भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- उत्तरपर्व *
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एवं अद्भुत प्रभावपूर्ण वृत्तान्तको जन्मान्तरसे सम्बन्धित जानकर इस प्रकार कहने लगे—‘राजन्! तुम्हारा पूर्वजन्म अत्यन्त भीषण व्याधके कुलमें हुआ था। एक तो तुम उस कुलमें पैदा हुए, फिर दिन-रात पापकर्ममें भी निरत रहते थे। तुम्हारा शरीर भी कठोर अङ्ग संधियुक्त तथा बेडौल था। तुम्हारी त्वचा दुर्गन्धयुक्त थी और नख बहुत बड़े हुए थे। उससे दुर्गन्ध निकलती थी और तुम बड़े कुरूप थे। उस जन्ममें न तो तुम्हारा कोई हितैषी मित्र था, न पुत्र और न भाई-बन्धु ही थे, न पिता-माता और बहिन ही थी। भूपाल! केवल तुम्हारी यह परम प्रियतमा पत्नी ही तुम्हारी अभीष्ट परमानुकूल संगिनी थी। एक बार कभी भयंकर अनावृष्टि हुई, जिसके कारण अकाल पड़ गया। उस समय भूखसे पीड़ित होकर तुम आहारकी खोजमें निकले, परंतु तुम्हें कुछ भी जंगली (कन्द-मूल) फल आदि कोई खाद्य वस्तु प्राप्त न हुई। इतनेमें ही तुम्हारी दृष्टि एक सरोवरपर पड़ी, जो कमलसमूहसे मण्डित था। उसमें बड़े-बड़े कमल खिले हुए थे। तब तुम उसमें प्रविष्ट होकर बहुसंख्यक कमल-पुष्पोंको लेकर वैदिश* नामक नगर (विदिशा नगरी) में चले गये। वहाँ तुमने उन कमल-पुष्पोंको बेचकर मूल्य-प्राप्तिके हेतु पूरे नगरमें चक्कर लगाया। सारा दिन बीत गया, पर उन कमल-पुष्पोंका कोई खरीददार न मिला। उस समय तुम भूखसे अत्यन्त व्याकुल और थकावटसे अतिशय क्लान्त होकर पत्नीसहित एक महलके प्राङ्गणमें बैठ गये। वहाँ रात्रिमें तुम्हें महान् मङ्गल शब्द सुनायी पड़ा। उसे सुनकर तुम पत्नीसहित उस स्थानपर गये, जहाँ वह मङ्गल शब्द हो रहा था। वहाँ मण्डपके मध्यभागमें भगवान् विष्णुकी पूजा हो रही थी। तुमने उसका अवलोकन किया। वहाँ अनङ्गवती नामकी वेश्या माघ मासकी विभूतिद्वादशी-व्रतकी समाप्ति कर अपने गुरुको भगवान् हृषीकेशका विधिवत् शृङ्गार कर स्वर्णमय
कल्पवृक्ष, श्रेष्ठ लवणाचल और समस्त उपकरणोंसहित शय्याका दान कर रही थी। इस प्रकार पूजा करती हुई अनङ्गवतीको देखकर तुम दोनोंके मनमें यह विचार जाग्रत् हुआ कि इन कमलपुष्पोंसे क्या लेना है। अच्छा तो यह होता कि इनसे भगवान् विष्णुका शृङ्गार किया जाता। नरेश्वर! उस समय तुम दोनों पति-पत्नीके मनमें ऐसी भक्ति उत्पन्न हुई और इसी अर्चाके प्रसङ्गमें तुम्हारे उन पुष्पोंसे भगवान् केशव और लवणाचलकी अर्चना सम्पन्न हुई तथा शेष पुष्प-समूहोंसे तुम दोनोंने शय्याको भी सब ओरसे सुसज्जित किया।
तुम्हारी इस क्रियासे अनङ्गवती बहुत प्रसन्न हुई। उस समय उसने तुम दोनोंको इसके बदले तीन सौ अशर्फियाँ देनेका आदेश दिया, पर तुम दोनोंने बड़ी दृढ़तासे उस धन-राशिको अस्वीकार कर दिया। भूपते! तब अनङ्गवतीने तुम्हें (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य) चार प्रकारका अन्न लाकर दिया और कहा—‘भोजन कीजिये’, किंतु तुम दोनोंने उसका भी परित्याग कर दिया और कहा—‘वरानने! हमलोग कल भोजन कर लेंगे। दृढ़व्रते! हम दोनों जन्मसे ही पापपरायण और कुकर्म करनेवाले हैं, पर इस समय तुम्हारे उपवासके प्रसङ्गसे हमें विशेष आनन्द प्राप्त हो रहा है।’ उसी प्रसङ्गमें तुम दोनोंको धर्मका लेशांश प्राप्त हुआ और तुम दोनोंने रातभर जागरण भी किया था। (दूसरे दिन) प्रातःकाल अनङ्गवतीने भक्तिपूर्वक अपने गुरुको लवणाचलसहित शय्या और अनेकों गाँव प्रदान किये। उसी प्रकार उसने अन्य बारह ब्राह्मणोंको भी सुवर्ण, वस्त्र, अलंकारादिसहित बारह गौएँ प्रदान कीं। तदनन्तर सुहृद, मित्र, दीन, अंधे और दरिद्रोंके साथ तुम लुब्धक-दम्पतिको भोजन कराया और विशेष आदर-सत्कारके साथ तुम्हें बिदा किया।
राजेन्द्र! वह सपत्नीक लुब्धक तुम्हीं थे, जो
- यह इतिहास-पुराणदिमें अति प्रसिद्ध विदिशा नामकी नदीके तटपर बसा मध्यप्रदेशके मध्यकालीन इतिहासका बेसनगर, आजकलका भेलसा नगर है। इसपर कनिंघमका ‘भेलसा टौप्स’ ग्रन्थ प्रसिद्ध है।
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
इस समय राजराजेश्वरके रूपमें उत्पन्न हुए हो। उस कमल-समूहसे भगवान् केशवका पूजन होनेके कारण तुम्हारे सारे पाप नष्ट हो गये तथा दृढ़ त्याग, तप एवं निर्लोभिताके कारण तुम्हें इस कमलमन्दिरकी भी प्राप्ति हुई है। राजन्! तुम्हारी उसी सात्त्विक भावनाके माहात्म्यसे, तुम्हारे थोड़े-से ही तपसे ब्रह्मरूपी भगवान् जनार्दन तथा लोकेश्वर ब्रह्मा भी संतुष्ट हुए हैं। इसीसे तुम्हारा पुष्कर-मन्दिर स्वेच्छानुसार जहाँ-कहीं भी जानेकी शक्तिसे युक्त है। वह अनङ्गवती वेश्या भी इस समय कामदेवकी पत्नी रतिके* सौतरूपमें उत्पन्न हुई है। यह इस समय प्रीति नामसे विख्यात है और समस्त लोकोंमें सबको आनन्द प्रदान करती तथा सम्पूर्ण देवताओंद्वारा सत्कृत है। इसलिये राजराजेश्वर! तुम उस पुष्कर-गृहको भूलपर छोड़ दो और गङ्गातटका आश्रय लेकर विभूतिद्वादशी-व्रतका अनुष्ठान करो।
उससे तुम्हें निश्चय ही मोक्षकी प्राप्ति हो जायगी।
श्रीकृष्णने कहा— महाराज! ऐसा कहकर प्रचेतामुनि वहीं अन्तर्हित हो गये। तब राजा पुष्पवाहनने मुनिके कथनानुसार सारा कार्य सम्पन्न किया। राजन्! इस विभूतिद्वादशी-व्रतका अनुष्ठान करते समय अखण्ड-व्रतका पालन करना आवश्यक है। जिस किसी भी प्रकारसे हो सके, बारहों द्वादशियोंका व्रत कमल-पुष्पोंद्वारा सम्पन्न करना चाहिये। अन्ध! अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको दक्षिणा भी देनेका विधान है। इसमें कृपणता नहीं करनी चाहिये, क्योंकि भक्तिसे ही भगवान् केशव प्रसन्न होते हैं। जो मनुष्य पापोंको विदीर्ण करनेवाले इस व्रतको पढ़ता या श्रवण करता है अथवा इसे करनेके लिये सम्मति प्रदान करता है, वह भी सौ करोड़ वर्षोंतक देवलोकमें निवास करता है।
(अध्याय ८५)
मदनद्वादशी-व्रतमें मरुद्रणोंका आख्यान
युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! दिति (दैत्योंकी जननी)-ने जिस व्रतके करनेसे उनचास मरुद्रणोंको पुत्ररूपमें प्राप्त किया था, अब मैं आपसे उस मदनद्वादशी-व्रतके विषयमें सुनना चाहता हूँ।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! पूर्वकालमें वसिष्ठ आदि महर्षियोंने दितिसे जिस उत्तम मदनद्वादशी-व्रतका वर्णन किया था, उसीको आप मुझसे विस्तारपूर्वक सुनिये। व्रतधारीको चाहिये कि वह चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिको श्वेत चावलोंसे परिपूर्ण एवं छिद्ररहित एक घट स्थापित करे। उसपर श्वेत चन्दनका अनुलेप लगा हो तथा वह श्वेत वस्त्रके दो टुकड़ोंसे आच्छादित हो। उसके निकट विभिन्न प्रकारके ऋतुफल और
गन्नेके टुकड़े रखे जायँ। वह विविध प्रकारकी खाद्य-सामग्रीसे युक्त हो तथा उसमें यथाशक्ति सुवर्ण-खण्ड भी डाला जाय। तत्पश्चात् उसके ऊपर गुड़से भरा हुआ ताँबेका पात्र स्थापित करे। उसके ऊपर केलेके पत्तेपर काम तथा उसके वामभागमें शक्करसमन्वित रतिकी स्थापना करे। फिर गन्ध, धूप आदि उपचारोंसे उनकी पूजा करे और गीत, वाद्य तथा भगवान् विष्णुकी कथाका आयोजन करे। प्रातःकाल वह घट ब्राह्मणको दान कर दे। पुनः भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराकर स्वयं भी नमकरहित भोजन करे और ब्राह्मणोंको दक्षिणा देकर इस प्रकार उच्चारण करे—‘जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित रहकर
- हरिवंश एवं अन्य पुराणों तथा कथासरित्सागरादिमें भी रति और प्रीति—ये दो कामदेवकी पत्नियाँ कही गयी हैं। किंतु उसकी दूसरी पत्नी प्रीतिकी उत्पत्तिकी पूरी कथा यही है।
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- उत्तरपर्व *
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आनन्द नामसे कहे जाते हैं, वे कामरूपी भगवान् जनार्दन मेरे इस अनुष्ठानसे प्रसन्न हों।'
इसी विधिसे प्रत्येक मासमें मदनद्वादशी-व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। व्रतीको चाहिये कि वह द्वादशीके दिन आम्लक-फल खाकर भूतलपर शयन करे और त्रयोदशीके दिन अविनाशी भगवान् विष्णुका पूजन करे। तेरहवाँ महीना आनेपर घृतधेनु-सहित एवं समस्त सामग्रियोंसे सम्पन्न शय्या, कामदेवकी स्वर्णनिर्मित प्रतिमा और श्वेत रंगकी दुधारू गौ ब्राह्मणको समर्पित करे। उस समय शक्तिके अनुसार वस्त्र एवं आभूषण आदिद्वारा सपत्नीक ब्राह्मणकी पूजा करके उन्हें शय्या और सुगन्ध आदि प्रदान करते हुए ऐसा कहना चाहिये— 'आप प्रसन्न हों।' तत्पश्चात् उस धर्मज्ञ व्रतीको कामदेवके नामोंका कीर्तन करते हुए गोदुग्धसे बनी हुई हवि और श्वेत तिलोंसे हवन करना चाहिये। पुनः कृपणता छोड़कर ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये और उन्हें यथाशक्ति गन्ना तथा पुष्पमाला प्रदानकर संतुष्ट करना चाहिये। जो इस विधिके अनुसार इस मदनद्वादशी-व्रतका अनुष्ठान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर भगवान् विष्णुकी समताको प्राप्त हो जाता है तथा इस लोकमें श्रेष्ठ पुत्रोंको प्राप्तकर सौभाग्य-फलका उपभोग करता है।
दितिके इस व्रतानुष्ठानके प्रभावसे प्रभावित होकर महर्षि कश्यप उसके निकट पधारे और परम प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने उसे पुनः रूप-यौवनसे सम्पन्न तरुण बना दिया तथा वर माँगनेके लिये कहा। दितिने कहा— 'पतिदेव! मैं आपसे एक ऐसे पुत्रका वरदान चाहती हूँ, जो इन्द्रका वध करनेमें समर्थ, अमित पराक्रमी और महान् आत्मबलसे सम्पन्न हो।' यह सुनकर महर्षि कश्यपने उससे कहा 'ऐसा ही होगा।'
कश्यपने पुनः उससे कहा— 'वरानने! एक सौ वर्षांतक तुम्हें इसी तपोवनमें रहना है और अपने गर्भकी रक्षाके लिये प्रयत्न करना है। वरवर्णिनि! गर्भिणी स्त्रीको संध्या-कालमें भोजन नहीं करना चाहिये। उसे न तो कभी वृक्षके मूलपर बैठना चाहिये, न उसके निकट ही जाना चाहिये। वह घरकी सामग्री—मूसल, ओखली आदिपर न बैठे, जलमें घुसकर स्नान न करे, सुनसान घरमें न जाय, लोगोंके साथ वाद-विवाद न करे और शरीरको तोड़े-मरोड़े नहीं। वह बाल खेलकर न बैठे, कभी अपवित्र न रहे, उत्तर दिशामें सिरहाना करके एवं कहीं भी नीचे सिर करके न सोये, न नंगी होकर रहे, न उद्विग्रचित रहे, न कभी भीगे चरणोंसे शयन करे, अमङ्गलसूचक वाणी न बोले, अधिक जोरसे हँसे नहीं, नित्य माङ्गलिक कार्योंमें तत्पर रहकर गुरुजनोंकी सेवा करे और (आयुर्वेदद्वारा गर्भिणीके स्वास्थ्यके लिये उपयुक्त बतलायी गयी) सम्पूर्ण औषधियोंसे युक्त गुनगुने गरम जलसे स्नान करे। बुरी स्त्रियोंसे बातचीत न करे, कपड़ेसे हवा न ले। मृतवत्सा स्त्रीके साथ न बैठे, दूसरेके घरमें न जाय, जल्दी-जल्दी न चले, महानदियोंको पार न करे। भयंकर और बीभत्स दृश्य न देखे। अजीर्ण भोजन न करे। कठिन व्यायामादि न करे। औषधियोंद्वारा गर्भकी रक्षा करती रहे, हृदयमें मात्स्यभाव न रखे। जो गर्भिणी स्त्री विशेषरूपसे इन नियमोंका पालन करती है, उसका उस गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न होता है, वह शीलवान् एवं दीर्घायु होता है। इन नियमोंका पालन न करनेपर निस्संदेह गर्भपातकी आशङ्का बनी रहती है। प्रिये! इसलिये तुम इन नियमोंका पालन करके अपने गर्भकी रक्षाका प्रयत्न करो। तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं जा रहा हूँ।' दितिके द्वारा पतिकी आज्ञा स्वीकार कर लेनेपर महर्षि कश्यप वहाँ अन्तर्धान हो गये।
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
तब दिति नियमोंका पालन करती हुई समय व्यतीत करने लगी। कालान्तरमें दितिको उनचास पुत्र (मरुद्रण) प्राप्त हुए।
राजन्! इस प्रकारसे जो भी नारी इस मदनह्लादशी-व्रतका अनुष्ठान करेगी, वह पुत्र प्राप्त कर पतिके सुखको प्राप्त करेगी। (अध्याय ८६)
अबाधक-व्रत एवं दौर्भाग्य-दौर्गन्ध्यनाशक-व्रतका माहात्म्य
राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! जनशून्य घोर वनमें, समुद्रतरणमें, संग्राममें, चोर आदिके भयमें व्याकुल मनुष्य किस देवताका स्मरण करे, जिससे उस संकटके समय उसकी रक्षा हो सके, यह आप बतायें।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! सर्वमङ्गला भगवती श्रीदुर्गादेवीका स्मरण करनेपर पुरुष कभी भी दुःख और भयको प्राप्त नहीं होता। भारत! जब मैं और बलदेवजी अपने गुरु संदीपनिमुनिके यहाँ सब विद्या पढ़ चुके तो उस समय हमने गुरुदक्षिणाके लिये गुरुजीसे प्रार्थना की। तब गुरुजीने हमारा दिव्य प्रभाव जानकर यही कहा—‘प्रभो! मेरा पुत्र प्रभासक्षेत्रमें गया था, वहाँ उसे समुद्रमें किसी प्राणीने मार दिया, उसी पुत्रको गुरुदक्षिणाके रूपमें मुझे प्राप्त कराओ।’ तब हम यमलोकमें गये और वहाँसे गुरुपुत्रको लेकर गुरुजीके समीप आये तथा गुरुदक्षिणाके रूपमें उनका पुत्र उन्हें समर्पित कर दिया। तदनन्तर गुरुको प्रणामकर जब हम चलने लगे, तब गुरुजीने कहा—‘पुत्रो! इस स्थानमें तुम अपने चरणोंका चिह्न बना दो’, हमने गुरुकी आज्ञाके अनुसार वैसा ही किया, फिर हम वापस घर आ गये। उसी दिनसे बलरामजीके दक्षिण पादका, मध्यमें सर्वमङ्गलाका और मेरे वाम चरणचिह्नका पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे अथवा अपनी इच्छाओंकी पूर्तिके लिये सभी वहाँ पूजन
करते हैं। प्रत्येक मासको शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीको एकभुक्त, नक्तव्रत अथवा उपवास रहकर मृतिका या सुवर्णकी इनकी प्रतिमा बना करके गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, मधु आदिसे जो स्त्री अथवा पुरुष पूजन करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो स्वर्गमें निवास करता है।
राजा युधिष्ठिरने पुनः पूछा—यदुशार्दूल! ऐसा कौन व्रत है, जिसके आचरणसे शरीरका दुर्गन्ध नष्ट हो जाय और दौर्भाग्य भी दूर हो जाय।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! इसी प्रश्नको रानी विष्णुभक्तिने जातूकण्ठ्यमुनिसे पूछा था, तब उन्होंने उनसे कहा—‘देवि! ज्येष्ठ मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीमें पवित्र जलाशयमें स्नान करे और शुद्ध स्थानमें उत्पन्न श्वेत आक, रक्त करवीर तथा निम्ब-वृक्षकी पूजा करे। ये तीनों वृक्ष भगवान् सूर्यको अत्यन्त प्रिय हैं। प्रातःकाल सूर्योदय हो जानेपर भगवान् सूर्यका दर्शनकर उनका अपने हृदयमें ध्यान करे। अनन्तर पुष्प, नैवेद्य, धूप आदि उपचारोंसे उन वृक्षोंकी पूजा करे और पूजनके अनन्तर उन्हें नमस्कार करे।
राजन्! इस विधिसे जो स्त्री-पुरुष इस व्रतको करते हैं, उनके शरीरकी दुर्गन्धि तथा उनका दौर्भाग्य दोनों दूर हो जाते हैं और वे सौभाग्यशाली हो जाते हैं।
(अध्याय ८७-८८)
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- उत्तरपर्व *
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धर्मराजका समाराधन-व्रत *
राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! ऐसा कौन-सा व्रत है, जिसके करनेसे यमराज प्रसन्न हो जायँ और नरकका दर्शन न हो।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! एक बार जब मैं द्वारका-स्थित समुद्रमें स्नान करके बाहर निकला, तब देखा कि मुद्गलमुनि चले आ रहे हैं। उनका तेज सूर्यके समान था और उनके मुखके तपस्तेजसे दिशाएँ उद्घासित हो रही थीं। तब मैंने उनका अर्घ्य, पाद्य आदिसे सत्कार कर आदरपूर्वक उनसे पूछा—‘महाराज! प्राणियोंके लिये अत्यन्त भयदायक नरक तथा यमदूतों आदिका जिससे दर्शन न हो ऐसा कोई व्रत आप मुझसे बतलायें।’ यह सुनकर मुद्गलमुनि भी कुछ विस्मित-से हुए। किंतु बादमें शान्त-मन होकर वे बोले—‘प्रभो! एक बार ऐसा हुआ कि मुझे अकस्मात् मूर्च्छा आ गयी और मैं पृथ्वीपर गिर पड़ा, उस स्थितिमें मैंने देखा कि हाथमें लाठी लिये कुछ लोग आगसे जलते हुए-से मेरे शरीरसे निकलकर बाहर खड़े हुए थे और मेरे हृदयसे एक अँगूठेके बराबर व्यक्तिको बलपूर्वक खींचकर तथा रसिस्योंसे बाँधकर यमपुरीकी ओर ले जा रहे हैं। फिर मैं तत्काल क्या देखता हूँ कि यमराजकी सभा लगी है और लाल-पीले नेत्रोंवाले यमराज सभामें विराजमान हैं तथा कफ, वात, पित्त, ज्वर, मांस, शोथ, फोड़े, फुंसी, भांदर, अक्षिरोग, विषूचिका, गलग्रह आदि अनेकों प्रकारके रोग और मृत्यु उन्हें घेरे हुए हैं और वे सभी मूर्तिमान् होकर यमदेवकी उपासना कर रहे हैं। यमदूत भयंकर शस्त्र धारण किये हैं। कुछ राक्षस, दानव आदि भी वहाँ बैठे हैं। सिंह, व्याघ्र, बिच्छू, दंश, सियार, साँप, उल्लू, कीड़े-
मकोड़े आदि भयंकर जीव-जन्तु वहाँ उपस्थित हैं।’ यमराजने अपने किंकरोंसे पूछा—‘दूतो! तुमलोग यहाँ इन मुद्गलमुनिको क्यों ले आये? मैंने तो मुद्गल क्षत्रियको लानेके लिये कहा था, वह कौंडिन्यनगरका निवासी भीष्मकका पुत्र है, उसकी आयु समाप्त हो चुकी है, इन मुनिको तत्काल छोड़ दो और उसे ही ले आओ।’ यह सुनकर वे दूत कौंडिन्यनगर गये, किंतु वहाँ राजा मुद्गलमें मृत्युके कोई लक्षण न देखकर भ्रान्त होकर पुनः यमलोकमें वापस आये और उन्होंने सारा वृत्तान्त यमराजको बता दिया। इसपर यमराजने उनसे कहा—‘दूतो! जिन पुरुषोंने नरकार्ति-विनाशिनी त्रयोदशीका व्रत किया है, उन्हें यमकिंकर नहीं देख पाते, इसीलिये तुमलोगोंने राजा मुद्गलको पहचाना नहीं।’ पुनः यमदूतोंद्वारा व्रतके विधानको पूछे जानेपर यमराजने उनसे कहा—‘मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीको जब रविवार एवं मंगलवार न हो, तब उस दिन तेरह विद्वान् और पवित्र ब्राह्मणों तथा एक पुराणवाचकका वरण करके पूर्वाह्नकालमें उन ब्राह्मणोंको उत्तराभिमुख पवित्र आसनपर बैठाये। तिल-तैलसे उनका अभ्यंग करके गन्धकाषाय तथा हलके गरम जलसे उन्हें पृथक्-पृथक् स्नान कराये और उनकी सेवा-शुश्रूषा करे। अनन्तर पूर्वाभिमुख बैठाकर उन्हें शाल्यन्त्र, मुद्गन्त्र, गुडके अपूप तथा सुपक्क व्यञ्जन आदरपूर्वक खिलाये।
पुनः व्रती पवित्र होकर आचमन करे और उन ब्राह्मणोंकी अर्चना करे। ताम्रपात्रमें प्रस्थमात्र (एक पसर या एक सेर) तिल-तण्डुल, दक्षिणा, छत्र, जलपूर्ण कलश आदि उन्हें अलग-अलग प्रदान कर विसर्जित करे।
- यह कथा स्कन्दपुराणके नामसे अनेक व्रत-निबन्धोंमें संग्रहीत है।
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
इसी प्रकार वर्षभरतक व्रत करे। कोई मानव यदि आदरपूर्वक एक बार भी इस व्रतको कर ले तो वह मेरे यमलोकका दर्शन नहीं करता। वह मेरी मायासे अदृष्ट रहता है, अन्तमें विमानद्वारा अर्कमण्डलमें प्रवेश कर वह विष्णुपुर और शिवपुरको प्राप्त करता है। यमदूतो! उस राजा मुद्दलने इस त्रयोदशी-व्रतको पहले किया था, इसीलिये तुम सब उस क्षत्रिय-श्रेष्ठका दर्शन नहीं कर पाये।
श्रीकृष्ण! उसी क्षण मेरी मूर्च्छा दूर हो गयी और मैं स्वस्थ हो गया। भगवन्! मैं आपके
दर्शनकी इच्छासे यहाँ आया था, जैसा पहले वृत्तान्त हुआ, वह सब मैंने आपको बतलाया।
भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले—राजन्! वे मुनि मुझसे इतना कहकर अपने स्थानको चले गये। कौन्तेय! आप भी इस व्रतको करें। इससे आपको यमलोक नहीं जाना पड़ेगा। इसी प्रकार जो कोई स्त्री-पुरुष इस त्रयोदशी-व्रतका श्रद्धापूर्वक आचरण करेंगे, वे सभी पापोंसे मुक्त होकर अपने पुण्य-कर्मके प्रभावसे स्वर्गमें पूजित होंगे और उन्हें कभी यमयातना नहीं सहनी पड़ेगी। (अध्याय ८९)
अनङ्ग-त्रयोदशी-व्रत
युधिष्ठिरने पूछा—संसारसे उद्धार करनेवाले स्वामिन्! आप रूप एवं सौभाग्य प्रदान करनेवाला कोई व्रत बतायें।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! शरीरको क्लेश देनेवाले बहुत-से व्रतोंके करनेसे क्या लाभ? अकेले अनङ्ग-त्रयोदशी ही सब दोषोंका शमन एवं समस्त मङ्गलोंकी वृद्धि करनेवाली है। आप इसकी विधि सुनें।
पहले जब भगवान् शंकरने कामदेवको दग्ध कर दिया, तब वह बिना अङ्गके ही सबके शरीरमें निवास करने लगा। कामदेवने इस व्रतको किया था, इसीसे इसका नाम अनङ्ग-त्रयोदशी पड़ा। इस व्रतमें मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीको नदी, तडाग आदिमें स्नान कर, जितेन्द्रिय हो, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और कालोद्भूत फलोंसे भगवान् शंकरका 'शशिशेखर' नामसे पूजन करे तथा तिलसहित अक्षतोंसे हवन करे। रात्रिको मधु-प्राशन कर सो जाय। इससे व्रती कामदेवके समान ही सुन्दर हो जाता है और दस अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त करता है। इसी प्रकार पौष मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीमें भगवान् शंकरका
'योगेश्वर' नामसे पूजन कर चन्दनका प्राशन करे तो शरीरमें चन्दनके समान गन्ध हो जाती है और व्रती राजसूय-यज्ञका फल प्राप्त करता है। माघ मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीको भगवान् शंकरका 'महेश्वर' नामसे पूजन कर मोतीका चूर्ण भक्षण करे तो उत्तम सौभाग्य प्राप्त करता है। इसी प्रकार फाल्गुनमें 'हरेश्वर' नामसे पूजन कर कंकोलका प्राशन करनेसे अतुल सौन्दर्य प्राप्त होता है। चैत्रमें 'सुरूपक' नामसे पूजन करने और कर्पूर-प्राशन करनेसे व्रती चन्द्रके तुल्य मनोहर हो जाता है एवं महान् सौभाग्य प्राप्त करता है। वैशाखमें 'महारूप' नामसे पूजन कर जातीफल (जायफल)-का प्राशन करे, इससे उत्तम कुलकी प्राप्ति होती है और उसके सब काम सफल हो जाते हैं तथा वह सहस्र गोदानका फल प्राप्त कर ब्रह्मलोकमें निवास करता है। ज्येष्ठमें 'प्रद्युम्न' नामसे पूजन करे और लवंगका प्राशन करे, इससे उत्तम स्थान, श्रेष्ठ लक्ष्मी और सभी सुख-सम्पदाएँ प्राप्त होती हैं तथा वह एक सौ आठ वाजपेय-यज्ञोंका फल प्राप्त करता है। आषाढ़में 'उमाभर्ता' नामसे पूजन कर तिलोदकका प्राशन करे। इससे उत्तम रूप
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- उत्तरपर्व *
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प्राप्त होता है तथा वह सौ वर्षतक सुखी जीवन व्यतीत करता है। श्रावणमें 'उमापति' नामसे पूजन कर तिलोंका प्राशन करे, इससे पौण्डरीक-यज्ञका फल प्राप्त होता है। भाद्रपद मासमें 'सद्योजात' नामसे पूजन कर अगुरुका प्राशन करे, इससे वह भूमिपर सबका गुरु बनता है और पुत्र-पौत्र, धन आदि प्राप्त कर बहुत दिन संसारमें सुख भोगकर अन्तमें विष्णुलोकमें पूजित होता है। आश्विन मासमें 'त्रिदशाधिपति' नामसे पूजन कर स्वर्णादकका प्राशन करे तो व्रती उत्तम रूप, सौभाग्य, प्रगल्भता और करोड़ों निष्कंदनका फल प्राप्त करता है। कार्तिकमें 'विश्वेश्वर' नामसे पूजन कर दमन (दौना) फलका प्राशन करे तो व्रती अपने बाहुबलसे समस्त संसारका स्वामी होता है और अन्तमें
शिवलोकमें निवास करता है।
इस प्रकार वर्षभर इस उत्तम व्रतका पालन कर पारणा करनी चाहिये। फिर कलश स्थापित कर उसके ऊपर ताम्रपात्र और उसके ऊपर शिवकी प्रतिमा स्थापित कर श्वेत वस्त्रसे आच्छादित करे। गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे उसका पूजन कर उसे शिवभक्त ब्राह्मणको प्रदान कर दे। साथ ही पयस्विनी सवत्सा गौ, छाता और यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये। इस प्रकार जो इस अनङ्ग-त्रयोदशी-व्रतको करता है और व्रत-पारणाके समय महान् उत्सव करता है वह निष्कण्टक राज्य, आयुष्य, बल, यश तथा सौभाग्य प्राप्त करता है और अन्तमें शिवलोकमें निवास करता है।
(अध्याय ९०)
पाली-व्रत१ एवं रम्भा (कदली)-व्रत
राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! श्रेष्ठ स्त्रियाँ जलपूर्ण तडागों और सरोवरोंमें किस निमित्त स्नान-दान आदि कर्म करती हैं? इसे आप बतायें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशीको बावली, कुएँ, पुष्करिणी तथा बड़े-बड़े जलाशयों आदिके पास पवित्र होकर भगवान् वरुणदेवको अर्घ्य प्रदान करना चाहिये। व्रतीको चाहिये कि तडागके तटपर जाकर फल, पुष्प, वस्त्र, दीप, चन्दन, महावर, ससधान्य, बिना अग्निके स्पर्शसे पका हुआ अन्न, तिल, चावल, खजूर, नारिकेल, बिजौरा नीबू, नारंगी, अंगूर, दाड़िम, सुपारी आदि उपचारोंसे वारुणीसहित वरुणदेवकी एवं जलाशयकी विधिपूर्वक पूजा करे और उन्हें अर्घ्य प्रदान कर इस प्रकार
उनकी प्रार्थना करे—
वरुणाय नमस्तुभ्यं नमस्ते यादसाम्यते। अपाम्यते नमस्तेऽस्तु रसानाम्यतये नमः॥ मा क्लेदं मा च दीर्गन्ध्यं विरस्यं मा मुखेऽस्तु मे। वरुणो वारुणीभर्ता वरदोऽस्तु सदा मम॥
(उत्तरपर्व ११।७-८)
'जलचर जीवोंके स्वामी वरुणदेव! आपको नमस्कार है। सभी जल एवं जलसे उत्पन्न रस-द्रव्योंके स्वामी वरुणदेव! आपको नमस्कार है। मेरे शरीरमें पसीना, दुर्गन्ध या विरसता२ आदि मेरे मुखमें न हों। वारुणीदेवीके स्वामी वरुणदेव! आप मेरे लिये सदा प्रसन्न एवं वरदायक बने रहें।'
व्रतीको चाहिये कि इस दिन बिना अग्निके पके हुए भोजन अर्थात् फल आदिका भोजन करे।
१-'पाली' शब्द जटिल है, यह कोशोंमें प्रायः नहीं मिलता। इसका अर्थ कूप, तडाग आदि जलाशयोंको रक्षाके लिये बने घेरेसे है। उसीपर बैठकर स्त्रियाँ इस व्रतको सम्पन्न करती हैं। वरुणदेव चूँकि सभी जलोंमें रहते हैं, अतः इसे वहाँ बैठकर करना चाहिये।
२-च्वर आदिसे मुखका स्वाद बिगड़ जाता है, उसे विरसता कहते हैं।
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४९०
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
इस विधिसे जो पाली-व्रतको करता है, वह तत्क्षण सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। आयु, यश और सौभाग्य प्राप्त करता है तथा समुद्रके जलकी भाँति उसके धनका कभी अन्त नहीं होता।
भगवान् श्रीकृष्णने पुनः कहा— राजन्! अब मैं ब्रह्माजीकी सभामें देवर्षियोंके द्वारा पूछे जानेपर देवलमुनिप्रोक्त रम्भा-व्रतका वर्णन कर रहा हूँ। यह भी भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशीको ही होता है। सभी देवताओं, गन्धर्वों तथा अप्सराओंने भी इस व्रतका अनुष्ठान कर कदली-वृक्षको सादर अर्घ्य प्रदान किया था। व्रतीको चाहिये कि इस चतुर्दशीको नाना प्रकारके फल, अंकुरित अन्नों, सप्तधान्य, दीप, चन्दन, दही, दूर्वा, अक्षत, वस्त्र, पक्वान्न, जायफल, इलायची तथा लवंग आदि उपचारोंसे कदली-वृक्षका पूजनकर उसे निम्नलिखित मन्त्रसे अर्घ्य प्रदान करे—
चित्या त्वं कन्दलदलैः कदली कामदायिनि।
शरीरारोग्यलावण्यं देहि देवि नमोऽस्तु ते॥
(उत्तरपर्व ९२।७)
‘कदली देवि! आप अपने पत्तोंसे वायुके व्याजसे ज्ञान एवं चेतनाका संचार करती हुई सभी कामनाओंको देती हैं। आप मेरे शरीरमें रूप, लावण्य, आरोग्य प्रदान करनेकी कृपा करें। आपको नमस्कार है*।’
इसके अनन्तर स्वयं पके हुए फल आदिका भोजन ग्रहण करे। जो भी पुरुष अथवा स्त्री भक्तिसे इस व्रतको करती है, उसके वंशमें दुर्भाग्य, दरिद्रा, वन्ध्या, पापिनी, व्यभिचारिणी, कुलटा, पुनर्भू, दुष्ट और पतिकी विरोधिनी कोई कन्या नहीं उत्पन्न होती। इस व्रतको करनेपर नारी सौभाग्य, पुत्र-पौत्र, धन, आयुष्य तथा कीर्ति आदि प्राप्त कर सौ वर्षपर्यन्त अपने पतिके साथ आनन्दपूर्वक रहती है। इस रम्भा-व्रतको गायत्रीने स्वर्गमें किया था। इसी प्रकार गौरीने कैलासमें, इन्द्राणीने नन्दनवनमें, लक्ष्मीने श्वेतद्वीपमें, राज्ञीने रविमण्डलमें, अरुन्धतीने दारुवनमें, स्वाहाने मेरुपर्वतपर, सीतादेवीने अयोध्यामें, वेदवतीने हिमाचलपर और भानुमतीने नागपुरमें इस व्रतको किया था। (अध्याय ९१-९२)
आग्रेयी शिवचतुर्दशी-व्रतके प्रसंगमें महर्षि अङ्गिराका आख्यान
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! प्राचीन कालमें जब अग्निदेव अदृश्य हो गये, उस समय अग्निना कार्य किसने किया और कैसे अग्निने पुनः अपना स्वरूप प्राप्त किया? इसे आप बतायें।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा— महाराज! एक बार उत्तथ्यमुनि और अङ्गिरामुनिका विद्यामें और तपमें परस्पर श्रेष्ठताके विषयमें बहुत विवाद हुआ। इसका निश्चय करनेके लिये दोनों ब्रह्मलोक गये
और उन्होंने ब्रह्माजीको सारा वृत्तान्त बतलाया। ब्रह्माजीने उनसे कहा कि ‘तुम दोनों जाकर सभी देवताओं और लोकपालोंको यहाँ बुला लाओ, तब सभीके समक्ष इसका निर्णय किया जायगा।’ ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर दोनों जाकर सभी देवता, ऋषि, गन्धर्व, किन्नर, यक्ष, राक्षस, दैत्य, दानव आदिको बुला लाये। किंतु भगवान् सूर्य नहीं आये। ब्रह्माजीके पुनः कहनेपर उत्तथ्यमुनि
- कदलीके व्याजसे सर्वशक्तिमयी दुर्गाकी ‘चितिरूपेण या कृत्स्नभेदद् व्याप्य स्थिता जगत्। नमस्तस्यै’ को ही स्मरण करते हुए प्रार्थना की गयी है।
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- उत्तरपर्व *
४९१
सूर्यनारायणके समीप जाकर बोले—‘भगवन्! आप शीघ्र ही हमारे साथ ब्रह्मलोक चले।’ भगवान् सूर्यने कहा—‘मुने! हमारे चले जानेपर जगत्में अन्धकार छा जायगा, इसलिये हमारा चलना किस प्रकार हो सकता है, हम नहीं चल सकेंगे।’ यह सुनकर उत्थ्यमुनि वहाँसे चले आये और ब्रह्माजीको सब वृत्तान्त सुना दिया। तब ब्रह्माजीने अङ्किरामुनिसे सूर्यभगवान्को बुलानेके लिये कहा। अङ्किरामुनि ब्रह्माजीकी आज्ञा पाकर सूर्यनारायणके समीप गये और उनसे ब्रह्मलोक चलनेको कहा। सूर्यनारायणने वही उत्तर इनको भी दिया। तब अङ्किराने कहा—‘प्रभो! आप ब्रह्मलोक जायँ, मैं आपके स्थानपर यहाँ रहकर प्रकाश करूँगा।’ यह सुनकर सूर्यनारायण तो ब्रह्माजीके पास चले गये और अङ्किरा प्रचण्ड तेजसे तपने लगे। इधर भगवान् सूर्यने ब्रह्माजीसे पूछा—‘ब्रह्मन्! आपने किस निमित्तसे मुझे यहाँ बुलाया है?’ ब्रह्माजीने कहा—‘देव! आप शीघ्र ही अपने स्थानपर जायँ, नहीं तो अङ्किरामुनि सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको दग्ध कर डालेंगे। देखिये उनके तापसे सभी लोग दग्ध हो रहे हैं। जबतक वे सब कुछ भस्म न कर डालें उससे पूर्व ही आप प्रतिष्ठित हो जायँ।’ यह सुनते ही सूर्यभगवान् पुनः अपने स्थानपर लौट आये और उन्होंने अङ्किरामुनिकी स्तुति कर उन्हें बिदा किया। अङ्किरा पुनः देवताओंके समीप आये। देवताओंने अङ्किरामुनिकी स्तुति की और कहा—‘भगवन्! जबतक हम अग्निको ढूँढ़ें तबतक आप अग्निके सभी कर्म कीजिये।’ देवताओंका ऐसा वचन सुनकर महर्षि अङ्किरा अग्निरूपमें देवकार्यादिको सम्पन्न करने लगे। जब अग्निदेव आये तो उन्होंने देखा कि अङ्किरामुनि अग्नि बनकर स्थित हैं। इसपर वे बोले—‘मुने! आप मेरा स्थान छोड़ दें। मैं आपकी शुभा नामकी
स्त्रीसे ज्येष्ठ एवं प्रिय पुत्रके रूपमें उत्पन्न होऊँगा और तब मेरा नाम होगा बृहस्पति। आपके और भी बहुत-से पुत्र-पौत्र होंगे।’ यह वर पाकर प्रसन्न हो महर्षि अङ्किराने अग्निका स्थान छोड़ दिया।
राजन्! अग्निदेवको चतुर्दशी तिथिको ही अपना स्थान प्राप्त हुआ था, इसलिये यह तिथि अग्निको अति प्रिय है और आग्नेयी चतुर्दशी तथा रौद्री चतुर्दशीके नामसे प्रसिद्ध है। स्वर्गमें देवता और भूमिपर मान्धाता, मनु, नहुष आदि बड़े-बड़े राजाओंने इस तिथिको माना है। जो पुरुष युद्धमें मारे जायँ, सर्प आदिके काटनेसे मरे हों और जिसने आत्मघात किया हो, उनका इस चतुर्दशी तिथिमें श्राद्ध करना चाहिये, जिससे वे सद्भक्तिको प्राप्त हो जायँ। इस तिथिके व्रतका विधान इस प्रकार है—चतुर्दशीको उपवास करे और गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे त्रिलोचन श्रीसदाशिवका पूजन करे, रात्रिमें जागरण करे। रात्रिमें पञ्चगव्यका प्राशन कर भूमिपर ही शयन करे। तैल-क्षारसे रहित श्यामाक (साँवा)-का भोजन करे। अग्निके नाम-मन्त्रोंद्वारा काले तिलोंसे १०८ आहुतियाँ प्रदान करे। दूसरे दिन प्रातः स्नान कर पञ्चामृतसे शिवजीको स्नान कराकर भक्तिपूर्वक उनका पूजन करे और पूर्वोक्त रीतिसे हवनकर उनकी प्रार्थना करे। पीछे आरती कर ब्राह्मणको भोजन कराये। उनको दक्षिणा दे और मौन हो स्वयं भी भोजन करे। इस प्रकार एक वर्ष व्रत कर सुवर्णकी त्रिलोचन भगवान् शंकरकी प्रतिमा बनाये। प्रतिमाको चाँदीके वृषभपर स्थितकर दो श्वेत वस्त्रोंसे आच्छादित कर ताम्रपात्रमें स्थापित करे। तदनन्तर गन्ध, श्वेत पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे उसका पूजन कर ब्राह्मणको दे दे। जो एक वर्षतक इस व्रतको करता है, वह लम्बी आयु प्राप्त कर अन्तमें तीर्थमें प्राण परित्याग कर
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४९२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
शिवलोकमें देवताओंके साथ विहार करता है। वहाँ बहुत कालतक रहकर वह पृथ्वीमें आकर ऐश्वर्यसम्पन्न धार्मिक राजा होता है। पुत्र-पौत्रोंसे
समन्वित होता है और चिरकालतक आनन्दित रहता है तथा अपने अभीष्ट मनोरथोंको प्राप्त करता है*। (अध्याय ९३)
अनन्तचतुर्दशी-व्रत-विधान
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—राजन्! सम्पूर्ण पापोंका नाशक, कल्याणकारक तथा सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला अनन्तचतुर्दशी नामक एक व्रत है, जिसे भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशीको सम्पन्न किया जाता है।
युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! आपने जो अनन्त नाम लिया है, क्या ये अनन्त शेषनाग हैं या कोई अन्य नाग हैं अथवा परमात्मा हैं या ब्रह्म हैं? अनन्त संज्ञा किसकी है? इसे आप बतलायें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! अनन्त मेरा ही नाम है। कला, काष्ठ, मुहूर्त, दिन, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर, युग तथा कल्प आदि काल-विभागोंके रूपमें मैं ही अवस्थित हूँ। संसारका भार उतारने तथा दानवोंका विनाश करनेके लिये वसुदेवके कुलमें मैं ही उत्पन्न हुआ हूँ। पार्थ! आप मुझे ही विष्णु, जिष्णु, हर, शिव, ब्रह्मा, भास्कर, शेष, सर्वव्यापी ईश्वर समझिये और अनन्त भी मैं ही हूँ। मैंने आपको विश्वास उत्पन्न करनेके लिये ऐसा कहा है।
युधिष्ठिरने पुनः पूछा—भगवन्! मुझे आप अनन्त-व्रतके माहात्म्य और विधिको तथा इसे किसने पहले किया था एवं इस व्रतका क्या पुण्य है, इसे बतलायें।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—युधिष्ठिर! इस सम्बन्धमें एक प्राचीन आख्यान है, उसे आप
सुनें। कृतयुगमें वसिष्ठगोत्री सुमन्तु नामके एक ब्राह्मण थे। उनका महर्षि भृगुकी कन्या दीक्षासे वेदोक्त-विधिसे विवाह हुआ था। उन्हें सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसका नाम शीला रखा गया। कुछ समय बाद उसकी माता दीक्षाका ज्वरसे देहान्त हो गया और उस पतिव्रताको स्वर्गलोक प्राप्त हुआ। सुमन्तुने पुनः एक कर्कशा नामकी कन्यासे विवाह कर लिया। वह अपने कर्कशा नामके समान ही दुःशील, कर्कश तथा नित्य कलहकारिणी एवं चण्डीरूपा थी। शीला अपने पिताके घरमें रहती हुई दीवाल, देहली तथा स्तम्भ आदिमें माङ्गलिक स्वस्तिक, पद्म, शङ्ख आदि विष्णुचिह्नोंको अङ्कित कर उनकी अर्चना करती रहती। सुमन्तुको शीलाके विवाहकी चिन्ता होने लगी। उन्होंने शीलाका विवाह कौंडिन्यमुनिके साथ कर दिया। विवाहके अनन्तर सुमन्तुने अपनी पत्नीसे कहा—‘देवि! दामादके लिये पारितोषिक रूपमें कुछ दहेज द्रव्य देना चाहिये।’ यह सुनकर कर्कशा क्रुद्ध हो उठी और उसने घरमें बने मण्डपको उखाड़ डाला तथा भोजनसे बचे हुए कुछ पदार्थोंको पाथेयके रूपमें प्रदान कर कहा—चले जाओ, फिर उसने कपाट बंद कर लिया।
कौंडिन्य भी शीलाको साथ लेकर बैलगाड़ीसे धीरे-धीरे वहाँसे चल पड़े। दोपहरका समय हो
- प्रायः अन्य ज्यौतिष ग्रन्थों तथा पुराणोंके अनुसार अग्निदेवकी तिथि प्रतिपदा ही है। चतुर्दशी शिवजीकी तिथि है। यहाँ भी शिवजीकी ही पूजा है, अतः कल्यान्तर-व्यवस्था मान लेनी चाहिये।
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- उत्तरपर्व *
४९३
गया। वे एक नदीके किनारे पहुँचे। शीलाने देखा कि शुभ वस्त्रोंको पहने हुए कुछ स्त्रियाँ चतुर्दशीके दिन भक्तिपूर्वक जनार्दनकी अलग-अलग पूजा कर रही हैं। शीलाने उन स्त्रियोंके पास जाकर पूछा—‘देवियो! आपलोग यहाँ किसकी पूजा कर रही हैं, इस व्रतका क्या नाम है।’ इसपर वे स्त्रियाँ बोलीं—‘यह व्रत अनन्तचतुर्दशी नामसे प्रसिद्ध है।’ शीला बोली—‘मैं भी इस व्रतको करूँगी, इस व्रतका क्या विधान है, किस देवताकी इसमें पूजा की जाती है और दानमें क्या दिया जाता है, इसे आपलोग बतायें।’ इसपर स्त्रियोंने कहा—‘शीले! प्रस्थभर पक्कात्रका नैवेद्य बनाकर नदीतटपर जाय, वहाँ स्नान कर एक मण्डलमें अनन्तस्वरूप भगवान् विष्णुकी गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदि उपचारोंसे पूजा करे और कथा सुने। उन्हें नैवेद्य अर्पित करे। नैवेद्यका आधा भाग ब्राह्मणको निवेदित कर आधा भाग प्रसादरूपमें ग्रहण करनेके लिये रखे। भगवान् अनन्तके सामने चौदह ग्रन्थियुक्त एक दोरक (डोरा) स्थापित कर उसे कुंकुमादिसे चर्चित करे। भगवान्को वह दोरक निवेदित करके पुरुष दाहिने हाथमें और स्त्री बायें हाथमें बाँध ले। दोरक-बन्धनका मन्त्र इस प्रकार है—
अनन्तसंसारमहासमुद्रे मग्नान् समभ्युद्भर वासुदेव। अनन्तरूपे विनियोजितात्मा ह्यनन्तरूपाय नमो नमस्ते॥
(उत्तरपर्व १४।३३)
‘हे वासुदेव! अनन्त संसाररूपी महासमुद्रमें मैं डूब रही हूँ, आप मेरा उद्धार करें, साथ ही अपने अनन्तस्वरूपमें मुझे भी आप विनियुक्त कर लें। हे अनन्तस्वरूप! आपको मेरा बार-बार प्रणाम है।’
दोरक बाँधनेके अनन्तर नैवेद्य ग्रहण करना चाहिये। अन्तमें विश्वरूपी अनन्तदेव भगवान्
नारायणका ध्यान कर अपने घर जाय। शीले! हमने इस अनन्तव्रतका वर्णन किया। तदनन्तर शीलाने भी विधिसे इस व्रतका अनुष्ठान किया। पाथेय निवेदित कर उसका आधा भाग ब्राह्मणको प्रदान कर आधा स्वयं ग्रहण किया और दोरक भी बाँधा। उसी समय शीलाले पति कौंडिन्य भी वहाँ आये। फिर वे दोनों बैलगाड़ीसे अपने घरकी ओर चल पड़े। घर पहुँचते ही व्रतके प्रभावसे उनका घर प्रचुर धन-धान्य एवं गोधनसे सम्पन्न हो गया। वह शीला भी मणि-मुक्ता तथा स्वर्णादिके हारों और वस्त्रोंसे सुशोभित हो गयी। वह साक्षात् सावित्रीके समान दिखलायी देने लगी। कुछ समय बाद एक दिन शीलाले हाथमें बँधे अनन्त-दोरकको उसके पतिने क्रुद्ध हो तोड़ दिया। उस विपरीत कर्मविपाकसे उनकी सारी लक्ष्मी नष्ट हो गयी, गोधन आदि चोरोंने चुरा लिया। सभी कुछ नष्ट हो गया। आपसमें कलह होने लगा। मित्रोंने सम्बन्ध तोड़ लिया। अनन्तभगवान्के तिरस्कार करनेसे उनके घरमें दरिद्रताका साम्राज्य छा गया। दुःखी होकर कौंडिन्य एक गहन वनमें चले गये और विचार करने लगे कि मुझे कब अनन्तभगवान्के दर्शनका सौभाग्य प्राप्त होगा। उन्होंने पुनः निराहार रहकर तथा ब्रह्मचर्यपूर्वक भगवान् अनन्तका व्रत एवं उनके नामोंका जप किया और उनके दर्शनोंकी लालसासे विह्वल होकर वे पुनः दूसरे निर्जन वनमें गये। वहाँ उन्होंने एक फले-फूलें आम्र-वृक्षको देखा और उससे पूछा कि क्या तुमने अनन्तभगवान्को देखा है? तब उसने कहा—‘ब्राह्मण देवता! मैं अनन्तको नहीं जानता।’ इस प्रकार वृक्षों आदिसे अनन्तभगवान्के विषयमें पूछते-पूछते घास चरती हुई एक सवत्सा गौको देखा। कौंडिन्यने गौसे पूछा—‘धेनुके! क्या तुमने अनन्तको देखा है?’ गौने कहा—‘विभो! मैं अनन्तको नहीं जानती।’
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
इसके पश्चात् कौंडिन्य फिर आगे बढ़े। वहाँ उन्होंने देखा कि एक वृषभ घासपर बैठा है। पूछनेपर वृषभने भी बताया कि मैंने अनन्तको नहीं देखा है। फिर आगे जानेपर कौंडिन्यको दो रमणीय तालाब दिखलायी पड़े। कौंडिन्यने उनसे भी अनन्तभगवान्के विषयमें पूछा, किंतु उन्होंने भी अनभिज्ञता प्रकट की। इसी प्रकार कौंडिन्यने अनन्तके विषयमें गर्दभ तथा हाथीसे पूछा, उन्होंने भी नकारात्मक उत्तर दिया। इसपर वे कौंडिन्य अत्यन्त निराश हो पृथ्वीपर गिर पड़े। उसी समय कौंडिन्यमुनिके सामने कृपा करके भगवान् अनन्त वृद्ध ब्राह्मणके रूपमें प्रकट हो गये और पुनः उन्हें अपने दिव्य चतुर्भुज विश्वरूपका दर्शन कराया। भगवान्का दर्शनकर कौंडिन्य अत्यन्त प्रसन्न हो गये और उनकी प्रार्थना करने लगे तथा अपने अपराधोंके लिये क्षमा माँगने लगे—
पापोऽहं पापकर्महिं पापात्मा पापसम्भवः ।
पाहि मां पुण्डरीकाक्ष सर्वपापहरो भव ॥
अद्य मे सफलं जन्म जीवितं च सुजीवितम् ।
(उत्तरपर्व १४।६०-६१)
कौंडिन्यने भगवान्से पुनः पूछा—भगवन्! घोर वनमें मुझे जो आम्रवृक्ष, वृषभ, गौ, पुष्करिणी, गर्दभ तथा हाथी मिले, वे कौन थे? आप तत्त्वतः इसे बतलायें।
भगवान् बोले—‘द्विजदेव! वह आम्रवृक्ष पूर्वजन्ममें एक वेदज्ञ विद्वान् ब्राह्मण था, किंतु उसे अपनी विद्याका बड़ा गर्व था। उसने
शिष्योंको विद्या-दान नहीं किया, इसलिये वह वृक्ष-योनिको प्राप्त हुआ। जिस गौको तुमने देखा, वह उपजाऊ शक्तिरहित वसुन्धरा थी, वह भूमि सर्वथा निष्फल थी, अतः वह गौ बनी। वृषभ सत्य धर्मका आश्रय ग्रहणकर धर्मस्वरूप ही था। वे पुष्करिणियाँ धर्म और अधर्मकी व्यवस्था करनेवाली दो ब्राह्मणियाँ थीं। वे परस्पर बहिनें थीं, किंतु धर्म-अधर्मके विषयमें उनमें परस्पर अनुचित विवाद होता रहता था। उन्होंने किसी ब्राह्मण, अतिथि अथवा भूखेको दान भी नहीं किया। इसी कारण वे दोनों बहिनें पुष्करिणी हो गयीं, यहाँ भी लहरोंके रूपमें आपसमें उनमें संघर्ष होता रहता है। जिस गर्दभको तुमने देखा, वह पूर्वजन्ममें महान् क्रोधी व्यक्ति था और हाथी पूर्वजन्ममें धर्मदूषक था। हे विप्र! मैंने तुम्हें सारी बातें बतला दीं। अब तुम अपने घर जाकर अनन्त-व्रत करो, तब मैं तुम्हें उत्तम नक्षत्रका पद प्रदान करूँगा। तुम स्वयं संसारमें पुत्र-पौत्रों एवं सुखको प्राप्तकर अन्तमें मोक्ष प्राप्त करोगे। ऐसा वर देकर भगवान् अन्तर्धान हो गये।
कौंडिन्यने भी घर आकर भक्तिपूर्वक अनन्तव्रतका पालन किया और अपनी पत्नी शीलाके साथ वे धर्मात्मा उत्तम सुख प्राप्तकर अन्तमें स्वर्गमें पुनर्वसु नामक नक्षत्रके रूपमें प्रतिष्ठित हुए। जो व्यक्ति इस व्रतको करता है या इस कथाको सुनता है, वह भी भगवान्के स्वरूपमें मिल जाता है।
(अध्याय १४)
श्रवणिकाव्रत-कथा एवं व्रत-विधि
राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! संसारमें श्रावणी नामकी जिन देवियोंका नाम सुना जाता है, वे कौन हैं और उनका क्या धर्म है तथा वे क्या करती हैं? इसे आप बतलानेकी कृपा करें।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—पाण्डवश्रेष्ठ! ब्रह्माने इन श्रावणी देवियोंकी रचना की है। संसारमें मानव जो कुछ भी शुभ अथवा अशुभ कर्म करता है, वे श्रावणी देवियाँ उस विषयकी सूचना शीघ्र
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- उत्तरपर्व *
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ही ब्रह्माको श्रवण कराती हैं, इसीलिये ये श्रावणी कही गयी हैं*। संसारके प्राणियोंका नियमन करनेके कारण वे पूज्य हैं। वे दूसरे ही जान-सुन-देख लेती हैं। कोई भी ऐसा कर्म नहीं है जो इनसे अदृश्य हो। इनमें ऐसी विलक्षण शक्ति है जो तर्क, हेतु आदिसे अगम्य है। जिस प्रकार देवता, विद्याधर, सिद्ध, गन्धर्व, किम्पुरुष आदि पूज्य एवं पुण्यप्रद हैं, उसी प्रकार ये श्रावणी देवियाँ भी वन्दनीय एवं पुण्यमयी हैं। स्त्री-पुरुषोंको इनकी प्रसन्नताके लिये व्रत करना चाहिये तथा जल, चन्दन, पुष्प, धूप, पक्का आदिसे इनकी पूजा करनी चाहिये और स्त्रियों तथा पुरुषोंको भोजन कराकर व्रतकी पारणा करनी चाहिये।
इनका व्रत न करनेसे मृत्यु-कष्ट होता है और यम-यातना सहन करनी पड़ती है। राजन्! इस विषयमें आपको एक आख्यान सुनाता हूँ—
प्राचीन कालमें नहुष नामके एक राजा थे। उनकी रानीका नाम 'जयश्री' था। वह अत्यन्त सुन्दर, शीलवती एवं पतिव्रता थी। एक बार गङ्गामें स्नान करके वह महर्षि वसिष्ठके समीपवर्ती आश्रममें गयी, वहाँ उसने देखा कि माता अरुन्धती मुनिपत्नियोंको विविध प्रकारका भोजन करा रही हैं। जयश्रीने उन्हें प्रणाम कर पूछा—'भगवति! आप यह कौन-सा व्रत कर रही हैं।' अरुन्धती बोली—'देवि! मैं श्रवणिकाव्रत कर रही हूँ। इस व्रतको मुझे महर्षि वसिष्ठने बताया है। यह व्रत अत्यन्त गुप्त और ब्रह्मर्षियोंका सर्वस्व है तथा कन्याओंके लिये श्रेष्ठ एवं उत्तम पति प्रदान करनेवाला है। तुम यहाँ ठहरो, मैं तुम्हारा आतिथ्य करूँगी' और उन्होंने वैसा ही किया। तदनन्तर जयश्री अपने नगरमें चली आयी। कुछ समय बाद वह
उस व्रतको तथा अरुन्धतीके भोजनको भूल गयी। समय आनेपर जब वह महासती मरणासन्न हुई तो उसके गलेमें धर्घराहट होने लगी, कण्ठ अवरुद्ध हो गया, मुखसे फेन एवं लार टपकने लगा। इस प्रकार दारुण कष्ट भोगते हुए उसे पंद्रह दिन व्यतीत हो गये। उसका मुख देखनेसे भय लगता था। सोलहवें दिन अरुन्धती जयश्रीके घर आयी और उन्होंने वैसी कष्टप्रद स्थितिमें उसे देखा। तब अरुन्धतीने राजा नहुषसे श्रवणिकाव्रतके विषयमें बतलाया। राजा नहुषने भी देवी अरुन्धतीके निर्देशानुसार जयश्रीके निमित्त तत्काल श्रवणिका-व्रतका आयोजन किया। उस व्रतके प्रभावसे जयश्रीने सुखपूर्वक मृत्युका वरण किया और इन्द्रलोकको प्राप्त किया।
श्रीकृष्णने पुनः कहा—राजन्! मार्गशीर्षसे कार्तिकतक द्वादश मासोंकी चतुर्दशी अथवा अष्टमी तिथियोंमें भक्तिपूर्वक यह व्रत करना चाहिये। प्रातःकाल नदी आदिमें स्नानकर पवित्र हो, श्रेष्ठ बारह ब्राह्मण-दम्पतियों अथवा अपने गोत्रमें उत्पन्न बारह दम्पतियोंको बुलाकर गन्ध, पुष्प, रोचना, वस्त्र, अलंकार, सिंदूर आदिसे उनका भक्तिपूर्वक पूजन करे। सुन्दर, सुडौल, अच्छिद्र, जलसे भरे हुए, सूत्रसे आवेशित तथा पुष्पमाला आदिसे विभूषित स्वर्णयुक्त बारह वर्धनियों (जलपूर्ण कलश)-को ब्राह्मणियोंके सामने पृथक्-पृथक् रखे। उनमेंसे मध्यकी एक वर्धनी उठाकर अपने सिरपर रखे और उन ब्राह्मणियोंसे बाल्यावस्था, कुमारावस्था तथा वृद्धावस्थामें किये गये पापोंके विनाश, सुखपूर्वक मृत्यु-प्राप्ति एवं संसार-सागरसे पार होने और भगवान्के परमपदको पानेके लिये प्रार्थना करे। वे ब्राह्मणियाँ भी कहें—'ऐसा ही
- गरुडपुराण, उत्तरखण्ड, अध्याय ७ में भी यह विषय विस्तारसे प्रतिपादित है। वहाँ इन्हें देवी न कहकर श्रवण नामका पुरुष देवता कहा गया है।
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
हो।' ब्राह्मणोंसे पापके विनाशके लिये प्रार्थना करे। ब्राह्मण उस वर्धनीको उसके सिरसे उतार लें और उसे आशीर्वाद प्रदान करें। उन सभी वर्धनियोंको ब्राह्मण-पत्नियोंको दे दे।
हे पार्थ! इस प्रकार इस श्रवणिकाव्रतको भक्तिपूर्वक करनेवाला सभी भोगोंका उपभोग कर सुखपूर्वक मृत्युका वरण करता है और उत्तम लोकको प्राप्त करता है। (अध्याय १५)
नक्त एवं शिवचतुर्दशी-व्रतकी विधि
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! अब आप नक्तव्रतका विधान सुनिये, जिसके करनेसे मनुष्य मुक्ति प्राप्त कर लेता है। किसी भी मासकी शुक्ल चतुर्दशीको ब्राह्मणको भोजन कराकर नक्तव्रत प्रारम्भ करना चाहिये। प्रत्येक मासमें दो अष्टमियाँ और दो चतुर्दशियाँ होती हैं। उस दिन भक्तिपूर्वक शिवजीका पूजन करे और उनके ध्यानमें तत्पर रहे। रात्रिके समय पृथ्वीको पात्र बनाकर उसीमें भोजन करे१। उपवाससे उत्तम भिक्षा, भिक्षासे उत्तम अयाचित-व्रत और अयाचित-व्रतसे भी उत्तम है नक्त-भोजन। इसलिये नक्तव्रत करना चाहिये। पूर्वाह्नमें देवता, मध्याह्नमें मुनिगण, अपराह्नमें पितर और सायंकालमें गुह्यक आदि भोजन करते हैं। इसलिये सबके बाद नक्त-भोजन करना चाहिये। नक्तव्रत करनेवाला पुरुष नित्य स्नान, स्वल्प हविष्यान्न-भोजन, सत्य-भाषण, नित्य-हवन और भूमिशयन करे। इस प्रकार एक वर्षतक व्रत करके अन्तमें घृतपूर्ण कलशके ऊपर भगवान् शिवकी मूर्तिकासे बनी प्रतिमा स्थापित करे। कपिला गौके पञ्चगव्यसे प्रतिमाको स्नान कराकर फल, पुष्प, यव, क्षीर, दधि, दूर्वाङ्गुर, तिल तथा चावल जलमें छोड़कर अष्टाङ्ग-अर्घ्य प्रदान करे। दोनों घुटनोंको पृथ्वीपर
रखकर पात्रको सिरतक उठाकर महादेवजीको अर्घ्य दे। अनन्तर अनेक प्रकारके भक्ष्य-भोज्य नैवेद्य निवेदित करे। एक उत्तम सवत्सा गौ और वृषभ वेदवेत्ता ब्राह्मणको दक्षिणासहित दे। इस व्रतको करनेवाला व्यक्ति दिव्य देह धारण कर उत्तम विमानमें बैठकर रुद्रलोकमें जाता है। वहाँ तीन सौ कोटि वर्षपर्यन्त सुख भोगकर इस लोकमें महान् राजा होता है। एक बार भी जो इस विधानसे नक्तव्रत कर श्रीसदाशिवका पूजन करता है, वह स्वर्गलोकको प्राप्त करता है।
भगवान् श्रीकृष्णने पुनः कहा—महाराज! अब मैं तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध शिवचतुर्दशीकी विधि बता रहा हूँ। यह माहेश्वरव्रत शिवचतुर्दशी नामसे प्रसिद्ध है२। इस व्रतमें मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीको एक बार भोजन करे और चतुर्दशीको निराहार रहकर पार्वतीसहित भगवान् शंकरकी गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदि उपचारोंसे पूजा करे। स्वर्णका वृषभ बनाकर उसकी भी पूजा करे। अनन्तर वह वृषभ तथा स्थापित जलपूर्ण कलश ब्राह्मणको प्रदान कर दे, विविध प्रकारके भक्ष्य पदार्थ भी दे और कहे—‘प्रियतां देवदेवोऽत्र सद्योजातः पिनाकधृक्।’ अनन्तर उत्तराभिमुख हो घृतका प्राशन कर भूमिपर शयन करे। प्रतिमासकी शुक्ल चतुर्दशीको यही
१-गया आदि तीर्थोंमें पृथ्वीपर ही भोजनपात्रके रूपमें थालियाँ बनी हुई हैं। पहले जैन, बौद्ध, भिक्षु, संन्यासी उन्हींमें या मिट्टीकी बनी थालियोंमें भोजन करते थे और कुछ लोग हाथमें लेकर भोजन करते थे। उन्हें करपात्री कहते थे। इसमें त्याग, व्रत, तपस्या और सहिष्णुता सब मिश्रित थी।
२-इस व्रतका वर्णन मत्स्य आदि पुराणोंमें भी प्राप्त होता है।
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- उत्तरपर्व *
४९७
विधान करे और मार्गशीर्ष आदि महीनोंमें शयनके समय इस प्रकार प्रार्थना करे—
शंकराय नमस्तुभ्यं नमस्ते करवीरक। त्र्यम्बकाय नमस्तुभ्यं महेश्वरमतः परम्॥ नमस्तेऽस्तु महादेव स्थाणवे च ततः परम्। नमः पशुपते नाथ नमस्ते शम्भवे नमः॥ नमस्ते परमानन्द नमः सोमार्धधारिणे। नमो भीमाय चोग्राय त्वामहं शरणं गतः॥
(उत्तरपर्व १७।१५—१७)
बारह महीनोंमें क्रमसे गोमूत्र, गोमय, दुग्ध, दधि, घृत, कुशोदक, पञ्चगव्य, बिल्ब, यवागू (यवकी काँजी), कमल तथा काले तिलका प्राशन करे और मन्दार, मालती, धतूर, सिंदुवार, अशोक, मल्लिका, कुब्जक, पाटल, अर्क-पुष्प, कदम्ब, रक्त अथवा नील कमल तथा कनेर— इन बारह पुष्पोंसे क्रमशः बारहों चतुर्दशियोंमें
उमामहेश्वरका पूजन करे। अनेक प्रकारके भोजन, वस्त्र, आभूषण, दक्षिणा आदि देकर ब्राह्मणोंको संतुष्ट कर नीले (कृष्ण) रंगका वृष छोड़े और एक गौ तथा एक वृष सुवर्णका बना करके आठ मोतियोंसे युक्त उत्तम शय्यापर स्थापित करे। जल-कुम्भ, शालि-चावल, घृत, दक्षिणासहित सब सामग्री वेद-व्रत-परायण, शान्तचित्त सपत्नीक ब्राह्मणोंको प्रदान कर दे। इस व्रतको जो पुरुष भक्तिपूर्वक करता है, उसके माता-पिताके भी सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और वह स्वयं हजार अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त करता है तथा दीर्घायु, ऐश्वर्य, आरोग्य, संतान एवं विद्या आदि प्राप्त करता है। बहुत दिनोंतक संसारका सुख भोगकर वह विष्णुलोकदिमें विहार करता हुआ अन्तमें शिवलोकको प्राप्त करता है।
(अध्याय १६-१७)
सर्वफलत्याग-चतुर्दशीव्रत
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—भारत! अब आप सर्वफलत्याग-चतुर्दशीव्रतका माहात्म्य सुनें। यह सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। इस व्रतका नियम मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशीको अथवा अन्य मासोंकी अष्टमीको ग्रहण करना चाहिये। उस दिन ब्राह्मणोंको पायस-भोजन कराकर दक्षिणा दे। इस व्रतका आरम्भ कर वर्षभर कोई निन्द्य फल-मूल तथा अठारह प्रकारके धान्य* भक्षण न करे। वर्षके अन्तमें चतुर्दशी अथवा अष्टमीके दिन सुवर्णके रुद्र एवं धर्मराजकी प्रतिमा बनाकर दो कलशोंके ऊपर स्थापित कर उनका पूजन करे। सोनेके सोलह कृष्णाण्ड और
मातुलुङ्ग, बैगन, कटहल, आम्र, आमड़ा, कैथ, कलिंग (तरबूज), ककड़ी, श्रीफल, वट, अश्वत्थ, जम्बीरी नींबू, केला, बेर तथा दाडिम (अनार)— ये फल बनवाये। मूली, आँवला, जामुन, कमलगट्टा, करौंदा, गूलर, नारियल, अंगूर, दो बनभंटा, कंकोल, काकमाची, खीरा, करील, कुटज तथा शमी— ये सोलह फल चाँदीके बनवाये और ताल, अगस्त्य, पिडार, खजूर, सूरण, कंदक, कटहल, लकुच, खेकसा, इमली, चित्रावल्ली, कूटशाल्मलिका, महुआ, कारवेल्ल, वल्ली तथा गुदपटोलक— ये सोलह फल ताँबेके बनवाये। इन फलोंका व्रतपर्यन्त भक्षण न करे अर्थात् इन फलोंके त्यागका व्रतमें
- ये अठारह धान्य—याज्ञवल्क्य-स्मृ १।२०८ की अपरार्क व्याख्या, व्याकरणमहाभाष्य ५।२।४, वाजसनेक संहिता १८।१२, दानमयूख तथा विधानपारिजात आदिके अनुसार इस प्रकार हैं—सावौ, धान, जौ, मूँग, तिल, अणु, (कैंगनी), उड़द, गेहूँ, कोदो, कुलथी, सतीन (छोटी मटर), सेम, आढ़की (अरहर) या मयुष्ट (उजली मटर), चना, कलाय, मटर, प्रियङ्गु (सरसों, राई या टॉगुन) और मसूर। अन्य मतसे मयुष्टादिकी जगह अतसी और नीवार ग्राह्य हैं।
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
संकल्प करे। व्रतकी पूर्णतापर धर्मराज एवं रुद्रकी प्रतिमा तथा स्वर्ण, रौप्य एवं ताप्रसे बनाये गये इन पलोंको वेदज्ञ, शान्त, सपत्नीक ब्राह्मणको भगवान्की प्रसन्नताके लिये प्रार्थनापूर्वक दान कर दे। सभी उपकरणोंसहित उत्तम शय्या, भूषण, दक्षिणा भी ब्राह्मणको देकर यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन कराये। स्वयं भी तैल-क्षारवर्जित भोजन करे। यदि सभी फलोंको न त्याग सके तो एक
ही फलका त्याग करे और सुवर्ण आदिका बनवाकर इसी विधानसे ब्राह्मणको दे। उन फलोंमें जितने परमाणु होते हैं, उतने हजार युग वर्षतक इस व्रतको करनेवाला व्यक्ति रुद्रलोकमें पूजित होता है। स्त्रियोंको भी यह व्रत करना चाहिये। इस व्रतके करनेवालोंको किसी जन्ममें इष्टका वियोग नहीं होता और अन्तमें वह स्वर्गमें निवास करता है। (अध्याय ९८)
पौर्णमासी-व्रत-विधान एवं अमावास्यामें श्राद्ध-तर्पणकी महिमा
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! पूर्णिमा चन्द्रमाकी प्रिय तिथि है। क्योंकि इसी दिन चन्द्रमा* सोलह कलाओंसे परिपूर्ण होते हैं। इसीलिये यह पौर्णमासी कही जाती है। इसी तिथिको चन्द्रमा तारासे बुध नामक पुत्रको प्राप्तकर अत्यन्त प्रसन्न हुए थे। यह पौर्णमासी तिथि सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली है। चन्द्रमाने स्वयं कहा है कि 'जो इस पूर्णिमा-तिथिमें भक्तिपूर्वक विधिवत् मेरी पूजा करेगा, मैं प्रसन्न होकर उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण कर दूँगा।' व्रतीको चाहिये कि पूर्णिमाके दिन प्रातः नदी आदिमें स्नान कर देवता और पितरोंका तर्पण करे। तदनन्तर घर आकर एक मण्डल बनाये और उसमें नक्षत्रोंसहित चन्द्रमाको अङ्कित कर श्वेत गन्ध, अक्षत, श्वेत पुष्प, धूप, दीप, घृतपक्व नैवेद्य तथा श्वेत वस्त्र आदि उपचारोंसे चन्द्रमाका पूजन कर उनसे क्षमा-प्रार्थना करे एवं सायंकाल इस मन्त्रसे चन्द्रमाको अर्घ्य प्रदान करे —
वसन्तबान्धव विभो शीतांशो स्वस्ति नः कुरु। गगनार्णवमाणिक्य चन्द्र दाक्षायणीपते ॥
(उत्तरपर्व ९९।५४)
अनन्तर रात्रिमें मौन होकर शाक एवं तिलीके चावलका भोजन करे। प्रत्येक मासकी पौर्णमासीको
इसी प्रकार उपवासपूर्वक चन्द्रमाकी पूजा करनी चाहिये। यदि कृष्ण पक्षकी अमावास्यामें कोई श्रद्धावान् व्यक्ति चन्द्रमाकी पूजा करना चाहे तो उसके लिये भी यही विधि बतलायी गयी है। इससे सभी अभीष्ट सुख प्राप्त होते हैं। अमावास्या तिथि पितरोंको अत्यन्त प्रिय है। इस दिन दान एवं तर्पण आदि करनेसे पितरोंको तृप्ति प्राप्त होती है। जो अमावास्याको उपवास करता है, उसे अक्षय-वटके नीचे श्राद्ध करनेका फल प्राप्त होता है। यह अक्षय-वट पितरोंके लिये उत्तम तीर्थ है। जो अमावास्याको अक्षय-वटमें पितरोंके उद्देश्यसे श्राद्धादि क्रिया करता है, वह पुण्यात्मा अपने इक्कीस कुलोंका उद्धार कर देता है। इस प्रकार एक वर्षपर्यन्त पूर्णिमा-व्रत करके नक्षत्रसहित चन्द्रमाकी सुवर्णकी प्रतिमा बना करके वस्त्राभूषण आदिसे उसका पूजन कर ब्राह्मणको दान कर दे। व्रती यदि इस व्रतको निरन्तर न कर सके तो एक पक्षके व्रतको ही करके उद्यापन कर ले। पार्थ! पौर्णमासी-व्रत करनेवाला व्यक्ति सभी पापोंसे मुक्त हो चन्द्रमाकी तरह सुशोभित होता है और पुत्र-पौत्र, धन, आरोग्य आदि प्राप्तकर बहुत कालतक सुख भोगकर अन्तसमयमें प्रयागमें प्राण त्यागकर
- मास शब्दका अर्थ चन्द्रमा होता है, हिन्दुओंके महीने अमावास्याको पूर्ण होते हैं।
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- उत्तरपर्व *
४९९
विष्णुलोकको जाता है। जो पुरुष पूर्णिमाको चन्द्रमाका पूजन और अमावास्याको पितृ-तर्पण, पिण्डदान
आदि करते हैं, वे कभी धन-धान्य-संतान आदिसे च्युत नहीं होते। (अध्याय ९९)
वैशाखी, कार्तिकी और माघी पूर्णिमाकी विधि
राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! संवत्सरमें कौन-कौन तिथियाँ स्नान-दान आदिमें अधिक पुण्यप्रद हैं। उनका आप वर्णन करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! वैशाख, कार्तिक और माघ—इन तीन महीनोंकी पूर्णिमाएँ स्नान-दान आदिके लिये अति श्रेष्ठ हैं। इन तिथियोंमें स्नान, दान आदि अवश्य करने चाहिये। इन तिथियोंमें तीर्थोंमें स्नान करे और यथाशक्ति दान दे। वैशाखीको उज्जयिनी (शिप्रा)-में, कार्तिकीको पुष्करमें और माघीको वाराणसी (गङ्गा)-में स्नान करना चाहिये। इस दिन जो पितरोंका तर्पण करता है, वह अनन्त फल पाता है और पितरोंका उद्धार करता है। वैशाख-पूर्णिमाको अन्न, सुवर्ण वस्त्रसहित जलपूर्ण कलश ब्राह्मणको दान करनेसे व्रती सर्वथा शोकमुक्त हो जाता है। इस व्रतमें सुन्दर मधुर भोजनसे परिपूर्ण पात्र, गौ, भूमि, सुवर्ण तथा वस्त्र आदिका दान करना चाहिये। माघ-पूर्णिमाको देवता और पितरोंका तर्पण कर सुवर्णसहित तिलपात्र, कम्बल, रूईके वस्त्र, कपास, रत्न आदि ब्राह्मणको दे। कार्तिक-पूर्णिमाको वृषोत्सर्ग करे। भगवान् विष्णुका नीराजन करे। हाथी, घोड़े, रथ और घृत-धेनु आदि दस धेनुओंका दान करे और केला, खजूर, नारियल, अनार, संतरा, ककड़ी, बैंगन, केरला, कुंदुरु, कृष्णाण्ड आदि फलोंका दान करे। इन पुण्य तिथियोंमें जो स्नान, दान आदि नहीं करते, वे जन्मान्तरमें रोगी और दरिद्री होते हैं। ब्राह्मणोंको
दान देनेका तो फल है ही, परंतु बहन, भानजे, बुआ आदिको तथा दरिद्र बन्धुओंको भी दान देनेसे बड़ा पुण्य होता है। मित्र, कुलीन व्यक्ति, विपत्तिसे पीड़ित व्यक्ति, दरिद्री और आशासे आये अतिथिको दान देनेसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है। राजन्! सीता और लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्र जब वन चले गये थे, उस समय भरतजी अपने ननिहालमें थे। इधर लोगोंने माता कौसल्याको उनके विषयमें सशंकित कर दिया कि श्रीरामके वन-गमनमें भरत ही मुख्य हेतु हैं। फिर जब वे ननिहालसे वापस आये और उन्हें सारी बातें ज्ञात हुईं तो उन्होंने माताको अनेक प्रकारसे समझाया और शपथ भी ली, पर माताको विश्वास न हुआ, किंतु जब भरतने कहा कि 'माँ! भगवान् श्रीरामके वन-गमनमें यदि मेरी सम्मति रही हो तो देवताओंद्वारा पूजित तथा अनेक पुण्योंको प्रदान करनेवाली वैशाख, कार्तिक तथा माघकी पूर्णिमाएँ मेरे बिना स्नान-दानके ही व्यतीत हों और मुझे निम्र गति प्राप्त हो।' इस महान् शपथको सुनते ही माताको विश्वास हो गया और उन्होंने भरतको अपने अङ्क में ले लिया तथा अनेक प्रकारसे आश्चस्त किया। महाराज! इन तीनों तिथियोंका सम्पूर्ण माहात्म्य कौन वर्णन कर सकता है। मैंने संक्षेपमें कहा है। इन तीनों तिथियोंको जल, अन्न, वस्त्र, स्वर्णपात्र, छत्र आदि दान करनेवाले पुरुष इन्द्रलोकको प्राप्त करते हैं। (अध्याय १००)
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५००
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
युगादि तिथियोंकी विधि
राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! आप उन तिथियोंका वर्णन करें, जिनमें स्वल्प भी किया गया स्नान, दान, जप आदि पुण्यकर्म अक्षय हो जाते हैं और महान् धर्म तथा शुभ फल प्राप्त होता है।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! मैं आपको अत्यन्त रहस्यकी बात बताता हूँ, जिसे आजतक मैंने किसीसे नहीं कहा था। वैशाख मासके शुक्ल पक्षकी तृतीया, कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी नवमी, भाद्रपद मासके कृष्ण पक्षकी त्रयोदशी और माघकी पूर्णिमा—ये चारों युगादि तिथियाँ हैं अर्थात् इन तिथियोंमें क्रमशः सत्य, त्रेता, द्वापर तथा कलि—चारों युगोंका प्रारम्भ हुआ है। इन तिथियोंको उपवास, तप, दान, जप, होम आदि करनेसे कोटि गुना पुण्य प्राप्त होता है। वैशाख शुक्ल तृतीयाको गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, वस्त्राभूषणादिसे लक्ष्मीसहित नारायणका पूजन कर सवत्सा लवण-धेनुका दान करना चाहिये। कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी नवमीको नदी, तङ्गा आदिमें स्नानकर पुष्प, धूप, नैवेद्य आदि उपचारोंसे उमाके साथ नीलकण्ठ भगवान् शंकरकी पूजा कर तिल-
धेनुका दान करना चाहिये। भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशीको पितृ-तर्पणकर शहद और घृतयुक्त अनेक प्रकारके पक्वानोंसे ब्राह्मण-भोजन कराये तथा दूध देनेवाली सुन्दर सुपुष्ट सवत्सा प्रत्यक्ष गौ ब्राह्मणोंको दान करना चाहिये। माघ-पूर्णिमाको गायत्रीसहित ब्रह्माजीका पूजन कर सुवर्ण, वस्त्र अनेक प्रकारके फलोंसहित नवनीत-धेनुका दान करना चाहिये।
राजन्! इस प्रकार दान करनेवालोंको तीनों लोकोंमें किसी वस्तुका अभाव नहीं होता। इन युगादि तिथियोंमें जो दान दिया जाता है वह अक्षय हो जाता है। निर्धन हो तो थोड़ा-थोड़ा ही दान करे, उसका भी अनन्त पुण्य प्राप्त होता है। वित्तेके अनुसार शय्या, आसन, छतरी, जूता, वस्त्र, सुवर्ण, भोजन आदि ब्राह्मणोंको देना चाहिये। इन तिथियोंमें यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन भी कराये। अनन्तर प्रसन्न-मनसे बन्धु-बान्धवोंके साथ मौन हो स्वयं भी भोजन करे। युगादि तिथियोंमें दान-पूजन आदि करनेसे कायिक, वाचिक और मानसिक सभी प्रकारके पाप नष्ट हो जाते हैं और दाता अक्षय स्वर्ग प्राप्त करता है। (अध्याय १०१)
सावित्री-व्रतकथा एवं व्रत-विधि
राजा युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! अब आप सावित्री-व्रतके विधानका वर्णन करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! सावित्री नामकी एक राजकन्याने वनमें जिस प्रकार यह व्रत किया था, स्त्रियोंके कल्याणार्थ मैं उस व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, उसे आप सुनें। प्राचीन कालमें मद्रदेश (पंजाब)-में एक बड़ा पराक्रमी, सत्यवादी, क्षमाशील, जितेन्द्रिय और प्रजापालनमें तत्पर
अश्वपति नामका राजा राज्य करता था, उसे कोई संतान न थी। इसलिये उसने सपत्नीक व्रतद्वारा सावित्रीकी आराधना की। कुछ कालके अनन्तर व्रतके प्रभावसे ब्रह्माजीकी पत्नी सावित्रीने प्रसन्न हो राजाको वर दिया कि 'राजन्! तुम्हें (मेरे ही अंशसे) एक कन्या उत्पन्न होगी।' इतना कहकर सावित्रीदेवी अन्तर्धान हो गयीं और कुछ दिन बाद राजाको एक दिव्य कन्या उत्पन्न हुई। वह
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- उत्तरपर्व *
५०१
सावित्रीदेवीके वरसे प्राप्त हुई थी, इसलिये राजाने उसका नाम सावित्री ही रखा। धीरे-धीरे वह विवाहके योग्य हो गयी। सावित्रीने भी भृगुके उपदेशसे सावित्री-व्रत किया।
एक दिन वह व्रतके अनन्तर अपने पिताके पास गयी और प्रणाम कर वहाँ बैठ गयी। पिताने सावित्रीको विवाहयोग्य जानकर अमात्योंसे उसके विवाहके विषयमें मन्त्रणा की; पर उसके योग्य किसी श्रेष्ठ वरको न देखकर पिता अश्वपतिने सावित्रीसे कहा—‘पुत्रि! तुम वृद्धजनों तथा अमात्योंके साथ जाकर स्वयं ही अपने अनुरूप कोई वर दूँद लो।’ सावित्री भी पिताकी आज्ञा स्वीकार कर मन्त्रियोंके साथ चल पड़ी। स्वल्प कालमें ही राजर्षियोंके आश्रमों, सभी तीर्थों और तपोवनोंमें घूमती हुई तथा वृद्ध ऋषियोंका अभिनन्दन करती हुई वह मन्त्रियोंसहित पुनः अपने पिताके पास लौट आयी। सावित्रीने देखा कि राजसभामें देवर्षि नारद बैठे हुए हैं। सावित्रीने देवर्षि नारद और पिताको प्रणामकर अपना वृत्तान्त इस प्रकार बताया—महाराज! शाल्वदेशमें घुमत्सेन नामके एक धर्मात्मा राजा हैं। उनके सत्यवान् नामक पुत्रका मैंने वरण किया है।’ सावित्रीकी बात सुनकर देवर्षि नारद कहने लगे—‘राजन्! इसने बाल्य-स्वभाववश उचित निर्णय नहीं लिया। यद्यपि घुमत्सेनका पुत्र सभी गुणोंसे सम्पन्न है, परंतु उसमें एक बड़ा भारी दोष है कि आजके ही दिन ठीक एक वर्षके बाद उसकी मृत्यु हो जायगी।’ देवर्षि नारदकी वाणी सुनकर राजाने सावित्रीसे किसी अन्य वरको दूँदनेके लिये कहा।
सावित्री बोली—‘राजाओंकी आज्ञा एक ही बार होती है। पण्डितजन एक ही बार बोलते हैं
और कन्या भी एक ही बार दी जाती है—ये तीनों बातें बार-बार नहीं होतीं। सत्यवान् दीर्घायु हो अथवा अल्पायु, निर्गुण हो या गुणवान्, मैंने तो उसका वरण कर ही लिया, अब मैं दूसरे पतिको कभी नहीं चुनूँगी। जो कहा जाता है, उसका पहले विचारपूर्वक मनमें निश्चय कर लिया जाता है और जो वचन कह दिया जाय, वही करना चाहिये। इसलिये मैंने जो मनमें निश्चय कर कहा है, मैं वही करूँगी।’ सावित्रीका ऐसा निश्चययुक्त वचन सुनकर नारदजीने कहा—‘राजन्! आपकी कन्याको यही अभीष्ट है तो इस कार्यमें शीघ्रता करनी चाहिये। आपका यह दान-कर्म निर्विघ्न सम्पन्न हो।’ इस तरह कहकर नारदमुनि स्वर्ग चले गये और राजाने भी शुभ मुहूर्तमें सावित्रीका सत्यवान्से विवाह कर दिया। सावित्री भी मनोवाञ्छित पति प्राप्तकर अत्यन्त प्रसन्न हुई। दोनों अपने आश्रममें सुखपूर्वक रहने लगे। परंतु नारदमुनिकी वाणी सावित्रीके हृदयमें खटकती रहती थी। जब वर्ष पूरा होनेको आया, तब सावित्रीने विचार किया कि अब मेरे पतिकी मृत्युका समय समीप आ गया है। यह सोचकर सावित्रीने भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीसे तीन रात्रिका व्रत ग्रहण कर लिया और वह भगवती सावित्रीका जप, ध्यान, पूजन करती रही। उसे यह निश्चय था कि आजसे चौथे दिन सत्यवान्की मृत्यु होगी। सावित्रीने तीन दिन-रात नियमसे व्यतीत किये। चौथे दिन देवता-पितरोंको संतुष्ट कर उसने अपने ससुर और सासके चरणोंमें प्रणाम किया।
सत्यवान् वनसे काष्ठ लाया करता था। उस दिन भी वह काष्ठ लेनेके लिये जाने लगा। सावित्री भी उसके साथ जानेको उद्यत हो गयी। इसपर
१-सकृजल्पन्ति राजानः सकृजल्पन्ति पण्डिताः। सकृत् प्रदीयते कन्या त्रीण्येतानि सकृत्सकृत् ॥ (उत्तरपर्व १०२। २९)
२-यह व्रत अन्य वचनोंके अनुसार ज्येष्ठ कृष्ण तथा शुक्ल द्वादशीसे पूर्णिमातक करनेकी परम्परा भी लोकमें प्रसिद्ध है।
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५०२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
सत्यवान्ने सावित्रीसे कहा—‘वनमें जानेके लिये अपने सास-ससुरसे पूछ लो।’ वह पूछने गयी। पहले तो सास-ससुरने मना किया, किंतु सावित्रीके बार-बार आग्रह करनेपर उन्होंने जानेकी आज्ञा दे दी। दोनों साथ-साथ वनमें गये। सत्यवान्ने वहाँ काष्ठ काटकर बोझ बाँधा, परंतु उसी समय उसके मस्तकमें महान् वेदना उत्पन्न हुई। उसने सावित्रीसे कहा—‘प्रिये! मेरे सिरमें बहुत व्यथा है, इसलिये थोड़ी देर विश्राम करना चाहता हूँ।’ सावित्री अपने पतिके सिरको अपनी गोदमें लेकर बैठ गयी। इतनेमें ही यमराज वहाँ आ गये। सावित्रीने उन्हें देखकर प्रणाम किया और कहा—‘प्रभो! आप देवता, दैत्य, गन्धर्व आदिमेंसे कौन हैं? मेरे पास क्यों आये हैं?’
धर्मराजने कहा—सावित्री! मैं सम्पूर्ण लोकोंका नियमन करनेवाला हूँ। मेरा नाम यम है। तुम्हारे पतिकी आयु समाप्त हो गयी है, परंतु तुम पतिव्रता हो, इसलिये मेरे दूत इसको न ले जा सके। अतः मैं स्वयं ही यहाँ आया हूँ। इतना कहकर यमराजने सत्यवान्के शरीरसे अङ्गुष्ठमात्रके पुरुषको खींच लिया और उसे लेकर अपने लोकको चल पड़े। सावित्री भी उनके पीछे चल पड़ी। बहुत दूर जाकर यमराजने सावित्रीसे कहा—‘पतिव्रते! अब तुम लौट जाओ। इस मार्गमें इतनी दूर कोई नहीं आ सकता।’
सावित्रीने कहा—महाराज! पतिके साथ आते हुए मुझे न तो ग्लानि हो रही है और न कुछ श्रम ही हो रहा है। मैं सुखपूर्वक चली आ रही हूँ। जिस प्रकार सज्जनोंकी गति संत हैं, वर्णाश्रमोंका आधार वेद है, शिष्योंका आधार गुरु और सभी प्राणियोंका आश्रय-स्थान पृथ्वी है, उसी प्रकार
स्त्रियोंका एकमात्र आश्रय-स्थान उसका पति ही है अन्य कोई नहीं*।
इस प्रकार सावित्रीके धर्म और अर्थयुक्त वचनोंको सुनकर यमराज प्रसन्न होकर कहने लगे—‘भामिनि! मैं तुमसे बहुत संतुष्ट हूँ, तुम्हें जो वर अभीष्ट हो वह माँग लो।’ तब सावित्रीने विनयपूर्वक पाँच वर माँगे—(१) मेरे ससुरके नेत्र अच्छे हो जायँ और उन्हें राज्य मिल जाय। (२) मेरे पिताके सौ पुत्र हो जायँ। (३) मेरे भी सौ पुत्र हों। (४) मेरा पति दीर्घायु प्राप्त करे तथा (५) हमारी सदा धर्ममें दृढ़ श्रद्धा बनी रहे। धर्मराजने सावित्रीको ये सारे वर दे दिये और सत्यवान्को भी दे दिया। सावित्री प्रसन्नतापूर्वक अपने पतिको साथ लेकर आश्रममें आ गयी। भाद्रपदकी पूर्णिमाको जो उसने सावित्री-व्रत किया था, यह सब उसीका फल है।
युधिष्ठिरने पुनः कहा—भगवन्! अब आप सावित्री-व्रतकी विधि विस्तारपूर्वक बतलायें।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! सौभाग्यकी इच्छावाली स्त्रीको भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीको पवित्र होकर तीन दिनके लिये सावित्री-व्रतका नियम ग्रहण करना चाहिये। यदि तीन दिन उपवास रहनेकी शक्ति न हो तो त्रयोदशीको नक्तव्रत, चतुर्दशीको अयाचित-व्रत और पूर्णिमाको उपवास करे। सौभाग्यकी कामनावाली नारी नदी, तड़ाग आदिमें नित्य-स्नान करे और पूर्णिमाको सरसोंका उबटन लगाकर स्नान करे।
यथाशक्ति मिट्टी, सोने या चाँदीकी ब्रह्मासहित सावित्रीकी प्रतिमा बनाकर बाँसके एक पात्रमें स्थापित करे और दो रक्त वर्णके वस्त्रोंसे उसे आच्छादित करे। फिर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप,
- सतां सन्तो गतिर्नान्या स्त्रीणां भर्ता सदा गतिः । वेदो वर्णाश्रमाणां च शिष्याणां च गतिर्गुरुः ॥
सर्वेषामेव जन्तूनां स्थानमस्ति महीतलम् । भर्तार एव मनुजस्त्रीणां नान्यः समाश्रयः ॥ (उत्तरपर्व १०२।५५-५६)
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