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ब्रह्मचर्यामृत अर्थात् जीवन सन्देश

Brahmacharyamrit Arthat Jeevan Sandesh

स्वामी ओमानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: गुरुकुल झज्जर संस्करण · गुरुकुल झज्जर (हरियाणा) (उद्गम)

DevanagariHindipublished26 पृष्ठ

जीवन-सन्देश

पूर्व इसे करें। पीछे करने से बहुत हानि होती है। इसे एक मिनट से आरम्भ करके शैनः-शैनः दस- पन्द्रह मिनट तक करने का अभ्यास बढ़ावें। जिन्हें स्वप्नदोष होता हो उन्हें सांयकाल भी शीर्षासन और प्राणायाम का दीर्घकाल तक अभ्यास करना चाहिए। इससे वीर्य ऊर्ध्वगति हो जाती है। वीर्यसम्बन्धी सब रोग नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार मयूरासन, हलासन, चक्रासन तथा मयूराचालादि प्रातः काल करने चाहिए। सांय काल शीर्षासन, मोगरी, मुग्दर, बैठक और मल्लयुद्ध (कुशती थोड़ी -सी) का व्यायाम अच्छा रहता है। यदि घी, दूध बादाम आदि पुष्टिकारक पदार्थ अधिक मिलें तो अधिक; और कम मिलें तो कम व्यायाम करें। व्यायाम शक्ति और भोजन के अनुसार ही करें। जैसे जल, वायु और अन्न, जीवन का आधार है, ऐसे ही व्यायाम स्वास्थ्य का मूल कारण है। संसार का कोई भी मनुष्य बिना व्यायाम के पूर्ण स्वस्थ नहीं रह सकता। व्यायाम करने में खूब आनन्द लें। व्यायाम करने से शरीर के सब अंग दृढ़ होते हैं। शरीर सुन्दर और सुडौल बनता है। वीर्य शरीर में पचकर रक्त में मिल जाता है और शक्ति का रूप धारण करता है।

व्यायाम से रंग-रोगन निखरता है। मुख पर तेज और लाली आती है। मनुष्य सदा जवान रहता है। घर के कार्य को कभी व्यायाम न समझें। कार्य-कार्य ही है और व्यायाम-व्यायाम ही। व्यायाम के लिए प्रातः काल का समय सबसे अच्छा है। यदि ब्रह्मचारी दोनों समय नियमित व्यायाम करे तो सोने पर सुहागा है। व्यायाम इतना करें कि पसीना आजाये। पैरों के व्यायाम की अपेक्षा हाथों का व्यायाम अधिक करें, जिससे भुजायें, छाती और मस्तिष्क अधिक बलशाली हों। उष्णकाल में स्नान से पूर्व और शीतकाल में स्नान-सन्ध्या के पीछे व्यायाम कर सकते हैं। शरीर ठण्डा होने पर अर्थात् आधा घण्टा पीछे स्नान करें। खाना खाकर कभी व्यायाम न करें। ग्रीष्मकाल में व्यायाम के पीछे प्यास लगती है, जल कभी न पियें, बहुत हानि करता है, गोदुग्ध का पान सर्वश्रेष्ठ है। यदि दूध न मिले तो बादाम आदि रगड़कर पीयें। व्यायाम के पीछे भूख लगा करती है, थोड़ा पुष्टिकारक भोजन अवश्य करलें, भूखा रहना अच्छा नहीं।

पूरे विवरण के लिए मेरे द्वारा लिखित "व्यायाम का महत्त्व और

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प्रकार का सन्देह नहीं।

मनुष्य अपने जीवन को सुन्दर, सुखी और शान्त बनाने के लिये अनेक प्रकार के यत्न करता है, परन्तु जब तक वह ब्रह्मचर्य का पालन नहीं करता, तब तक उसे सच्ची शान्ति और सुख प्राप्त नहीं हो सकता। ब्रह्मचर्य ही जीवन का मूल आधार है। जो मनुष्य वीर्य की रक्षा करता है, उसका शरीर पुष्ट, मन प्रसन्न और बुद्धि तीव्र होती है। इसके विपरीत जो मनुष्य वीर्य का नाश करता है, वह दुर्बल, रोगी, अल्पायु और निस्तेज हो जाता है।

अतः प्रत्येक युवक और युवती का यह परम कर्तव्य है कि वह ब्रह्मचर्य के महत्व को समझे और अपने जीवन में उसका दृढ़तापूर्वक पालन करे। विषय-वासनाओं के जाल में फँसकर अपने अमूल्य जीवन को नष्ट न करे। सदा उत्तम विचारों का चिन्तन करे, सत्पुरुषों की संगति करे और ईश्वर की उपासना में मन लगावे। इसी से उसका लोक और परलोक दोनों सुधर सकते हैं।

ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करने से मनुष्य दीर्घायु, बलवान् और यशस्वी बनता है। हमारे प्राचीन ऋषियों-महर्षियों ने ब्रह्मचर्य के बल पर ही महान् कार्य किये और संसार का मार्गदर्शन किया।

जीवन-सन्देश

हो। स्वाद के लिए जिह्वा के दास न बनें। लाल, काली सफेद, हरी किसी भी प्रकार की मिर्च न खायें। ये सभी ब्रह्मचर्य के लिए विष हैं, सोडावाटर, बर्फ, चाय, कहवा, कॉफी ये सभी वीर्यनाशक हैं, इन्हें कभी न छुयें। माँस, मछली, अण्डे मनुष्य का भोजन नहीं, इन्हे खाकर सात जन्म में भी ब्रह्मचारी नहीं रह सकता। यदि खाते हैं तो अभी छोड़ दें।

नशों से बचें

हुक्का, बीड़ी, सिगरेट, शराब, गॉंजा, अफीम, चण्डू, भंग आदि खाने-पीने की वस्तु नहीं। इनके खाने-पीनेवाला जीवन से प्रेम छोड़ दे, कफन मंगवाकर घर में रखे। कहो वीर्यरक्षा और कहां ये नशे ओर व्यसन, इनका क्या मेल ? सिगरेट शराब आदि पीने वाला इन्हें बिना छोड़े ही वीर्यरक्षा करना चाहता है। यदि अपना कल्याण चाहते हैं तो आज ही कान पकड़ लें और व्रत लें कि “कभी सिगरेट, शराब आदि विष का पान नहीं करेंगे, चाहे मर भी जायें इन्हे छुयेंगे नहीं।” इनके पीने खानेवाला सर्वथा नष्ट होकर मिट्टी में मिल जाता है। विशेष विवरण के लिये ‘भोजन’ पुस्तक पढ़ें।

६. शयन

सदा अकेले सोयें। कभी किसी अवस्था में भी किसी के साथ यहाँ तक कि सगे भाई के साथ भी न सोयें। सोने से पूर्व लघुशंका (पेशाब) अवश्य करें। हाथ, पैर, मुख शीतल जल से धोयें। मूत्रेन्द्रिय का स्नान भी हितकर है। अँगोछे से हाथ पैर पोंछलें। कुर्ता धोती आदि सब वस्त्र उतार दें। केवल शुद्ध और बारीक खदर का लंगोट बाँधे रहें। मर्द का लंगोट और घोड़े का तंग २४ घण्टे बँधा ही रहना चाहिए। सदा भूमि पर सोये। एक दरी का बिछौना रखें। यदि जाड़े में न रह सकें तो एक कम्बल और डाललें, रूई के गढ़े वा कोमल बिस्तर पर कभी न सार्यें। सीधे, पेट के बल कभी न सोयें, ब्रह्मचारी को दार्या करवट सोना चाहिए। सोते समय पैर के ऊपर पैर न रखें, आगे पीछे रखें। सिर पूर्व वा दक्षिण की ओर ही रखें।

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सकता। जो मनुष्य अपने मन को वश में कर लेता है, वह संसार के समस्त सुखों का उपभोग करने में समर्थ होता है।

मन की चंचलता को रोकने के लिये प्राणायाम, ईश्वर-प्रार्थना और स्वाध्याय परम आवश्यक साधन हैं। जब मन पवित्र और एकाग्र हो जाता है, तब विषय-वासनाएँ स्वतः ही शान्त हो जाती हैं।

युवकों को चाहिये कि वे गन्दे उपन्यासों, अश्लील चित्रों और सिनेमा के कुप्रभाव से दूर रहें। कुसंगति से सदा बचें, क्योंकि जैसी संगति होगी, वैसा ही रंग चढ़ेगा। शुद्ध, सात्विक और पौष्टिक भोजन करें। अधिक मिर्च-मसाले और उत्तेजक पदार्थों का त्याग करें। रात्रि को शीघ्र सोयें और प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर भ्रमण व व्यायाम करें।

इस प्रकार के नियमबद्ध जीवन से स्वास्थ्य उत्तम रहता है और ब्रह्मचर्य की रक्षा सहज ही हो जाती है।

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ब्रह्मचर्य के बिना किसी भी राष्ट्र की उन्नति सम्भव नहीं है। जिस देश के युवक ब्रह्मचारी, वीर्यवान् और चरित्रवान् होंगे, वही देश संसार में सिरमौर बन सकता है। चरित्र ही मनुष्य का सच्चा धन है। यदि धन नष्ट हो गया तो कुछ नहीं गया, यदि स्वास्थ्य नष्ट हो गया तो कुछ नष्ट हुआ, परन्तु यदि चरित्र नष्ट हो गया तो सब कुछ नष्ट हो गया।

अतः आओ, हम सब मिलकर यह प्रतिज्ञा करें कि हम अपने चरित्र की रक्षा करेंगे, ब्रह्मचर्य का व्रत धारण करेंगे और अपने देश तथा समाज का मस्तक ऊँचा करेंगे।

ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः !


इति शुभम्

महाशय रणधीर सिंह जी का जन्म गान्धरा गाँव जिला रोहतक में सन् १६२६ को महाशय श्री भानी सिंह रिसालदार के यहाँ हुआ। आपके पिता श्री बडे धर्मात्मा व दानी महानुभाव थे। अपनी वीरता के कारण ही आपने सेना में रिसालदार का पद प्राप्त किया। सेना से निवृत्त होकर आए तो आपकी दान की ख्याति सुनकर लोग जिस दिन पेंशन लेने आप जाते उस दिन सैंकड़ों याचक आपके समक्ष उपस्थित होते, आप सारी पेंशन का उनको सामान खरीद कर देते जो शेष बच जाते उनको अगली पेंशन के उधार पर सामान दिलवा देते आप घर पर एक भी पैसा नहीं पहुँचा पाते। घर का खर्चा खेती-बाड़ी में चल जाता। स्वयं महाशय रणधीर जी भी पिताश्री से कम नहीं निकले। घर से दूध बेचने के बहाने ले जाते और रोहतक अस्थल बोहर डेरे में साधु सन्तों को पिलाकर वापिस आ जाते। घर का खर्च आपकी धर्मपत्नी धनकौर देवी जी अपनी कर्मठता से तथा आप भी कृषि से चलाते। आपके चार पुत्र, दो पुत्रियाँ क्रमशः राजवीर, तसवीर, सुखवीर, जगवीर, कृष्णा व दर्शना है। पिछले बीस वर्षों से लगातार दैनिक अग्निहोत्र करते हुए यज्ञमय जीवन इस परिवार का चल रहा है। इस यज्ञ ने इस परिवार को प्रत्येक दिशा में उन्नत किया है। श्री राजवीर जी उपासक के मन में एक भावना सदा रहती थी कि मैं खेतों में घर बनाकर योगियों की तरह जीवन जीऊँ वह इच्छा इनकी पूरी हुई आज घरौटी जिला रोहतक

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में गाँव से दूर नहर के किनारे इनके चवालीस एकड़ भूमि में योगियों के आश्रम सदृश इनका घर है। जिसमें नित्य दोनों समय पूरा परिवार मिलकर ब्रह्मयज्ञ तथा अग्निहोत्र करते हैं। पूर्ण वैदिक जीवन जीते हुए यह परिवार पूर्ण आनन्द को प्राप्त कर रहा है।

पुत्र-पुत्रियाँ भी पिता-पितामह के चरणचिन्हों का अनुसरण करके चल रहे हैं। माता धनकौर देवी जी ने इस पुस्तक के प्रकाशन के लिए एक लाख रुपये सात्विक दान दिया है। इसके लिए इस परिवार को कोटि-कोटि धन्यवाद तथा प्रभु से प्रार्थना है कि इस प्रकार के लाखों करोड़ों परिवार भारत में हों जिससे कि देश धर्म की उन्नति हो सके।

इस पुस्तक को पढ़कर आज की भटकती हुई युवा पीढ़ी अवश्य ही प्रेरणाप्राप्त अपने जीवन को व राष्ट्र समाज की अवश्य ही सुख पहुँचायेगी।

आचार्य बलदेव

आर्य महाविद्यालय गुरुकुल कालवा, जिला जीन्द (हरयाणा)

दूरभाष : 01686-268348

यशवन्त आर्य:

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  1. ब्रह्मचर्यामृत (जीवन सन्देश) — स्वामी ओमानन्द सरस्वती
  2. महर्षि दयानन्द का जीवन चरित्र
  3. सत्यार्थ प्रकाश (सरल व्याख्या)
  4. योग दर्शन एवं स्वास्थ्य रक्षा
  5. संस्कार विधि एवं दैनिक कर्तव्य

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व्यवस्थापक, गुरुकुल झज्जर, जिला रोहतक (हरियाणा)