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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

प्रकृतिखण्ड २५९

गोपीपति परम प्रभु उन परमेश्वरने इनके वस्त्र और शरीरको जीर्ण देखकर इनका ‘जरत्कारु’ नाम रख दिया। साथ ही, उन कृपानिधिने कृपापूर्वक इनकी सभी अभिलाषाएँ पूर्ण कर दीं, इनकी पूजाका प्रचार किया और स्वयं भी इनकी पूजा की। स्वर्गमें, ब्रह्मलोकमें, भूमण्डलमें और पातालमें—सर्वत्र इनकी पूजा प्रचलित हुई। सम्पूर्ण जगत्‌में ये अत्यधिक गौरवर्ण, सुन्दरी और मनोहारिणी हैं; अतएव ये साध्वी देवी ‘जगद्गौरी’—के नामसे विख्यात होकर सम्मान प्राप्त करती हैं। भगवान् शिवसे शिक्षा प्राप्त करनेके कारण ये देवी ‘शैवी’ कहलाती हैं। भगवान् विष्णुकी ये अनन्य उपासिका हैं। अतएव लोग इन्हें ‘वैष्णवी’ कहते हैं। राजा जनमेजयके यज्ञमें इन्हींके सत्प्रयत्नसे नागोंके प्राणोंकी रक्षा हुई थी, अतः इनका नाम ‘नागेश्वरी’ और ‘नागभगिनी’ पड़ गया। विषका संहार करनेमें परम समर्थ होनेसे इनका एक नाम ‘विषहरी’ है। इन्हें भगवान् शंकरसे योगसिद्धि प्राप्त हुई थी। अतः ये ‘सिद्धयोगिनी’ कहलाने लगीं। इन्होंने शंकरसे महान् गोपनीय ज्ञान एवं मृतसंजीवनी नामक उत्तम विद्या प्राप्त की है, इस कारण विद्वान् पुरुष इन्हें ‘महाज्ञानयुता’ कहते हैं। ये परम तपस्विनी देवी मुनिवर आस्तीककी माता हैं। अतः ये देवी जगत्‌में सुप्रतिष्ठित होकर ‘आस्तीकमाता’ नामसे विख्यात हुई हैं। जगत्पूज्य योगी महात्मा मुनिवर जरत्कारुकी प्यारी पत्नी होनेके कारण ये ‘जरत्कारुप्रिया’ नामसे विख्यात हुईं। जरत्कारु, जगद्गौरी, मनसा, सिद्धयोगिनी, वैष्णवी, नागभगिनी, शैवी, नागेश्वरी, जरत्कारुप्रिया, आस्तीकमाता, विषहरी और महाज्ञानयुता—इन बारह नामोंसे विश्व इनकी पूजा करता है। जो पुरुष पूजाके समय इन बारह नामोंका पाठ करता है, उसे तथा उसके वंशजको भी सर्पका भय नहीं हो सकता।* जिस शयनागारमें नागोंका भय हो, जिस भवनमें बहुतेरे नाग भरे हों, नागोंसे युक्त होनेके कारण जो महान् दारुण स्थान बन गया हो तथा जो नागोंसे वेष्टित हो, वहाँ भी पुरुष इस स्तोत्रका पाठ करके सर्पभयसे मुक्त हो जाता है—इसमें कोई संशय नहीं है। जो नित्य इसका पाठ करता है, उसे देखकर नाग भाग जाते हैं। दस लाख पाठ करनेसे यह स्तोत्र मनुष्योंके लिये सिद्ध हो जाता है। जिसे यह स्तोत्र सिद्ध हो गया, वह विष-भक्षण करने तथा नागोंको भूषण बनाकर नागपर सवारी करनेमें भी समर्थ हो सकता है। वह नागासन, नागकल्प तथा महान् सिद्ध हो जाता है।

मुनिवर! अब मैं देवी मनसाकी पूजाका विधान तथा सामवेदोक्त ध्यान बतलाता हूँ, सुनो। ‘भगवती मनसा श्वेतचम्पक-पुष्पके समान वर्णवाली हैं। इनका विग्रह रत्नमय भूषणोंसे विभूषित है। अग्निशुद्ध वस्त्र इनके शरीरकी शोभा बढ़ा रहे हैं। इन्होंने सर्पोंका यज्ञोपवीत धारण कर रखा है। महान् ज्ञानसे सम्पन्न होनेके कारण प्रसिद्ध ज्ञानियोंमें भी ये प्रमुख मानी जाती हैं। ये सिद्धपुरुषोंकी अधिष्ठात्री देवी हैं। सिद्धि प्रदान करनेवाली तथा सिद्धा हैं; मैं इन भगवती मनसाकी उपासना करता हूँ।’ इस प्रकार ध्यान करके मूलमन्त्रसे भगवतीकी पूजा करनी चाहिये। अनेक प्रकारके नैवेद्य तथा गन्ध, पुष्प और अनुलेपनसे देवीकी पूजा होती है। सभी उपचार मूलमन्त्रको पढ़कर अर्पण करने चाहिये। मुने! इनके मूलमन्त्रका नाम है—‘मूल कल्पतरु’—यह सुसिद्ध मन्त्र है। इसमें बारह


* जरत्कारुर्जगद्गौरी मनसा सिद्धयोगिनी। वैष्णवी नागभगिनी शैवी नागेश्वरी तथा॥
जरत्कारुप्रियाऽऽस्तीकमाता विषहरीति च। महाज्ञानयुता चैव सा देवी विश्वपूजिता॥
द्वादशैतानि नामानि पूजाकाले तु यः पठेत्। तस्य नागभयं नास्ति तस्य वंशोद्भवस्य च॥
(प्रकृतिखण्ड ४५। १५—१७)

३५- नारद-नारायण-संवादमें पार्वतीजीके पूछनेपर महादेवजीके द्वारा श्रीराधाके प्रादुर्भाव एवं महत्त्व आदिका वर्णन

२६०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अक्षर हैं। इसका वर्णन वेदमें है। यह भक्तोंके मनोरथको पूर्ण करनेवाला है। मन्त्र इस प्रकार है—‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं मनसादेव्यै स्वाहा।’ पाँच लाख मन्त्र जप करनेपर यह मन्त्र सिद्ध हो जाता है। जिसे इस मन्त्रकी सिद्धि प्राप्त हो गयी, वह धरातलपर सिद्ध है। उसके लिये विष भी अमृतके समान हो जाता है। उस पुरुषकी धन्वन्तरिसे तुलना की जा सकती है।

ब्रह्मन्! जो पुरुष आषाढ़की संक्रान्तिके दिन ‘गुडा’ (कपास या सेंहुड़) नामक वृक्षकी शाखापर यत्नपूर्वक इन भगवती मनसाका आवाहन करके भक्तिभावके साथ पूजा करता है तथा मनसापञ्चमीको उन देवीके लिये बलि अर्पण करता है, वह अवश्य ही धनवान्, पुत्रवान् और कीर्तिमान् होता है। महाभाग! पूजाका विधान कह चुका। अब धर्मदेवके मुखसे जैसा कुछ सुना है, वह उपाख्यान कहता हूँ, सुनो।

प्राचीन समयकी बात है। भूमण्डलके सभी मानव नागोंके भयसे आक्रान्त हो गये थे। नाग जिन्हें काट खाते, वे जीवित नहीं बचते थे। यह देख-सुनकर कश्यपजी भी भयभीत हो गये; अतः ब्रह्माजीके अनुरोधसे उन्होंने सर्पभयनिवारक मन्त्रोंकी रचना की। ब्रह्माजीके उपदेशसे वेदबीजके अनुसार मन्त्रोंकी रचना हुई। साथ ही ब्रह्माजीने अपने मनसे उत्पन्न करके इन देवीको इस मन्त्रकी अधिष्ठात्री देवी बना दिया। तपस्या तथा मनसे प्रकट होनेके कारण ये देवी ‘मनसा’ नामसे विख्यात हुईं। कुमारी अवस्थामें ही ये भगवान् शंकरके धाममें चली गयीं। कैलासमें पहुँचकर इन्होंने भक्तिपूर्वक भगवान् चन्द्रशेखरकी पूजा करके उनकी स्तुति की। मुनिकुमारी मनसाने देवताओंके वर्षसे हजार वर्षोंतक भगवान् शंकरकी उपासना की। तदनन्तर भगवान् आशुतोष इनपर प्रसन्न हो गये। मुने! भगवान् शंकरने प्रसन्न होकर इन्हें महान् ज्ञान प्रदान किया। सामवेदका अध्ययन कराया और भगवान् श्रीकृष्णके कल्पवृक्षरूप अष्टाक्षर-मन्त्रका उपदेश किया।

मन्त्रका रूप ऐसा है—लक्ष्मीबीज, मायाबीज और कामबीजका पूर्वमें प्रयोग करके कृष्ण शब्दके अन्तमें ‘ङे’ विभक्ति लगाकर ‘नमः’ पद जोड़ दिया जाता है (‘श्रीं ह्रीं क्लीं कृष्णाय नमः’)। भगवान् शंकरकी कृपासे जब मुनिकुमारी मनसाको उक्त मन्त्रके साथ त्रैलोक्यमङ्गल नामक कवच, पूजनका क्रम, सर्वमान्य स्तवन, भुवनपावन ध्यान, सर्वसम्मत वेदोक्त पुरश्चरणका नियम तथा मृत्युञ्जय-ज्ञान प्राप्त हो गया, तब वह साध्वी उनसे आज्ञा ले पुष्करक्षेत्रमें तपस्या करनेके लिये चली गयी। वहाँ जाकर उसने परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णकी तीन युगोंतक उपासना की। इसके बाद उसे तपस्यामें सिद्धि प्राप्त हुई। भगवान् श्रीकृष्णने सामने प्रकट होकर उसे दर्शन दिये। उस समय कृपानिधि श्रीकृष्णने उस कृशाङ्गी बालापर अपनी कृपाकी दृष्टि डाली। उन्होंने उसका दूसरोंसे पूजन कराया और स्वयं भी उसकी पूजा की; साथ ही वर दिया कि ‘देवि! तुम जगत्में पूजा प्राप्त करो।’ इस प्रकार कल्याणी मनसाको वर प्रदान करके भगवान् अन्तर्धान हो गये।

इस तरह इस मनसादेवीकी सर्वप्रथम भगवान् श्रीकृष्णने पूजा की। तत्पश्चात् शंकर, कश्यप, देवता, मुनि, मनु, नाग एवं मानव आदिसे त्रिलोकीमें श्रेष्ठ व्रतका पालन करनेवाली यह देवी सुपूजित हुई। फिर कश्यपजीने जरत्कारु मुनिके साथ उसका विवाह कर दिया। वे मुनि महान् योगी थे। विवाह करनेके पश्चात् तपस्या करनेमें संलग्न हो गये। वे एक दिन पुष्करक्षेत्रमें उस वटवृक्षके नीचे देवी जरत्कारुकी जाँघपर लेट गये और उन्हें नींद आ गयी। इतनेमें सायंकाल होनेको आया। सूर्यनारायण अस्ताचलको जाने लगे। देवी मनसा परम साध्वी एवं पतिव्रता थी। उसने मनमें विचार किया—‘द्विजोंके लिये

प्रकृतिखण्ड २६१ नित्य सायंकाल संध्या करनेका विधान है। यदि मेरे पति सोये ही रह जाते हैं तो इन्हें पाप लग जायगा; क्योंकि ऐसा नियम है कि जो प्रातः और सायंकालकी संध्या ठीक समयपर नहीं करता, वह अपवित्र होकर पापका भागी होता है।' यों विचार करके उस परम सुन्दरी मनसाने पतिदेवको जगा दिया। मुने! मुनिवर जरत्कारु जगनेपर क्रोधसे भर गये। मुनिने कहा- साध्वि ! मैं सुखपूर्वक सो रहा था; तुमने मेरी निद्रा क्यों भङ्ग कर दी ? जो स्त्री अपने स्वामीका अपकार करती है, उसके व्रत, तपस्या, उपवास और दान आदि सभी सत्कर्म व्यर्थ हो जाते हैं। स्वामीका अप्रिय करनेवाली स्त्री किसी भी सत्कर्मका फल नहीं प्राप्त कर सकती। जिसने अपने पतिकी पूजा की, उससे मानो स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण सुपूजित हो गये। पतिव्रताओंके व्रतके लिये स्वयं भगवान् श्रीहरि पतिके रूपमें विराजमान रहते हैं। सम्पूर्ण दान, यज्ञ, तीर्थसेवन, व्रत, तप, उपवास, धर्म, सत्य और देवपूजन - ये सब-के-सब स्वामीकी सेवाकी सोलहवीं कलाकी भी तुलना नहीं कर सकते। जो स्त्री भारतवर्ष-जैसे पुण्यक्षेत्रमें पतिकी सेवा करती है, वह अपने स्वामीके साथ वैकुण्ठमें जाकर श्रीहरिके चरणोंमें शरण पाती है। साध्वि ! जो असत्कुलमें उत्पन्न स्त्री अपने स्वामीके प्रतिकूल आचरण करती तथा उसके प्रति कटु वचन बोलती है, वह कुम्भीपाक नरकमें सूर्य और चन्द्रमाकी आयुपर्यन्त वास करती है। तदनन्तर चाण्डालके घरमें उसका जन्म होता है और पति एवं पुत्रके सुखसे वह वञ्चित रहती है। यों कहकर वे चुप हो गये। तब साध्वी मनसा भयसे काँपने लगी। उसने पतिदेवसे कहा। साध्वी मनसाने कहा- उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महाभाग ! आपकी संध्योपासनाका लोप न हो जाय, इसी भयसे मैंने आपको जगा दिया है- यह मेरा दोष अवश्य है। इस प्रकार कहकर देवी मनसा भक्तिपूर्वक अपने स्वामी जरत्कारु मुनिके चरण-कमलोंमें पड़ गयी। उस समय रोषके आवेशमें आकर मुनि सूर्यको भी शाप देनेके लिये उद्यत हो गये। नारद ! उन्हें देखकर स्वयं भगवान् सूर्य संध्यादेवीको साथ लेकर वहाँ आये और भयभीत होकर विनयपूर्वक मुनिवर जरत्कारुसे सम्यक् प्रकारसे यथार्थ बात कहने लगे। भगवान् सूर्यने कहा - भगवन् ! आप परम शक्तिशाली ब्राह्मण हैं। संध्याका समय देखकर धर्मलोप हो जानेके भयसे इस साध्वीने आपको जगा दिया। मुने ! विप्रवर! मैं आपकी शरणमें उपस्थित हूँ। मुझे शाप देना आपके लिये उचित नहीं है। ब्राह्मणोंका हृदय सदा नवनीतके समान कोमल होता है। ब्राह्मण चाहें तो पुनः सृष्टि कर सकते हैं; इनसे बढ़कर तेजस्वी दूसरा कोई है ही नहीं। ब्रह्मज्योति ब्राह्मणके द्वारा निरन्तर सनातन भगवान् श्रीकृष्णकी आराधना होती है। सूर्यके उपर्युक्त वचन सुनकर विप्रवर जरत्कारु प्रसन्न हो गये। उनसे आशीर्वाद लेकर सूर्य अपने स्थानको चले गये। प्रतिज्ञाकी रक्षाके लिये उन ब्राह्मणदेवताने देवी मनसाका त्याग कर दिया। उस समय देवीके शोककी सीमा नहीं रही। दुःखके कारण उनका हृदय क्षुब्ध हो उठा था। वे रो रही थीं। उस विपत्तिके अवसरपर भयसे व्याकुल होकर उस देवीने अपने गुरुदेव शंकर, इष्टदेवता ब्रह्मा और श्रीहरि तथा जन्मदाता कश्यपजीका स्मरण किया। देवी मनसाके चिन्तन करनेपर तुरंत गोपीश भगवान् श्रीकृष्ण, शंकर, ब्रह्मा और कश्यप मुनि वहाँ आ गये। प्रकृतिसे परे निर्गुण परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्ण मुनिवर जरत्कारुके अभीष्ट देवता थे। उनके दर्शन पाकर परम भक्तिके साथ मुनि बार-बार प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे। फिर भगवान् शंकर,

२६२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

ब्रह्मा और कश्यपको भी नमस्कार किया। यों पूछा—‘महाभाग देवताओ! आपलोगोंका यहाँ कैसे पधारना हुआ है?'

मुनिवर जरत्कारुकी बात सुनकर ब्रह्माजीने समयोचित बातें कहीं। भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलको प्रणाम करके उन्होंने मुनिको उत्तर दिया—‘मुने! तुम्हारी यह धर्मपत्नी मनसा परम साध्वी एवं धर्ममें आस्था रखनेवाली है। यदि तुम इसे त्यागना चाहते हो तो पहले इसको किसी संतानकी जननी बना दो, जिससे यह अपने धर्मका पालन कर सके। संतान हो जानेके पश्चात् स्त्रीको त्यागा जा सकता है। जो पुरुष पुत्रोत्पत्ति कराये बिना ही प्रिय पत्नीका त्याग कर देता है, उसका पुण्य चलनीसे बह जानेवाले जलकी भाँति साथ छोड़ देता है।'

नारद! ब्रह्माजीकी बात सुनकर मुनिवर जरत्कारुने मन्त्र पढ़कर योगबलका सहारा ले देवी मनसाकी नाभिका स्पर्श कर दिया और उससे कहा।

**मुनिवर जरत्कारुने कहा—**मनसे! इस गर्भसे तुम्हें पुत्र होगा। वह पुत्र जितेन्द्रिय पुरुषोंमें श्रेष्ठ, धार्मिक, ब्रह्मज्ञानी, तेजस्वी, तपस्वी, यशस्वी, गुणी, वेदवेत्ताओं, ज्ञानियों और योगियोंमें प्रमुख, विष्णुभक्त तथा अपने कुलका उद्धारक होगा। ऐसे सुयोग्य पुत्रके उत्पन्न होनेमात्रसे पितर आनन्दमें भरकर नाचने लगते हैं। जो पातिव्रतधर्मका पालन करती है, प्रिय बोलती है और सुशीला है, वह 'प्रिया' है। जो धर्ममें श्रद्धा रखती है, पुत्र उत्पन्न करती है तथा कुलकी रक्षा करती है, उसीको 'कुलीन स्त्री' कहते हैं। जो भगवान् श्रीहरिके प्रति भक्ति उत्पन्न करता एवं अभीष्ट सुख देनेमें तत्पर रहता है, वही 'बन्धु' है। यदि भगवान् श्रीहरिके मार्गका प्रदर्शक हो तो उस बन्धुको पिता भी कह सकते हैं। वही 'गर्भधारिणी स्त्री' कहलाती है, जो ज्ञानोपदेशद्वारा संतानको गर्भवाससे मुक्त कर दे। 'दयारूपा भगिनी' उसको कहते हैं, जिसकी कृपासे प्राणी यमराजके भयसे मुक्त हो जाय। भगवान् विष्णुके मन्त्रको प्रदान करनेवाला गुरु वही है, जो भगवान् श्रीहरिमें भक्ति उत्पन्न करा दे। ज्ञानदाता गुरु उसीको कहते हैं, जिसकी कृपासे भगवान् श्रीकृष्णके चिन्तनकी योग्यता प्राप्त हो जाय; क्योंकि ब्रह्मपर्यन्त चराचर सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न होता और नष्ट हो जाता है।

वेद अथवा यज्ञसे जो कुछ सारतत्त्व निकलता है, वह यही है कि भगवान् श्रीहरिका सेवन किया जाय। यही तत्त्वोंका भी तत्त्व है। भगवान् श्रीहरिकी उपासनाके अतिरिक्त सब कुछ केवल विडम्बनामात्र है। मैंने तुम्हें यथार्थ ज्ञानोपदेश कर दिया; क्योंकि स्वामी भी वही कहलाता है, जो ज्ञान प्रदान कर दे। ज्ञानके द्वारा बन्धनसे मुक्त करनेवाला 'स्वामी' माना जाता है और वही यदि बन्धनमें डालता है तो 'शत्रु' है। जो गुरु भगवान् श्रीहरिमें भक्ति उत्पन्न करनेवाला ज्ञान नहीं देता, उसे 'शिष्यघाती' कहते हैं; क्योंकि वह शिष्यको बन्धनमुक्त नहीं कर सका। जो जननीके गर्भमें रहनेके क्लेशसे तथा यमयातनासे मुक्त नहीं कर सकता, उसे गुरु, तात और बान्धव कैसे कहा जाय? भगवान्

३६- श्रीराधा और श्रीकृष्णके चरित्र तथा श्रीराधाकी पूजा-परम्पराका अत्यन्त संक्षिप्त परिचय

प्रकृतिखण्ड २६३

श्रीकृष्णका सनातन मार्ग परमानन्द-स्वरूप है। जो निरन्तर ऐसे मार्गका प्रदर्शन नहीं कराता, वह मनुष्योंके लिये कैसा बान्धव है? अतः साध्वि! तुम निर्गुण एवं अच्युत ब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णकी उपासना करो; इनकी उपासनासे पुरुषोंके सारे कर्ममूल कट जाते हैं। प्रिये! मैंने जो तुम्हारा त्याग कर दिया है, इस अपराधको क्षमा करो। साध्वी स्त्रियाँ क्षमापरायण होती हैं। सत्त्वगुणके प्रभावसे उनमें क्रोध नहीं रहता। देवि! मैं तपस्या करनेके लिये पुष्करक्षेत्रमें जा रहा हूँ। तुम भी सुखपूर्वक यहाँसे जा सकती हो; क्योंकि निःस्पृह पुरुषोंके लिये एकमात्र मनोरथ यही है कि वे भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलकी उपासनामें लग जायँ।

मुनिवर ! जरत्कारुका यह वचन सुनकर देवी मनसा शोकसे आतुर हो गयी। उसकी आँखोंमें आँसू भर आये। उसने विनयभाव प्रदर्शित करते हुए अपने प्राणप्रिय पतिदेवसे कहा।

देवी मनसा बोली- प्रभो! मैंने आपकी निद्रा भङ्ग कर दी, यह मेरा दोष नहीं कहा जा सकता, जिससे आप मेरा त्याग कर रहे हैं। अतएव मेरी प्रार्थना है कि जहाँ मैं आपका स्मरण करूँ, वहीं आप मुझे दर्शन देनेकी कृपा कीजियेगा। पतिव्रता स्त्रियोंके लिये सौ पुत्रोंसे भी अधिक प्रेमका भाजन पति है। पति स्त्रियोंके लिये सम्यक् प्रकारसे प्रिय है; अतएव विद्वान् पुरुषोंने पतिको 'प्रिय' की संज्ञा दी है। जिस प्रकार एक पुत्रवालोंका पुत्रमें, वैष्णव-पुरुषोंका भगवान् श्रीहरिमें, एक नेत्रवालोंका नेत्रमें, प्यासे जनोंका जलमें, क्षुधातुरोंका अन्नमें, विद्वानोंका शास्त्रमें तथा वैश्योंका वाणिज्यमें निरन्तर मन लगा रहता है, प्रभो! वैसे ही पतिव्रता स्त्रियोंका मन सदा अपने स्वामीका किङ्कर बना रहता है। इस प्रकार कहकर मनसादेवी अपने स्वामीके चरणोंमें पड़ गयी।

मुनिवर जरत्कारु कृपाके समुद्र थे। उन्होंने कृपाके वशीभूत होकर क्षणभरके लिये उसे अपनी गोदमें ले लिया। मुनिके नेत्रोंसे जलकी ऐसी धारा गिरी कि वह साध्वी मनसा नहा उठी तथा वियोग-भयसे कातर हुई मनसाने भी अपने आँसुओंसे मुनिके वक्षःस्थलको भिगो दिया। तत्पश्चात् वे दोनों पति-पत्नी ज्ञानद्वारा शोकसे मुक्त हुए।

तदनन्तर मुनिवर जरत्कारु परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलका बार-बार स्मरण करते हुए अपनी प्रिया मनसाको समझाकर तपस्या करनेके लिये चले गये। उधर देवी मनसा भी कैलासपर पहुँचकर अपने गुरु भगवान् शंकरके निवास-गृहमें चली गयी। वह शोकसे व्याकुल थी। भगवती पार्वतीने उसे भलीभाँति समझाया। भगवान् शंकरने भी उसे मङ्गलमय ज्ञान देकर ढाढ़स बँधाया। वह शिवधाममें रहने लगी। वहाँ उत्तम दिनकी मङ्गलमयी वेलामें साध्वी मनसाने पुत्र उत्पन्न किया, जो भगवान् नारायणका अंश और योगियों एवं ज्ञानियोंका भी गुरु था। वह गर्भमें था तभी भगवान् शंकरके मुखसे उसे महाज्ञानकी उपलब्धि हो चुकी थी। अतएव वह बालक योगीन्द्र तथा योगियों और ज्ञानियोंका गुरु होनेका अधिकारी बना। भगवान् शंकरने उसका जातकर्म और नामकरण आदि माङ्गलिक संस्कार कराया। भगवान् शिवने उस शिशुके कल्याणार्थ उसे वेद पढ़ाये। बहुत-से मणि, रत्न और किरीट ब्राह्मणोंको दान किये। देवी पार्वतीद्वारा लाखों गाएँ तथा भाँति-भाँतिके रत्न ब्राह्मणोंको वितरण किये गये। भगवान् शिव स्वयं उस बालकको चारों वेद और वेदाङ्ग निरन्तर पढ़ाते रहे। साथ

३७- राजा सुयज्ञकी यज्ञशीलता और उन्हें ब्राह्मणके शापकी प्राप्ति, ऋषियोंद्वारा ब्राह्मणको क्षमाके लिये प्रेरित करते हुए कृतघ्नोंके भेद तथा विभिन्न पापोंके फलका प्रतिपादन

२६४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण ही मृत्युञ्जयने श्रेष्ठ ज्ञानका भी उपदेश किया। मनसाकी अपने प्राणवल्लभ पतिमें, इष्टदेव श्रीहरिमें तथा गुरुदेव भगवान् शिवमें पूर्ण भक्ति थी; अतः 'यस्या भक्तिरास्ते तस्याः पुत्रः' - इस व्युत्पत्तिके अनुसार उस पुत्रका नाम 'आस्तीक' हुआ। (वहाँ आये हुए) मुनिवर जरत्कारु उसी क्षण भगवान् शंकरसे आज्ञा लेकर भगवान् विष्णुकी तपस्या करनेके लिये पुष्करक्षेत्रमें चले गये थे। उन तपोधन मुनिने परमात्मा श्रीकृष्णका महामन्त्र प्राप्त करके दीर्घकालतक तप किया। फिर वे महान् योगी मुनि भगवान् शंकरको प्रणाम करनेके विचारसे कैलासपर आये। शंकरको नमस्कार करके कुछ समयके लिये वहीं रुक गये। तबतक वह बालक भी वहीं था। उदार देवी मनसा उस बालकको लेकर अपने पिता कश्यपमुनिके आश्रममें चली आयी। उस समय पुत्रवती कन्याको देखकर प्रजापति कश्यपके मनमें अपार हर्ष हुआ। मुने ! उस अवसरपर प्रजापतिने ब्राह्मणोंको प्रचुर रत्न दान किये। शिशुके कल्याणार्थ असंख्य ब्राह्मणोंको भोजन कराया। परंतप ! कश्यपजीकी दिति-अदिति तथा अन्य भी जितनी पत्नियाँ थीं, उनके मनमें भी बड़ी प्रसन्नता हुई। उनकी वह कन्या मनसा पुत्रके साथ सुदीर्घ कालतक उस आश्रमपर ठहरी रही। इसीके आगेका उपाख्यान कहता हूँ, सुनो। अभिमन्युकुमार राजा परीक्षित्को ब्राह्मणका शाप लग गया। ब्रह्मन् ! दुर्देवकी प्रेरणासे ऐसा कर्म बन गया कि सहसा परीक्षित् शापसे ग्रस्त हो गये। शृङ्गी ऋषिने कौशिकीका जल हाथमें लेकर शाप दे दिया कि 'एक सप्ताहके बीतते ही तक्षक सर्प तुम्हें काट खायगा।' तक्षकने सातवें दिन उन्हें डँस लिया। राजा सहसा शरीर त्यागकर परलोक चले गये। जनमेजयने उन अपने पिताका दाह-संस्कार कराया। मुने ! इसके बाद उन महाराज जनमेजयने सर्पसत्र आरम्भ किया। ब्रह्मतेजके कारण समूह- के-समूह सर्प प्राणोंसे हाथ धोने लगे। तक्षक भयसे घबराकर इन्द्रकी शरणमें चला गया। तब ब्राह्मणमण्डली इन्द्रसहित तक्षकको होम देनेके लिये उद्यत हो गयी। ऐसी स्थितिमें इन्द्रके साथ देवता भगवती मनसाके पास गये। उस समय इन्द्र भयसे अधीर हो उठे थे। उन्होंने भगवती मनसाकी स्तुति की। फलस्वरूप मुनिवर आस्तीक माताकी आज्ञासे राजा जनमेजयके यज्ञमें आये। उन्होंने जनमेजयसे इन्द्र और तक्षकके प्राणोंकी याचना की। ब्राह्मणोंकी आज्ञा अथवा कृपावश राजाने वर दे दिया। यज्ञकी पूर्णाहुति कर दी गयी। सुप्रसन्न राजाद्वारा ब्राह्मण यज्ञान्त-दक्षिणा पा गये। तत्पश्चात् ब्राह्मण, देवता और मुनि सभी देवी मनसाके पास गये तथा सबने पृथक्-पृथक् उस देवीकी पूजा और स्तुति की। इन्द्रने पवित्र हो श्रेष्ठ सामग्रियोंको लेकर उनके द्वारा देवी मनसाका पूजन किया। फिर वे भक्तिपूर्वक नित्य पूजा करने लगे। षोडशोपचारसे अतिशय आदर प्रकट करते हुए उन्होंने पूजा और स्तुति की। यों देवी मनसाकी अर्चना करनेके पश्चात् ब्रह्मा, विष्णु एवं शिवके आज्ञानुसार संतुष्ट होकर सभी देवता अपने स्थानोंपर चले गये। मुने ! इस प्रकारकी ये सम्पूर्ण कथाएँ कह चुका। अब आगे और क्या सुनना चाहते हो ? नारदजीने पूछा- प्रभो ! देवराज इन्द्रने किस स्तोत्रसे देवी मनसाकी स्तुति की थी तथा किस विधिके क्रमसे पूजन किया था ? इस प्रसङ्गको मैं सुनना चाहता हूँ। भगवान् नारायण कहते हैं- नारद ! देवराज इन्द्रने स्नान किया। पवित्र हो आचमन करके दो नूतन वस्त्र धारण किये। देवी मनसाको रत्नमय सिंहासनपर पधराया और भक्तिपूर्वक स्वर्गगङ्गाका जल रत्नमय कलशमें लेकर वेदमन्त्रोंका उच्चारण करते हुए उससे देवीको स्नान कराया। विशुद्ध दो मनोहर अग्निशुद्ध वस्त्र पहननेके लिये अर्पण किये। देवीके सम्पूर्ण अङ्गोंमें चन्दन लगाया।

४०- राजा उत्कल (सुयज्ञ)-का यज्ञ-अनुष्ठान

प्रकृतिखण्ड २६५

भक्तिपूर्वक पाद्य और अर्घ्यको उनके सामने निवेदन किया। उस समय देवराज इन्द्रने गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और गौरी—इन छः देवताओंका पूजन करनेके पश्चात् साध्वी मनसाकी पूजा की थी। 'ॐ ह्रीं श्रीं मनसादेव्यै स्वाहा।' इस दशाक्षर मूलमन्त्रका उच्चारण करके यथोचित रूपसे पूजनकी सभी सामग्री देवीको अर्पण की। इस तरह सोलह प्रकारकी दुर्लभ वस्तुएँ देवराज इन्द्रके द्वारा साध्वी मनसाकी सेवामें अर्पित हुईं। भगवान् विष्णुकी प्रेरणासे इन्द्र प्रसन्नतापूर्वक भक्तिसहित पूजामें लगे रहे। उस समय उन्होंने नाना प्रकारके बाजे बजवाये। देवी मनसाके ऊपर पुष्पोंकी वर्षा होने लगी। तदनन्तर ब्रह्मा, विष्णु और शिवकी आज्ञासे पुलकित-शरीर होकर नेत्रोंमें अश्रु भरे हुए इन्द्रने देवी मनसाकी स्तुति की।

इन्द्र बोले— देवि! तुम साध्वी पतिव्रताओंमें परम श्रेष्ठ तथा परात्पर देवी हो। इस समय मैं तुम्हारी स्तुति करना चाहता हूँ; किंतु यह महत्त्वपूर्ण कार्य मेरी शक्तिके बाहर है। देवी प्रकृते! वेदोंमें स्तोत्रोंका लक्षण यह बताया गया है कि स्तुत्यके स्वभावका प्रतिपादन किया जाय; परंतु सुव्रते! मैं तुम्हारे स्वभावका वर्णन करनेमें असमर्थ हूँ। तुम शुद्ध-सत्त्वस्वरूपा हो, तुममें कोप और हिंसाका नितान्त अभाव है। यही कारण है कि जरत्कारु मुनिके द्वारा परित्यक्त होनेपर भी तुमने उन मुनिको शाप नहीं दिया। साध्वि! मैंने माता अदितिके समान मानकर तुम्हारा पूजन किया है। तुम मेरी दयारूपिणी भगिनी और माताके समान क्षमाशील हो। सुरेश्वरि! तुमने पुत्र और स्त्रीसहित मेरे प्राणोंकी रक्षा की है, मैं तुम्हें पूजनीया बनाता हूँ। तुम्हारे प्रति मेरी प्रीति निरन्तर बढ़ रही है। जगदम्बिके! यद्यपि इस जगत्में तुम्हारी नित्य पूजा होती है, फिर भी मैं तुम्हारी पूजाका प्रचार और प्रसार कर रहा हूँ। सुरेश्वरि! जो पुरुष आषाढ़ मासकी संक्रान्तिके समय, मनसासंज्ञक पञ्चमी (नागपञ्चमी)-को अथवा आषाढ़से आश्विनतक प्रतिदिन भक्तिके साथ तुम्हारी पूजा करेंगे, उनके यहाँ पुत्र-पौत्र आदिकी और धनकी वृद्धि होगी—यह निश्चित है। साथ ही वे यशस्वी, कीर्तिमान्, विद्वान् और गुणी होंगे। जो व्यक्ति अज्ञानके कारण तुम्हारी पूजासे विमुख होकर निन्दा करेंगे, उनके यहाँ लक्ष्मी नहीं ठहरेंगी और उन्हें सर्पोंसे सदा भय बना रहेगा। तुम स्वयं स्वर्गमें स्वर्गलक्ष्मी हो। वैकुण्ठमें कमलाकी कला हो। ये मुनिवर जरत्कारु भगवान् नारायणके साक्षात् अंश हैं। पिताजीने हम सबकी रक्षाके लिये ही तपस्या और तेजके प्रभावसे मनके द्वारा तुम्हारी सृष्टि की है। अतएव तुम मनसादेवी कहलाती हो। देवि! तुम सिद्धयोगिनी हो, अतः स्वतः मनसे देवन (सर्वत्र गमन) करनेकी शक्ति रखती हो; इसलिये जगत्में मनसादेवीके नामसे पूजित और वन्दिता होती हो। देवता भक्तिपूर्वक निरन्तर मनसे तुम्हारी पूजा करते हैं, इसीसे विद्वान् पुरुष तुम्हें मनसादेवी कहते हैं। देवि! तुम सदा सत्त्वका सेवन करनेसे सत्त्वस्वरूपा हो। जो पुरुष जिस वस्तुका निरन्तर चिन्तन करते हैं, वे वैसी वस्तुको सौगुनी संख्यामें पा जाते हैं। मुने! इस प्रकार इन्द्र देवी मनसाकी स्तुति करके वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित उस बहिनको साथ ले अपने निवास-स्थानको चले गये।*


* पुरन्दर उवाच
देवि त्वां स्तोतुमिच्छामि साध्वीनां प्रवरां वराम्। परात्परां च परमां न हि स्तोतुं क्षमोऽधुना॥
स्तोत्राणां लक्षणं वेदे स्वाभावाख्यानतत्परम्। न क्षमः प्रकृते वक्तुं गुणानां तव सुव्रते॥
शुद्धसत्त्वस्वरूपा त्वं कोपहिंसाविवर्जिता। न च शप्तो मुनिस्तेन त्यक्तया च त्वया यतः॥
त्वं मया पूजिता साध्वि जननी मे यथादितिः॥
दयारूपा च भगिनी क्षमारूपा यथा प्रसूः। त्वया मे रक्षिताः प्राणाः पुत्रदाराः सुरेश्वरि॥

४१- ब्राह्मणद्वारा राजा उत्कल(सुयज्ञ)-को शाप

२६६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

देवी मनसाने अपने पुत्रके साथ पिता कश्यपजीके आश्रममें दीर्घकालतक वास किया। भ्रातृवर्ग सदा उनका पूजन, अभिवादन और सम्मान करता था। ब्रह्मन्! तदनन्तर एक बार गोलोकसे सुरभी गौ आयी और उसने अपने दूधसे आदरणीया मनसाको स्नान कराकर सादर उनका पूजन किया। साथ ही, उसने सर्वदुर्लभ गोप्य ज्ञानका भी उपदेश दिया। उस समय सुरभी देवताओंसे पूजित हो स्वर्गलोकमें चली गयी।

यह स्तोत्र पुण्यबीज कहलाता है। जो पुरुष मनसादेवीकी पूजा करके इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसे तथा उसके वंशके लिये भी नागसे भय नहीं हो सकता। यदि यह स्तोत्र सिद्ध हो जाय तो पुरुषके लिये विष भी अमृत-तुल्य हो जाता है। इस स्तोत्रका पाँच लाख जप करनेपर यह सिद्ध हो जाता है। फिर मन्त्रसिद्ध पुरुष सर्पशायी तथा सर्पवाहन हो सकता है अर्थात् उसपर सर्पका कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता। (अध्याय ४४—४६)


आदिगौ सुरभीदेवीका उपाख्यान

नारदजीने पूछा— ब्रह्मन्! वह सुरभीदेवी कौन थी, जो गोलोकसे आयी थी? मैं उसके जन्म और चरित्र सुनना चाहता हूँ।

भगवान् नारायण बोले— नारद! देवी सुरभी गोलोकमें प्रकट हुई। वह गौओंकी अधिष्ठात्री देवी, गौओंकी आदि, गौओंकी जननी तथा सम्पूर्ण गौओंमें प्रमुख है। मुने! मैं सबसे पहली सृष्टिका प्रसङ्ग सुना रहा हूँ, जिसके अनुसार पूर्वकालमें वृन्दावनमें उस सुरभीका ही जन्म हुआ था।

एक समयकी बात है। गोपाङ्गनाओंसे घिरे हुए राधापति भगवान् श्रीकृष्ण कौतूहलवश श्रीराधाके साथ पुण्य-वृन्दावनमें गये। वहाँ वे विहार करने लगे। उस समय कौतुकवश उन


अहं करोमि त्वां पूज्यां प्रीतिश्च वर्धते मम। नित्यं यद्यपि त्वं पूज्या भवेऽत्र जगदम्बिके॥
तथापि तव पूजां च वर्धयामि च सर्वतः। ये त्वामाषाढसंक्रान्त्यां पूजयिष्यन्ति भक्तितः॥
पञ्चम्यां मनसाख्यायामिषान्तं वा दिने दिने। पुत्रपौत्रादयस्तेषां वर्धन्ते च धनानि वै॥
यशस्विनः कीर्तिमन्तो विद्यावन्तो गुणान्विताः। ये त्वां न पूजयिष्यन्ति निन्दन्त्यज्ञानतो जनाः।
लक्ष्मीहीना भविष्यन्ति तेषां नागभयं सदा। त्वं स्वर्गलक्ष्मीः स्वर्गे च वैकुण्ठे कमलाकला॥
नारायणांशो भगवान् जरत्कारुर्मुनीश्वरः। तपसा तेजसा त्वां च मनसा ससृजे पिता॥
अस्माकं रक्षणायैव तेन त्वं मनसाभिधा। मनसा देवितुं शक्ता स्वात्मना सिद्धयोगिनी॥
तेन त्वं मनसादेवी पूजिता वन्दिता भवे। ये भक्त्या मनसां देवाः पूजयन्त्यनिशं भृशम्॥
तेन त्वां मनसादेवीं प्रवदन्ति मनीषिणः। सत्यस्वरूपा देवी त्वं शश्वत्सत्त्वनिषेवया॥
यो हि यद् भावयेन्नित्यं शतं प्राप्नोति तत्समम्। इन्द्रश्च मनसां स्तुत्वा गृहीत्वा भगिनीं च ताम्॥
प्रजगाम स्वभवनं भूषावासपरिच्छदाम्। (प्रकृतिखण्ड ४६। १२८—१४१ १/२)

प्रकृतिखण्ड २६७

स्वेच्छा‌मय प्रभुके मनमें सहसा दूध पीनेकी इच्छा जाग उठी। तब भगवान्‌ने अपने वामपार्श्वसे लीलापूर्वक सुरभी गौको प्रकट किया। उसके साथ बछड़ा भी था। वह दुग्धवती थी। उस सवत्सा गौको सामने देख सुदामाने एक रत्नमय पात्रमें उसका दूध दुहा। वह दूध सुधासे भी अधिक मधुर तथा जन्म और मृत्युको दूर करनेवाला था। स्वयं गोपीपति भगवान् श्रीकृष्णने उस गरम-गरम स्वादिष्ट दूधको पीया। फिर हाथसे छूटकर वह पात्र गिर पड़ा और दूध धरतीपर फैल गया। उस दूधसे वहाँ एक सरोवर बन गया। उसकी लंबाई और चौड़ाई सब ओरसे सौ-सौ योजन थी। गोलोकमें वह सरोवर ‘क्षीरसरोवर’ नामसे प्रसिद्ध हुआ है। गोपिकाओं और श्रीराधाके लिये वह क्रीड़ा-सरोवर बन गया। भगवान्‌की इच्छासे उस क्रीड़ावापीके घाट तत्काल अमूल्य दिव्य रत्नोंद्वारा निर्मित हो गये। उसी समय अकस्मात् असंख्य कामधेनु प्रकट हो गयीं। जितनी वे गौएँ थीं, उतने ही बछड़े भी उस सुरभी गौके रोमकूपसे निकल आये। फिर उन गौओंके बहुत-से पुत्र-पौत्र भी हुए, जिनकी संख्या नहीं की जा सकती। यों उस सुरभी देवीसे गौओंकी सृष्टि कही गयी, जिससे सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है।

मुने! पूर्वकालमें भगवान् श्रीकृष्णने देवी सुरभीकी पूजा की थी। तत्पश्चात् त्रिलोकीमें उस देवीकी दुर्लभ पूजाका प्रचार हो गया। दीपावलीके दूसरे दिन भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे देवी सुरभीकी पूजा सम्पन्न हुई थी। यह प्रसङ्ग मैं अपने पिता धर्मके मुखसे सुन चुका हूँ। महाभाग! देवी सुरभीका ध्यान, स्तोत्र, मूलमन्त्र तथा पूजाकी विधिका वेदोक्त क्रम मैं तुमसे कहता हूँ, सुनो। ‘ॐ सुरभ्यै नमः’ सुरभीदेवीका यह षडक्षर-मन्त्र है। एक लाख जप करनेपर मन्त्र सिद्ध होकर भक्तोंके लिये कल्पवृक्षका काम करता है। ध्यान और पूजन यजुर्वेदमें सम्यक् प्रकारसे वर्णित हैं। जो ऋद्धि, वृद्धि, मुक्ति और सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली हैं; जो लक्ष्मीस्वरूपा, श्रीराधाकी सहचरी, गौओंकी अधिष्ठात्री, गौओंकी आदिजननी, पवित्ररूपा, पूजनीया, भक्तोंके अखिल मनोरथ सिद्ध करनेवाली हैं तथा जिनसे यह सारा विश्व पावन बना है, उन भगवती सुरभीकी मैं उपासना करता हूँ। कलश, गायके मस्तक, गौओंके बाँधनेके खंभे, शालग्रामकी मूर्ति, जल अथवा अग्निमें देवी सुरभीकी भावना करके द्विज इनकी पूजा करें। जो दीपमालिकाके दूसरे दिन पूर्वाह्नकालमें भक्तिपूर्वक भगवती सुरभीकी पूजा करेगा, वह जगत्में पूज्य हो जायगा।

एक बार वाराहकल्पमें देवी सुरभीने दूध देना बंद कर दिया। उस समय त्रिलोकीमें दूधका अभाव हो गया था। तब देवता अत्यन्त चिन्तित होकर ब्रह्मलोकमें गये और ब्रह्माजीकी स्तुति करने लगे। तदनन्तर ब्रह्माजीकी आज्ञा पाकर इन्द्रने देवी सुरभीकी स्तुति आरम्भ की।

इन्द्रने कहा—देवी एवं महादेवी सुरभीको बार-बार नमस्कार है। जगदम्बिके! तुम गौओंकी बीजस्वरूपा हो; तुम्हें नमस्कार है। तुम श्रीराधाको प्रिय हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम लक्ष्मीकी अंशभूता हो, तुम्हें बार-बार नमस्कार है। श्रीकृष्ण-प्रियाको नमस्कार है। गौओंकी माताको बार-बार नमस्कार है। जो सबके लिये कल्पवृक्षस्वरूपा तथा श्री, धन और वृद्धि प्रदान करनेवाली हैं, उन भगवती सुरभीको बार-बार नमस्कार है। शुभदा, प्रसन्ना और गोप्रदायिनी सुरभी देवीको बार-बार नमस्कार है। यश और कीर्ति प्रदान करनेवाली धर्मज्ञा देवीको बार-बार नमस्कार है।*


* पुरन्दर उवाच —
नमो देव्यै महादेव्यै सुरभ्यै च नमो नमः। गवां बीजस्वरूपायै नमस्ते जगदम्बिके॥

२६८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

इस प्रकार स्तुति सुनते ही सनातनी जगज्जननी भगवती सुरभी संतुष्ट और प्रसन्न हो उस ब्रह्मलोकमें ही प्रकट हो गयीं। देवराज इन्द्रको परम दुर्लभ मनोवाञ्छित वर देकर वे पुनः गोलोकको चली गयीं। देवता भी अपने-अपने स्थानोंको चले गये। नारद! फिर तो सारा विश्व सहसा दूधसे परिपूर्ण हो गया। दूधसे घृत बना और घृतसे यज्ञ सम्पन्न होने लगे तथा उनसे देवता संतुष्ट हुए।

जो मानव इस महान् पवित्र स्तोत्रका भक्तिपूर्वक पाठ करेगा, वह गोधनसे सम्पन्न, प्रचुर सम्पत्तिवाला, परम यशस्वी और पुत्रवान् हो जायगा। उसे सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करने तथा अखिल यज्ञोंमें दीक्षित होनेका फल सुलभ होगा। ऐसा पुरुष इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें भगवान् श्रीकृष्णके धाममें चला जाता है। चिरकालतक वहाँ रहकर भगवान्‌की सेवा करता रहता है। नारद! उसे पुनः इस संसारमें नहीं आना पड़ता। (अध्याय ४७)


नारद-नारायण-संवादमें पार्वतीजीके पूछनेपर महादेवजीके द्वारा श्रीराधाके प्रादुर्भाव एवं महत्त्व आदिका वर्णन

नारदजी बोले— भगवान् नारायणके ध्यानमें तत्पर रहनेवाले महाभाग मुनिवर नारायण! आप नारायणके ही अंश हैं। अतः भगवन्! आप नारायणसे सम्बन्ध रखनेवाली कथा कहिये। सुरभीका उपाख्यान अत्यन्त मनोहर है, उसे मैंने सुन लिया। वह समस्त पुराणोंमें गोपनीय कहा गया है। पुराणवेत्ताओंने उसकी बड़ी प्रशंसा की है। अब मैं श्रीराधाका परम उत्तम आख्यान सुनना चाहता हूँ। उनके प्रादुर्भावके प्रसङ्ग तथा उनके ध्यान, स्तोत्र और उत्तम कवचको भी सुननेकी मेरी प्रबल इच्छा है; अतः आप इन सबका वर्णन कीजिये।

मुनिवर श्रीनारायणने कहा— नारद! पूर्वकालकी बात है, कैलास-शिखरपर सनातन भगवान् शंकर, जो सर्वस्वरूप, सबसे श्रेष्ठ, सिद्धोंके स्वामी तथा सिद्धिदाता हैं, बैठे हुए थे। मुनिलोग भी उनकी स्तुति करके उनके पास ही बैठे थे। भगवान् शिवका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिला हुआ था। उनके अधरोंपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी। वे कुमारको परमात्मा श्रीकृष्णके रासोत्सवका सरस आख्यान सुना रहे थे। उस प्रसङ्गके श्रवणमें कुमारकी बड़ी रुचि थी। रासमण्डलका वर्णन चल रहा था। जब इस


नमो राधाप्रियायै च पद्मांशायै नमो नमः। नमः कृष्णप्रियायै च गवां मात्रे नमो नमः॥
कल्पवृक्षस्वरूपायै सर्वेषां सततं परम्। श्रीदायै धनदायै च वृद्धिदायै नमो नमः॥
शुभदायै प्रसन्नायै गोप्रदायै नमो नमः। यशोदायै कीर्तिदायै धर्मज्ञायै नमो नमः॥
(प्रकृतिखण्ड ४७। २४-२७)

३८- शेष कृतघ्नोंके कर्मफलोंका विभिन्न मुनियोंद्वारा प्रतिपादन

प्रकृतिखण्ड २६९

आख्यानकी समाप्ति हुई और अपनी बात प्रस्तुत करनेका अवसर आया, उस समय सती-साध्वी पार्वती मन्द मुस्कानके साथ अपने प्राणवल्लभके समक्ष प्रश्न उपस्थित करनेको उद्यत हुईं। पहले तो वे डरती हुई-सी स्वामीकी स्तुति करने लगीं। फिर जब प्राणेश्वरने मधुर वचनोंद्वारा उन्हें प्रसन्न किया, तब वे देवेश्वरी महादेवी उमा महादेवजीके सामने वह अपूर्व राधिकोपाख्यान सुनानेके लिये अनुरोध करने लगीं, जो पुराणोंमें भी परम दुर्लभ है।

श्रीपार्वती बोलीं—नाथ! मैंने आपके मुखारविन्दसे पाञ्चरात्र आदि सारे उत्तमोत्तम आगम, नीतिशास्त्र, योगियोंके योगशास्त्र, सिद्धोंके सिद्धि-शास्त्र, नाना प्रकारके मनोहर तन्त्रशास्त्र, परमात्मा श्रीकृष्णके भक्तोंके भक्तिशास्त्र तथा समस्त देवियोंके चरित्रका श्रवण किया। अब मैं श्रीराधाका उत्तम आख्यान सुनना चाहती हूँ। श्रुतिमें कण्वशाखाके भीतर श्रीराधाकी प्रशंसा संक्षेपसे की गयी है, उसे मैंने आपके मुखसे सुना है; अब व्यासद्वारा वर्णित श्रीराधाकी महत्ता सुनाइये। पहले आगमाख्यानके प्रसङ्गमें आपने मेरी इस प्रार्थनाको स्वीकार किया था। ईश्वरकी वाणी कभी मिथ्या नहीं हो सकती। अतः आप श्रीराधाके प्रादुर्भाव, ध्यान, उत्तम नाम-माहात्म्य, उत्तम पूजा-विधान, चरित्र, स्तोत्र, उत्तम कवच, आराधन-विधि तथा अभीष्ट पूजा-पद्धतिका इस समय वर्णन कीजिये। भक्तवत्सल! मैं आपकी भक्त हूँ, अतः मुझे ये सब बातें अवश्य बताइये। साथ ही, इस बातपर भी प्रकाश डालिये कि आपने आगमाख्यानसे पहले ही इस प्रसङ्गका वर्णन क्यों नहीं किया था?

पार्वतीका उपर्युक्त वचन सुनकर भगवान् पञ्चमुख शिवने अपना मस्तक नीचा कर लिया। अपना सत्य भङ्ग होनेके भयसे वे मौन हो गये—चिन्तामें पड़ गये। उस समय उन्होंने अपने इष्टदेव करुणानिधान भगवान् श्रीकृष्णका ध्यानद्वारा स्मरण किया और उनकी आज्ञा पाकर वे अपनी अर्द्धाङ्गस्वरूपा पार्वतीसे इस प्रकार बोले—‘देवि! आगमाख्यानका आरम्भ करते समय मुझे परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णने राधाख्यानके प्रसङ्गसे रोक दिया था, परंतु महेश्वरि! तुम तो मेरा आधा अङ्ग हो; अतः स्वरूपतः मुझसे भिन्न नहीं हो। इसलिये भगवान् श्रीकृष्णने इस समय मुझे यह प्रसङ्ग तुम्हें सुनानेकी आज्ञा दे दी है। सतीशिरोमणे! मेरे इष्टदेवकी वल्लभा श्रीराधाका चरित्र अत्यन्त गोपनीय, सुखद तथा श्रीकृष्णभक्ति प्रदान करनेवाला है। दुर्गे! वह सब पूर्वापर श्रेष्ठ प्रसङ्ग मैं जानता हूँ। मैं जिस रहस्यको जानता हूँ, उसे ब्रह्मा तथा नागराज शेष भी नहीं जानते। सनत्कुमार, सनातन, देवता, धर्म, देवेन्द्र, मुनीन्द्र, सिद्धेन्द्र तथा सिद्धपुङ्गवोंको भी उसका ज्ञान नहीं है। सुरेश्वरि! तुम मुझसे भी बलवती हो; क्योंकि इस प्रसङ्गको न सुनानेपर अपने प्राणोंका परित्याग कर देनेको उद्यत हो गयी थीं। अतः मैं इस गोपनीय विषयको भी तुमसे कहता हूँ। दुर्गे! यह परम अद्भुत रहस्य है। मैं इसका कुछ वर्णन करता हूँ, सुनो। श्रीराधाका चरित्र अत्यन्त पुण्यदायक तथा दुर्लभ है।

एक समय रासेश्वरी श्रीराधाजी श्यामसुन्दर श्रीकृष्णसे मिलनेको उत्सुक हुईं। उस समय वे रत्नमय सिंहासनपर अमूल्य रत्नाभरणोंसे विभूषित होकर बैठी थीं। अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र उनके श्रीअङ्गोंकी शोभा बढ़ा रहा था। उनकी मनोहर अङ्गकान्ति करोड़ों पूर्ण चन्द्रमाओंको लज्जित कर रही थी। उनकी प्रभा तपाये हुए सुवर्णके सदृश जान पड़ती थी। वे अपनी ही दीप्तिसे दमक रही थीं। शुद्धस्वरूपा श्रीराधाके अधरपर मन्द मुस्कान खेल रही थी। उनकी दन्तपंक्ति बड़ी ही सुन्दर थी। उनका मुखारविन्द शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाको तिरस्कृत कर रहा था। वे मालती-सुमनोंकी मालासे मण्डित रमणीय केशपाश धारण करती थीं। उनके गलेकी रत्नमयी माला

२७० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


ग्रीष्म-ऋतुके सूर्यके समान दीप्तिमती थी। कण्ठमें प्रकाशित शुभ मुक्ताहार गङ्गाकी धवल धारके समान शोभा पा रहा था। रसिकशेखर श्यामसुन्दर श्रीकृष्णने मन्द-मन्द मुस्कराती हुई अपनी उन प्रियतमाको देखा। प्राणवल्लभापर दृष्टि पड़ते ही विश्वकान्त श्रीकृष्ण मिलनके लिये उत्सुक हो गये। परम मनोहर कान्तिवाले प्राणवल्लभको देखते ही श्रीराधा उनके सामने दौड़ी गयीं। महेश्वरि! उन्होंने अपने प्राणारामकी ओर धावन किया, इसीलिये पुराणवेत्ता महापुरुषोंने उनका 'राधा' यह सार्थक नाम निश्चित किया। राधा श्रीकृष्णकी आराधना करती हैं और श्रीकृष्ण श्रीराधाकी। वे दोनों परस्पर आराध्य और आराधक हैं। संतोंका कथन है कि उनमें सभी दृष्टियोंसे पूर्णतः समता है।$^१$ महेश्वरि! मेरे ईश्वर श्रीकृष्ण रासमें प्रियाजीके धावनकर्मका स्मरण करते हैं, इसीलिये वे उन्हें 'राधा' कहते हैं, ऐसा मेरा अनुमान है। दुर्गे! भक्त पुरुष 'रा' शब्दके उच्चारणमात्रसे परम दुर्लभ मुक्तिको पा लेता है और 'धा' शब्दके उच्चारणसे वह निश्चय ही श्रीहरिके चरणोंमें दौड़कर पहुँच जाता है। 'रा' का अर्थ है 'पाना' और 'धा' का अर्थ है 'निर्वाण' (मोक्ष)। भक्तजन उनसे निर्वाण-मुक्ति पाता है, इसलिये उन्हें 'राधा' कहा गया है। श्रीराधाके रोमकूपोंसे गोपियोंका समुदाय प्रकट हुआ है तथा श्रीकृष्णके रोमकूपोंसे सम्पूर्ण गोपोंका प्रादुर्भाव हुआ है। श्रीराधाके वामांश-भागसे महालक्ष्मीका प्राकट्य हुआ है। वे ही शस्यकी अधिष्ठात्री देवी तथा गृहलक्ष्मीके रूपमें भी आविर्भूत हुई हैं। देवी महालक्ष्मी चतुर्भुज विष्णुकी पत्नी हैं और वैकुण्ठधाममें वास करती हैं। राजाको सम्पत्ति देनेवाली राजलक्ष्मी भी उन्हींकी अंशभूता हैं। राजलक्ष्मीकी अंशभूता मर्त्यलक्ष्मी हैं, जो गृहस्थोंके घर-घरमें वास करती हैं। वे ही शस्याधिष्ठातृदेवी तथा वे ही गृहदेवी हैं। स्वयं श्रीराधा श्रीकृष्णकी प्रियतमा हैं तथा श्रीकृष्णके ही वक्षःस्थलमें वास करती हैं। वे उन परमात्मा श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी हैं।$^२$

पार्वति! ब्रह्मासे लेकर तृण अथवा कीटपर्यन्त सम्पूर्ण जगत् मिथ्या ही है। केवल त्रिगुणातीत परब्रह्म परमात्मा श्रीराधावल्लभ श्रीकृष्ण ही परम सत्य हैं; अतः तुम उन्हींकी आराधना करो।$^३$ वे सबसे प्रधान, परमात्मा, परमेश्वर, सबके आदिकारण, सर्वपूज्य, निरीह तथा प्रकृतिसे परे विराजमान हैं। उनका नित्यरूप स्वेच्छामय है। वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही शरीर धारण करते हैं। श्रीकृष्णसे भिन्न जो दूसरे-दूसरे देवता हैं; उनका रूप प्राकृत तत्त्वोंसे ही गठित है। श्रीराधा श्रीकृष्णको प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं। वे परम सौभाग्यशालिनी हैं। वे मूलप्रकृति परमेश्वरी श्रीराधा महाविष्णुकी जननी हैं। संत पुरुष मानिनी राधाका सदा सेवन करते हैं। उनका चरणारविन्द ब्रह्मादि देवताओंके लिये परम दुर्लभ होनेपर भी भक्तजनोंके लिये सदा सुलभ है। सुदामाके शापसे देवी श्रीराधाको गोलोकसे इस भूतलपर आना पड़ा था। उस समय वे वृषभानु गोपके घरमें अवतीर्ण हुई थीं। वहाँ उनकी माता कलावती थीं। (अध्याय ४८)


१. राधा भजति श्रीकृष्णं स च तां च परस्परम्। उभयोः सर्वसाम्यं च सदा सन्तो वदन्ति च॥
(प्रकृतिखण्ड ४८।३८)
२. प्राणाधिष्ठातृदेवी च तस्यैव परमात्मनः॥ (प्रकृतिखण्ड ४८।४७)
३. आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं सर्वं मिथ्यैव पार्वति । भज सत्यं परं ब्रह्म राधेशं त्रिगुणात्परम्॥
(प्रकृतिखण्ड ४८।४८)

३९- सुतपाके द्वारा सुयज्ञको शिवप्रदत्त परम दुर्लभ महाज्ञानका उपदेश

.. प्रकृतिखण्ड२७१

श्रीराधा और श्रीकृष्णके चरित्र तथा श्रीराधाकी पूजा-परम्पराका अत्यन्त संक्षिप्त परिचय

**श्रीमहादेवजी कहते हैं—**पार्वति! एक समयकी बात है, श्रीकृष्ण विरजा नामवाली सखीके यहाँ उसके पास थे। इससे श्रीराधाजीको क्षोभ हुआ। इस कारण विरजा वहाँ नदीरूप होकर प्रवाहित हो गयी। विरजाकी सखियाँ भी छोटी-छोटी नदियाँ बनीं। पृथ्वीकी बहुत-सी नदियाँ और सातों समुद्र विरजासे ही उत्पन्न हैं। राधाने प्रणयकोपसे श्रीकृष्णके पास जाकर उनसे कुछ कठोर शब्द कहे। सुदामाने इसका विरोध किया। इसपर लीलामयी श्रीराधाने उसे असुर होनेका शाप दे दिया। सुदामाने भी लीलाक्रमसे ही श्रीराधाको मानवीरूपमें प्रकट होनेकी बात कह दी। सुदामा माता राधा तथा पिता श्रीहरिको प्रणाम करके जब जानेको उद्यत हुआ तब श्रीराधा पुत्रविरहसे कातर हो आँसू बहाने लगीं। श्रीकृष्णने उन्हें समझा-बुझाकर शान्त किया और शीघ्र उसके लौट आनेका विश्वास दिलाया। सुदामा ही तुलसीका स्वामी शङ्खचूड़ नामक असुर हुआ था, जो मेरे शूलसे विदीर्ण एवं शापमुक्त हो पुनः गोलोक चला गया। सती राधा इसी वाराहकल्पमें गोकुलमें अवतीर्ण हुई थीं। वे व्रजमें वृषभानु वैश्यकी कन्या हुईं। वे देवी अयोनिजा थीं, माताके पेटसे नहीं पैदा हुई थीं। उनकी माता कलावतीने अपने गर्भमें ‘वायु’ को धारण कर रखा था। उसने योगमायाकी प्रेरणासे वायुको ही जन्म दिया; परंतु वहाँ स्वेच्छासे श्रीराधा प्रकट हो गयीं। बारह वर्ष बीतनेपर उन्हें नूतन यौवनमें प्रवेश करती देख माता-पिताने ‘रायाण’ वैश्यके साथ उसका सम्बन्ध निश्चित कर दिया। उस समय श्रीराधा घरमें अपनी छायाको स्थापित करके स्वयं अन्तर्धान हो गयीं। उस छायाके साथ ही उक्त रायाणका विवाह हुआ।

‘जगत्पति श्रीकृष्ण कंसके भयसे रक्षाके बहाने शैशवावस्थामें ही गोकुल पहुँचा दिये गये थे। वहाँ श्रीकृष्णकी माता जो यशोदा थीं, उनका सहोदर भाई ‘रायाण’ था। गोलोकमें तो वह श्रीकृष्णका अंशभूत गोप था, पर इस अवतारके समय भूतलपर वह श्रीकृष्णका मामा लगता था। जगत्स्रष्टा विधाताने पुण्यमय वृन्दावनमें श्रीकृष्णके साथ साक्षात् श्रीराधाका विधिपूर्वक विवाहकर्म सम्पन्न कराया था। गोपगण स्वप्नमें भी श्रीराधाके चरणारविन्दका दर्शन नहीं कर पाते थे। साक्षात् राधा श्रीकृष्णके वक्षःस्थलमें वास करती थीं और छायाराधा रायाणके घरमें। ब्रह्माजीने पूर्वकालमें श्रीराधाके चरणारविन्दका दर्शन पानेके लिये पुष्करमें साठ हजार वर्षोंतक तपस्या की थी; उसी तपस्याके फलस्वरूप इस समय उन्हें श्रीराधा-चरणोंका दर्शन प्राप्त हुआ था। गोकुलनाथ श्रीकृष्ण कुछ कालतक वृन्दावनमें श्रीराधाके साथ आमोद-प्रमोद करते रहे। तदनन्तर सुदामाके शापसे उनका श्रीराधाके साथ वियोग हो गया। इसी बीचमें श्रीकृष्णने पृथ्वीका भार उतारा। सौ वर्ष पूर्ण हो जानेपर तीर्थयात्राके प्रसङ्गसे श्रीराधाने श्रीकृष्णका और श्रीकृष्णने श्रीराधाका दर्शन प्राप्त किया। तदनन्तर तत्त्वज्ञ श्रीकृष्ण श्रीराधाके साथ गोलोकधाम पधारे। कलावती (कीर्तिदा) और यशोदा भी श्रीराधाके साथ ही गोलोक चली गयीं।

प्रजापति द्रोण नन्द हुए। उनकी पत्नी धरा यशोदा हुईं। उन दोनोंने पहले की हुई तपस्याके प्रभावसे परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णको पुत्ररूपमें प्राप्त किया था। महर्षि कश्यप वसुदेव हुए थे। उनकी पत्नी सती साध्वी अदिति अंशतः देवकीके रूपमें अवतीर्ण हुई थीं। प्रत्येक कल्पमें जब भगवान् अवतार लेते हैं, देवमाता अदिति तथा देवपिता कश्यप उनके माता-पिताका स्थान ग्रहण करते हैं। श्रीराधाकी माता कलावती (कीर्तिदा)

२७२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

पितरोंकी मानसी कन्या थी। गोलोकसे वसुदाम गोप ही वृषभानु होकर इस भूतलपर आये थे।

दुर्गे! इस प्रकार मैंने श्रीराधाका उत्तम उपाख्यान सुनाया। यह सम्पत्ति प्रदान करनेवाला, पापहारी तथा पुत्र और पौत्रोंकी वृद्धि करनेवाला है। श्रीकृष्ण दो रूपोंमें प्रकट हैं—द्विभुज और चतुर्भुज। चतुर्भुजरूपसे वे वैकुण्ठधाममें निवास करते हैं और स्वयं द्विभुज श्रीकृष्ण गोलोकधाममें। चतुर्भुजकी पत्नी महालक्ष्मी, सरस्वती, गङ्गा और तुलसी हैं। ये चारों देवियाँ चतुर्भुज नारायणदेवकी प्रिया हैं। श्रीकृष्णकी पत्नी श्रीराधा हैं, जो उनके अर्धाङ्गसे प्रकट हुई हैं। वे तेज, अवस्था, रूप तथा गुण सभी दृष्टियोंसे उनके अनुरूप हैं। विद्वान् पुरुषको पहले ‘राधा’ नामका उच्चारण करके पश्चात् ‘कृष्ण’ नामका उच्चारण करना चाहिये। इस क्रमसे उलट-फेर करनेपर वह पापका भागी होता है, इसमें संशय नहीं है।

कार्तिककी पूर्णिमाको गोलोकके रासमण्डलमें श्रीकृष्णने श्रीराधाका पूजन किया और तत्सम्बन्धी महोत्सव रचाया। उत्तम रत्नोंकी गुटिकामें राधा-कवच रखकर गोपोंसहित श्रीहरिने उसे अपने कण्ठ और दाहिनी बाँहमें धारण किया। भक्तिभावसे उनका ध्यान करके स्तवन किया। फिर मधुसूदनने राधाके चबाये हुए ताम्बूलको लेकर स्वयं खाया। राधा श्रीकृष्णकी पूजनीया हैं और भगवान् श्रीकृष्ण राधाके पूजनीय हैं। वे दोनों एक-दूसरेके इष्ट देवता हैं। उनमें भेदभाव करनेवाला पुरुष नरकमें पड़ता है।* श्रीकृष्णके बाद धर्मने, ब्रह्माजीने, मैंने, अनन्तने, वासुकिने तथा सूर्य और चन्द्रमाने श्रीराधाका पूजन किया। तत्पश्चात् देवराज इन्द्र, रुद्रगण, मनु, मनुपुत्र, देवेन्द्रगण, मुनीन्द्रगण तथा सम्पूर्ण विश्वके लोगोंने श्रीराधाकी पूजा की। ये सब द्वितीय आवरणके पूजक हैं। तृतीय आवरणमें सातों द्वीपोंके सम्राट् सुयज्ञने तथा उनके पुत्र-पौत्रों एवं मित्रोंने भारतवर्षमें प्रसन्नतापूर्वक श्रीराधिकाका पूजन किया। उन महाराजको दैववश किसी ब्राह्मणने शाप दे दिया था, जिससे उनका हाथ रोगग्रस्त हो गया था। इस कारण वे मन-ही-मन बहुत दुःखी रहते थे। उनकी राज्यलक्ष्मी छिन गयी थी; परंतु श्रीराधाके वरसे उन्होंने अपना राज्य प्राप्त कर लिया। ब्रह्माजीके दिये हुए स्तोत्रसे परमेश्वरी श्रीराधाकी स्तुति करके राजाने उनके अभेद्य कवचको कण्ठ और बाँहमें धारण किया तथा पुष्करतीर्थमें सौ वर्षोंतक ध्यानपूर्वक उनकी पूजा की। अन्तमें वे महाराज रत्नमय विमानपर सवार होकर गोलोकधाममें चले गये। पार्वति! यह सारा प्रसङ्ग मैंने तुम्हें कह सुनाया। अब और क्या सुनना चाहती हो? (अध्याय ४९)

राजा सुयज्ञकी यज्ञशीलता और उन्हें ब्राह्मणके शापकी प्राप्ति, ऋषियोंद्वारा ब्राह्मणको क्षमाके लिये प्रेरित करते हुए कृतघ्नोंके भेद तथा विभिन्न पापोंके फलका प्रतिपादन

**पार्वतीने पूछा—**प्रभो! राजा सुयज्ञ कौन थे? किस वंशमें उनका जन्म हुआ था? उन्हें ब्राह्मणका शाप कैसे प्राप्त हुआ था और किस तरह श्रीराधाजीको वे पा सके? जो सर्वात्मा श्रीकृष्णकी पत्नी हैं तथा साक्षात् श्रीकृष्णने जिनका पूजन किया है, उन्हीं परमेश्वरी श्रीराधाकी सेवाका सौभाग्य एक मल-मूत्रधारी मनुष्यको कैसे मिल सका? जिनके चरणारविन्दोंकी रजको पानेके लिये ब्रह्माजीने पूर्वकालमें पुष्करतीर्थके भीतर साठ हजार वर्षोंतक तप किया तथा जिनका


* राधा पूज्या च कृष्णस्य तत्पूज्यो भगवान् प्रभुः। परस्पराभीष्टदेवो भेदकृन्नरकं व्रजेत्॥
(प्रकृतिखण्ड ४९। ६४)

प्रकृतिखण्ड २७३ दर्शन पाना आपके लिये भी अत्यन्त कठिन है, उन्हीं पुरातनी महालक्ष्मी श्रीराधादेवीका दर्शन राजा सुयज्ञने कैसे किया ? वे मनुष्योंके दृष्टिपथमें कैसे आयीं ? तीनों लोकोंके स्रष्टा ब्रह्माने राजा सुयज्ञको श्रीराधाका कवच किस प्रकार दिया ? उनके ध्यान, पूजन-विधि तथा स्तोत्रका उपदेश कैसे दिया ? यह सब बतानेकी कृपा कीजिये। श्रीमहादेवजी बोले- देवि ! चौदह मनुओँमें जो सबसे प्रथम हैं, उन्हें स्वायम्भुव मनु कहते हैं। वे ब्रह्माजीके पुत्र और तपस्वी कहे गये हैं। उन्होंने शतरूपासे विवाह किया था। मनु और शतरूपाके पुत्र उत्तानपाद हुए। उत्तानपादके पुत्र केवल ध्रुव हैं। गिरिराजनन्दिनि ! ध्रुवकी कीर्ति तीनों लोकोंमें विख्यात है। ध्रुवके पुत्र उत्कल हुए, जो भगवान् नारायणके अनन्य भक्त थे। उन्होंने पुष्करतीर्थमें एक हजार राजसूय-यज्ञोंका अनुष्ठान किया था, उस यज्ञमें सारे पात्र रत्नोंके बने हुए थे। राजाने बड़ी प्रसन्नताके साथ वे सब पात्र ब्राह्मणोंको दान कर दिये थे। यज्ञान्तमहोत्सवमें राजाने बहुमूल्य वस्त्रोंकी सहस्रों राशियाँ जो तेजःपुञ्जसे उद्भासित होती थीं, ब्राह्मणोंको बाँट दीं। प्रिये ! उस सुन्दर यज्ञको देखकर ब्रह्माजीने देवसभामें राजा उत्कलका नाम सुयज्ञ रख दिया। राजा सुयज्ञ अन्न, रत्न तथा सब प्रकारकी सम्पत्तियोंके दाता थे। वे प्रतिदिन प्रसन्नतापूर्वक उचित दक्षिणाके साथ ब्राह्मणोंको दस-बारह लाख गौएँ दानमें देते थे। उन गौओंके सींग रत्नोंसे मढ़े होते थे तथा दुग्धपात्र आदि सामग्री भी रत्नमयी ही होती थी। वे प्रतिदिन छः करोड़ ब्राह्मणोंको भोजन कराया करते थे। उन्हें प्रतिदिन चूसने, चबाने, चाटने और पीनेयोग्य भोजनसामग्री देकर तृप्त करते थे। नित्यप्रति एक लाख रसोइयोंको भोजन दिया करते थे। पूआ, रोटी-चावल आदि अन्न, दाल आदि व्यञ्जन दहीके साथ परोसे जाते थे। उस भोजनसामग्रीमें मांसका सर्वथा अभाव होता था। ब्राह्मणलोग भोजनके समय मनुवंशी राजा सुयज्ञकी ही नहीं, उनके पितरोंकी भी स्तुति करते थे। सुन्दरि ! यज्ञके दिनोंमें तथा उसकी समाप्तिके दिन कुल मिलाकर छत्तीस लाख करोड़ ब्राह्मणोंने अत्यन्त तृप्तिपूर्वक सु-अन्न भोजन किया था। उन्होंने दक्षिणामें इतने रत्न ग्रहण किये थे कि उन सबको अपने घरतक ढो ले जाना उनके लिये असम्भव हो गया था। कुछ तो उन्होंने शूद्रोंको बाँट दिया और कुछ रास्तेमें छोड़ दिया। ब्राह्मण-भोजनके अन्तमें राजाने ब्राह्मणेतरोंको भी भोजन दिया तथापि वहाँ अन्नकी सहस्रों राशियाँ शेष रह गयीं। इस प्रकार यज्ञ करके महाबाहु राजा सुयज्ञ अपनी राजसभामें रमणीय रत्न-सिंहासनपर बैठे हुए थे। वह सिंहासन रत्नेन्द्रसारसे निर्मित अनेक छत्रोंसे सुशोभित था। उसे अच्छी तरह सजाया गया था। उसपर चन्दन आदि सुगन्धित वस्तुओंका लेप हुआ था। चन्दनपल्लवोंसे उसकी रमणीयता और बढ़ गयी थी। वहाँ वसु, वासव, चन्द्रमा, इन्द्र, आदित्यगण, मुनिवर नारद तथा बड़े-बड़े देवता विराजमान थे। इसी समय वहाँ एक ब्राह्मण आया,

४४- नित्य वैकुण्ठधाममें वनमालाधारी चतुर्भुज नारायणदेवका लक्ष्मी, सरस्वती, गङ्गा तथा तुलसी और सुनन्द, नन्द तथा कुमुद आदि पार्षदोंके साथ निवास

२७४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

जो रूखा और मलिन वस्त्र पहने था। उसके कण्ठ, ओठ और तालु सूखे हुए थे। उसने मुसकराते हुए हाथ जोड़कर रत्नसिंहासनपर बैठे हुए पुष्पमाला और चन्दनसे चर्चित राजाको आशीर्वाद दिया। राजाने भी ब्राह्मणको प्रणाम तो किया, किंतु वे अपने स्थानसे उठे नहीं। उस सभाके सभासद् भी ब्राह्मणकी ओर देखकर खड़े नहीं हुए। वे सभी थोड़ा-थोड़ा हँसते रहे। तब वह श्रेष्ठ ब्राह्मण मुनियों और देवताओंको नमस्कार करके निरङ्कुश-भावसे वहाँ खड़ा हो गया और क्रोधपूर्वक राजाको शाप देता हुआ बोला—'ओ पामर! तू इस राज्यसे दूर चला जा, श्रीहीन हो जा तथा शीघ्र ही गलित कोढ़से युक्त, बुद्धिहीन और उपद्रवोंसे ग्रस्त हो जा।' ऐसा कहकर क्रोधसे काँपता हुआ ब्राह्मण सभासदोंको शाप देनेके लिये उद्यत हो गया। जो लोग वहाँ हँसे थे, वे सब उठकर खड़े हो गये। उन सबने अपने दोषका परिहार कर लिया। अतः उनकी ओरसे ब्राह्मणका क्रोध जाता रहा।

राजा उस ब्राह्मणको प्रणाम करके भयसे कातर हो रोने लगे। वे व्यथित-हृदयसे सभाके बीचसे बाहर निकले। तब गूढ़रूपवाले वे ब्राह्मणदेवता भी ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होते हुए चल दिये। उनके पीछे-पीछे भयसे कातर हुए समस्त मुनि भी चले और बारंबार उच्चस्वरसे पुकारने लगे—'हे विप्र! ठहरो, ठहरो।' उन मुनियोंके नाम इस प्रकार हैं—पुलह, पुलस्त्य, प्रचेता, भृगु, अङ्गिरा, मरीचि, कश्यप, वसिष्ठ, क्रतु, शुक्र, बृहस्पति, दुर्वासा, लोमश, गौतम, कणाद, कण्व, कात्यायन, कठ, पाणिनि, जाजलि, ऋष्यशृङ्ग, विभाण्डक, आपिशालि, तैत्तिलि, महातपस्वी मार्कण्डेय, वोढु, पैल, सनक, सनन्दन, सनातन, भगवान् सनत्कुमार, नर-नारायण ऋषि, पराशर, जरत्कारु, संवर्त, करथ, और्व, च्यवन, भरद्वाज, वाल्मीकि, अगस्त्य, अत्रि, उतथ्य, संवर्त, आस्तीक, आसुरि, शिलालि, लाङ्गलि, शाकल्य, शाकटायन, गर्ग, वात्स्य, पञ्चशिख, जमदग्नि, देवल, जैगीषव्य, वामदेव, बालखिल्य आदि, शक्ति, दक्ष, कर्दम, प्रस्कन्न, कपिल, विश्वामित्र, कौत्स, ऋचीक और अघमर्षण—ये तथा और भी मुनि, पितर, अग्नि, हरिप्रिय, दिक्पाल तथा समस्त देवता भी ब्राह्मणके पीछे-पीछे चले। पार्वति! उन नीतिविशारद मुनियोंने

प्रकृतिखण्ड

२७५


ब्राह्मणको समझाया, एक स्थानपर ठहराया और क्रमशः उनसे नीतिकी बातें कहीं।

पार्वतीने पूछा—प्रभो! ब्राह्मणों और ब्रह्माजीके पुत्रोंने, जो नीतिके विद्वान् थे, उस समय उन ब्राह्मणदेवतासे नीतिकी कौन-सी बात कही, यह मुझे बतानेकी कृपा करें।

श्रीमहादेवजी बोले—सुमुखि! उस मुनि-समुदायने स्तुति और विनयसे ब्राह्मणको संतुष्ट करके क्रमशः इस प्रकार कहना आरम्भ किया।

सनत्कुमारने कहा—ब्रह्मन्! तुम्हारे पीछे-पीछे राजाकी लक्ष्मी और कीर्ति भी चली आयी है। सत्त्व, यश, सुशीलता, महान् ऐश्वर्य, पितर, अग्नि और देवता भी राजाको श्रीहीन करके उनके घरसे बाहर चले आये हैं। द्विजश्रेष्ठ! अब तुम संतुष्ट हो जाओ; क्योंकि ब्राह्मण शीघ्र ही संतुष्ट होनेवाला कहा गया है। मुने! ब्राह्मणोंका हृदय नवनीतके समान कोमल होता है। वह तपस्यासे परिमार्जित होनेके कारण अत्यन्त निर्मल और शुद्ध होता है। अतः विप्रवर! अब क्षमा करो। आओ और राजभवनको पवित्र करो। जिसके घरसे अतिथि निराश होकर लौट जाता है, उसके देवता, पितर तथा अग्नि भी निराश होकर लौट जाते हैं; क्योंकि वहाँ अतिथिका सत्कार नहीं हुआ। इसलिये विप्रवर! क्षमा करो, आओ और राजभवनको शुद्ध करो।

पुलस्त्यजी बोले—जो घरपर आये हुए अतिथिको टेढ़ी आँखोंसे देखते हैं, उन्हें अतिथि अपना पाप देकर और उनके पुण्य लेकर चला जाता है। अतः तुम राजाके दोषको क्षमा कर दो। वत्स! तुम्हारी जहाँ मौज हो, जाओ। राजा अपने कर्मदोषसे ही उठकर खड़े नहीं हुए थे। उनके उस दोषको तुम क्षमा कर दो।

पुलहने कहा—जो क्षत्रिय, राजलक्ष्मीके मदसे अथवा जो ब्राह्मण विद्याके मदसे किसी ब्राह्मणका अपमान करता है, वह क्षत्रिय श्रीहीन होता है तथा वह ब्राह्मण त्रिकाल संध्यासे शून्य हो जाता है। वे दोनों ही एकादशीव्रत तथा भगवान् विष्णुके नैवेद्यसे वञ्चित हो जाते हैं।

क्रतु बोले—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र कोई भी क्यों न हो, जो ब्राह्मणका अपमान करता है, वह दीक्षाके पुण्य और अधिकारसे भ्रष्ट हो जाता है। इतना ही नहीं, उसका धन नष्ट हो जाता है तथा वह पुत्र और पत्नीसे भी हीन हो जाता है। यह एक अटल सत्य है, अतः भगवन्! क्षमा करो। आओ और राजाके घरको पवित्र करो।

अङ्गिराने कहा—जो ज्ञानवान् ब्राह्मण होकर किसी ब्राह्मणका अपमान करता है, वह भारतवर्षमें सात जन्मोंतक सवारी ढोनेवाला बैल होता है।

मरीचि बोले—जो पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें देवता, ब्राह्मण तथा गुरुका अपमान करता है, वह भगवान् विष्णुकी भक्तिसे वञ्चित हो जाता है।

कश्यपने कहा—जो वैष्णव ब्राह्मणको देखकर उसका अपमान करता है, वह विष्णुमन्त्रकी दीक्षासे वञ्चित हो विष्णुपूजासे भी विरत हो जाता है।

प्रचेता बोले—जो अतिथि ब्राह्मणको आया देख उसके लिये अभ्युत्थान नहीं करता—उठकर खड़ा नहीं हो जाता, वह भारतभूमिमें माता-पिताकी भक्तिसे रहित होता है। उस मूढ़को सात जन्मोंतक हाथीकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। अतः द्विजश्रेष्ठ! शीघ्र चलो। राजाको आशीर्वाद दो।

दुर्वासाने कहा—जो गुरु, ब्राह्मण अथवा देवताकी प्रतिमाको देखकर शीघ्र ही उसके सामने मस्तक नहीं झुकाता, वह पृथ्वीपर सूअर होता है। अतः ब्रह्मन्! हमारे सब अपराधोंको क्षमा करो और चलकर अतिथि-सत्कार ग्रहण करो।

राजाने पूछा—आप सब लोग श्रेष्ठ मुनि हैं। आपने किसी-न-किसी बहानेसे धर्मका उपदेश किया है। अतः सब कुछ स्पष्ट बताकर

२७६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण मुझ मूर्खको समझाइये। विद्वद्वरो! आपलोग पहले मुझे यह बतावें कि स्त्रीहत्या, गोहत्या, कृतघ्नता, गुरुपत्नीगमन तथा ब्रह्महत्या करनेवालोंको कौन-सा दोष लगता है तथा उसका परिहार कैसे होता है ? वसिष्ठजी बोले- राजन् ! यदि स्वेच्छापूर्वक गो-वधका पाप किया गया हो तो उसके प्रायश्चित्तके लिये मनुष्य एक वर्षतक तीर्थोंमें भ्रमण करता रहे। वह प्रतिदिन जौकी रोटी अथवा जौकी लप्सी खाये और हाथसे ही जल पीये। वर्ष पूरा होनेपर ब्राह्मणोंको दक्षिणासहित सौ अच्छी और दुधारू गौओंका दान करे। प्रायश्चित्तसे पाप क्षीण हो जानेपर भी मनुष्य अपने सम्पूर्ण पापसे मुक्त नहीं होता। जो पाप शेष रह जाता है, उसीके फलसे वह दुःखी एवं चाण्डाल होता है। यदि आतिदेशिक हत्या हुई हो अर्थात् साक्षात् गोवध आदि न होकर उसके समान बताया गया कोई पापकर्म बन गया हो तो उसमें साक्षात् की हुई हत्यासे आधा फल भोगना पड़ता है। अनुकल्परूप प्रायश्चित्तसे उस हत्याका पाप यद्यपि क्षीण हो जाता है तथापि उससे पूर्णतया छुटकारा नहीं मिलता। शुकने कहा - स्त्रीकी हत्या करनेपर निश्चय ही गोहत्यासे दूना पाप लगता है। स्त्रीहत्यारा हजारों वर्षोंतक कालसूत्र नामक नरकमें निवास करता है। तदनन्तर वह महापापी मानव सात जन्मोंतक सूअर और सात जन्मोंतक सर्प होता है। इसके बाद उसकी शुद्धि होती है। बृहस्पति बोले - स्त्रीहत्यासे दूना पाप लगता है ब्रह्महत्यामें। ब्रह्महत्यारा एक लाख वर्षोंतक निश्चय ही महाभयंकर कुम्भीपाक नरकमें निवास करता है। तदनन्तर उस महापापीको सौ वर्षोंतक विष्ठाका कीड़ा होना पड़ता है, इसके बाद सात जन्मोंतक सर्प होकर वह उस पापसे शुद्ध होता है। गौतमने कहा- राजेन्द्र ! कृतघ्नको ब्रह्महत्यासे चौगुना पाप लगता है। वेदमें अवश्य ही कृतघ्नोंकी शुद्धिके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं कहा गया है। राजाने पूछा- वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे ! आप मुझे कृतघ्नोंका लक्षण बताइये। कृतघ्नोंके कितने भेद हैं और उनमेंसे किन्हें किस दोषकी प्राप्ति होती है ? ऋष्यशृङ्गने उत्तर दिया - सामवेदमें सोलह प्रकारके कृतघ्नोंका निरूपण किया गया है। वे सब-के-सब प्रत्येक दोषसे प्रत्येक फलके भागी होते हैं। सत्कर्म, सत्य, पुण्य, स्वधर्म, तप, प्रतिज्ञा, दान, स्वगोष्ठी-परिपालन, गुरुकृत्य, देवकृत्य, कामकृत्य, द्विजपूजन, नित्य-कृत्य, विश्वास, परधर्म और परप्रदान - इनमें स्थित हुए मनुष्योंका जो वध करता है, वह पापिष्ठ कृतघ्न कहा गया है। इनके लिये जो लोक हैं, वे उस जन्मसे भिन्न योनियोंमें उपलब्ध होते हैं। राजेन्द्र ! वे पापी कृतघ्न जिन-जिन नरकोंमें जाते हैं, वे-वे नरक निश्चय ही यमलोकमें विद्यमान हैं। सुयज्ञने पूछा - प्रभो ! किस प्रकारके कृतघ्न कौन-सा कर्म करके किन-किन भयंकर नरकोंमें जाते हैं ? इसे एक-एक करके मैं सुनना चाहता हूँ। आप बतानेकी कृपा करें। कात्यायनने कहा- जो शपथ खाकर भी अपने सत्यको मिटा देता है, उसका पालन नहीं करता, वह कृतघ्न अवश्य ही चार युगोंतक कालसूत्र नरकमें निवास करता है। फिर सात- सात जन्मोंतक कौआ और उल्लू होकर पुनः सात जन्मोंतक महारोगी शूद्र होता है। इसके बाद उसकी शुद्धि होती है। तत्पश्चात् सर्वश्री सनन्दन, सनातन, पराशर, जरत्कारु, भरद्वाज और विभाण्डकने विभिन्न कृतघ्नोंके भेद तथा उनको प्राप्त होनेवाली दुर्गतिका वर्णन किया। तदनन्तर श्रीमार्कण्डेयजी बोले। मार्कण्डेयने कहा- नरेश्वर ! शूद्रजातीय स्त्रीके

प्रकृतिखण्ड २७७

साथ समागम करनेपर ब्राह्मणको जो दोष प्राप्त होता है, उसका वर्णन वेदोंमें किया गया है। उसे बताता हूँ, सावधान होकर सुनो। जो ब्राह्मण शूद्रजातीय स्त्रीके साथ सम्बन्ध स्थापित करता है, वह कृतघ्नोंमें प्रधान है। उसे चौदह इन्द्रोंके स्थितिकालतक कृमिदंष्ट्र नामक नरकमें निवास करना पड़ता है। वहाँ वह ब्राह्मण कीड़ोंके काटनेसे व्याकुल रहता है। यमराजके दूत उससे प्रतिदिन तपायी हुई लोहेकी प्रतिमाका आलिङ्गन करवाते हैं। तदनन्तर निश्चय ही वह व्यभिचारिणी स्त्रीकी योनिका कीड़ा होता है। इस अवस्थामें एक हजार वर्षोंतक रहनेके बाद वह शूद्र होता है। तत्पश्चात् उसकी शुद्धि होती है।

सुयश बोले—मुने! अन्य कृतघ्नोंके भी कर्मोंका फल बताइये। यह ब्राह्मणका शाप मेरे लिये श्लाघ्य है; क्योंकि इसके कारण मुझे सत्संगका लाभ हुआ। भला, विपत्तिमें पड़े बिना किसको सम्पत्ति प्राप्त होती है। मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ। मेरा जीवन सफल हो गया; क्योंकि आज मेरे घरपर मुक्त मुनिगण और देवता पधारे हैं।

(अध्याय ५०-५१)


शेष कृतघ्नोंके कर्मफलोंका विभिन्न मुनियोंद्वारा प्रतिपादन

पार्वतीने पूछा—प्रभो! अन्य कृतघ्नोंको जिस-जिस फलकी प्राप्ति होती है, उसके विषयमें उन वेद-वेदाङ्गके पारंगत विद्वानोंने क्या कहा?

श्रीमहेश्वर बोले—प्रिये! राजेन्द्र सुयज्ञके प्रश्न करनेपर उन सब मुनियोंमें महान् ऋषि नारायणने प्रवचन देना आरम्भ किया।

नारायणने कहा—भूपाल! जो अपनी या दूसरोंकी दी हुई ब्राह्मणवृत्तिका अपहरण करता है, उसे कृतघ्न समझना चाहिये। उसे जो फल मिलता है, उसको सुनो। जिनकी जीविका छिन जाती है, उन ब्राह्मणोंके आँसुओंसे धरतीके जितने धूलिकण भीगते हैं, उतने सहस्र वर्षोंतक वह 'शूलप्रोत' नामक नरकमें रहता है। दहकते हुए अंगार उसे खानेको मिलते हैं और औटाया हुआ मूत्र पीनेको। तपे हुए अंगारोंकी शय्यापर उसे सोना पड़ता है। उठनेकी चेष्टा करनेपर यमराजके दूत उन्हें पीटते हैं। उस नरकयातनाके अन्तमें वह महापापी जीव भारतवर्षमें विष्ठाका कीड़ा होता है। उस योनिमें उसे देवताके वर्षसे साठ हजार वर्षोंतक रहना पड़ता है। तत्पश्चात् वह मानव भूमिहीन, संतानहीन, दरिद्र, कृपण, रोगी और निन्दनीय शूद्र होता है। उसके बाद उसकी शुद्धि होती है।

नारद बोले—जो नराधम अपनी अथवा परायी कीर्तिका हनन करता है, वह कृतघ्न कहा गया है। उसको मिलनेवाले फलका वर्णन सुनो। नरेश्वर! वह अत्यन्त दीर्घकालतक अन्धकूप नामक नरकमें निवास करता है। उसमें सरौते-जैसे कीड़े उसे सदा काटते और खाते रहते हैं। वह पापी वहाँ तपाया हुआ खारा पानी पीता और खाता है। तदनन्तर सात जन्मोंतक सर्प और पाँच जन्मोंतक कौआ होनेके बाद वह शूद्र होता है।

देवलने कहा—जो भारतवर्षमें ब्राह्मण, गुरु अथवा देवताके धनका अपहरण करता है, उसे महान् पापी एवं कृतघ्न समझना चाहिये। वह बहुत लंबे समयतक 'अवटोद' नामक नरकमें निवास करता है। तदनन्तर शराबी और शूद्र होता है। इसके बाद उसकी शुद्धि होती है।

जैगीषव्य बोले—जो पिता, माता तथा गुरुके प्रति भक्तिसे हीन होकर उनका पालन नहीं करता, उलटे वाणीद्वारा उनकी ताड़ना करता है, उसे 'कृतघ्न' कहा गया है। जो कुलटा नारी

२७८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण प्रतिदिन वाणीद्वारा अपने स्वामीको ताने मारती या फटकारती है, वह 'कृतघ्नी' कही गयी है। भारतवर्षमें वह बहुत बड़ी पापिनी है। कृतघ्न पुरुष हो या स्त्री, दोनों 'वह्रिकुण्ड' नामक महाघोर नरकमें पड़ते हैं। वहाँ बहुत लंबे समयतक वे अग्निमें ही वास करते हैं। तत्पश्चात् सात जन्मोंतक जलौका (जोंक) होकर वह शुद्ध होता है। वाल्मीकिने कहा—राजन् ! जैसे सभी तरुओंमें सर्वत्र वृक्षत्व है, कहीं भी वृक्षत्वका त्याग नहीं है, उसी तरह सम्पूर्ण पापोंमें कृतघ्नता है। जो काम, क्रोध तथा भयके कारण झूठी गवाही देता है तथा सभामें पक्षपातपूर्वक बात करता है, वह कृतघ्न माना गया है। राजन्! जो पुण्यमात्रका हनन करता है, वह भी कृतघ्न ही है। सर्वत्र सबके पुण्यकी हानिमें कृतघ्नता निहित है। नरेश्वर ! जो भारतवर्षमें झूठी गवाही देता या पक्षपातपूर्ण बात करता है, वह निश्चय ही बहुत लंबे समयतक सर्पकुण्डमें निवास करता है। सदा उसके शरीरमें साँप लिपटे रहते हैं; वह डरा रहता है और साँप उसे खाये जाते हैं। यमदूतोंकी मार पड़नेपर वह साँपोंका मल-मूत्र खानेको विवश होता है। तदनन्तर भारतमें सात-सात जन्मोंतक वह अपनी सात पीढ़ीके पूर्वजोंसहित गिरगिट और मेढक होता है। इसके बाद विशाल वनमें सेमलका वृक्ष होता है। तत्पश्चात् गूँगा मनुष्य एवं शूद्र होकर वह शुद्धि-लाभ करता है। आस्तीक बोले- गुरुपत्नीगमन करनेपर मानव मातृगामी समझा जाता है। मातृगमन करनेपर मनुष्योंके लिये प्रायश्चित्त नहीं मिलता। नृपश्रेष्ठ ! भारतवर्षमें मातृगामी पुरुषोंको जो दोष प्राप्त होता है, वह शूद्रोंको ब्राह्मणीके साथ समागम करनेपर लगता है। यदि ब्राह्मणी शूद्रके साथ मैथुन करे तो उसे भी उतना ही दोष प्राप्त होता है। कन्या, पुत्रवधू, सास, गर्भवती भौजाई और भगिनीके साथ समागम करनेपर भी वैसा ही दोष लगता है। राजेन्द्र ! अब ब्रह्माजीके बताये अनुसार दोषका निरूपण करूँगा। जो महापापी मानव इन सबके साथ मैथुन करता है वह जीते-जी ही मृतक- तुल्य होता है, चाण्डाल एवं अस्पृश्य समझा जाता है। उसे सूर्यमण्डलके दर्शनका भी अधिकार नहीं होता। वह शालग्रामका, उनके चरणामृतका, तुलसीदल मिश्रित जलका, सम्पूर्ण तीर्थजलका तथा ब्राह्मणोंके चरणोदकका स्पर्श भी नहीं कर सकता। वह पातकी मनुष्य विष्ठाके तुल्य घृणित होता है। उसे देवता, गुरु और ब्राह्मणको नमस्कार करनेका भी अधिकार नहीं रह जाता है। उसका जल मूत्रसे भी अधिक अपवित्र होता है। भारतमें पृथ्वी उसके भारसे दब जाती है। वह उसके बोझको ढोनेमें असमर्थ हो जाती है। बेटी बेचनेवाले पापीकी भाँति गुरुपत्नीगामीके पापसे भी सारा देश पतित हो जाता है। उसके स्पर्शसे, उसके साथ वार्तालाप करनेसे, सोनेसे, एक स्थानमें रहने और साथ-साथ भोजन करनेसे मनुष्योंको पाप लगता है। वह कुम्भीपाकमें निवास करता है। वहाँ उसे दिन-रात अविरामगतिसे चक्रकी भाँति घूमना पड़ता है। वह आगकी लपटोंसे जलता और यमदूतोंद्वारा पीटा जाता है। इस प्रकार वह महापापी प्रतिदिन नरक-यातना भोगता है। घोर प्राकृतिक महाप्रलय बीतनेपर जब पुनः सृष्टिका आरम्भ होता है तो वह फिर वैसा ही हो जाता है। नरक-यातनाके पश्चात् हजारों वर्षोंतक उसे विष्ठाका कीड़ा होना पड़ता है। तदनन्तर वह पत्नीहीन नपुंसक चाण्डाल होता है। तत्पश्चात् उसे सात जन्मोंतक गलित कोढ़से युक्त शूद्र एवं नपुंसक होना पड़ता है। इसके बाद वह कोढ़ी, अन्धा एवं नपुंसक ब्राह्मण होता है। इस प्रकार सात जन्म धारण करनेके पश्चात् उस महापापीकी शुद्धि होती है। मुनि बोले- इस प्रकार हमने शास्त्रके अनुसार सब बातें बतायीं। राजन्! तुम इन विप्रवरको प्रणाम करो और निश्चय ही इन्हें अपने