भारतकोश
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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

आगमन, वरके अलौकिक रूप-सौन्दर्यको देख मेनाका प्रसन्न होना, स्त्रियोंद्वारा दुर्गाके सौभाग्यकी सराहना, दुर्गाका रूप, दम्पतिका एक-दूसरेकी ओर देखना, गिरिराजद्वारा दहेजके साथ शिवके हाथमें कन्याका दान तथा शिवका स्तवन

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६०३ मुनिको आया देख राजाने शीघ्र ही उनके चरणोंमें प्रणाम किया और भयसे व्याकुल हो मधुपर्क आदि देकर भक्तिपूर्वक उनकी पूजा की। वह सब कुछ ग्रहण करके मुनिने कामनापूर्वक राजकन्याको माँगा। उनकी याचना सुनकर राजा चुप हो गये। उनसे कुछ भी उत्तर देते नहीं बना। मुनिने फिर याचना की। नरेश्वर! अपनी कन्या मुझे दीजिये; अन्यथा मैं एक ही क्षणमें सबको भस्म कर डालूँगा। मुनिके तेजसे राजाके समस्त सेवक आच्छन्न हो गये। मुनिको वृद्ध और जरा- जीर्ण हुआ देख भृत्यगणोंसहित राजा रोने लगे। सब रानियाँ भी रोदन करने लगीं। इस समय क्या करना चाहिये, इसका निर्णय करनेकी शक्ति किसीमें नहीं रह गयी। कन्याकी माता महारानी शोकसे व्याकुल हो मूर्च्छित हो गयीं। तब नीतिशास्त्रके ज्ञाता राजपण्डितने राजा, रानी, राजकुमारों और कन्याको उत्तम नीतिका उपदेश देते हुए कहा—'नरेश्वर! आज या दूसरे दिन आप अपनी कन्या किसी-न-किसीको देंगे ही। इस ब्राह्मणको छोड़कर और किसको आप कन्या देना उचित समझते हैं? मैं तो तीनों लोकोंमें इस ब्राह्मणके सिवा दूसरे किसीको कन्यादानका उत्तम पात्र नहीं देखता हूँ। आप मुनिको अपनी पुत्री देकर समस्त सम्पदाओंकी रक्षा कीजिये; अन्यथा राजकन्याके कारण सारी सम्पत्ति नष्ट हो जायगी। शरणागतके सिवा दूसरे किसी भी एक मनुष्यका त्याग करके सर्वस्वकी रक्षा की जा सकती है।' पण्डितजीकी बात सुनकर राजाने बारंबार विलापके पश्चात् राजकन्याको वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत करके मुनीन्द्रके हाथमें दे दिया। प्राणवल्लभाको पाकर मुनि प्रसन्नतापूर्वक अपने आश्रमको लौट गये। राजा भी शोकके कारण सबका त्याग करके तपस्याके लिये चले गये। पति और पुत्रीके शोकसे सुन्दरी महारानीने अपने प्राणोंको त्याग दिया। राजाके बिना उनके पुत्र, पौत्र और भृत्यगण शोकसे अचेत हो गये। राजा अनरण्य गोलोकनाथ राधावल्लभका चिन्तन और सेवन करते हुए तप करके गोलोकधामको चले गये। उनका ज्येष्ठ पुत्र कीर्तिमान् राजा हुआ। वह भूतलपर समस्त प्रजाका पुत्रकी भाँति पालन करने लगा। (अध्याय ४१) अनरण्यकी पुत्री पद्माकी धर्मद्वारा परीक्षा, सती पद्माका उनको शाप देना तथा उस शापसे उनकी रक्षाकी भी व्यवस्था करना, वसिष्ठजीका हिमवान्‌को संक्षेपसे सतीके देह-त्यागका प्रसङ्ग सुनाना वसिष्ठजी कहते हैं— गिरिराज! जैसे लक्ष्मी नारायणकी सेवा करती हैं, उसी प्रकार अनरण्यकी कन्या पद्मा मन, वाणी और क्रियाद्वारा भक्तिभावसे पिप्पलादमुनिकी सेवा करने लगी। एक दिन वह सती राजकुमारी स्नान करनेके लिये गङ्गाजीके तटपर गयी। मार्गमें राजाका वेष धारण किये हुए साक्षात् धर्मने उसके मनके भावोंको जाननेके लिये पवित्र भावनासे ही कामी पुरुषकी भाँति कुछ बातें कहीं। उन्हें सुनकर पद्मा बोली—'ओ पापिष्ठ नृपाधम! दूर चला जा, दूर चला जा। यदि तू मेरी ओर कामदृष्टिसे देखेगा तो तत्काल भस्म हो जायगा। जिनका शरीर तपस्यासे परम पवित्र हो गया है; उन मुनिश्रेष्ठ पिप्पलादको छोड़कर क्या मैं तेरे-जैसे स्त्रीके गुलाम तथा रति- लम्पटकी सेवा स्वीकार करूँगी? मैं तेरे लिये माताके समान हूँ तो भी तू भोग्या स्त्रीका भाव लेकर मुझसे बात कर रहा है। इसलिये मैं शाप देती हूँ कि कालक्रमसे तेरा क्षय हो जायगा।'

६०४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सतीका शाप सुनकर देवेश्वर धर्म काँपने लगे और राजाका रूप छोड़ अपनी मूर्ति धारण करके उससे बोले।

धर्मने कहा—मातः ! आप मुझे धर्मज्ञोंके गुरुका भी गुरु धर्म समझिये। पतिव्रते ! मैं सदा परायी स्त्रीके प्रति माताका ही भाव रखता हूँ। मैं आपके आन्तरिक भावको समझनेके लिये ही आया था। यद्यपि आप-जैसी सतियोंका मन कैसा होता है, यह मैं जानता था; तथापि दैवसे प्रेरित होकर परीक्षा करनेके लिये चला आया। साध्वि ! आपने जो मेरा दमन किया है, वह नीतिके विरुद्ध नहीं है; सर्वथा उचित ही है; क्योंकि कुमार्गपर चलनेवालोंके लिये दण्डका विधान साक्षात् परमेश्वर श्रीकृष्णने ही किया है। जो धर्मको भी स्वधर्मका ज्ञान कराने और कालकी भी कलना (गणना) तथा स्रष्टाकी भी सृष्टि करनेमें समर्थ हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। जो समयपर संहर्ताका भी संहार करनेकी शक्ति रखते हैं और अनायास ही स्रष्टाकी भी सृष्टि कर सकते हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। जो शत्रुको भी मित्र बना सकते हैं, कलहको भी उत्तम प्रेममें परिणत कर सकते हैं तथा सृष्टि और विनाशकी भी क्षमता रखते हैं; उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। जो सबको शाप, सुख, दुःख, वर, सम्पत्ति और विपत्ति भी देनेमें समर्थ हैं; उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। जिन्होंने प्रकृतिको प्रकट किया है, महाविष्णु तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वर आदिको उत्पन्न किया है; उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। जिन्होंने दूधको श्वेत, जलको शीतल और अग्निको दाहिका शक्तिसे सम्पन्न बनाया है; उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। जो अत्यन्त तेजःपुञ्जसे प्रकट होते हैं, जिनकी मूर्ति तेजोमयी है तथा जो गुणोंसे श्रेष्ठ एवं निर्गुण हैं; उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है और जो सर्वरूप, सर्वबीजस्वरूप, सबके अन्तरात्मा तथा समस्त जीवोंके लिये बन्धुस्वरूप हैं; उन भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है।

यों कहकर जगद्गुरु धर्म पद्माके सामने खड़े हो गये। शैलराज! धर्मका परिचय पाकर वह साध्वी सहसा बोल उठी।

पद्माने कहा—भगवन् ! क्या आप ही सबके समस्त कर्मोंके साक्षी, सबके भीतर रहनेवाले, सर्वात्मा, सर्वज्ञ तथा सर्वतत्त्ववेत्ता धर्म हैं? फिर मेरे मनको जाननेके लिये मुझ दासीकी विडम्बना क्यों करते हैं? धर्मदेव ! आपके प्रति मैंने जो कुछ किया है, वह मेरा अपराध है। प्रभो ! मैंने स्त्री-स्वभाववश आपको न जाननेके कारण क्रोधपूर्वक शाप दे दिया है। उस शापकी क्या व्यवस्था होगी; यही इस समय मेरा चिन्ताका विषय है। आकाश, सम्पूर्ण दिशाएँ और वायु भी यदि नष्ट हो जायँ तो भी पतिव्रताका शाप कभी नष्ट नहीं हो सकता*। मेरे शापसे यदि आप नष्ट हो जाते हैं तो सम्पूर्ण सृष्टिका ही नाश हो जायगा। यह सोचकर मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हो रही हूँ; तथापि आपसे कहती हूँ। देवेश्वर! जैसे पूर्णिमाको चन्द्रमा पूर्ण होते हैं, उसी प्रकार सत्ययुगमें आप चारों चरणोंसे परिपूर्ण रहेंगे। उस युगमें सर्वत्र और सर्वदा दिन-रात आप विराजमान होंगे। किंतु भगवन् ! त्रेतायुग आनेपर आपके एक चरणका नाश हो जायगा। प्रभो! द्वापरमें दो पैर क्षीण होंगे और कलियुगमें आपका तीसरा पैर भी नष्ट हो जायगा। कलिके अन्तमें आपका चौथा चरण भी छिप जायगा। फिर सत्ययुग आनेपर आप चारों चरणोंसे परिपूर्ण हो जायँगे। सत्ययुगमें आप सर्वव्यापी होंगे और उससे भिन्न युगोंमें भी कहीं-कहीं पूर्णरूपमें विद्यमान रहेंगे। प्रभो! जहाँ आपका स्थान या


*आकाशोऽसौ दिशः सर्वा यदि नश्यन्ति वायवः । तथापि साध्वीशापस्तु न नश्यति कदाचन ॥
(४२।३४)

·· श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६०५

आधार होगा, उसे बताती हूँ, सुनिये।

सम्पूर्ण वैष्णव, यति, ब्रह्मचारी, पतिव्रता स्त्री, ज्ञानी पुरुष, वानप्रस्थ, भिक्षु (संन्यासी), धर्मशील राजा, साधु-संत, श्रेष्ठ वैश्यजाति तथा सत्पुरुषोंके संसर्गमें रहनेवाले द्विज, सेवक, शूद्र— इन सबमें आप सदा पूर्णरूपसे विराजमान रहेंगे। युग-युगमें जहाँ भी पुण्यात्मा पुरुष होंगे, वे आपके आधार रहेंगे। पीपल, वट, बिल्व, तुलसी, चन्दन—इन वृक्षोंपर; दीक्षा, परीक्षा, शपथ, गोशाला और गोपद भूमियोंमें; विवाहमें, फूलोंमें, देववृक्षोंमें, देवालयोंमें, तीर्थोंमें तथा साधु पुरुषोंके गृहोंमें आपका सदा निवास होगा। वेद-वेदाङ्गोंके श्रवणकालमें, जलमें, सभाओंमें, श्रीकृष्णके नाम और गुणोंके कीर्तन, श्रवण तथा गानके स्थानोंमें; व्रत, पूजा, तप, न्याय, यज्ञ एवं साक्षीके स्थानोंमें; गोशालाओंमें तथा गौओंमें विद्यमान रहकर आप अपनेको पूर्णरूपसे प्रतिष्ठित देखेंगे। धर्म! उन स्थानोंमें आप क्षीण नहीं होंगे। इनसे भिन्न स्थानोंमें आपकी कृशता देखी जायगी। जो स्थान आपके लिये अगम्य हैं; उनका वर्णन सुनिये। सम्पूर्ण व्यभिचारिणियोंमें, नरघाती मनुष्योंके घरोंमें, नरहत्या करनेवाले नीच पुरुषोंमें, मूर्ख और दुष्टोंमें, देवता, गुरु, ब्राह्मण, इष्टदेव तथा पालनीय मनुष्योंके धनका अपहरण करनेवालोंमें; दुष्टों, धूर्तों और चोरोंमें, रति-स्थानोंमें; जूआ, मदिरापान और कलहके स्थानोंमें; शालग्राम, साधु, तीर्थ और पुराणोंसे रहित स्थलोंमें; डाकुओंके स्नेहमें, वाद-विवादमें, ताड़की छायामें, गर्वीले मनुष्योंमें, तलवारसे जीविका चलानेवाले तथा स्याहीसे जीवन-निर्वाह करनेवाले, देवालयोंमें पूजाकी वृत्तिसे जीनेवाले तथा ग्राम-पुरोहितोंमें; बैल जोतनेवालों, सुनारों और जीव-हिंसासे जीविका चलानेवालोंमें; भर्तृनिन्दित नारियों तथा नारीके वशमें रहनेवाले पुरुषोंमें; दीक्षा, संध्या तथा विष्णुभक्तिसे हीन द्विजोंमें; अपनी पुत्री तथा पत्नी बेचनेवालोंमें; शालग्राम और देवमूर्तियोंका विक्रय करनेवालोंमें; मित्रद्रोही, कृतघ्न, सत्यनाशक तथा विश्वासघातियोंमें; शरणागतकी रक्षासे दूर रहनेवालों तथा शरणमें आये हुए लोगोंका नाश करनेवालोंमें; सदा झूठ बोलनेवाले, सीमाका अपहरण करनेवाले, काम, क्रोध और लोभवश झूठी गवाही देनेवाले, पुण्यकर्महीन तथा पुण्यकर्मके विरोधी मनुष्योंमें आप नहीं रहेंगे। प्रभो! इन निन्दनीय स्थानोंमें रहनेका आपको अधिकार नहीं होगा। ऐसी व्यवस्था होनेसे मेरी बात भी सच्ची हो जायगी। तात! अब मैं पतिसेवाके लिये जाऊँगी। आप भी अपने घरको पधारिये।

ऐसी बातें कहनेवाली पद्माके वचन सुनकर ब्रह्मपुत्र श्रीमान् धर्मका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिल उठा। वे उस पतिव्रतासे अत्यन्त विनयपूर्वक बोले।

धर्मने कहा—मेरी रक्षा करनेवाली देवि! तुम धन्य हो। पतिपरायणा हो। तुम्हारा सदा ही कल्याण हो। मैं तुम्हें वर देता हूँ; ग्रहण करो। बेटी! तुम्हारे पति युवावस्थासे सम्पन्न तथा रतिकर्ममें समर्थ हों। साध्वि! वे रूपवान् और गुणवान् हों। उनका यौवन सदा ही स्थिर रहे। वत्से! तुम भी उत्तम ऐश्वर्यसे युक्त एवं स्थिरयौवना हो जाओ। तुम्हारे पति मार्कण्डेयके बाद दूसरे चिरंजीवी पुरुष हों। वे कुबेरसे भी धनी और इन्द्रसे भी बढ़कर ऐश्वर्यवान् हों। शिवके समान विष्णुभक्त तथा कपिलके बाद उन्हींकी श्रेणीके सिद्ध हों। तुम जीवनभर पतिके सौभाग्यसे सम्पन्न बनी रहो। साध्वि! तुम्हारे घर कुबेरके भवनसे भी अधिक सुन्दर हों। तुम अपने पतिसे भी अधिक गुणवान् और चिरंजीवी दस पुत्रोंकी माता बनोगी; इसमें संशय नहीं है।

शैलराज! यों कहकर धर्मराज चुपचाप खड़े हो गये। पद्मा उनकी परिक्रमा और प्रणाम करके अपने घरको चली गयी। धर्म भी उसे आशीर्वाद दे अपने धामको गये और प्रत्येक सभामें

३९- शिव-पार्वतीके विवाहका होम, स्त्रियोंका नव-दम्पतिको कौतुकागारमें ले जाना, देवाङ्गनाओंका उनके साथ हास-विनोद, शिवके द्वारा कामदेवको जीवन-दान, वर-वधू और बारातकी विदाई, शिवधाममें पति-पत्नीकी एकान्त वार्ता, कैलासमें अतिथियोंका सत्कार और विदाई, सास-ससुरके बुलानेपर शिव-पार्वतीका वहाँ जाना तथा पार्षदोंसहित शिवका श्वशुर-गृहमें निवास

६०६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

पतिव्रताकी प्रशंसा करने लगे। पद्मा अपने तरुण पतिके साथ सदा एकान्तमें मिलन-सुखका अनुभव करने लगी। पीछे उसके दस श्रेष्ठ पुत्र हुए जो उसके पतिसे भी अधिक गुणवान् थे। गिरिराज ! इस प्रकार मैंने सारा पुरातन इतिहास कह सुनाया। अनरण्यने अपनी पुत्री देकर समस्त सम्पत्तिकी रक्षा कर ली। तुम भी सबके ईश्वर भगवान् शिवको अपनी कन्या देकर अपने समस्त बन्धुओं तथा सम्पूर्ण सम्पत्तिकी रक्षा करो। शैलराज ! एक सप्ताह बीतनेपर अत्यन्त दुर्लभ शुभ क्षणमें, जब चन्द्रमा लग्नेश होकर लग्नमें अपने पुत्र बुधके साथ विराजमान होंगे; रोहिणीका संयोग पाकर प्रसन्नताका अनुभव करते होंगे; चन्द्र और तारा सर्वथा शुद्ध होंगे; मार्गशीर्ष मासका सोमवार होगा; लग्न सब प्रकारके दोषोंसे रहित, समस्त शुभग्रहोंकी दृष्टिसे लक्षित और असत् ग्रहोंसे शून्य होगा; उत्तम संतानप्रद, पतिसौभाग्यदायक, वैधव्यनिवारक, जन्म-जन्ममें सुख प्रदान करनेवाला तथा प्रेमका कभी विच्छेद न होने देनेवाला अत्यन्त श्रेष्ठतम योग उपस्थित होगा; उस समय तुम अपनी पुत्री मूलप्रकृति ईश्वरी जगदम्बाको जगत्पिता महादेवजीके हाथमें देकर कृतकृत्य हो जाओ।

गिरिराज ! कल्पान्तरकी बात है; वह मूलप्रकृति ईश्वरी भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे दक्षकन्या सतीके रूपमें आविर्भूत हुई। दक्षने उस देवीको विधि-विधानके साथ शूलपाणि शिवके हाथमें दे दिया। तदनन्तर मेरे पिताके यज्ञमें, जहाँ समस्त देवताओंकी सभा जुड़ी हुई थी, दक्षका उन शूलपाणि महादेवजीके साथ सहसा महान् कलह हो गया। उस कलहसे रुष्ट हो त्रिनेत्रधारी शिव ब्रह्माजीको नमस्कार करके चले गये। दक्षके मनमें भी रोष था; अतः वे भी अपने गणोंके साथ उसी क्षण अपने घरको चल दिये। घर जाकर दक्षने रोषपूर्वक ही यज्ञकी सामग्री एकत्र की और उसके द्वारा महान् यज्ञका आयोजन किया। उस यज्ञमें उन्होंने द्वेषवश शूलपाणि शंकरको भाग नहीं दिया। यह देख सतीके मनमें पिताके प्रति बड़ा क्रोध हुआ। उसकी आँखें लाल हो गयीं। उसने व्यथित-हृदयसे पिताको बहुत फटकारा और यज्ञस्थानसे उठकर वह माताके पास गयी। उस परात्परा देवीको तीनों कालोंका ज्ञान था; अतः उसने भविष्यमें घटित होनेवाली घटनाका वहाँ वर्णन किया। यज्ञका विध्वंस, पिता दक्षका पराभव, यज्ञस्थानसे देवताओं, मुनियों, ऋत्विजों तथा पर्वतोंका पलायन, शंकरके सैनिकोंकी विजय, अपनी मृत्यु, पत्नीके विरहसे आतुर-चित्त होकर शोकवश पतिका पर्यटन, उनके नेत्रोंके जलसे सरोवरका निर्माण, भगवान् जनार्दनके समझानेसे उनका धैर्य धारण करना, दूसरे शरीरसे पुनः शिवकी प्राप्ति, उनके साथ विहार तथा अन्य सब भावी वृत्तान्त बताकर सती माता और बहनोंके मना करनेपर भी दुःखी हो घरसे चली गयी। वह सिद्धयोगिनी थी। अतः योगबलसे सबकी दृष्टिसे ओझल हो गयी। गङ्गाजीके तटपर जाकर शंकरके ध्यान और पूजनके पश्चात् उनके चरणारविन्दोंका चिन्तन करती हुई सुन्दरी सतीने शरीरको त्याग दिया और गन्धमादन पर्वतकी गुफामें विद्यमान उस दिव्य विग्रहमें प्रवेश किया, जिसके द्वारा उसने पूर्वकालमें दैत्योंके समस्त कुलका संहार किया था। वह घटना देख सब देवता अत्यन्त विस्मित हो हाहाकार कर उठे। शंकरके सैनिक दक्ष-यज्ञका विनाश तथा सबका पराभव करके शोकसे व्याकुल हो लौट गये और शीघ्र ही सारा वृत्तान्त अपने स्वामीसे कह सुनाया। वह समाचार सुनकर समस्त रुद्रगणोंसे घिरे हुए संहारकारी महेश्वर गङ्गाजीके उस तटपर गये, जहाँ देवी सतीका शरीर पड़ा था।

(अध्याय ४२)

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

६०७

शिवका सतीके शवको लेकर शोकवश समस्त लोकोंमें भ्रमण, भगवान् विष्णुका उन्हें समझाना और प्रकृतिकी स्तुतिके लिये कहना, शिवद्वारा की हुई स्तुतिसे संतुष्ट हुई प्रकृतिरूपिणी सतीका शिवको दर्शन एवं सान्त्वना देना

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! तदनन्तर महादेवजीने गङ्गाजीके तटपर सोयी हुई दुर्गास्वरूपा सतीकी मनोहर मूर्ति देखी, जिसके मुखारविन्दकी कान्ति अभी मलिन नहीं हुई थी। वह शरीरपर श्वेत वस्त्र धारण किये और हाथमें अक्षमाला लिये दिव्य तेजसे प्रकाशित हो रही थी। उसके अङ्गोंसे तपाये हुए सुवर्णकी-सी कमनीय कान्ति फैल रही थी। सतीके उस प्राणहीन शरीरको देखकर भगवान् शिव विरहकी आगसे जलने लगे। वे मूर्तिमान् तत्त्वराशि होनेपर भी सतीके वियोगमें कभी मूर्च्छित, कभी चेतन होते हुए भाँति-भाँतिसे विलाप करने लगे। तदनन्तर उनके स्वर्णप्रतिम मृत देहको वक्षपर धारण करके सप्तद्वीप, लोकालोक पर्वत तथा सप्तसिन्धुमें भ्रमण करते हुए भारतमें शतशृङ्ग-गिरिके पास जम्बूद्वीपमें निर्जन प्रदेशस्थ अक्षयवटके नीचे नदीतीरपर पहुँचे। वहाँसे महायोगी शंकर विरहाकुलचित्त होकर पूरे एक वर्षतक पृथ्वीपर परिभ्रमण करते रहे। सती देवीके उस मृत देहके अङ्ग-प्रत्यङ्ग जिस-जिस स्थानपर गिरे, वे स्थान कामनाप्रद सिद्धपीठ हो गये। तदनन्तर शंकरने सतीके अवशिष्ट अङ्गोंका संस्कार किया। अस्थियोंकी माला गूँथकर उसे अपना कण्ठभूषण बना लिया और प्रतिदिन सतीका शरीर-भस्म अपने शरीरपर लगाने लगे। इसके बाद वे निश्चेष्ट-से होकर एक वटमूलमें पड़ गये। तब लक्ष्मीपूजित भगवान् नारायण अपने पार्षदों, देवताओं और ऋषि-मुनियोंके साथ वहाँ पधारकर श्रीशंकरको गोदमें लेकर उन्हें समझाने लगे।

श्रीभगवान्ने कहा— स्वात्माराम शिव! मेरी बात सुनो और उसपर ध्यान दो। वह हितकारक, अध्यात्मज्ञानका सार, दुःख-शोकका नाश करनेवाली तथा सम्पूर्ण अध्यात्मज्ञानका विद्यमान बीज है। यद्यपि तुम स्वयं ज्ञानकी निधि, विधि, सर्वज्ञ तथा स्रष्टाओंके भी स्रष्टा हो, तथापि मैं तुम्हें ज्ञानका उपदेश दे रहा हूँ। प्राण-संकटके समय विद्वान् पुरुष विद्वान्‌को भी समझा सकता है। लोकमें यह व्यवहार है कि सब लोग सबको परस्पर समझाते-बुझाते हैं। शम्भो! महेश्वर! दुर्दिनमें दुःख, शोक और भयकी प्राप्ति होती है। जब दुर्दिन बीत जाता और सुदिन आ जाता है, तब उनकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? उस समय तो हर्ष और ऐश्वर्यविषयक दर्पकी ही निरन्तर वृद्धि होती है; परंतु विद्वान् पुरुष इन सबको स्वप्नकी भाँति मिथ्या समझते हैं। महादेव! तुम ज्ञानकी उत्पत्तिके कारण तथा सनातन हो। ज्ञान प्राप्त करो—अपने स्वरूपका स्मरण करो। तुम्हारा कल्याण हो, तुम सचेत होओ—होशमें आओ। निश्चय ही तुम्हें सतीकी प्राप्ति होगी। जैसे शीतलता जलको, दाहिका शक्ति अग्निको, तेज सूर्यको तथा गन्ध पृथ्वीको कभी नहीं छोड़ती है; उसी तरह सती तुम्हें छोड़कर अलग नहीं रह सकती है।

सनातन ज्ञानानन्दस्वरूप ज्ञाननिधे शंकर! मैं जो कहता हूँ, उसे सुनो। तुम परात्पर परमेश्वर हो, परंतु शोकवश अपने-आपको भूल गये हो। प्रत्येक जगत्‌में तथा जन्म-जन्ममें सुदिन और दुर्दिनका चक्र निरन्तर चला करता है। वे सुदिन और दुर्दिन ही समस्त प्राकृत प्राणियोंके लिये सुख-दुःखकी प्राप्तिके मुख्य कारण होते हैं। सुखसे हर्ष, दर्प, शौर्य, प्रमाद, राग, ऐश्वर्यकी अभिलाषा और विद्वेष निरन्तर प्रकट होते रहते

४०- इन्द्रके अभिमान-भङ्गका प्रसङ्ग—प्रकृति और गुरुकी अवहेलनासे इन्द्रको शाप, गौतम-मुनिके शापसे इन्द्रके शरीरमें सहस्र योनियोंका प्राकट्य, अहल्याका उद्धार, विश्वरूप और वृत्रके वधसे इन्द्रपर ब्रह्महत्याका आक्रमण, इन्द्रका मानसरोवरमें छिपना, बृहस्पतिका उनके पास जाना, इन्द्रद्वारा गुरुकी स्तुति, ब्रह्महत्याका भस्म होना, इन्द्रका विश्वकर्माद्वारा नगरका निर्माण कराना, द्विजबालकरूपधारी श्रीहरि तथा लोमश-मुनिके द्वारा इन्द्रका मान-भंजन, राज्य छोड़नेको उद्यत हुए विरक्त इन्द्रका बृहस्पतिजीके समझानेसे पुनः राज्यपर ही प्रतिष्ठित रहना

६०८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

हैं। दुःख, शोक और उद्वेगसे सदा भयकी प्राप्ति होती है। महेश्वर! यदि इनके बीज नष्ट हो जायें तो ये सब स्वतः नष्ट हो जाते हैं। चञ्चल मन ही पुण्य और पापका बीज है। शम्भो! सम्पूर्ण इन्द्रियोंसहित मन मेरा अंश है। सबका जनक जो अहंकार है, उसके अधिष्ठाता चेतन तुम हो और ये ब्रह्मा बुद्धिके अधिष्ठाता हैं। परब्रह्म परमात्मा एक हैं। गुण-भेदसे ही सदा उसके भिन्न-भिन्न रूप होते हैं। वह ब्रह्मतत्त्व एक होनेपर भी अनेक प्रकारका है। शिव! वह सगुण भी है और निर्गुण भी। जो मायारूप उपाधिका आश्रय लेता है, वह सगुण और जो मायातीत है, वह निर्गुण कहलाता है। भगवान् स्वेच्छामय हैं। वे अपनी इच्छासे ही विविध रूपोंमें प्रकट होते हैं। उनकी इच्छाशक्तिका ही नाम प्रकृति है। वह नित्यस्वरूपा और सदा सबकी जननी है। कुछ लोग ज्योतिःस्वरूप सनातन ब्रह्मको एक ही बताते हैं तथा कुछ दूसरे विद्वान् उसे प्रकृतिसे युक्त होनेके कारण द्विविध कहते हैं। जो एक बताते हैं, उनका मत सुनो। ब्रह्म माया तथा जीवात्मा दोनोंसे परे है। उस ब्रह्मसे ही वे दोनों (माया और जीवात्मा) प्रकट होते हैं; अतः ब्रह्म ही सबका कारण है। वह परब्रह्म एक होकर भी स्वेच्छासे दो हो जाता है। उसकी इच्छाशक्ति ही प्रकृति है, जो सदा सम्पूर्ण शक्तियोंकी जननी होती है। उससे संयुक्त होनेके कारण वे परमात्मा 'सगुण' कहे जाते हैं। वे ही सबके आधार, सनातन, सर्वेश्वर, सर्वसाक्षी तथा सर्वत्र फलदाता होते हैं। शम्भो! शरीर भी दो प्रकारका होता है—एक नित्य और दूसरा प्राकृत। नित्य शरीरका विनाश नहीं होता; परंतु प्राकृत शरीर सदा नश्वर होता है। भगवन्! हम दोनोंके शरीर नित्य हैं। हमारे अंशभूत जो अन्य जीव हैं, उनके शरीर त्रिगुणात्मिका प्रकृतिसे उत्पन्न होनेके कारण प्राकृत कहलाते हैं। प्राकृत शरीर सदा ही विनाशशील हैं। रुद्र आदि तुम्हारे अंश हैं और विष्णुरूपधारी मेरे अंश। मेरे भी दो रूप हैं—द्विभुज और चतुर्भुज। चतुर्भुज मैं हूँ और वैकुण्ठधाममें लक्ष्मी तथा पार्षदोंके साथ रहता हूँ। द्विभुजरूपसे मैं श्रीकृष्ण कहलाता हूँ और गोलोकमें गोपियों तथा राधाके साथ निवास करता हूँ।

जो ब्रह्मको द्विविध बताते हैं, उनके मतमें दो प्रधान तत्त्व हैं—नित्य पुरुष तथा नित्या प्रकृति ईश्वरी। शिव! वे दोनों सदा परस्पर संयुक्त रहते हैं। वे ही सबके माता-पिता हैं। वे दोनों अपनी इच्छाके अनुसार कभी साकार और कभी निराकार होते हैं। दोनों ही सर्वस्वरूप हैं। जैसे पुरुषकी नित्य प्रधानता है, उसी तरह प्रकृतिकी भी है। शम्भो! यदि तुम सतीको पाना चाहते हो तो प्रकृतिका स्तवन करो। तुमने पूर्वकालमें दुर्वासाको प्रसन्नतापूर्वक जिस स्तोत्रका उपदेश दिया था, वह दिव्य है और उसका कण्वशाखामें वर्णन किया गया है। तुम उसीके द्वारा जगदम्बाकी आराधना करो। शिव! मेरे आशीर्वादसे तुम्हारे शोकका नाश हो। तुम्हें कल्याणकी प्राप्ति हो और तुम्हारे लिये विप्लवका कारण बना हुआ पत्नीके वियोगका यह रोग दूर हो जाय।

गिरिराज! ऐसा कहकर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु चुप हो गये। तदनन्तर महेश्वरने प्रकृतिके स्तवनका कार्य आरम्भ किया। उन्होंने स्नान करके श्रीकृष्ण और ब्रह्माको भक्तिपूर्वक हाथ जोड़ नमस्कार किया। उस समय उनका अङ्ग-अङ्ग पुलकित हो उठा था।

महेश्वर बोले—'ॐ नमः प्रकृत्यै'

ॐ (सच्चिदानन्दमयी) प्रकृतिदेवीको नमस्कार है।

ब्राह्मि! तुम ब्रह्मस्वरूपिणी हो। सनातनि!

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६०९

परमात्मस्वरूपे ! परमानन्दरूपिणि ! तुम मुझपर प्रसन्न हो जाओ। भद्रे ! तुम भद्र अर्थात् कल्याण प्रदान करनेवाली हो। दुर्गे ! तुम दुर्गम संकटका निवारण तथा दुर्गतिका नाश करनेवाली हो। भवसागरसे पार उतारनेके लिये नूतन एवं सुदृढ़ नौकास्वरूपिणी देवि ! मुझपर कृपा करो। सर्वस्वरूपे ! सर्वेश्वरि ! सर्वबीजस्वरूपिणि ! सर्वाधारे ! सर्वविद्ये ! विजयप्रदे ! मुझपर प्रसन्न होओ। सर्वमङ्गले ! तुम सर्वमङ्गलरूपा, सभी मङ्गलोंको देनेवाली तथा सम्पूर्ण मङ्गलोंकी आधारभूता हो; मेरे ऊपर कृपा करो। भक्तवत्सले ! तुम निद्रा, तन्द्रा, क्षमा, श्रद्धा, तुष्टि, पुष्टि, लज्जा, मेधा और बुद्धिरूपा हो; मुझपर प्रसन्न होओ। वेदमातः ! तुम वेदस्वरूपा, वेदोंका कारण, वेदोंका ज्ञान देनेवाली और सम्पूर्ण वेदाङ्ग-स्वरूपिणी हो; मेरे ऊपर कृपा करो। जगदम्बिके ! तुम दया, जया, महामाया, क्षमाशील, शान्त, सबका अन्त करनेवाली तथा क्षुधा-पिपासारूपिणी हो; मुझपर प्रसन्न होओ। विष्णुमाये ! तुम नारायणकी गोदमें लक्ष्मी, ब्रह्माके वक्षः-स्थलमें सरस्वती और मेरी गोदमें महामाया हो; मेरे ऊपर कृपा करो। दीनवत्सले ! तुम कला, दिशा, दिन तथा रात्रिस्वरूपा एवं कर्मोंके परिणाम (फल)-को देनेवाली हो; मुझपर प्रसन्न होओ। राधिके ! तुम सभी शक्तियोंका कारण, श्रीकृष्णके हृदयमन्दिरमें निवास करनेवाली, श्रीकृष्णकी प्राणोंसे भी अधिक प्रिया तथा श्रीकृष्णसे पूजित हो। मेरे ऊपर कृपा करो। देवि ! तुम यशःस्वरूपा, सभी यशकी कारणभूता, यश देनेवाली, सम्पूर्ण देवीस्वरूपा और अखिल नारीरूपकी सृष्टि करनेवाली हो। शुभे ! तुम अपनी कलाके अंशमात्रसे सम्पूर्ण कामिनियोंका रूप धारण करनेवाली, सर्वसम्पत्स्वरूपा तथा समस्त सम्पत्तिको देनेवाली हो; मुझपर प्रसन्न होओ। देवि ! तुम परमानन्दस्वरूपा, सम्पूर्ण सम्पत्तियोंका कारण, यशस्वियोंसे पूजित और यशकी निधि हो; मेरे ऊपर कृपा करो। देवि ! तुम समस्त जगत् एवं रत्नोंकी आधारभूता वसुन्धरा हो, चर और अचरस्वरूपा हो; मुझपर शीघ्र ही प्रसन्न होओ। सिद्धयोगिनि ! तुम योगस्वरूपा, योगियोंकी स्वामिनी, योगको देनेवाली, योगकी कारणभूता, योगकी अधिष्ठात्री देवी और देवियोंकी ईश्वरी हो; मेरे ऊपर कृपा करो। सिद्धेश्वरि ! तुम सम्पूर्ण सिद्धिस্বরূপा, समस्त सिद्धियोंको देनेवाली तथा सभी सिद्धियोंका कारण हो; मुझपर प्रसन्न होओ। महेश्वरि ! विभिन्न मतोंके अनुसार जो समस्त शास्त्रोंका व्याख्यान है, उसका तात्पर्य तुम्हीं हो। ज्ञानस्वरूपे परमेश्वरि ! मैंने जो कुछ अनुचित कहा हो, वह सब तुम क्षमा करो। कुछ विद्वान् प्रकृतिकी प्रधानता बतलाते हैं और कुछ पुरुषकी। कुछ विद्वान् इन दो प्रकारके मतोंमें व्याख्याभेदको ही कारण मानते हैं। पहले प्रलयकालमें एकार्णवके जलमें शयन करनेवाले महाविष्णुके नाभिदेशसे प्रकट हुए कमलपर, उसीसे उत्पन्न हुए जो ब्रह्माजी बैठे थे, उन्हें महादैत्य मधु और कैटभ खेल-खेलमें ही मारनेको उद्यत हो गये। तब ब्रह्माजी अपनी रक्षाके लिये तुम्हारी स्तुति करने लगे। उन्हें स्तुति करते देख तुमने उन दोनों महादैत्योंके विनाशके लिये जलशायी महाविष्णुको जगा दिया। तब नारायणने तुम शक्तिकी सहायतासे उन दोनों महादैत्योंको मार डाला। ये भगवान् तुम्हारा सहयोग पाकर ही सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। तुम्हारे बिना शक्तिहीन होनेके कारण ये कुछ भी नहीं कर सकते। सुरेश्वरि ! पूर्वकालमें त्रिपुरोंसे संग्राम करते समय जब मैं आकाशसे नीचे गिर पड़ा, तब तुमने ही विष्णुके साथ आकर मेरी रक्षा की थी। ईश्वरि ! इस समय मैं विरहाग्निसे जल रहा हूँ; तुम मेरी रक्षा करो। परमेश्वरि ! अपने दर्शनके पुण्यसे मुझे क्रीत दास बना लो।

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संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

यह कहकर शम्भु मौन हो गये। तब उन्होंने आकाशमें विराजमान उस देवी प्रकृतिको प्रसन्नता-पूर्वक देखा, जो रत्नसारनिर्मित रथपर बैठी थीं। उनके सौ भुजाएँ थीं। उनकी अङ्गकान्ति तपाये हुए स्वर्णके समान देदीप्यमान थी। वे रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित थीं और उनके प्रसन्न-मुखपर मन्द हासकी छटा छा रही थी। उन जगन्माता सतीको देखकर विरहासक्त शंकरने पुनः शीघ्र ही उनकी स्तुति की और रोते हुए अपने विरहजनित दुःखको निवेदन किया। तदनन्तर उन्होंने सतीकी अस्थियोंसे बनी हुई अपनी माला उन्हें दिखायी और उनके शरीरजनित भस्मको, जो शिवने अपने अङ्गोंका भूषण बना रखा था; उसकी ओर भी उनकी दृष्टि आकर्षित

की। फिर अनेक प्रकारसे मनुहार करके उन्होंने सुन्दरी सतीको संतुष्ट किया। उस समय नारायण, ब्रह्मा, धर्म, शेषनाग, देवता और ऋषियोंने भी 'हे ईश्वर! शिवकी रक्षा करो' ऐसा कहकर उन देवीका स्तवन किया। उन सबके स्तवनसे वे देवी तत्काल प्रसन्न हो गयीं तथा शिवकी उन प्राणवल्लभाने प्राणेश्वर शम्भुसे कृपापूर्वक कहा।

प्रकृति बोलीं—महादेव! आप धैर्य धारण करें। प्रभो! आप मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं। योगीश्वर! आप ही आत्मा तथा जन्म-जन्ममें मेरे स्वामी हैं। महेश्वर! मैं पर्वतराज हिमालयकी भार्या मेनकाके गर्भसे जन्म लेकर आपकी पत्नी बनूँगी; अतः आप इस विरह-ज्वरको त्याग दीजिये।

यों कह तथा शिवको आश्वासन दे वे अन्तर्धान हो गयीं और देवता भी उन्हें सान्त्वना देकर चले गये। उस समय लज्जासे भगवान् शिवका मस्तक झुका हुआ था। उनका चित्त हर्षसे उत्फुल्ल हो रहा था। वे कैलास पर्वतपर चले गये और शीघ्र ही विरहज्वरको त्यागकर अपने गणोंके साथ प्रसन्नतासे नाचने लगे।

जो मनुष्य शिवद्वारा किये गये इस प्रकृतिके स्तोत्रका पाठ करता है, उसका प्रत्येक जन्ममें अपनी पत्नीसे कभी वियोग नहीं होता। इहलोकमें सुख भोगकर वह शिवलोकमें चला जाता है तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंको प्राप्त कर लेता है; इसमें संशय नहीं है। (अध्याय ४३)


• श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६११ पार्वतीके विवाहकी तैयारी, हिमवान्‌के द्वारपर दूल्हा शिवके साथ बारातमें विष्णु आदि देवताओंका आगमन, हिमालयद्वारा उनका सत्कार, वरको देखनेके लिये स्त्रियोंका आगमन, वरके अलौकिक रूप-सौन्दर्यको देख मेनाका प्रसन्न होना, स्त्रियोंद्वारा दुर्गाके सौभाग्यकी सराहना, दुर्गाका रूप, दम्पतिका एक-दूसरेकी ओर देखना, गिरिराजद्वारा दहेजके साथ शिवके हाथमें कन्याका दान तथा शिवका स्तवन भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं- वसिष्ठजीके पूर्वोक्त वचनको सुनकर सेवकगणों तथा पत्नीसहित हिमालयको बड़ा विस्मय हुआ; किंतु स्वयं पार्वती मन-ही-मन हँस रही थी। अरुन्धतीने भी उन मेनादेवीको, जो शोकसे कातर हो खाना-पीना छोड़कर रो रही थीं; समझाया। तब उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक शोकका त्याग कर दिया तथा अरुन्धतीको उत्तम भोजन कराकर स्वयं भी भोजन किया। इसके बाद वे प्रसन्न- चित्तसे समस्त मङ्गलकार्योंका सम्पादन करने लगीं। प्रिये! तदनन्तर वसिष्ठजीकी आज्ञासे हिमालयने वैवाहिक सामग्री एकत्रित की और बड़ी उतावलीके साथ विभिन्न स्थानोंमें निमन्त्रणपत्र भेजवाया। तत्पश्चात् उन्होंने शिवके पास मङ्गलपत्रिका पठवायी। इसके बाद शैलराजने विवाहके लिये भोज्यपदार्थ, मिष्टान्न, दिव्य वस्त्र तथा स्वर्ण-रत्न आदिका अपार संग्रह किया। पार्वतीको स्नान करवाकर वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत किया गया। उसके नेत्रोंमें काजल और पैरोंमें महावर लगाया गया। इधर देवेश्वरगण विविध वाहनोंपर सवार हो रत्नमय रथपर आरूढ़ हुए भगवान् शंकरको साथ लिये हिमालय-भवनके समीप पहुँचे। वहाँ भाँति- भाँतिसे सबका स्वागत-सत्कार किया गया। देवेश्वरोंको सामने देख हिमालयने उन्हें प्रणाम किया और सेवकोंको आज्ञा दी कि 'इन सम्माननीय अतिथियोंके लिये सिंहासन प्रस्तुत किये जायँ।' तत्पश्चात् विनतानन्दन गरुड़की पीठसे तत्काल ही उतरकर चार-भुजाधारी भगवान् नारायण अपने पार्षदोंसहित सिंहासनपर बैठे। रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित चतुर्भुज पार्षद रत्नमयी मुट्ठीमें बँधे हुए श्वेत चामरोंद्वारा उनकी सेवा कर रहे थे। उस समाजमें श्रेष्ठतम ऋषि और बड़े-बड़े देवता उनके गुण गा रहे थे। भगवान्‌का प्रसन्नमुख मन्द मुस्कानसे सुशोभित था और वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर जान पड़ते थे। उनके पास ही देवताओंके साथ ब्रह्माजी भी बैठे। ऋषि और मुनि भी मङ्गलमय स्थानपर विराजमान हुए। इसी समय भगवान् शिव रथसे उतरकर रत्नमय सिंहासनपर बैठे। बैठकर उन्होंने पर्वतराज हिमालयकी ओर देखा। तत्पश्चात् भगवान् शिवको देखनेके लिये वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो शैलेन्द्र-नगरकी स्त्रियाँ आयीं। उनमें बालिकाएँ, युवतियाँ और वृद्धाएँ भी थीं। ऋषियों, देवों, नागों, गन्धर्वों, पर्वतों और राजाओंकी भी मनोहर कन्याएँ वहाँ आ पहुँचीं। मेनाने कुमारी कन्याओंके साथ दूल्हा शंकरका दर्शन किया। उनके श्रीअङ्गोंकी कान्ति मनोहर चम्पाके समान गौर थी। वे एक मुख तथा तीन नेत्रोंसे सुशोभित थे। उनके प्रसन्न- मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी। वे रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित थे। उनके अङ्ग

६१२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

चन्दन, अगुरु, कस्तूरी तथा सुन्दर कुंकुमसे अलंकृत थे। उन्होंने मालतीकी माला धारण कर रखी थी। उनका मस्तक श्रेष्ठ रत्नमय मुकुटसे प्रकाशमान था। अग्निशोधित, अनुपम, अत्यन्त सूक्ष्म, सुन्दर, विचित्र और बहुमूल्य दो वस्त्रोंसे उनकी बड़ी शोभा हो रही थी। उन्होंने हाथमें रत्नमय दर्पण ले रखा था। अञ्जनसे अञ्जित होनेके कारण उनके नेत्रोंकी शोभा बढ़ गयी थी। पूर्ण प्रभासे आच्छादित होनेके कारण वे अत्यन्त मनोहर दिखायी देते थे। उनकी अवस्था अत्यन्त तरुण (नवीन) थी। वे भूषणभूषित रमणीय अङ्गोंसे बड़ी शोभा पा रहे थे। उस समय उन्होंने भगवान् नारायणकी आज्ञासे परम सुन्दर अनुपम रूप धारण कर रखा था। भगवान् शंकर योगस्वरूप, योगेश्वर, योगीन्द्रोंके गुरुके भी गुरु, स्वतन्त्र, गुणातीत तथा सनातन ब्रह्मज्योति हैं। वे गुणोंके भेदसे अनन्त भिन्न-भिन्न रूप धारण करते हैं, तथापि रूपरहित हैं। भवसागरमें डूबे हुए प्राणियोंका उद्धार करनेवाले हैं तथा जगत्‌की सृष्टि, पालन एवं संहारके कारण हैं। वे सर्वाधार, सर्वबीज, सर्वेश्वर, सर्वजीवन तथा सबके साक्षी हैं। उनमें किसी प्रकारकी इच्छा या चेष्टा नहीं है। वे परमानन्दस्वरूप, अविनाशी, आदि, अन्त और मध्यसे रहित, सबके आदिकारण तथा सर्वरूप हैं। ऐसे दिव्य जामाताको देखकर आनन्दमग्न हुई मेनाने शोकको त्याग दिया। 'सती धन्य है, धन्य है'—कहकर वहाँ आयी हुई युवतियोंने पार्वतीके सौभाग्यकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। कुछ कन्याएँ कहने लगीं—'अहो! दुर्गा बड़ी भाग्यशालिनी है।' कुछ कामिनियाँ कामभावसे युक्त हो मौन एवं स्तब्ध रह गयीं और कितनी ही बोल उठीं—'अरी सखी! हमने अपने जीवनमें ऐसा वर कभी नहीं देखा था।'

बाजे बजानेवालोंने भाँति-भाँतिकी कलाएँ दिखाते हुए वहाँ अनेक प्रकारके सुन्दर और मधुर वाद्य बजाये। इसी समय हिमवान्‌के अन्तःपुरकी परिचारिकाएँ दुर्गाको बाहर ले आयीं। वह रत्नमय सिंहासनपर बैठी थी। उसके सामने रत्नमयी वेदी शोभा पा रही थी। उसके मुख-मण्डलका कस्तूरी तथा स्निग्ध सिन्दूरके बिन्दुओंसे श्रृङ्गार किया गया था। चारु चन्दनसे चर्चित चन्द्रसदृश आभावाले आनम्र भालदेशसे उसकी बड़ी शोभा हो रही थी। श्रेष्ठ रत्नोंके सारसे निर्मित हार उसके वक्षःस्थलकी शोभा बढ़ा रहा था। वह त्रिलोचन शिवकी ओर कनखियोंसे देख रही थी। उनके सिवा और कहीं उसकी दृष्टि नहीं जाती थी। उसके मुखपर अत्यन्त मन्द मुस्कानकी आभा बिखरी हुई थी। वह कटाक्षपूर्वक देखनेके कारण बड़ी मनोहर जान पड़ती थी। उसकी भुजाएँ और हाथ रत्ननिर्मित केयूर, कड़े तथा कंगनसे विभूषित थे। उसके कटिप्रदेशमें रत्नोंकी बनी हुई करधनी शोभा दे रही थी। झनकारते हुए मञ्जीर चरणोंका सौन्दर्य बढ़ाते थे। वह बहुमूल्य, तुलनारहित, विचित्र एवं कीमती दो वस्त्रोंसे सुशोभित थी। उसके सुन्दर कपोल श्रेष्ठ रत्नमय कुण्डलोंसे जगमगा रहे थे। दन्तपङ्क्ति मणिके सारभागकी प्रभाको छीने लेती थी। वह एक हाथमें रत्नमय दर्पण लिये हुए थी और दूसरेमें क्रीड़ाकमल लेकर घुमा रही थी। उसके अङ्ग चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमसे चर्चित थे। ऐसी अलौकिक रूपवाली जगत्‌की आदिकारणभूता जगदम्बाको सब लोगोंने प्रसन्नताके साथ देखा। हर्षसे युक्त भगवान् त्रिलोचनने भी नेत्रके कोनेसे पार्वतीकी ओर देखा। देखकर वे आनन्द-विभोर हो उठे। उसकी सम्पूर्ण आकृति सतीसे सर्वथा मिलती-

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६१३

जुलती थी। उसे देखकर भगवान् शंकरने विरह-ज्वरका परित्याग कर दिया। उन्होंने अपना मन दुर्गाको अर्पित कर दिया और स्वयं सब कुछ भूल गये। उनके सारे अङ्ग पुलकित हो गये तथा नेत्रोंमें आनन्दके आँसू छलक आये।

इसी समय हर्षसे भरे हुए हिमवान्ने पुरोहितके साथ जाकर वस्त्र, चन्दन और आभूषणोंद्वारा उनका वरके रूपमें वरण किया। भक्तिभावसे पाद्य आदि उपचार अर्पित किये तथा दिव्य गन्धवाली मनोहर मालाओंसे दूल्हको अलंकृत किया। तत्पश्चात् यथासम्भव शीघ्र वेदमन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक उनके हाथमें अपनी कन्याका दान कर दिया। राधिके! तदनन्तर हर्षसे भरे हुए हिमालयने उदारतापूर्वक दहेजमें उन्हें अनेक प्रकारके रत्न, सुन्दर रत्नोंके बने हुए मनोहर पात्र, एक लाख गौ, रत्नजटित झूल और अंकुशसे युक्त एक सहस्र गजराज, सजे-सजाये तीन लाख घोड़े, श्रेष्ठ रत्नोंसे अलंकृत लाखों अनुरक्त दासियाँ, पार्वतीके लिये छोटे भाईके समान प्रिय एक सौ ब्राह्मण वटु और श्रेष्ठ रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित सौ रमणीय रथ दिये। पूर्वोक्त वस्तुओंके साथ शैलराजद्वारा यत्नपूर्वक दी हुई पार्वतीको भगवान् शंकरने प्रसन्न-मनसे 'स्वस्ति' कहकर ग्रहण किया। हिमालयने कन्यादान करके भगवान् शंकरकी परिहार नामक स्तुति की। उन्होंने दोनों हाथ जोड़ माध्यन्दिन-शाखामें वर्णित स्तोत्रको पढ़ते हुए उनका स्तवन किया।

हिमालय बोले—सर्वेश्वर शिव! आप दक्ष-यज्ञका विध्वंस करनेवाले तथा शरणागतोंको नरकके समुद्रसे उबारनेवाले हैं, सबके आत्मस्वरूप हैं और आपका श्रीविग्रह परमानन्दमय है; आप मुझपर प्रसन्न हों; गुणवानोंमें श्रेष्ठ महाभाग शंकर! आप गुणोंके सागर होते हुए भी गुणातीत हैं; गुणोंसे युक्त, गुणोंके स्वामी और गुणोंके आदि कारण हैं; मेरे ऊपर प्रसन्न होइये। प्रभो! आप योगके आश्रय, योगरूप, योगके ज्ञाता, योगके कारण, योगीश्वर तथा योगियोंके आदिकारण और गुरु हैं; आप मेरे ऊपर कृपा करें। भव! आपमें ही सब प्राणियोंका लय होता है, इसलिये आप 'प्रलय' हैं। प्रलयके एकमात्र आदि तथा उसके कारण हैं। फिर प्रलयके अन्तमें सृष्टिके बीजरूप हैं और उस सृष्टिका पूर्णतः परिपालन करनेवाले हैं; मुझपर प्रसन्न होवें। भयंकर संहार-कालमें सृष्टिका संहार करनेवाले आप ही हैं। आपके वेगको रोकना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है। आराधनाद्वारा आपको रिझा लेना भी सहज नहीं है तथापि आप भक्तोंपर शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं; प्रभो! आप मुझपर कृपा करें। आप कालस्वरूप, कालके स्वामी, कालानुसार फल देनेवाले, कालके एकमात्र आदिकारण तथा कालके नाशक एवं पोषक हैं; मुझपर प्रसन्न हों। आप कल्याणकी मूर्ति, कल्याणदाता तथा कल्याणके बीज और आश्रय हैं। आप ही कल्याणमय तथा कल्याणस्वरूप प्राण हैं; सबके परम आश्रय शिव! मुझपर कृपा करें।

इस प्रकार स्तुति कर हिमालय चुप हो गये, उस समय समस्त देवताओं और मुनियोंने गिरिराजके सौभाग्यकी सराहना की। राधिके! जो मनुष्य सावधान-चित्त होकर हिमालयद्वारा किये गये स्तोत्रका पाठ करता है, उसके लिये शिव निश्चय ही मनोवाञ्छित वस्तु प्रदान करते हैं।

(अध्याय ४४)

४१- सूर्य और अग्निके दर्प-भङ्गकी कथा

६१४ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

शिव-पार्वतीके विवाहका होम, स्त्रियोंका नव-दम्पतिको कौतुकागारमें ले जाना, देवाङ्गनाओंका उनके साथ हास-विनोद, शिवके द्वारा कामदेवको जीवन-दान, वर-वधू और बारातकी विदाई, शिवधाममें पति-पत्नीकी एकान्त वार्ता, कैलासमें अतिथियोंका सत्कार और विदाई, सास-ससुरके बुलानेपर शिव-पार्वतीका वहाँ जाना तथा पार्षदोंसहित शिवका श्वशुर-गृहमें निवास

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रिये! तदनन्तर महादेवजीने वैदिक विधिसे अग्निकी स्थापना करके पार्वतीको अपने वामभागमें बिठाकर वहीं यज्ञ (वैवाहिक होम) किया। वृन्दावन-विनोदिनि! उस यज्ञके विधिपूर्वक सम्पन्न हो जानेपर भगवान् शिवने ब्राह्मणको दक्षिणाके रूपमें सौ सुवर्ण दिये। तत्पश्चात् गिरिराजके नगरकी स्त्रियोंने प्रदीप लाकर माङ्गलिक कृत्यका सम्पादन किया। फिर वे नव-दम्पतिको घरमें ले गयीं। उन सबने प्रेमपूर्वक जयध्वनि तथा शुभ निर्मञ्छन आदि करके मन्द मुस्कराहटके साथ कटाक्षपूर्वक शिवकी ओर देखा। उस समय उनके अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया था। वास-भवनमें प्रवेश करके कामिनियोंने देखा—शंकर अत्यन्त सुन्दर रूप और वेश-भूषासे सुशोभित हैं। उनका प्रत्येक अङ्ग रत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित है। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी तथा कुंकुमसे अलंकृत है। उनके प्रसन्नमुखपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल रही है। वे कटाक्षपूर्वक देखते और मनको हर लेते हैं। उनकी वेश-भूषा अपूर्व एवं सूक्ष्म है। वे सिन्दूर-बिन्दुओंसे विभूषित हैं। उनकी गौर-कान्ति मनोहर चम्पाकी आभाको तिरस्कृत कर रही है। वे सर्वाङ्गसुन्दर, नूतन यौवनसे सम्पन्न तथा मुनीन्द्रोंके भी चित्तको मोह लेनेवाले हैं। वहाँ सरस्वती, लक्ष्मी, सावित्री, गङ्गा, रति, अदिति, शची, लोपामुद्रा, अरुन्धती, अहल्या, तुलसी, स्वाहा, रोहिणी, वसुन्धरादेवी, शतरूपा तथा संज्ञा—ये सोलह देवाङ्गनाएँ भी उपस्थित थीं। इनके सिवा और भी बहुत-सी मनोहर रूपवाली देवकन्याएँ, नागकन्याएँ तथा मुनिकन्याएँ वहाँ आयी थीं। उस समय जो देवाङ्गनाएँ गिरिराजके भवनमें विराजमान थीं, उन सबकी संख्या बतानेमें कौन समर्थ है?

उनके दिये हुए रत्नमय सिंहासनपर दूलह शिव प्रसन्नतापूर्वक बैठे। उस समय उन सोलह दिव्य देवियोंने सुधाके समान मधुर वाणीमें भगवान् शंकरको बधाई दी। उनके साथ विनोदभरी बातें कीं और पार्वतीको सुख पहुँचानेके लिये विनम्र अनुरोध किया। इसी समय भगवान् शंकरने रतिपर कृपा की। रतिने गाँठमें बँधी हुई कामदेवके शरीरकी भस्मराशि उनके सामने रख दी और शिवने अपनी अमृतमयी दृष्टिसे देखकर भस्मके उस ढेरसे पुनः कामदेवको प्रकट कर दिया। तत्पश्चात् योगियोंके परम गुरु निर्विकार भगवान् शंकरने उन परिहासपरायणा देवियोंसे कहा—'आप सब-की-सब साध्वी तथा जगन्माताएँ हैं, फिर मुझ पुत्रके प्रति यह चपलता क्यों?' शिवकी यह बात सुनकर वे देवियाँ सम्भ्रमपूर्वक चित्रलिखी-सी खड़ी रह गयीं। इसके बाद शंकरजीने भोजन किया। फिर उन्होंने मनोहर राजसिंहासनपर विराजमान हो उस दिव्य निवासगृहकी अनुपम शोभा एवं चित्रकारी देखी। यह सब देखकर उन्हें आश्चर्य और परम संतोष हुआ। रातको उन्होंने उसी दिव्य भवनमें विश्राम किया। प्राणवल्लभे! जब प्रातःकाल हुआ, तब नाना प्रकारके वाद्योंकी मधुर ध्वनि होने लगी। फिर तो सब देवता वेगपूर्वक उठे और वेश-भूषासे

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६१५

सज्जित हो अपने-अपने वाहनोंपर सवार होकर कैलासकी यात्राके लिये उद्यत हो गये। उस समय नारायणकी आज्ञासे धर्म उस वासभवनमें गये और योगिश्वर शंकरसे समयोचित वचन बोले।

धर्मने कहा—प्रमथेश्वर! आपका कल्याण हो। उठिये, उठिये और श्रीहरिका स्मरण करते हुए माहेन्द्र-योगमें पार्वतीके साथ यात्रा कीजिये।

वृन्दावनविनोदिनि! धर्मकी बात सुनकर शंकरने पार्वतीके साथ माहेन्द्र-योगमें यात्रा आरम्भ की। पार्वतीके साथ देवेश्वर शंकरके यात्रा करते समय मेना उच्चस्वरसे रो पड़ीं और उन कृपानिधानसे बोलीं।

मेनाने कहा—कृपानिधे! कृपा करके मेरी बच्चीका पालन कीजियेगा। आप आशुतोष हैं। इसके सहस्रों दोषोंको क्षमा कीजियेगा। मेरी बेटी जन्म-जन्ममें आपके चरणकमलोंमें अनन्यभक्ति रखती आयी है। सोते-जागते हर समय इसे अपने स्वामी महादेवके सिवा दूसरे किसीकी याद नहीं आती है। आपके प्रति भक्तिकी बातें सुनते ही इसका अङ्ग-अङ्ग पुलकित हो उठता है और नेत्रोंसे आनन्दके आँसू बहने लगते हैं। मृत्युञ्जय! आपकी निन्दा कानमें पड़नेपर यह ऐसी मौन हो जाती है, मानो मर गयी हो।

मेना यह कह ही रही थीं कि हिमवान् तत्काल वहाँ आ पहुँचे और अपनी बच्चीको छातीसे लगा फूट-फूटकर रोने लगे—'वत्से! हिमालयको—मेरे इस घरको सूना करके तू कहाँ चली जा रही है? तेरे गुणोंको याद करके मेरा हृदय अवश्य ही विदीर्ण हो जायगा।' यों कहकर शैलराजने अपनी शिवा शिवको सौंप दी और पुत्र तथा बन्धु-बान्धवोंसहित वे बारंबार उच्चस्वरसे रोदन करने लगे। उस समय कृपानिधान साक्षात् भगवान् नारायणने उन सबको कृपापूर्वक अध्यात्मज्ञान देकर धीरज बँधाया। पार्वतीने भक्तिभावसे माता-पिता और गुरुको प्रणाम किया। वे महामायारूपिणी हैं; अतः मायाका आश्रय ले बारंबार जोर-जोरसे रोने लगीं। पार्वतीके रोनेसे ही वहाँ सब स्त्रियाँ रोने लगीं। पत्नियों तथा सेवकगणोंसहित सम्पूर्ण देवता और मुनि भी रो पड़े। फिर वे मानसशायी देवता शीघ्र ही कैलासपर्वतको चल दिये तथा दो ही घड़ीमें शिवके निवासस्थानपर सानन्द जा पहुँचे। यह देखकर वहाँके मङ्गल-कृत्यका सम्पादन करनेके लिये देवताओं और मुनियोंकी पत्नियाँ भी दीप लिये शीघ्रतापूर्वक सहर्ष वहाँ आ गयीं। वायु, कुबेर और शुक्रकी स्त्रियाँ, बृहस्पतिकी पत्नी तारा, दुर्वासाकी स्त्री, अत्रि-भार्या अनसूया, चन्द्रमाकी पत्नियाँ, देवकन्या, नागकन्या तथा सहस्रों मुनिकन्याएँ वहाँ उपस्थित हुईं। वहाँ जिन असंख्य कामिनियोंका समूह आया था, उन सबकी गणना करनेमें कौन समर्थ है? उन सबने मिलकर नवदम्पतिका उनके निवास-मन्दिरमें प्रवेश कराया तथा उन महेश्वरको रमणीय रत्नमय सिंहासनपर बिठाया। वहाँ भगवान् शिवने सतीको उनका पहलेवाला घर दिखाया और प्रसन्नतापूर्वक पूछा—'प्रिये! क्या तुम्हें अपने इस घरकी याद आती है? यहींसे तुम अपने पिताके निवास-स्थानको गयी थीं। अन्तर इतना ही है कि इस समय तुम गिरिराजकुमारी हो और उस समय यहाँ दक्षकन्याके रूपमें निवास करती थीं। तुम्हें पूर्वजन्मकी बातोंका सदा स्मरण रहता है; इसीलिये पिछली बातोंकी याद दिला रहा हूँ। यदि तुम्हें उन बातोंका स्मरण है तो कहो।'

भगवान् शंकरकी बात सुनकर पार्वती मुस्करायीं और बोलीं—'प्राणनाथ! मुझे सब बातोंका स्मरण है; किंतु इस समय आप चुप रहें (उन बीती बातोंकी चर्चा न करें)।' तत्पश्चात् शिवने सामग्री एकत्र करके नारायण आदि देवताओंको नाना प्रकारके मनोहर पदार्थ भोजन कराये। भोजनके पश्चात् भाँति-भाँतिके रत्नोंसे अलंकृत हो अपनी स्त्रियों और सेवकगणोंसहित

४२- धन्वन्तरिके दर्प-भङ्गकी कथा, उनके द्वारा मनसादेवीका स्तवन

६१६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सब देवता भगवान् चन्द्रशेखरको प्रणाम करके बिदा हुए। भगवान् नारायण और ब्रह्माको शंकरजीने स्वयं ही प्रणाम किया। वे दोनों उन्हें हृदयसे लगाकर आशीर्वाद दे अपने-अपने स्थानको चले गये।

इसके बाद हिमवान् और मेनाने मैनाकको बुलाया और कहा— 'बेटा ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम शिव और पार्वतीको शीघ्र यहाँ बुला लाओ।' उनकी बात सुनकर मैनाक शीघ्र ही शिवधाममें गया और पार्वती एवं परमेश्वरको लिवाकर आ गया। पार्वतीका आगमन सुनकर बालक-बालिका, वृद्धा तथा युवती स्त्रियाँ भी उन्हें देखनेके लिये दौड़ी आयीं। पर्वतगण भी सानन्द भागे आये। मेना अपने पुत्रों और बहूके साथ मुस्कराती हुई दौड़ीं। हिमालय भी प्रसन्नतापूर्वक पुत्रीकी अगवानीके लिये दौड़े आये। देवी पार्वतीने रथसे उतरकर बड़े हर्षके साथ माता-पिता तथा गुरुजनोंको प्रणाम किया। उस समय वे आनन्दके समुद्रमें गोते लगा रही थीं। हर्ष-विह्वल मेना और मोदमग्न हिमालयने पार्वतीको हृदयसे लगा लिया। उन्हें ऐसा लगा, मानो गये हुए प्राण वापस आ गये हों। पुत्रीको घरमें रखकर गिरिराजने उसके लिये रत्नसिंहासन दिया और शूलपाणि शिव तथा उनके पार्षदगणोंको मधुपर्क आदि दे सहर्ष उनका सत्कार किया। पार्षदोंसहित भगवान् चन्द्रशेखर अपने ससुरालके घरमें रहने लगे। वहाँ प्रतिदिन पत्नीसहित उनकी सोलह उपचारोंसे पूजा होने लगी। राधे ! इस प्रकार मैंने तुमसे भगवान् शंकरके मङ्गल-परिणयकी कथा कह सुनायी, जो हर्ष बढ़ानेवाली तथा शोकका नाश करनेवाली है। अब और क्या सुनना चाहती हो ?

(अध्याय ४५-४६)


इन्द्रके अभिमान-भङ्गका प्रसङ्ग—प्रकृति और गुरुकी अवहेलनासे इन्द्रको शाप, गौतममुनिके शापसे इन्द्रके शरीरमें सहस्र योनियोंका प्राकट्य, अहल्याका उद्धार, विश्वरूप और वृत्रके वधसे इन्द्रपर ब्रह्महत्याका आक्रमण, इन्द्रका मानसरोवरमें छिपना, बृहस्पतिका उनके पास जाना, इन्द्रद्वारा गुरुकी स्तुति, ब्रह्महत्याका भस्म होना, इन्द्रका विश्वकर्माद्वारा नगरका निर्माण कराना, द्विज-बालकरूपधारी श्रीहरि तथा लोमशमुनिके द्वारा इन्द्रका मान-भंजन, राज्य छोड़नेको उद्यत हुए विरक्त इन्द्रका बृहस्पतिजीके समझानेसे पुनः राज्यपर ही प्रतिष्ठित रहना

श्रीराधिकाने पूछा— जगद्गुरो ! मैंने शूलपाणि शिवके यश तथा दैववश उनके दर्प-भङ्गकी बात सुनी। पार्वतीके गर्वभंजनका और शिव-पार्वतीके विवाहका भी वर्णन सुना। अब इन्द्रके तथा अन्य लोगोंके भी अभिमानके चूर्ण होनेके प्रसङ्गोंको क्रमशः सुनना चाहती हूँ; कृपया विस्तारपूर्वक कहें।

श्रीकृष्ण बोले— सुन्दरि ! इन्द्रके दर्प-भङ्गकी बात तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। वह प्रसङ्ग सुन्दर, अनुपम तथा कानोंके लिये अमृतके समान मधुर है। प्राचीन कालकी बात है। इन्द्र सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके समस्त देवताओंके स्वामी तथा महान् ऐश्वर्यसे सम्पन्न हो गये। तपस्याके फलसे प्रतिदिन उनके ऐश्वर्यकी वृद्धि होने लगी। बृहस्पतिजीने उन्हें सिद्ध-मन्त्रकी दीक्षा दी। उन्होंने पुष्करमें सौ वर्षोंतक उस महामन्त्रका जप किया। जपसे वह मन्त्र सिद्ध हो गया और इनका मनोरथ पूरा हुआ। मनुष्य सम्पत्तिसे मोहित हुआ ब्रह्मस्वरूपा प्रकृतिका आदर नहीं करता; अतः

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६१७ प्रकृतिने इन्द्रको शाप दे दिया। इसीलिये उन्हें अपने गुरुकी ओरसे भी अत्यन्त क्रोधपूर्वक शाप मिला। एक दिन इन्द्र अपनी सभामें बैठे थे। प्रकृतिके शापसे उनकी बुद्धि मारी गयी थी; अतः वे गुरुको आते देखकर भी न तो उठे और न प्रसन्नतापूर्वक उन्हें प्रणाम ही किया। यह देख बृहस्पतिजी क्रोधसे युक्त हो उस सभामें नहीं बैठे, उलटे पाँव घर लौट आये। वहाँ भी वे ताराके निकट नहीं ठहरे, तपस्याके लिये वनमें चले गये। उन्होंने मन-ही-मन दुःखी होकर कहा—'इन्द्रकी सम्पत्ति चली जाय।' तदनन्तर इन्द्रको सुबुद्धि प्राप्त हुई और वे बोले—'मेरे स्वामी यहाँसे कहाँ चले गये।' यों कहकर वे वेगपूर्वक सिंहासनसे उठे और ताराके पास गये। वहाँ उन्होंने भक्तिभावसे मस्तक झुका दोनों हाथ जोड़कर माता ताराको प्रणाम किया और सारी बातें बतायीं। फिर वे उच्चस्वरसे बारंबार रोदन करने लगे। पुत्रको रोते देख माता तारा भी बहुत रोयीं और बोलीं—'बेटा! तू घर जा। इस समय तुझे गुरुदेवके दर्शन नहीं होंगे। जब दुर्दिनका अन्त होगा, तभी तुझे गुरुजी मिलेंगे और उनकी कृपासे पुनः लक्ष्मीकी प्राप्ति होगी। मूढ़! तेरा अन्तःकरण दूषित है; अतः अब अपने कर्मोंका फल भोग। दुर्दिनमें अपने गुरुपर दोषारोपण करता है और अच्छे दिनोंमें अपने- आपको ही संतुष्ट करनेमें लगा रहता है। (गुरुकी परवा नहीं करता।) इन्द्र! सुदिन और दुर्दिन ही सुख और दुःखके कारण हैं।' यों कहकर पतिव्रता तारादेवी चुप हो गयीं। तदनन्तर इन्द्र वहाँसे लौट आये और एक दिन मन्दाकिनीके तटपर स्नानके लिये गये। वहाँ उन्होंने स्नान करती हुई गौतमपत्नी अहल्याको देखा। इन्द्रकी बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी थी। उन्होंने गौतमका रूप धारण करके अहल्याका शील भङ्ग कर दिया। इसी बीच गौतमजी भी वहाँ आ गये। इन्द्रने भयभीत होकर मुनिके चरण पकड़ लिये। तब गौतमजीने कुपित होकर उनसे कहा। गौतम बोले—इन्द्र! तुझे धिक्कार है। तू देवताओंमें श्रेष्ठ समझा जाता है। कश्यपजीका पुत्र है; ज्ञानी है और जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीका प्रपौत्र है तो भी तेरी ऐसी बुद्धि कैसे हो गयी? जिसके नाना साक्षात् प्रजापति दक्ष हैं और माता पतिव्रता अदिति देवी हैं, उसका इतना पतन आश्चर्यकी बात है! तू वेदोंका ज्ञान प्राप्त करके ज्ञानी कहलाता है; किंतु कर्मसे योनि-लम्पट है; अतः तेरे शरीरमें एक सहस्र योनियाँ प्रकट हो जायँ । पूरे एक वर्षतक तुझे सदा योनिकी ही दुर्गन्ध प्राप्त होती रहेगी। तत्पश्चात् सूर्यकी आराधना करनेपर तेरे शरीरकी योनियाँ नेत्रोंके रूपमें परिणत हो जायँगी। मेरे शाप और गुरुके क्रोधसे इस समय तू राजलक्ष्मीसे भ्रष्ट हो जा। ओ मूढ़! तेरे गुरु बड़े तेजस्वी और मेरे अत्यन्त प्रेमी बन्धु हैं। हम दोनों बन्धुओंमें फूट न पड़ जाय; इस भयसे तेरे गुरुका ही खयाल करके मैंने इस समय तेरे प्राण नहीं लिये हैं। तदनन्तर पैरोंमें पड़ी हुई अहल्याको लक्ष्य करके मुनिवर गौतमने कहा—'प्रिये ! अब तू वनमें जा अपने शरीरको पत्थर बनाकर चिरकाल- तक उसी अवस्थामें रह। इस बातको मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि तेरे मनमें कोई कामना नहीं थी। इन्द्रने स्वयं आसक्त होकर तेरे साथ छल किया है।' स्वामीकी ऐसी आज्ञा होनेपर अहल्या बहुत डर गयी और 'हा नाथ ! हा नाथ !' पुकारती तथा रोती हुई वनमें चली गयी। साठ हजार वर्षोंतक कर्मफलका भोग करनेके बाद मुनिप्रिया अहल्या श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंका स्पर्श पाकर तत्काल शुद्ध हो गयी। फिर वह अत्यन्त सुन्दर रूप धारण करके गौतमजीके पास गयी। मुनिने सुन्दरी अहल्याको पाकर प्रसन्नताका अनुभव किया।

६१८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सुन्दरि राधिके! अब इन्द्रका उत्तम वृत्तान्त सुनो, जो पुण्यका बीज तथा पापका नाशक है। मैं विस्तारपूर्वक उसका वर्णन करता हूँ। गुरुके कोप और प्रकृतिकी अवहेलनासे वज्रधारी इन्द्रकी विवेक-शक्ति नष्ट हो गयी थी; अतः उनसे एक दिन ब्रह्महत्याका पाप बन गया। गुरुको तो वे छोड़ ही चुके थे; दैवने भी उन्हें अपना ग्रास बनाया। दैत्योंका आक्रमण हुआ और वे उनसे पीड़ित एवं भयभीत हो जगद्गुरु ब्रह्माजीकी शरणमें गये। ब्रह्माजीकी आज्ञासे उन्होंने विश्वरूपको अपना पुरोहित बनाया। दैवसे उनकी बुद्धि मारी गयी थी; इसलिये इन्द्रने विश्वरूपपर पूरा-पूरा विश्वास कर लिया। विश्वरूपकी माता दैत्यवंशकी कन्या थी; अतः उनके मनमें दैत्योंके प्रति भी पक्षपात था। बुद्धिमान् इन्द्र उनके इस मनोभावको ताड़ गये; अतः उन्होंने अनायास ही तीखे बाण मारकर पुरोहित विश्वरूपका सिर काट लिया। विश्वरूपके पिता त्वष्टाने जब यह बात सुनी तो वे तत्क्षण रोषके वशीभूत हो गये और ‘इन्द्रशत्रो विवर्द्धस्व’ (इन्द्रके शत्रु ! तुम बढ़ो) ऐसा कहकर यज्ञका अनुष्ठान करने लगे, उस यज्ञके कुण्डसे वृत्र नामक महान् असुर प्रकट हुआ, जिसने अनायास ही समस्त देवताओंको क्रोधपूर्वक कुचल डाला। तब दैत्यमर्दन इन्द्रने महामुनि दधीचिकी हड्डियोंसे अत्यन्त भयंकर वज्रका निर्माण करके देवकण्टक वृत्रासुरका वध कर डाला। फिर तो इन्द्रपर ब्रह्महत्याने धावा बोल दिया। वे अचेत-से हो रहे थे। ब्रह्महत्या बूढ़ी स्त्रीका वेष धारण करके आयी थी। वह लाल कपड़े पहन रखी थी। उसके शरीरकी ऊँचाई सात ताड़ोंके बराबर थी तथा कण्ठ, ओठ और तालु सूखे हुए थे। उसके दाँत हरिसके समान लंबे थे। उसने इन्द्रको बहुत डरा दिया। वे जब दौड़ते थे तो उनके पीछे-पीछे वह भी दौड़ती थी। ब्रह्महत्या बलिष्ठ थी और इन्द्र अपनी चेतनातक खो बैठे थे। उसका स्वभाव निर्दय था और वह हाथमें तलवार लेकर बड़े वेगसे दौड़ रही थी। उस घोर ब्रह्महत्याको देखकर गुरुके चरणोंका स्मरण करते हुए वे कमलके नालके सूक्ष्म सूत्रके सहारे मानसरोवरमें प्रविष्ट हो गये। ब्रह्महत्या ब्रह्माजीके शापके कारण वहाँ पहुँचनेमें असमर्थ थी; अतः सरोवरके तटके निकट बरगदकी एक शाखापर जा बैठी। उन दिनों राजा नहुष इन्द्रकी जगह त्रिभुवनके स्वामी बनाये गये। नहुष बलिष्ठ थे और देवता दुर्बल। अतः इन्द्रपदपर प्रतिष्ठित हुए नहुषने देवताओंसे यह माँग की कि इन्द्राणी शची मुझ इन्द्रकी सेवाके लिये उपस्थित हों। यह समाचार सुनकर शचीको बड़ा भय हुआ। वे तारादेवीकी शरणमें गयीं। ताराने अपने पतिको बहुत फटकारा और शिष्य-पत्नीकी रक्षा की। तब शचीको आश्वासन दे गुरु बृहस्पति प्रसन्नतापूर्वक मानसरोवरको गये और वहाँ कातर एवं अचेत हुए देवेन्द्रको सम्बोधित करके बोले।

बृहस्पतिने कहा— बेटा! उठो, उठो। मेरे रहते हुए तुम्हें क्या भय हो सकता है? मैं तुम्हारा स्वामी एवं गुरु हूँ। मेरे स्वरसे ही मुझे पहचानो और भय छोड़ो।

बृहस्पतिके स्वरको पहचानकर सम्पूर्ण सिद्धियोंके स्वामी इन्द्रने सूक्ष्म रूपको त्याग अपना रूप धारण कर लिया और तत्काल उठकर वेगपूर्वक उन सूर्यतुल्य तेजस्वी गुरुको देखा और प्रसन्नतापूर्वक उन्हें प्रणाम किया। गुरुजी उस समय प्रसन्न थे और क्रोधका परित्याग कर चुके थे। पैरोंमें पड़कर भयविह्वल हो रोते हुए इन्द्रको खींचकर उन्होंने प्रेमपूर्वक छातीसे लगा लिया और स्वयं भी प्रेमाकुल होकर रो पड़े! बृहस्पतिजीको संतुष्ट तथा रोते देख देवेश्वर इन्द्रका अङ्ग-अङ्ग पुलकित हो उठा। भक्तिभावसे उनका मस्तक झुक गया और वे हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे।

४३- श्रीकृष्णके अन्तर्धान होनेसे श्रीराधा और गोपियोंका दुःखसे रोदन, चन्दनवनमें श्रीकृष्णका उन्हें दर्शन देना, गोपियोंके प्रणय-कोपजनित उद्गार, श्रीकृष्णका उनके साथ विहार, श्रीराधा नामके प्रथम उच्चारणका कारण, श्रीकृष्णद्वारा श्रीराधाका शृङ्गार, गोपियोंद्वारा उनकी सेवा और श्रीकृष्णके मथुरागमनसे लेकर परमधामगमनतककी लीलाओंका संक्षिप्त परिचय

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६१९

इन्द्र बोले— भगवन्! मेरे अपराधको क्षमा कीजिये। कृपानिधान! कृपा कीजिये। अच्छे स्वामी अपने सेवकके अपराधको हृदयमें स्थान नहीं देते। अपनी पत्नी, अपने शिष्य, अपने भृत्य तथा अपने पुत्रोंको दुर्बल या सबल कौन मनुष्य दण्ड देनेमें असमर्थ होता है? तीन करोड़ देवताओंमें मैं ही एक देवाधम और मूढ़ हूँ। सुरश्रेष्ठ! आपकी कृपासे ही मैं उच्च पदपर प्रतिष्ठित हूँ। आपने ही दया करके मुझे आगे बढ़ाया है। आप सारे जगत्का संहार करनेकी शक्ति रखते हैं। आपके सामने मेरी क्या बिसात है? मैं वैसा ही हूँ, जैसा बावलीका कीट। आप साक्षात् विधाताके पौत्र हैं; अतः स्वयं दूसरी सृष्टि रचनेमें समर्थ हैं।

इन्द्रके मुखसे यह स्तवन सुनकर गुरु बृहस्पति बहुत संतुष्ट हुए। उनके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे और वे प्रेमपूर्वक बोले।

बृहस्पतिने कहा— महाभाग! धैर्य धारण करो और पहलेसे भी चौगुना महान् ऐश्वर्य पाकर सुस्थिर लक्ष्मीका लाभ लो। वत्स पुरन्दर! मेरे प्रसादसे तुम्हारे शत्रु मारे गये। अब तुम अमरावतीमें जाकर राज्य करो और पतिव्रता शचीसे मिलो।

यों कहकर ज्यों ही शिष्यसहित गुरु वहाँसे चलनेको उद्यत हुए, त्यों ही उन्होंने अत्यन्त दुःसह एवं भयंकर ब्रह्महत्याको सामने खड़ी देखा। उसपर दृष्टि पड़ते ही इन्द्र अत्यन्त भयभीत हो गुरुकी शरणमें गये। बृहस्पतिको भी बड़ा भय हुआ। उन्होंने मन-ही-मन मधुसूदनका स्मरण किया। इसी बीचमें आकाशवाणी हुई, जिसमें अक्षर तो थोड़े थे, परंतु अर्थ बहुत। बृहस्पतिजीने वह आकाशवाणी सुनी— 'संसारविजय नामक जो राधिकाकवच है, वह समस्त अशुभोंका नाश करनेवाला है। इस समय उसीका उपदेश देकर तुम शिष्यकी रक्षा करो।' तब शिष्यवत्सल बृहस्पतिने शिष्यको उस कवचका उपदेश दिया और अनायास ही हुङ्कारमात्रसे ब्रह्महत्याको भस्म कर डाला। तदनन्तर शिष्यको साथ लेकर बृहस्पतिजी अमरावतीपुरीमें गये। इन्द्रने गुरुकी आज्ञासे उस पुरीकी दशा देखी। शत्रुने उस नगरीको तोड़-फोड़ डाला था।

पतिका आगमन सुनकर शचीके मनमें बड़ा हर्ष हुआ। उसने भक्तिभावसे गुरुदेवको प्रणाम करके प्राणवल्लभके चरणोंमें भी मस्तक झुकाया। प्रिये! इन्द्रका शुभागमन सुनकर सब देवता, ऋषि और मुनि वहाँ आये। उनका चित्त हर्षसे गद्गद हो रहा था। इन्द्रने अमरावतीका निर्माण करनेके लिये एक श्रेष्ठ देवशिल्पीको नियुक्त किया। देवशिल्पीने पूरे सौ वर्षोंतक अमरावतीकी रचना की। नाना विचित्र रत्नोंसे सम्पन्न तथा श्रेष्ठ मणिरत्नोंद्वारा निर्मित उस मनोहर पुरीकी कहीं उपमा नहीं थी। फिर भी उससे देवराज इन्द्र संतुष्ट नहीं हुए। विश्वकर्माको आज्ञा नहीं मिली। इसलिये वे घर जा तो नहीं सके; परंतु उनका चित्त अत्यन्त उद्विग्न हो उठा। वे ब्रह्माजीकी शरणमें गये। ब्रह्माजीने उनके अभिप्रायको जानकर कहा— 'कल तुम्हारे प्रतिरोधक कर्मका क्षय हो जानेपर ही तुम्हें छुटकारा मिलेगा।' ब्रह्माजीकी बात सुनकर विश्वकर्मा शीघ्र ही अमरावती लौट आये और ब्रह्माजी वैकुण्ठधाममें गये। वहाँ उन्होंने अपने माता-पिता श्रीहरिको प्रणाम करके उनसे सारी बातें कहीं। तब श्रीहरिने ब्रह्माजीको धैर्य देकर अपने घरको लौटाया और स्वयं ब्राह्मणका रूप धारण करके वे अमरावतीपुरीमें आये। ब्राह्मणकी अवस्था बहुत छोटी थी। शरीर भी अधिक नाटा था। उन्होंने दण्ड और छत्र धारण कर रखे थे। शरीरपर श्वेत वस्त्र और ललाटमें उज्ज्वल तिलकसे वे बड़े मनोहर जान पड़ते थे। मुस्कराते समय उनकी श्वेत दन्तावली चमक उठती थी। अवस्थामें छोटे होनेपर भी

६२०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

वे ज्ञान और बुद्धिमें बढ़े-चढ़े थे। विद्वान् तो थे ही, स्वयं विधाताके भी विधाता तथा सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके दाता थे। इन्द्रके द्वारपर खड़े हो वे द्वारपालसे बोले—'द्वाररक्षक! तुम इन्द्रसे जाकर कहो कि द्वारपर एक ब्राह्मण खड़े हैं, जो आपसे शीघ्र मिलनेके लिये आये हैं।' द्वारपालने उनकी बात सुनकर इन्द्रको सूचना दी और इन्द्र शीघ्र आकर उन ब्राह्मणकुमारसे मिले। हँसते हुए बालक और बालिकाओंके समूह उन्हें घेरकर खड़े थे। वे बड़े उत्साहसे मुस्करा रहे थे और उनका स्वरूप अत्यन्त तेजस्वी जान पड़ता था। इन्द्रने उन शिशुरूपधारी हरिको भक्तिभावसे प्रणाम किया और भक्तवत्सल श्रीहरिने प्रेमपूर्वक उन्हें आशीर्वाद दिया। इन्द्रने मधुपर्क आदि देकर उनकी पूजा की और ब्राह्मणबालकसे पूछा—'कहिये, किसलिये आपका शुभागमन हुआ है?' इन्द्रका वचन सुनकर ब्राह्मणबालकने जो बृहस्पतिके गुरुके भी गुरु थे, मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा।

**ब्राह्मण बोले—**देवेन्द्र! मैंने सुना है कि तुम बड़े विचित्र और अद्भुत नगरका निर्माण करा रहे हो; अतः इस नगरको देखने तथा इसके विषयमें मनोवाञ्छित बातें पूछनेके लिये मैं यहाँ आया हूँ। कितने वर्षोंतक इसका निर्माण कराते रहनेके लिये तुमने संकल्प किया है? अथवा विश्वकर्मा कितने वर्षोंमें इसका निर्माणकार्य पूर्ण कर देंगे? ऐसा निर्माण तो किसी भी इन्द्रने नहीं किया था। ऐसे सुन्दर नगरके निर्माणमें दूसरा कोई विश्वकर्मा भी समर्थ नहीं है।

ब्राह्मणबालककी यह बात सुनकर देवराज इन्द्र हँसने लगे। वे सम्पत्तिके मदसे अत्यन्त मतवाले हो रहे थे; अतः उन्होंने उस द्विजकुमारसे पुनः पूछा—'ब्रह्मन्! आपने कितने इन्द्रोंका समूह देखा अथवा सुना है? तथा कितने प्रकारके विश्वकर्मा आपके देखने या सुननेमें आये हैं? यह मुझे इस समय बताइये।' इन्द्रका यह प्रश्न सुनकर ब्राह्मणकुमार हँसे और अमृतके समान मधुर एवं श्रवणसुखद वचन बोले।

**ब्राह्मणने कहा—**तात! मैं तुम्हारे पिता प्रजापति कश्यपको जानता हूँ। उनके पिता तपोनिधि मरीचिमुनिसे भी परिचित हूँ। मरीचिके पिता देवेश्वर ब्रह्माजीको भी, जो भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे उत्पन्न हुए हैं, जानता हूँ और उनके रक्षक सत्त्वगुणशाली महाविष्णुका भी परिचय रखता हूँ। मुझे उस एकार्णव प्रलयका भी ज्ञान है, जो सम्पूर्ण प्राणियोंसे शून्य एवं भयानक दिखायी देता है। इन्द्र! निश्चय ही सृष्टि कई प्रकारकी है। कल्प भी अनेक हैं तथा ब्रह्माण्ड भी कितने ही प्रकारके हैं। उन ब्रह्माण्डोंमें अनेकानेक ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा इन्द्र भी बहुतेरे हैं। उन सबकी गणना कौन कर सकता है? सुरेश्वर! भूतलके धूलिकणोंकी गणना कर ली जाय तो भी इन्द्रोंकी गणना नहीं हो सकती है; ऐसा विद्वानोंका मत है। इन्द्रकी आयु और अधिकार इकहत्तर चतुर्युगतक है। अट्ठाईस इन्द्रोंका पतन हो जानेपर विधाताका एक दिन-रात पूरा होता है। इस तरह एक सौ आठ वर्षोंतक ब्रह्माजीकी सम्पूर्ण आयु है। जहाँ विधाताकी भी संख्या नहीं है, वहाँ देवेन्द्रोंकी गणना क्या हो सकती है? जहाँ ब्रह्माण्डोंकी ही संख्या ज्ञात नहीं होती; वहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेशकी कहाँ गिनती है? महाविष्णुके रोमकूपजनित निर्मल जलमें ब्रह्माण्डकी स्थिति उसी तरह है, जैसे सांसारिक नदी-नद आदिके जलमें कृत्रिम नौका हुआ करती है। इस प्रकार महाविष्णुके शरीरमें जितने रोएँ हैं, उतने ब्रह्माण्ड हैं; अतएव ब्रह्माण्ड असंख्य कहे गये हैं। एक-एक ब्रह्माण्डमें तुम्हारे-जैसे कितने ही देवता निवास करते हैं।

इसी बीचमें पुरुषोत्तम श्रीहरिने वहाँ चींटोंके समूहको देखा, जो सौ धनुषकी दूरीतक फैला

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

६२१

हुआ था। बारी-बारीसे उन सबकी ओर देखकर वे ब्राह्मणबालकका रूप धरकर पधारे हुए भगवान् उच्चस्वरसे हँसने लगे। किंतु कुछ बोले नहीं। मौन रह गये। उनका हृदय समुद्रके समान गम्भीर था। ब्राह्मण-वटुककी गाथा सुनकर और उनका अट्टहास देखकर इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ। तदनन्तर उनके विनयपूर्वक पूछनेपर ब्राह्मणरूपधारी जनार्दनने भाषण देना आरम्भ किया।

**ब्राह्मण बोले—**इन्द्र! मैंने क्रमशः एक-एक करके चींटोंके समुदायकी सृष्टि की है। वे सब चींटे अपने कर्मसे देवलोकमें इन्द्रके पदपर प्रतिष्ठित हो चुके थे; परंतु इस समय वे सब अपने कर्मानुसार क्रमशः भिन्न-भिन्न जीवयोनियोंमें जन्म लेते हुए चींटोंकी जातिमें उत्पन्न हुए हैं। कर्मसे ही जीव निरामय वैकुण्ठधाममें जाते हैं, कर्मसे ब्रह्मलोकमें और कर्मसे ही शिवलोकमें पहुँचते हैं। अपने कर्मसे ही वे स्वर्गमें तथा स्वर्गतुल्य स्थान पातालमें भी प्रवेश करते हैं। कर्मसे ही अपने लिये दुःखके एकमात्र कारण घोर नरकमें गिरते हैं। कर्मसूत्रसे ही विधाता जीवधारियोंको फल देते हैं। कर्म स्वभावसाध्य है और स्वभाव अभ्यासजन्य। देवेन्द्र! चराचर प्राणियोंसहित समस्त संसार स्वप्नके समान मिथ्या है। यहाँ कालयोगसे सबकी मौत सदा सिरपर सवार रहती है। जीवधारियोंके शुभ और अशुभ सब कुछ पानीके बुलबुलेके समान हैं। इन्द्र! विद्वान् पुरुष इसमें सदा विचरता है; परंतु कहीं भी आसक्त नहीं होता।

यों कहकर ब्राह्मणदेवता वहाँ मुस्कराते हुए बैठे रहे। उनकी बात सुनकर देवेश्वर इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ। वे अपने-आपको अब अधिक महत्त्व नहीं दे रहे थे। इसी बीच एक मुनीश्वर वहाँ शीघ्रतापूर्वक आये जो ज्ञान और अवस्था दोनोंमें बड़े थे। उनका शरीर अत्यन्त वृद्ध था। वे महान् योगी जान पड़ते थे। वे कटिमें कृष्ण-मृगचर्म, मस्तकपर जटा, ललाटमें उज्ज्वल तिलक, वक्षःस्थलमें रोमचक्र तथा सिरपर चटाई धारण किये हुए थे। उनका सारा रोममण्डल विद्यमान था; केवल बीचमें कुछ रोम उखाड़े गये थे। वे मुनि ब्राह्मणबालक तथा इन्द्रके बीचमें आकर ठूँठे काठकी भाँति खड़े हो गये। महेन्द्रने ब्राह्मणको देखकर सहर्ष प्रणाम किया और मधुपर्क देकर भक्तिभावसे उनकी पूजा की। इसके बाद उन्होंने ब्राह्मणसे कुशल-मङ्गल पूछा और सादर एवं सानन्द आतिथ्य करके उन्हें संतुष्ट किया। तत्पश्चात् ब्राह्मणबालकने उनके साथ बातचीत की और विनयपूर्वक अपना सारा मनोभाव प्रकट किया।

**बालकने कहा—**विप्रवर! आप कहाँसे आये हैं? और आपका नाम क्या है? यहाँ आनेका उद्देश्य क्या है? तथा आप कहाँके रहनेवाले हैं? आपने मस्तकपर चटाई किसलिये धारण कर रखी है? मुने! आपके वक्षःस्थलमें रोमचक्र कैसा है? यह बहुत बढ़ा हुआ है; किंतु बीचमेंसे कुछ रोम क्यों उखाड़ लिये गये हैं? ब्रह्मन्! यदि आपकी मुझपर कृपा हो तो सब विस्तारपूर्वक कहिये। इन सब अद्भुत बातोंको सुननेके लिये मेरे मनमें उत्कण्ठा है।

ब्राह्मणबालककी यह बात सुनकर वे महामुनि इन्द्रके सामने प्रसन्नतापूर्वक अपना सारा वृत्तान्त बताने लगे।

**मुनि बोले—**ब्रह्मन्! आयु बहुत थोड़ी होनेके कारण मैंने कहीं भी रहनेके लिये घर नहीं बनाया है; विवाह भी नहीं किया है और जीविकाका साधन भी नहीं जुटाया है। आजकल भिक्षासे ही जीवन-निर्वाह करता हूँ। मेरा नाम लोमश है। आप-जैसे ब्राह्मणका दर्शन ही यहाँ मेरे आगमनका प्रयोजन है। मेरे सिरपर जो चटाई है, वह वर्षा और धूपका निवारण करनेके लिये है। मेरे वक्षःस्थलमें जो रोमचक्र है, उसका भी

६२२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

कारण सुनिये, जो सांसारिक जीवोंको भय देनेवाला और उत्तम विवेकको उत्पन्न करनेवाला है। मेरे वक्षःस्थलका यह रोममण्डल ही मेरी आयुकी संख्याका प्रमाण है। ब्रह्मन्! जब एक इन्द्रका पतन हो जाता है, तब मेरे इस रोमचक्रका एक रोम उखाड़ दिया जाता है। इसी कारणसे बीचके बहुत-से रोएँ उखाड़ दिये गये हैं; तथापि अभी बहुत-से विद्यमान हैं। ब्रह्माका दूसरा परार्द्ध पूर्ण होनेपर मेरी मृत्यु बतायी गयी है। विप्रवर! असंख्य विधाता मर चुके हैं और मरेंगे। फिर इस छोटी-सी आयुके लिये स्त्री, पुत्र और घरकी क्या आवश्यकता है? ब्रह्माजीका पतन हो जानेपर भगवान् श्रीहरिकी एक पलक गिरती है; अतः मैं निरन्तर उन्हींके चरणारविन्दोंका दर्शन करता रहता हूँ। श्रीहरिका दास्यभाव दुर्लभ है। भक्तिका गौरव मुक्तिसे भी बढ़कर है। सारा ऐश्वर्य स्वप्नके समान मिथ्या और भगवान्‌की भक्तिमें व्यवधान डालनेवाला है। यह उत्तम ज्ञान मेरे गुरु भगवान् शंकरने दिया है; अतः मैं भक्तिके बिना सालोक्य आदि चार प्रकारकी मुक्तियोंको भी नहीं ग्रहण करना चाहता हूँ।

ऐसे कहकर वे मुनि भगवान् शंकरके समीप चले गये और बालकरूपधारी श्रीहरि भी वहीं अन्तर्धान हो गये। इन्द्र स्वप्नकी भाँति यह घटना देखकर बड़े विस्मित हुए। अब उन परमेश्वरके मनमें सम्पत्तिके लिये तृष्णा नहीं रह गयी। उन्होंने विश्वकर्माको बुलाकर उनसे मीठी-मीठी बातें कीं तथा रत्न देकर पूजन करनेके पश्चात् उन्हें घर जानेकी आज्ञा दी। फिर सब कुछ अपने पुत्रको सौंपकर वे भगवान्‌की शरणमें जानेको उद्यत हो गये। उनका विवेक जाग उठा था; अतः वे शची तथा राजलक्ष्मीको त्यागकर प्रारब्ध-क्षयकी कामना करने लगे। अपने प्राणवल्लभको विवेक एवं वैराग्यसे युक्त हुआ देख शचीका हृदय व्यथित हो उठा। वे शोकसे व्याकुल एवं भयभीत हो गुरुकी शरणमें गयीं। वहाँ सब कुछ निवेदन करके बृहस्पतिजीको बुलाकर इन्द्रको नीतिके सार-तत्त्वका उपदेश कराया। गुरु बृहस्पतिने दाम्पत्य-प्रेमसे युक्त शास्त्र-विशेषकी रचना करके स्वयं प्रेमपूर्वक उन्हें पढ़ाया। बृहस्पतिजीने उस शास्त्र-विशेषका भाव इन्द्रको भलीभाँति समझा दिया। वृन्दावनविनोदिनि! तब इन्द्र पूर्ववत् राज्य करने लगे। सुरेश्वरि! इस प्रकार मैंने इन्द्रके अभिमान-भङ्गका सारा प्रसङ्ग कह सुनाया। पिता नन्दके यज्ञमें जो इन्द्रके दर्पका दलन हुआ था, उसे तो तुमने अपनी आँखों देखा ही था। (अध्याय ४७)


सूर्य और अग्निके दर्प-भङ्गकी कथा

राधिका बोलीं— भगवन्! आपने इन्द्रके दर्प-भङ्गका प्रसङ्ग मुझसे कहा। अब मैं सूर्यदेवके गर्वगञ्जनकी बात यथार्थरूपसे सुनना चाहती हूँ।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा— सुन्दरि! सूर्य एक ही बार उदय लेकर फिर अस्त हो गये, परंतु माली और सुमाली नामक दो दैत्यराज सूर्यास्त हो जानेके बाद भी वैसा ही प्रकाश बनाये रखनेके लिये उद्यत हुए। भगवान् शंकरके वरसे महान् ऐश्वर्य पाकर वे दोनों दैत्य मदसे उन्मत्त हो गये थे। उनकी प्रभासे रात्रि नहीं होने पाती थी। (रातके समय भी दिनका-सा प्रकाश छाया रहता था।) यह देख सूर्यदेव रुष्ट हो गये और उन्होंने अपने शूलसे अवहेलनापूर्वक उन दोनों दैत्योंको मारा। सूर्यके शूलसे आहत हो वे दोनों दैत्य मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। भक्तोंका विनाश हुआ जान भक्तवत्सल शंकर आये और उन्होंने अपने महान् ज्ञानद्वारा उन दोनोंको जीवन-दान दिया। तब वे दोनों दैत्य भगवान् शिवको