भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
| ४१२ | भैषज्यरत्नावली । | [ अग्निमान्द्य- |
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अम्लवेतसजम्बीरमातुलुङ्गानि माक्षिकम् ।
नवनीतं घृतं तक्रं सौवीरकतुषोदके ॥ २३ ॥
धान्याम्लं कटुतैलं च रामठं लवणाईकम् ।
यमानी मरिचं मेथी धान्यकं जीरकं दधि ॥ २४ ॥
ताम्बूलं तप्तसलिलं कटुतिक्तौ रसावपि ।
मन्दानलेऽप्यजीर्णेऽपि पथ्यमेतन्नृणां भवेत् ॥ २५ ॥
रोगीकी अवस्थाको यथाविधि विचारकर कफजन्य अजीर्णमें प्रथम वमन, पित्तके अजीर्णमें प्रथम मृदु विरेचन और वातके अजीर्णमें प्रथम स्वेद देना आदि क्रियायें हितकर हैं एवं विविध प्रकारकी व्यायाम (दण्ड कसरत आदि परिश्रम) अग्निप्रदीपक और लघुपाकी पदार्थ, बहुत पुराने और बारीक लाल शालिधानोंके चावल, विलेपी एवं खीलोंका माँड, भातका माँड मूंगका यूष, मद्य तथा हिरन, मोर, खरगोश, लवापक्षी इस सबका मांसरस, सर्व प्रकारकी छोटी २ मछलियाँ, शान्तिशाक, बेतके अंकुर, बथुएका शाक, कच्चीमूली, लहसुन, पक्का पेठा, कच्ची केलेकी फली, सहिंजनेकी फली, परवल, बैंगन, नीम, ककोडा, करेला, बडी कटेरीके फल, अदरख, गन्धप्रसारिणी, मेढासिंगी, नोनिया, चौपतिया शाक, आमला, नारंगी, अनार, जौका मांड पित्तपापडा, अम्लवेत, जम्बीरी नींबू, बिजौरा नींबू, शहद, मक्खन, घी मट्ठा, सौवीरनामवाली कांजी, तुषोदक और धान्याम्लनामक काँजी, सरसोंका तेल, हींग, सेंधानामक और अदरख, अजवायन, मिरच, मेथी, धनियाँ, जीरा, दही, पान, गरम जल एवं चरपरे और कडुवे रसवाले पदार्थ ये मन्दाग्नि और अजीर्णरोगमें पथ्य हैं ॥ १७-२२५ ॥
अग्निमान्द्यरोगमें अपथ्य ।
विरेचनानि विण्मूत्रवायुवेगविधारणम् ।
अध्यशनं समशनं जागरं विषमाशनम् ॥ २२६ ॥
रक्तस्रुतिं शमीधान्यं मत्स्यं मांसमुपोदिकाम् ।
जलपानं पिष्टकं च जाम्बवं सवमालुकम् ॥ २२७ ॥
कूर्च्चिकां मोरटं क्षीरं किलाटं च प्रपाणकम् ।
तालास्थिसस्यं तद्नालं स्नेहनं दुष्टवारि च ॥ २२८ ॥
विरुद्धासात्म्यपानान्नं विष्टम्भीनि गुरूणि च ।
अग्निमान्द्येऽप्यजीर्णे च सर्वाणि परिवर्जयेत् ॥ २२९ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४१३
विरेचन, मल-मूत्र और अधोवायुके वेगको रोकना, भोजनपर भोजन करना, अपथ्य पदार्थोंका भोजन, रातको जागना, विषमभोजन, रक्तमोक्षण, सब प्रकारके दो दलवाले अन्न, मछली, मांस, पोईका शाक, अधिक जलपान, पिष्टक, जामुन, सर्व प्रकारके आलू आदि कन्द, फटा हुआ दूध, खीस, मद्य अधिक शरबत व पन्ना ( मिष्टान्न पकवान आदि ), ताडके फलकी गुठलीकी मींग, घी-तैलादि स्नेहपदार्थ, दूषितजल, स्वभावविरुद्ध व प्रकृतिविरुद्ध और असात्म्य अन्नपान विष्टम्भकारक और गुरुपाकी पदार्थ समस्त मन्दाग्नि और अजीर्णरोगमें सर्वथा त्याग देना चाहिये ॥ २२६-२२९ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्याम् अग्निमान्द्यचिकित्सा ।
कृमिरोग-चिकित्सा ।
पारसीययमानीं पीत्वा पर्युषितवारिणा प्रातः ।
गुडपूर्वां कृमिजातं कोष्ठगतं पातयत्याशु ॥ १ ॥
प्रातःकालमें खुरासानी अजवायनके चूर्ण किंचित् गुड मिलाकर बासी जलके साथ पीनेसे मलके साथ कोष्ठगत कृमि तत्काल निकल जाते हैं ॥ १ ॥
पारिभद्रकपत्रोत्थं रसं क्षौद्रयुतं पिबेत् ।
केबूकस्य रसं वापि पत्तूरस्याथवा पुनः ॥
फरहदके पत्तोंके रसको वा केउआँके अथवा पतङ्गरके पत्तोंके रसको शहद मिलाकर पान करनेसे सब प्रकारके कृमि नष्ट होते हैं ॥
लिह्यात् क्षौद्रेण वैडङ्गं चूर्णं कृमिहरं परम् ॥ २ ॥
वायविडंगके चूर्णको शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे यह चूर्ण सब प्रकारके कृमिको नष्ट करता है ॥ २ ॥
मुस्ताखुकर्णीफलशिग्रुदारुक्वाथः सकृष्णाकृमिशत्रुकल्कः ।
मार्गद्वयेनापि चिरप्रवृत्तान् क्रिमीन्निहन्ति क्रिमिजांश्च रोगान् ॥
नागरमोथा, मूसाकानी, हरड, आमला, बहेडा, सहिंजनेकी छाल और देवदारु इनके क्वाथमें पीपलका चूर्ण और वायविडङ्गका चूर्ण डालकर पान करनेसे ऊर्ध्व और अधः इन दोनों मार्गोंसे निकलनेवाले बहुत दिनोंके कृमि तथा कृमिजन्य अन्यान्य उपद्रव नष्ट होते हैं ॥ ३ ॥
४१४ | भैषज्यरत्नावली । | [ कृमिरोग-
पलाशबीजस्वरसं पिबेद्वा क्षौद्रसयुतम् ।
पिबेत्तद्बीजकल्कं वा तक्रेण कृमिनाशनम् ॥ ४ ॥
ढाकके बीजोंके स्वरसको शहदके साथ मिलाकर पीनेसे अथवा ढाकके बीजोंके चूर्णको मट्ठेके साथ सेवन करनेसे कृमि नष्ट होते हैं ॥ ४ ॥
क्वाथं खर्जूरपत्राणां सक्षौद्रमुषितं निशि ।
पीत्वा निवारयत्याशु कृमिसङ्घमशेषतः ॥ ५ ॥
खजूरके पत्तोंके वासी क्वाथको शहद मिलाकर पान करनेसे सर्व प्रकारके कृमि तत्काल नष्ट होते हैं ॥ ५ ॥
अपक्वं क्रमुकं पिष्टं पीतं जम्बीरजै रसैः ।
निहन्ति विड्भवं कीटं रसः खर्जूरजम्ब्वयोः ॥ ६ ॥
कच्ची सुपारीको जलमें पीसकर जम्भीरी नींबूके रसके साथ अथवा खजूरके पत्तोंका रस और जामुनके पत्तोंका रस मिलाकर पान करनेसे मलमें उत्पन्न हुए कृमि निश्चय नष्ट होते हैं ॥ ६ ॥
पिबेत्तुम्बीबीजचूर्णं तक्रेण कृमिनाशनम् ॥ ७ ॥
कडुवीतोंबीके बीजोंके चूर्णको मट्ठेके साथ सेवन करनेसे कृमि दूर होते हैं ॥ ७ ॥
नारिकेलजलं पीतं सक्षौद्रं कृमिनाशनम् ॥ ८ ॥
नारियलके जलमें शहद डालकर पान करनेसे कृमि नष्ट होते हैं ॥ ८ ॥
विडङ्गपिप्पलीमूलशिग्रुभिर्मरिचेन च ।
तक्रसिद्धा यवागूः स्यात् कृमिघ्नी ससुवर्चिका ॥
पीतं बिम्बीघृतं हन्ति पक्वामाशयगान्कृमीन् ॥ ९ ॥
वायविडङ्ग, पीपलामूल, सहिजनके बीज और कालीमिरच इन सबके चूर्णके साथ मट्ठेमें यवागू सिद्ध करके उसमें सज्जीका चूर्ण डालकर पान करनेसे अथवा बिम्बी (कंदूरी) के द्वारा सिद्ध किये हुए घीको सेवन करनेसे आमाशय और पक्वाशयगत कृमि नष्ट होते हैं ॥ ९ ॥
यमानीं लवणोपेतां भक्षयेत कल्य उत्थितः ।
अजीर्णमामवातं च कृमिजांश्च जयेद्गदान् ॥ १० ॥
प्रातःकालमें अजवायन, सेंधानमक दोनोंको एकत्र पीसकर भक्षण करनेसें अजीर्ण आमवात और कृमि तथा कृमिजन्य अन्यान्य सर्व प्रकारके रोग दूर होते हैं ॥१०॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४१५
पलाशबीजेन्द्रविडङ्गनिम्बभूनिम्बचूर्णं सगुडं लिहेद्यः। दिनत्रयेण क्रिमयःपतन्ति पलाशबीजेन यमानिकां वा ॥११॥
ढाकके बीज, इन्द्रजौ, वायविडङ्ग, नीमकी छाल और चिरायता इन सबके चूर्णको समान भाग लेकर गुडमें मिलाकर सेवन करनेसे अथवा ढाकके बीज और अजवायनको एकत्र मिलाकर सेवन करनेसे सर्वप्रकारके कृमि तीन दिनमें नष्ट होकर गिरजाते हैं ॥ ११ ॥
पेषयेदारनालेन नाडीचस्य फलानि च। यूकालिख्याःप्रशान्त्यर्थं दद्याल्लेपं तु मस्तके ॥ १२ ॥
जुओं और लीखोंको नष्ट करनेके लिये नाडीके शाकके फलोंको काँजीके साथ पीसकर सिरपर लेप करे ॥ १२ ॥
रसेन्द्रेण समायुक्तो रसो धुत्तूरपत्रजः। ताम्बूलपत्रजो वापि लेपाद्युकाविनाशनः ॥ १३ ॥
पारेको धतूरेके पत्तोंके रस अथवा पानके रसमें खरल करके मस्तकपर लेप करनेसे शिरकी सब जुयें नष्ट होजाती हैं ॥ १३ ॥
आखुकर्णीदलैः पिष्टैः पिष्टकेन च पूपिकाम्। जग्ध्वा सौवीरकं चानु पिबेत्कृमिहरं परम् ॥ १४ ॥
मूसाकानीके पत्तोंके रससे जौ अथवा चावलोंके चूर्णको मलकर पूए बनाकर खाय और ऊपरसे काँजी पीवे तो कृमिरोग नष्ट होता है ॥ १४ ॥
सुरसादिगणं वापि सर्वथैवोपयोजयेत् । विडङ्गसैन्धवक्षारकम्पिल्लकहरीतकीः ॥ पिबेत्तक्रेण सम्पिष्य सर्वक्रिमीन्निवृत्तये ॥ १५ ॥
सुरसादिगणकी औषधियोंका कल्क वा क्वाथ सेवन करनेसे अथवा वायविडङ्ग सैंधानमक, जवाखार, कबीला और हरड इन सब औषधि समान भाग लेकर और सबका एकत्र चूर्ण करके मट्ठेके साथ सेवन करनेसे सर्वप्रकारके कृमि नष्ट होते हैं १५
पारसीयादिचूर्ण।
पार्सीयायमानिका च घनकणशृङ्गीविडङ्गारुणा- चूर्णं श्लक्ष्णतरं विलीढमपि तत्क्षौद्रेण संयोजितम् । कासं नाशयति ज्वरं च जयति प्रौढातिसारं जये- च्छर्दिं मर्दयति क्रिमिं तु नियतं कोष्ठस्थमुन्मूलयेत् ॥१६॥
| ४१६ | भैषज्यरत्नावली । | [ कृमिरोग- |
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खुरासानी अजवायन, नागरमोथा, पीपल, काकडासिंगी, वायविडङ्ग और अतीस इन औषधियोंका बारीक चूर्ण समान भाग लेकर शहदके साथ मिलाकर सेवन करनेसे खाँसी, ज्वर, पुराना अतिसार, वमनका होना और कोष्ठगत कृमि आदि रोग नष्ट होते हैं ॥ १६ ॥
कृमिकालानल रस ।
विडङ्गं द्विपलं चैव विषचूर्णं तदर्द्धकम् ।
लौहचूर्णं तदर्द्धं च तदर्द्धं शुद्धपारदम् ॥ १७ ॥
रसतुल्यं शुद्धगन्धं छागीदुग्धेन पेषयेत् ।
छायाशुष्कां वटीं कृत्वा खादेत्षोडशरक्तिकाम् ॥ १८ ॥
धान्यजीराऽनुपानेन नाम्ना कालानलो रसः ।
उदरस्थं कृमिं हन्याद् ग्रहण्यार्शःसमन्वितम् ॥ १९ ॥
अग्निदः शोथशमनो गुल्मप्लीहोदरान् जयेत् ।
गहनानन्दनाथेन भाषितो विश्वसम्पदे ॥ २० ॥
वायविडङ्ग ८ तोले, शुद्ध मीठा तेलिया ४ तोले, लोहभस्म २ तोले, शुद्ध पारा १ तोला और शुद्ध आमलासार गन्धक १ तोला; इन सब औषधियोंको एकत्र मिलाकर बकरीके दूधमें खरल करे । फिर छायामें सुखाकर सोलह सोलह रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे, इनमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एक गोली खाकर ऊपरसे धनिये और जीरेके क्वाथको पीवे तो यह कृमिकालानलनामक रस उदरस्थ कृमि, संग्रहणी, बवासीर, सूजन, वायगोला, तिल्ली और उदररोग इन सबको नष्ट करता है और पाचकाग्निको बढाता है । इस प्रयोगको महाराज गहनानन्दनाथने सांसारिक मनुष्योंके हितके लिये कहा है ॥ १७–२० ॥
कृमिधूलिजलप्लव रस ।
पारदं गन्धकं शुद्धं वङ्गं शङ्खं समं समम् ।
चतुर्णां योजयेत्तुल्यं पथ्याचूर्णं भिषग्वरः ॥ २१ ॥
दण्डयन्त्रेण निर्मथ्य पटोलस्वरसं क्षिपेत् ।
कार्पासबीजसदृशीं वटिकां कुरु यत्नतः ॥ २२ ॥
त्रिवटीं भक्षयेत्प्रातः शीततोयं पिबेदनु ।
केवलं पैत्तिके योज्यः कदाचिद्वातपैत्तिके ॥
श्रीमद्गहननाथोक्तः कृमिधूलिजलप्लवः ॥ २३ ॥
| चिकित्सा ] | भाषाटीकासहिता । | ४१७ |
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शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धग, वङ्ग और शंखभस्म ये चारों समान भाग और हरडका चूर्ण चौगुना सबको एकत्र बारीक चूर्ण करके उसमें पटोलपातके स्वरसको डालकर अच्छे प्रकारसे खरल करे और बिनौलोंके बराबर गोलियाँ बनालेवे, फिर प्रतिदिन प्रातःकाल तीन तीन गोली खाकर ऊपरसे शीतल जल पान करे । इस रसको केवल पित्तजनित रोगोंमें प्रयोग करना चाहिये और कभी वात-पित्तजनित रोगोंमें भी देवे । इस कृमिधूलिजलप्लवरसको श्रीमद्गहनानन्दनाथने कहा है ॥ २१-२३ ॥
कृमिकाष्ठानल रस ।
विशुद्धं पारदं गन्धं वङ्गं तालं वराटकम् ।
मनःशिला कृष्णकाचं सोमराजीविडङ्गकम् ॥ २४ ॥
दन्तीबीजं च जैपालं शिलाटङ्कणचित्रकम् ।
कर्षमात्रं तु प्रत्येकं वज्रीक्षीरेण मर्दयेत् ॥ २५ ॥
कलायसदृशीं कृत्वा वटिकां भक्षयेत्ततः ।
कृमिकाष्ठानलो नाम रसोऽयं परिनिर्मितः ॥
श्लैष्मिके श्लेष्मपित्ते च श्लेष्मवाते च शस्यते ॥ २६ ॥
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, वङ्गभस्म, हरतालभस्म, कौडीकी भस्म, शुद्ध मैनसिल, काला काँच, बावची, वायविडङ्ग, दन्तीके बीज, जमाल गोटा, शुद्ध मैनसिल, सुहागा और चीता इन सबको एक एक कर्ष लेकर थूहरके दूधमें अच्छे प्रकारसे खरल कर मटरकी बराबर गोलियाँ बनाकर नित्यप्रति प्रातःसमय एक एक गोली सेवन करे । इस कृमिकाष्ठानलनामक रस कफ और पित्त एवं कफ और वातके रोगोंमें विशेष हितकारी है ॥ २४-२६ ॥
लाक्षादिवर्ती ।
लाक्षाभल्लातश्रीवासश्वेतापराजिताशिफाः ।
अर्जुनस्य फलं पुष्पं विडङ्गमजगुग्गुलुः ॥ २७ ॥
एभिः कीटाश्च शाम्यन्ते तिष्ठन्तोऽपि गृहे सदा ।
भुजङ्गा मूषिका दंशाः सङ्घनामा मतङ्गजाः ॥
दूरादेव पलायन्ते किं न कीटाश्च ये पराः ॥ २८ ॥
लाख, भिलावे, सरलका गोंद, सफेद कोयलकी जड, अर्जुनके फल और फूल, वायविडंग और गूगल इन सब औषधियोंको समान भाग ले एकत्र खरल करके
२७
४१८ ] [ कृमिरोग- भैषज्यरत्नावली ।
गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंको प्रतिदिन प्रातःकाल एकएक करके सेवन करनेसे सर्व प्रकारके कृमि नष्ट होते हैं और ये गोलियाँ जिस घरमें सदैव रहती हैं वहाँ सर्प, चूहे, डाँस संघनामवाले कृमि, मतङ्गज आदि अनेक प्रकारके कृमि दूरसे ही भाग जाते हैं ॥ २७ ॥ २८ ॥
कृमिमुद्गर रस । क्रमेण वृद्धं रसगन्धकाजमोदा विडङ्गं विषमुष्टिका च । पलाशबीजं च विचूर्णमस्य निष्कप्रमाणं मधुनाऽवलीढम् २९॥ पिबेत्कषायं घनजं तदूर्ध्वं रसोऽयमुक्तः कृमिमुद्गराख्यः । कृमीन्निहन्ति क्रिमिजांश्च रोगान्सन्दी॒पयत्यग्निमयं त्रिरात्रात् ॥
शुद्ध पारा १ तोला, शुद्ध गन्धक २ तोले, अजमोद ३ तोले, वायविडंग ४ तोले; शुद्ध कुचला ५ तोले और ढाकके बीज ६ तोले इन सब औषधियोंका एकत्र चूर्ण करके जलके साथ खरलकर चार चार मासेकी मात्रा प्रतिदिन प्रातःकाल शहदके साथ खाय और ऊपरसे नागरमोथेका क्वाथ पान करे तो यह कृमिमुद्गरनामक रस तीन दिनमें ही सर्व प्रकारके कृमिरोग एवं कृमियोंसे उत्पन्नहुए अनेक विकारोंको दूर करता है और पाचकाग्निको दीपन करता है ॥ २९ ॥ ३० ॥
कीटारिरस । शुद्धसूतं चेन्द्रयवं चाजमोदा मनःशिला । पलाशबीजं गन्धं च देवदाल्या द्रवैर्दिनम् ॥ ३१ ॥ संमर्द्य भक्षयेन्नित्यं मुद्गपर्णीरसैः सह । सितायुक्तं पिबेच्चानु कृमिपातो भवत्यलम् ॥ ३२ ॥
शुद्ध पारा, इन्द्रजौ, अजमोद, शुद्ध मैनसिल, ढाकके बीज और शुद्ध गन्धक इन सबको बराबर २ भाग लेकर बंदालके रसमें एकदिनतक खरल करे । फिर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे नित्यप्रति प्रातःकाल एक गोली खाकर ऊपरसे मुद्गपर्णी वनमूँगका क्वाथ मिश्री डालकर पान करनेसे सब प्रकारके कृमि नष्ट होते हैं ॥ ३१ ॥ ३२ ॥
कीटमर्दरस । शुद्धसूतं शुद्धगन्धमजमोदा विडङ्ककम् । विषमुष्टिर्ब्रह्मबीजं यथाक्रमगुणोत्तरम् ॥ ३३ ॥ चूर्णयेन्मधुना मिश्रं निष्कैकं कृमिजिद्भवेत् । कीटमर्दो रसो नाम मुस्ताक्वाथं पिबेदनु ॥ ३४ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४१९
शुद्ध पारा १ तोला, शुद्ध गन्धक दो तोले, अजमोद ३ तोले, वायविडङ्ग ४ तोले शुद्ध कुचला ५ तोले और ढाकके बीज ६ तोले इन सबका एकत्र बारीक चूर्ण करके इसमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल चार चार मासेकी मात्रासे शहदमें मिलाकर खाय और ऊपरसे नागरमोथेका क्वाथ पीवे तो यह कीटमर्द्दनामक रस कृमिरोगको दूर करता है ॥ ३३ ॥ ३४ ॥
कृमिघातिनी गुटिका।
रसगन्धाजमोदानां कृमिघ्नब्रह्मबीजयोः ।
एकद्वित्रिचतुःपंच तिन्दोर्बीजस्य षट् क्रमात् ॥ ३५ ॥
सञ्चूर्ण्य मधुना सर्वं गुटिकां कृमिघातिनीम् ।
खादन् पिपासुस्तोयं च मुस्तानां कृमिशान्तये ॥
आखुकर्णीकषायं वा प्रपिबेच्छर्करान्वितम् ॥ ३६ ॥
शुद्ध पारा १ तोला, शुद्ध गन्धक २ तोले, अजमोद ३ तोले, वायविडङ्ग ४ तोले ढाकके बीज ५ तोले और तेंदूके बीज ६ तोले लेवे। सबको एकत्र चूर्ण करके शहदके साथ खरलकर डेढ डेढ मासेकी मात्रासे कृमिरोगको नष्ट करनेके लिये प्रतिदिन प्रातःकाल शहदके साथ सेवन करे अथवा इसकी गोली बनाकर शहदमें मिलाकर और प्यास लगनेपर नागरमोथेके क्वाथ अथवा मूसाकनीका क्वाथ मिश्री मिलाकर पीवे ॥ ३५ ॥ ३६ ॥
कृमिविनांशरस ।
शुद्धसूतं समं गन्धमभ्रं लौहं मनःशिला ।
धातकी त्रिफला लोध्रं विडङ्गं रजनीद्वयम् ॥ ३७ ॥
भावयेत्सप्तधा सर्वं शृङ्गवेरभवै रसैः ।
चणमात्रां वटीं कृत्वा त्रिफलारससंयुताम् ॥ ३८ ॥
भक्षयेत्प्रातरुत्थाय कृमिरोगोपशान्तये ।
वातिकं पैत्तिकं हन्ति श्लैष्मिकं च त्रिदोषजम् ॥
कृमिविनांशनामाऽयं कृमिरोगकुलान्तकः ॥ ३९ ॥
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, अभ्रकभस्म, लोहभस्म, शुद्ध मैनसिल, धायके फूल, त्रिफला, लोध, वायविडङ्ग, हल्दी और दारुहल्दी इन सब औषधियोंको बराबर १ भाग लेकर एकत्र चूर्ण करके अदरखके रसमें सातवार भावना देकर चनेकी
४२० भैषज्यरत्नावली । [कृमिरोग-
बराबर गोलियाँ बनालेवे । इनमेंसे नित्यप्रति प्रातःकाल एक एक गोली त्रिफलेके क्वाथके साथ सेवन करे तो यह कृमिविनाश नामक रस वातज, पित्तज, कफज और त्रिदोषसे उत्पन्नहुए सब प्रकारके कृमिरोगको समूल नष्ट करता है ॥ ३७-३९ ॥
कृमिहररस ।
शुद्धसूतमिन्द्रयवमजमोदा मनःशिला ।
पलाशबीजं गन्धं च देवदाल्याद्रवैर्दिनम् ॥ ४० ॥
संमर्द्य भक्षयेन्नित्यं शालपर्णीरसैः सह ।
सितायुक्तं पिबेच्चानु कृमिपातो भवत्यलम् ॥ ४१ ॥
शुद्ध पारा, इन्द्रजौ, अजमोद, शुद्ध मैनसिल, ढाकके बीज और शुद्ध गन्धक इन सब औषधियोंको बराबर भाग लेकर बंदालके रसमें एक दिनतक अच्छेप्रकारसे खरल करके १-१ रत्तीकी गोलियाँ बनाकर नित्यप्रति एक एक गोली खाय और ऊपरसे शालपर्णीके क्वाथमें मिश्री मिलाकर पान करे, तो सब प्रकारके कृमि गिरजाते हैं ॥ ४० ॥ ४१ ॥
कृमिरोगारिरस ।
सूतं गन्धं मृतं लौहं मरिचं विषमेव च ।
धातकी त्रिफला शुण्ठी विडङ्गं सरसाञ्जनम् ॥ ४२ ॥
त्रिकटुमुस्तकं पाठा बालकं बिल्वमेव च ।
भावयेत्सर्वमेकत्र स्वरसैर्भृङ्गजैस्ततः ॥ ४३ ॥
वराटिकाप्रमाणेन भक्षणीयो विशेषतः ।
कृमिरोगारिनामाऽयं रसो वै कृमिनाशनः ॥ ४४ ॥
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, लोहभस्म, कालीमिरच, शुद्ध मीठा तेलिया, धायके फूल, त्रिफला सोंठ, वायविडङ्ग, रसौंत, त्रिकुटा, नागरमोथा, पाठ, सुगन्धवाला और बेलगिरी इन सबको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करके भाँगरेके स्वरसमें खरल करे । फिर कौडीकी बराबर गोलियाँ बनाकर प्रतिदिन एक एक गोली सेवन करे । यह कृमिरोगारि नामक रस विशेषकर कृमिरोग नाशक है ॥ ४२-४४ ॥
कृमिघ्नरस ।
कृमिघ्नं किंशुकारिष्टबीजं सुरसभस्मकम् ।
वल्लद्वयं चाखुकर्णीरसैः कृमिविनाशनम् ॥ ४५ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४२१
वायविडंग, ढाकके बीज, नीमके बीज और रससिन्दूर इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर मूसाकानीके रसमें खरल करके तीन तीन रत्तीकी गोलियाँ बनाकर सेवन करनेसे कृमिरोग दूर होता है ॥ ४५ ॥
विडंगलौह ।
रसं गन्धं च मरिचं जातीफललवङ्गकम् ।
शुण्ठी टङ्कं कणा तालं प्रत्येकं भागसम्मितम् ॥ ४६ ॥
सर्वचूर्णसमं लौहं विडङ्गं सर्वतुल्यकम् ।
लौहं विडङ्गकं नामकोष्ठस्थकृमिनाशनम् ॥ ४७ ॥
दुर्नाममरुचिं चैव मन्दाग्निं च विषूचिकाम् ।
शोथं शूलं ज्वरं हिक्कां श्वासं कासं विनाशयेत् ॥ ४८ ॥
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, मिरच, जायफल, लौंग, सोंठ, सुहागा, पीपल और हरताल ये सब समान भाग और सबके बराबर लोहभस्म एवं लोहभस्म सहित सम्पूर्ण औषधियोंकी बराबर वायविडंगका चूर्ण मिलाकर सबको एकत्र खरल करलेवे । इस विडंगलोहनामक चूर्णको प्रतिदिन सेवन करनेसे कोष्ठगत कृमि, बवासीर, अरुचि, मन्दाग्नि, विषूचिका, शोथ, शूल, ज्वर, हिचकी, श्वास और खांसी आदि सब रोग नष्ट होते हैं ॥ ४६–४८ ॥
हरिद्राखण्ड ।
स्वरसं पारिभद्रस्य प्रस्थमादाय यत्नतः ।
तदर्द्धं च सितां दत्त्वा घृतं कुडवसम्मितम् ॥ ४९ ॥
प्रस्थार्द्धं रजनीचूर्णं दत्त्वा पाकं समाचरेत् ।
यदा दर्वीप्रलेपः स्यात्तदेषां चूर्णमाक्षिपेत् ॥ ५० ॥
चित्रकं त्रिफला मुस्तं विडङ्गं कृष्णजीरकम् ।
यमानीद्वयसिन्धूत्थं निर्गुण्डीफलमेव च ॥ ५१ ॥
पाठाविडङ्गकं चैव शारिवाद्वयवासकौ ।
पलाशबीजं व्योषं च त्रिवृद्दन्ती सरेणुका ॥ ५२ ॥
अरिष्टं सोमराजी च प्रत्येकं तु द्विकार्षिकम् ।
ततो माषाष्टकं खादेत्तोयं चानु पिबेन्नरः ॥ ५३ ॥
फरहदका स्वरस १ प्रस्थ ( ६४ तोले ), मिश्री आधा प्रस्थ ( ३२ तोले ), घृत १ कुडव ( १६ तोले ) और हल्दीका चूर्ण ३२ तोले लेवे । इन सबको एकत्र
| ४२२ | भैषज्यरत्नावली । | [ कृमिरोग- |
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मिलाकर मन्द मन्द अग्निसे पकावे, जब वह करछीसे लगने लगे तब उतारकर उसमें चीतेकी जड, त्रिफला, नागरमोथा, वायविडंग, कालाजीरा, अजवायन, अजमोद सेंधानमक, निर्गुण्डीके फल, पाठ, वायविडंग, अनन्तमूल, जवासा, अडूसा, ढाकके बीज, सोंठ, मिरच, पीपल, निसोत, दन्तीकी जड, रेणुका, नीमकी छाल और बाकुची ये-प्रत्येक औषधि दो दो कर्ष लेकर चूर्ण करके मिलादेवे। फिर इसमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल आठ आठ मासे परिमाण शीतल जलके साथ सेवन करे ॥ ४९-५३ ॥
कृमींश्च विंशतिविधान् नाशयेन्नात्र संशयः ।
दुष्टव्रणं च कुष्ठं च नाडीव्रणभगन्दरम् ॥ ५४ ॥
शीतपित्तं विद्रधिं च दद्रु चर्मदलं तथा ।
अजीर्णं कामलां गुल्मं श्वयथुं च विनाशयेत् ॥ ५५ ॥
बलपुष्टिकरो ह्येष वलीपलिपनाशनः ।
हरिद्राखण्डनामाऽयं सर्वव्याधिनिषूदनः ॥
व्रणिनां हितकामो हि प्राह नागार्जुनो मुनिः ॥ ५६ ॥
यह हरिद्राखंड नामक बीसों प्रकारके कृमिरोग, दुष्टव्रण, कोढ, नासूर, भगन्दर, शीतपित्त, विद्रधि, दाद, चर्मदल, अजीर्ण, कामला, गुल्म, शोथ, असमयमें शरीरपर झुर्रियोंका पडना तथा बालोंका पकना और अन्यान्य सर्वप्रकारके रोगोंको समूल नष्ट करता है। एवं शरीरकी पुष्टि और बलकी वृद्धि करता है। यह योग विशेषकर सर्वप्रकारके व्रणोंको दूर करनेवाला है। इसको श्रीनागार्जुनमुनिने वर्णन किया है ॥ ५४-५६ ॥
त्रिफलाद्यघृत ।
त्रिफला त्रिवृता दन्ती वचा कम्पिल्लकं तथा ।
सिद्धमेभिर्गवां मूत्रैः सर्पिः कृमिविनाशनम् ॥ ५७ ॥
त्रिफला, निसोत, दन्तीकी जडकी छाल, वच और कबीला इन सब औषधियोंके समान भाग मिश्रित कल्क और गोमूत्रके द्वारा यथाविधिसे सिद्ध कियाहुआ घृतकों पान करे । यह घृत कृमिरोगको नष्ट करता है ५७ ॥
विडङ्गघृत ।
त्रिफलायास्त्रयः प्रस्था विडङ्गप्रस्थ एव च ।
दीपनं दशमूलं च लाभतः समुपाहरेत् ॥ ५८ ॥
पादशेषे जलद्रोणे शृते सर्पिर्विपाचयेत् ।
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ५२३
पादशेषे जलद्रोणे शृते सर्पिर्विपाचयेत् ।
प्रस्थोन्मितं सिन्धुयुतं तत्परं कृमिनाशनम् ॥ ५९ ॥
विडङ्गघृतमेतद्धि लेह्यं शर्करया सह ।
सर्वान्कृमीन् प्रणुदति वज्रं मुक्तमिवासुरान् ॥ ६० ॥
त्रिफला ३ प्रस्थ ( १९२ तोले ), वायविडङ्ग १ प्रस्थ ( ६४ तोले ), एवं पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीतेकी जड और सोंठ ये सब समानभाग मिलेहुए १ प्रस्थ और दशमूलकी औषधियाँ एक प्रस्थ ( ६४ तोले ) लेवे । सबको एकत्र मिलाकर एक द्रोण जलमें पकावे । जब पककर चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे । फिर उसमें घृत १ प्रस्थ और सेंधेनमकका चूर्ण १ प्रस्थ डालकर पकावे । इस घृतको छः छः मासे प्रमाण लेकर मिश्रीके साथ मिलाकर प्रतिदिन सेवन करनेसे यह विडङ्गघृत सम्पूर्ण कृमिरोगोंको इस प्रकार नष्ट करदेता है जैसे इन्द्रका वज्र असुरोंको ॥ ५८-६० ॥
विडङ्गतैल ।
सविडङ्गगन्धकशिलासिद्धं सुरभीजलेन कटुतैलम् ।
आजन्म नयति नाशं लिक्ष्यासहितांश्च यूकांश्च ॥ ६१ ॥
वायविडङ्ग, शुद्ध गन्धक और शुद्ध मैनसिल इन तीनोंके कल्क और गोमूत्रके द्वारा सरसोंके तेलको पकावे । यह तैल-शिरपर मालिश करनेसे लीखों जुएँ आदि सब प्रकारके शिरके कृमियोंको समूल नष्ट करता है ॥ ६१ ॥
धुस्तूरतैल ।
धुस्तूरपत्रकल्केन तद्रसेन च साधितम् ।
तैलमभ्यङ्गमात्रेण यूकान्नाशयति ध्रुवम् ॥ ६२ ॥
धतूरेके पत्तोंके कल्क और स्वरसके साथ यथाविधि सरसोंके तैलको सिद्ध करके शिरमें लगानेसे जुएं और लीखें नष्ट होती हैं ॥ ६२ ॥
कृमिरोगमें पथ्य ।
आस्थापनं कायशिरोविरेचनं धूमः कफघ्नानि शरीर-
मार्जना । चिरन्तना वैणवरक्तशालयः पटोलवेत्राग्र-
रसो नवास्तुकम् ॥ ६३ ॥ हुताशमन्दारदलानि सर्षपं
नवीनमोचं बृहतीफलान्यपि । तिक्तानि नालीच
दलानि मौषिकं मांसं विडङ्गं पिचुमर्दपल्लवम् ॥ ६४ ॥
४२४ भैषज्यरत्नावली । [ कृमिरोग
पथ्या च तैलं तिलसर्षपोद्भवं सौवीरशुक्तं च तुषोदकं मधु । पचेलिमं तालमरुष्करं गवां मूत्रं च ताम्बूलसुरा- मृगाण्डजम् ॥६३॥ उष्ट्रस्य मूत्राज्यपयांसि रामठं क्षारा- जमोदा खदिरं च वत्सकम् । जम्बीरनीरं सुषवी यमा- निका साराः सुराह्वागुरुशिंशपोद्भवाः । तिक्तः कषायः कटुको रसोऽप्ययं वर्गो नराणां कृमिरोगिणां सुखः ॥६६॥
आस्थापन वस्ति (पिचकारी) देना, कायविरेचन (जुलाब) और शिरोविरेचन (नस्य) देना, कफनाशकपदाथोंका धूम्रपान कराना, शरीरको मार्जन करना या उबटन करना, बाँसके और लालशालिधानोंके पुराने चावल, परवल, बेंतके अंकुर, लहसुन, बथुआ, चीतेके पत्तोंका शाक, आकके पत्ते, सरसोंके पत्ते, नवीन केलेका मोचा, बडी कटेरीके फल, डवे पदार्थ, नाडीका शाक, चूहेका मांस, वायविडंग, नीमके पत्ते, हरड, तिल और सरसोंका तैल सौवीरनामक काँजी, सिरका, तुषोदकनामक काँजी, शहद, पके ताडके फल, भिलावे, गोमूत्र, पान, मदिरा, कस्तूरी, ऊँटका मूत्र, घी, दूध, हींग, जवाखार, अजमोद, खैर, इन्द्रजौ, जम्बीरीनींबूका रस, करेले, अजवायन, देवदारु, अगर और शीशमके वृक्षका सार तथा कडवे, कषैले और चरपरे रसवाले पदार्थ ये कृमिरोगवाले मनुष्योंके लिये हितकारी हैं॥६३-६६॥
कृमिरोगमें अपथ्य ।
छर्दिं च तद्वेगविधारणं च विरुद्धपानाशनमह्नि निद्राम् ।
द्रवं च पिष्टान्रमजीर्णतां च घृतानि माषान्दधि पत्रशाकम् ॥
मांसं पयोऽम्लं मधुरं रसं च कृमीञ्जिघांसुः परिवर्जयेच्च॥६७॥
वमनको और वमनके वेगको रोकना, प्रकृति विरुद्ध अन्न-पान करना, दिनमें सोना, द्रव (पतले) पदार्थ, मिठाई, पक्वान्न आदि अजीर्णकारक पदार्थ, घी, उडद, दही, पत्तेवाले शाक, मांस, दूध, खट्टे रसवाले और मधुर रसवाले पदार्थ—ये सब कृमिरोगवालोंको तत्काल त्याग देने चाहिये ॥ ६७ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां कृमिरोगचिकित्सा ।
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४२५
पाण्डु-कामला-हलीमककी चिकित्सा ।
साध्यं च पाण्ड्वामयिनं समीक्ष्य स्निग्धं घृतेनोर्ध्वमधश्च शुद्धम् ।
सम्पाचयेत्क्षौद्रघृतप्रगाढैर्हरीतकीचूर्णमयः प्रयोगैः ॥ १ ॥
प्रथम पाण्डुरोगीको साध्य देखकर उसे घृतके द्वारा स्निग्ध करके वमन और विरेचन कराकर शरीरको शुद्ध करे । फिर शहद और घृतमें मिलाकर हरड़ोंका चूर्ण सेवन करावे ॥ १ ॥
पिबेद् घृतं वा रजनीविपक्वं यत् त्रफलं तैन्दुकमेव वापि ।
विरेचनद्रव्यकृतान्पिबेद्वा योगांश्च वैरेचनिकान् घृतेन ॥ २ ॥
हल्दीके कल्क और क्वाथसे सिद्ध किया हुआ घृत अथवा त्रिफलेके क्वाथ और कल्कके द्वारा सिद्ध कियाहुआ वा तेन्दूके कल्क और क्वाथसे सिद्ध किया घृत पान करे या विरेचन औषधियोंको घृतके साथ अथवा विरेचन औषधियोंके द्वारा सिद्ध कियेहुये घृतको पान करे ॥ २ ॥
विधिः स्निग्धश्च वातोत्थे तिक्तशीतश्च पैत्तिके ।
श्लैष्मिके कटुरूक्षोष्णः कार्यो मिश्रस्तु मिश्रके ॥ ३ ॥
वातज पाण्डुरोगमें स्निग्धक्रिया, पित्तज पाण्डुरोगमें कडवे पदार्थोंका सेवन और शीतलक्रिया, कफज पाण्डुरोगमें, चरपरे और रूखे पदार्थोंका सेवन एवं उष्णक्रिया करे तथा मिलेहुए दोषोंवाले पाण्डुरोगमें मिश्रित क्रिया करनी चाहिये ॥
पाण्डुरोगे सदा सेव्या सगुडा च हरीतकी।
पाण्डुरोगमें सर्वदा हरडका चूर्ण गुड मिलाकर सेवन करना चाहिये ।
त्रिफलाक्वथितं तोयं सघृतं च सशर्करम् ।
वातपाण्ड्वामयी पीत्वा स्वास्थ्यमाशु व्रजेद् ध्रुवम् ॥ ४ ॥
वातज पाण्डुरोगी त्रिफलेके क्वाथमें घी और मिश्री मिलाकर सेवन करे तो शीघ्र आरोग्य होता है ॥ ४ ॥
द्विशर्करं त्रिवृच्चूर्णं पलार्द्धं पैत्तिके पिबेत् ।
कफपाण्डौ च गोमूत्रयुक्तां क्लिन्नां हरीतकीम् ॥ ५ ॥
नागरं लोहचूर्णं वा कृष्णं पथ्यां तथाऽश्मजम् ।
गुग्गुलुं वाऽथ मूत्रेण कफपांड्वामयी पिबेत् ॥ ६ ॥
| ४२६ | भैषज्यरत्नावली । | [ पाण्डु-आदि- |
|---|
सप्तरात्रं गवां मूत्रे भावितं चाप्ययोरजः ।
पाण्डुरोगप्रशान्त्यर्थं पयसा प्रपिबेन्नरः ॥ ७ ॥
पित्तज पाण्डुरोगमें निसोतका चूर्ण दो तोले और मिश्री २ तोले मिलाकर सेवन करे। कफज पाण्डुरोगमें हरडको रात्रिमें गोमूत्रमें भिजोकर प्रातःकाल गोमूत्रमें पीसकर पान करे अथवा सोंठ, लोहभस्म, पीपलका चूर्ण, हरडका चूर्ण, शुद्ध शिला-जीत, शुद्ध गूगल, इनमेंसे किसी एक औषधिको गोमूत्रके साथ उचित मात्रासे सेवन करनेसे पाण्डुरोग दूर होता है। लोहभस्मको गोमूत्रमें सात दिनतक भावना देकर दूधके साथ पान करनेसे पाण्डुरोग शमन होता है।
अयस्तिलत्र्यूषणकोलभागैः सर्वैः समं माक्षिकधातुचूर्णम् ।
तैर्मोदकः क्षौद्रयुतोऽनुतक्रः पाण्ड्वामये दूरगतेऽपि शस्तः ॥८॥
लोहकी भस्म, काले तिल, सोंठ, मिरच, पीपल, प्रत्येक औषधि एक एक तोला लेवे और इन सबकी बराबर शुद्ध सोनामाखीका चूर्ण लेवे। सबका एकत्र चूर्ण करके शहदमें मिलाकर लड्डू बनालेवे। इनमेंसे प्रतिदिन एक एक लड्डू तक्रके साथ सेवन करे। ये मोदक पुराने पाण्डुरोगमें अथवा रोगके दूर होजानेपर भी सेवन करने हितकारी हैं ॥ ८ ॥
लौहपात्रे शृतं क्षीरं सप्ताहं पथ्यभोजनः ।
पिबेत्पाण्ड्वामयी शोषी ग्रहणीदोषपीडितः ॥ ९ ॥
पाण्डुरोगी, क्षयी और संग्रहणीवाले रोगी एक सप्ताहपर्यन्त लोहेके पात्रमें चौगुने जलके साथ पकाया हुआ गोदुग्ध पान करे और पथ्य पदार्थोंका भोजन करे तो उक्त रोग नष्ट होते हैं ॥ ९ ॥
अयोमलं तु सन्तप्तं भूयो गोमूत्रशोधितम् ।
मधुसर्पिर्युतं चूर्णं सह भक्तेन योजयेत् ।
दीपनं चाग्निजननं शोथपाण्ड्वामयापहम् ॥ १० ॥
मण्डूरभस्मको सात बार अग्निमें तपाकर सातबार गोमूत्रमें बुझावे। फिर उसका बारीक चूर्ण करके शहद, घृत और भातके साथ मिलाकर सेवन करनेसे अत्यन्त दीपन होती है एवं शोथ और पाण्डुरोग दूर होते हैं ॥ १० ॥
कामला-चिकित्सा ।
रेचनं कामलार्त्तस्य स्निग्धस्यादौ प्रयोजयेत् ।
ततः प्रशमनी कार्या क्रिया वैद्येन जानता ॥ ११ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४२७
कामलारोगीको पहले घृतादिके द्वारा स्निग्ध करके विरेचन करावे । फिर योग्य वैद्यके द्वारा रोगनाशक चिकित्साः करानी चाहिये ॥ ११ ॥
त्रिफलाया गुडूच्या वा दार्व्या निम्बस्य वा रसः ।
प्रातर्माक्षिकसंयुक्तः शीलितः कामलापहः ॥ १२ ॥
त्रिफलेके क्वाथ अथवा गिलोयके स्वरस या दारुहल्दीके क्वाथ या नीमकी छालके क्वाथ अथवा स्वरसको शहद मिलाकर प्रतिदिन प्रातःकाल पीनेसे कामलारोग नष्ट होता है ॥ ११ ॥
अञ्जनं कामलार्त्तस्य द्रोणपुष्पीरसः स्मृतः ।
निशागैरिकधात्रीणां चूर्णं वा सप्रकल्पयेत् ॥ १३ ॥
कामलारोगीको गुमाके पत्तोंका रस अथवा हल्दी, गेरू और आमलोंके चूर्णकों शहदमें मिलाकर आँखोंमें आँजनेसे शीघ्र आराम होता है ॥ १३ ॥
नस्य कर्कोटमूलं वा ज्ञेयं वा जालिनीफलम् ॥ १४ ॥
ककोडेकी जडको पीसकर उसके रसकी अथवा कडवी तोरईको पीसकर उसके रसकी नस्य देनेसे कामलारोग दूर होता है ॥ १४ ॥
सशर्करं कामलिनां त्रिवण्डी हिता गवाक्षी सगुडा च शुण्ठी ॥
निसोतका चूर्ण अथवा इन्द्रायनका चूर्ण खांड मिलाकर सेवन करनेसे या गुड मिलाकर साठका चूर्ण सेवन करनेसे कामलारोगीको आरोग्यलाभ होता है ॥ १५ ॥
कुम्भकामलाकी चिकित्सा ।
दग्ध्वाऽक्षकाष्ठैर्मलमायसं तु गोमूत्रनिर्वापितमष्टवारान् ।
विचूर्ण्य लीढं मधुनाऽचिरेण कुम्भाह्वयं पाण्डुगदं निहन्ति १६
लोहेके मैलको लेकर बहेडेकी लकडीकी अग्निमें आठवार तपाकर क्रमसे आठ बार गोमूत्रमें बुझावे । फिर उसका बारीक चूर्ण करके शहदके साथ सेवन करनेसे कुम्भकामला और पाण्डुरोग शीघ्रही नष्ट होते हैं ॥ १६ ॥
हलीमककी-चिकित्सा ।
पाण्डुरोगक्रियां सर्वां योजयेच्च हलीमके ।
कामलायां च याऽऽदिष्टा सापि कार्या भिषग्वरैः ॥ १७ ॥
पाण्डु और कामलारोगमें जो चिकित्सा कही गई है वही समस्त चिकित्साः हलीमक रोगमें भी करनी चाहिये ॥ १७ ॥
| ४२८ | भैषज्यरत्नावली । | [ पाण्डु-आदि- |
|---|
मारितं चायसं चूर्णं मुस्ताचूर्णेन संयुतम् ।
खदिरस्य कषायेण पिबेद्धन्तुं हलीमकम् ॥ १८ ॥
लोहेकी भस्मको नागरमोथेके चूर्ण और खैरके क्वाथके साथ मिलाकर सेवन करे तो हलीमकरोग नष्ट होता है ॥ १८ ॥
सितातिक्ताबलायष्टित्रिफलारजनीयुगैः ।
लौहं लिह्यात्समध्वाज्यं हलीमकनिवृत्तये ॥ १९ ॥
मिश्री, कुटकी, खिरेंटी, मुलहठी, त्रिफला, हल्दी और दारुहल्दी इन सबको समान भाग और सबकी बराबर लोह भस्म लेकर सबका एकत्र चूर्ण करलेवे फिर शहद और घीमें मिलाकर सेवन करनेसे हलीमकरोग दूर होता है ॥ १९ ॥
फलत्रिकादि-कषाय ।
फलत्रिकामृतावासातिक्ताभूनिम्बनिम्बजः ।
क्वाथः क्षौद्रयुतो हन्यात्पाण्डुरोगं सकामलम् ॥ २० ॥
त्रिफला, गिलोय, बिसौंटा, कुटकी, चिरायता और नीमकी छाल इनका काढ़ा बनाकर मधुके साथ सेवन करे तो पाण्डु और कामला नष्ट होते हैं ॥ २० ॥
वासादिकषाय ।
वासामृतानिम्बकिरातकट्वीकषायकोऽयं समधुर्निपीतः ।
सकामलं पाण्डुमथास्रपित्तं हलीमकं हन्ति कफादिरोगान् ॥
बिसौंटेकी छाल, गिलोय, नीमकी छाल, चिरायता और कुटकी इन सबका बराबर भाग लेकर यथाविधि क्वाथ बनाय शहद डालकर पान करे तो कामला पाण्डु, रक्तपित्त, हलीमक और कफादिरोग नष्ट होते हैं ॥ २१ ॥
नवायसलौह ।
त्र्यूषणत्रिफलामुस्तविडङ्गचित्रकाः समाः ।
नवायोरजसो भागास्तच्चूर्णं मधुसर्पिषा ॥ २२ ॥
भक्षयेत्पाण्डुहृद्रोगकुष्ठार्शःकामलापहम् ।
नवायसमिदं लौहं कृष्णात्रेयेण भाषितम् ॥ २३ ॥
त्रिकुटा, त्रिफला, नागरमोथा, वायविडङ्ग और चीतेकी जड़—ये सब औषधियाँ समान भाग और लोह भस्म ९ भाग लेकर सबका एकत्र बारीक, चूर्ण शहद और घीके साथ मिलाकर सेवन करनेसे पाण्डु, हृद्रोग कुष्ठ,
कित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४२९
बवासीर और कामला ये सब रोग दूर होते हैं। इस नवायसलोहको कृष्णात्रेयने कहा है ॥ २२ ॥ २३ ॥
विशालौह ।
लौहचूर्ण निशायुग्मं त्रिफलारोहिणीयुतम् ।
प्रलिह्यान्मधुसर्पिर्भ्यां कामलापाण्डुशान्तये ॥ २४ ॥
हल्दी, दारुहल्दी, त्रिफला और कुटकी ये सब समान भाग और सबकी बराबर लोहेका चूर्ण एकत्र खरल करके शहद और घृतके साथ मिलाकर सेवन करनेसे पाण्डु और कामलारोग नष्ट होते हैं ॥ २४ ॥
धात्रीलौह ।
धात्रीलौहरजोव्योषनिशाक्षौद्राज्यशर्कराः ।
भक्षणाद्विनिहन्त्याशु कामलां च हलीमकम् ॥ २५ ॥
आमले, लोहभस्म, सोंठ, मिरच, पीपल और हल्दी इनके समान भाग चूर्णको शहद, घी और मिश्रीमें मिलाकर सेवन करनेसे कामला और हलीमक रोग शीघ्र नष्ट होते हैं ॥ २५ ॥
विडंगादिलौह ।
विडंगत्रिफलाव्योषं शुद्धलौहं तु तत्समम् ।
पुरातनगुडेनैव लेहयेद्दिनसप्तकम् ॥ २६ ॥
श्वयथुं नाशयेच्छीघ्रं पाण्डुरोगं हलीमकम् ॥ २७ ॥
वायविडंग, त्रिफला और त्रिकुटा इनको समान भाग और सबकी बराबर शुद्ध लोहेकी भस्म लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे । इस चूर्णको पुराने गुडके साथ मिलाकर सात दिनतक सेवन करनेसे शोथ, पाण्डु और हलीमक रोग शीघ्र नष्ट होते हैं ॥ २६ ॥ २७ ॥
विडंगमुस्तत्रिफलादेवदारुषडूषणैः ।
तुल्यमात्रामयश्चूर्णं गोमूत्रेऽष्टगुणे पचेत् ॥ २८ ॥
तैरक्षमात्रां गुटिकां कृत्वा खादेद्दिने दिने ।
कामलापाण्डुरोगार्त्तः सुखमापद्यतेऽचिरात् ॥ २९ ॥
वायविडंग, नागरमोथा, त्रिफला, देवदारु, पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीता, सोंठ और कालीमिरच ये सब औषधि समान भाग और इन सबको बराबर गोमूत्रमें शुद्ध कियाहुआ लोहचूर्ण लेवे । फिर सबको एकत्र पीसकर आठगुन गोमूत्रमें
४३० भैषज्यरत्नावली । [ पाण्डु-आदि -
पकावे। जब पककर लोहेकी समान गाढा होजाय, तब एक एक तोलेकी गोलियाँ बनाकर इनमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक गोली खानेसे कामला और पाण्डुरोग शीघ्र दूर होते हैं ॥ २८-२९ ॥
दार्व्यादिलौह ।
दार्वीसत्रिफलाव्योषविडङ्गानन्यसो रजः ।
मधुसर्पिर्युतं लिह्यात् कामलापाण्डुरोगवान् ॥ ३० ॥
दारुहल्दी, त्रिफला, त्रिकुटा और वायविडङ्ग इन सबके चूर्णको समान भाग और सब चूर्णके बराबर लोहभस्म लेकर सबको एकत्र शहद और घृतके साथ मिलाकर प्रतिदिन सेवन करनेसे कामला और पांडुरोगी स्वास्थ्यलाभ करते हैं॥३०॥
त्रिकत्रयाद्यलौह ।
पलं लौहस्य किट्टस्य पलं गव्यस्य सर्पिषः ।
सितायाश्च पलं चैकं मधुनश्च पलं तथा ॥ ३१ ॥
तोलैकं कान्तलौहस्य त्रिकत्रयसमन्वितम् ।
ततः पात्रे विधातव्यं लौहे वा मृन्मये तथा ॥ ३२ ॥
भावितं मधुसर्पिर्भ्यां रौद्रे शिशिर एव च ।
भोजनादौ तथा मध्ये चान्ते चैव प्रयोजयेत् ॥ ३३ ॥
कामलां पाण्डुरोगं च हलीमकंमथापि च ।
अम्लपित्तं तथा शूलं शूलं च परिणामजम् ॥ ३४ ॥
कासं पञ्चविधं चैव प्लीहश्वासज्वरानपि ।
अपस्मारं तथोन्मादमुदरं गुल्ममेव च ॥ ३५ ॥
अग्निमान्द्यमजीर्णं च श्वयथुं च सुदारुणम् ।
निहन्ति नात्र सन्देहो भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ३६ ॥
मण्डूर (लोहेका मैल) ४ तोले, गौका घी ४ तोले मिश्री ४ तोले, शहद ४ तोले, कान्तलोहका चूर्ण १ तोला, एवं त्रिकुटा, त्रिफला, चीतेकी जड, नागरमोथा और वायविडंग इन सबका चूर्ण एक एक तोला लेवे। फिर इन औषधियोंको एकत्र लोहेके पात्र अथवा मिट्टोके पात्रमें करके दिनको धूपमें और रातको ओसमें तीनदिन तक शहद और घृतकी भावना देवे। इसको भोजनके पहले, मध्यमें और अन्तमें सेवन करनेसे यह त्रिकत्रयाद्यलौह कामला,
चिकित्सा भाषाटीकासहिता । ४३१
पाण्डु, हलीमक, अम्लपित्त, शूल, परिणामशूल, पाँचों प्रकारकी खाँसी, प्लीहा, श्वास, ज्वर, अपस्मार, उन्माद, उदररोग, गुल्म, अग्निमान्द्य, अजीर्ण और दारुण शोथ-आदि रोगोंको नष्ट करता है ॥ ६१-२६ ॥
कामलान्तकलौह ।
द्विपलं जारितं लौहं लौहार्द्धं जारिताभ्रकम् ।
मण्डूरं च तदर्द्धं च तदर्द्धं मृतवङ्गकम् ॥ ३७ ॥
वङ्गाद्धं मागधः शुण्ठी पिप्पली गजपिप्पली ।
ग्रन्थिकं गन्धपत्रं च दार्वा चव्यं यमानिका ॥ ३८ ॥
चित्रकं कट्फलं रास्ना देवदारु फलत्रिकम् ।
रसाञ्जनं चातिविषां समभागानि चूर्णयेत् ॥ ३९ ॥
केशराजस्य भृङ्गरस्य सोमराजरसस्य च ।
मण्डूकपर्ण्याः स्वरसैर्भावयेच्च दिनत्रयम् ॥ ४० ॥
लोहेकी भस्म ८ तोले, अभ्रककी भस्म ४ तोले, मण्डूरभस्म २ तोले, वंगभस्म १ तोला एवं जीरा, सोंठ, पीपल, गजपीपल, गठिवन, तेजपात, दारुहलदी, चव्य, अजवायन, चीता, कायफल, रास्ना देवदारु, त्रिफला, रसौत और अतीस ये सब औषधियाँ छः छः मासे लेकर सबका एकत्र चूर्ण करलेवे । फिर इस चूर्णको कुक्कुरभाँगरा, भाँगरा, बावची और मण्डूकपर्णी इनके स्वरसमें पृथक् पृथक् तीन तीन दिनतक भावना देवे ॥ ३७ ॥ ४० ॥
भक्षयेन्मधुना युक्तं सर्वमेहकुलान्तकः ।
कामलां पाण्डुरोगं च हलीमकमतारुचिम् ॥ ४१ ॥
कासं श्वासं शिरःशूलं प्लीहानमग्रमांसकम् ।
जीर्णज्वरं तथा शोथमङ्गग्रहनिपीडितम् ॥ ४२ ॥
गुल्मशूलं च हृद्रोगं संग्रहग्रहणीहरम् ।
अग्निं च कुरुते दीप्तं ज्वरं जीर्णं व्यपोहति ॥
कामलान्तकनामेदं लोहं कामलरोगनुत् ॥ ४३ ॥
इस कामलान्तकनामक लोहको शहदके साथ मिलाकर भक्षण करनेसे सर्व प्रकारके प्रमेह, कामला, पाण्डु, हलीमक, अरुचि, खाँसी, श्वास, शिरदर्द, प्लीहा अग्रमांस पुराना ज्वर, शोथ, अंगपीडा, गुल्म, शूल, हृदयरोग, संग्रहणी आदि