भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
पुरुषोंके शुभाशुभ लक्षण
राजा शतानीकने पूछा—विप्रेन्द्र! स्त्री और पुरुषके जो लक्षण कार्तिकेयने बनाये थे और जिस ग्रन्थको क्रोधमें आकर भगवान् शिवने समुद्रमें फेंक दिया था, वह कार्तिकेयको पुनः प्राप्त हुआ या नहीं? इसे आप मुझे बतायें।
सुमन्तु मुनिने कहा—राजेन्द्र! कार्तिकेयने स्त्री-पुरुषका जैसा लक्षण कहा है, वैसा ही मैं कह रहा हूँ। व्योमकेश भगवान्के सुपुत्र कार्तिकेयने जब अपनी शक्तिके द्वारा क्रौंचपर्वतको विदीर्ण किया, उस समय ब्रह्माजी उनपर प्रसन्न हो उठे। उन्होंने कार्तिकेयसे कहा कि हम तुमपर प्रसन्न हैं, जो चाहो वह वर मुझसे माँग लो। उस तेजस्वी कुमार कार्तिकेयने नतमस्तक होकर उन्हें प्रणाम किया और कहा कि विभो! स्त्री-पुरुषके विषयमें मुझे अत्यधिक कौतूहल है। जो लक्षण-ग्रन्थ पहले मैंने बनाया था उसे तो पिता देवदेवेश्वरने क्रोधमें आकर समुद्रमें फेंक दिया। वह मुझे भूल भी गया है। अतः उसको सुननेकी मेरी इच्छा है। आप कृपा करके उसीका वर्णन करें।
ब्रह्माजी बोले—तुमने अच्छी बात पूछी है। समुद्रने जिस प्रकारसे उन लक्षणोंको कहा है, उसी प्रकार मैं तुम्हें सुना रहा हूँ। समुद्रने स्त्री-पुरुषोंके उत्तम, मध्यम तथा अधम—तीन प्रकारके लक्षण बतलाये हैं।
शुभाशुभ लक्षण देखनेवालेको चाहिये कि वह शुभ मुहूर्तमें मध्याह्नेके पूर्व पुरुषके लक्षणोंको देखे। प्रमाणसमूह, छायागति, सम्पूर्ण अङ्ग, दाँत, केश, नख, दाढ़ी-मूँछका लक्षण देखना चाहिये। पहले आयुकी परीक्षा करके ही लक्षण बताने चाहिये। आयु कम हो तो सभी लक्षण व्यर्थ हैं। अपनी अङ्गुलियोंसे जो पुरुष एक सौ आठ यानी चार
हाथ बारह अङ्गुलका होता है, वह उत्तम होता है। सौ अङ्गुलका होनेपर मध्यम और नब्बे अङ्गुलका होनेपर अधम माना जाता है—लम्बाईके प्रमाणका यही लक्षण आचार्य समुद्रने कहा है।
हे कुमार! अब मैं पुरुषके अङ्गोंका लक्षण कहता हूँ। जिसका पैर कोमल, मांसल, रक्तवर्ण, स्निग्ध, ऊँचा, पसीनेसे रहित और नाड़ियोंसे व्याप्त न हो अर्थात् नाड़ियाँ दिखायी नहीं पड़ती हों तो वह पुरुष राजा होता है। जिसके पैरके तलवेमें अंकुशका चिह्न हो, वह सदा सुखी रहता है। कछुवेके समान ऊँचे चरणवाला, कमलके सदृश कोमल और परस्पर मिली हुई अङ्गुलियोंवाला, सुन्दर पार्धि—एडीसे युक्त, निगूढ टखनेवाला, सदा गर्म रहनेवाला, प्रस्वेदशून्य, रक्तवर्णके नखोंसे अलंकृत चरणवाला पुरुष राजा होता है। सूर्यके समान रूखा, सफेद नखोंसे युक्त, टेढ़ी-रूखी नाड़ियोंसे व्याप्त, विरल अङ्गुलियोंसे युक्त चरणवाले पुरुष दरिद्र और दुःखी होते हैं। जिसका चरण आगमें पकायी गयी मिट्टीके समान वर्णका होता है, वह ब्रह्महत्या करनेवाला, पीले चरणवाला अगम्या-गमन करनेवाला, कृष्णवर्णके चरणवाला मद्यपान करनेवाला तथा श्वेतवर्णके चरणवाला अभक्ष्य पदार्थ भक्षण करनेवाला होता है। जिस पुरुषके पैरोंके अँगूठे मोटे होते हैं वे भाग्यहीन होते हैं। विकृत अँगूठेवाले सदा पैदल चलनेवाले और दुःखी होते हैं। चिपटे, विकृत तथा टूटे हुए अँगूठेवाले अतिशय निन्दित होते हैं एवं टेढ़े, छोटे और फटे हुए अँगूठेवाले कष्ट भोगते हैं। जिस पुरुषके पैरकी तर्जनी अँगुली अँगूठेसे बड़ी हो, उसको स्त्री-सुख प्राप्त होता है। कनिष्ठा अँगुलीके बड़ी होनेपर स्वर्णकी प्राप्ति होती है। चपटी, विरल, सूखी अँगुली होनेपर पुरुष धनहीन
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- ब्राह्मपर्व *
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होता है और सदा दुःख भोगता है। रूक्ष और श्वेत नख होनेपर दुःखकी प्राप्ति होती है। खराब नख होनेपर पुरुष शीलरहित और कामभोगरहित होता है। रोमसे युक्त जंघा होनेपर भाग्यहीन होता है। जंघे छोटे होनेपर ऐश्वर्य प्राप्त होता है, किंतु बन्धनमें रहता है। मृगके समान जंघा होनेपर राजा होता है। लम्बी, मोटी तथा मांसल जंघावाला ऐश्वर्य प्राप्त करता है। सिंह तथा बाघके समान जंघावाला धनवान् होता है। जिसके घुटने मांसरहित होते हैं, वह विदेशमें मरता है, विकट जानु होनेपर दरिद्र होता है। नीचे घुटने होनेपर स्त्री-जित होता है और मांसल जानु होनेपर राजा होता है। हंस, भास पक्षी, शुक्र, वृष, सिंह, हाथी तथा अन्य श्रेष्ठ पशु-पक्षियोंके समान गति होनेपर व्यक्ति राजा अथवा भाग्यवान् होता है। ये आचार्य समुद्रके वचन हैं, इनमें संदेह नहीं है।
जिस पुरुषका रक्त कमलके समान होता है वह धनवान् होता है। कुछ लाल और कुछ काला रुधिरवाला मनुष्य अधम और पापकर्मको करनेवाला होता है। जिस पुरुषका रक्त मूँगेके समान रक्त और स्निग्ध होता है, वह सात द्वीपोंका राजा होता है। मृग अथवा मोरके समान पेट होनेपर उत्तम पुरुष होता है। बाघ, मेढक और सिंहके समान पेट होनेपर राजा होता है। मांससे पुष्ट, सीधा और गोल पार्श्ववाला व्यक्ति राजा होता है। बाघके समान पीठवाला व्यक्ति सेनापति होता है। सिंहके समान लम्बी पीठवाला व्यक्ति बन्धनमें पड़ता है। कछुवेके समान पीठवाला पुरुष धनवान् तथा सौभाग्य-सम्पन्न होता है। चौड़ा, मांससे पुष्ट और रोमयुक्त वक्षःस्थलवाला पुरुष, शतायु, धनवान् और उत्तम भोगोंको प्राप्त करता है। सूखी, रूखी, विरल हाथकी अँगुलियोंवाला पुरुष धनहीन और सदा दुःखी रहता है।
जिसके हाथमें मत्स्यरेखा होती है, उसका कार्य सिद्ध होता है और वह धनवान् तथा पुत्रवान् होता है। जिसके हाथमें तुला अथवा वेदीका चिह्न होता है, वह पुरुष व्यापारमें लाभ करता है। जिसके हाथमें सोमलताका चिह्न होता है, वह धनी होता है और यज्ञ करता है। जिसके हाथमें पर्वत और वृक्षका चिह्न होता है, उसकी लक्ष्मी स्थिर होती है और वह अनेक सेवकोंका स्वामी होता है। जिसके हाथमें बछी, बाण, तोमर, खड्ग और धनुषका चिह्न होता है, वह युद्धमें विजयी होता है। जिसके हाथमें ध्वजा और शङ्खका चिह्न होता है, वह जहाजसे व्यापार करता है और धनवान् होता है। जिसके हाथमें श्रीवत्स, कमल, वज्र, रथ और कलशका चिह्न होता है, वह शत्रुरहित राजा होता है। दाहिने हाथके अँगूठेमें यवका चिह्न रहनेपर पुरुष सभी विद्याओंका ज्ञाता तथा प्रवक्ता होता है। जिस पुरुषके हाथमें कनिष्ठाके नीचेसे तर्जनीके मध्यतक रेखा चली जाती है और बीचमें अलग नहीं रहती है तो वह पुरुष सौ वर्षोंतक जीवित रहता है। जिसका पेट साँपके समान लम्बा होता है वह दरिद्री और अधिक भोजन करनेवाला होता है। विस्तीर्ण, फैली हुई, गम्भीर और गोल नाभिवाला व्यक्ति सुख भोगनेवाला और धन-धान्यसे सम्पन्न होता है। नीची और छोटी नाभिवाला व्यक्ति विविध क्लेशोंको भोगनेवाला होता है। बलिके नीचे नाभि हो और वह विषम हो तो धनकी हानि होती है। दक्षिणवर्त नाभि बुद्धि प्रदान करती है और वामावर्त नाभि शान्ति प्रदान करती है। सौ दलोंवाले कमलकी कर्णिकाके समान नाभिवाला पुरुष राजा होता है। पेटमें एक बलि होनेपर शस्त्रसे मारा जाता है, दो बलि होनेपर स्त्री-भोगी होता है, तीन बलि होनेपर राजा अथवा आचार्य होता है। चार बलि होनेपर
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
अनेक पुत्र होते हैं, सीधी बलि होनेपर धनका उपभोग करता है।
जिनके स्कन्ध कठोर एवं मांसल तथा समान हों वे राजा होते हैं और सुखी रहते हैं। जिसका वक्षःस्थल बराबर, उन्नत, मांसल और विस्तृत होता है वह राजाके समान होता है। इसके विपरीत कड़े रोमवाले तथा नसें दिखायी पड़नेवाले वक्षःस्थल प्रायः निर्धनोके ही होते हैं। दोनों वक्षःस्थल समान होनेपर पुरुष धनवान् होता है, पुष्ट होनेपर शूरवीर होता है, छोटे होनेपर धनहीन तथा छोटा-बड़ा होनेपर अर्किंचन होता है और शस्त्रसे मारा जाता है। विषम हनुवाला धनहीन तथा उन्नत हनु (टुट्टी)- वाला भोगी होता है। चिपटी ग्रीवावाला धनहीन होता है। महिषके समान ग्रीवावाला शूरवीर होता है। मृगके समान ग्रीवावाला डरपोक होता है। समान ग्रीवावाला राजा होता है। तोता, ऊँट, हाथी और बगुलेके समान लम्बी तथा शुष्क ग्रीवावाला धनहीन होता है। छोटी ग्रीवावाला धनवान् और सुखी होता है। पुष्ट, दुर्गन्धरहित, सम एवं थोड़े रोमोंसे युक्त काँखवाले धनी होते हैं, जिसकी भुजाएँ ऊपरको खिंची रहती हैं, वह बन्धनमें पड़ता है। छोटी भुजा रहनेपर दास होता है, छोटी-बड़ी भुजा होनेपर चोर होता है, लम्बी भुजा होनेपर सभी गुणोंसे युक्त होता है और जानुओंतक लम्बी भुजा होनेपर राजा होता है। जिसके हाथका तल गहरा होता है उसे पिताका धन नहीं प्राप्त होता, वह डरपोक होता है। ऊँचे करतलवाला पुरुष दानी, विषम करतलवाला पुरुष मिश्रित फलवाला, लाखके समान रक्तवर्णवाला करतल होनेपर राजा होता है। पीले करतलवाला पुरुष अगम्यागमन करनेवाला, काला और नीला करतलवाला मद्यादि द्रव्योंका पान करनेवाला होता है। रूखे करतलवाला पुरुष निर्धन होता है।
जिनके हाथकी रेखाएँ गहरी और स्निग्ध होती हैं वे धनवान् होते हैं। इसके विपरीत रेखावाले दरिद्र होते हैं। जिनकी अँगुलियाँ विरल होती हैं, उनके पास धन नहीं ठहरता और गहरी तथा छिद्रहीन अँगुली रहनेपर धनका संचयी रहता है।
ब्रह्माजी पुनः बोले— कार्तिकेय! चन्द्रमण्डलके समान मुखवाला व्यक्ति धर्मात्मा होता है और जिसका मुख सँडकी आकृतिका होता है वह भाग्यहीन होता है। टेढ़ा, टूटा हुआ, विकृत और सिंहके समान मुखवाला चोर होता है। सुन्दर और कान्तियुक्त श्रेष्ठ हाथीके समान भरा हुआ सम्पूर्ण मुखवाला व्यक्ति राजा होता है। बकरे अथवा बंदरके समान मुखवाला व्यक्ति धनी होता है। जिसका मुख बड़ा होता है उसका दुर्भाग्य रहता है। छोटा मुखवाला कृपण, लम्बा मुखवाला धनहीन और पापी होता है। चौखूँटा मुखवाला धूर्त, स्त्रीके मुखके समान मुखवाला और निम्न मुखवाला पुरुष पुत्रहीन होता है या उसका पुत्र उत्पन्न होकर नष्ट हो जाता है। जिसके कपोल कमलके दलके समान कोमल और कान्तिमान् होते हैं, वह धनवान् एवं कृषक होता है। सिंह, बाघ और हाथीके समान कपोलवाला व्यक्ति विविध भोग-सम्पत्तियोंवाला और सेनाका स्वामी होता है। जिसका नीचेका ओठ रक्तवर्णका होता है, वह राजा होता है और कमलके समान अधरवाला धनवान् होता है। मोटा और रूखा हाँठ होनेपर दुःखी होता है।
जिसके कान मांसरहित हों वह संग्राममें मारा जाता है। चिपटा कान होनेपर रोगी, छोटा होनेपर कृपण, शङ्कुके समान कान होनेपर राजा, नाड़ियोंसे व्यास होनेपर क्रूर, केशोंसे युक्त होनेपर दीर्घजीवी, बड़ा, पुष्ट तथा लम्बा कान होनेपर भोगी तथा देवता और ब्राह्मणकी पूजा करनेवाला एवं राजा होता है। जिसकी नाक शुक्लकी चोंचके समान हो
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- ब्राह्मपर्व *
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वह सुख भोगनेवाला और शुष्क नाकवाला दीर्घजीवी होता है। पतली नाकवाला राजा, लम्बी नाकवाला भोगी, छोटी नाकवाला धर्मशील, हाथी, घोड़ा, सिंह या सूर्यकी भाँति तीखी नाकवाला व्यापारमें सफल होता है। कुन्द-पुष्पकी कलीके समान उज्ज्वल दाँतवाला राजा तथा हाथीके समान दाँतवाला एवं चिकने दाँतवाला गुणवान् होता है। भालू और बंदरके समान दाँतवाले नित्य भूखसे व्याकुल रहते हैं। कराल, रूखे, अलग-अलग और फूटे हुए दाँतवाले दुःखसे जीवन व्यतीत करनेवाले होते हैं। बत्तीस दाँतवाले राजा, एकतीस दाँतवाले भोगी, तीस दाँतवाले सुख-दुःख भोगनेवाले तथा उनतीस दाँतवाले पुरुष दुःख ही भोगते हैं। काली या चित्रवर्णकी जीभ होनेपर व्यक्ति दासवृत्तिसे जीवन व्यतीत करता है। रूखी और मोटी जीभवाला क्रोधी, श्वेतवर्णकी जीभवाला पवित्र आचरणसे सम्पन्न होता है। निम्न, स्निग्ध, अग्रभाग रक्तवर्ण और छोटी जिह्वावाला विद्वान् होता है। कमलके पतेके समान पतली, लम्बी न बहुत मोटी और न बहुत चौड़ी जिह्वा रहनेपर राजा होता है। काले रंगका तालुवाला अपने कुलका नाशक, पीले तालुवाला सुख-दुःख भोग करनेवाला, सिंह और हाथीके तालुके समान तथा कमलके समान तालुवाला राजा होता है, श्वेत तालुवाला धनवान् होता है। रूखा, फटा हुआ तथा विकृत तालुवाला मनुष्य अच्छा नहीं माना जाता।
हंसके समान स्वरवाले तथा मेघके समान गम्भीर स्वरवाले पुरुष धन्य माने गये हैं। क्राँचके समान स्वरवाले राजा, महान् धनी तथा विविध सुखोंका भोग करनेवाले होते हैं। चक्रवाकके समान जिनका स्वर होता है ऐसे व्यक्ति धन्य तथा धर्मवत्सल राजा होते हैं। घड़े एवं दुन्दुभिके समान स्वरवाले पुरुष राजा होते हैं। रूखे, ऊँचे, क्रूर,
पशुओंके समान तथा घर्घरयुक्त स्वरवाले पुरुष दुःखभागी होते हैं। नीलकण्ठ पक्षीके समान स्वरवाले भाग्यवान् होते हैं। फूटे काँसेके बर्तनके समान तथा टूटे-फूटे स्वरवाले अधम कहे गये हैं।
दाड़िमके पुष्पके समान नेत्रवाला राजा, व्याघ्रके समान नेत्रवाला क्रोधी, केकड़ेके समान आँखवाला झगड़ालू, बिल्ली और हंसके समान नेत्रवाला पुरुष अधम होता है। मयूर एवं नकुलके समान आँखवाले मध्यम माने जाते हैं। शहदके समान पिङ्गल वर्णके नेत्रवालेको लक्ष्मी कभी भी त्याग नहीं करती। गोरोचन, गुंजा और हरतालके समान पिङ्गल नेत्रवाला बलवान् और धनेश्वर होता है। अर्धचन्द्रके समान ललाट होनेपर राजा होता है। बड़ा ललाट होनेपर धनवान् होता है। छोटा ललाट होनेपर धर्मात्मा होता है। ललाटके बीच जिस स्त्री तथा पुरुषके पाँच आड़ी रेखा होती है वह सौ वर्षोंतक जीवित रहता है और ऐश्वर्य भी प्राप्त करता है। चार रेखा होनेपर अस्सी वर्ष, तीन रेखा होनेपर सत्तर वर्ष, दो रेखा होनेपर साठ वर्ष, एक रेखा होनेपर चालीस वर्ष और एक भी रेखा न होनेपर पचीस वर्षकी आयुवाला होता है। इन रेखाओंके द्वारा हीन, मध्यम और पूर्ण आयुकी परीक्षा करनी चाहिये। छोटी रेखा होनेपर व्याधियुक्त तथा अल्पायु और लम्बी-लम्बी रेखाएँ होनेपर दीर्घायु होता है। जिसके ललाटमें त्रिशूल अथवा पट्टिशका चिह्न होता है, वह बड़ा प्रतापी, कीर्तिसम्पन्न राजा होता है। छत्रके समान सिर होनेपर राजा, लम्बा सिर होनेपर दुःखी, दरिद्र, विषम होनेपर समान तथा गोल सिर होनेपर सुखी, हाथीके समान सिर होनेपर राजाके समान होता है। जिनके केश अथवा रोम मोटे, रूखे, कपिल और आगेसे फटे हुए होते हैं, वे अनेक प्रकारके दुःख भोगते हैं। बहुत गहरे और कठोर केश दुःखदायी होते
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
हैं। विरल, स्निग्ध, कोमल, भ्रमर अथवा अंजनके समान अतिशय कृष्ण केशवाला पुरुष अनेक
प्रकारके सुखका भोग करता है और राजा होता है। (अध्याय २४—२६)
राजपुरुषोंके लक्षण
कार्तिकेयजीने कहा—ब्रह्मन्! आप राजाओंके शरीरके अङ्गोंके लक्षणोंको बतानेकी कृपा करें।
ब्रह्माजी बोले—मैं मनुष्योंमें राजाओंके अङ्गोंके लक्षणोंको संक्षेपमें बताता हूँ। यदि ये लक्षण साधारण पुरुषोंमें भी प्रकट हों तो वे भी राजाके समान होते हैं, इन्हें आप सुनें—
जिस पुरुषके नाभि, स्वर और संधिस्थान—ये तीन गम्भीर हों, मुख, ललाट और वक्षःस्थल—ये तीन विस्तीर्ण हों, वक्षःस्थल, कक्ष, नासिका, नख, मुख और कृकाटिका—ये छः उन्नत अर्थात् ऊँचे हों, उपस्थ, पीठ, ग्रीवा और जंघा—ये चार ह्रस्व हों, नेत्रोंके प्रान्त, हाथ, पैर, तालु, ओष्ठ, जिह्वा तथा नख—ये सात रक्तवर्णके हों, हनु, नेत्र, भुजा, नासिका तथा दोनों स्तनोंका अन्तर—ये पाँच दीर्घ हों और दन्त, केश, अङ्गुलियोंके पर्व, त्वचा तथा नख—ये पाँच सूक्ष्म हों, वह सप्तद्वीपवती पृथ्वीका राजा होता है। जिसके नेत्र कमलदलके समान और अन्तमें रक्तवर्णके होते हैं, वह लक्ष्मीका स्वामी होता है। शहदके समान पिङ्गल नेत्रवाला पुरुष महात्मा होता है। सूखी आँखवाला डरपोक, गोल और चक्रके समान घूमनेवाली आँखवाला चोर, केकड़ेके समान आँखवाला क्रूर होता है। नील कमलके समान नेत्र होनेपर विद्वान्, श्यामवर्णके नेत्र होनेपर सौभाग्यशाली, विशाल नेत्र होनेपर भाग्यवान्, स्थूल नेत्र होनेपर राजमन्त्री और दीन
नेत्र होनेपर दरिद्र होता है। भौंहें विशाल होनेपर सुखी, ऊँची होनेपर अल्पायु और विषम या बहुत लम्बी होनेपर दरिद्र और दोनों भौंहोंके मिले हुए होनेपर धनहीन होता है। मध्यभागमें नीचेकी ओर झुकी भौंहवाले परदाराभिगामी होते हैं। बालचन्द्रकलाके समान भौंहें होनेपर राजा होता है। ऊँचा और निर्मल ललाट होनेपर उत्तम पुरुष होता है, नीचा ललाट होनेपर स्तुति किया जानेवाला और धनसे युक्त होता है, कहीं ऊँचा और कहीं नीचा ललाट होनेपर दरिद्र तथा सीपके समान ललाट होनेपर आचार्य होता है। स्निग्ध, हास्ययुक्त और दीनतासे रहित मुख शुभ होता है, दैन्यभावयुक्त तथा आँसुओंसे युक्त आँखोंवाला एवं रूखे चेहरेवाला श्रेष्ठ नहीं है। उत्तम पुरुषका हास्य कम्पनरहित धीरे-धीरे होता है। अधम व्यक्ति बहुत शब्दके साथ हँसता है। हँसते समय आँखको मूँदनेवाला व्यक्ति पापी होता है। गोल सिरवाला पुरुष अनेक गौओंका स्वामी तथा चिपटा सिरवाला माता-पिताको मारनेवाला होता है। घण्टेकी आकृतिके समान सिरवाला सदा कहीं-न-कहीं यात्रा करता रहता है। निम्न सिरवाला अनेक अनर्थोंको करनेवाला होता है।
इस प्रकार पुरुषोंके शुभ और अशुभ लक्षणोंके मैंने आपसे कहा। अब स्त्रियोंके लक्षण बतलात हूँ। (अध्याय २७)
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- ब्राह्मपर्व *
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स्त्रियोंके शुभाशुभ लक्षण
ब्रह्माजी बोले—कार्तिकेय ! स्त्रियोंके जो लक्षण मैंने पहले नारदजीको बतलाये थे, उन्हीं शुभाशुभ लक्षणोंको बताता हूँ। आप सावधान होकर सुनें—शुभ मुहूर्तमें कन्याके हाथ, पैर, अँगुली, नख, हाथकी रेखा, जंघा, कटि, नाभि, ऊरु, पेट, पीठ, भुजा, कान, जिह्वा, ओठ, दाँत, कपोल, गला, नेत्र, नासिका, ललाट, सिर, केश, स्वर, वर्ण और भौरी—इन सबके लक्षण देखे।
जिसकी ग्रीवामें रेखा हो और नेत्रोंका प्रान्तभाग कुछ लाल हो, वह स्त्री जिस घरमें जाती है, उस घरकी प्रतिदिन वृद्धि होती है। जिसके ललाटमें त्रिशूलका चिह्न होता है, वह कई हजार दासियोंकी स्वामिनी होती है। जिस स्त्रीकी राजहंसके समान गति, मृगके समान नेत्र, मृगके समान ही शरीरका वर्ण, दाँत बराबर और श्वेत होते हैं, वह उत्तम स्त्री होती है। मेढकके समान कुक्षिवाली एक ही पुत्र उत्पन्न करती है और वह पुत्र राजा होता है। हंसके समान मृदु वचन बोलनेवाली, शहदके समान पिङ्गल वर्णवाली स्त्री धन-धान्यसे सम्पन्न होती है, उसे आठ पुत्र होते हैं। जिस स्त्रीके लम्बे कान, सुन्दर नाक और भौंह धनुषके समान टेढ़ी होती है, वह अतिशय सुखका भोग करती है। तन्वी, श्यामवर्णा, मधुरभाषिणी, शङ्खुके समान अतिशय स्वच्छ दाँतोंवाली, स्निग्ध अङ्गोंसे समन्वित स्त्री अतिशय ऐश्वर्यको प्राप्त करती है। विस्तीर्ण जंघाओंवाली, वेदीके समान मध्यभागवाली, विशाल नेत्रोंवाली स्त्री रानी होती है। जिस स्त्रीके वाम स्तनपर, हाथमें, कानमें ऊपर या गलेपर तिल अथवा मसा होता है, उस स्त्रीको प्रथम पुत्र उत्पन्न होता है। जिस स्त्रीका पैर रक्तवर्ण हो, ठेहुने बहुत ऊँचे न हों, छोटी एड़ी हो, परस्पर मिली हुई सुन्दर अँगुलियाँ हों, लाल नेत्र हों—
ऐसी स्त्री अत्यन्त सुख भोग करती है। जिसके पैर बड़े-बड़े हों, सभी अङ्गोंमें रोम हों, छोटे और मोटे हाथ हों, वह दासी होती है। जिस स्त्रीके पैर उत्कट हों, मुख विकृत हो, ऊपरके ओठके ऊपर रोम हो वह शीघ्र अपने पतिको मार देती है। जो स्त्री पवित्र, पतिव्रता, देवता, गुरु और ब्राह्मणोंकी भक्त होती है, वह मानुषी कहलाती है। नित्य स्नान करनेवाली, सुगन्धित द्रव्य लगानेवाली, मधुर वचन बोलनेवाली, थोड़ा खानेवाली, कम सोनेवाली और सदा पवित्र रहनेवाली स्त्री देवता होती है। गुरुरूपसे पाप करनेवाली, अपने पापको छिपानेवाली, अपने हृदयके अभिप्रायको किसीके आगे प्रकट न करनेवाली स्त्री माजारी-संज्ञक होती है। कभी हँसनेवाली, कभी क्रौडा करनेवाली, कभी क्रोध करनेवाली, कभी प्रसन्न रहनेवाली तथा पुरुषोंके मध्य रहनेवाली स्त्री गर्दभी-श्रेणीकी होती है। पति और बान्धवोंके द्वारा कहे गये हितकारी वचनको न माननेवाली, अपनी इच्छाके अनुसार विहार करनेवाली स्त्री आसुरी कही जाती है। बहुत खानेवाली, बहुत बोलनेवाली, खोटे वचन बोलनेवाली, पतिको मारनेवाली स्त्री राक्षसी-संज्ञक होती है। शौच, आचार और रूपसे रहित, सदा मलिन रहनेवाली, अतिशय भयंकर स्त्री पिशाची कहलाती है। अतिशय चञ्चल स्वभाववाली, चपल नेत्रोंवाली, इधर-उधर देखनेवाली, लोभी नारी वानरी-संज्ञक होती है। चन्द्रमुखी, मदमत्त हाथीके समान चलनेवाली, रक्तवर्णके नखोंवाली, शुभ लक्षणोंसे युक्त हाथ-पैरवाली स्त्री विद्याधरी-श्रेणीकी होती है। वीणा, मृदङ्ग, वंशी आदि वाद्योंके शब्दोंको सुनने तथा पुष्पों और विविध सुगन्धित द्रव्योंमें अभिरुचि रखनेवाली स्त्री गान्धर्वी-श्रेणीकी होती है।
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
सुमन्तु मुनिने कहा—राजन्! ब्रह्माजी इस प्रकार स्त्री और पुरुषोंके लक्षणोंको स्वामिकार्तिकेयको बतलाकर अपने लोकको चले गये। (अध्याय २८)
विनायक-पूजाका माहात्म्य
शतानीकने कहा—मुने! अब आप मुझे भगवान् गणेशकी आराधनाके विषयमें बतलायें। गायत्री है। इसका जप करना चाहिये।
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! भगवान् गणेशकी आराधनामें किसी तिथि, नक्षत्र या उपवासादिकी अपेक्षा नहीं होती। जिस किसी भी दिन श्रद्धा-भक्तिपूर्वक भगवान् गणेशकी पूजा की जाय तो वह अभीष्ट फलोंको देनेवाली होती है। कामना-भेदसे अलग-अलग वस्तुओंसे गणपतिकी मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करनेसे मनोवाञ्छित फलकी प्राप्ति होती है। 'महाकर्णाय१ विद्यहे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्।'—यह गणेश-
गणेशका पूजन करता है, उसके सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं और सभी अनिष्ट दूर हो जाते हैं। श्रीगणेशजीके अनुकूल होनेसे सभी जगत् अनुकूल हो जाता है। जिसपर एकदन्त भगवान् गणपति संतुष्ट होते हैं, उसपर देवता, पितर, मनुष्य आदि सभी प्रसन्न रहते हैं२। इसलिये सम्पूर्ण विघ्नोंको निवृत्त करनेके लिये श्रद्धा-भक्तिपूर्वक गणेशजीकी आराधना करनी चाहिये।
(अध्याय २९-३०)
चतुर्थी-कल्पमें शिवा, शान्ता तथा सुखा—तीन प्रकारकी
चतुर्थीका फल और उनका व्रत-विधान
सुमन्तु मुनिने कहा—राजन्! चतुर्थी तिथि तीन प्रकारकी होती है—शिवा, शान्ता और सुखा। अब मैं इनका लक्षण कहता हूँ, उसे सुनें—
भाद्रपद मासकी शुक्ला चतुर्थीका नाम 'शिवा' है, इस दिन जो स्नान, दान, उपवास, जप आदि सत्कर्म किया जाता है, वह गणपतिके प्रसादसे सौ गुना हो जाता है। इस चतुर्थीको गुड़, लवण और घृतका दान करना चाहिये, यह शुभकर माना गया है और गुड़के अपूर्णों (मालपूआ)—से ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये तथा उनकी पूजा करनी चाहिये। इस दिन जो स्त्री अपने सास और ससुरको गुड़के पूए तथा नमकीन पूए
खिलाती है वह गणपतिके अनुग्रहसे सौभाग्यवती होती है। पतिकी कामना करनेवाली कन्या विशेषरूपसे इस चतुर्थीका व्रत करे और गणेशजीकी पूजा करे। राजन्! यह शिवा-चतुर्थीका विधान है।
माघ मासकी शुक्ला चतुर्थीको 'शान्ता' कहते हैं। यह शान्ता तिथि नित्य शान्ति प्रदान करनेके कारण 'शान्ता' कही गयी है। इस दिन किये हुए स्नान-दानादि सत्कर्म गणेशजीकी कृपासे हजार गुना फलदायक हो जाते हैं। इस शान्ता नामक चतुर्थी तिथिको उपवास कर गणेशजीका पूजन तथा हवन करे और लवण, गुड़, शाक एवं गुड़के पूए ब्राह्मणोंको दानमें दे। विशेषरूपसे
१-परम्परासे प्रचलित गणेश-गायत्रीमें 'एकदन्ताय' पाठ है।
२-एकदन्ते जगन्नाथे गणेशे तुष्टिमागते। पितृदेवमनुष्याद्याः सर्वे तुष्यन्ति भारत ॥ (ब्राह्मपर्व ३०।८)
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- ब्राह्मपर्व *
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स्त्रियाँ अपने ससुर आदि पूज्य जनोंका पूजन करें एवं उन्हें भोजन करायें। इस व्रतके करनेसे अखण्ड सौभाग्यकी प्राप्ति होती है, समस्त विघ्न दूर होते हैं और गणेशजीकी कृपा प्राप्त होती है।
किसी भी महीनेके भौमवारयुक्त शुक्ला चतुर्थीको 'सुखा' कहते हैं। यह व्रत स्त्रियोंको सौभाग्य, उत्तम रूप और सुख देनेवाला है। भगवान् शङ्कर एवं माता पार्वतीके संयुक्त तेजसे भूमिद्वारा रक्तवर्णके मङ्गलकी उत्पत्ति हुई। भूमिका पुत्र होनेसे वह भौम कहलाया और कुज, रक्त, वीर, अङ्गारक आदि नामोंसे प्रसिद्ध हुआ। वह शरीरके अङ्गोंकी रक्षा करनेवाला तथा सौभाग्य आदि देनेवाला है, इसीलिये अङ्गारक कहलाया। जो पुरुष अथवा स्त्री भौमवारयुक्त शुक्ला चतुर्थीको उपवास करके भक्तिपूर्वक प्रथम गणेशजीका, तदनन्तर रक्त चन्दन, रक्त पुष्प आदिसे भौमका पूजन करते हैं, उन्हें सौभाग्य और उत्तम रूप-सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है।
प्रथम संकल्पकर स्नान करे, अनन्तर गणेश-स्मरणपूर्वक हाथमें शुद्ध मृत्तिका लेकर इस मन्त्रको पढ़ें—
इह त्वं वन्दिता पूर्वं कृष्णोन्मुखरता किल। तस्मान्मे दह पाप्मानं यन्मया पूर्वसंचितम्॥
(ब्राह्मपर्व ३१।२४)
इसके बाद मृत्तिकाको गङ्गाजलसे मिश्रितकर सूर्यके सामने करे, तदनन्तर अपने सिर आदि अङ्गोंमें लगाये और फिर जलके मध्य खड़ा होकर इस मन्त्रको पढ़कर नमस्कार करे—
त्वमापो योनिः सर्वेषां दैत्यदानवद्यौकसाम्। स्वेदाण्डजोद्भिदां चैव रसानां पतये नमः॥
(ब्राह्मपर्व ३१।२७)
अनन्तर सभी तीर्थों, नदियों, सरोवरों, झरनों और तालाबोंमें मैंने स्नान किया—इस प्रकार भावना करता हुआ गोते लगाकर स्नान करे, फिर
पवित्र होकर घरमें आकर दूर्वा, पीपल, शमी तथा गौका स्पर्श करे। इनके स्पर्श करनेके मन्त्र इस प्रकार हैं —
दूर्वा स्पर्श करनेका मन्त्र
त्वं दूर्वैऽमृतनामासि सर्वदेवैस्तु वन्दिता॥ वन्दिता दह तत्सर्वं दुरितं यन्मया कृतम्।
(ब्राह्मपर्व ३१।३१-३२)
शमी स्पर्श करनेका मन्त्र
पवित्राणां पवित्रा त्वं काश्यपी प्रथिता श्रुतौ। शमी शमय मे पापं नूनं वेत्सि धराधरान्॥
(ब्राह्मपर्व ३१।३३)
पीपल-वृक्ष स्पर्श करनेका मन्त्र
नेत्रस्पन्दादिजं दुःखं दुःस्वप्नं दुर्विचिन्तनम्। शक्तानां च समुद्योगमश्रुत्य त्वं क्षमस्व मे॥
(ब्राह्मपर्व ३१।३४)
गौको स्पर्श करनेका मन्त्र
सर्वदेवमयी देवि मुनिभित्तु सुपूजिता। तस्मात् स्पृशामि वन्दे त्वां वन्दिता पापहा भव॥
(ब्राह्मपर्व ३१।३६)
श्रद्धापूर्वक पहले गौकी प्रदक्षिणा कर उपर्युक्त मन्त्रको पढ़ें और गौका स्पर्श करे। जो गौकी प्रदक्षिणा करता है, उसे सम्पूर्ण पृथ्वीकी प्रदक्षिणाका फल प्राप्त होता है।
इस प्रकार इनको स्पर्शकर, हाथ-पैर धोकर, आसनपर बैठकर आचमन करे। अनन्तर खदिर (खैर)-की समिधाओंसे अग्नि प्रज्वलित कर घृत, दुग्ध, यव, तिल तथा विविध भक्ष्य पदार्थोंसे मन्त्र पढ़ते हुए हवन करे। आहुति इन मन्त्रोंसे दे—ॐ शर्वाय स्वाहा, ॐ शर्वपुत्राय स्वाहा, ॐ क्षोण्युत्सङ्गभवाय स्वाहा, ॐ कुजाय स्वाहा, ॐ ललिताङ्गाय स्वाहा तथा ॐ लोहिताङ्गाय स्वाहा। इन प्रत्येक मन्त्रोंसे १०८ या अपनी शक्तिके अनुसार आहुति दे। अनन्तर सुवर्ण, चाँदी, चन्दन या देवदारुके
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६६
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
काष्ठकी मङ्गलकी मूर्ति बनाकर ताँबे अथवा चाँदीके पात्रमें उसे स्थापित करे। घी, कुंकुम, रक्त चन्दन, रक्त पुष्प, नैवेद्य आदिसे उसकी पूजा करे अथवा अपनी शक्तिके अनुसार पूजा करे। अथवा ताम्र, मृत्तिका या बाँससे बने पात्रमें कुंकुम, केसर आदिसे मूर्ति अङ्कितकर पूजा करे। 'अग्निर्मूर्धा० *' इत्यादि वैदिक मन्त्रोंसे सभी उपचारोंको समर्पित कर वह मूर्ति ब्राह्मणको दे दे और यथाशक्ति घी, दूध, चावल, गेहूँ, गुड़ आदि वस्तु भी ब्राह्मणको दे। धन रहनेपर कृपणता नहीं करनी चाहिये, क्योंकि कंजूसी करनेसे फल नहीं प्राप्त होता।
इस प्रकार चार बार भौमयुक्त चतुर्थीका व्रत कर श्रद्धापूर्वक दस अथवा पाँच तोले सोनेकी
मङ्गल और गणपतिकी मूर्ति बनवाये। उसे बीर पल या दस पलके सोने, चाँदी अथवा ताम्र आदिसे पात्रमें भक्तिपूर्वक स्थापित करे। सभी उपचारोंसे पूजा करनेके बाद दक्षिणाके साथ सत्पात्र ब्राह्मणको उसे दे, इससे इस व्रतका सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है। राजन्! इस प्रकार इस उत्तम तिथिको मैं कहता हूँ। इस दिन जो व्रत करता है, वह चन्द्रमासे समान कान्तिमान्, सूर्यके समान तेजस्वी एवं प्रभावशाली तथा वायुके समान बलवान् होता है और अन्तर्गत महागणपतिके अनुग्रहसे भौमलोकमें निवास करता है। इस तिथिके माहात्म्यको जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक पढ़ता-सुनता है, वह महापातकादिसे मुक्त होकर श्रेष्ठ सम्पत्तियोंको प्राप्त करता है। (अध्याय ३१)
पञ्चमी-कल्पका आरम्भ, नागपञ्चमीकी
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! अब मैं पञ्चमी-कल्पका वर्णन करता हूँ। पञ्चमी तिथि नागोंको अत्यन्त प्रिय है और उन्हें आनन्द देनेवाली है। इस दिन नागलोकमें विशिष्ट उत्सव होता है। पञ्चमी तिथिको जो व्यक्ति नागोंको दूधसे स्नान कराता है, उसके कुलमें वासुकि, तक्षक, कालिय, मणिभद्र, ऐरावत, धृतराष्ट्र, कर्कोटक तथा धनञ्जय—ये सभी बड़े-बड़े नाग अभय दान देते हैं—उसके कुलमें सर्पका भय नहीं रहता। एक बार माताके शापसे नागलोग जलने लग गये थे। इसीलिये उस दाहकी व्यथाको दूर करनेके लिये पञ्चमीको गायके दूधसे नागोंको आज भी लोग स्नान कराते हैं, इससे सर्प-भय नहीं रहता।
राजाने पूछा—महाराज! नागमाताने नागोंको क्यों शाप दिया था और फिर वे कैसे बच गये? इसका आप विस्तारपूर्वक वर्णन करें।
कथा, पञ्चमी-व्रतका विधान और फल
सुमन्तु मुनिने कहा—एक बार राक्षसों और देवताओंने मिलकर समुद्रका मन्थन किया। उस समय समुद्रसे अतिशय श्वेत उच्चैःश्रवा नामका एक अश्व निकला, उसे देखकर नागमाता कदूने अपने सपत्नी (सौत) विनतासे कहा कि देखो, यह अश्व श्वेतवर्णका है, परंतु इसके बाल काले दीख पड़ते हैं। तब विनताने कहा कि न तो यह अश्व सर्वश्वेत है, न काला है और न लाल। यह सुनकर कदूने कहा—'मेरे साथ शर्त करो कि यदि मैं इस अश्वसे बालोंको कृष्णवर्णका दिखा दूँ तो तुम मेरी दासी हो जाओगी और यदि नहीं दिखा सकी तो मैं तुम्हारी दासी हो जाऊँगी।' विनताने यह शर्त स्वीकार कर ली। दोनों क्रोध करती हुई अपने-अपने स्थानके चली गयीं। कदूने अपने पुत्र नागोंको बुलाकर सब वृत्तान्त उन्हें सुना दिया और कहा कि 'पुत्रो तुम अश्वके बालके समान सूक्ष्म होकर उच्चैःश्रवासे
- अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम्। अपाश्रेश्वात्सि जिवन्ति ॥ (यजुर्वेद ३।१२)
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- ब्राह्मपर्व *
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शरीरमें लिपट जाओ, जिससे यह कृष्णवर्णका दिखायी देने लगे। ताकि मैं अपनी सौत विनताको जीतकर उसे अपनी दासी बना सकूँ।' माताके इस वचनको सुनकर नागोंने कहा—'माँ! यह छल तो हमलोग नहीं करेंगे, चाहे तुम्हारी जीत हो या हार। छलसे जीतना बहुत बड़ा अधर्म है।' पुत्रोंका यह वचन सुनकर कदूने क्रुद्ध होकर कहा—तुमलोग मेरी आज्ञा नहीं मानते हो, इसलिये मैं तुम्हें शाप देती हूँ कि 'पाण्डवोंके वंशमें उत्पन्न राजा जनमेजय जब सर्प-सत्र करेंगे, तब उस यज्ञमें तुम सभी अग्निमें जल जाओगे।' इतना कहकर कदू चुप हो गयी। नागगण माताका शाप सुनकर बहुत घबड़ाये और वासुकि को साथमें लेकर ब्रह्माजीके पास पहुँचे तथा ब्रह्माजीको अपना सारा वृत्तान्त सुनाया। इसपर ब्रह्माजीने कहा कि वासुके! चिन्ता मत करो। मेरी बात सुनो—यायावर-वंशमें बहुत बड़ा तपस्वी जरत्कारु नामका ब्राह्मण उत्पन्न होगा। उसके साथ तुम अपनी जरत्कारु नामवाली बहिनका विवाह कर देना और वह जो भी कहे, उसका वचन स्वीकार करना। उसे आस्तीक नामका विख्यात पुत्र उत्पन्न होगा, वह जनमेजयके सर्पयज्ञको रोकेगा और तुमलोगोंकी रक्षा करेगा। ब्रह्माजीके इस वचनको सुनकर नागराज वासुकि आदि अतिशय प्रसन्न हो, उन्हें प्रणाम कर अपने लोकमें आ गये।
सुमन्तु मुनिने इस कथाको सुनाकर कहा—राजन्! यह यज्ञ तुम्हारे पिता राजा जनमेजयने किया था। यही बात श्रीकृष्णभगवान्ने भी युधिष्ठिरसे कही थी कि 'राजन्! आजसे सौ वर्षके बाद सर्पयज्ञ होगा, जिसमें बड़े-बड़े विषधर और दुष्ट नाग नष्ट हो जायेंगे। करोड़ों नाग जब अग्निमें दग्ध होने लेंगे, तब आस्तीक नामक ब्राह्मण
सर्पयज्ञ रोककर नागोंकी रक्षा करेगा।' ब्रह्माजीने पञ्चमीके दिन वर दिया था और आस्तीक मुनिने पञ्चमीको ही नागोंकी रक्षा की थी, अतः पञ्चमी तिथि नागोंको बहुत प्रिय है*।
पञ्चमीके दिन नागोंकी पूजा कर यह प्रार्थना करनी चाहिये कि जो नाग पृथ्वीमें, आकाशमें, स्वर्गमें, सूर्यकी किरणोंमें, सरोवरोंमें, वापी, कूप, तालाब आदिमें रहते हैं, वे सब हमपर प्रसन्न हों, हम उनको बार-बार नमस्कार करते हैं—
सर्वे नागाः प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथिवीतले॥ ये च हेलिमरीचिस्था येऽन्तरे दिवि संस्थिताः। ये नदीषु महानागा ये सरस्वतिगामिनः। ये च वापीतडागेषु तेषु सर्वेषु वै नमः॥
(ब्राह्मपर्व ३२।३३-३४)
इस प्रकार नागोंको विसर्जित कर ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये और स्वयं अपने कुटुम्बियोंके साथ भोजन करना चाहिये। प्रथम मीठा भोजन करना चाहिये, अनन्तर अपनी अभिरुचिके अनुसार भोजन करे।
इस प्रकार नियमानुसार जो पञ्चमीको नागोंका पूजन करता है, वह श्रेष्ठ विमानमें बैठकर नागलोकको जाता है और बादमें द्वारपरयुगमें बहुत पराक्रमी, रोगरहित तथा प्रतापी राजा होता है। इसलिये घी, खीर तथा गुग्गुलसे इन नागोंकी पूजा करनी चाहिये।
राजाने पूछा—महाराज! क्रुद्ध सर्पके काटनेसे मरनेवाला व्यक्ति किस गतिको प्राप्त होता है और जिसके माता-पिता, भाई, पुत्र आदि सर्पके काटनेसे मरे हों, उनके उद्धारके लिये कौन-सा व्रत, दान अथवा उपवास करना चाहिये, यह आप बतायें।
सुमन्तु मुनिने कहा—राजन्! सर्पके काटनेसे जो मरता है, वह अधोगतिको प्राप्त होता है तथा
- पञ्चम्यां तत्र भविता ब्रह्मा प्रोवाच लेलिहान्।
तस्मादियं महाबाहो पञ्चमी दधिता सदा। नागानामानन्दकरी दत्ता वै ब्रह्मणा पुरा॥ (ब्राह्मपर्व ३२।३२)
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६८
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
निर्विष सर्प होता है और जिसके माता-पिता आदि सर्पके काटनेसे मरते हैं, वह उनकी सद्गतिके लिये भाद्रपदके शुक्ल पक्षकी पञ्चमी तिथिको उपवास कर नागोंकी पूजा करे१। यह तिथि महापुण्या कही गयी है। इस प्रकार बारह महीनेतक चतुर्थी तिथिके दिन एक बार भोजन करना चाहिये और पञ्चमीको व्रत कर नागोंकी पूजा करनी चाहिये। पृथ्वीपर नागोंका चित्र अङ्कित कर अथवा सोना, काष्ठ या मिट्टीका नाग बनाकर पञ्चमीके दिन करवीर, कमल, चमेली आदि पुष्प, गन्ध, धूप और विविध नैवेद्योंसे उनकी पूजा कर घी, खीर, और लड्डू उत्तम पाँच ब्राह्मणोंको खिलाये। अनन्त, वासुकि, शंख, पद्म, कम्बल, कर्कोटक, अश्चर, धृतराष्ट्र, शंखपाल, कालिय, तक्षक और पिंगल—इन बारह नागोंकी बारह महीनोंमें क्रमशः पूजा करे।
इस प्रकार वर्षपर्यन्त व्रत एवं पूजनकर व्रतकी
पारणा करनी चाहिये। बहुत-से ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। विद्वान् ब्राह्मणको सोनेका नाग बनाकर उसे देना चाहिये। यह उद्यापनकी विधि है। राजन् आपके पिता जनमेजयने भी अपने पिता परीक्षितके उद्धारके लिये यह व्रत किया था और सोनेका बहुत भारी नाग तथा अनेक गौण्ड ब्राह्मणोंको दी थीं। ऐसा करनेपर वे पितृ-ऋणसे मुक्त हुए थे और परीक्षितने भी उत्तम लोकको प्राप्त किया था। आप भी इसी प्रकार सोनेका नाग बनाकर उनकी पूजा कर उन्हें ब्राह्मणको दान करें, इससे आप भी पितृ-ऋणसे मुक्त हो जायेंगे। राजन्! जो कोई भी इस नागपञ्चमी-व्रतको करेगा, साँपसे डँसे जानेपर भी वह शुभलोकको प्राप्त होगा और जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इस कथाको सुनेगा, उसके कुलमें कभी भी साँपका भय नहीं होगा। इस पञ्चमी-व्रतके करनेसे उत्तम लोककी प्राप्ति होती है। (अध्याय ३२)
सर्पोंके लक्षण, स्वरूप और जाति२
राजा शतानीकने पूछा—मुने! सर्पोंके कितने रूप हैं, क्या लक्षण हैं, कितने रंग हैं और उनकी कितनी जातियाँ हैं? इसका आप वर्णन करें।
सुमन्तु मुनिने कहा—राजन्! इस विषयमें सुमेरु पर्वतपर महर्षि कश्यप और गौतमका जो संवाद हुआ था, उसका मैं वर्णन करता हूँ। महर्षि कश्यप किसी समय अपने आश्रममें बैठे थे। उस समय वहाँ उपस्थित महर्षि गौतमने उन्हें प्रणामकर विनयपूर्वक पूछा—महाराज! सर्पोंके लक्षण, जाति, वर्ण और स्वभाव किस प्रकारके हैं, उनका आप वर्णन करें तथा उनकी उत्पत्ति
किस प्रकार हुई है यह भी बतायें। वे विष किस प्रकार छोड़ते हैं, विषके कितने वेग हैं, विषकी कितनी नाड़ियाँ हैं, साँपोंके दाँत कितने प्रकारके होते हैं, सर्पिणीको गर्भ कब होता है और वह कितने दिनोंमें प्रसव करती है, स्त्री-पुरुष और नपुंसक सर्पका क्या लक्षण है, ये क्यों काटते हैं, इन सब बातोंको आप कृपाकर मुझे बतायें।
कश्यपजी बोले—मुने! आप ध्यान देकर सुनें। मैं सर्पोंके सभी भेदोंका वर्णन करता हूँ। ज्येष्ठ और आषाढ़ मासमें सर्पोंको मद होता है। उस समय वे मैथुन करते हैं। वर्षा-ऋतुके चार महीनेतक
१-वर्तमानमें नागपञ्चमी प्रायः सभी पञ्चाङ्गों तथा व्रतके निबन्ध-ग्रन्थोंके अनुसार श्रावण शुक्ल पञ्चमीको होती है। यहाँ या लो पाठ अशुद्ध है या कालान्तरमें कभी भाद्रपदमें नागपञ्चमी मनायी जाती रही होगी।
२-शिवतत्त्व-रत्नाकर और अभिलषितार्थ-चिन्तामणि तथा आयुर्वेद-ग्रन्थों—सुश्रुत, चरक, वाग्भटके चिकित्साख्यानोंमें भी इस विषयका वर्णन मिलता है।
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- ब्राह्मपर्व *
६९
सर्पिणी गर्भ धारण करती है, कार्तिकमें दो सौ चालीस अंडे देती है और उनमेंसे कुछको स्वयं प्रतिदिन खाने लगती है। प्रकृतिकी कृपासे कुछेक अंडे इधर-उधर ढुलककर बच जाते हैं। सोनेकी तरह चमकनेवाले अंडोंमें पुरुष, स्वर्णकेतक वर्णके समान आभावाले और लम्बी रेखाओंसे युक्त अंडोंसे स्त्री तथा शिरीषपुष्पके समान रंगवाले अंडोंके बीच नपुंसक सर्प होता है। उन अंडोंको सर्पिणी छः महीनेतक सेती है। अनन्तर अंडोंके फूटनेपर उनसे सर्प निकलते हैं और वे बच्चे अपनी मातासे स्नेह करते हैं। अंडेके बाहर निकलनेके सात दिनमें बच्चोंका कृष्णवर्ण हो जाता है। सर्पकी आयु एक सौ बीस वर्षकी होती है और इनकी मृत्यु आठ प्रकारसे होती है—मोरसे, मनुष्यसे, चकोर पक्षीसे, बिल्लीसे, नकुलसे, शूकरसे, वृक्षकसे और गौ, भैंस, घोड़े, ऊँट आदि पशुओंके खुरोंसे दब जानेपर। इनसे बचनेपर सर्प एक सौ बीस वर्षतक जीवित रहते हैं। सात दिनेके बाद दाँत उगते हैं और इक्कीस दिनमें विष हो जाता है। साँप काटनेके तुरंत बाद अपने जबड़ेसे तीक्ष्ण विषका त्याग करता है और फिर विष इकट्टा हो जाता है। सर्पिणीके साथ घूमनेवाला सर्प बालसर्प कहा जाता है। पचीस दिनमें वह बच्चा भी विषके द्वारा दूसरे प्राणियोंके प्राण हरनेमें समर्थ हो जाता है। छः महीनेमें कंचुक- (केंचुल-) का त्याग करता है। साँपके दो सौ चालीस पैर होते हैं, परंतु वे पैर गायके रोयेंके समान बहुत सूक्ष्म होते हैं, इसीलिये दिखायी नहीं देते। चलनेके समय निकल आते हैं और अन्य समय भीतर प्रविष्ट हो जाते हैं। उनके शरीरमें दो सौ बीस अङ्गुलियाँ और दो सौ बीस संधियाँ होती हैं। अपने समयके बिना जो सर्प उत्पन्न होते हैं उनमें कम विष रहता है और वे पचहत्तर वर्षसे अधिक जीते भी नहीं हैं। जिस साँपके दाँत लाल,
पीले एवं सफेद हों और विषका वेग भी मंद हो, वे अल्पायु और बहुत डरपोक होते हैं।
साँपको एक मुँह, दो जीभ, बत्तीस दाँत और विषसे भरी हुई चार दाढ़ें होती हैं। उन दाढ़ोंके नाम मकरी, कराली, कालरात्री और यमदूती है। इनके क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और यम—ये चार देवता हैं। यमदूती नामकी दाढ़ सबसे छोटी होती है। इससे साँप जिसे काटता है वह तत्क्षण मर जाता है। इसपर मन्त्र, तन्त्र, औषधि आदिका कुछ भी असर नहीं होता। मकरी दाढ़का चिह्न शस्त्रके समान, करालीका काकके पैरके समान तथा कालरात्रीका हाथके समान चिह्न होता है और यमदूती कूर्मके समान होती है। ये क्रमशः एक, दो, तीन और चार महीनोंमें उत्पन्न होती हैं और क्रमशः वात, पित्त, कफ और संनिपात इनमें होता है। क्रमशः गुडयुक्त भात, कषाययुक्त अन्न, कटु पदार्थ, संनिपातमें दिया जानेवाला पथ्य इनके द्वारा काटे गये व्यक्तिको देना चाहिये। श्वेत, रक्त, पीत और कृष्ण—इन चार दाढ़ोंके क्रमशः रंग हैं। इनके वर्ण क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं। सर्पोंके दाढ़ोंमें सदा विष नहीं रहता। दाहिने नेत्रके समीप विष रहनेका स्थान है। क्रोध करनेपर वह विष पहले मस्तकमें जाता है, मस्तकसे धमनी और फिर नाड़ियोंके द्वारा दाढ़में पहुँच जाता है।
आठ कारणोंसे साँप काटता है—दबनेसे, पहलेके वैरसे, भयसे, मदसे, भूखसे, विषका वेग होनेसे, संतानकी रक्षाके लिये तथा कालकी प्रेरणासे। जब सर्प काटते ही पेटकी ओर उलट जाता है और उसकी दाढ़ टेढ़ी हो जाती है, तब उसे दबा हुआ समझना चाहिये। जिसके काटनेसे बहुत बड़ा घाव हो जाय, उसको अत्यन्त द्रुपसे काट है, ऐसा समझना चाहिये। एक दाढ़का चिह्न हो जाय, किंतु वह भी भलीभाँति दिखायी न पड़े तो भयसे काटा हुआ
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७०
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
समझना चाहिये। इसी प्रकार रेखाकी तरह दाढ़ दिखायी दे तो मदसे काटा हुआ, दो दाढ़ दिखायी दे और बड़ा घाव भर जाय तो भूखसे काटा हुआ, दो दाढ़ दिखायी दे और घावमें रक्त हो जाय तो विषके वेगसे काटा हुआ, दो दाढ़ दिखायी दे, किंतु घाव न रहे तो संतानकी रक्षाके लिये काटा हुआ मानना चाहिये। काकके पैरकी तरह तीन दाढ़ गहरे दिखायी दें या चार दाढ़ दिखायी दें तो कालकी प्रेरणासे काटा हुआ जानना चाहिये। यह
असाध्य है, इसकी कोई भी चिकित्सा नहीं है।*
सर्पके काटनेके दंष्ट्र, दंष्ट्रानुपीत और दंष्ट्रोद्भूत—ये तीन भेद हैं। सर्पके काटनेके बाद ग्रीवा यदि झुके तो दंष्ट्र तथा काटकर पार करे तो दंष्ट्रानुपीत कहते हैं। इसमें तिहाई विष चढ़ता है और काटकर सब विष उगल दे तथा स्वयं निर्विष होकर उलट जाय—पीठके बल उलटा हो जाय, उसका पेट दिखायी दे तो उसे दंष्ट्रोद्भूत कहते हैं।
(अध्याय ३३)
विभिन्न तिथियों एवं नक्षत्रोंमें कालसर्पसे डँसे हुए पुरुषके लक्षण, नागोंकी उत्पत्तिकी कथा
कश्यप मुनि बोले—गौतम! अब मैं कालसर्पसे काटे हुए पुरुषका लक्षण कहता हूँ, जिस पुरुषको कालसर्प काटता है, उसकी जिह्वा भंग हो जाती है, हृदयमें दर्द होता है, नेत्रोंसे दिखायी नहीं देता, दाँत और शरीर पके हुए जामुनके फलके समान काले पड़ जाते हैं, अङ्गोंमें शिथिलता आ जाती है, विष्टाका परित्याग होने लगता है, कंधे, कमर और ग्रीवा झुक जाते हैं, मुख नीचेकी ओर लटक जाता है, आँखें चढ़ जाती हैं, शरीरमें दाह और कम्प होने लगता है, बार-बार आँखें बंद हो जाती हैं, शस्त्रसे शरीरमें काटनेपर खून नहीं निकलता। बेतसे मारनेपर भी शरीरमें रेखा नहीं पड़ती, काटनेका स्थान कटे हुए जामुनके समान नीले रंगका, फूला हुआ, रक्तसे परिपूर्ण और कौएके पैरके समान हो जाता है, हिचकी आने लगती है, कण्ठ अवरुद्ध हो जाता है, श्वासकी गति बढ़ जाती है, शरीरका रंग पीला पड़ जाता
है। ऐसी अवस्थाको कालसर्पसे काटा हुआ समझना चाहिये। उसकी मृत्यु आसन्न समझनी चाहिये।
घाव फूल जाय, नीले रंगका हो जाय, अधिक पसीना आने लगे, नाकसे बोलने लगे, ओठ लटक जाय, हृदयमें कम्प होने लगे तो कालसर्पसे काटा हुआ समझना चाहिये। दाँत पीसने लगे, नेत्र उलट जायें, लम्बी श्वास आने लगे, ग्रीवा लटक जाय, नाभि फड़कने लगे तो कालसर्पसे काटा हुआ जानना चाहिये। दर्पण या जलमें अपनी छाया न दीखे, सूर्य तेजहीन दिखायी पड़े, नेत्र लाल हो जायें, सम्पूर्ण शरीर कष्टके कारण कॉपने लगे तो उसे कालसर्पसे काटा हुआ समझना चाहिये, उसकी शीघ्र ही मृत्यु सम्भाव्य है।
अष्टमी, नवमी, कृष्णा चतुर्दशी और नागपञ्चमीके दिन जिसको साँप काटता है, उसके प्रायः प्राण नहीं बचते। आर्द्रा, आश्लेषा, मघा, भरणी, कृत्तिका, विशाखा, तीनों पूर्वा, मूल, स्वाती और
- सभी सर्पाकी दवाके रूपमें मन्त्र-शास्त्रोंमें विशेषकर गरुडोपनिषदमें गरुड-मन्त्र और सर्पाकी मणियाँ उनके विषकी अबूक ओषधियाँ हैं। कुछ अन्य ओषधियाँ भी अचूक होती हैं जो सर्पाको निर्विष एवं स्तम्भित बना देती हैं। इंडुभ सर्पके काट लेनेपर किसी भी अन्य सर्पका विष नहीं चढ़ता। नर्मदा नदीका नाम लेनेसे भी साँप भागते हैं—
नर्मदाये नमः प्रातर्नर्मदाये नमो निशि। नमोऽस्तु नर्मदे तुभ्यं त्राहि मां विषसर्पतः ॥ (विष्णुपु. ४। ३। १३)
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- ब्राह्मपर्व *
७१
शतभिषा नक्षत्रमें जिसको साँप काटता है वह भी नहीं जीता। इन नक्षत्रोंमें विष पीनेवाला व्यक्ति भी तत्काल मर जाता है। पूर्वोक्त तिथि और नक्षत्र दोनों मिल जायँ तथा खण्डहरमें, श्मशानमें और सूखे वृक्षके नीचे जिसे साँप काटता है वह नहीं जीता।
मनुष्यके शरीरमें एक सौ आठ मर्म-स्थान हैं, उनमें भी शंख अर्थात् ललाटकी हड्डी, आँख, भूमध्य, वस्ति, अण्डकोशका ऊपरी भाग, कक्ष, कंधे, हृदय, वक्षःस्थल, तालु, ठोढ़ी और गुदा—ये बारह मुख्य मर्म-स्थान हैं। इनमें सर्प काटनेसे अथवा शस्त्राघात होनेपर मनुष्य जीवित नहीं रहता।
अब सर्प काटनेके बाद जो वैद्यको बुलाने जाता है उस दूतका लक्षण कहता हूँ। उत्तम जातिका हीन वर्ण दूत और हीन जातिका उत्तम वर्ण दूत भी अच्छा नहीं होता। वह दूत हाथमें दंड लिये हुए हों, दो दूत हों, कृष्ण अथवा रक्तवस्त्र पहने हों, मुख ढके हों, सिरपर एक
वस्त्र लपेटे हो, शरीरमें तेल लगाये हो, केश खोले हो, जोरसे बोलता हुआ आये, हाथ-पैर पीटे तो ऐसा दूत अत्यन्त अशुभ है। जिस रोगीका दूत इन लक्षणोंसे युक्त वैद्यके समीप जाता है, वह रोगी अवश्य ही मर जाता है।
कश्यपजी बोले— गौतम! अब मैं भगवान् शिवके द्वारा कथित नागोंकी उत्पत्तिके विषयमें कहता हूँ। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने अनेक नागों एवं ग्रहोंकी सृष्टि की। अनन्त नाग सूर्य, वासुकि चन्द्रमा, तक्षक भौम, कर्कोटक बुध, पद्म बृहस्पति, महापद्म शुक्र, कुलिक और शंखपाल शनैश्चर ग्रहके रूप हैं। रविवारके दिन दसवाँ और चौदहवाँ यामार्थ, सोमवारको आठवाँ और बारहवाँ, भौमवारको छठा और दसवाँ, बुधवारको नवाँ, बृहस्पतिको दूसरा और छठा, शुक्रको चौथा, आठवाँ और दसवाँ, शनिवारको पहिला, सोलहवाँ, दूसरा और बारहवाँ प्रहरार्थ अशुभ है। इन समयोंमें सर्पके काटनेसे व्यक्ति जीवित नहीं रहता। (अध्याय ३४)
सर्पोंके विषका वेग, फैलाव तथा सात धातुओंमें प्राप्त विषके लक्षण और उनकी चिकित्सा
कश्यपजी बोले— गौतम! यदि यह ज्ञात हो जाय कि सर्पने अपने यमदूती नामक दाढ़से काटा है तो उसकी चिकित्सा न करे। उस व्यक्तिको मरा हुआ ही समझे*। दिनमें और रातमें दूसरा और सोलहवाँ प्रहरार्थ साँपोंसे सम्बन्धित नागोदय नामक वेला कही गयी है। उसमें साँप काटे तो कालके द्वारा काटा गया समझना चाहिये और उसकी चिकित्सा नहीं करनी चाहिये। पानीमें बाल डुबोनेपर और उसे उठानेपर बालके अग्रभागसे जितना जल गिरता है, उतनी ही मात्रामें विष सर्प
प्रविष्ट कराता है। वह विष सम्पूर्ण शरीरमें फैल जाता है। जितनी देरमें हाथ पसारना और समेटना होता है, उतने ही सूक्ष्म समयमें काटनेके बाद विष मस्तकमें पहुँच जाता है। हवासे आगकी लपट फैलनेके समान रक्तमें पहुँचनेपर विषकी बहुत वृद्धि हो जाती है। जैसे जलमें तेलकी बूँद फैल जाती है, वैसे ही त्वचामें पहुँचकर विष दूना हो जाता है। रक्तमें चौगुना, पित्तमें आठ गुना, कफमें सोलह गुना, वातमें तीस गुना, मज्जामें साठ गुना और प्राणोंमें पहुँचकर वही विष अनन्त
- गारुडोपनिषद् एवं ताक्ष्योपनिषद्में यमदूतीके नामसे भी मन्त्र पढ़े गये हैं, यहाँ मध्यम नियमका वर्णन है। वैसे भगवत्कृपासे कुछ भी असाध्य नहीं है।
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
गुना हो जाता है। इस प्रकार सारे शरीरमें विषके व्याप्त हो जाने तथा श्रवणशक्ति बंद हो जानेपर वह जीव श्वास नहीं ले पाता और उसका प्राणान्त हो जाता है। यह शरीर पृथ्वी आदि पञ्चभूतोंसे बना है, मृत्युके बाद भूत-पदार्थ अलग-अलग हो जाते हैं और अपने-अपनेमें लीन हो जाते हैं। अतः विषकी चिकित्सा बहुत शीघ्र करनी चाहिये, विलम्ब होनेसे रोग असाध्य हो जाता है। सर्पादि जीवोंका विष जिस प्रकार प्राण हरण करनेवाला होता है, वैसे ही शंखिया आदि विष भी प्राणको हरण करनेवाले होते हैं।
विषके पहले वेगमें रोमाञ्च तथा दूसरे वेगमें पसीना आता है। तीसरे वेगमें शरीर काँपता है तथा चौथेमें श्रवणशक्ति अवरुद्ध होने लगती है, पाँचवेंमें हिचकी आने लगती है और छठेमें ग्रीवा लटक जाती है तथा सातवें वेगमें प्राण निकल जाते हैं। इन सात वेगोंमें शरीरके सातों धातुओंमें विष व्याप्त हो जाता है। इन धातुओंमें पहुँचे हुए विषका अलग-अलग लक्षण तथा उपचार इस प्रकार हैं—
आँखोंके आगे अँधेरा छा जाय और शरीरमें बार-बार जलन होने लगे तो यह जानना चाहिये कि विष त्वचामें है। इस अवस्थामें आककी जड़, अपामार्ग, तगर और प्रियंगु—इनको जलमें घोंटकर पिलानेसे विषकी बाधा शान्त हो सकती है। त्वचासे रक्तमें विष पहुँचनेपर शरीरमें दाह और मूर्च्छा होने लगती है। शीतल पदार्थ अच्छा लगता है। उशीर (खस), चन्दन, कूट, तगर, नीलोत्पल, सिंदुवारकी जड़, धतूरेकी जड़, हींग और मिरच—इनको पीसकर देना चाहिये। इससे बाधा शान्त न हो तो भटकटैया, इन्द्रायणकी जड़ और सर्पगन्धाको घीमें पीसकर देना चाहिये। यदि इससे भी शान्त न हो तो सिंदुवार और
हींगका नस्य देना चाहिये और पिलाना चाहिये। इसीका अञ्जन और लेप भी करना चाहिये, इससे रक्तमें प्राप्त विषकी बाधा शान्त हो जाती है।
रक्तसे पित्तमें विष पहुँच जानेपर पुरुष उठ-उठकर गिरने लगता है, शरीर पीला हो जाता है, सभी दिशाएँ पीले वर्णकी दिखायी देती हैं, शरीरमें दाह और प्रबल मूर्च्छा होने लगती है। इस अवस्थामें पीपल, शहद, महुआ, घी, तुम्बेकी जड़, इन्द्रायणकी जड़—इन सबको गोमूत्रमें पीसकर नस्य, लेपन तथा अञ्जन करनेसे विषका वेग हट जाता है।
पित्तसे विषके कफमें प्रवेश कर जानेपर शरीर जकड़ जाता है। श्वास भलीभाँति नहीं आती, कण्ठमें घर्घर शब्द होने लगता है और मुखसे लार गिरने लगती है। यह लक्षण देखकर पीपल, मिरच, सौंठ, श्लेष्मातक (बहुवार वृक्ष), लोध एवं मधुसारको समान भाग करके गोमूत्रमें पीसकर लेपन और अञ्जन लगाना चाहिये और उसे पिलाना भी चाहिये। ऐसा करनेसे विषका वेग शान्त हो जाता है।
कफसे वातमें विष प्रवेश करनेपर पेट फूल जाता है, कोई भी पदार्थ दिखायी नहीं पड़ता, दृष्टि-भंग हो जाता है। ऐसा लक्षण होनेपर शोणा (सोनागाछ)—की जड़, प्रियाल, गजपीपल, भारंगी, वचा, पीपल, देवदारु, महुआ, मधुसार, सिंदुवार और हींग—इन सबको पीसकर गोली बना ले और रोगीको खिलाये एवं अञ्जन तथा लेपन करे। यह औषधि सभी विषोंका हरण करती है।
वातसे मज्जामें विष पहुँच जानेपर दृष्टि नष्ट हो जाती है, सभी अङ्ग बेसुध हो शिथिल हो जाते हैं, ऐसा लक्षण होनेपर घी, शहद, शर्करायुक्त खस और चन्दनको घोंटकर पिलाना चाहिये और नस्य आदि भी देना चाहिये। ऐसा करनेसे विषका वेग हट जाता है।
मज्जासे मर्मस्थानोंमें विष पहुँच जानेपर सभी
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- ब्राह्मपर्व *
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इन्द्रियाँ निश्चेष हो जाती हैं और वह जमीनपर गिर जाता है। काटनेसे रक्त नहीं निकलता, केशके उखाड़नेपर भी कष्ट नहीं होता, उसे मृत्युके ही अधीन समझना चाहिये। ऐसे लक्षणोंसे युक्त रोगीकी साधारण वैद्य चिकित्सा नहीं कर सकते। जिनके पास सिद्ध मन्त्र और ओषधि होगी वे ही ऐसे रोगियोंके रोगको हटानेमें समर्थ होते हैं। इसके लिये साक्षात् रुद्रने एक ओषधि कही है।
मोरका पित्त तथा मार्जारका पित्त और गन्धनाडीकी जड़, कुंकुम, तगर, कूट, कासमर्दकी छाल तथा उत्पल, कुमुद और कमल—इन तीनोंके केसर—सभीका समान भाग लेकर उसे गोमूत्रमें पीसकर नस्य दे, अञ्जन लगाये। ऐसा करनेसे कालसर्पसे ढँसा हुआ भी व्यक्ति शीघ्र विषरहित हो जाता है यह मृतसंजीवनी ओषधि है अर्थात् मरेको भी जिला देती है। (अध्याय ३५)
सर्पोंकी भिन्न-भिन्न जातियाँ, सर्पोंके काटनेके लक्षण, पञ्चमी तिथिका नागोंसे सम्बन्ध और पञ्चमी-तिथिमें नागोंके पूजनका फल एवं विधान
गौतम मुनिने कश्यपजीसे पूछा—महात्मन्! सर्प, सर्पिणी, बालसर्प, सूतिका, नपुंसक और व्यन्तर नामक सर्पोंके काटनेमें क्या भेद होता है, इनके लक्षण आप अलग-अलग बतायें।
कश्यपजी बोले—मैं इन सबको तथा सर्पोंके रूप-लक्षणोंको संक्षेपमें बतलाता हूँ, सुनिये—
यदि सर्प काटे तो दृष्टि ऊपरको हो जाती है, सर्पिणीके काटनेसे दृष्टि नीचे, बालसर्पके काटनेसे दाहिनी ओर और बालसर्पिणीके काटनेसे दृष्टि बायीं ओर झुक जाती है। गर्भिणीके काटनेसे पसीना आता है, प्रसूती काटे तो रोमाञ्च और कम्पन होता है तथा नपुंसकके काटनेसे शरीर टूटने लगता है। सर्प दिनमें, सर्पिणी रात्रिमें और नपुंसक संध्याके समय अधिक विषयुक्त होता है। यदि अँधेरेमें, जलमें, वनमें सर्प काटे या सोते हुए या प्रमत्तको काटे, सर्प न दिखायी पड़े अथवा दिखायी पड़े, उसकी जाति न पहचानी जाय और पूर्वोक्त लक्षणोंकी जानकारी न हो तो वैद्य उसकी कैसे चिकित्सा कर सकता है!
सर्प चार प्रकारके होते हैं—दर्वीकर, मण्डली, राजिल और व्यन्तर। इनमें दर्वीकरका विष वात-स्वभाव, मण्डलीका पित्त-स्वभाव, राजिलका कफ-
स्वभाव और व्यन्तर सर्पका संनिपात-स्वभावका होता है अर्थात् उसमें वात, पित्त और कफ—इन तीनोंकी अधिकता होती है। इन सर्पोंके रक्तकी परीक्षा इस प्रकार करनी चाहिये। दर्वीकर सर्पमें रक्त कृष्णवर्ण और स्वल्प होता है, मण्डलीमें बहुत गाढ़ा और लाल रंगका रक्त निकलता है, राजिल तथा व्यन्तरमें स्निग्ध और थोड़ा-सा रुधिर निकलता है। इन चार जातियोंके अतिरिक्त सर्पोंकी अन्य कोई पाँचवीं जाति नहीं मिलती। सर्प ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र—इन चार वर्णोंके होते हैं। ब्राह्मण सर्प काटे तो शरीरमें दाह होता है, प्रबल मूच्छा आ जाती है, मुख काला पड़ जाता है, मज्जा स्तम्भित हो जाती है और चेतना जाती रहती है। ऐसे लक्षणोंके दिखायी देनेपर अश्वगन्धा, अपामार्ग, सिंदुवारको घीमें पीसकर नस्य दे और पिलाये तो विषकी निवृत्ति हो जाती है। क्षत्रिय वर्णके सर्पके काटनेपर शरीरमें मूच्छा छा जाती है, दृष्टि ऊपरको हो जाती है, अत्यधिक पीड़ा होने लगती है और व्यक्ति अपनेको पहचान नहीं पाता। ऐसे लक्षणोंके होनेपर आककी जड़, अपामार्ग, इन्द्रायण और प्रियंगुको घीमें पीसकर मिला ले तथा इसीका नस्य देनेसे एवं पिलानेसे बाधा मिट
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
जाती है। वैश्य सर्प डँसे तो कफ बहुत आता है, मुखसे लार बहती है, मूच्छा आ जाती है और वह चेतनाशून्य हो जाता है। ऐसा होनेपर अश्वगन्धा, गृहधूम, गुग्गुल, शिरीष, अर्क, पलाश और श्वेत गिरिकणिंका (अपराजिता)—इन सबको गोमूत्रमें पीसकर नस्य देने तथा पिलानेसे वैश्य सर्पकी बाधा तत्क्षण दूर हो जाती है। जिस व्यक्तिको शूद्र सर्प काटता है, उसे शीत लगकर ज्वर होता है, सभी अङ्ग चुलचुलाने लगते हैं, इसकी निवृत्तिके लिये कमल, कमलका केसर, लोध, क्षौद्र, शहद, मधुसार और श्वेतगिरिकर्णी—इन सबको समान भागोंमें लेकर शीतल जलके साथ पीसकर नस्य आदि दे और पान कराये। इससे विषका वेग शान्त हो जाता है।
ब्राह्मण सर्प मध्याह्नेके पहले, क्षत्रिय सर्प मध्याह्नेमें, वैश्य सर्प मध्याह्नेके बाद और शूद्र सर्प संध्याके समय विचरण करता है। ब्राह्मण सर्प वायु एवं पुष्प, क्षत्रिय मूषक, वैश्य मेढक और शूद्र सर्प सभी पदार्थोंका भक्षण करता है। ब्राह्मण सर्प आगे, क्षत्रिय दाहिने, वैश्य बायें और शूद्र सर्प पीछेसे काटता है। मैथुनकी इच्छासे पीड़ित सर्प विषके वेगके बढ़नेसे व्याकुल होकर बिना समय भी काटता है। ब्राह्मण सर्पमें पुष्पके समान गन्ध होती है, क्षत्रियमें चन्दनके समान, वैश्यमें घृतके समान और शूद्र सर्पमें मत्स्यके समान गन्ध होती है। ब्राह्मण सर्प नदी, कूप, तालाब, झरने, बाग-बगीचे और पवित्र स्थानोंमें रहते हैं। क्षत्रिय सर्प ग्राम, नगर आदिके द्वार, तालाब, चतुष्पथ तथा तोरण आदि स्थानोंमें, वैश्य सर्प श्मशान, ऊधर स्थान, भस्म, घास आदिके ढेर तथा वृक्षोंमें; इसी प्रकार शूद्र सर्प अपवित्र स्थान, निर्जन वन, शून्य घर, श्मशान आदि बुरे स्थानोंमें निवास करते हैं। ब्राह्मण सर्प श्वेत एवं कपिल
वर्ण, अग्रिके समान तेजस्वी, मनस्वी और सात्त्विक होते हैं। क्षत्रिय सर्प मूँगेके समान रक्तवर्ण अथवा सुवर्णके तुल्य पीत वर्ण तथा सूर्यके समान तेजस्वी, वैश्य सर्प अलसी अथवा बाण-पुष्पके समान वर्णवाले एवं अनेक रेखाओंसे युक्त तथा शूद्र सर्प अञ्जन अथवा काकके समान कृष्णवर्ण और धूम्रवर्णके होते हैं। एक अङ्गुष्ठके अन्तरमें दो दंश हों तो बालसर्पका काटा हुआ जानना चाहिये। दो अङ्गुल अन्तर हो तो तरुण सर्पका, ढाई अङ्गुल अन्तर हो तो वृद्ध सर्पका दंश समझना चाहिये।
अनन्तनाग सामने, वासुकि बायीं ओर, तक्षक दाहिनी ओर देखता है और कर्कोटककी दृष्टि पीछेकी ओर होती है। अनन्त, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंखपाल और कुलिक—ये आठ नाग क्रमशः पूर्वादि आठ दिशाओंके स्वामी हैं। पद्म, उत्पल, स्वस्तिक, त्रिशूल, महापद्म, शूल, क्षत्र और अर्धचन्द्र—ये क्रमशः आठ नागोंके आयुध हैं। अनन्त और कुलिक—ये दोनों ब्राह्मण नाग-जातियाँ हैं, शंख और वासुकि क्षत्रिय, महापद्म और तक्षक वैश्य तथा पद्म और कर्कोटक शूद्र नाग हैं। अनन्त और कुलिक नाग शुक्लवर्ण तथा ब्रह्माजीसे उत्पन्न हैं, वासुकि और शंखपाल रक्तवर्ण तथा अग्रिसे उत्पन्न हैं, तक्षक और महापद्म स्वल्प पीतवर्ण तथा इन्द्रसे उत्पन्न हैं, पद्म और कर्कोटक कृष्णवर्ण तथा यमराजसे उत्पन्न हैं।
सुमन्तु मुनिने पुनः कहा—राजन्! सर्पोंके ये लक्षण और चिकित्सा महर्षि कश्यपने महामुनि गौतमको उपदेशके प्रसंगमें कहे थे और यह भी बताया कि सदा भक्तिपूर्वक नागोंकी पूजा करे और पञ्चमीको विशेषरूपसे दूध, खीर आदिसे उनका पूजन करे। श्रावण शुक्ला पञ्चमीको द्वारके दोनों ओर गोबरके द्वारा नाग बनाये। दही, दूध,
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- ब्राह्मपर्व *
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दूर्वा, पुष्प, कुश, गन्ध, अक्षत और अनेक प्रकारके नैवेद्योंसे नागोंका पूजन कर ब्राह्मणोंको भोजन कराये। ऐसा करनेपर उस पुरुषके कुलमें कभी सपोंका भय नहीं होता।
भाद्रपदकी पञ्चमीको अनेक रंगोंके नागोंको चित्रितकर घी, खीर, दूध, पुष्प आदिसे पूजनकर गुगुलकी धूप दे। ऐसा करनेसे तक्षक आदि नाग प्रसन्न होते हैं और उस पुरुषकी सात पीढ़ीतकको सोंपका भय नहीं रहता।
आश्विन मासकी पञ्चमीको कुशका नाग
बनाकर गन्ध, पुष्प आदिसे उनका पूजन करे। दूध, घी, जलसे स्नान कराये। दूधमें पके हुए गेहूँ और विविध नैवेद्योंका भोग लगाये। इस पञ्चमीको नागकी पूजा करनेसे वासुकि आदि नाग संतुष्ट होते हैं और वह पुरुष नागलोकमें जाकर बहुत कालतक सुखका भोग करता है। राजन्! इस पञ्चमी तिथिके कल्पका मैंने वर्णन किया। जहाँ 'ॐ कुरुकुल्ले फट् स्वाहा'—यह मन्त्र पढ़ा जाता है, वहाँ कोई सर्प नहीं आ सकता१।
(अध्याय ३६—३८)
षष्ठी-कल्प-निरूपणमें स्कन्द-षष्ठी-व्रतकी महिमा
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! अब मैं षष्ठी तिथि-कल्पका वर्णन करता हूँ। यह तिथि सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली है। कार्तिक मासकी षष्ठी तिथिको फलाहारकर यह तिथिव्रत किया जाता है२। यदि राज्यच्युत राजा इस व्रतका अनुष्ठान करे तो वह अपना राज्य प्राप्त कर लेता है। इसलिये विजयकी अभिलाषा रखनेवाले व्यक्तिको इस व्रतका प्रयत्न-पूर्वक पालन करना चाहिये।
यह तिथि स्वामिकार्तिकेयको अत्यन्त प्रिय है। इसी दिन कृतिकाओंके पुत्र कार्तिकेयका आविर्भाव हुआ था। वे भगवान् शङ्कर, अग्नि तथा गङ्गाके भी पुत्र कहे गये हैं। इसी षष्ठी तिथिको स्वामिकार्तिकेय देवसेनाके सेनापति हुए। इस तिथिको व्रत कर घृत, दही, जल और पुष्पोंसे स्वामिकार्तिकेयको दक्षिणकी ओर मुख कर अर्घ्य देना चाहिये।
अर्घ्यदानका मन्त्र इस प्रकार है—
समर्षिदारज स्कन्द स्वाहापतिसमुद्भव। रुद्रार्यमाग्निज विभो गङ्गागर्भ नमोऽस्तु ते। प्रियतां देवसेनानीः सम्पादयतु हृदतम्॥
(ब्राह्मपर्व ३९।६)
ब्राह्मणको अन्न देकर रात्रिमें फलका भोजन और भूमिपर शयन करना चाहिये। व्रतके दिन पवित्र रहे और ब्रह्मचर्यका पालन करे। शुक्ल-पक्ष तथा कृष्णपक्ष—दोनों षष्ठियोंको यह व्रत करना चाहिये। इस व्रतके करनेसे भगवान् स्कन्दकी कृपासे सिद्धि, धृति, तुष्टि, राज्य, आयु, आरोग्य और मुक्ति मिलती है। जो पुरुष उपवास न कर सके, वह रात्रि-व्रत ही करे, तब भी दोनों लोकोंमें उत्तम फल प्राप्त होता है। इस व्रतको करनेवाले पुरुषको देवता भी नमस्कार करते हैं और वह इस लोकमें आकर चक्रवर्ती राजा होता है। राजन्! जो पुरुष षष्ठी-व्रतके माहात्म्यका भक्तिपूर्वक श्रवण
१-कश्मीर नागोंका देश माना जाता है। 'नीलमतपुराण' में इसका विस्तृत वर्णन है।
२-पञ्चाङ्गोंके अनुसार मार्गशीर्ष शुक्ला षष्ठीको स्कन्द-षष्ठी होती है तथा कार्तिक शुक्ला षष्ठीको रवि-षष्ठी मानी जाती है, जिस दिन सम्पूर्ण भारतमें सूर्योपासना होती है। परंतु यहाँ कार्तिक शुक्ला षष्ठीके रूपमें वर्णन आया है, यह गणना अमान्तमास (अमावास्याको पूर्ण होनेवाले मास)-के अनुसार प्रतीत होती है।
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
करता है, वह भी स्वामिकातिकेयकी कृपासे विविध उत्तम भोग, सिद्धि, तुष्टि, धृति और लक्ष्मीको प्राप्त करता है। परलोकमें वह उत्तम गतिका भी अधिकारी होता है। (अध्याय ३९)
आचरणकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन
राजा शतानीकने कहा—मुने! अब आप ब्राह्मण आदिके आचरणकी श्रेष्ठताके विषयमें बतलानेकी कृपा करें।
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! मैं अत्यन्त संक्षेपमें इस विषयको बताता हूँ, उसे आप सुनें। न्याय-मार्गका अनुसरण करनेवाले शास्त्रकारोंने कहा है कि 'वेद आचारहीनको पवित्र नहीं कर सकते, भले ही वह सभी अङ्गोंके साथ वेदोंका अध्ययन कर ले। वेद पढ़ना तो ब्राह्मणका शिल्पमात्र है, किंतु ब्राह्मणका मुख्य लक्षण तो सदाचरण ही बतलाया गया है*।' चारों वेदोंका अध्ययन करनेपर भी यदि वह आचरणसे हीन है तो उसका अध्ययन वैसे ही निष्फल होता है, जिस प्रकार नपुंसकके लिये स्त्रीरत्न निष्फल होता है।
जिनके संस्कार उत्तम होते हैं, वे भी दुराचरण कर पतित हो जाते हैं और नरकमें पड़ते हैं तथा संस्कारहीन भी उत्तम आचरणसे अच्छे कहलाते हैं एवं स्वर्ग प्राप्त करते हैं। मनमें दुष्टता भरी रहे, बाहरसे सब संस्कार हुए हों, ऐसे वैदिक संस्कारोंसे संस्कृत कतिपय पुरुष आचरणमें शूद्रोंसे भी अधिक मलिन हो जाते हैं। क्रूर कर्म करनेवाला, ब्रह्महत्या करनेवाला, गुरुदारगामी, चोर, गौओंको मारनेवाला, मद्यपायी, परस्त्रीगामी, मिथ्यावादी, नास्तिक, वेदनिन्दक, निषिद्ध कर्मोंका आचरण करनेवाला यदि ब्राह्मण है और सभी तरहके संस्कारसे सम्पन्न भी है, वेद-वेदाङ्ग-पारङ्गत भी है, फिर भी उसकी सद्गति नहीं होती। दयाहीन, हिंसक, अतिशय
दाम्भिक, कपटी, लोभी, पिशुन (चुगलखोर), अतिशय दुष्ट पुरुष वेद पढ़कर भी संसारको उगते हैं और वेदको बेचकर अपना जीवन-यापन करते हैं, अनेक प्रकारके छल-छिद्रसे प्रजाकी हिंसा कर केवल अपना सांसारिक सुख सिद्ध करते हैं। ऐसे ब्राह्मण शूद्रसे भी अधम हैं।
जो ग्राह्य-अग्राह्यके तत्त्वको जाने, अन्याय और कुमार्गका परित्याग करे, जितेन्द्रिय, सत्यबादी और सदाचारी हो, नियमोंके पालन, आचार तथा सदाचरणमें स्थिर रहे, सबके हितमें तत्पर रहे, वेद-वेदाङ्ग और शास्त्रका मर्मज्ञ हो, समाधिमें स्थित रहे, क्रोध, मत्सर, मद तथा शोक आदिसे रहित हो, वेदके पठन-पाठनमें आसक्त रहे, किसीका अत्यधिक सङ्ग न करे, एकान्त और पवित्र स्थानमें रहे, सुख-दुःखमें समान हो, धर्मनिष्ठ हो, पापाचरणसे डरे, आसक्तिरहित, निरहंकार, दानी, शूर, ब्रह्मवेता, शान्त-स्वभाव और तपस्वी हो तथा सम्पूर्ण शास्त्रोंमें परिनिष्ठित हो—इन गुणोंसे युक्त पुरुष ब्राह्मण होते हैं। ब्रह्मके भक्त होनेसे ब्राह्मण, क्षतसे रक्षा करनेके कारण क्षत्रिय, वार्ता (कृषि-विद्या आदि)-का सेवन करनेसे वैश्य और शब्द-श्रवणमात्रसे जो द्रुतगति हो जायँ, वे शूद्र कहलाते हैं। क्षमा, दम, शम, दान, सत्य, शौच, धृति, दया, मृदुता, त्रह्युता, संतोष, तप, निरहंकारता, अक्रोध, अनसूया, अतृष्णता, अस्तेय, अमात्सर्य, धर्मज्ञान, ब्रह्मचर्य, ध्यान, आस्तिक्य, वैराग्य, पाप-भीरुता, अद्वेष,
- आचारहीनान् न पुनन्ति वेदा यद्यप्यधीताः सह यद्भिर्द्वैः । शिल्पं हि वेदाध्ययनं द्विजानां वृत्तं स्मृतं ब्राह्मणलक्षणं तु॥
(ब्राह्मपर्व ४१।८)
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- ब्राह्मपर्व *
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गुरुशुश्रूषा आदि गुण जिनमें रहते हैं, उनका ब्राह्मणत्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता रहता है।
शम, तप, दम, शौच, क्षमा, ऋजुता, ज्ञान-विज्ञान और आस्तिक्य—ये ब्राह्मणोंके सहज कर्म हैं। ज्ञानरूपी शिखा, तपोरूपी सूत्र अर्थात् यज्ञोपवीत जिनके रहते हैं, उनको मनुने ब्राह्मण कहा है। पाप-कर्मोंसे निवृत्त होकर उत्तम आचरण करनेवाला
भी ब्राह्मणके समान ही है। शीलसे युक्त शूद्र भी ब्राह्मणसे प्रशस्त हो सकता है और आचाररहित ब्राह्मण भी शूद्रसे अधम हो जाता है।
जिस तरह दैव और पौरुषके मिलनेपर कार्य सिद्ध होते हैं, वैसे ही उत्तम जाति और सत्कर्मका योग होनेपर आचरणकी पूर्णता सिद्ध होती है।
(अध्याय ४०—४५)
भगवान् कार्तिकेय तथा उनके षष्ठी-व्रतकी महिमा
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! भाद्रपद मासकी षष्ठी तिथि बहुत उत्तम तिथि है, यह सभी पापोंका हरण करनेवाली, पुण्य प्रदान करनेवाली तथा सभी कल्याण-मङ्गलोंको देनेवाली है। यह तिथि कार्तिकेयको अतिशय प्रिय है। इस दिन किया हुआ स्नान, दान आदि सत्कर्म अक्षय होता है। जो दक्षिण दिशा (कुमारिकाक्षेत्र)—में निवास करनेवाले कुमार कार्तिकेयका इस तिथिको दर्शन करते हैं, वे ब्रह्महत्या आदि पापोंसे मुक्त हो जाते हैं, इसलिये इस तिथिमें भगवान् कार्तिकेयका अवश्य दर्शन करना चाहिये। भक्तिपूर्वक कार्तिकेयका पूजन करनेसे मानव मनोवाञ्छित फल प्राप्त करता है और अन्तमें इन्द्रलोकमें निवास करता है। ईट, पत्थर, काष्ठ आदिके द्वारा श्रद्धापूर्वक कार्तिकेयका मन्दिर बनानेवाला पुरुष स्वर्णके विमानमें बैठकर कार्तिकेयके लोकमें जाता है। इनके मन्दिरपर ध्वजा चढ़ाने तथा झाडू-पोंछा (मार्जन) आदि करनेसे रुद्रलोक
प्राप्त होता है। चन्दन, अगर, कपूर आदिसे कार्तिकेयकी पूजा करनेपर हाथी, घोड़ा आदि वाहनोंका स्वामी होता है और सेनापतित्व भी प्राप्त होता है। राजाओंको कार्तिकेयकी अवश्य ही आराधना करनी चाहिये। जो राजा कृत्तिकाओंके पुत्र भगवान् कार्तिकेयकी आराधना कर युद्धके लिये प्रस्थान करता है, वह देवराज इन्द्रकी तरह अपने शत्रुओंको परास्त कर देता है। कार्तिकेयकी चम्पक आदि विविध पुष्पोंसे पूजा करनेवाला व्यक्ति सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है और शिवलोकको प्राप्त करता है। इस भाद्रपद मासकी षष्ठीको तेलका सेवन नहीं करना चाहिये। षष्ठी तिथिको व्रत एवं पूजनकर रात्रिमें भोजन करनेवाला व्यक्ति सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो कार्तिकेयके लोकमें निवास करता है। जो व्यक्ति कुमारिकाक्षेत्रमें स्थित भगवान् कार्तिकेयका दर्शन एवं भक्तिपूर्वक उनका पूजन करता है, वह अखण्ड शान्ति प्राप्त करता है। (अध्याय ४६)
ससमी-कल्पमें भगवान् सूर्यके परिवारका निरूपण एवं शाक-ससमी-व्रत
सुमन्तु मुनिने कहा—राजन्! अब मैं ससमी-कल्पका वर्णन करता हूँ। ससमी तिथिको भगवान् सूर्यका आविर्भाव हुआ था। वे अण्डके साथ उत्पन्न हुए और अण्डमें रहते हुए ही उन्होंने वृद्धि
प्राप्त की। बहुत दिनोंतक अण्डमें रहनेके कारण ये 'मार्तण्ड' के नामसे प्रसिद्ध हुए। जब ये अण्डमें ही स्थित थे तो दक्ष प्रजापतिने अपनी रूपवती कन्या रूपाको भायाँके रूपमें इन्हें अर्पित
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