भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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584
॥ श्रीहरिः ॥
संक्षिप्त
भविष्यपुराण
त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥
गीताप्रेस, गोरखपुर
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नम्र निवेदन
विषय-वस्तु, वर्णनशैली तथा काव्य-रचनाकी दृष्टिसे भविष्यपुराण उच्चकोटिका ग्रन्थ है। इसमें धर्म, सदाचार, नीति, उपदेश, आख्यान-साहित्य, व्रत, तीर्थ, दान, ज्योतिष एवं आयुर्वेदादिसे सम्बन्धित विषयोंका अद्भुत संयोजन है। इसकी कथाएँ रोचक तथा प्रभावोत्पादक हैं। यह पुराण ब्राह्म, मध्यम, प्रतिसर्ग तथा उत्तर—इन चार मुख्य पर्वोंमें विभक्त है। मध्यमपर्व तीन तथा प्रतिसर्गपर्व चार अवान्तर खण्डोंमें विभक्त है। पर्वोंके अन्तर्गत अध्याय हैं, जिनकी कुल संख्या ४८५ है। यह पुराण भगवान् सूर्यकी महत्ताका सुन्दर प्रतिपादक है। प्रतिसर्गपर्वके द्वितीय खण्डके २३ अध्यायोंमें वेताल-विक्रम-संवादके रूपमें जो कथा-प्रबन्ध है, वह अत्यन्त रमणीय तथा मोहक है। रोचकताके कारण ही यह कथा-प्रबन्ध गुणाढ्यकी 'बृहत्कथा', क्षेमेन्द्रकी 'बृहत्कथा-मञ्जरी, सोमदेवके 'कथा-सरित्सागर' आदिमें वेतालपञ्चविंशतिके रूपमें संगृहीत हुआ है। भविष्यपुराणकी इन्हीं कथाओंका नाम 'वेतालपञ्चविंशति' या 'वेतालपञ्चविंशतिका' है। इसी प्रकार प्रतिसर्गपर्वके द्वितीय खण्डके २४ से २९ अध्यायोंतक उपनिबद्ध 'श्रीसत्यनारायणव्रतकथा' उत्तम कथा-साहित्य है। उत्तरपर्वमें वर्णित व्रतोत्सव तथा दान-माहात्म्यसे सम्बद्ध कथाएँ भी एकसे बढ़कर एक हैं। ब्राह्मपर्व तथा मध्यमपर्वकी सूर्य-सम्बन्धी कथाएँ भी कम रोचक नहीं हैं। आल्हा-ऊदलके इतिहासका प्रसिद्ध आख्यान इसी पुराणके आधारपर प्रचलित है।
भविष्यपुराणकी दूसरी विशेषता यह है कि यह पुराण भारतवर्षके वर्तमान समस्त आधुनिक इतिहासका आधार है। इसके प्रतिसर्गपर्वके तृतीय तथा चतुर्थ खण्डमें इतिहासकी महत्त्वपूर्ण सामग्री विद्यमान है। इतिहास लेखकोंने प्रायः इसीका आधार लिया है। इसमें मध्यकालीन हर्षवर्धन आदि हिन्दू राजाओं और अलाउद्दीन, मुहम्मद तुगलक, तैमूरलंग, बाबर तथा अकबर आदिका प्रामाणिक इतिहास निरूपित है।
इस पुराणकी तीसरी विशेषता यह है कि इसके मध्यमपर्वमें समस्त कर्मकाण्डका निरूपण है। इसमें वर्णित व्रत और दानसे सम्बद्ध विषय भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इतने विस्तारसे व्रतोंका वर्णन न किसी पुराण, धर्मशास्त्रमें मिलता है और न किसी स्वतन्त्र व्रत-संग्रहके ग्रन्थमें। हेमाद्रि, व्रतकल्पद्रुम, व्रतरत्नाकर, व्रतराज आदि परवर्ती व्रत-साहित्यमें मुख्यरूपसे भविष्यपुराणका ही आश्रय लिया गया है।
विषय-वस्तुकी लोकोपयोगिता एवं पाठकोंके बार-बार आग्रहको दृष्टिगत रखते हुए 'कल्याण' के छाठवें वर्षके विशेषाङ्कके रूपमें पूर्व प्रकाशित 'संक्षिप्त भविष्यपुराणाङ्क' को अब 'संक्षिप्त भविष्यपुराण' के रूपमें पाठकोंके समक्ष प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष हो रहा है। आशा है, गीताप्रेससे प्रकाशित अन्य पुराणोंकी भाँति इस पुराणको भी अपनाकर पाठकगण इससे भरपूर लाभ उठायेंगे। आकर्षक लेमिनेटेड आवरण, मज़बूत जिल्द, ऑफसेटकी सुन्दर छपाई और उपासनायोग्य अनेक चित्र इसकी अन्य विशेषताएँ हैं।
प्रकाशक
॥ श्रीहरिः ॥
संक्षिप्त भविष्यपुराणकी विषय-सूची
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| ब्राह्मपर्व | १४- तृतीया-कल्पका आरम्भ, गौरी-तृतीया-व्रत-विधान और उसका फल | ५४ | |
| १- व्यास-शिष्य महर्षि सुमन्तु एवं राजा शतानीकका संवाद, भविष्यपुराणकी महिमा एवं परम्परा, सृष्टि-वर्णन, चारों वेद, पुराण एवं चारों वर्णोंकी उत्पत्ति, चतुर्विध सृष्टि, काल-गणना, युगोंकी संख्या, उनके धर्म तथा संस्कार | ११ | १५- चतुर्थी-व्रत एवं गणेशजीकी कथा तथा सामुद्रिक शास्त्रका संक्षिप्त परिचय | ५५ |
| २- गर्भाधानसे यज्ञोपवीतपर्यन्त संस्कारोंकी संक्षिप्त विधि, अन्नप्रशंसा तथा भोजन-विधिके प्रसंगमें धनवर्धनकी कथा, हाथोंके तीर्थ एवं आचमन-विधि | १९ | १६- चतुर्थी-कल्प-वर्णनमें गणेशजीका विघ्न-अधिकार तथा उनकी पूजा-विधि | ५६ |
| ३- वेदाध्ययन-विधि, ओंकार तथा गायत्री-माहात्म्य, आचार्यादि-लक्षण, ब्रह्मचारिधर्म-निरूपण, अभिवादन-विधि, स्नातककी महिमामें अङ्गिरापुत्रका आख्यान, माता-पिता और गुरुकी महिमा | २२ | १७- पुरुषोंके शुभाशुभ लक्षण | ५८ |
| १८- राजपुरुषोंके लक्षण | ६२ | ||
| १९- स्त्रियोंके शुभाशुभ लक्षण | ६३ | ||
| २०- विनायक-पूजाका माहात्म्य | ६४ | ||
| ४- विवाह-संस्कारके उपक्रममें स्त्रियोंके शुभ और अशुभ लक्षणोंका वर्णन तथा आचरणकी श्रेष्ठता | २९ | २१- चतुर्थी-कल्पमें शिवा, शान्ता तथा सुखा—तीन प्रकारकी चतुर्थीका फल और उनका व्रत-विधान | ६४ |
| ५- गृहस्थाश्रममें धन एवं स्त्रीकी महत्ता, धन-सम्पादन करनेकी आवश्यकता तथा समान कुलमें विवाह-सम्बन्धकी प्रशंसा | ३१ | २२- पञ्चमी-कल्पका आरम्भ, नागपञ्चमीकी कथा, पञ्चमी-व्रतका विधान और फल | ६६ |
| ६- विवाह-सम्बन्धी तत्त्वोंका निरूपण, विवाहयोग्य कन्याके लक्षण, आठ प्रकारके विवाह, ब्रह्मावर्त, आर्यावर्त आदि उत्तम देशोंका वर्णन | ३३ | २३- सर्पोंके लक्षण, स्वरूप और जाति | ६८ |
| २४- विभिन्न तिथियों एवं नक्षत्रोंमें कालसर्पसे डँसे हुए पुरुषके लक्षण, नागोंकी उत्पत्तिकी कथा | ७० | ||
| ७- धन एवं स्त्रीके तीन आश्रय तथा स्त्री-पुरुषोंके पारस्परिक व्यवहारका वर्णन | ३५ | २५- सर्पोंके विषका वेग, फैलाव तथा सात धातुओंमें प्राप्त विषके लक्षण और उनकी चिकित्सा | ७१ |
| ८- पतिव्रता स्त्रियोंके कर्तव्य एवं सदाचारका वर्णन, स्त्रियोंके लिये गृहस्थ-धर्मके उत्तम व्यवहारकी आवश्यक बातें | ३६ | २६- सर्पोंकी भिन्न-भिन्न जातियाँ, सर्पोंके काटनेके लक्षण, पञ्चमी तिथिका नागोंसे सम्बन्ध और पञ्चमी-तिथिमें नागोंके पूजनका फल एवं विधान | ७३ |
| ९- पञ्चमहायज्ञोंका वर्णन तथा व्रत-उपवासोंके प्रकरणमें आहारका निरूपण एवं प्रतिपदा तिथिकी उत्पत्ति, व्रत-विधि और माहात्म्य | ४३ | २७- षष्ठी-कल्प-निरूपणमें स्कन्द-षष्ठी-व्रतकी महिमा | ७५ |
| २८- आचरणकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन | ७६ | ||
| २९- भगवान् कार्तिकेय तथा उनके षष्ठी-व्रतकी महिमा | ७७ | ||
| १०- प्रतिपत्कल्प-निरूपणमें ब्रह्माजीकी पूजा-अर्चाकी महिमा | ४६ | ३०- सप्तमी-कल्पमें भगवान् सूर्यके परिवारका निरूपण एवं शाक-सप्तमी-व्रत | ७७ |
| ११- ब्रह्माजीकी रथयात्राका विधान और कार्तिक शुक्ल प्रतिपदाकी महिमा | ४८ | ३१- श्रीकृष्ण-साम्ब-संवाद तथा भगवान् सूर्यनारायणकी पूजन-विधि | ८० |
| १२- द्वितीया-कल्पमें महर्षि च्यवनकी कथा एवं पुष्पद्वितीया-व्रतकी महिमा | ४९ | ३२- श्रीसूर्यनारायणके नित्यार्चनका विधान | ८२ |
| १३- फल-द्वितीया (अशून्यशयन-व्रत)-का व्रत-विधान और द्वितीया-कल्पकी समाप्ति | ५३ | ३३- भगवान् सूर्यके पूजन एवं व्रतोद्यापनका विधान, द्वादश आदित्योंके नाम और रथसप्तमी-व्रतकी महिमा | ८३ |
| ३४- सूर्यदेवके रथ एवं उसके साथ भ्रमण करनेवाले देवता-नाग आदिका वर्णन | ८५ | ||
| ३५- भगवान् सूर्यकी महिमा, विभिन्न ऋतुओंमें उनके अलग-अलग वर्ण तथा उनके फल | ८७ |
$$[ \text{५} ]$$
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| ३६-भगवान् सूर्यका अभिषेक एवं उनकी रथयात्रा | ८८ | ६०-जया-सप्तमी-व्रतका वर्णन | १२५ |
| ३७-रथयात्रा में विघ्न होनेपर एवं गोचरमें दुष्ट ग्रहोंके आ जानेपर शान्तिका विधान और तिलककी महिमा | ९१ | ६१-जयन्ती-सप्तमीका विधान और फल | १२६ |
| ३८-सूर्यनारायणकी रथयात्राका फल | ९३ | ६२-अपराजिता-सप्तमी एवं महाजया-सप्तमी-व्रतका वर्णन | १२७ |
| ३९-रथसप्तमी तथा भगवान् सूर्यकी महिमाका वर्णन | ९४ | ६३-नन्दा-सप्तमी तथा भद्रा-सप्तमी-व्रतका विधान | १२८ |
| ४०-भगवान् सूर्यद्वारा योगका वर्णन एवं ब्रह्माजीद्वारा दिण्डीको दिया गया क्रियायोगका उपदेश | ९५ | ६४-तिथियों और नक्षत्रोंके देवता तथा उनके पूजनका फल | १२९ |
| ४१-भगवान् सूर्यके व्रतोंके अनुष्ठान तथा उनके मन्दिरोंमें अर्चन-पूजनकी विधि तथा फल-सप्तमी-व्रतका फल | ९८ | ६५-सूर्य-पूजाका माहात्म्य | १३२ |
| ४२-रहस्य-सप्तमी-व्रतके दिन त्याज्य पदार्थका निषेध तथा व्रतका विधान एवं फल | १०० | ६६-त्रिवर्ग-सप्तमीकी महिमा | १३४ |
| ४३-शंख एवं द्विज, वसिष्ठ एवं साम्ब तथा याज्ञवल्क्य और ब्रह्माके संवादमें आदित्यकी आराधनाका माहात्म्य-कथन, भगवान् सूर्यकी ब्रह्मरूपता | १०१ | ६७-कामदा एवं पापनाशिनी-सप्तमी-व्रत-वर्णन | १३५ |
| ४४-सूर्यनारायणके प्रिय पुष्प, सूर्यमन्दिरमें मार्जन-लेपन आदिका फल, दीपदानका फल तथा सिद्धार्थ-सप्तमी-व्रतका विधान और फल | १०४ | ६८-सूर्यपदद्वय-व्रत, सर्वाप्ति-सप्तमी एवं मार्तण्ड-सप्तमीकी विधि | १३६ |
| ४५-शुभाशुभ स्वप्न और उनके फल | १०६ | ६९-अनन्त-सप्तमी तथा अव्यङ्ग-सप्तमीका विधान | १३७ |
| ४६-सिद्धार्थ (सर्षप)-सप्तमी-व्रतके उद्यापनकी विधि | १०७ | ७०-सूर्यपूजामें भाव-शुद्धिकी आवश्यकता एवं त्रिप्ताप्ति-सप्तमी-व्रत | १३८ |
| ४७-ब्रह्माद्वारा कहा गया भगवान् सूर्यका नाम-स्तोत्र | १०७ | ७१-सूर्यमन्दिर-निर्माणका फल तथा यमराजका अपने दूतोंको सूर्यभक्तोंसे दूर रहनेका आदेश, घृत तथा दूधसे अभिषेकका फल | १३९ |
| ४८-जम्बूद्वीपमें सूर्यनारायणकी आराधनाके तीन प्रमुख स्थान, दुर्वासा मुनिका साम्बको शाप देना | १०८ | ७२-कौसल्या और गौतमीके संवादरूपमें भगवान् सूर्यका माहात्म्य-निरूपण तथा भगवान् सूर्यके प्रिय पत्र-पुष्पादिका वर्णन | १४० |
| ४९-सूर्यनारायणकी द्वादश मूर्तियोंका वर्णन | ११० | ७३-सूर्य-भक्त सत्राजित्की कथा तथा त्रिविक्रम-व्रतकी विधि | १४१ |
| ५०-देवर्षि नारदद्वारा सूर्यके विराट्रूप तथा उनके प्रभावका वर्णन | १११ | ७४-भोजकोंकी उत्पत्ति तथा उनके लक्षणोंका वर्णन | १४४ |
| ५१-भगवान् सूर्यका परिवार | ११४ | ७५-भद्र ब्राह्मणकी कथा एवं कार्तिक मासमें सूर्य-मन्दिरमें दीपदानका फल | १४६ |
| ५२-सूर्यभगवान्को नमस्कार एवं प्रदक्षिणा करनेका फल और विजया-सप्तमी-व्रतकी विधि | ११७ | ७६-यमदूत और नारकीय जीवोंके संवादके प्रसंगमें सूर्य-मन्दिरमें दीपदान करने एवं दीप चुरानेके पुण्य-पापोंका परिणाम | १४७ |
| ५३-द्वादश रविवारोंका वर्णन और नन्दादित्य-व्रतकी विधि | ११७ | ७७-वैवस्वतके लक्षण और सूर्यनारायणकी महिमा | १४८ |
| ५४-भद्रादित्य, सौम्यादित्य और कामदादित्यवार-व्रतोंकी विधिका निरूपण | ११८ | ७८-भगवान् सूर्यनारायणके सौम्य रूपकी कथा, उनकी स्तुति और परिवार तथा देवताओंका वर्णन | १५० |
| ५५-पुत्रद, जय, जयन्तसंज्ञक आदित्यवार-व्रतोंकी विधि | ११९ | ७९-श्रीसूर्यनारायणके आयुध—व्योमका लक्षण और माहात्म्य | १५२ |
| ५६-विजय, आदित्याभिमुख तथा हृदयवार-व्रतोंकी विधि | ११९ | ८०-साम्बद्वारा भगवान् सूर्यकी आराधना, कुष्ठरोगसे मुक्ति तथा सूर्यस्तवराजका कथन | १५४ |
| ५७-रोगहा एवं महाश्वेतवार-व्रतकी विधि | १२० | ८१-साम्बको सूर्य-प्रतिमाकी प्राप्ति | १५७ |
| ५८-सूर्यदेवकी पूजामें विविध उपचार और फल आदि निवेदन करनेका माहात्म्य | १२१ | ८२-मन्दिर-निर्माण-योग्य भूमि एवं मन्दिरमें प्रतिमाओंके स्थानका निरूपण | १५८ |
| ५९-एक वैश्य तथा ब्राह्मणकी कथा, सूर्यमन्दिरमें पुराण-वाचन एवं भगवान् सूर्यको स्नानादि करानेका फल | १२३ | ८३-सात प्रकारकी प्रतिमा एवं काष्ठ-प्रतिमाके निर्माणोपयोगी वृक्षोंके लक्षण | १५९ |
| ८४-सूर्य-प्रतिमाकी निर्माण-विधि | १६० |
[ ६ ]
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| ८५-सूर्य-प्रतिष्ठाका मुहूर्त और मण्डप बनानेका विधान ........ | १६१ | ११८-पातक, उपपातक, यममार्ग एवं यमयातनाका वर्णन ............................................................... | २१६ |
| ८६-साम्बोपाख्यानके प्रसंगमें सूर्यकी अभिषेक-विधि ............ | १६२ | ११९-सप्तमी-व्रतमें दन्तधावन-विधि-वर्णन................. | २१७ |
| ८७-भगवान् सूर्यकी प्रतिमाके अधिवासन और प्रतिष्ठाका विधान तथा फल ................................... | १६३ | १२०-स्वप्न-फल-वर्णन तथा उदक-सप्तमी-व्रत ......... | २१८ |
| ८८-ध्वजारोपणका विधान और फल ................................ | १६५ | १२१-सूर्यनारायणकी महिमा, अर्घ्य प्रदान करनेका फल तथा आदित्य-पूजनकी विधियाँ ................. | २१९ |
| ८९-साम्बोपाख्यानमें मगोंका वर्णन ................................... | १६६ | १२२-भगवान् भास्करके व्योम-पूजनकी विधि तथा आदित्य-माहात्म्य ............................................ | २२३ |
| ९०-अव्यङ्गका लक्षण और उसका माहात्म्य ..................... | १६७ | १२३-सप्त-सप्तमी तथा द्वादश मास-सप्तमी-व्रतोंका वर्णन .............................................................. | २२५ |
| ९१-साम्बोपाख्यानमें भगवान् सूर्यको अर्घ्य प्रदान करने और धूप दिखानेकी महिमा........................... | १६८ | १२४-अर्कसम्पुटिका-सप्तमीव्रत-विधि, सप्तमी-व्रत-माहात्म्यमें कौथुमिका आख्यान ..................... | २२६ |
| ९२-सूर्यमण्डलस्थ पुरुषका वर्णन ..................................... | १६९ | १२५-मरिच-सप्तमी-व्रत-वर्णन ................................... | २२८ |
| ९३-भगवान् व्यासद्वारा योग-ज्ञानका वर्णन ....................... | १६९ | १२६-निम्ब-सप्तमी तथा फलसप्तमी-व्रतका वर्णन ..... | २२८ |
| ९४-उत्तम एवं अधम भोजकोंके लक्षण ............................ | १७१ | १२७-ब्राह्मपर्व-श्रवणका माहात्म्य, पुराण-श्रवणकी विधि, पुराणों तथा पुराणवाचक व्यासकी महिमा .......... | २३० |
| ९५-भगवान् सूर्यके कालात्मक चक्रका वर्णन ................... | १७२ | मध्यमपर्व ( प्रथम भाग ) | |
| ९६-सूर्यचक्रका निर्माण और सूर्य-दीक्षाकी विधि ....... | १७३ | १२८-गृहस्थाश्रम एवं धर्मकी महिमा ............................. | २३३ |
| ९७-भगवान् आदित्यकी सप्तावरण-पूजन-विधि ....... | १७४ | १२९-सृष्टि तथा सात ऊर्ध्व एवं सात पाताल लोकोंका वर्णन ............................................................... | २३४ |
| ९८-सौरधर्मका वर्णन .................................................... | १७५ | १३०-भूगोल एवं ज्योतिश्चक्रका वर्णन ........................... | २३६ |
| ९९-ब्रह्मादि देवताओंद्वारा भगवान् सूर्यकी स्तुति एवं वर-प्राप्ति ........................................................... | १७६ | १३१-ब्राह्मणोंकी महिमा तथा छब्बीस दोषोंका वर्णन .. | २३७ |
| १००-सौर-धर्म-निरूपणमें सूर्यावतारका कथन ........... | १८२ | १३२-माता, पिता एवं गुरुकी महिमा ............................ | २३९ |
| १०१-ब्रह्मादि देवताओंद्वारा सूर्यके विराट्-रूपका दर्शन ...... | १८४ | १३३-पुराण-श्रवणकी विधि तथा पुराण-वाचककी महिमा.............................................................. | २४० |
| १०२-सूर्योपासनाका फल ............................................. | १८५ | १३४-पूर्त-कर्म-निरूपण ............................................. | २४२ |
| १०३-विभिन्न पुष्पोंद्वारा सूर्य-पूजनका फल .................. | १८६ | १३५-प्रासाद, उद्यान आदिके निर्माणमें भूमि-परीक्षण तथा वृक्षारोपणकी महिमा ................................ | २४४ |
| १०४-सूर्यषष्ठी-व्रतकी महिमा ........................................ | १८८ | १३६-देव-प्रतिमा-निर्माण-विधि ................................... | २४६ |
| १०५-उभयसप्तमी-व्रतका वर्णन ..................................... | १८९ | १३७-कुण्ड-निर्माण एवं उनके संस्कारकी विधि और ग्रह-शान्तिका माहात्म्य .................................... | २४७ |
| १०६-निक्षुभार्क-सप्तमी तथा निक्षुभार्क-चतुष्टय-व्रत-माहात्म्य-वर्णन .............................................. | १९० | १३८-अग्नि-पूजन-विधि ............................................. | २४९ |
| १०७-कामप्रद स्त्री-व्रतका वर्णन ................................... | १९१ | १३९-विविध कर्मोंमें अग्निके नाम तथा होम-द्रव्योंका वर्णन .............................................................. | २५० |
| १०८-भगवान् सूर्यके निमित्त गृह एवं रथ आदिके दानका माहात्म्य .......................................................... | १९१ | १४०-यज्ञ-पात्रोंका स्वरूप और पूर्णाहुतिकी विधि ..... | २५१ |
| १०९-सौर-धर्ममें सदाचरणका वर्णन .............................. | १९२ | मध्यमपर्व ( द्वितीय भाग ) | |
| ११०-सौर-धर्मकी महिमाका वर्णन, ब्रह्माकृत सूर्य-स्तुति ......................................................... | १९३ | १४१-यज्ञादि कर्मोंके मण्डल-निर्माणका विधान तथा क्रौञ्चादि पक्षियोंके दर्शनका फल........................ | २५३ |
| १११-सौर-धर्ममें शान्तिक कर्म एवं अभिषेक-विधि .. | १९५ | १४२-यज्ञादि कर्ममें दक्षिणाका माहात्म्य, विभिन्न कर्मोंमें पारिश्रमिक व्यवस्था और कलश-स्थापनका वर्णन .............................................................. | २५३ |
| ११२-विविध स्मृति-धर्मों तथा संस्कारोंका वर्णन ...... | २०७ | १४३-चतुर्विध मास-व्यवस्था एवं मलमास-वर्णन ..... | २५५ |
| ११३-श्राद्धके विविध भेद तथा वैश्वदेव-कर्मकी महिमा........ | २०८ | ||
| ११४-मातृ-श्राद्धकी संक्षिप्त विधि ............................... | २०९ | ||
| ११५-सौर-धर्ममें शुद्धि-प्रकरण..................................... | २१० | ||
| ११६-श्राद्धाकी महिमा, खखोल्क-मन्त्रका माहात्म्य तथा गौकी महिमा............................................... | २११ | ||
| ११७-पञ्चमहायज्ञ एवं अतिथि-माहात्म्य-वर्णन, सौर-धर्ममें दानकी महत्ता और पात्रापात्रका निर्णय तथा पञ्च महापातक .................................................... | २१३ |
[ ७ ]
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| १४४-काल-विभाग, तिथि-निर्णय एवं वर्षभरके विशेष पर्वों तथा तिथियोंके पुण्यप्रद कृत्य ........ | २५६ | १७०-साधनामें मनोयोगकी महत्ता .......................... | ३०४ |
| १४५-गोत्र-प्रवर आदिके ज्ञानकी आवश्यकता ......... | २५९ | १७१-संतानमें समान-भाव रखें ............................ | ३०५ |
| १४६-वास्तु-मण्डलके निर्माण एवं वास्तु-पूजनकी संक्षिप्त विधि ........................................ | २५९ | १७२-पढ़ो कम, समझो ज्यादा ............................ | ३०७ |
| १४७-कुशकण्डिका-विधान तथा अग्नि-जिह्वाओंके नाम ....... | २६२ | १७३-सत्यनारायणव्रत-कथा ............................... | ३०९ |
| १४८-अधिवासनकर्म एवं यज्ञकर्ममें उपयोज्य उत्तम ब्राह्मण तथा धर्मदेवताका स्वरूप ................. | २६४ | १७४-सत्यनारायणव्रत-कथामें शतानन्द ब्राह्मणकी कथा ....... | ३१२ |
| १४९-प्रतिष्ठा-मुहूर्त एवं जलाशय आदिकी प्रतिष्ठा-विधि .................................................. | २६५ | १७५-सत्यनारायणव्रत-कथामें राजा चन्द्रचूड़का आख्यान ................................................ | ३१५ |
| मध्यमपर्व ( तृतीय भाग ) | १७६-सत्यनारायण-व्रतके प्रसंगमें लकड़हारोंकी कथा ......... | ३१६ | |
| १५०-उद्यान-प्रतिष्ठा-विधि .................................... | २६८ | १७७-सत्यनारायण-व्रतके प्रसंगमें साधु वणिक् एवं जामाताकी कथा ..................................... | ३१७ |
| १५१-गोचर-भूमिके उत्सर्ग तथा लघु उद्यानोंकी प्रतिष्ठा-विधि ........................................ | २७० | १७८-सत्यधर्मके आश्रयसे सबका उद्धार ................... | ३१९ |
| १५२-अश्वत्थ, पुष्करिणी तथा जलाशयके प्रतिष्ठाकी विधि .................................................. | २७२ | १७९-पितृशर्मा और उनके वंशज—व्याडि, पाणिनि और वररुचि आदिकी कथा .......................... | ३२३ |
| १५३-वट, बिल्व तथा पूगीफल आदि वृक्ष-युक्त उद्यानकी प्रतिष्ठा-विधि ............................. | २७३ | १८०-महर्षि पाणिनिका इतिवृत्त ............................ | ३२४ |
| १५४-मण्डप, महायूप और पौंसले आदिकी प्रतिष्ठा-विधि ........................................ | २७४ | १८१-बोपदेवके चरित्र-प्रसंगमें श्रीमद्भागवत-माहात्म्य ......... | ३२५ |
| १५५-पुष्पवाटिका तथा तुलसीकी प्रतिष्ठा-विधि ........ | २७५ | १८२-श्रीदुर्गासप्तशतीके आदिचरित्रका माहात्म्य ......... | ३२६ |
| १५६-एकाह-प्रतिष्ठा तथा काली आदि देवियोंकी प्रतिष्ठा-विधि ........................................ | २७६ | १८३-श्रीदुर्गासप्तशतीके मध्यमचरित्रका माहात्म्य ........ | ३२७ |
| १५७-दिव्य, भौम एवं अन्तरिक्षजन्य उत्पात तथा उनकी शान्तिके उपाय ........................................ | २७७ | १८४-श्रीदुर्गासप्तशतीके उत्तरचरित्रकी महिमाके प्रसंगमें योगाचार्य महर्षि पतञ्जलिका चरित्र ................ | ३२८ |
| प्रतिसर्गपर्व ( प्रथम खण्ड ) | प्रतिसर्गपर्व ( तृतीय खण्ड ) | ||
| १५८-सत्ययुगके राजवंशका वर्णन ........................ | २८१ | १८५-आल्हा खण्ड (आल्हा-ऊदलकी कथा)-का उपक्रम ................................................ | ३२९ |
| १५९-त्रेतायुगके सूर्य एवं चन्द्र-राजवंशोंका वर्णन ...... | २८४ | १८६-राजा शालिवाहन तथा ईशामसीहकी कथा ........ | ३३० |
| १६०-द्वापरयुगके चन्द्रवंशीय राजाओंका वृत्तान्त ......... | २८६ | १८७-राजा भोज और महामदकी कथा ................... | ३३२ |
| १६१-म्लेच्छवंशीय राजाओंका वर्णन तथा म्लेच्छ-भाषा आदिका संक्षिप्त परिचय ........................... | २८८ | १८८-देशराज एवं वत्सराज आदि राजाओंका आविर्भाव ...... | ३३२ |
| १६२-काश्यपके उपाध्याय, दीक्षित आदि दस पुत्रोंका नामोल्लेख, मगधके राजवंश और बौद्ध राजाओंका तथा चौहान और परमार आदि राजवंशोंका वर्णन ....... | २९२ | प्रतिसर्गपर्व ( चतुर्थ खण्ड ) | |
| १६३-महाराज विक्रमादित्यके चरित्रका उपक्रम ......... | २९४ | १८९-कलियुगमें उत्पन्न आन्ध्रवंशीय राजाओंके वंश-वृक्षका वर्णन ......................................... | ३३४ |
| प्रतिसर्गपर्व ( द्वितीय खण्ड ) | १९०-राजपूताना तथा दिल्लीनगरके राजवंशका इतिहास ..... | ३३६ | |
| १६४-स्वामी एवं सेवककी परस्पर भक्तिका आदर्श .... | २९६ | १९१-ब्राह्मणोंकी उत्पत्तिके प्रसंगमें शुक्लवंश एवं उसके आगे होनेवाले विभिन्न क्षत्रियवंशोंका वर्णन ........ | ३३७ |
| १६५-ब्राह्मण-पुत्री महादेवीकी कथा ........................ | २९७ | १९२-परिहारवंश और बंगालके शूरवंश आदिका वर्णन ....... | ३३९ |
| १६६-समान-वर्णमें विवाह-सम्बन्धका औचित्य ....... | २९९ | १९३-भगवान्से चारों वर्णोंकी उत्पत्ति, चारों युगोंमें भगवान्के अवतारों एवं चारों युगोंके मनुष्योंकी आयुका निरूपण ................................... | ३४१ |
| १६७-विषयी राजा राज्यके विनाशका कारण बनता है • | ३०० | १९४-दिल्ली नगरपर पठानोंका शासन और तैमूरलंगका उत्पात .................................................. | ३४२ |
| १६८-किये गये कर्मोंका फल अवश्य भोगना पड़ता है ......... | ३०२ | १९५-भगवान् सूर्यके तेजसे आचार्य ईश्वरपुरी, आचार्य रामानन्द और निम्बार्काचार्यका आविर्भाव ......... | ३४३ |
| १६९-जीवन-दानका आदर्श .................................. | ३०३ | १९६-आचार्य मध्व, श्रीधरस्वामी, विष्णुस्वामी, वाणीभूषण, भट्टोजिदीक्षित तथा वराहमिहिर आदिके आविर्भावकी कथा .................................... | ३४६ |
[ ८ ]
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| १९७-वैद्यराज धन्वन्तरि, सुश्रुत और भक्त कवि जयदेवजीका चरित्र | ३५० | युधिष्ठिरकी प्रार्थना | ३८३ |
| १९८-चैतन्य महाप्रभु, वाल्मीकि और शंकराचार्यके आविर्भावकी कथा | ३५२ | २१४-भुवनकोशका संक्षिप्त वर्णन | ३८४ |
| १९९-गिरिशर्मा, वनशर्मा तथा पुरीशर्माके आविर्भावका आख्यान | ३५५ | २१५-नारदजीको विष्णु-मायाका दर्शन | ३८६ |
| २००-भारती, नाथशर्मा, क्षेत्रशर्मा तथा ढुंढिराजकी उत्पत्ति-कथा | ३५६ | २१६-संसारके दोषोंका वर्णन | ३८८ |
| २०१-अघोरपंथी भैरव तथा बालशर्माकी उत्पत्तिकी कथामें रावण तथा हनुमान्जीका चरित्र | ३६० | २१७-विविध प्रकारके पापों एवं पुण्य-कर्मोंका फल | ३९२ |
| २०२-रुद्रमाहात्म्य, भवके अंशसे रामानुजाचार्यका आविर्भाव | ३६१ | २१८-व्रतोपवासकी महिमामें शकटव्रतकी कथा | ३९६ |
| २०३-वसुदेवताओंके अंशसे कुबेर आदिकी उत्पत्ति, रामायणकी संक्षिप्त कथा एवं त्रिलोचन भक्तका वृत्तान्त | ३६२ | २१९-तिलकव्रतके माहात्म्यमें चित्रलेखाका चरित्र | ३९७ |
| २०४-रामानन्दजीके शिष्य नामदेव, भक्त रंकण (राँका) एवं बंकणा (बाँका)-का चरित्र, वरुणदेव और पराम्बाकी महिमा | ३६४ | २२०-अशोकव्रत तथा करवीरव्रतका माहात्म्य | ३९८ |
| २०५-संत कबीर, भक्त नरसी मेहता, पीपा, नानक तथा साधु नित्यानन्दजीके पूर्वजन्मोंकी कथा | ३६५ | २२१-कोकिलाब्रतका विधान और माहात्म्य | ३९९ |
| २०६-अश्विनीकुमारोंके अंशसे सधन (सदन कसाई) और रैदासकी उत्पत्ति-कथा | ३६७ | २२२-बृहत्तपोव्रतका विधान और फल | ३९९ |
| २०७-यज्ञांश चैतन्यमहाप्रभुका चरित्र एवं अन्य आचार्योंका भी उनके भक्ति-भावसे प्रभावित होना | ३६८ | २२३-जातिस्मर-भद्रव्रतका फल और विधान तथा स्वर्णष्ठीवीकी कथा | ४०१ |
| २०८-भक्तोंसहित चैतन्यमहाप्रभुकी जगन्नाथपुरी-यात्रा एवं साक्षात् भगवान्से वार्तालाप | ३७० | २२४-यमद्वितीया तथा अशून्यशयन-व्रतकी विधि | ४०४ |
| २०९-मुनिश्रेष्ठ कण्वके उपाध्याय, दीक्षित तथा पाठक आदि दस पुत्रोंकी उत्पत्ति, चैतन्य महाप्रभु आदि आचार्योंद्वारा शुद्धिपूवर्क वैष्णवधर्मका विस्तार | ३७१ | २२५-मधुकतृतीया एवं मेघपाली तृतीयाव्रत | ४०५ |
| २१०-अकबर आदि अन्तिम मुगल शासकोंका चरित्र, तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई, तानसेन तथा बीरबल आदिके पूर्वजन्मोंका वृत्तान्त, गुरुण्ड, मौन और सर्वत्र म्लेच्छराज्यका विस्तार | ३७४ | २२६-पञ्चाग्निसाधन नामक रम्भा-तृतीया तथा गोष्पद-तृतीयाव्रत | ४०६ |
| २११-कलिके द्वितीय, तृतीय तथा चतुर्थ चरणोंका वृत्तान्त तथा कल्कि भगवान्का अवतार | ३७९ | २२७-हरकालीव्रत-कथा | ४०८ |
| २१२-भगवान् कल्किकी विजय, सत्ययुगकी उत्पत्तिकथा, अक्षयनावमीमें आँवलेके पूजनका माहात्म्य, अयोध्यामें महाराज वैवस्वतका प्रतिष्ठित होना तथा प्रतिसर्गपर्वका उपसंहार | ३८१ | २२८-ललितातृतीया-व्रतकी विधि | ४०९ |
| उत्तरपर्व | २२९-अवियोगतृतीया-व्रत | ४१० | |
| २१३-महाराज युधिष्ठिरके पास व्यासादि महर्षियोंका आगमन एवं उनसे उपदेश करनेके लिये | २३०-उमा-महेश्वर-व्रतकी विधि | ४११ | |
| २३१-रम्भातृतीया-व्रतका माहात्म्य | ४१२ | ||
| २३२-सौभाग्यशयन-व्रतकी विधि | ४१४ | ||
| २३३-अनन्त-तृतीया तथा रसकल्याणिनी तृतीया-व्रत | ४१५ | ||
| २३४-आर्द्रानन्दकरी तृतीयाव्रत | ४१८ | ||
| २३५-चैत्र, भाद्रपद और माघ शुक्ल तृतीया-व्रतका विधान और फल | ४१९ | ||
| २३६-आनन्तर्य-तृतीयाव्रत | ४२० | ||
| २३७-अक्षय-तृतीयाव्रतके प्रसंगमें धर्म वणिक्का चरित्र | ४२३ | ||
| २३८-शान्तिव्रत | ४२४ | ||
| २३९-सरस्वतीव्रतका विधान और फल | ४२४ | ||
| २४०-श्रीपञ्चमीव्रत-कथा | ४२५ | ||
| २४१-विशोक-षष्ठी-व्रत | ४२७ | ||
| २४२-कमलषष्ठी (फलषष्ठी)-व्रत | ४२८ | ||
| २४३-मन्दारषष्ठी-व्रत | ४२८ | ||
| २४४-ललिताषष्ठी-व्रतकी विधि | ४२९ | ||
| २४५-कुमारषष्ठी-व्रतकी कथा | ४३० | ||
| २४६-विजया-सप्तमीव्रत | ४३१ | ||
| २४७-आदित्य-मण्डलदान-विधि | ४३२ | ||
| २४८-वर्ज्यसप्तमीव्रत | ४३२ | ||
| २४९-कुक्कुट-मर्कटी-व्रतकथा (मुक्ताभरण सप्तमीव्रत-कथा) | ४३२ | ||
| २५०-उभय-सप्तमीव्रत | ४३४ |
[ ९ ]
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| २५१-कल्याणसप्तमी-व्रतकी विधि | ४३५ | २८६-धर्मराजका समाराधन-व्रत | ४८७ |
| २५२-शर्करासप्तमी-व्रतकी विधि | ४३६ | २८७-अनङ्ग-त्रयोदशी-व्रत | ४८८ |
| २५३-कमलसप्तमी-व्रत | ४३७ | २८८-पाली-व्रत एवं रम्भा (कदली)-व्रत | ४८९ |
| २५४-शुभसप्तमी-व्रतकी विधि | ४३७ | २८९-आग्नेयी शिवचतुर्दशी-व्रतके प्रसंगमें महर्षि अङ्गिराका आख्यान | ४९० |
| २५५-सप्तमी-स्नपनव्रत और उसकी विधि | ४३८ | २९०-अनन्तचतुर्दशी-व्रत-विधान | ४९२ |
| २५६-अचलासप्तमी-व्रत-कथा तथा व्रत-विधि | ४४० | २९१-श्रवणिकाव्रत-कथा एवं व्रत-विधि | ४९४ |
| २५७-बुधाष्टमीव्रत-कथा तथा माहात्म्य | ४४२ | २९२-नक्त एवं शिवचतुर्दशी-व्रतकी विधि | ४९६ |
| २५८-श्रीकृष्ण-जन्माष्टमीव्रतकी कथा एवं विधि | ४४४ | २९३-सर्वफलत्याग-चतुर्दशीव्रत | ४९७ |
| २५९-दूर्वाकी उत्पत्ति एवं दूर्वाष्टमीव्रतका विधान | ४४७ | २९४-पौर्णमासी-व्रत-विधान एवं अमावास्यामें श्राद्ध-तर्पणकी महिमा | ४९८ |
| २६०-मासिक कृष्णाष्टमी-व्रतोंकी विधि | ४४७ | २९५-वैशाखी, कार्तिकी और माघी पूर्णिमाकी विधि | ४९९ |
| २६१-अनघाष्टमी-व्रतकी कथा एवं विधि | ४४९ | २९६-युगादि तिथियोंकी विधि | ५०० |
| २६२-सोमाष्टमी-व्रत-विधान | ४५१ | २९७-सावित्री-व्रतकथा एवं व्रत-विधि | ५०० |
| २६३-श्रीवृक्षनवमी-व्रत-कथा | ४५१ | २९८-महाकार्तिकी-व्रतके प्रसंगमें रानी कलिंगभद्रका आख्यान | ५०३ |
| २६४-ध्वजनवमी-व्रत-कथा | ४५२ | २९९-मनोरथपूर्णिमा तथा अशोकपूर्णिमाव्रत-विधि | ५०४ |
| २६५-उल्का-नवमी-व्रतका विधान और फल | ४५३ | ३००-अनन्तव्रत-माहात्म्यमें कार्तवीर्यके आविर्भावका वृत्तान्त | ५०६ |
| २६६-दशावतारव्रत-कथा, विधान और फल | ४५४ | ३०१-मास-नक्षत्र-व्रतके माहात्म्यमें साम्भ्रायणीकी कथा | ५०७ |
| २६७-आशादशमी-व्रत-कथा एवं व्रत-विधान | ४५५ | ३०२-वैष्णव एवं शैव नक्षत्रपुरुष-व्रतोंका विधान | ५०९ |
| २६८-तारकद्वादशीके प्रसंगमें राजा कुशध्वजकी कथा तथा व्रत-विधान | ४५७ | ३०३-भग्नव्रतकी प्रायश्चित्त-विधि तथा पण्यस्त्री-व्रत | ५११ |
| २६९-अरण्यद्वादशी-व्रतका विधान और फल | ४५८ | ३०४-वृन्ताक-त्याग एवं ग्रह-नक्षत्रव्रतकी विधि | ५१२ |
| २७०-रोहिणीचन्द्र-व्रत तथा अवियोग-व्रतका विधान | ४५८ | ३०५-शनैश्चर-व्रतके प्रसंगमें महामुनि पिप्पलादका आख्यान | ५१३ |
| २७१-गोवत्सद्वादशीका विधान, गौओंका माहात्म्य, मुनियों और राजा उत्तानपादकी कथा | ४५९ | ३०६-आदित्यवार नक्त-व्रत तथा संक्रान्ति-व्रतके उद्यापनकी विधि | ५१५ |
| २७२-देवशयनी एवं देवोत्थानी द्वादशी-व्रतोंका विधान | ४६३ | ३०७-भद्राका चरित्र एवं उसके व्रतकी विधि | ५१६ |
| २७३-नीराजनद्वादशी-व्रत-कथा एवं व्रत-विधान | ४६६ | ३०८-महर्षि अगस्त्यकी कथा और उनके अर्घ्य-दानकी विधि | ५१८ |
| २७४-भीष्मपञ्चक-व्रतकी विधि एवं महिमा | ४६७ | ३०९-नवोदित चन्द्र, गुरु एवं शुक्रको अर्घ्य देनेकी विधि | ५२१ |
| २७५-मल्लद्वादशी एवं भीमद्वादशी-व्रतका विधान | ४६८ | ३१०-प्रकीर्ण-व्रत | ५२२ |
| २७६-श्रवणद्वादशी-व्रतके प्रसंगमें एक वणिक्की कथा | ४७० | ३११-माघ-स्नान-विधि | ५२८ |
| २७७-विजय-श्रवण-द्वादशीव्रतमें वामनावतारकी कथा तथा व्रत-विधि | ४७२ | ३१२-स्नान और तर्पण-विधि | ५३० |
| २७८-सम्प्राप्ति-द्वादशी एवं गोविन्द-द्वादशीव्रत | ४७४ | ३१३-रुद्र-स्नानकी विधि | ५३२ |
| २७९-अखण्ड-द्वादशी, मनोरथ-द्वादशी एवं तिल-द्वादशी-व्रतोंका विधान | ४७४ | ३१४-ग्रहण-स्नानका माहात्म्य और विधान | ५३३ |
| २८०-सुकृत-द्वादशीके प्रसंगमें सौरभद्र वैश्यकी कथा | ४७६ | ३१५-मरणासन्न (मृत्युके पूर्व) प्राणीके कर्तव्य तथा ध्यानके चतुर्विध भेद | ५३४ |
| २८१-धरणी-व्रत (अर्चावतार-व्रत) | ४७७ | ३१६-इष्टापूर्तकी महिमा | ५३६ |
| २८२-विशोकद्वादशी-व्रत और गुडधेनु आदि दस धेनुओंके दानकी विधि तथा उसकी महिमा | ४७९ | ३१७-दीपदानकी महिमाके प्रसंगमें जातिस्मरा रानी ललिताका आख्यान | ५३८ |
| २८३-विभूतिद्वादशी-व्रतमें राजा पुष्पवाहनकी कथा | ४८१ | ||
| २८४-मदनद्वादशी-व्रतमें मरुद्गणोंका आख्यान | ४८४ | ||
| २८५-अबाधक-व्रत एवं दौर्भाग्य-दौर्गन्ध्यनाशक-व्रतका माहात्म्य | ४८६ |
[ १० ]
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| ३१८-वृषोत्सर्गकी महिमा | ५४० | $\quad$ कथा | ५९१ |
| ३१९-फाल्गुन-पूर्णिमोत्सव | ५४१ | ३५२-दासीदान-विधि | ५९२ |
| ३२०-दमनकोत्सव, दोलोत्सव तथा रथयात्रोत्सव आदिका वर्णन | ५४२ | ३५३-प्रपा (पौंसला) और अग्नीष्टिका (अँगीठी)-दानकी महिमा | ५९३ |
| ३२१-श्रावणपूर्णिमाको रक्षाबन्धनकी विधि | ५४६ | ३५४-विद्यादानकी महिमा | ५९४ |
| ३२२-महानवमी (विजयादशमी)-व्रत | ५४७ | ३५५-तुलापुरुषदानकी विधि | ५९५ |
| ३२३-इन्द्रध्वजोत्सवके प्रसंगमें उपरिचर वसुका वृत्तान्त | ५४९ | ३५६-हिरण्यगर्भ-दानकी विधि | ५९९ |
| ३२४-दीपमालिकोत्सव | ५५० | ३५७-ब्रह्माण्डदान-विधि | ६०१ |
| ३२५-शान्तिक एवं पौष्टिक कर्मों तथा नवग्रह-शान्तिकी विधिक वर्णन | ५५२ | ३५८-कल्पवृक्ष एवं कल्पलतादानकी विधि | ६०३ |
| ३२६-कोटिहोमका विधान | ५५८ | ३५९-गजरथ-अश्वरथदान-विधि | ६०५ |
| ३२७-महाशान्ति-विधान | ५६० | ३६०-कालपुरुषदान-विधि | ६०७ |
| ३२८-विनायक-शान्ति | ५६२ | ३६१-सप्तसागरदान-विधि | ६०८ |
| ३२९-नक्षत्राच्चर्न-विधि (रोगावलिचक्र) | ५६३ | ३६२-महाभूतघटदान-विधि | ६०९ |
| ३३०-अपराधशतशमन-व्रत | ५६४ | ३६३-शय्यादान एवं मृतशय्यादान-विधि | ६०९ |
| ३३१-काञ्चनपुरीव्रत-विधि | ५६५ | ३६४-आत्मप्रतिकृतिदान-विधि | ६१० |
| ३३२-कन्यादान एवं ब्राह्मणोंकी परिचर्याका माहात्म्य | ५६७ | ३६५-हिरण्याश्वदान-विधि | ६११ |
| ३३३-दानकी महिमा और प्रत्यक्ष धेनु-दानकी विधि | ५६८ | ३६६-हिरण्याश्वरथ-दानकी विधि | ६१२ |
| ३३४-तिलधेनु-दानकी विधि | ५७० | ३६७-कृष्णाजिन (मृगछाला)-दान-विधि | ६१३ |
| ३३५-जलधेनु-दानके प्रसंगमें महर्षि मुद्गलका आख्यान | ५७१ | ३६८-हेमहस्तिरथ-दानकी विधि | ६१३ |
| ३३६-घृतधेनुदान-विधि | ५७३ | ३६९-विश्वरथदान-विधि | ६१४ |
| ३३७-लवणधेनुदान-विधि | ५७४ | ३७०-भुवनप्रतिष्ठाका माहात्म्य, धर्मात्मा रजिकी कथा | ६१६ |
| ३३८-सुवर्णधेनुदान-विधि | ५७५ | ३७१-नक्षत्रदान (नक्षत्रोंमें दानके पदार्थ) | ६१८ |
| ३३९-रत्नधेनुदान-विधि | ५७५ | ३७२-तिथिदान (तिथियोंमें दानके पदार्थ) | ६१९ |
| ३४०-उभयमुखी धेनु-दानका माहात्म्य | ५७६ | ३७३-वराहदानका विधान | ६२२ |
| ३४१-गोसहस्रदान-विधि | ५७७ | ३७४-दशविध पर्वतदानोंमें धान्यशैलदानकी विधि और महिमा | ६२२ |
| ३४२-वृषभदानकी महिमा | ५७८ | ३७५-लवणाचलदान-विधि तथा गुड़पर्वतकी महिमाके प्रसंगमें सुलभाका आख्यान | ६२५ |
| ३४३-कपिलादानकी महिमा | ५७९ | ३७६-सुवर्ण एवं तिलशैलदान-विधि, तिलोंकी महिमा | ६२७ |
| ३४४-महिषी एवं मेषी-दानकी विधि | ५८१ | ३७७-कपास एवं घृतपर्वतोंके दानकी महिमा | ६२८ |
| ३४५-भूमिदानकी महिमा | ५८२ | ३७८-रत्नाचल और रौप्याचलदानका माहात्म्य | ६२९ |
| ३४६-सुवर्णरचित भूदानकी विधि | ५८३ | ३७९-शर्कराचल और लवणाचलदानकी महिमा | ६३० |
| ३४७-हलपंक्तिदान-विधि | ५८४ | ३८०-सदाचारधर्मका निरूपण | ६३२ |
| ३४८-आपाकदानके प्रसंगमें राजा हव्यवाहनकी कथा | ५८५ | ३८१-रोहिणीचन्द्रशयन-व्रत | ६३८ |
| ३४९-गृहदान-विधि | ५८७ | ३८२-श्रीकृष्ण-युधिष्ठिर-संवादका उपसंहार और भगवान्का द्वारकागमन | ६३९ |
| ३५०-अन्नदानकी महिमाके प्रसंगमें राजा श्वेत और एक वैश्यकी कथा | ५८८ | ३८३-भविष्योत्तरपर्वकी संक्षिप्त अनुक्रमणिका | ६४० |
| ३५१-स्थालीदानकी महिमामें द्रौपदीके पूर्वजन्मकी |
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
संक्षिप्त भविष्यपुराण
ब्राह्मपर्व
व्यास-शिष्य महर्षि सुमन्तु एवं राजा शतानीकका संवाद, भविष्यपुराणकी महिमा एवं परम्परा, सृष्टि-वर्णन, चारों वेद, पुराण एवं चारों वर्णोंकी उत्पत्ति, चतुर्विध सृष्टि, काल-गणना, युगोंकी संख्या, उनके धर्म तथा संस्कार
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
‘बदरिकाश्रमनिवासी प्रसिद्ध ऋषि श्रीनारायण तथा श्रीनर (अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण तथा उनके नित्य-सखा नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन), उनकी लीला प्रकट करनेवाली भगवती सरस्वती और उनकी लीलाओंके वक्ता महर्षि वेदव्यासको नमस्कार कर जय*—आसुरी सम्पत्तियोंका नाश करके अन्तःकरणपर दैवी सम्पत्तियोंको विजय प्राप्त करनेवाले वाल्मीकीय रामायण, महाभारत एवं अन्य सभी इतिहास-पुराणादि सद्ग्रन्थोंका पाठ करना चाहिये।’
जयति पराशरसूनुः सत्यवतीहृदयनन्दनो व्यासः । यस्यास्यकमलगलितं वाङ्मयममृतं जगत् पिबति ॥
‘पराशरके पुत्र तथा सत्यवतीके हृदयको आनन्दित करनेवाले भगवान् व्यासकी जय हो, जिनके मुखकमलसे निःसृत अमृतमयी वाणीका यह सम्पूर्ण विश्व पान करता है।’
यो गोशतं कनकशृङ्गमयं ददाति विप्राय वेदविदुषे च बहुश्रुताय ।
पुण्यां भविष्यसुकथां शृणुयात् समग्रां
पुण्यं समं भवति तस्य च तस्य चैव ॥
‘वेदादि शास्त्रोंके जाननेवाले तथा अनेक विषयोंके मर्मज्ञ विद्वान् ब्राह्मणको स्वर्णजटित सींगोंवाली सैकड़ों गौओंको दान देनेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, ठीक उतना ही पुण्य इस भविष्यमहापुराणकी उत्तम कथाओंके श्रवण करनेसे प्राप्त होता है।’
एक समय व्यासजीके शिष्य महर्षि सुमन्तु तथा वसिष्ठ, पराशर, जैमिनि, याज्ञवल्क्य, गौतम, वैशम्पायन, शौनक, अङ्गिरा और भारद्वाजादि महर्षिगण पाण्डववंशमें समुत्पन्न महाबलशाली राजा शतानीककी सभामें गये। राजाने उन ऋषियोंका अर्घ्यादिसे विधिवत् स्वागत-सत्कार किया और उन्हें उत्तम आसनोपर बैठाया तथा भलीभाँति उनका पूजन कर विनयपूर्वक इस प्रकार प्रार्थना की—‘हे महात्माओ! आपलोगोंके आगमनसे मेरा जन्म सफल हो गया। आपलोगोंके स्मरणमात्रसे ही मनुष्य पवित्र हो जाता है, फिर आपलोग मुझे दर्शन देनेके लिये यहाँ पधारे हैं, अतः आज मैं धन्य हो गया। आपलोग कृपा करके मुझे उन
- ‘जय’ शब्दकी व्याख्या प्रायः कई पुराणोंमें आयी है। भविष्यपुराणके ब्राह्मपर्वके चौथे अध्याय (श्लोक ८६ से ८८)-में इसे विस्तारसे समझाया गया है, वहाँ देखना चाहिये।
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१२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
पवित्र एवं पुण्यमयी धर्मशास्त्रकी कथाओंको सुनायें, जिनके सुननेसे मुझे परमगतिकी प्राप्ति हो।'
ऋषियोंने कहा—हे राजन्! इस विषयमें आप हम सबके गुरु, साक्षात् नारायणस्वरूप भगवान् वेदव्याससे निवेदन करें। वे कृपालु हैं, सभी प्रकारके शास्त्रोंके और विद्याओंके ज्ञाता हैं। जिसके श्रवणमात्रसे मनुष्य सभी पातकोंसे मुक्त हो जाता है, उस 'महाभारत' ग्रन्थके रचयिता भी यही हैं।
राजा शतानीकने ऋषियोंके कथनानुसार सभी शास्त्रोंके जाननेवाले भगवान् वेदव्याससे प्रार्थनापूर्वक जिज्ञासा की—प्रभो! मुझे आप धर्ममयी पुण्य-कथाओंका श्रवण करायें, जिससे मैं पवित्र हो जाऊँ और इस संसार-सागरसे मेरा उद्धार हो जाय।
व्यासजीने कहा—'राजन्! यह मेरा शिष्य सुमन्तु महान् तेजस्वी एवं समस्त शास्त्रोंका ज्ञाता है, यह आपकी जिज्ञासाको पूर्ण करेगा।' मुनियोंने भी इस बातका अनुमोदन किया। तदनन्तर राजा शतानीकने महामुनि सुमन्तुसे उपदेश करनेके लिये प्रार्थना की—हे द्विजश्रेष्ठ! आप कृपाकर उन पुण्यमयी कथाओंका वर्णन करें, जिनके सुननेसे सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और शुभ फलोंकी प्राप्ति होती है।
महामुनि सुमन्तु बोले—राजन्! धर्मशास्त्र सबको पवित्र करनेवाले हैं। उनके सुननेसे मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। बताओ, तुम्हारी क्या सुननेकी इच्छा है?
राजा शतानीकने कहा—ब्राह्मणदेव! वे कौनसे धर्मशास्त्र हैं, जिनके सुननेसे मनुष्य पापोंसे मुक्त हो जाता है।
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! मनु, विष्णु, यम,
अङ्गिरा, वसिष्ठ, दक्ष, संवर्त, शातातप, पराशर, आपस्तम्ब, उशना, काल्यायन, बृहस्पति, गौतम, शङ्खु, लिखित, हारीत तथा अत्रि आदि ऋषियोंद्वारा रचित मन्वादि बहुत-से धर्मशास्त्र हैं। इन धर्मशास्त्रोंको सुनकर एवं उनके रहस्योंको भलीभाँति हृदयङ्गमकर मनुष्य देवलोकमें जाकर परम आनन्दको प्राप्त करता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।
शतानीकने कहा—प्रभो! जिन धर्मशास्त्रोंको आपने कहा है, इन्हें मैंने सुना है। अब इन्हें पुनः सुननेकी इच्छा नहीं है। कृपाकर आप चारों वर्णोंके कल्याणके लिये जो उपयुक्त धर्मशास्त्र हो उसे मुझे बतायें।
सुमन्तु मुनि बोले—हे महाबाहो! संसारमें निमग्न प्राणियोंके उद्धारके लिये अठारह महापुराण, श्रीरामकथा तथा महाभारत आदि सद्ग्रन्थ नौकारूपी साधन हैं। अठारह महापुराणों तथा आठ प्रकारके व्याकरणोंको भलीभाँति समझकर सत्यवतीके पुत्र वेदव्यासजीने 'महाभारतसंहिता' की रचना की, जिसके सुननेसे मनुष्य ब्रह्महत्याके पापोंसे मुक्त हो जाता है। इनमें आठ प्रकारके व्याकरण ये हैं—ब्राह्म, ऐन्द्र, याम्य, रौद्र, वायव्य, वारुण, सावित्र्य तथा वैष्णव। ब्रह्म, पद्म, विष्णु, शिव, भागवत, नारदीय, मार्कण्डेय, अग्नि, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, लिङ्ग, वाराह, स्कन्द, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड तथा ब्रह्माण्ड—ये अठारह महापुराण हैं। ये सभी-चारों वर्णोंके लिये उपकारक हैं। इनमेंसे आप क्या सुनना चाहते हैं?
राजा शतानीकने कहा—हे विप्र! मैंने महाभारत सुना है तथा श्रीरामकथा भी सुनी है, अन्य पुराणोंको भी सुना है, किंतु भविष्यपुराण नहीं सुना है। अतः विप्रश्रेष्ठ! आप भविष्यपुराणको मुझे सुनायें, इस विषयमें मुझे महत् कौतूहल है।
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- ब्राह्मपर्व *
१३
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! आपने बहुत उत्तम बात पूछी है। मैं आपको भविष्यपुराणकी कथा सुनाता हूँ, जिसके श्रवण करनेसे ब्रह्महत्या आदि बड़े-बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं और अश्वमेधादि यज्ञोंका पुण्यफल प्राप्त होता है तथा अन्तमें सूर्यलोककी प्राप्ति होती है, इसमें कोई संदेह नहीं। यह उत्तम पुराण पहले ब्रह्माजीद्वारा कहा गया है। विद्वान् ब्राह्मणको इसका सम्यक् अध्ययन कर अपने शिष्यों तथा चारों वर्णोंके लिये उपदेश करना चाहिये। इस पुराणमें श्रौत एवं स्मार्त सभी धर्मोंका वर्णन हुआ है। यह पुराण परम मङ्गलप्रद, सदुबुद्धिको बढ़ानेवाला, यश एवं कीर्ति प्रदान करनेवाला तथा परमपद—मोक्ष प्राप्त करानेवाला है—
इदं स्वस्त्ययनं श्रेष्ठमिदं बुद्धिविवर्धनम्।
इदं यशस्यं सततमिदं निःश्रेयसं परम्॥
(ब्राह्मपर्व १।७९)
इस भविष्यपुराणमें सभी धर्मोंका संनिवेश हुआ है तथा सभी कर्मोंके गुणों और दोषोंके फलोंका निरूपण किया गया है। चारों वर्णों तथा आश्रमोंके सदाचारका भी वर्णन किया गया है, क्योंकि 'सदाचार ही श्रेष्ठ धर्म है' ऐसा श्रुतियोंने कहा है, इसलिये ब्राह्मणको नित्य आचारका पालन करना चाहिये, क्योंकि सदाचारसे विहीन ब्राह्मण किसी भी प्रकार वेदके फलको प्राप्त नहीं कर सकता। सदा आचारका पालन करनेपर तो वह सम्पूर्ण फलोंका अधिकारी हो जाता है, ऐसा कहा गया है। सदाचारको ही मुनियोंने धर्म तथा
तपस्याओंका मूल आधार माना है, मनुष्य भी इसीका आश्रय लेकर धर्माचरण करते हैं। इस प्रकार इस भविष्यमहापुराणमें आचारका वर्णन किया गया है१। तीनों लोकोंकी उत्पत्ति, विवाहदि संस्कार-विधि, स्त्री-पुरुषोंके लक्षण, देवपूजाका विधान, राजाओंके धर्म एवं कर्तव्यका निर्णय, सूर्यनारायण, विष्णु, रुद्र, दुर्गा तथा सत्यनारायणका माहात्म्य एवं पूजा-विधान, विविध तीर्थोंका वर्णन, आपद्वर्म तथा प्रायश्चित्त-विधि, संध्याविधि, स्नान, तर्पण, वैश्वदेव, भोजनविधि, जातिधर्म, कुलधर्म, वेदधर्म तथा यज्ञ-मण्डलमें अनुष्ठित होनेवाले विविध यज्ञोंका वर्णन हुआ है।
हे कुरुश्रेष्ठ शतानीक! इस महापुराणको ब्रह्माजीने शंकरको, शंकरने विष्णुको, विष्णुने नारदको, नारदने इन्द्रको, इन्द्रने पराशरको तथा पराशरने व्यासको सुनाया और व्याससे मैंने प्राप्त किया। इस प्रकार परम्परा-प्राप्त इस उत्तम भविष्यमहापुराणको मैं आपसे कहता हूँ, इसे सुनें।
इस भविष्यमहापुराणकी श्लोक-संख्या पचास हजार है२। इसे भक्तिपूर्वक सुननेवाला ऋद्धि, वृद्धि तथा सम्पूर्ण सम्पत्तियोंको प्राप्त करता है। ब्रह्माजीद्वारा प्रोक्त इस महापुराणमें पाँच पर्व कहे गये हैं—(१) ब्राह्म, (२) वैष्णव, (३) शैव, (४) त्वाष्ट्र तथा (५) प्रतिसर्गपर्व। पुराणके सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर तथा वंशानुचरित—ये पाँच लक्षण बताये गये हैं तथा इसमें चौदह विद्याओंका भी वर्णन है३। चौदह विद्याएँ इस प्रकार हैं—चार
१-आचारः प्रथमो धर्मः श्रुत्युक्तश्च नरोत्तम । तस्मादस्मिन् समायुको नित्यं स्यादात्मवान् द्विजः ॥
आचारद्विज्युतो विप्रो न वेदफलमश्रुते । आचारेण च संयुक्तः सम्पूर्णफलभाक् स्मृतः ॥
एवमाचारतो दृष्ट्वा धर्मस्य मुनयो गतिम् । सर्वस्य तपसो मूलमाचारं जगृहः परम् ॥
अन्ये च मानवा राजत्राचारं संश्रिताः सदा । एवमस्मिन् पुराणे तु आचारस्य तु कीर्तनम् ॥ (ब्राह्मपर्व १।८१-८४)
२-वर्तमान समयमें भविष्यपुराणका जो संस्करण उपलब्ध है, उसमें ब्राह्म, मध्यम, प्रतिसर्ग तथा उत्तर नामक चार सर्ग मिलते हैं और श्लोक-संख्या भी पचास हजारके स्थानपर लगभग अट्ठाईस हजार है। इसमें भी कुछ अंश प्रक्षिप्त माने जाते हैं।
३-सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च ॥
वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् । चतुर्दशभिर्विद्याभिर्भूषितं
कुरुनन्दन ॥ (ब्राह्मपर्व २।४-५)
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१४
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
वेद (ऋक्, यजुः, साम, अथर्व), छः वेदाङ्ग (शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छन्द, ज्योतिष), मीमांसा, न्याय, पुराण तथा धर्मशास्त्र। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद तथा अर्थशास्त्र—इन चारोंको मिलानेसे अठारह विद्याएँ होती हैं।
सुमन्तु मुनि पुनः बोले— हे राजन्! अब मैं भूतसर्ग अर्थात् समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिका वर्णन करता हूँ, जिसके सुननेसे सभी पापोंकी निवृत्ति हो जाती है और मनुष्य परम शान्तिको प्राप्त करता है।
हे तात! पूर्वकालमें यह सारा संसार अन्धकारसे व्याप्त था, कोई पदार्थ दृष्टिगत नहीं होता था, अविज्ञेय था, अतर्क्य था और प्रसुप्त-सा था। उस समय सूक्ष्म अतीन्द्रिय और सर्वभूतमय उन परब्रह्म परमात्मा भगवान् भास्करने अपने शरीरसे नानाविध सृष्टि करनेकी इच्छा की और सर्वप्रथम परमात्माने जलको उत्पन्न किया तथा उसमें अपने वीर्यरूप शक्तिका आधान किया। इससे देवता, असुर, मनुष्य आदि सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ। वह वीर्य जलमें गिरनेसे अत्यन्त प्रकाशमान सुवर्णका अण्ड हो गया। उस अण्डके मध्यसे सृष्टिकर्ता चतुर्मुख लोकपितामह ब्रह्माजी उत्पन्न हुए।
नर (भगवान्)-से जलकी उत्पत्ति हुई है, इसलिये जलको नार कहते हैं। वह नार जिसका पहले अयन (स्थान) हुआ, उसे नारायण कहते हैं। ये सदसदूप, अव्यक्त एवं नित्यकारण हैं, इनसे जिस पुरुष-विशेषकी सृष्टि हुई, वे लोकमें ब्रह्माके नामसे प्रसिद्ध हुए। ब्रह्माजीने दीर्घकालतक तपस्या की और उस अण्डके दो भाग कर दिये। एक भागसे भूमि और दूसरेसे आकाशकी रचना की, मध्यमें स्वर्ग, आठों दिशाओं तथा वरुणका
निवास-स्थान अर्थात् समुद्र बनाया। फिर महदादि तत्त्वोंकी तथा सभी प्राणियोंकी रचना की।
परमात्माने सर्वप्रथम आकाशको उत्पन्न किया और फिर क्रमसे वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—इन तत्त्वोंकी रचना की। सृष्टिके आदिमें ही ब्रह्माजीने उन सबके नाम और कर्म वेदोंके निर्देशानुसार ही नियत कर उनकी अलग-अलग संस्थाएँ बना दीं। देवताओंके तुषित आदि गण, ज्योतिष्टोमादि सनातन यज्ञ, ग्रह, नक्षत्र, नदी, समुद्र, पर्वत, सम एवं विषम भूमि आदि उत्पन्न कर कालके विभागों (संवत्सर, दिन, मास आदि) और ऋतुओं आदिकी रचना की। काम, क्रोध आदिकी रचना कर विविध कर्मोंके सदसद्विवेकके लिये धर्म और अधर्मकी रचना की और नानाविध प्राणजगत्की सृष्टि कर उनको सुख-दुःख, हर्ष-शोक आदि द्वन्द्वोंसे संयुक्त किया। जो कर्म जिसने किया था तदनुसार उनकी (इन्द्र, चन्द्र, सूर्य आदि) पदोंपर नियुक्ति हुई। हिंसा, अहिंसा, मृदु, क्रूर, धर्म, अधर्म, सत्य, असत्य आदि जीवोंका जैसा स्वभाव था, वह वैसे ही उनमें प्रविष्ट हुआ, जैसे विभिन्न ऋतुओंमें वृक्षोंमें पुष्प, फल आदि उत्पन्न होते हैं।
इस लोककी अभिवृद्धिके लिये ब्रह्माजीने अपने मुखसे ब्राह्मण, बाहुओंसे क्षत्रिय, ऊरु अर्थात् जंघासे वैश्य और चरणोंसे शूद्रोंको उत्पन्न किया। ब्रह्माजीके चारों मुखोंसे चार वेद उत्पन्न हुए। पूर्व-मुखसे ऋग्वेद प्रकट हुआ, उसे वसिष्ठ-मुनिने ग्रहण किया। दक्षिण-मुखसे यजुर्वेद उत्पन्न हुआ, उसे महर्षि याज्ञवल्क्यने ग्रहण किया। पश्चिम-मुखसे सामवेद निःसृत हुआ, उसे गौतम-ऋषिने धारण किया और उत्तर-मुखसे अथर्ववेद प्रादुर्भूत हुआ, जिसे लोकपूजित महर्षि शौनकने ग्रहण किया। ब्रह्माजीके लोकप्रसिद्ध पञ्चम (ऊर्ध्व)
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- ब्राह्मपर्व *
१५
मुखसे अठारह पुराण, इतिहास और यमादि स्मृति-शास्त्र उत्पन्न हुए१।
इसके बाद ब्रह्माजीने अपने देहके दो भाग किये। दाहिने भागको पुरुष तथा बायें भागको स्त्री बनाया और उसमें विराट् पुरुषकी सृष्टि की। उस विराट् पुरुषने नाना प्रकारकी सृष्टि रचनेकी इच्छासे बहुत कालतक तपस्या की और सर्वप्रथम दस ऋषियोंको उत्पन्न किया, जो प्रजापति कहलाये। उनके नाम इस प्रकार हैं—(१) नारद, (२) भृगु, (३) वसिष्ठ, (४) प्रचेता, (५) पुलह, (६) ऋतु, (७) पुलस्त्य, (८) अत्रि, (९) अङ्गिरा और (१०) मरीचि। इसी प्रकार अन्य महातेजस्वी ऋषि भी उत्पन्न हुए। अनन्तर देवता, ऋषि, दैत्य और राक्षस, पिशाच, गन्धर्व, अस्सरा, पितर, मनुष्य, नाग, सर्प आदि योनियोंके अनेक गण उत्पन्न किये और उनके रहनेके स्थानोंको बनाया। विद्युत्, मेघ, वज्र, इन्द्रधनुष, धूमकेतु (पुच्छल तारे), उल्का, निर्धात (बादलोंकी गड़गड़ाहट) और छोटे-बड़े नक्षत्रोंको उत्पन्न किया। मनुष्य, किंनर, अनेक प्रकारके मत्स्य, वराह, पक्षी, हाथी, घोड़े, पशु, मृग, कृमि, कीट, पतंग आदि छोटे-बड़े जीवोंको उत्पन्न किया। इस प्रकार उन भास्करदेवने त्रिलोकीकी रचना की।
हे राजन्! इस सृष्टिकी रचना कर सृष्टिमें जिन-जिन जीवोंका जो-जो कर्म और क्रम कहा गया है, उसका मैं वर्णन करता हूँ, आप सुनें।
हाथी, व्याल, मृग और विविध पशु, पिशाच, मनुष्य तथा राक्षस आदि जरायुज (गर्भसे उत्पन्न होनेवाले) प्राणी हैं। मत्स्य, कछुवे, सर्प, मगर
तथा अनेक प्रकारके पक्षी अण्डज (अण्डेसे उत्पन्न होनेवाले) हैं। मक्खी, मच्छर, जूँ, खटमल आदि जीव स्वेदज हैं अर्थात् पसीनेकी उष्मासे उत्पन्न होते हैं। भूमिको उद्भेदकर उत्पन्न होनेवाले वृक्ष, ओषधियाँ आदि उद्भिज्ज सृष्टि हैं। जो फलके पकनेतक रहें और पीछे सूख जायें या नष्ट हो जायें तथा बहुत फूल और फलवाले वृक्ष हैं वे ओषधि कहलाते हैं और जो पुष्पके आये बिना ही फलते हैं, वे वनस्पति हैं तथा जो फूलते और फलते हैं उन्हें वृक्ष कहते हैं। इसी प्रकार गुल्म, वल्ली, वितान आदि भी अनेक भेद होते हैं। ये सब बीजसे अथवा काण्डसे अर्थात् वृक्षकी छोटी-सी शाखा काटकर भूमिमें गाड़ देनेसे उत्पन्न होते हैं। ये वृक्ष आदि भी चेतना-शक्तिसम्पन्न हैं और इन्हें सुख-दुःखका ज्ञान रहता है, परंतु पूर्वजन्मके कर्मोंके कारण तमोगुणसे आच्छन्न रहते हैं, इसी कारण मनुष्योंकी भाँति बातचीत आदि करनेमें समर्थ नहीं हो पाते२।
इस प्रकार यह अचिन्त्य चराचर-जगत् भगवान् भास्करसे उत्पन्न हुआ है। जब वह परमात्मा निद्राका आश्रय ग्रहण कर शयन करता है, तब यह संसार उसमें लीन हो जाता है और जब निद्राका त्याग करता है अर्थात् जागता है, तब सब सृष्टि उत्पन्न होती है और समस्त जीव पूर्वकर्मानुसार अपने-अपने कर्मोंमें प्रवृत्त हो जाते हैं। वह अव्यय परमात्मा सम्पूर्ण चराचर संसारको जाग्रत् और शयन दोनों अवस्थाओंद्वारा बार-बार उत्पन्न और विनष्ट करता रहता है।
परमेश्वर कल्पके प्रारम्भमें सृष्टि और कल्पके
१-यतन्मुखं महाबाहो पञ्चमं लोकविश्रुतम्। अष्टादश पुराणानि सेतिहासानि भारत ॥
निर्गतानि तत्तत्समानुखात् कुरुकुलोद्भव ॥ तथाभ्याः स्मृतयश्चापि यमाद्या लोकपूजिताः ॥ (ब्राह्मपर्व २। ५६-५७)
२-ओषधः फलपाकान्ता नानाविधफलोपगाः। अपुष्पा फलवन्तो ये ते वनस्पतयः स्मृताः ॥
पुष्पिणः फलिनश्चैव वृक्षास्तुभयतः स्मृताः।
तमसा बहुरूपेण वैष्टिताः कर्महेतुना ॥
अन्तःसंज्ञा भवन्त्येते सुखदुःखसमन्विताः। (ब्राह्मपर्व २। ७३-७६)
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१६
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
अन्तमें प्रलय करते हैं। कल्प परमेश्वरका दिन है। इस कारण परमेश्वरके दिनमें सृष्टि और रात्रिमें प्रलय होता है। हे राजा शतानीक! अब आप काल-गणनाको सुनें—
अठारह निमेष (पलक गिरनेके समयको निमेष कहते हैं)-की एक काष्ठा होती है अर्थात् जितने समयमें अठारह बार पलकोंका गिरना हो, उतने कालको काष्ठा कहते हैं। तीस काष्ठाकी एक कला, तीस कलाका एक क्षण, बारह क्षणका एक मुहूर्त, तीस मुहूर्तका एक दिन-रात, तीस दिन-रातका एक महीना, दो महीनोंकी एक ऋतु, तीन ऋतुका एक अयन तथा दो अयनोंका एक वर्ष होता है। इस प्रकार सूर्यभगवान्के द्वारा दिन-रात्रिका काल-विभाग होता है। सम्पूर्ण जीव रात्रिको विश्राम करते हैं और दिनमें अपने-अपने कर्ममें प्रवृत्त होते हैं।
पितरोंका दिन-रात मनुष्योंके एक महीनेके बराबर होता है अर्थात् शुक्ल पक्षमें पितरोंकी रात्रि और कृष्ण पक्षमें दिन होता है। देवताओंका एक अहोरात्र (दिन-रात) मनुष्योंके एक वर्षके बराबर होता है अर्थात् उत्तरायण दिन तथा दक्षिणायन रात्रि कही जाती है। हे राजन्! अब आप ब्रह्माजीके रात-दिन और एक-एक युगके प्रमाणको सुनें— सत्ययुग चार हजार वर्षका है, उसके संध्यांशके चार सौ वर्ष तथा संध्याके चार सौ वर्ष मिलाकर
इस प्रकार चार हजार आठ सौ दिव्य वर्षोंका एक सत्ययुग होता है*। इसी प्रकार त्रेतायुग तीन हजार वर्षोंका तथा संध्या और संध्यांशके छः सौ वर्ष कुल तीन हजार छः सौ वर्ष, द्वापर दो हजार वर्षोंका संध्या तथा संध्यांशके चार सौ वर्ष कुल दो हजार चार सौ वर्ष तथा कलियुग एक हजार वर्ष तथा संध्या और संध्यांशके दो सौ वर्ष मिलाकर बारह सौ वर्षोंके मानका होता है। ये सब दिव्य वर्ष मिलाकर बारह हजार दिव्य वर्ष होते हैं। यही देवताओंका एक युग कहलाता है।
देवताओंके हजार युग होनेसे ब्रह्माजीका एक दिन होता है और यही प्रमाण उनकी रात्रिका है। जब ब्रह्माजी अपनी रात्रिके अन्तमें सोकर उठते हैं तब सत्-असत्-रूप मनको उत्पन्न करते हैं। वह मन सृष्टि करनेकी इच्छासे विकारको प्राप्त होता है, तब उससे प्रथम आकाशतत्त्व उत्पन्न होता है। आकाशका गुण शब्द कहा गया है। विकारयुक्त आकाशसे सब प्रकारके गन्धको वहन करनेवाले पवित्र वायुकी उत्पत्ति होती है, जिसका गुण स्पर्श है। इसी प्रकार विकारवान् वायुसे अन्धकारका नाश करनेवाला प्रकाशयुक्त तेज उत्पन्न होता है, जिसका गुण रूप है। विकारवान् तेजसे जल, जिसका गुण रस है और जलसे गन्धगुणवाली पृथ्वी उत्पन्न होती है। इसी प्रकार सृष्टिका क्रम चलता रहता है।
- एक संक्रान्तिसे दूसरी सूर्य-संक्रान्तिकके समयको सौर मास कहते हैं। बारह सौर मासोंका एक सौर वर्ष होता है और मनुष्य-मानका यही एक सौर वर्ष देवताओंका एक अहोरात्र होता है। ऐसे ही तीस अहोरात्रोंका एक मास और बारह मासोंका एक दिव्य वर्ष होता है।
| दोनों संध्याओंसहित युगोंका मान | दिव्य वर्षोंमें | सौर वर्षोंमें |
|---|---|---|
| १-सत्ययुगका मान | ४,८०० | १७,२८,००० |
| २-त्रेतायुगका मान | ३,६०० | १२,९६,००० |
| ३-द्वापरयुगका मान | २,४०० | ८,६४,००० |
| ४-कलियुगका मान | १,२०० | ४,३२,००० |
महायुग या एक चतुर्थी— | १२,००० | ४३,२०,००० वर्ष
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- ब्राह्मपर्व *
१७
पूर्वमें बारह हजार दिव्य वर्षोंका जो एक दिव्य युग बताया गया है, वैसे ही एकहत्तर युग होनेसे एक मन्वन्तर होता है। ब्रह्माजीके एक दिनमें चौदह मन्वन्तर व्यतीत होते हैं।
सत्ययुगमें धर्मके चारों पाद वर्तमान रहते हैं अर्थात् सत्ययुगमें धर्म चारों चरणोंसे (अर्थात् सर्वाङ्गपूर्ण) रहता है। फिर त्रेता आदि युगोंमें धर्मका बल घटनेसे धर्म क्रमसे एक-एक चरण घटता जाता है, अर्थात् त्रेतामें धर्मके तीन चरण, द्वापरमें दो चरण तथा कलियुगमें धर्मका एक ही चरण बचा रहता है और तीन चरण अधर्मके रहते हैं। सत्ययुगके मनुष्य धर्मात्मा, नीरोग, सत्यवादी होते हुए चार सौ वर्षोंतक जीवन धारण करते हैं। फिर त्रेता आदि युगोंमें इन सभी वर्षोंका एक चतुर्थांश न्यून हो जाता है, यथा त्रेताके मनुष्य तीन सौ वर्ष, द्वापरके दो सौ वर्ष तथा कलियुगके एक सौ वर्षतक जीवन धारण करते हैं। इन चारों युगोंके धर्म भी भिन्न-भिन्न होते हैं। सत्ययुगमें तपस्या, त्रेतामें ज्ञान, द्वापरमें यज्ञ और कलियुगमें दान प्रधान धर्म माना गया है।
परम द्युतिमान् परमेश्वरने सृष्टिकी रक्षाके लिये अपने मुख, भुजा, ऊरु और चरणोंसे क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र—इन चार वर्णोंको उत्पन्न किया और उनके लिये अलग-अलग कर्मोंकी कल्पना की। ब्राह्मणोंके लिये पढ़ना-पढ़ाना, यज्ञ करना यज्ञ कराना तथा दान देना और दान लेना—ये छः कर्म निश्चित किये गये हैं। पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना तथा प्रजाओंका पालन आदि कर्म क्षत्रियोंके लिये नियत किये गये हैं। पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना, पशुओंकी रक्षा करना, खेती-व्यापारसे धनार्जन करना—ये काम वैश्योंके लिये निर्धारित किये गये और इन तीनों वर्णोंकी सेवा करना—यह एक मुख्य कर्म शूद्रोंका नियत किया गया है।
पुरुषकी देहमें नाभिसे ऊपरका भाग अत्यन्त पवित्र माना गया है। उसमें भी मुख प्रधान है। ब्राह्मण ब्रह्माके मुख (उत्तमाङ्ग)—से उत्पन्न हुआ है, इसलिये ब्राह्मण सबसे उत्तम हैं, यह वेदकी वाणी है। ब्रह्माजीने बहुत कालतक तपस्या करके सबसे पहले देवता और पितरोंको हव्य तथा कव्य पहुँचानेके लिये और सम्पूर्ण संसारकी रक्षा करने-हेतु ब्राह्मणको उत्पन्न किया। शिरोभागसे उत्पन्न होने और वेदको धारण करनेके कारण सम्पूर्ण संसारका स्वामी धर्मतः ब्राह्मण ही है। सब भूतों (स्थावर-जङ्गमरूप पदार्थों)—में प्राणी (कीट आदि) श्रेष्ठ हैं, प्राणियोंमें बुद्धिसे व्यवहार करनेवाले पशु आदि श्रेष्ठ हैं। बुद्धि रखनेवाले जीवोंमें मनुष्य श्रेष्ठ हैं और मनुष्योंमें ब्राह्मण, ब्राह्मणोंमें विद्वान्, विद्वानोंमें कृतबुद्धि और कृतबुद्धियोंमें कर्म करनेवाले तथा इनसे ब्रह्मवेत्ता—ब्रह्मज्ञानी श्रेष्ठ हैं। ब्राह्मणका जन्म धर्म-सम्पादन करनेके लिये है और धर्माचरणसे ब्राह्मण ब्रह्मत्त्व तथा ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है।
राजा शतानीकने पूछा—हे महामुने! ब्रह्मलोक और ब्रह्मत्त्व अति दुर्लभ हैं, फिर ब्राह्मणमें कौनसे ऐसे गुण होते हैं, जिनके कारण वह इन्हें प्राप्त करता है। कृपाकर आप इसका वर्णन करें।
सुमन्तु मुनि बोले—हे राजन्! आपने बहुत ही उत्तम बात पूछी है, मैं आपको वे बातें बताता हूँ, उन्हें ध्यानपूर्वक सुनें।
जिस ब्राह्मणके वेदादि शास्त्रोंमें निर्दिष्ट गर्भाधान, पुंसवन आदि अङ्गतालीस संस्कार विधिपूर्वक हुए हों, वही ब्राह्मण ब्रह्मलोक और ब्रह्मत्त्वको प्राप्त करता है। संस्कार ही ब्रह्मत्त्व-प्राप्तिका मुख्य कारण है, इसमें कोई संदेह नहीं।
राजा शतानीकने पूछा—महात्मन्! वे संस्कार कौनसे हैं, इस विषयमें मुझे महान् कौतूहल हो रहा है। कृपाकर आप इन्हें बतायें।
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१८ * संक्षिप्त भविष्यपुराण *
सुमन्तुजी बोले- राजन्! वेदादि शास्त्रोंमें जिन संस्कारोंका निर्देश हुआ है, उनका मैं वर्णन करता हूँ— गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, चूडाकर्म, उपनयन, चार प्रकारके वेदव्रत, वेदस्नान, विवाह, पञ्चमहायज्ञ (जिनसे देवता, पितरों, मनुष्य, भूत और ब्रह्मकी तृप्ति होती है), सप्तपाकयज्ञ-संस्था—अष्टकाद्वय, पार्वण, श्रावणी, आग्रहायणी, चैत्री (शूलगव) तथा आश्वयुजी, सप्तहविर्यज्ञ-संस्था—अग्न्याधान, अग्निहोत्र, दर्श-पौर्णमास, चातुर्मास्य, निरूढ-पशुबन्ध, सौत्रामणी और सप्तसोम-संस्था—अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम—ये चालीस ब्राह्मणके संस्कार हैं। इनके साथ ही ब्राह्मणमें आठ आत्मगुण भी अवश्य होने चाहिये, जिससे ब्रह्मकी प्राप्ति होती है। ये आठ गुण इस प्रकार हैं—
अनसूया दया क्षान्तिरनायासं च मङ्गलम्।
अकार्पण्यं तथा शौचमस्पृहा च कुरुद्वह॥
(ब्राह्मपर्व २।१५५)
'अनसूया (दूसरोंके गुणोंमें दोष-बुद्धि नहीं रखना), दया, क्षमा, अनायास (किसी सामान्य बातके पीछे जानकी बाजी न लगाना), मङ्गल (माङ्गलिक वस्तुओंका धारण), अकार्पण्य (दीन वचन नहीं बोलना और अत्यन्त कृपण न बनना), शौच (बाह्याभ्यन्तरकी शुद्धि) और अस्पृहा—ये आठ आत्मगुण हैं।' इनकी पूरी परिभाषा इस प्रकार है—
गुणीके गुणोंको न छिपाना अर्थात् प्रकट करना, अपने गुणोंको प्रकट न करना तथा दूसरेके दोषोंको देखकर प्रसन्न न होना अनसूया है। अपने-परायेमें, मित्र और शत्रुमें अपने समान व्यवहार करना और दूसरेका दुःख दूर करनेकी इच्छा रखना दया है। मन, वचन अथवा शरीरसे कोई दुःख भी पहुँचाये तो उसपर क्रोध और वैर न करना क्षान्ति है। अभक्ष्य वस्तुका भक्षण न करना, निन्दित पुरुषोंका सङ्ग न करना और सदाचरणमें स्थित रहना शौच कहा जाता है। जिन शुभ कर्मोंके करनेसे शरीरको कष्ट होता है, उस कर्मको हठात् नहीं करना चाहिये, यह अनायास है। नित्य अच्छे कार्योंको करना और बुरे कर्मोंका परित्याग करना—यह मङ्गल-गुण कहलाता है। बड़े कष्ट एवं परिश्रमसे न्यायोपार्जित धनसे उदारतापूर्वक थोड़ा-बहुत नित्य दान करना अकार्पण्य है। ईश्वरकी कृपासे प्राप्त थोड़ी-सी सम्पत्तिमें भी संतुष्ट रहना और दूसरेके धनकी किंचित् भी इच्छा न रखना अस्पृहा है*। इन आठ गुणों और पूर्वोक्त संस्कारोंसे जो ब्राह्मण संस्कृत हो वह ब्रह्मलोक तथा ब्रह्मत्वको प्राप्त करता है। जिसकी गर्भ-शुद्धि हो, सब संस्कार विधिवत् सम्पन्न हुए हों और वह वर्णाश्रम-धर्मका पालन करता हो तो उसे अवश्य मुक्ति प्राप्त होती है। (अध्याय १-२)
* न गुणान् गुणिनो हन्ति न स्तौत्यात्मगुणानपि। प्रहृष्यते नान्यदोषैरनसूया प्रकीर्तिता॥
अपरे बन्धुवर्गे वा मित्रे द्वेष्टरि वा सदा। आत्मवद्वर्तनं यत् स्यात् सा दया परिकीर्तिता॥
वाचा मनसि काये च दुःखेनोत्पादितेन च। न कुप्यति न चाप्रीतिः सा क्षमा परिकीर्तिता॥
अभक्ष्यपरिहारश्च संसर्गश्चाप्यनिन्दितैः। आचारे च व्यवस्थानं शौचमेतत् प्रकीर्तितम्॥
शरीरं पीड्यते येन शुभेनापि च कर्मणा। अत्यन्तं तन्न कुर्वीत अनायासः स उच्यते॥
प्रशस्ताचरणं नित्यमप्रशस्तविवर्जनम्। एतद्धि मङ्गलं प्रोक्तं मुनिभिर्ब्रह्मवादिभिः॥
स्तोकादपि प्रदातव्यमदीनेनान्तरात्मना। अहन्यहनि यत्किंचिदकार्पण्यं तदुच्यते॥
यथोत्पन्नेन संतुष्टः स्वल्पेनाप्यथ वस्तुना। अहिंसया परस्वेषु साऽस्पृहा परिकीर्तिता॥ (ब्राह्मपर्व २।१५७-१६४)
- ब्राह्मपर्व *
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गर्भाधानसे यज्ञोपवीतपर्यन्त संस्कारोंकी संक्षिप्त विधि, अन्नप्रशंसा तथा भोजन-विधिके प्रसंगमें धनवर्धनकी कथा, हाथोंके तीर्थ एवं आचमन-विधि
राजा शतानीकने कहा—हे मुने! आपने मुझे जातकर्मादि संस्कारोंके विषयमें बताया, अब आप इन संस्कारोंके लक्षण तथा चारों वर्ण एवं आश्रमके धर्म बतलानेकी कृपा करें।
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, अन्नप्राशन, चूडाकर्म तथा यज्ञोपवीत आदि संस्कारोंके करनेसे द्विजातियोंके बीज-सम्बन्धी तथा गर्भ-सम्बन्धी सभी दोष निवृत्त हो जाते हैं। वेदाध्ययन, व्रत, होम, त्रैविद्य व्रत, देवर्षि-पितृ-तर्पण, पुत्रोत्पादन, पञ्च महायज्ञ और ज्योतिष्टोमादि यज्ञोंके द्वारा यह शरीर ब्रह्म-प्राप्तिके योग्य हो जाता है। अब इन संस्कारोंकी विधिको आप संक्षेपमें सुनें—
पुरुषका जातकर्म-संस्कार नालच्छेदनसे पहिले किया जाता है। इसमें वेदमन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक बालकको सुवर्ण, मधु और घृतका प्राशन कराया जाता है। दसवें दिन, बारहवें दिन, अठारहवें दिन अथवा एक मास पूरा होनेपर शुभ तिथि-मुहूर्त और शुभ नक्षत्रमें नामकरण-संस्कार किया जाता है। ब्राह्मणका नाम मङ्गलवाचक रखना चाहिये, जैसे शिवशर्मा। क्षत्रियका बलवाचक जैसे इन्द्रवर्मा। वैश्यका धनयुक्त जैसे धनवर्धन और शूद्रका भी यथाविधि देवदासादि नाम रखना चाहिये। स्त्रियोंका नाम ऐसा रखना चाहिये, जिसके बोलनेमें कष्ट न हो, क्रूर न हो, अर्थ स्पष्ट और अच्छा हो, जिसके सुननेसे मन प्रसन्न हो तथा मङ्गलसूचक एवं आशीर्वादयुक्त हो और जिसके अन्तमें आकार, ईकार आदि दीर्घ स्वर हों। जैसे यशोदादेवी आदि।
जन्मसे बारहवें दिन अथवा चतुर्थ मासमें बालकको घरसे बाहर निकालना चाहिये, इसे निष्क्रमण कहते हैं। छठे मासमें बालकका अन्नप्राशन-संस्कार करना चाहिये। पहले या तीसरे वर्षमें मुण्डन-संस्कार करना चाहिये। गर्भसे आठवें वर्षमें ब्राह्मणका, ग्यारहवें वर्षमें क्षत्रियका और बारहवें वर्षमें वैश्यका यज्ञोपवीत-संस्कार करना चाहिये। परंतु ब्रह्मतेजकी इच्छावाला ब्राह्मण पाँचवें वर्षमें, बलकी इच्छावाला क्षत्रिय छठे वर्षमें और धनकी कामनावाला वैश्य आठवें वर्षमें अपने-अपने बालकोंका उपनयन-संस्कार सम्पन्न करे। सोलह वर्षतक ब्राह्मण, बाईस वर्षतक क्षत्रिय और चौबीस वर्षतक वैश्य गायत्री (सावित्री)-के अधिकारी रहते हैं, इसके अनन्तर यथासमय संस्कार न होनेसे गायत्रीके अधिकारी नहीं रहते और वे 'ब्रात्य' कहलाते हैं। फिर जबतक ब्रात्यस्तोम नामक यज्ञसे उनकी शुद्धि नहीं की जाती, तबतक उनका शरीर गायत्री-दीक्षाके योग्य नहीं बनता। इन ब्रात्योंके साथ आपत्तिमें भी वेदादि शास्त्रोंका पठन-पाठन अथवा विवाह आदिका सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये।
त्रैवर्णिक ब्रह्मचारियोंको उत्तरीयके रूपमें क्रमशः कृष्ण (कस्तूरी)-मृगचर्म, रुरु नामक मृगका चर्म और बकरेका चर्म धारण करना चाहिये। इसी प्रकार क्रमशः सन (टाट), अलसी और भेड़के ऊनका वस्त्र धारण करना चाहिये। ब्राह्मण ब्रह्मचारीके लिये तीन लड़ीवाली सुन्दर चिकनी मूँजकी, क्षत्रियके लिये मूर्वा (मुरा)-की और वैश्यके लिये सनकी मेखला कही गयी है। मूँज आदिके प्राप्त न होनेपर क्रमशः कुशा, अशमन्तक और बल्वज नामक
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