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आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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आयुर्वेद-दर्शन

वस्थित सर्वं धातुपाकम्, अनुपहत सर्वं धातुप्रमाश्रुतस्रोतः केवलं शरीरसुपचयबलवर्णं सुखाद्युपायोजयति, शरीरधातून्जयति ।

धातवो हि धात्वाहाराः प्रकृतिमनुकुर्यते । तत्र आहारप्रसादाख्यो रसः किट्ठं च मलाख्यमभिनिवर्तते । किट्टात् स्वेद-मूत्रपुरीष, वातपित्तश्लेष्माणः, कर्णाक्षिनासिकास्य लोमकूप प्रजननमलाः, केशशमश्रुलोमनखाद्यश्चावयवाः पुज्यंति । पुज्यंति हि आहाररसात् रसरुधिरमांस मेदोऽस्थिमज्जशुक्रौजांसि । पंचेन्द्रियद्रव्याणि ‘धातुप्रसादं’ संज्ञकानि, शरीरसंविधंधपिच्छाद्यश्चावयवाः । ते सर्व एव धातवो मलाख्याः प्रसादाख्याश्च रसमलाभ्यां पुज्यंतः स्वमानमनुवर्तते यथा वयः शरीरम् ।

एवं रसमलौ स्वप्रमाणवस्थितौ आश्रयस्य समधातवो धातुसाम्यमनुवर्तयतः । निमित्ततस्तु क्षीणवृद्धानां प्रसादाख्यानां धातुनां वृद्धिक्षयार्थान् आहारमूलाभ्यां रसः साम्यमुत्पादयत्यायोग्याय । किट्ठं च मलानाम् । एवमेव स्वमानातिरिक्ताश्रोतसर्निणः शीतोष्णपर्ययगुणैश्वोपचर्यमाणा मलाः शरीरधातुसाम्यकराः समुपलभ्यते । तेषां तु मलप्रसादाख्यानां धातूनां स्रोतांस्ययन मुखानि । यथा स्वं तानि यथा विभागेन यथा स्वम् धातून् आपूरयति । ( च, सू. अ. २८ )

इध वर्गीकरणं मे उर्द्धी वातपित्तश्लेष्माश्वो का उल्लेख है जो विपाकजन्य और ‘मल’ हैं । और इसी हेतु से

वायोंविद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धान्त

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उनको मल वर्ग में रखना है। वातपित्तश्लेष्माविषयक उक्त कल्पना यद्यपि संकुचित है फिर भी एक समय एवंगुण-विशिष्ट-वातपित्तश्लेष्माओं को हेतुसंक्षेप में प्रधान माना जाता था। उपलब्ध ग्रंथों में कई अंश ऐसे हैं जिनमें इन मल संज्ञक वातपित्तश्लेष्माओं का ही विवेचन है।

किंतु तदुत्तरकाल में श्लेष्मापित्त्वाताविषयक ज्ञान अधिक व्यापक हुआ। उक्त वर्गीकरण के कर्ता, श्लेष्मापित्त्वात् शब्दों से मलों को ही संबोधित करते थे अतः वे ओज, ऊष्मा व धातु-प्रसाद को 'प्रसाद' वर्ग में रखते थे। किंतु तदुत्तरकालीन संप्रदायों को यह अभीष्ट नहीं था। वे श्लेष्मापित्त्वातों में ओज, ऊष्मा व धातुप्रसाद का समावेश कर के उनकी सिर्फ 'प्रकृपित' अवस्था को ही मलवर्ग में रखना चाहते थे। किंतु उनके इस समन्वय को जानने के पूर्व यह जानना अत्यावश्यक है कि उस समय ओज, ऊष्मा व धातुप्रसाद के विषय में किस प्रकार का ज्ञान था। अतः अब उस पर विचार करें।

ओज, तेज, व धातुप्रसाद.

आयुर्वेद में ओज के सामान्यतः तीन प्रकार उपलब्ध होते हैं, (१) शुक्रमल, (२) पर, और (३) अपर।

(१) शुक्रमल संज्ञक ओजः—यह शुक्र का अंश विशेष है। बागभट इसको शुक्र का मल कहते हैं। (बा. शा.

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आधुनिक दर्शन

अ. ३ श्लो. ६४ ) इसको बुद्धि-बल-वर्धक माना जाता है । इसकी रक्षा के लिये त्रव्याचर्य का विधान है । वर्तमान वैज्ञानिक भी इसका शुक्र संबंधी अवयवों से सूत [ अंतः सूत ] होना, इसके द्वारा बुद्धिद्रिय [ Nervous system नाडी संस्था ] का पोषण होना और इससे उपरिहृष लक्षणों [ मूछे, गंभीर स्वर इ० ] का पैदा होना स्वीकार करते हैं ।

२ पर ओजः—इस के विषय में यह कहा गया है किः-

यत् सारमादौ गर्भस्य यत्तद्रभैरसाद्रसः ।

संवर्तमानं हृदयं समाविशति यत्पुराः ॥ (च.सू.अ.३०)

पर ओज, गर्भ का 'आद्य सार' है । (अर्थात् शुक्रार्तव अथवा बीज Spermatozoon फल Ovum संज्ञक अणु अवयवों Cells का और उनके संयोग से बननेवाले 'गर्भांकुर' Fertilized Ovum का मूलघटक है । 'इसको जीवनायतनौजस्' Nucleo protein कहते हैं । यह शरीर गत समस्त 'अणु-अवयवों' में रहता है । ) यह गर्भरस का अर्थात् 'कलल' का भी सारभूत द्रव्य है । यह सर्व प्रथम हृदय में प्रविष्ट होता है और इस कारण ही हृदय, अन्य इंद्रियों के पहिले अपने कार्य में सम्यक् प्रवृत्त होता है ।

यस्यनाशाचतु नाशोस्ति 'धारि' यत् हृदयाश्रितम् ।

( च. सू. अ.३० )

वायोर्विद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत

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इसका जो हृदयस्थ अंश है वह सत्व, शरीर व आत्मा के संयोग को धारण करता है। अतः इसके नाश से जीवित ही नष्ट होजाता है।

प्रथमे जायते ह्योजः शरीरेऽस्मिन् शरीरिणाम् ।

सर्विर्वेणं मधुरसं लाजगंधि प्रजायते ॥ (च. सू. अ. १७)

प्राणियों के प्रथम शरीर में अर्थात् 'गर्भाकुर' में यह ची के सहस्र, मीठा, और धान के लावा के सहस्र गंधवाला रहता है। किंतु

हृदि तिष्ठति यच्छुद्धं रक्तभीषत्सपीतकम् ।

आजः शरीरं संख्यातं तन्नाशान्ना विनश्यति ॥

(च. सू. अ. १७)

जो पर आज हृदय में रहता है और जिसके नाश से जीवित नष्ट होता है वह सुरखी मायल पीला रहता है।

(३) अपर ओजः— इसके विषय में यह कहा गया है किः—

आजोचहा शरीरेऽस्मिन् विधम्यंते समंततः ।

येनौजसा वर्तयति ग्रीणिताः सर्वजंतवः ॥

यत् शरीरं रस स्नेहः प्राणायत्र प्रतिष्ठिताः ।

यं दत्ते सर्व भूतानां जीवितं नावतिष्ठते ॥

(च. सू. अ. ३०)

१ इन अंशों को हमने जानबूझ कर आगे पीछे किया है।

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आयुर्वेद-दर्शन

जिस अपर ओज के कारण शरीरावयव तृप्त होकर प्राणी जीवित रहते हैं; जो धातुरस का सारभूत पदार्थ ( पोषक द्रव्य, Protein ) है; ( प्रायः इसी हेतु धातु-रस को भी ' रसश्वैजः संख्यातः ' इस तरह ओज कहने की प्रथासी पड गई ) जिसमें प्राणों ( सत्व, शरीर, आत्मा अथवा सत्व रज तम वायु अग्नि सोम और आत्मा ) का वास्तव्य रहता है और जिसके बिना प्राणियों का जीवित रह नहीं सकता उसको ओजोवहा ( धमनियाँ ) शरीर में चारों ओर पहुंचाती हैं।

यह अन्न से प्राप्त होता है और इसी की विशुद्ध अवस्था को पर ओज कहते हैं।

ओज के उक्त विवेचन में उसके सामान्यतः तीन कार्यों का उल्लेख है; शरीर को तृप्त करना, प्राणों के संयोग को धारण करना अर्थात ही ' संबद्ध ' करना और उस संयोग को बनाये रखना अर्थात जीवन को कायम रखना। तदनुसार क्षीणौजस् पुरुष के लक्षणों के विषय में यह कहा गया है कि:-

बिभेति दुर्बलोऽभीक्षणं ध्यायति न्यथितेन्द्रियः ।

दुच्छायो दुर्भना रुक्षः क्षामश्चैवोजसः क्षये ॥

( च. सू. अ. १७ )

इस पर से यह ज्ञात होगा कि ओज का मुख्य कार्य 'संबंध-विधान' है चाहे फिर वह अवयवों का हो अथवा प्राणों का।

वाचोविद् का रसवाद और त्रिधातुसिद्धांत

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अवयवों के सुसंबद्ध रहने से शरीर में बल रहता है और जब यह संबंध शिथिल होता है तब शरीर दुर्बल होता है। और यह दोनों बातें ओज के अस्तित्व और अभाव पर अवलंबित हैं। इसी हेतु से यह कहा गया है कि:—

देहस्यावयवस्तेन व्याप्तो भवति देहिनाम् ।

तदभावाच्च शीर्यते शरीराणि शरीरिणाम् ॥ (सु. सं.)

ओज के कारण देह के समस्त अवयव आपस में सुसंबद्ध हैं किंतु जब वह क्षीण होता है तब शरीरावयव असंबद्ध फलतः शिथिल रहते हैं। ओज की विलंसन, व्यापद् और क्षय संज्ञक अवस्थाओं में भी संधिविश्लेषण को प्रधान लक्षण माना जाता है।

ओजगत इस धर्म को आयुर्वेद में 'बल' कहते हैं। बल-संज्ञक इस धर्म को आरंभ में ओज से अभिन्न माना जाता था। अतः कुछ संप्रदाय ओज को ही 'तत्त्वल्लोजस्त-देव बलमुच्यते' (सु. सं.) इस तरह बल शब्द से संबोधित करते थे। किंतु जो संप्रदाय बल के तत्त्वतः पृथक् अस्तित्व का अनुभव करने लगे थे वे इस का अलग ही विवेचन करते थे। उनका कहना था कि 'बलेन स्थिरोपचित मांसता सर्वे चेषास्वप्रतीघातः स्वरवर्णप्रसादो बाह्यानामाभ्यंतर्णा च करणानामात्मकार्ये प्रतिपत्तिर्भवति'। इसी तरह वे बल के

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आयुर्वेद-दर्शन

व्यापद् विस्मसन और क्षय लक्षणों का भी पृथक् ही विवेचन करते थे । चरक-संहितांतर्गत बल-लक्षण भी यहां ध्यान में रखना चाहिये । जैसा कि:—

त्रिविधं बलमिति । सहजं, कालजं, युक्तिक्तं च । सहजं यत् शरीर सत्वयोः प्राकृतम् । कालकृतं, ऋतुविभागजं वयः कृतं च । युक्तिक्तं, पुनस्तद्यदाहारचेष्टा योगजम् ।

[ च. सू. अ. ११ ]

ऊष्मा को भी पहिले वर्गीकरण के समय मल-संज्ञक पित्त से पृथक् माना जाता था । क्योंकि पहिले वर्गीकरण में 'ऊष्मा' को अन्न के विविध अंशों तथा शारीरधातुओं में रहनेवाला और अंतराग्नि से संशुद्धित होकर अपने २ अंशों तथा धातुओं का पाचन करनेवाला 'पदार्थ विशेष' सिद्ध किया गया है । इस तरह उस समय इस पदार्थ को अग्नि-संशुद्धित व पाचन-कर्ता स्वीकार करते हुए भी अग्नि और मलसंज्ञक पित्त दोनों से अलग ही रक्खा जाता था ।

कुछ संप्रदाय 'ऊष्मा' शब्द का 'ताप' के अर्थ में प्रयोग करते थे जैसा कि 'मात्रामात्रात्त्वमूष्मणः' (च. सू. अ. १२) इसमें किया गया है । अतः इस पदार्थ को 'तेज' शब्द से भी संबोधित किया जाने लगा । जैसा कि 'ओजस्तेजोऽप्ययः प्राणा श्रोत्रा देहाग्नि हेतुकाः' (च.चि.अ. १९) इसमें कहा गया है । सुश्रुत-संहिता

ब्रायोविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत

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में इस को 'तेज' शब्द से ही संबोधित किया है और उसका ओज व बल के सहस्र विवेचन किया है। यथा:-

तेजोऽप्योभ्रयं क्रमशः पञ्चमानानां धातूनाम भिनिर्वृत्तामंत- रस्थं स्नेहजातं वसाल्यं क्षीणां विशेषतो भवति। तेन मार्दव सौकुमार्यं श्रुद्धरपोभतोत्साहदृष्टिस्थितिपात्तिकीतिद्वितीयो भवति। (सु. सू. अ. १५)

अर्थात् तेज भी क्रमशः परिपाचित होनेवाले धातुओं से निकलनेवाला 'वसा'ल्य स्नेह समुदाय है। यह अग्नि-गुणात्मक होकर स्त्रियों में विशेष (विशिष्ट प्रकार का) रहता है। इस से तनुमार्दव, सुकुमारपन, रोम में मृदुता व अल्पता, उत्साह, दृष्टिस्थिति, पाचन, कांति इ. रहते हैं।

शरीरगत स्नेहजात को पाश्चात्य Fats अथवा Lipoids कहते हैं। इसी का एक उत्तम प्रकार Lecithin है। यह रक्त के श्वेत कणों में, अंडे में और भिन्न २ शरीररसों में विशेषतः अणुअवयवों के जीवनरस में रहता है। आयुर्वेदांतर्गत उक्त वसाल्य तेज भी इस से अतिरिक्त वस्तु नहीं है। नव्य-विज्ञान-दृष्ट्या भी यह अग्निगुणात्मक है। क्योंकि प्राणवायु, के संबंध से इसका व्यवहन होना और उससे ऊष्मा या ताप की वृद्धि होना विज्ञान सम्मत है। स्त्रियों में अर्थात् स्त्रियों के 'फल' में यह विशेष प्रकार का होता है। गर्भांकुर में

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आयुर्वेद-दर्शन

परओज का जितना महत्त्व है उतना ही फलगत तेज का है । यहाँ यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि शुक्रमलसंज्ञक ओज, जिस तरह पुरुष के शुक्र संबंधी अवयवों से अंतःस्रुत होता है उसी तरह स्त्रियों के फल संबंधी अवयवों ( अंतःफल Ovary अथवा फलकोष Graafian follicles ) से भी एक प्रकार के स्निग्ध द्रव्य का अंतःस्रुत होना संभवनीय माना जाता है । दृष्टि-स्थिति-विधायक तेज, तेजोजल [ इसका 'तेजोजलाश्रितवाहाम्' सु. अ. उ. १ इस तरह उल्लेख है । इसको पाश्चात्य Aqueous Humours कहते हैं ] में रहता है । दीप्तिकांतिकर तेज, मांसधरात्त्वक के केश-गृहों के नीचे वाले पिंडों में रहता है ।

इस तेज के भी व्यापद् विस्मसन-क्षयसंज्ञक विकारों का अलग विवेचन उपलब्ध होता है ।

धातु-प्रसाद को पहिले वर्गीकरण में पंचेंद्रियों का द्रव्य कहा गया है और उसके अनेक होने का भी स्वीकार किया गया है । वर्तमान समय के वैज्ञानिकों को इसके श्वेत और धूसर दो प्रकार उपलब्ध हुए हैं । इंद्रियव्यापकस्पर्श-नेंद्रिय अथवा नाडीसंस्था Nervous system इन्हीं की बनी हुई है । पंचज्ञानेंद्रिय, पंचकर्मेंद्रिय, अर्तीन्द्रिय, बुद्धीन्द्रिय इनकी रचना इन्हीं द्रव्यों की है । इस तरह यह धातुप्रसाद, ज्ञान

वार्योविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत

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व चेष्टा दोनों का वाहक है। पहिले वर्गीकरण में इसका उल्लेख शारीर प्रसादधातु में किया है।

यह मानी हुई बात है कि ओज, ऊष्मा [ तेज ] और धातुप्रसाद इनके विषय का इतना ज्ञान बहुत समय के अन्वेषण का फल है। अतः पहिले वर्गीकरण वालों को इन के विषय में कितना ज्ञान था यह तो तर्क से ही जानना उचित है। किंतु यह तो स्पष्ट ही है कि वे इनको जानते थे और इनको वातपित्तश्लेष्माओं से अलग रखते थे। पर जो संप्रदाय इनका वात्पित्तश्लेष्माओं में समन्वय करना चाहते थे और इनकी सिर्फ कृपित अवस्था को ही 'मल' वर्ग में रखना चाहते थे उनके विधानोंपर अब विचार करना चाहिये।

ओज तेज ऊष्माओं का श्लेष्मपित्तवातों में समन्वय

षड् रसवादी, मधुरप्रपाकजन्य और रसविकृतिरूप उदक को पिच्छिल कहते ही थे। सचेतन द्रव्यों को गुर्वादि संज्ञाओं से संबोधित करनेवाले संप्रदायों की दृष्टि में यह पैच्छिल्य एक सचेतन द्रव्य प्रतीत हुआ। इसका वे समस्त शरीर में विविधरूप में अनुभव करते थे। और इसीके द्वारा अवयवों का जुड़े हुए या लिपटे हुए रहना प्रमाणित करते थे। क्योंकि प्रत्येक संधि में इसका किसी न किसी रूप में अस्तित्व प्रतीत होगा था। और इसकी

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आयुर्वेद-दर्शन

विकृत अवस्था में संधि शैथिल्य का होना भी पाया गया था। इनकी दृष्टि इस द्रव्य के श्लेषण धर्म पर अधिक थी। इस श्लेषणधर्म को ये 'बल' कहते थे और उनको इस बल का ओजगत बल के साथ अभिन्नत्व प्रतीत हो गया था। परिणाम यह हुआ कि वे इस द्रव्य में और ओज में भी अभिन्नत्व प्रस्थापित करने लगे। जैसा कि:—

प्राकृतस्तु बलं श्लेष्मा विकृतो मल उच्यते ।

स चैवोजः स्मृतः काये सचपाप्मोप दिश्यते ॥

( सु. सू. अ. १७ )

इस पर से व्यक्त होता है। इसमें प्रकृत अवस्थापन्न पिच्छिल-गुण श्लेष्मा को बलोत्पादक (अथवा बल) और उसकी विकृतावस्था को मल (अथवा मलवर्गीय) कहा गया है। सिवाय श्लेष्मा को ओज कहकर यह व्यक्त किया है कि ओज, श्लेष्मा का ही प्रकार है। सारांश पहिले वर्गीकरण के समय जिस ओज को श्लेष्मा से भिन्न माना जाता था उसका तदुत्तर काल में श्लेष्म शब्द में ही समावेश किया जाने लगा। अब जब कि ओज का घटक श्लेष्मा ही सिद्ध हुआ तब ओजगत बल को भी श्लेष्मा का धर्म मानना तर्कसंगत था। किंतु इस बल के विषय में हम आगे चलकर देखेंगे कि तदुत्तर काल में इस बल को वायु का प्रकार कहने लग गये थे।

बायोविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धान्त

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वर्तमान वैज्ञानिकों के मत से 'मुट्रुश्लेष्म' Mucin और कफकल्प Mucoids ओज के प्रकार माने जाते हैं। तदनुसार 'अणुश्लेष्म' Inter Cellular material 'कल्ल-श्लेष्म,' Jelly Like Tissue (जिसको कि आयुर्वेद में भी 'खेटभूतः' च. शा. अ. ४ अर्थात् श्लेष्मा कहा गया है, ) 'धातु श्लेष्म,' Areolar Tissus 'संधिश्लेष्म' Synovia आदि पदार्थों को ओज के प्रकार कहते हैं। किंतु उक्त आयुर्वेदिक संप्रदायों की दृष्टि में श्लेष्मा ही मूल-भूत 'गुण' है और उसीके प्रकार कफकल्प और ओजस् द्रव्य हैं।

ऊष्मा अथवा तेज संज्ञक वसाख्य द्रव्य का भी 'पित्त' शब्द में अंतर्भाव किया गया। जैसा कि:—

पित्तादेवोष्मणः पक्तिर्नराणासुपजायते।

तच्च पित्तं प्रकुपितं विकारान्कुस्तेवहन् ॥

(च. सू. अ. १७)

इस पर से व्यक्त होता है। यहां प्रकरणानुरोध से 'पित्तादेवोष्मणः' का अर्थ 'पित्तसंज्ञकवसाख्यद्रव्य' है। क्योंकि पहिले श्लोक में जिस कदर ओज संज्ञक सचेतन द्रव्य को श्लेष्मा में समन्वित करने का यत्न किया गया है उसी तरह इस श्लोक में वसाख्य सचेतन द्रव्य को पित्त में समन्वित करने

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आयुर्वेद-दर्शन

का यत्न हुआ है। पहिले वर्गीकरण में इस तेजसंज्ञक वसा को ही ‘अंतराग्नि से संयुक्त होनेवाला ऊष्मा’ कहा गया। और उसको अम्लप्रपाकजन्य पित्त से अलग रक्खा। किंतु तदुत्तर काल में ऐसा कि उक्त श्लोक पर से विदित होता है; पित्त शब्द को अधिक व्यापक बनाया गया और उसमें ऊष्मा या तेज संज्ञक वसा का भी समन्वय किया गया।

इस वसाख्य पित्त का प्राणवायु के संबंध से प्रवचन होकर ताप की वृद्धि होना विज्ञानसम्मत है। संभव है कि यह बात भी ऋषियों के ध्यान में आ चुकी हो और तदनुसार वे ऊष्मा शब्द से ‘ताप’ को संबोधित कर के उसका पित्त शब्द में ही अंतर्भाव करने लगे हों। क्योंकि ‘पित्तादेवोष्मणः’ का उक्तानार्थ ‘पित्तसंज्ञक ताप’ होता है और वह भी अभिप्रेत है।

शरीरगत ऊष्मा चाहे तेजसंज्ञक वसा हो अथवा ताप हो पहिले वर्गीकरण के अनुसार अन्न में (यहां मूल में ‘यथास्वम्’ इतना ही कहा है। प्रत्येक संप्रदाय इसका अर्थ अपने २ वर्गीकरण के अनुसार कर सकता है। उदाहरणार्थ षड्दरसवादी अन्न को षडास्वादों में विभक्त करते थे तदनुसार अन्नगत ऊष्मा षड्विध होगा किंतु कुछ संप्रदाय अन्न का पृथिव्यादि धातुपंचक या भतपंचक में विश्लेषण करते थे तदनुसार ऊष्मा भी भौम-आप्य इत्यादि प्रकारों से पंचविध होगा।)

वायोंविद् का रसवाद और विधातु सिद्धांत

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व रसरत्नादि धातुओं में ( अर्थात् समविध ) रहता है और वह अंतरम्नि द्वारा संधुक्षित एवं बलवान् होकर निरंतर समस्त-धातुओं का पाक करता है । पहिले वर्गीकरण वालों की दृष्टि में इस पाचक ऊष्मा का अस्तित्व अम्लप्रपाकजन्य मलसंज्ञक पाचक रस में होना ही चाहिये । फिर भी वे इस ऊष्मा को और तज्जनक अग्नि को मलसंज्ञक पित्र से अलग ही रखते थे । किंतु जो संप्रदाय ऊष्मा को पित्र शब्द से संबोधित करने लग गये थे अथवा ऊष्मा ( ताप ) व अग्नि शब्द समानार्थक मानने लग गये थे वे अंतरम्नि को भी पित्र शब्द से ही संबोधित करना चाहते थे ।

अंतरम्नि के स्वरूप के विषय में भी भिन्न-भिन्न मत दिखाई देते हैं । उदा० भारद्वाजीय धातुपंचकवादानुसार यह अग्निसंज्ञकधातु नित्य अचेतन द्रव्य है, षड्धातुवादानुसार उष्णत्व लक्षण गुण है, शब्दादि गुण प्रधानतावादियों के अनुसार रूपगुणक महाभूत है तो अग्निषोम लोकपक्ष के अनुसार धर्म है । कुछ संप्रदाय इसके ऊष्मा के सहस ही भौतिकान्न और धात्वग्निनों के रूप में प्रभेद करते थे । कुछ संप्रदाय इसका प्रधान स्थान नाभि भाग में तत्रत्य सोम-मंडलांतर्गत सूर्य मंडलों में मानते थे । कुछ संप्रदाय इसका पित्र से अलग अस्तित्व ही नहीं मानते थे । इनके मत से सूर्य मंडलगत अग्नि, प्रदीपवत् नहीं अपितु अवयव विशेष है ।

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आयुर्वेद-दर्शन

जिस तरह ओज का स्नेष्म शब्द में और ऊष्मा का पित्त शब्द में सप्तन्वय किया गया उसी तरह धातुप्रसाद का विशेषतः तद्गत 'करणवृत्ति' संज्ञक व्यापारों का वायु शब्द में अतर्भाव किया गया। जैसा कि:—

सर्वा हि चेष्टा वातेन स प्राणः प्राणिनां स्मृतः । तेनेव रोगा जायन्ते तेन चैवोपरुध्यते ॥

(च. सू. अ. १७)

इस विधान पर से ज्ञात होता है। किंतु यह घटना यका-यक नहीं हुई। अतः उस पर विचार करना आवश्यक है।

षड्ऋसवादी, अन्न के कटु प्रपाक से शरीर में वायु का प्रादुर्भाव मानते थे। यह वायु अधवा वायवीय द्रव्य उनकी दृष्टि से स्नेष्मा व पित्त के सहस्र 'मल' ही था। वे इसको अन्नकिट् का अर्थात् कटुप्रपाक के बाद अन्नरस का पिंडीभूत जो शेष अंश रहता है उसका मल कहते थे। इस वायु को वे शरीरगत समस्त चेष्टाओं का प्रवर्तक समझते थे। क्योंकि उस समय धातुप्रसाद को सिर्फ पंचैन्द्रिय द्रव्य अर्थात् ज्ञानवाहक ही माना जाता था और इस पहिले वर्गीकरण में उसका अलग ही उल्लेख किया जाता था।

इसमें संदेह नहीं कि महास्रोत में अन्नके मधुर अम्ल और कटु ये तीन प्रपाक क्रमशः होते हैं और उनके द्वारा अन्न का सूक्ष्मातिसूक्ष्म विश्लेषण हो जाता है। कटुप्रपाक

वायोविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धान्त

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जन्य वायु, अन्न के विश्लेषण का अंतिम सूक्ष्मतर शेष अर्थात् ही अन्न का सूक्ष्मतर घटक है। आगे यह भी मालूम हुआ होगा कि इस प्रकार का वायु अनशन व्यायाम आदि के कारण भी पैदा होता है अर्थात् यह शारीर धातुओं का भी सूक्ष्मतर घटक है। इन प्रपाकजन्य वायुओं के अतिरिक्त श्वसनेंद्रिय के द्वारा प्रविष्ट होनेवाले और निकलने वाले वायु का भी ज्ञान था ही। संभव है कि किसी समय इन वायवीय द्रव्यों में किसी प्रकार का भेद न किया जाता हो किंतु जब श्वसनेंद्रिय द्वारा प्रविष्ट होने वाले और उच्छ्वासन द्वारा बाहर निकलने वाले वायुओं के नैसर्गिक आवश्यकता और अनावश्यकताओं पर ध्यान आकृष्ट हुआ तब प्रपाकजन्य वायुओं की अपेक्षा उसको अधिक महत्वपूर्ण एवं शारीरधातुघटक माना गया जो श्वास के द्वारा समस्त शरीर में संचार करता है। आगे इसको 'प्राण' शब्द से और प्रपाकजन्यों को 'उदान' व 'अपान' शब्दों से संबोधित किया जाने लगा। यद्यपि इस विषय में अधिक कुछ नहीं कहा जा सकता तथापि यह निश्चय है कि आरंभ में कटु प्रपाक जन्य वायु को ही समस्त शारीर धातुओं का प्रधान घटक माना जाता था किंतु अंत में श्वसनेंद्रिय संचारी प्राण को ही प्रधान माना गया और शेष वायुओं को अपान न्यान उदान समान संज्ञाओं से संबोधित किया जाने लगा।

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आयुर्वेद-दर्शन

इसी तरह धातुप्रसाद विषयक ज्ञान में भी प्रगति हुई। धातुप्रसाद को आरंभ में केवल ज्ञानवाहक पंचोद्विगद्रव्य कहते थे किंतु बाद में 'चेष्टावाहक' भी कहा जाने लगा। अब जब कि समस्त शारीर धातुओं का प्रधान घटक प्राणद्रव्य है तब धातुप्रसाद का भी प्रधान घटक प्राण ही होना चाहिये और शरीर गत समस्त चेष्टाएँ भी प्राण के कारण ही होना चाहिये। अतः धातुपंचकवादियों ने धातुप्रसाद का वायु में समन्वय करने के हेतु से उक्त 'सर्वाहिचेष्टावातेन' इत्यादि विधान किया।

इस तरह ओज ऊष्मा व धातुप्रसाद जैसे द्रव्यों का श्लेष्मपित्तवातों में अंतर्भाव किये जाने पर उनको (श्लेष्मपित्तवातों को) मलवर्ग में रखना अनुचित प्रतीत होने लगा और ओज ऊष्मा व धातुप्रसाद का पृथक् उल्लेख करने की आवश्यकता भी नहीं रही। सिवाय इस समय गुणप्रसादाख्यवर्ग के विषय में भी समुचित ज्ञान हो चुका था बल्कि यूं कहना चाहिये कि औजस् और तैजस् समस्त द्रव्य, गुणप्रसादाख्य वर्ग के ही रूपांतर प्रतीत होने लग गये थे। ( विज्ञान दृष्ट्या भी औजस् तैजस् द्रव्य, गुणप्रसादाख्य वर्ग के ही दो प्रधान रूप हैं; इन रूपों में ही इस वर्ग की उपलब्धि होती है। ) इन सब कारणों से शारीरधातुओं का दूसरी बार वर्गीकरण हुआ।

जैसा कि:—

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दूसरा वर्गीकरण.

शारीरधातवस्त्वेवं (अथवा शारीरधातुगुणाः) द्विविधाः संप्रहेण मलभूताः प्रसाद-भताश्च । तत्र मलभूतास्ते ये शरीरस्य बाधकराः स्युः । तद्यथा-शरीरच्छिद्रेषूपदेहाः पृथक्जनमानो बहिर्मुखः परिपकाश्चधातवः प्रकुपिताश्च वातपित्तश्लेष्माणां ये चान्येऽपिकेचित् शरीरे तिष्ठतो भावाः शरीरस्योपघातायोपतिष्ठन्ते सर्वास्तान् मले प्रचक्षमहे । इतरास्तु प्रसादे, गुर्वादींश्चद्रव-तान् 'गुण' भेदेन, रसादींश्च शुक्तांन् 'द्रव्य' भेदेन ।

( च. शा. अ. ६ )

इसमें बाधकर और अबाधकर की दृष्टि से मल व प्रसाद संज्ञक दो प्रधान वर्ग किये गये हैं और तदनुसार 'मल' वर्ग में केवल प्रकुपित अर्थात् बाधकर वातपित्त श्लेष्माओं का उल्लेख किया है; अकुपित वातपित्तश्लेष्माओं का नहीं । प्रसाद वर्ग में गुणप्रसादाख्य और द्रव्य प्रसादाख्य इस तरह दो वर्ग किये हैं । तहां गुण प्रसादाख्य वर्ग के प्रकारांतर ही ओज, तेज व धातुप्रसाद हैं और समस्त द्रव्य-प्रसादाख्य वर्ग इनका ही बना हुआ है । चूंकि जब कि इस वर्गीकरण के 'मल' वर्ग में प्रकुपित वातपित्तश्लेष्माओं का स्पष्ट उल्लेख है तब अकुपित वातपित्तश्लेष्माओं का 'प्रसाद' वर्ग में स्पष्ट उल्लेख होना चाहिये था । पर सचेतन द्रव्यों के इस वर्गीकरण में गुण प्रसादाख्य वर्ग का उल्लेख करना ही वचित

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आयुर्वेद-दर्शन

प्रतीत होता है। यहाँ यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि उस समय श्लेष्म, पित्त और वात इन शब्दों में ओज तेज व धातुप्रसाद जैसे सचेतन द्रव्यों का समावेश किये जाने के साथ २ उदक, अभि और वयवीय द्रव्य (प्राण) जैसे अचेतन द्रव्यों का भी संग्रह हो गया था। अर्थात् वातपित्तश्लेष्म शब्दों से शरीरगत सचेतन व अचेतन दोनों प्रकार के मूलभूत द्रव्यों को संबोधित किया जाता था।

वातपित्तश्लेष्माओं की प्राकृत वैकृत अवस्थाएँ

इस तरह वातपित्तश्लेष्म शब्द अधिक व्यापक हो जाने के कारण उनकी सामन्यतः दो अवस्थाएँ स्वीकार की गईं। एक प्राकृत अथवा अकुपित और दूसरी वैकृत अथवा कुपित। और तदनुसार उनके कार्यों का भी निर्णय किया गया। जैसा कि:—

नित्याः प्राणभूतां देहे वातपित्तकफा क्षयः । विकृताः प्रकृतिस्था वा तान् बुध्दत्सेथ पंडितः ॥ उत्साहोच्छ्वास निःश्वास चैष्टा धातुगतिः समाः । समो मोक्षो गतिमतां वायोः कर्माविकारजम् ॥ दर्शनं पाकिरूष्मा च क्षुत्तुष्णा देहमार्दवम् । प्रभा प्रसादो मेधा च पित्तकर्माविकारजम् ॥ स्नेहो बंधः स्थिरत्वं च गौरवं वृषता बलम् । शुमा धृतिरलोमश्च कफकर्माविकारजम् ॥

ज्ञानोविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत

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वाते पित्ते कफे चैव क्षीणे लक्षणमुच्यते ।

कर्मणः प्राकृताद्वाग्निर्द्वेष्टि वापि विरोधिनाम् ॥

दोष प्रकृति वैशेष्यं नियतं वृद्धि लक्षणम् ।

दोषाणां प्रकृतिर्हानिर्द्वेष्टिश्चैवं परीक्ष्यते ॥

( च. सू. अ. १८ )

यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिये कि इन अंशों में प्राकृत वैकृत शब्द सामान्यतः अकुपित कुपित के समानार्थक हैं और प्राकृत कार्यों में मुख्यतः उन कार्यों का उल्लेख किया गया है जिनकी भित्ति पर तदुत्तर काल में वातपित्तक्षेपमाओं के पांच २ प्रकार किये गये ।

इसके बाद जब ऋषियों का ध्यान भिन्न २ मनुष्यों की भिन्न २ ' प्रकृतियों ' पर और उनके कारणों पर आकृष्ट हुआ तब प्राकृत वैकृत शब्दों की व्याख्या भी बदल गई ।

प्रकृति के विषय में यद्यपि सामान्यतः यह स्वीकार कर लिया गया था कि " प्रकृति में जाति, कुल, देश, काल, वय और आत्मा ( निज ) के भावविशेष शामिल रहते हैं और तदनुसार वह जातिप्रसक्ता, कुलप्रसक्ता, देशानुपातिनी, कालानुपातिनी, वयोनुपातिनी तथा प्रत्यात्मनियता होती है " ( च. इ. अ. १ ) तथापि इनकी सबकी वह में वे मुख्यतः प्रत्यात्मनियता को ही देखते थे ।