भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

१०२-शकट-भञ्जन

२९०

  • संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

उनका एक पैर छकड़ेसे छू गया। उसके हल्के आघातसे ही वह छकड़ा उलटकर गिर पड़ा। उसपर रखे हुए मटके और घड़े आदि टूट-फूट गये। उस समय समस्त गोप-गोपियाँ हाहाकार करती हुई वहाँ आ पहुँचीं। उन्होंने देखा—'बालक श्रीकृष्ण उत्तान सोये हुए हैं।' तब गोपोंने पूछा—'किसने इस छकड़ेको उलट दिया?' वहीं कुछ बालक खेल रहे थे। उन्होंने कहा—'इस बच्चेने ही गिराया है।' यह सुनकर गोपोंके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ। नन्दगोपने अत्यन्त विस्मित होकर बालकको गोदमें उठा लिया। यशोदाने भी आश्चर्य-चकित हो टूटे-फूटे भाँड़ोंके टुकड़ों और छकड़ेकी दही, फूल, फल और अक्षतसे पूजा की।

एक दिन वसुदेवजीकी प्रेरणासे गर्गजी गोकुलमें आये और अन्य गोपोंसे छिपे-छिपे ही उन्होंने उन दोनों बालकोंके द्विजोचित संस्कार किये। उनके नामकरण-संस्कार करते हुए परम बुद्धिमान् गर्गजीने बड़े बालकका नाम 'राम' और छोटेका 'कृष्ण' रखा। थोड़े ही दिनोंमें वे दोनों बालक महाबलवान्के रूपमें प्रसिद्ध हो गये। घुटनोंके बलसे चलनेके कारण उनके दोनों घुटनों और हाथोंमें रगड़ पड़ गयी थी। वे शरीरमें गोबर और राख लपेटे इधर-उधर घूमा करते थे। यशोदा और रोहिणी उन्हें रोक नहीं पाती थीं। कभी गौओंके बाड़ेमें खेलते-खेलते बछड़ोंके बाड़ेमें निकल जाते थे। कभी उसी दिन पैदा हुए बछड़ोंकी पूँछ पकड़कर खींचने लगते थे। वे दोनों बालक एक ही स्थानपर साथ-साथ खेलते और अत्यन्त चपलता दिखाते थे। एक दिन जब यशोदा उन्हें किसी प्रकार रोक न सकीं, तब उनके मनमें कुछ क्रोध हो आया। उन्होंने अनायास ही बड़े-बड़े कार्य करनेवाले श्रीकृष्णकी कमरमें रस्सी कस दी और उन्हें ऊखलसे बाँध दिया। उसके बाद कहा—'ओ चञ्चल! तू बहुत ऊधम मचा रहा था। अब तुझमें सामर्थ्य हो तो जा।' यों कहकर गृहस्वामिनी यशोदा अपने काम-काजमें लग गयीं। जब यशोदा घरके काम-धंधेमें फँस गयीं, तब कमलनयन श्रीकृष्ण ऊखलको घसीटते हुए दो अर्जुन वृक्षोंके बीचसे जा निकले। वे दोनों वृक्ष जुड़वें उत्पन्न हुए थे। उन वृक्षोंके बीचमें तिरछी पड़ी हुई ऊखलीको ज्यों ही उन्होंने खींचा, उसी समय ऊँची शाखाओंवाले वे दोनों वृक्ष जड़से उखड़कर गिर पड़े। वृक्षोंके उखड़ते समय बड़े जोरसे कड़कड़ाहटकी आवाज हुई। उसे सुनकर समस्त ब्रजवासी कातरभावसे वहाँ दौड़े आये। आनेपर सबने देखा वे दोनों महावृक्ष पृथ्वीपर गिरे पड़े हैं। उनकी मोटी-मोटी डालियाँ और पतली शाखाएँ भी टूट-टूटकर बिखर गयी हैं। उन दोनोंके बीचमें बालक कृष्ण मन्द-मन्द मुस्करा रहा है। उसके खुले हुए मुखमें थोड़े-से दाँत झलक रहे हैं। उसकी

१०३-वत्सचारण-लीला

  • भगवान्‌का अवतार, गोकुलगमन, पूतना-वध और श्रीकृष्णका बछड़े चराना * २९१

कमरमें खूब कसकर रस्सी बँधी हुई है। उदरमें दाम (रस्सी) बँधनेके कारण ही श्रीकृष्णकी दामोदरके नामसे प्रसिद्धि हुई।

तदनन्तर नन्द आदि समस्त बड़े-बूढ़े गोप, जो बड़े-बड़े उत्पातोंके कारण बहुत डर गये थे, उद्विग्न होकर आपसमें सलाह करने लगे—'अब हमें इस स्थानपर रहनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। किसी दूसरे महान् वनमें चलना चाहिये। यहाँ नाशके हेतुभूत अनेक उत्पात देखे जाते हैं—जैसे पूतनाका विनाश, छकड़ेका उलट जाना और बिना आँधी-वर्षाके ही दोनों वृक्षोंका गिरना आदि। अतः अब हम विलम्ब न करके शीघ्र ही यहाँसे वृन्दावनको चल दें। जबतक कोई भूमिसम्बन्धी दूसरा महान् उत्पात ब्रजको नष्ट न कर दे, तबतक ही हमें उसकी व्यवस्था कर लेनी चाहिये।' इस प्रकार वहाँसे चले जानेका निश्चय करके समस्त ब्रजवासी अपने-अपने कुटुम्बके लोगोंसे कहने लगे—'शीघ्र चलो, विलम्ब न करो।' फिर तो एक ही क्षणमें छकड़ों और गौओंके साथ सब लोग वहाँसे चल दिये। बछड़ोंके चरवाहे झुंड-के-झुंड एक साथ होकर उन बछड़ोंको चराते हुए चलते थे। ब्रजका वह खाली किया हुआ स्थान अन्नके दाने बिखरे होनेके कारण क्षणभरमें कौए आदि पक्षियोंसे व्यास हो गया। लीलापूर्वक सब कार्य करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने गौओंके अभ्युदयकी कामनासे अपने शुद्ध अन्तःकरणके द्वारा नित्य वृन्दावन धामका चिन्तन किया। अतः अत्यन्त रूक्ष ग्रीष्मकालमें भी वहाँ सब ओर वर्षाकालकी भाँति नयी-नयी घास जम गयी। वृन्दावनमें पहुँचकर वह समस्त गोप-गौओंका समुदाय चारों ओरसे अर्धचन्द्राकार छकड़ोंकी बाड़ लगाकर बस गया।

तत्पश्चात् बलराम और श्रीकृष्ण बछड़ोंकी चरवाही करने लगे। गोष्ठमें रहकर वे दोनों भाई अनेक प्रकारकी बाललीलाएँ किया करते थे। मोरके पंखका मुकुट बनाकर पहनते, जंगली पुष्पोंको कानोंमें धारण करते, कभी मुरली बजाते और कभी पत्तोंको लपेटकर उन्हींके छिद्रोंसे तरह-तरहकी ध्वनि निकालते थे। दोनों काक-पक्षधारी बालक हँसते-खेलते हुए उस महान् वनमें विचरण करते थे। कभी आपसमें ही एक-दूसरेको हँसाते हुए खेलते और कभी दूसरे ग्वालबालोंके साथ बालोचित क्रीड़ाएँ करते-फिरते थे। इस प्रकार कुछ समय बीतनेपर बलराम और श्रीकृष्ण सात वर्षके हो गये। जो सम्पूर्ण जगत्‌का पालन करनेवाले हैं, वे उस महाब्रजमें बछड़ोंके पालक बने हुए थे। धीरे-धीरे ग्रीष्म-ऋतुके बाद वहाँ वर्षाका समय आया। मेघोंकी घटासे सम्पूर्ण आकाश आच्छादित हो गया। निरन्तर धारावाहिक वृष्टि होनेसे सम्पूर्ण दिशाएँ एक-सी जान पड़ती थीं। पानी पड़नेसे

२९२* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

नयी-नयी घास उग आयी। स्थान-स्थानपर बीरबहूटियोंसे पृथ्वी आच्छादित हो गयी। जैसे पन्नेके फर्शपर लाल मणिकी ढेरी शोभा पाती है, उसी प्रकार बीरबहूटियोंसे ढकी हुई हरी-भरी पृथ्वी सुशोभित होती थी। जैसे नूतन सम्पत्ति पाकर उद्धत मनुष्योंके मन कुमार्गमें प्रवृत्त होने लगते हैं, उसी प्रकार वर्षाके जलसे भरी हुई नदियोंका पानी बाँध तोड़कर तटके ऊपरसे बहने लगा। संध्या होनेपर महाबली राम और श्रीकृष्ण इच्छानुसार व्रजमें लौट आते और अपने समवयस्क ग्वाल-बालोंके साथ देवताओंकी भाँति क्रीड़ा करते थे।

कालिय नागका दमन

**व्यासजी कहते हैं—**एक दिनकी बात है—श्रीकृष्ण अपने बड़े भाई बलरामजीको साथ लिये बिना ही वृन्दावनके भीतर गये और ग्वाल-बालोंके साथ विचरने लगे। जंगली पुष्पोंका हार पहननेके कारण वे बड़े सुन्दर दिखायी देते थे। घूमते-घूमते श्रीकृष्ण चञ्चल लहरोंसे सुशोभित यमुनाके तटपर गये, जो तटपर लगे हुए फेनोंके रूपमें मानो सब ओर हास्यकी छटा बिखेर रही थी। उस यमुनामें एक कालिय नागका कुण्ड था, जो विषाग्निके कणोंसे दूषित होनेके कारण अत्यन्त भयंकर हो गया था। श्रीकृष्णने उस भयानक कुण्डको देखा। उसकी फैलती हुई विषाग्निसे तटके बड़े-बड़े वृक्ष दग्ध हो गये थे। वायुके आघातसे जो जलमें हिलोर उठती थी और उससे जो जलके छींटे चारों ओर पड़ते थे, उनका स्पर्श हो जानेपर पक्षी जलकर भस्म हो जाते थे। वह महाभयंकर कुण्ड मृत्युका दूसरा मुख था। उसे देखकर भगवान् मधुसूदनने सोचा—‘इस कुण्डके भीतर दुष्टात्मा कालिय नाग रहता है, जिसका विष ही शस्त्र है। इसने यहाँ सागरगामिनी यमुनाका सारा जल दूषित कर दिया है। प्याससे पीड़ित मनुष्य अथवा गौएँ इस जलका उपयोग नहीं कर सकते। अतः मुझे नागराज कालियका दमन करना चाहिये, जिससे सदा भयभीत रहनेवाले व्रजवासी यहाँ सुखपूर्वक विचर सकें। मैंने मनुष्यलोकमें इसीलिये अवतार धारण किया है कि इन कुमार्गगामी दुरात्माओंको दण्ड देकर राहपर लाऊँ। वहाँ पास ही बहुत-सी शाखाओंसे सम्पन्न कदम्बका वृक्ष है। उसीपर चढ़कर जीवोंका नाश करनेवाले इस सर्पके कुण्डमें कूदूँगा।’

ऐसा निश्चय करके भगवान्ने अच्छी तरह कमर कस ली और वे वेगपूर्वक नागराजके कुण्डमें कूद पड़े। उनके कूदनेसे वह महान् कुण्ड क्षुब्ध हो उठा। पानीकी ऐसी हिलोर उठी कि बहुत दूरके वृक्ष भी भीग गये। सर्पकी विषाग्निद्वारा तपे हुए जलसे भीगनेके कारण वे सभी वृक्ष सहसा जल उठे। चारों दिशाओंमें आगकी लपटें फैल गयीं। उस नागकुण्डमें पहुँचकर श्रीकृष्णने अपनी भुजाओंपर ताल ठोंकी। उसका शब्द सुनकर नागराज उनके पास आया। उसके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे। उसके फणोंसे विषाग्निकी लपटें निकल रही थीं। और भी बहुत-से विषैले नाग उसे घेरे हुए थे। सैकड़ों नागपत्नियाँ भी वहाँ उपस्थित थीं, जो मनोहर हार पहनकर बड़ी शोभा पा रही थीं। उनके अङ्गोंके हिलने-डुलनेसे कानोंके चञ्चल कुण्डल झिलमिला रहे थे। सर्पोंने श्रीकृष्णको अपने शरीरमें लपेट लिया और वे विषकी ज्वालासे भरे हुए मुखोंद्वारा उन्हें डसने लगे। श्रीकृष्णको कुण्डमें पड़कर नागके फणोंसे पीड़ित होते देख ग्वाल-बाल व्रजमें दौड़े आये और शोकाकुल

१०४-कालिय नागके बन्धनमें श्रीकृष्ण

* कालिय नागका दमन * २९३

होकर रोते हुए बोले—‘व्रजवासियो! श्रीकृष्ण कालियह्रदमें डूबकर मूर्च्छित हो गये हैं। नागराज उन्हें खाये लेता है। तुम जल्दी आओ, विलम्ब न करो।’

यह बात सुनकर मानो गोपोंपर वज्र टूट पड़ा। समस्त गोप और यशोदा आदि गोपियाँ तुरंत कालियह्रदपर दौड़ी आयीं। ‘हाय, हाय, प्यारे कृष्ण कहाँ हैं?’ इस प्रकार विलाप करती हुई गोपियाँ अत्यन्त व्याकुल हो उठीं और यशोदाके साथ गिरती-पड़ती हुई वहाँ आयीं। नन्दगोप, अन्य गोपगण तथा अद्भुत पराक्रमी बलराम भी श्रीकृष्णको देखनेके लिये तुरंत यमुनातटपर जा पहुँचे। पुत्रका मुँह देखकर नन्दगोप और माता यशोदा दोनों जड़वत् हो गये।

अन्यान्य गोपियाँ भी शोकसे आतुर हो रोती हुई श्रीकृष्णकी ओर देखने लगीं। वे भयसे कातर हो गद्गद वाणीमें प्रेमपूर्वक बोलीं—‘हम सब लोग यशोदाके साथ नागराजके महान् कुण्डमें प्रवेश करें। अब व्रजमें लौटना हमारे लिये उचित नहीं है। भला, सूर्यके बिना दिन और चन्द्रमाके बिना रात कैसी। दूधके बिना गौएँ और श्रीकृष्णके बिना व्रज किस कामका। हम श्रीकृष्णके बिना गोकुलमें नहीं जायँगी।’

गोपियोंके ये वचन सुनकर रोहिणीनन्दन महाबली बलरामने देखा—गोपगण बहुत दुःखी हैं। इनकी आँखें आँसुओंसे भीगी हुई हैं। नन्दजी भी पुत्रके मुखपर दृष्टि लगाये अत्यन्त कातर हो रहे हैं और यशोदा अपनी सुध-बुध खो बैठी हैं। तब उन्होंने अपनी संकेतमयी भाषामें श्रीकृष्णको उनके माहात्म्यका स्मरण दिलाते हुए कहा—‘देवदेवेश्वर! तुम क्यों इस प्रकार मानवभाव व्यक्त कर रहे हो। क्या इस बातको नहीं जानते कि तुम इन मानवोंसे भिन्न साक्षात् परमात्मा हो? तुम्हीं इस जगत्के केन्द्र हो। देवताओंका आश्रय भी तुम्हीं हो। तुम्हीं त्रिभुवनकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले त्रयीमय परमेश्वर हो। हम दोनों इस समय यहाँ अवतीर्ण हुए हैं। इस व्रजमें ये गोप-गोपियाँ ही हमारे बान्धव हैं। ये सब-के-सब तुम्हारे लिये दुःखी हो रहे हैं। फिर क्यों अपने इन बन्धुओंकी उपेक्षा करते हो। तुमने मनुष्यभाव अच्छी तरह दिखा लिया। बालोचित चपलता दिखानेमें भी कोई कमी नहीं की। अब यह खेल रहने दो और दाँतोंसे ही अस्त्र-शस्त्रोंका काम लेनेवाले इस दुरात्मा नागका दमन करो।’

बलरामजीके द्वारा इस प्रकार स्मरण दिलाये जानेपर श्रीकृष्णके होठ मन्द मुसकानसे खिल उठे। उन्होंने अँगड़ाई लेकर अपने शरीरको साँपोंके बन्धनसे छुड़ा लिया और दोनों हाथोंसे उसके बीचके फणको नीचे झुकाकर वे उसीपर चढ़ गये और शीघ्रतापूर्वक पैर चलाते हुए नृत्य करने लगे। श्रीकृष्णके चरणोंके आघातसे उस नागके

१०५-कालिय नागके फणोंपर भगवान्‌का नृत्य

२९४ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


फणमें कई घाव हो गये। वह जिस फणको ऊपर उठाता, उसीको भगवान् अपने पैरोंसे झुकाकर दबा देते थे। श्रीकृष्णके द्वारा कुचले जानेसे नागको चक्कर आने लगा। वह मूर्च्छित होकर डंडेकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसके मस्तक और गर्दन टेढ़े हो गये थे। मुखसे रक्तकी अजस्र धारा बह रही थी। यह देखकर नागराजकी पत्नियाँ भगवान् मधुसूदनकी शरणमें गयीं।

नागपत्नियाँ बोलीं—देवदेवेश्वर! हमने आपको पहचान लिया। आप सबके ईश्वर और सबसे उत्तम हैं। अचिन्त्य परमज्योतिःस्वरूप जो ब्रह्म है, उसीके अंशभूत आप परमेश्वर हैं। देवता भी जिन स्वयम्भू प्रभुकी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हैं, उन्हींके स्वरूपका वर्णन हम-जैसी साधारण स्त्रियाँ कैसे कर सकती हैं। सम्पूर्ण पृथ्वी, आकाश, जल, अग्नि और वायुरूप यह ब्रह्माण्ड जिनके छोटे-से अंशका भी अंश है, उस भगवान्की स्तुति हम कैसे कर सकती हैं। जगन्नाथ! हम बड़े कष्टमें पड़ गयी हैं। आप हमपर कृपा करें। यह नाग अब प्राण त्यागना चाहता है। हमें पतिकी भिक्षा दें।

उनके इस प्रकार स्तुति करनेपर कालिय नागको कुछ आश्वासन मिला। यद्यपि उसका शरीर अत्यन्त शिथिल हो गया था तो भी वह धीरे-धीरे बोला—‘देवदेव! मुझपर प्रसन्न हों। नाथ! आपमें अणिमा आदि आठ ऐश्वर्य स्वाभाविक हैं। आपसे बढ़कर अन्यत्र कहीं भी उनकी स्थिति नहीं है। ऐसे आप परमेश्वरकी मैं क्या स्तुति करूँगा। आप पर हैं। पर (मूल प्रकृति)-के भी आदि कारण हैं। परकी प्रवृत्ति भी आपसे ही हुई है। परात्मन्! आप परसे भी पर हैं। फिर मैं कैसे आपकी स्तुति कर सकता हूँ। ईश्वर! आपने जाति, रूप और स्वभावसे मुझे जैसा बनाया है, उसके अनुसार ही मैंने यह चेष्टा की है। देवदेव! यदि इन सबके विपरीत कोई चेष्टा करूँ तो मुझे दण्ड देना उचित हो सकता है। क्योंकि आपका ऐसा ही आदेश है तथापि आप जगत्के स्वामी हैं। आपने मुझको जो दण्ड दिया है, उसे मैंने सहर्ष स्वीकार किया; क्योंकि आपसे मिला हुआ दण्ड भी वरदान है। अब मेरे लिये दूसरे वरकी आवश्यकता नहीं है। अच्युत! आपने मेरे बलका नाश किया, मेरे विषको भी हर लिया और पूर्णरूपसे मेरा दमन भी कर दिया। अब एकमात्र जीवन रह गया है। उसे छोड़ दीजिये और कहिये, आपकी क्या सेवा करूँ?’

श्रीभगवान् बोले—‘सर्प! अब तुम्हें यहाँ यमुनाजलमें कदापि नहीं रहना चाहिये। अपने भृत्य और परिवारके साथ समुद्रके जलमें चले जाओ। नाग! तुम्हारे मस्तकपर मेरे चरणचिह्न देखकर नागोंके शत्रु गरुड़ तुमपर प्रहार नहीं करेंगे।’

यों कहकर भगवान् श्रीहरिने नागराजको छोड़ दिया। वह भी श्रीकृष्णको प्रणाम करके समुद्रको

७४- धेनुक और प्रलम्बका वध तथा गिरियज्ञका अनुष्ठान

* धेनुक और प्रलम्बका वध तथा गिरियज्ञका अनुष्ठान * २९५

चला गया। उसने सबके देखते-देखते सेवक, संतान, बन्धु-बान्धव और पत्नियोंके साथ सदाके लिये वह कुण्ड त्याग दिया। सर्पके चले जानेपर गोपोंने दौड़कर श्रीकृष्णको छातीसे लगा लिया, मानो वे मरकर पुनः लौट आये हों। उनके नेत्रोंसे आँसू निकलकर श्रीकृष्णके मस्तकपर गिरने लगे।

कुछ गोप विस्मित होकर श्रीकृष्णकी स्तुति करने लगे। यमुना नदीका जल विषसे रहित हो गया—यह देख समस्त गोपोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। गोपियाँ श्रीकृष्णकी मनोहर लीलाओंका गान करने लगीं और ग्वाल-बाल उनके गुणोंकी प्रशंसा करने लगे। उन सबके साथ श्रीकृष्ण व्रजमें आये।


धेनुक और प्रलम्बका वध तथा गिरियज्ञका अनुष्ठान

**व्यासजी कहते हैं—**एक दिन बलराम और श्रीकृष्ण साथ-साथ गौएँ चराते हुए वनमें विचरने लगे। घूमते-घूमते वे परम रमणीय ताड़के वनमें जा पहुँचे। वहाँ धेनुक नामक दानव गदहेके रूपमें सदा निवास करता था। मनुष्यों और गौओंका मांस ही उसका भोजन था। फलकी समृद्धिसे पूर्ण मनोहर तालवनको देखकर ग्वाल-बाल वहाँके फल लेनेको ललचा उठे और बोले—'भैया राम! ओ कृष्ण! धेनुकासुर सदा इस भूभागकी रक्षा करता है। इसीलिये ये ताड़ोंके सुगन्धित फल लोगोंने छोड़ रखे हैं। हम इन्हें प्राप्त करना चाहते हैं। यदि आपलोगोंको जँचे तो इन फलोंको गिराइये।' ग्वाल-बालोंकी यह बात सुनकर बलराम और श्रीकृष्णने बहुत-से तालफल पृथ्वीपर गिराये। गिरते हुए फलोंका शब्द सुनकर वह गर्दभाकार दुष्ट दैत्य क्रोधमें भरा हुआ आया। आते ही उसने अपने दोनों पिछले पैरोंसे बलरामजीकी छातीमें प्रहार किया। बलरामजीने उसके दोनों पैर पकड़ लिये और उसे आकाशमें घुमाना आरम्भ किया। घुमानेसे आकाशमें ही उसके प्राणपखेरू उड़ गये। फिर वेगसे बलरामजीने उसे एक महान् ताल-वृक्षपर दे मारा। जैसे आँधी बादलोंको उड़ा देती है, उसी प्रकार उस दैत्यने गिरते-गिरते अपने शरीरके आघातसे बहुतेरे फल गिरा दिये।

उसके मारे जानेपर और भी बहुत-से गर्दभाकार दैत्य आये, किंतु श्रीकृष्ण और बलभद्रने उन सबको खेल-खेलमें ही उठाकर वृक्षोंपर फेंक दिया। एक ही क्षणमें पके हुए ताड़के फलों और गर्दभाकार दैत्योंके शरीरसे सारी पृथ्वी पट गयी। इससे उस स्थानकी बड़ी शोभा होने लगी। तबसे उस तालवनमें गौएँ बाधारहित होकर नयी-नयी घास चरने लगीं।

अनुचरोंसहित धेनुकासुरके मारे जानेपर वह मनोहर तालवन समस्त गोप-गोपियोंके लिये सुखदायक हो गया। इससे वसुदेवके दोनों पुत्र बलराम और श्रीकृष्ण प्रसन्न हुए। वे दोनों महात्मा छोटे-छोटे सींगोंवाले बछड़ोंकी भाँति शोभा पा रहे थे। कंधेपर गाय बाँधनेकी रस्सी लिये, वनमालासे विभूषित हो वे दूर-दूरतक गौएँ चराते और उनके नाम ले-लेकर पुकारते थे। श्रीकृष्णका वस्त्र सुनहरे रंगका था और बलरामजीका नीले रंगका। उन्हें धारण किये वे दोनों भाई दो इन्द्रधनुषों एवं श्वेत-श्याम मेघोंकी भाँति शोभा पाते थे। लोकमें बालकोंके जो-जो खेल प्रचलित हैं, उन सबके द्वारा परस्पर क्रीड़ा करते हुए वनमें विचरते थे। समस्त लोकनाथोंके नाथ होकर भी वे इस पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए और मानवधर्ममें तत्पर रहकर मनुष्ययोनिको गौरवान्वित करते थे।

२९६ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

मानव-जातिके गुणोंसे युक्त भाँति-भाँतिके खेल खेलते हुए वनमें घूमते थे। कभी झूला झूलकर और कभी आपसमें कुश्ती लड़कर महाबली श्रीराम और श्रीकृष्ण व्यायाम करते थे। उन दोनोंको खेलते देख प्रलम्ब नामक दानव उन्हें पकड़ ले जानेकी इच्छासे वहाँ आया। उसने ग्वाल-बालोंके वेषमें अपने वास्तविक रूपको छिपा रखा था। मनुष्य न होते हुए भी मनुष्यका रूप धारण करके दानवोंमें श्रेष्ठ प्रलम्ब ग्वाल-बालोंकी उस मण्डलीमें बेखटके जा मिला। वह राम और कृष्ण दोनोंको उठा ले जानेका अवसर ढूँढ़ने लगा। उसने कृष्णको तो सर्वथा अजेय समझा। अतः रोहिणीनन्दन बलरामको ही मारनेका निश्चय किया।

तदनन्तर उन ग्वाल-बालोंमें हरिणाक्रीडन नामक खेल आरम्भ हुआ। यह बालकोंका वह खेल है, जिसमें दो-दो बालक एक साथ हिरणकी तरह उछलते हुए किसी निश्चित लक्ष्यतक जाते हैं। आगे पहुँचनेवाला विजयी होता है। हारा हुआ बालक विजयीको अपनी पीठपर बिठाकर नियत स्थानतक ले आता है। इस खेलमें सब लोग सम्मिलित हुए। दो-दो बालक एक साथ उछलते हुए चले। श्रीदामाके साथ श्रीकृष्ण, प्रलम्बके साथ बलराम तथा अन्य ग्वाल-बालोंके साथ दूसरे-दूसरे बालक कूद रहे थे। श्रीकृष्णने श्रीदामाको और बलरामने प्रलम्बको जीत लिया। इसी प्रकार श्रीकृष्णपक्षके अन्य बालकोंने भी अपने साथियोंको हरा दिया। अब वे हारे हुए बालक एक-दूसरेको अपनी पीठपर लादे हुए भाण्डीर-वटतक आये और पुनः वहाँसे लौट चले। किन्तु दानव प्रलम्ब बलरामको अपने कंधेपर चढ़ाकर शीघ्र ही उड़ चला! वह चलता ही गया। कहीं रुका नहीं। जब वह बलरामजीका भार नहीं सह सका, तब बड़े क्रोधमें आकर वर्षाकालके मेघकी भाँति उसने अपने शरीरको बढ़ा लिया। बलरामजीने देखा, उस दैत्यका रंग जले हुए पर्वतके समान है। उसके गलेमें बहुत बड़ा हार लटक रहा था। मस्तकपर बहुत बड़ा मुकुट था। आँखें गाड़ीके पहिये-जैसी घूम रही थीं। उसके पैर रखनेसे धरती डगमगाने लगती थी। उसका रूप बड़ा ही भयंकर था। ऐसे राक्षसके द्वारा अपनेको हरे जाते देख बलरामने श्रीकृष्णसे कहा—'कृष्ण! कृष्ण! इधर तो देखो, ग्वाल-बालोंके वेषमें छिपा हुआ कोई दैत्य मुझे हरकर लिये जाता है। इसकी विकराल मूर्ति पर्वतके समान दिखायी देती है। मधुसूदन! बताओ, इस समय मुझे क्या करना चाहिये। यह दुरात्मा बड़ी उतावलीके साथ भागा जाता है।'

यह सुनकर भगवान् श्रीकृष्णके ओठ मन्द मुसकानसे खिल उठे। वे रोहिणीनन्दन बलरामके बल और पराक्रमको जानते थे। अतः उनसे बोले—'सर्वात्मन्! यह क्या बात है, आप तो स्पष्टरूपमें मनुष्यकी-सी चेष्टा करने लगे। आप सम्पूर्ण गुह्य पदार्थोंमें गुह्यसे भी गुह्य हैं। जरा अपने उस स्वरूपका तो स्मरण कीजिये, जो सम्पूर्ण जगत्‌का कारण, कारणोंका भी पूर्ववर्ती, अद्वितीय आत्मा और प्रलयकालमें भी स्थित रहनेवाला है। विश्वात्मन्! आप और मैं दोनों ही इस संसारके एकमात्र कारण हैं और पृथ्वीका भार उतारनेके लिये यहाँ दो रूपोंमें प्रकट हैं। अप्रमेयात्मन्! आप अपने स्वरूपको स्मरण कीजिये और इस दानवको मार डालिये। तत्पश्चात् मानुष-भावका आश्रय लेकर बन्धुजनोंका हित कीजिये।'

महात्मा श्रीकृष्णके द्वारा इस प्रकार अपने स्वरूपका स्मरण कराये जानेपर महाबली बलरामने हँसकर प्रलम्बासुरको दबाया और क्रोधसे लाल

१०६-बलरामद्वारा प्रलम्बासूरका वध

* धेनुक और प्रलम्बका वध तथा गिरियज्ञका अनुष्ठान *२९७

आँखें करके उसके मस्तकपर एक मुक्का मारा। उनके इस प्रहारसे प्रलम्बके दोनों नेत्र बाहर निकल आये, मस्तिष्क फट गया और वह दैत्य मुँहसे खून उगलता हुआ पृथ्वीपर गिरकर मर गया। अद्भुत कर्म करनेवाले बलदेवजीके द्वारा प्रलम्बको मारा गया देख ग्वाल-बाल ‘बहुत अच्छा हुआ, बहुत अच्छा हुआ’ कहते हुए उनकी प्रशंसा करने लगे। इस प्रकार प्रलम्बासूरके मारे जानेपर ग्वाल-बालोंके मुखसे अपनी प्रशंसा सुनते हुए बलरामजी श्रीकृष्णके साथ पुनः गौओंके समूहमें आये।

इस तरह नाना प्रकारकी लीलाएँ करते हुए बलराम और श्रीकृष्ण वनमें विहार करते रहे। इतनेमें ही वर्षा बीत गयी और शरद्-ऋतुका आगमन हुआ। जलाशयोंमें कमल खिलने लगे, आकाश और नक्षत्र निर्मल हो गये। ऐसे समयमें समस्त व्रजवासी इन्द्रोत्सवका आयोजन करने लगे। उन्हें उत्सवके लिये अत्यन्त उत्सुक देख परम बुद्धिमान् श्रीकृष्णने बड़े-बूढ़े गोपोंसे कौतूहलवश पूछा—‘यह इन्द्रोत्सव क्या वस्तु है, जिससे आपलोगोंको इतना हर्ष हुआ है?’ श्रीकृष्णको अत्यन्त आदरपूर्वक प्रश्न करते देख नन्द गोपने कहा—‘बेटा! देवराज इन्द्र मेघ और जलके स्वामी हैं। उन्हींसे प्रेरित होकर मेघ जलमय रसकी वृष्टि करते हैं। उस वृष्टिसे ही अन्न पैदा होता है, जिसे हम तथा अन्य देहधारी खाकर जीवन-निर्वाह करते और देवता आदिको भी तृप्त करते हैं। ये दूध और बछड़ोंवाली गौएँ इन्द्रके बढ़ाये हुए अन्नसे ही संतुष्ट हो हृष्ट-पुष्ट रहती हैं। जहाँ वर्षा करनेवाले मेघ होते हैं, वहाँ बिना खेतीकी भूमि नहीं दिखायी देती, कोई ऋणग्रस्त नहीं रहता और वहाँ एक भी भूखसे पीड़ित मनुष्य नहीं दृष्टिगोचर होता। मेघ सूर्यकी किरणोंद्वारा इस पृथ्वीका जल ग्रहण करते और फिर सम्पूर्ण लोकोंकी भलाईके लिये उसे बरसा देते हैं। अतः वर्षाकालमें सब राजालोग, हम तथा अन्य देहधारी भी बड़ी प्रसन्नताके साथ उत्सव मनाते और देवराज इन्द्रकी पूजा करते हैं।’

इन्द्रपूजाके विषयमें नन्दगोपका ऐसा कथन सुनकर भगवान् दामोदरने इन्द्रको कुपित करनेके उद्देश्यसे कहा—‘पिताजी! हमलोग न तो खेती करते हैं और न व्यापारसे ही जीविका चलाते हैं। हमारे देवता तो ये गौएँ ही हैं। क्योंकि हम सब लोग वनवासी हैं। आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता और दण्डनीति—ये चार प्रकारकी विद्याएँ हैं। इनमेंसे वार्ताका सम्बन्ध हमलोगोंसे है। अतः उसका वर्णन सुनिये। कृषि, वाणिज्य और पशुपालन—इन तीन वृत्तियोंपर वार्ता अवलम्बित रहती है। कृषि किसानोंकी वृत्ति है और वाणिज्य क्रय-विक्रय करनेवाले वैश्योंकी। हमलोगोंकी सबसे प्रधान वृत्ति है—गोपालन। इस प्रकार ये वार्ताके तीन भेद हैं। उपर्युक्त चार विद्याओंमेंसे

१०७-गिरिराजरूपमें पूजा-ग्रहण

२९८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

जो जिस विद्यासे निर्वाह करता है, वही उसके लिये महान् देवता है। उसे उसीकी पूजा-अर्चा करनी चाहिये। वही उसके लिये उपकारक है। जो मनुष्य एकका दिया हुआ फल भोगता और किसी दूसरेकी पूजा करता है, वह इस लोक या परलोकमें—कहीं भी कल्याणका भागी नहीं होता। हमारे इस व्रजकी जो प्रख्यात सीमाएँ हैं, उनका पूजन होना चाहिये। सीमाके भीतर वन है और वनके भीतर सम्पूर्ण पर्वत हैं, जो हमारे लिये परम आश्रय हैं। अतः हमें गिरियज्ञ और गोयज्ञ आरम्भ करना चाहिये। इन्द्रसे हमारा क्या लाभ होता है। हमारे लिये तो गौएँ और गिरिराज ही देवता हैं। ब्राह्मण मन्त्रयुक्त यज्ञको प्रधानता देते हैं। किसानोंके यहाँ सीरयज्ञ (हल-पूजन) होता है और हम-जैसे वन एवं पर्वतोंमें रहनेवाले लोग गिरियज्ञ और गोयज्ञका अनुष्ठान करें तो उत्तम है। इसलिये मेरा विचार तो यह है कि आपलोग भाँति-भाँतिकी पूजा-सामग्रियोंसे गिरिराज गोवर्धनकी पूजा करें। सम्पूर्ण व्रजका दूध एकत्र किया जाय और उससे ब्राह्मणों तथा अन्य याचकोंको भोजन कराया जाय। इस प्रकार गोवर्धनका पूजन, होम और ब्राह्मण-भोजन हो जानेपर गौओंका शरद्-ऋतुमें प्राप्त होनेवाले पुष्पोंद्वारा शृङ्गार किया जाय और वे गिरिराजकी परिक्रमा करें। गोपगण! यही मेरी सम्मति है। यदि आपलोग प्रेमपूर्वक यह यज्ञ करेंगे तो इसके द्वारा गौएँ और गिरिराज गोवर्धन प्रसन्न होंगे। साथ ही मुझे भी बड़ी प्रसन्नता होगी।'

श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर नन्द आदि व्रजवासियोंके मुख हर्षसे प्रफुल्लित हो उठे। वे बोले—'बहुत ठीक, बहुत ठीक। बेटा! तुमने जो अपना मत प्रकट किया है, वह बहुत सुन्दर है। हमलोग वही करेंगे। अब गिरियज्ञका ही आरम्भ किया जाय।' यों कहकर ब्रजवासियोंने गिरियज्ञका

अनुष्ठान किया। गिरिराज गोवर्धनको दही और खीर आदिकी बलि चढ़ायी। सैकड़ों-हजारों ब्राह्मणोंको भोजन कराया। फिर गायों और साँड़ोंकी पूजा की गयी और उनके द्वारा गिरिराजकी परिक्रमा करायी गयी। साँड़ जलसे भरे मेघकी भाँति गर्जना करते थे। भगवान् श्रीकृष्ण दूसरे रूपमें पर्वतके शिखरपर जा बैठे और मैं ही मूर्तिमान् गिरिराज हूँ—यों कहकर गोपोंद्वारा अर्पित किये हुए नाना प्रकारके अन्नोंका भोग लगाने लगे तथा अपने कृष्णरूपसे ही गोपोंके साथ पर्वत-शिखरपर चढ़कर उन्होंने अपने द्वितीय शरीर गिरिराजका पूजन भी किया। तदनन्तर गिरिराजरूपमें प्रकट हुए भगवान् अन्तर्धान हो गये और गोपगण उनसे मनोवाञ्छित वरदान पाकर गिरियज्ञकी समाप्ति करके पुनः अपने व्रजमें लौट आये।

७५- इन्द्रके द्वारा भगवान्‌का अभिषेक, श्रीकृष्ण और गोपियोंकी बातचीत, रासलीला और अरिष्टासुरका वध

* इन्द्रके द्वारा भगवान्‌का अभिषेक, रासलीला और अरिष्टासुरका वध * २९९

इन्द्रके द्वारा भगवान्‌का अभिषेक, श्रीकृष्ण और गोपोंकी बातचीत, रासलीला और अरिष्टासुरका वध

व्यासजी कहते हैं—इन्द्रयज्ञमें बाधा पड़नेसे देवराज इन्द्रको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने मेघोंके संवर्तक नामक गणसे कहा—'बादलो! मेरी बात सुनो और मैं जो भी आज्ञा दूँ, उसे बिना विचारे शीघ्र पूरा करो। खोटी बुद्धिवाले नन्दगोपने अन्य ग्वालोंके साथ श्रीकृष्णके बलपर उन्मत्त हो मेरे यज्ञको बंद कर दिया है। इसलिये उनकी जो सबसे बड़ी आजीविका हैं और जिनका पालन करनेके कारण वे गोप कहलाते हैं, उन गौओंको मूसलाधार वृष्टिसे पीड़ित करो। मैं भी पर्वत-शिखरके समान ऊँचे ऐरावतपर सवार हो वायुके संयोगसे तुमलोगोंकी सहायता करूँगा।' देवराजकी ऐसी आज्ञा पाकर मेघोंने गौओंका संहार करनेके लिये बड़ी भयंकर आँधी और वर्षा आरम्भ की। एक ही क्षणमें पृथ्वी, दिशाएँ और आकाश धारावाहिक वृष्टिके कारण एक हो गये। वर्षाके साथ ही वायु भी बड़े वेगसे चल रही थी। इससे काँपती हुई गौएँ प्राण त्यागने लगीं। कुछ गौएँ अपने अङ्कमें बछड़ोंको छिपाकर खड़ी थीं। जलकी तेज धारा बहनेसे कितनी ही गायोंके बछड़े बह गये। बछड़ोंका मुख अत्यन्त दयनीय हो रहा था। वायुके वेगसे उनकी गर्दन काँप रही थी। मानो वे आर्त होकर मन्द स्वरमें श्रीकृष्णसे त्राहि-त्राहिकी पुकार कर रही थीं। भगवान्‌ने देखा—गौओं, गोपियों और ग्वालोंसे भरा हुआ सम्पूर्ण ब्रज अत्यन्त पीड़ित हो रहा है। तब उन्होंने उनकी रक्षाके लिये इस प्रकार विचार किया—'जान पड़ता है यह सब देवराज इन्द्रकी करतूत है। अपना यज्ञ बंद होनेसे वे हमलोगोंके विरोधी हो गये हैं। इस समय मुझे समस्त ब्रजकी रक्षा करनी चाहिये। यह गोवर्धन पर्वत बड़ी-बड़ी शिलाओंसे युक्त है। इसीको अपने बलसे उखाड़कर मैं ब्रजके ऊपर छत्रकी भाँति धारण करूँगा।'

ऐसा निश्चय करके श्रीकृष्णने गोवर्धन पर्वतको उखाड़ लिया और उसे लीलापूर्वक एक ही हाथसे धारण किया। पर्वत उखाड़नेके बाद जगदीश्वर श्रीकृष्णने गोपोंसे कहा—'मैंने वर्षासे बचनेका उपाय कर दिया। तुम सब लोग इसके नीचे आ जाओ और जहाँ वायुका झोंका न लगे, ऐसे स्थानोंमें यथायोग्य बैठ जाओ। किसी प्रकारका भय न करो। पर्वतके गिरनेकी आशङ्का बिलकुल छोड़ दो।' भगवान्‌के यों कहनेपर समस्त गोप छकड़ोंपर बर्तन-भाँड़े लादे गौओंके साथ उसके नीचे आ गये। वर्षाकी धारासे पीड़ित हुई गोपियाँ भी वहीं आ गयीं। श्रीकृष्णने गोवर्धन पर्वतको स्थिरतापूर्वक धारण कर रखा था। वह तनिक

१०९-गोविन्दका अभिषेक

३०० | * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

भी हिलता-डुलता नहीं था। ब्रजमें रहनेवाले गोप-गोपीजन हर्ष और विस्मयपूर्ण दृष्टिसे उन्हें देखते रहे। वे प्रेमपूर्वक निर्निमेष नेत्रोंसे देखते हुए भगवान्की स्तुति करते रहे। नन्दके ब्रजमें मेघोंने लगातार सात रातोंतक वर्षा की। वे इन्द्रकी आज्ञासे गोपोंका विनाश करनेपर तुले थे। परंतु श्रीकृष्ण तबतक उस पर्वतको धारण किये खड़े ही रह गये। इससे गोकुलकी पूर्ण रक्षा हुई और इन्द्रकी प्रतिज्ञा झूठी हो गयी। तब उन्होंने बादलोंको वर्षा करनेसे रोक दिया। बादल हट गये। आकाश स्वच्छ हो गया और इन्द्रका षड्यन्त्र सफल न हो सका। तब समस्त ब्रजके लोग प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे निकलकर पुनः अपने स्थानपर आये। फिर श्रीकृष्णने भी महापर्वत गोवर्धनको यथास्थान रख दिया। ब्रजवासी विस्मित होकर उनकी यह लीला देख रहे थे।

श्रीकृष्णने गोवर्धन पर्वत धारण करके समूचे गोकुलको बचा लिया, यह जानकर इन्द्रको उनके दर्शनकी इच्छा हुई। वे महागज ऐरावतपर आरूढ़ हो ब्रजमें आये। वहाँ देवराजने गोवर्धन पर्वतके समीप श्रीकृष्णका दर्शन किया। वे गोप-शरीर धारण करके गौएँ चरा रहे थे। उनका पराक्रम अनन्त था। सम्पूर्ण जगत्के रक्षक भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ ग्वाल-बालोंसे घिरे हुए खड़े थे। ऊपर पक्षिराज गरुड़ अन्य प्राणियोंसे अदृश्य रहकर श्रीहरिके मस्तकपर अपने पंखोंसे छाया कर रहे थे। यह देखकर इन्द्र एकान्तमें ऐरावत हाथीसे उतरे और प्रेमसे एकटक देखते हुए भगवान् मधुसूदनसे मुसकराकर बोले—‘महाबाहु श्रीकृष्ण! मैं आपके समीप जिस कार्यके लिये आया हूँ, उसे सुनिये। मेरे प्रति कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। परमेश्वर ! आप ही सम्पूर्ण जगत्के आधार हैं और पृथ्वीका भार उतारनेके लिये भूतलपर अवतीर्ण हुए हैं। मेरा यज्ञ बंद होनेसे मेरे मनमें विरोध जाग उठा और मैंने गोकुलका नाश करनेके लिये बड़े-बड़े मेघोंको वर्षा करनेकी आज्ञा दे दी। उन्होंने ही यह संहार मचाया है। परंतु आपने महापर्वत गोवर्धनको उखाड़कर समस्त गौओंको कष्टसे बचा लिया। वीरवर ! आपके इस अद्भुत कर्मसे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है। कृष्ण! मैं तो अब ऐसा मानता हूँ कि आज ही देवताओंका सारा प्रयोजन सिद्ध हो गया। क्योंकि आपने एक ही हाथसे इस गिरिराजको ऊपर उठा रखा था। श्रीकृष्ण! आपने गोवंशकी बहुत बड़ी रक्षा की है। अतः आपका आदर करनेके लिये मैं गौओंकी प्रेरणासे यहाँ आपके समीप आया हूँ। गौओंके आदेशानुसार आज मैं उपेन्द्रके पदपर आपका अभिषेक करूँगा। आजसे आप गौओंके इन्द्र होकर गोविन्द नामसे विख्यात होंगे।’

यों कहकर इन्द्रने ऐरावत हाथीसे घण्टा उतारा। उसमें पवित्र जल भरा हुआ था। उस दिव्य जलसे उन्होंने श्रीकृष्णका अभिषेक किया।

  • इन्द्रके द्वारा भगवान्‌का अभिषेक, रासलीला और अरिष्टासुरका वध * ३०१

श्रीकृष्णका अभिषेक होते समय गौओंने तत्काल अपने थनोंसे दूधकी धारा बहाकर वसुधाको भिगो दिया। अभिषेकका कार्य पूरा करके शचीपति इन्द्रने प्रेम और विनयपूर्वक श्रीकृष्णसे फिर कहा—'महाभाग! यह सब तो मैंने गौओंके आदेशसे किया है। अब पृथ्वीका भार उतरवानेकी इच्छासे मैं जो और कुछ बातें निवेदन करता हूँ, उन्हें भी सुनिये। मेरे अंशसे इस पृथ्वीपर एक श्रेष्ठ पुरुष उत्पन्न हुआ है, जिसका नाम अर्जुन है। आप उसकी सदा रक्षा करते रहें। मधुसूदन! अर्जुन वीर पुरुष है। वह इस भूमिक भार उतारनेमें आपकी सहायता करेगा। जैसे अपनी रक्षा की जाती है, वैसे ही आपको अर्जुनकी भी रक्षा करनी चाहिये।'

**श्रीभगवान् बोले—**देवराज ! मैं जानता हूँ, भरतवंशमें आपके अंशसे अर्जुनकी उत्पत्ति हुई है। मैं जबतक इस भूतलपर रहूँगा, अर्जुनकी रक्षा करूँगा। मेरे रहते अर्जुनको युद्धमें कोई भी जीत न सकेगा। महाबाहु कंस, अरिष्टासुर, केशी, कुवलयापीड और नरकासुर आदि दैत्योंके मारे जानेके पश्चात् महाभारत युद्ध होगा। उसकी समाप्ति होनेपर यह जानना चाहिये कि पृथ्वीका भार उतर गया। अब आप जाइये, पुत्रके लिये चिन्ता न कीजिये। मेरे आगे अर्जुनका कोई भी शत्रु सफल न हो सकेगा। केवल अर्जुनके लिये ही मैं युधिष्ठिर आदि पाँचों भाइयोंको महाभारतके अन्तमें कुन्तीदेवीके समीप सकुशल लौटाऊँगा।

श्रीकृष्णके यों कहनेपर देवराज इन्द्रने उन्हें छातीसे लगाया और ऐरावतपर आरूढ़ हो पुनः स्वर्गको प्रस्थान किया। तदनन्तर श्रीकृष्ण गौओं और ग्वाल-बालोंके साथ पुनः ब्रजमें लौट आये। गोपियोंकी आँखें उनके पथपर लगी हुई थीं। उनकी दृष्टिसे वह मार्ग पवित्र हो गया था।

इन्द्रके चले जानेपर गोपोंने अनायास ही अद्भुत कर्म करनेवाले श्रीकृष्णसे प्रेमपूर्वक कहा—'महाभाग ! आपने गोवर्धन पर्वत उठाकर हमारी और गौओंकी बहुत बड़े भयसे रक्षा की है। तात! यह अनुपम बाललीला, समाजमें नीचा समझा जानेवाला ग्वालेका शरीर और आपका दिव्य कर्म—यह सब क्या है? आपने जलमें प्रवेश करके कालिय नागका दमन किया, प्रलम्बको मार गिराया और गोवर्धन पर्वतको हाथपर उठा लिया। इससे हमारे मनमें सन्देह पैदा होता है। अमितपराक्रम श्रीकृष्ण! हम श्रीहरिके चरणोंकी शपथ खाकर सत्य-सत्य कहते हैं कि आपकी इस दिव्य शक्तिको देखते हुए हमें विश्वास नहीं होता कि आप मनुष्य हैं। आप देवता हैं या दानव, यक्ष हैं या गन्धर्व—इन सब बातोंका विचार करनेसे हमारा क्या लाभ है। आप कोई भी क्यों न हों, इस समय हमारे बान्धव हैं। अतः आपको नमस्कार है। हम देखते हैं, स्त्री और बालकोंसहित समस्त ब्रजका आपके प्रति प्रेम बढ़ रहा है और यह कर्म भी आपका ऐसा है, जिसे सम्पूर्ण देवता भी नहीं कर सकते। अभी आप बालक हैं, फिर भी आपके बलकी कोई सीमा नहीं है। इधर आपने हमलोगोंमें जन्म लिया है, जो अच्छी श्रेणीमें नहीं गिना जाता। अमेयात्मन्! इन सब बातोंपर विचार करनेसे आप हमारे मनमें शङ्का उत्पन्न कर देते हैं।'

गोपोंकी यह बात सुनकर भगवान् कुछ कालतक प्रेमसे रूठकर चुपचाप बैठे रहे। फिर इस प्रकार बोले—'गोपगण! यदि मेरे साथ सम्बन्ध होनेसे आपको लज्जा नहीं आती हो अथवा यदि मैं आपलोगोंका प्रिय हूँ तो इस प्रकार विचार करनेकी क्या आवश्यकता है। यदि मुझपर आपका प्रेम है अथवा मैं आपकी प्रशंसाका पात्र हूँ तो मेरे प्रति

११०-वृन्दावनमें रासके लिये गोपियोंका आगमन

३०२ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


अपने बन्धु-बान्धवोंके समान ही स्नेह रखिये। मैं न देवता हूँ न गन्धर्व हूँ, न यक्ष हूँ और न दानव ही हूँ। मैं तो आपका बन्धु होकर उत्पन्न हुआ हूँ। अतः यही आपको मानना चाहिये। इसके विपरीत किसी भी विचारको मनमें स्थान नहीं देना चाहिये।'

श्रीहरिका यह वचन सुनकर गोप मौन हो गये। वे यह सोचकर कि कन्हैया हमारी बातें सुनकर रूठ गया है, वहाँसे चुपचाप चले गये।

तदनन्तर एक दिन निशाकालमें श्रीकृष्णने देखा—आकाश स्वच्छ है, शरच्चन्द्रकी मनोरम चाँदनी चारों ओर फैली है, कुमुदिनी खिली है, जिसकी आमोदमय सुगन्धसे सम्पूर्ण दिशाएँ महक रही हैं। वनमें सब ओर भौंरे गूँज रहे हैं, जिससे वह वनश्रेणी अत्यन्त मनोहारिणी जान पड़ती है। प्रकृतिकी यह नैसर्गिक शोभा देखकर उन्होंने गोपियोंके साथ रास करनेका विचार किया। श्रीकृष्णने अत्यन्त मधुर स्वरमें संगीतकी मधुर तान छेड़ दी, जो वनिताओंको बहुत ही प्रिय थी। गीतकी मनोरम ध्वनि सुनकर गोपियाँ घर छोड़कर निकल पड़ीं और बड़ी उतावलीके साथ उस स्थानपर आ पहुँचीं, जहाँ मधुसूदन मुरली बजा रहे थे। वहाँ आकर कोई गोपी तो उनके स्वरमें स्वर मिलाकर धीरे-धीरे गाने लगी। कोई ध्यान देकर सुनती हुई मन-ही-मन भगवान्‌का स्मरण करने लगी। कोई 'कृष्ण-कृष्ण' कहकर लजा गयी। कोई प्रेमान्ध होकर लज्जाको तिलाञ्जलि दे उनके बगलमें खड़ी हो गयी। कोई गोपी बाहर गुरुजनोंको खड़ा देख घरके भीतर ही रह गयी और नेत्र बंद करके तन्मय हो गोविन्दका ध्यान करने लगी। गोपियोंसे घिरे हुए श्रीकृष्ण रासलीलाका रसास्वादन करनेको उत्सुक थे। अतः उन्होंने शरत्कालीन चन्द्रमाकी ज्योत्स्नासे अत्यन्त मनोरम प्रतीत होनेवाली उस रजनीका सम्मान किया—रास आरम्भ करके उसे गौरव प्रदान किया।

इसी बीचमें श्रीकृष्ण गायब होकर कहीं अन्यत्र चले गये। गोपियोंका शरीर श्रीकृष्णकी चेष्टाओंके अधीन था। वे झुंड-की-झुंड अपने प्रियतमकी खोजके लिये वृन्दावनमें विचरने लगीं। उनके मनमें केवल श्रीकृष्णके दर्शनकी लालसा थी। वे वृन्दावनकी भूमिपर रात्रिमें श्रीकृष्णके चरण-चिह्न देखकर उन्हें चारों ओर ढूँढ़ रही थीं। श्रीकृष्णकी विभिन्न लीलाओंका अनुकरण करती हुईं उन्हींमें व्यग्र हो सब गोपियाँ एक ही साथ वृन्दावनमें विचरने लगीं। बहुत खोजनेपर भी जब श्रीकृष्ण नहीं मिले, तब उनके दर्शनसे निराश हो वे सब-की-सब लौटकर यमुनाके तटपर आयीं और उनके मनोहर चरित्रोंका गान करने लगीं। इतनेमें ही श्रीकृष्ण उन्हें आते दिखायी दिये। उनका मुखकमल खिला था। त्रिभुवनके रक्षक और लीलासे ही सब कुछ करनेवाले श्रीकृष्णको आते देख कोई गोपी

  • इन्द्रके द्वारा भगवान्‌का अभिषेक, रासलीला और अरिष्टासुरका वध * ३०३

अत्यन्त हर्षसे भर गयी। उसके नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे और वह 'कृष्ण-कृष्ण-कृष्ण' की रट लगाने लगी। किसीने भौंहें टेढ़ी करके उनकी ओर देखा और नेत्ररूपी भ्रमरोंके द्वारा उनके मुखकमलकी सौन्दर्य-माधुरीका पान करने लगी। किसी गोपीने गोविन्दको निहारकर अपने नेत्र बंद कर लिये और उन्हींके रूपका ध्यान करती हुई वह योगारूढ़-सी प्रतीत होने लगी।

तब माधवने किसीको प्रिय वचन कहकर और किसीको कुटिल भ्रूभङ्गीसे निहारकर मनाया। सबका चित्त प्रसन्न हो गया। फिर उदार चरित्रोंवाले श्रीकृष्णने रासमण्डली बनायी और समस्त गोपियोंके साथ आदरपूर्वक रासलीला की। उस समय कोई भी गोपी श्रीकृष्णके पाससे हटना नहीं चाहती थी, अतः एक स्थानपर स्थिर हो जानेके कारण रासोचित मण्डल न बन सका। तब श्रीकृष्णने एक-एक गोपीका हाथ पकड़कर रासमण्डलकी रचना की। उस समय उनके हाथका स्पर्श पाकर प्रत्येक गोपीकी आँखें आनन्दसे मुँद जाती थीं। इसके बाद रासलीला आरम्भ हुई। चञ्चल चूड़ियोंकी झनकारके साथ क्रमशः शरद्-ऋतुकी शोभाके रमणीय गीत गाये जाने लगे। उस समय श्रीकृष्ण शरद्-ऋतुके चन्द्रमाका, उनकी चारु-चन्द्रिकाका और मनोहर कुमुद-वनका वर्णन करते हुए गीत गाते थे; किंतु गोपियाँ बारंबार केवल श्रीकृष्णके नामका ही गान करती थीं। श्रीकृष्ण जितने ऊँचे स्वरसे रासके गीत गाते, उससे दुगुने स्वरमें समस्त गोपियाँ 'धन्य कृष्ण ! धन्य कृष्ण!!' का उच्चारण करती थीं। भगवान् जब आगे चलते, तब गोपियाँ उनके पीछे चलती थीं और जब वे पीछेकी ओर घूमकर लौट पड़ते, तब वे उनके सामने मुँह किये पीछे हटती थीं। इस प्रकार वे अनुलोम और प्रतिलोम-गतिसे श्रीहरिका साथ देती थीं। मधुसूदनने उस समय गोपियोंके साथ ऐसा रास किया, जिससे उन्हें उनके बिना एक क्षण भी करोड़ वर्षोंके समान प्रतीत होने लगा। भगवान् श्रीकृष्ण सबके ईश्वर हैं। वे गोपियोंमें, उनके पतियोंमें तथा सम्पूर्ण भूतोंमें भी निवास करते हैं। वे आत्मारूपसे सम्पूर्ण विश्वको व्याप्त करके स्थित हैं। जैसे सब प्राणियोंमें पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश और आत्मा हैं, उसी प्रकार भगवान् भी सबको व्याप्त करके स्थित हैं।

एक दिन आधी रातके समय जब श्रीकृष्ण रासलीलामें संलग्न थे, अरिष्टासुर नामका उन्मत्त दानव व्रजवासियोंको त्रास देता हुआ वहाँ साँड़के रूपमें आ पहुँचा। उसका शरीर जलपूर्ण मेघके समान काला था। सींग तीखे थे। नेत्र सूर्यकी भाँति तेजस्वी दिखायी देते थे। वह अपने खुरोंके अग्रभागसे पृथ्वीको विदीर्ण किये डालता था और दाँत पीसता हुआ अपने दोनों ओठोंको बार-बार जीभसे चाटता था। उसके कंधोंकी गाँठें अत्यन्त कठोर थीं और उसने क्रोधके मारे अपनी पूँछ ऊपर उठा रखी थी। उसकी गर्दन लंबी और मुख विशाल था। वृक्षोंसे टक्कर लेनेके कारण उसके ललाटमें घावके कई चिह्न थे। साँड़का रूप धारण करनेवाला वह दैत्य गौओंके गर्भ गिरा देता और सबको बड़े वेगसे मारता हुआ सदा वनमें घूमा करता था। उसके नेत्र बड़े भयंकर थे। उसे देखकर समस्त गोप और गोपाङ्गनाएँ अत्यन्त भयसे व्याकुल हो उठीं और 'कृष्ण-कृष्ण' पुकारने लगीं। उनका आर्तनाद सुनकर श्रीकृष्णने ताल ठोंकते हुए सिंहके समान गर्जना की। वह शब्द सुनकर दुरात्मा वृषाभासुर श्रीकृष्णकी ओर ही दौड़ा। उसकी आँखें श्रीकृष्णके पेटकी ओर लगी थीं और सामने उन्हींकी सीधमें उसने सींगोंका अग्रभाग कर रखा था। उस महाबली

७६- कंसका अक्रूरको नन्दगाँव जानेकी आज्ञा देना और केशीका वध तथा भगवान्‌के पास नारदका आगमन

३०४ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


दैत्यको आते देख श्रीकृष्ण अवहेलनापूर्वक हँसने लगे और अपने स्थानसे तिलभर भी पीछे न हटे। ज्यों ही वह दैत्य समीप आया, मधुसूदनने झट उसके दोनों सींग पकड़ लिये और अपने घुटनेसे उसकी कोखमें प्रहार किया। सींग पकड़ लिये जानेसे वह दानव हिल-डुल नहीं पाता था। उसका अहंकार और बल दोनों नष्ट हो चुके थे। श्रीकृष्णने उसकी गर्दनको भीगे हुए कपड़ेकी भाँति निचोड़ डाला और एक सींग उखाड़कर उसीसे उसपर प्रहार किया। इससे वह महादैत्य मुँहसे रक्त वमन करके मर गया। उसके मारे जानेपर गोपोंने भगवान् श्रीकृष्णकी भूरि-भूरि प्रशंसा की—ठीक उसी तरह, जैसे पूर्वकालमें जम्भासुरके मारे जानेपर देवताओोंने इन्द्रकी स्तुति की थी।


कंसका अक्रूरको नन्दगाँव जानेकी आज्ञा देना और केशीका वध तथा भगवान्‌के पास नारदका आगमन

**व्यासजी कहते हैं—**महर्षियो! जब वृषभरूपधारी अरिष्टासुर, धेनुक और प्रलम्ब आदि असुर मारे जा चुके, गोवर्धन पर्वत धारण करके श्रीकृष्णने गोकुलको बचा लिया, उनके द्वारा कालिय नागका दमन, दोनों यमलार्जुन वृक्षोंका भङ्ग, पूतनाका वध और शकट-भङ्ग आदि घटनाएँ हो गयीं, तब देवर्षि नारदने कंसके पास जाकर क्रमशः सब समाचार कह सुनाया। यशोदा और देवकीके बालकोंमें जो अदला-बदली हुई, वहाँसे लेकर अरिष्ट-वधतककी सारी बातें नारदजीके मुखसे सुनकर खोटी बुद्धिवाले कंसने वसुदेवजीके प्रति बड़ा क्रोध किया और समस्त यादवोंकी सभामें अत्यन्त रोषपूर्वक उलाहना देकर उसने यदुवंशियोंकी बड़ी निन्दा की; फिर आगेके कर्तव्यके विषयमें इस प्रकार विचार किया—'बलराम और कृष्ण दोनों अभी बालक हैं। जबतक वे युवा होकर अत्यन्त बलवान् नहीं हो जाते, तबतक ही मुझे उनका वध कर डालना चाहिये। युवा होनेपर तो वे मेरे काबूके बाहर हो जायँगे। यहाँ महापराक्रमी चाणूर और बलवान् मुष्टिक दोनों पहलवान मौजूद हैं। इनके द्वारा मल्लयुद्धमें उन दोनों मतवाले बालकोंको मरवा डालूँगा। धनुषयज्ञ नामक उत्सव देखनेके बहाने दोनोंको ब्रजसे बुलाकर ऐसा यत्न करूँगा, जिससे उनका नाश हो जाय।'

इस प्रकार सोच-विचारकर दुष्टात्मा कंसने बलराम और श्रीकृष्णको मार डालनेका निश्चय किया और वीरवर अक्रूरको बुलाकर कहा—'दानपते! तुम मेरी प्रसन्नताके लिये एक बात मानो, यहाँसे रथपर बैठकर नन्दगाँव जाओ। वहाँ वसुदेवके दो पुत्र हैं, जो मेरा विनाश करनेके लिये विष्णुके अंशसे उत्पन्न हुए हैं। वे दोनों दुष्ट बढ़ते जा रहे हैं। चतुर्दशीको धनुषयज्ञका उत्सव

११२-केशीका वध

  • कंसका अक्रूरको नन्दगाँव जानेकी आज्ञा देना * ३०५

होनेवाला है। उसमें कुश्ती लड़नेके लिये उन दोनोंको बुला लाओ। मेरे दो पहलवान चाणूर और मुष्टिक दाँव-पेचमें बहुत कुशल हैं। इनके साथ यहाँ उन दोनोंकी कुश्ती हो और सब लोग देखें। वसुदेवके दोनों पापी पुत्र अभी बालक ही हैं। द्वारपर आते ही उन दोनोंको महावतकी प्रेरणासे मेरा कुवलयापीड हाथी मार डालेगा। उन दोनोंको मारकर मैं दुष्ट बुद्धिवाले वसुदेव, नन्द और अपने पिता उग्रसेनको भी मौतके घाट उतारूँगा। तत्पश्चात् समस्त गोपोंका गोधन और सारा वैभव छीन लूँगा, क्योंकि वे दुष्ट मेरे वधकी इच्छा करते हैं। दानपते! तुम्हारे सिवा ये सभी यादव बड़े दुष्ट हैं, अतः मैं क्रमशः इनका भी वध करनेके लिये प्रयत्न करूँगा। तदनन्तर यादवोंसे रहित यह समस्त अकण्टक राज्य अकेला ही भोगूँगा। अतः वीर! तुम मेरी प्रसन्नताके लिये वहाँ जाओ। गोपोंसे ऐसा कहना जिससे वे भैंसका घी, दही आदि उपहारकी वस्तुएँ लेकर शीघ्र यहाँ आयें।'

अक्रूरजी बड़े भगवद्भक्त थे। कंसके इस प्रकार आदेश देनेपर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। इसी बहाने कल भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन तो करूँगा, इस विचारने उन्हें उतावला बना दिया। राजा कंससे 'बहुत अच्छा' कहकर अक्रूरजी शीघ्र ही रथपर सवार हुए और मथुरापुरीसे निकलकर नन्दगाँवकी ओर चल दिये।

इधर कंसका दूत महाबली केशी कंसके ही आदेशसे वृन्दावनमें आया। श्रीकृष्णचन्द्रका वध करना ही उसकी यात्राका उद्देश्य था। उसने घोड़ेका रूप धारण कर रखा था। वह अपनी टापोंसे पृथ्वीको खोदता, गर्दनके बालोंसे बादलोंको उड़ाता तथा वेगसे उछलकर चन्द्रमा और सूर्यके भी मार्गको लाँघता हुआ गोपोंके समीप आया। उसके हींसनेके शब्दसे समस्त गोप और गोपाङ्गनाएँ भयभीत हो भगवान् गोविन्दकी शरणमें गयीं। उनकी त्राहि-त्राहिकी पुकार सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण जलपूर्ण मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर वाणीमें इस प्रकार बोले—'गोपालगण ! इस केशीसे डरनेकी आवश्यकता नहीं है। आपलोग तो गोप-जातिके हैं। इस तरह भयसे व्याकुल होकर अपने वीरोचित पराक्रमका लोप क्यों कर रहे हैं? अरे ! इस दैत्यमें शक्ति ही कितनी है, यह हमारा क्या कर लेगा? यह तो जोर-जोरसे हिनहिनाकर केवल आतङ्क फैला रहा है। इसपर तो दैत्योंकी सेना सवारी करती है। यह दुष्ट अश्व व्यर्थ ही उछल-कूद मचा रहा है।' ग्वालोंसे यों कहकर भगवान्ने उस दैत्यसे कहा—'ओ दुष्ट ! इधर आ। मैं कृष्ण हूँ। जैसे पिनाकधारी वीरभद्रने पूषाके दाँत तोड़ दिये थे, उसी तरह मैं भी तेरे सारे दाँत गिराये देता हूँ।'

यों कहकर भगवान् श्रीकृष्ण केशीके सामने गये। वह दैत्य भी मुँह फैलाकर उनकी ओर दौड़ा। श्रीकृष्णने अपनी बाँहको बढ़ाकर दुष्ट केशीके मुखमें घुसेड़ दिया। उससे टकराकर केशीके सारे दाँत शुभ्र मेघ-खण्डोंकी भाँति छिन्न-भिन्न

७७- अक्रूरका नन्दगाँवमें जाना, श्रीराम-कृष्णकी मथुरायात्रा, गोपियोंकी कथा, अक्रूरको यमुनामें भगवद्दर्शन, उनके द्वारा भगवान्‌की स्तुति, मथुरा-प्रवेश, रजक-वध और मालीपर कृपा

३०६ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

हो गिर गये। श्रीकृष्णकी भुजा केशीके शरीरमें बढ़ती ही चली गयी। जैसे अवहेलनापूर्वक उपेक्षा किया हुआ रोग धीरे-धीरे बढ़कर विनाशका कारण बन जाता है, वैसे ही वह भुजा भी उस दैत्यकी मृत्युका साधन बन गयी। उसके जबड़े फट गये। वह मुखसे फेन और रक्त फेंकने लगा। नस-नाड़ियोंके बन्धन टूट जानेसे उसके दोनों जबड़े बिलग हो गये। वह लीद और पेशाब करता हुआ धरतीपर पैर पटकने लगा। उसका सारा शरीर पसीनेसे तर हो गया और वह थककर प्राणोंसे हाथ धो बैठा। उसकी सारी हलचल समाप्त हो गयी। जैसे बिजली गिरनेसे किसी वृक्षके दो टुकड़े हो जाते हैं, उसी प्रकार श्रीकृष्णकी भुजासे वह महाभयंकर असुर दो टुकड़े होकर गिर पड़ा। केशीको मारनेसे श्रीकृष्णके शरीरमें कोई थकावट नहीं हुई। वे स्वस्थरूपसे हँसते हुए वहीं खड़े रहे। उस दैत्यके मारे जानेसे गोप और गोपियोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे श्रीकृष्णको सब ओरसे घेरकर आश्चर्यचकित हो उनकी स्तुति करने लगे। इसी समय देवर्षि नारद बड़ी उतावलीके साथ वहाँ आये और बादलोंमें स्थित हो गये। केशीको मारा गया देख वे हर्षसे फूले नहीं समाते थे।

**नारदजी बोले—**जगन्नाथ! आपको धन्यवाद है। अच्युत! आपने खेल-खेलमें ही इस केशीको मार डाला। यह देवताओंको बड़ा क्लेश दिया करता था। मधुसूदन! आपने इस अवतारमें जो-जो महान् कर्म किये हैं, उनसे मेरे चित्तको बड़ा आश्चर्य और संतोष हुआ है। यह अश्वरूपधारी दैत्य जब गर्दनके बालोंको हिलाते और हिनहिनाते हुए आकाशकी ओर देखता था, उस समय देवराज इन्द्र और सम्पूर्ण देवता भी थर्रा उठते थे। जनार्दन! आपने दुष्टात्मा केशीका वध किया है, इसलिये अब लोकमें आप 'केशव' नामसे विख्यात होंगे। आपका कल्याण हो, अब मैं जाऊँगा और परसों कंसके यहाँ आपके साथ जो युद्ध होगा, उसमें फिर सम्मिलित होऊँगा। धरणीधर! उग्रसेनकुमार कंस जब अपने अनुचरोंसहित मारा जायगा, उस समय पृथ्वीका भार आप बहुत कुछ उतार देंगे। उसके बाद भी राजाओंके साथ आपके अनेक युद्ध हमें देखनेको मिलेंगे। गोविन्द! आपने देवताओंका बहुत बड़ा कार्य सिद्ध किया और मुझे भी बहुत आदर दिया। आपका कल्याण हो, अब मैं जाता हूँ।

यों कहकर नारदजी चले गये। तब श्रीकृष्ण अत्यन्त सौम्यभावसे ग्वालोंके साथ गोकुलमें चले आये।


अक्रूरका नन्दगाँवमें जाना, श्रीराम-कृष्णकी मथुरायात्रा, गोपियोंकी कथा, अक्रूरको यमुनामें भगवद्दर्शन, उनके द्वारा भगवान्‌की स्तुति, मथुरा-प्रवेश, रजक-वध और मालीपर कृपा

**व्यासजी कहते हैं—**अक्रूरजी शीघ्र चलनेवाले रथपर चढ़कर मथुरासे निकले और श्रीकृष्णके दर्शनका लोभ लेकर नन्दगाँवकी ओर चल दिये। मार्गमें सोचने लगे—'अहा! मुझसे बढ़कर सौभाग्यशाली कोई नहीं है, क्योंकि आज मैं अंशसहित अवतीर्ण हुए साक्षात् भगवान् विष्णुका मुख देखूँगा। आज मेरा जन्म सफल हुआ और आनेवाला प्रभात बहुत ही सुन्दर होगा। क्योंकि

* अक्रूरका नन्दगाँवमें जाना, श्रीराम-कृष्णकी मथुरायात्रा *३०७

मैं विकसित कमलके समान नेत्रोंवाले भगवान् विष्णुके मुखका दर्शन करूँगा। जो स्मरण अथवा ध्यानमें आकर भी मनुष्यके सारे पाप हर लेता है, वही कमल-सदृश नेत्रोंवाला श्रीविष्णुका सुन्दर मुख आज मुझे देखनेको मिलेगा। जिससे सम्पूर्ण वेद और वेदाङ्गोंका प्रादुर्भाव हुआ है तथा जो देवताओंके लिये सर्वश्रेष्ठ आश्रय है, भगवान्के उसी मुखका आज मैं दर्शन करूँगा।^१ ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, अश्विनीकुमार, वसु, आदित्य तथा मरुद्गण जिनके स्वरूपको नहीं जानते, वे श्रीहरि आज मेरा स्पर्श करेंगे। जो सर्वात्मा, सर्वव्यापी, सर्वस्वरूप, सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित, अव्यय एवं व्यापी परमात्मा हैं, वे ही आज मेरे नेत्रोंके अतिथि होंगे। जिन्होंने अपनी योगशक्तिसे मत्स्य, कूर्म, वराह और नरसिंह आदि अवतार ग्रहण किये थे, वे ही भगवान् आज मुझसे वार्तालाप करेंगे। स्वेच्छासे शरीर धारण करनेवाले अविनाशी जगन्नाथ इस समय कार्यवश व्रजमें निवास करनेके लिये मानवरूप धारण किये हुए हैं। जो भगवान् अनन्त अपने मस्तकपर इस पृथ्वीको धारण करते हैं, वे ही जगत्‌का हित करनेके लिये अवतीर्ण हो आज मुझे ‘अक्रूर’ कहकर बुलायेंगे। पिता, पुत्र, सुहृद्, भ्राता, माता और बन्धु-बान्धवरूपिणी जिनकी मायाको यह जगत् हटा नहीं पाता, उन भगवान्‌को बारंबार नमस्कार है। जिनको हृदयमें स्थापित करके मनुष्य इस योगमायारूप फैली हुई अविद्याको तर जाते हैं, उन विद्यास्वरूप परमात्माको नमस्कार है। जिन्हें यज्ञपरायण मनुष्य यज्ञपुरुष, भगवद्भक्त-जन वासुदेव और वेदान्तवेत्ता सर्वव्यापी श्रीविष्णु कहते हैं, उनको मेरा नमस्कार है। जो सम्पूर्ण जगत्‌के निवासस्थान हैं, जिनमें सत् और असत् दोनों प्रतिष्ठित हैं, वे भगवान् अपने सहज सत्त्वगुणसे मुझपर प्रसन्न हों। जिनका स्मरण करनेपर मनुष्य पूर्ण कल्याणका भागी होता है, उन पुरुषश्रेष्ठ श्रीहरिकी मैं सदाके लिये शरण लेता हूँ।^२

अक्रूरका हृदय भक्तिसे विनम्र हो रहा था। वे इस प्रकार श्रीविष्णुका चिन्तन करते हुए कुछ दिन रहते नन्दगाँवमें पहुँच गये। वहाँ उन्होंने


१. चिन्तयामास चाकूरो नास्ति धन्यतरो मया। योऽहमंशावतीर्णस्य मुखं द्रक्ष्यामि चक्रिणः॥
अद्य मे सफलं जन्म सुप्रभाता च मे निशा। यदुन्निद्राम्बोजपत्राक्षं विष्णोर्द्रक्ष्याम्यहं मुखम्॥
पापं हरति यत्पुंसां स्मृतं संकल्पनामयम्। तत्पुण्डरीकनयनं विष्णोर्द्रक्ष्याम्यहं मुखम्॥
निर्जग्मुश्च यतो वेदा वेदाङ्गान्यखिलानि च। द्रक्ष्यामि यत्परं धाम देवानां भगवन्मुखम्॥
(१९९।२—५)

२. न ब्रह्मा नेन्द्ररुद्राश्विस्वादित्यमरुद्गणाः। यस्य स्वरूपं जानन्ति स्पृशत्यद्य स मे हरिः॥
सर्वात्मा सर्वगः सर्वः सर्वभूतेषु संस्थितः। यो भवत्यव्ययो व्यापी स वीक्ष्यते मयाऽद्य ह॥
मत्स्यकूर्मवराहाद्यैः सिंहरूपादिभिः स्थितम्। चकार योगतो योगं स मामालापयिष्यति॥
सांप्रतं च जगत्स्वामी कार्यजाते व्रजे स्थितिम्। कर्तुं मनुष्यतां प्राप्तः स्वेच्छादेहधृगव्ययः॥
योऽनन्तः पृथिवीं धत्ते शिखरस्थितिसंस्थिताम्। सोऽवतीर्णो जगदर्थे मामक्रूरेति वक्ष्यति॥
पितृबन्धुसुहृद्भ्रातृमातृबन्धुमयीमिमाम् । यन्मायां नालमुद्धर्तुं जगतस्मै नमो नमः॥
तरन्त्यविद्यां विततां हृदि यस्मिन्निवेशिते। योगमायामिमां मर्त्यास्तस्मै विद्यात्मने नमः॥
यज्वभिर्यज्ञपुरुषो वासुदेवश्च शाश्वतैः। वेदान्तवेदिभिर्विष्णुः प्रोच्यते यो नतोऽस्मि तम्॥
तथा यत्र जगद्धाम्नि धार्यते च प्रतिष्ठितम्। सदसत्त्वं स सत्त्वेन मय्यसौ यातु सौम्यताम्॥
स्मृते सकलकल्याणभाजनं यत्र जायते। पुरुषप्रवरं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम्॥
(१९९।८—१७)

११३-अक्रूरका व्रजमें आगमन

३०८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

भगवान् श्रीकृष्णको उस स्थानपर देखा, जहाँ गौएँ दुही जा रही थीं। वे बछड़ोंके बीचमें खड़े थे। उनका श्रीअङ्ग विकसित नीलकमलकी आभासे सुशोभित था। नेत्र खिले हुए कमलकी शोभा धारण करते थे। वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न दिखायी देता था। बड़ी-बड़ी बाँहें, चौड़ी और उभरी हुई छाती, ऊँची नासिका, विलासयुक्त मुस्कानसे सुशोभित मुख, लाल-लाल नख, शरीरपर पीताम्बर, गलेमें जंगली पुष्पोंके हार, हाथमें स्निग्ध नील लता और कानोंमें श्वेत कमलपुष्पके आभूषण—यही उनकी झाँकी थी। उनके दोनों चरण भूमिपर विराजमान थे। श्रीकृष्णका दर्शन करनेके बाद अक्रूरजीकी दृष्टि यदुनन्दन बलभद्रजीपर पड़ी, जो हंस, चन्द्रमा और कुन्दके समान गौरवर्ण थे। उनके शरीरपर नील वस्त्र शोभा पा रहे थे। उनकी कद ऊँची और बाँहें बड़ी-बड़ी थीं। मुख प्रफुल्ल कमल-सा सुशोभित था। नीलाम्बरधारी गौराङ्ग बलभद्रजी ऐसे जान पड़ते थे, मानो मेघमालासे घिरा हुआ दूसरा कैलास पर्वत हो।* उन दोनों भाइयोंको देखकर महाबुद्धिमान् अक्रूरजीका मुखकमल प्रसन्नतासे खिल उठा। सम्पूर्ण शरीरमें रोमाञ्च हो आया और वे मन-ही-मन इस प्रकार कहने लगे—‘इन दोनों बन्धुओंके रूपमें यहाँ साक्षात् भगवान् विष्णु विराज रहे हैं। ये ही वह परम धाम और ये ही वह परम पद हैं। अनन्तमूर्ति भगवान् आज ही मेरे हाथका स्पर्श करके उसे शोभासम्पन्न बनायेंगे। इन्हीं भगवान्की अँगुलियोंके स्पर्शसे सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जानेके कारण मनुष्य उत्तमोत्तम सिद्धि प्राप्त करते हैं तथा अश्विनीकुमार, रुद्र, इन्द्र और वसु आदि देवता प्रसन्न होकर उन्हें उत्तम वर देते हैं। इन्हीं भगवान्ने दैत्यराजकी सेनाका विनाश करके दैत्यपत्नियोंकी आँखोंका काजल भी छीन लिया। राजा बलिने जिनके हाथमें संकल्पका जल छोड़कर रसातलमें रहते हुए भी मनोहर स्वर्गीय भोग प्राप्त कर लिये तथा देवराज इन्द्रने जिनकी आराधना करके एक मन्वन्तरके लिये देवलोकका अखण्ड साम्राज्य प्राप्त किया, वे ही भगवान् कंसके साथ रहनेके कारण निर्दोष


* स ददर्श तदा तत्र कृष्णमादोहने गवाम्। वत्समध्यगतं फुल्लनीलोत्पलदलच्छविम्॥
प्रफुल्लपद्मपत्राक्षं श्रीवत्साङ्कितवक्षसम्। प्रलम्बबाहुमायामत्तुङ्गोरस्थलमुन्नसम् ॥
सविलासस्मिताधारं बिभ्राणं मुखपङ्कजम्। तुङ्गरक्तनखं पद्भ्यां धरण्यां सुप्रतिष्ठितम्॥
बिभ्राणं वाससी पीते वन्यपुष्पविभूषितम्। सान्द्रनीललताहस्तं सिताम्भोजावतंसकम्॥
हंसेन्दुकुन्दधवलं नीलाम्बरधरं द्विजाः। तस्यानु बलभद्रं च ददर्श यदुनन्दनम्॥
प्रांशुमुत्तुङ्गबाहुं च विकाशिमुखपङ्कजम्। मेघमालापरिवृतं कैलासाद्रिमिवापरम्॥
(१९१।१९—२४)

  • अक्रूरका नन्दगाँवमें जाना, श्रीराम-कृष्णकी मथुरायात्रा * ३०९

होते हुए भी दोषके पात्र बने हुए मुझ अक्रूरका क्या आदर न करेंगे? जो साधु पुरुषोंसे बहिष्कृत है उसके जन्मको धिक्कार है। भगवान् श्रीहरि ज्ञानस्वरूप हैं। परिपूर्ण सत्त्वके पुञ्ज हैं। सब प्रकारके दोषोंसे रहित हैं, अव्यक्त हैं और समस्त प्राणियोंके हृदयमें विराजमान हैं। जगत्में कौन-सी ऐसी वस्तु है, जो उन्हें ज्ञात न हो। अतः मैं भक्तिसे विनीत होकर आदि, मध्य और अन्तसे रहित, अजन्मा, पुरुषोत्तम, भगवान् विष्णुके अंशावतार तथा ईश्वरोंके भी ईश्वर श्रीकृष्णकी शरणमें जाता हूँ।'

इस प्रकार विचार करते हुए वे भगवान् श्रीकृष्णके पास गये और 'मैं यदुवंशी अक्रूर हूँ'—यों कहकर उनके चरणोंमें पड़ गये। भगवान्‌ने भी ध्वजा, वज्र और कमल आदि चिह्नोंसे सुशोभित अपने करकमलद्वारा उनका स्पर्श किया और उन्हें खींचकर प्रेमपूर्वक गाढ़ आलिङ्गन दिया। फिर बलराम और श्रीकृष्णने उनसे बातचीत की और उन्हें साथ ले अपने भवनमें चले गये। परस्पर प्रणाम आदिके बाद अक्रूरने दोनों भाइयोंके साथ बैठकर भोजन किया और यथायोग्य उनसे सब बातें निवेदन कीं। दुरात्मा दानव कंसने वसुदेव और देवकीको जिस प्रकार धमकाया था, उग्रसेनके प्रति जैसा उसका बर्ताव था और जिस उद्देश्यसे कंसने उन्हें व्रजमें भेजा था, वह सब विस्तारके साथ कह सुनाया। सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने कहा—'ये सब बातें मुझे ज्ञात हैं। इस विषयमें जो उचित कर्तव्य है, उसे मैं करूँगा। आप अन्यथा विचार न करें। कंसको मारा गया ही समझें। मैं बलरामजीसहित कल आपके साथ मथुरा चलूँगा। बड़े-बूढ़े गोप भी भेंटकी बहुत-सी सामग्री लेकर जायँगे। वीर! आप किसी प्रकारकी चिन्ता न करें। आरामसे यहाँ रात बितायें। आजसे तीन रातके भीतर ही मैं अनुचरोंसहित कंसको मार डालूँगा।'

तदनन्तर गोपोंको मथुरा चलनेका आदेश दे अक्रूर, श्रीकृष्ण तथा बलरामजी नन्दके घरमें सोये। सबेरा होनेपर महाबली राम और श्रीकृष्ण अक्रूरके साथ मथुरा जानेको तैयार हो गये, यह देख गोपियोंके नेत्रोंमें आँसू भर आये। वे चिन्तासे इतनी दुर्बल हो गयीं कि उनके कंगन और बाजूबंद खिसक-खिसककर गिरने लगे। वे दुःखसे पीड़ित हो लंबी साँस लेती हुई एक दूसरीसे कहने लगीं—'सखी! गोविन्द मथुरा जाते हैं। वहाँ जाकर वे इस गोकुलमें फिर क्यों आने लगे। वहाँ तो अपने कानोंद्वारा नगरकी स्त्रियोंके मधुर वार्तालापका रस पान करेंगे। नगरकी नारियोंके विलासपूर्ण वचनोंमें जब इनका मन आसक्त हो जायगा, तब फिर गाँवोंकी रहनेवाली इन गँवार गोप-गोपियोंकी ओर उनका झुकाव कैसे हो सकेगा। हाय ! श्रीहरि सम्पूर्ण व्रजके प्राण थे। इन्हें छीनकर दुरात्मा और निर्दयी विधाताने हम गोपियोंपर निष्ठुर प्रहार किया है। नगरकी युवतियाँ भावभरी मुसकानके साथ बात करती हैं। उनकी गतिमें लालित्य है। वे कटाक्षपूर्ण नेत्रोंसे देखती हैं। अतः ये हमलोगोंके पास क्यों आने लगे। यह देखो, गोविन्द रथपर बैठकर मथुरा जाते हैं। क्रूर अक्रूरने उन्हें चकमा दिया है। क्या इस निर्दयीको प्रेमीजनोंकी मानसिक वेदनाका अनुभव नहीं है, जो यह हमारे नयनानन्द गोविन्दको अन्यत्र लिये जाता है ? गोविन्द भी आज अत्यन्त निष्ठुर हो गये हैं। देखो न, बलरामजीके साथ रथपर बैठकर चले जा रहे हैं। अरी! इन्हें रोकनेमें शीघ्रता करो। ऐं! क्या कहती हो—गुरुजनोंके सामने हमारा कुछ बोलना उचित नहीं है ? अरी! हम तो यों ही विरहकी आगमें जल रही हैं। अब ये गुरुजन हमारा क्या कर लेंगे। हाय ! ये नन्दबाबा आदि