ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त (ब्रह्मगुप्त - शून्य, कुट्टक, बीजगणित एवं सम्पूर्ण २१ अध्याय सान्वय सटीक)
Brahmasphuta Siddhanta of Brahmagupta with Commentary
आचार्य ब्रह्मगुप्त द्वारा
( २८६ ) तद्भावे² होमजपः³ स्नानादि⁴ फलस्य⁵ चाभावः ।⁷ राहुक्रतं¹ ग्रहणद्वय मागोपालांगनादि⁶ सिद्धमिदम् ॥ ४० ॥⁸ बहुफलमिदमपि¹ सिद्धं जपहोमस्नानफलमत्र² । स्मृतीषूक्तं³ न स्नानं राहोरन्यत्र दर्शनाद्रात्रौ ॥ ४१ ॥ राहुग्रस्ते सूर्ये¹ सर्वं गंगासमं तोयम्² । स्वर्भानुरास्तुरिरिनं³ तमसा वित्याधवेदवाक्यमिदम्⁴ ॥ ४२ ॥
४०. (घ) (वि०—यहाँ प्रथम पंक्ति के अन्त में ४० संख्या दी है)
१. कृतं (ग) for (क्रतं)
(ग) २. तदभावो for (तद्भावे) ३. लुप्त पद है । ४. लुप्त पद है ।
५. फलस्याभावः ॥ ४१ ॥ for (फलस्य चाभावः)
(वि०—इस श्लोक का उत्तरार्ध, अगले श्लोक का पूर्वार्ध है)
६. माग्गो पा
( २६० ) श्रुतिसंहितास्मृतीनां भवति तथैक्यं¹ तदुक्तिरत:³।² राहुस्तच्छादयति प्रविशति यच्छुक्ल⁴ पंच दश्यन्ते ॥ ४३ ॥ भूच्छाया तमसींदो⁴ वरप्रदानात्कमलजस्य।५ ¹ चन्द्रोवुभयो²धस्थो³ यदग्निमय⁶ भास्करस्य मासांते ॥ ४४ ॥ छादयति शमिततयो³ राहु छादयति⁶ तत्सवितु:।⁴ ¹ भूच्छाया व्याससम:² शशिकक्षायां स्थित: शशिग्रहणे ॥ ४५ ॥५
४३. (घ) १. यथैक्यं (ग) (च) (ङ) for (तथैक्यं)
२. (वि०—यहाँ क्रमसंख्या ४३ दी है) (च) (ङ)
(ग) ३. रंत: ॥ ४४ ॥ for (रत:)
४. यत् शुक्ल पंच दृश्यंते for (यच्छुक्ल पंचदश्यन्ते)
(च) (वि०—यहाँ इस श्लोक के अन्त में कोई क्रमसंख्या अंकित नहीं क्योंकि
यह उत्तरार्ध यहाँ ४४ वें श्लोक का पूर्वार्ध माना जाता है)
(ङ) ४. यच्छुक्ल for (यच्छुक्ल)
४४. (घ) १. (वि०—यहां क्रमसंख्या ४४ दी है) (च) (ङ)
२. वुमयो (ग) चंद्रोबुमयोघस्थ: for (चन्द्रोवुभयोधस्थो)
३. घस्थो for (स्थ: स्थो)
(ग) ४. नभसींदो for (तमसींदो)
५. त्कमलाया ने ॥४४॥ for (कमलजस्य). ६. यदग्नियम for (यदग्निमय)
(वि०—इस श्लोक का उत्तरार्ध ४५ वें श्लोक का पूर्वार्ध है)
(च) (वि०—इस श्लोक का उत्तरार्ध ४५ वें श्लोक का पूर्वार्ध है)
अतएव यहां अन्त में कई क्रमसंख्या अंकित नहीं ।
(ङ) ५. कमलयोने: for (कमलजस्य)
२. छन्द्रोम्बुमयोऽघ: स्थो for (चन्द्रोवुभयोधस्थो)
४५. (घ) १. (वि०—यहां क्रमसंख्या ४५ अंकित है) (च) (ङ)
२. सम for (सम:)
(ग) ३. शमिततापो (ङ) for (शमिततयो)
४. तच्छवितु: ।।४५।। for (तत्सवितु:)
(वि०—इस श्लोक का उत्तरार्ध, ४६ वें श्लोक का पूर्वार्ध है) (च)
(च) ३. शमिततायो for (शमिततयो) ५. क्रम संख्या लुप्त
(ङ) ६. राहुश्छादयति for (राहुछादयति)
( २६१ ) राहु छादयतींदुं³ सूर्यग्रहणे⁴ऽर्किंबिंदु¹ समः । यत्तदधिकं तमोमयराहुव्यासस्य सूर्य⁵ द्रष्टं² तत् ॥ ४६⁶ ॥ नश्यति भूछायेंदु व्यास समोऽस्माद्¹ भवति राहुः³ । भूछायानेंदुमतो² ग्रहणे छादयति नार्किंबिंदुर्वा⁴ ॥ ४७⁵ ॥ तत्स्थस्तद्व्याससमो¹ राहुं² छादयति शशिसूर्यौ³ । प्राच्यपरं सममंडलमन्द्यद्याम्योत्तरं क्षितिजमन्यत् ॥ ४८⁴ ॥
४६. (घ) १. बिंदुं समः (ग) (च) (for बिंदुसमः)
(वि०—यहां क्रमसंख्या ४६ अंकित है)
२. दृष्टं तत् (ग) for (द्रष्टं तत्)
(ग) ३. छादयतींदुं for (छादयतींदु) ४. सूर्यं for (सूर्य)
५. ‘सूर्य’ लुप्त पद है।
(वि०—श्लोक का उत्तरार्ध ४७ वें श्लोक का पूर्वार्ध है) (च)
(च) २. दृष्टं for (द्रष्टं) ६. क्रमसंख्या लुप्त
(ङ) ३. राहुश्छादयतीन्दूं for (राहुछादयतीन्दु) २. दृष्टत्वात् for (दृष्टंतत्)
४७. (घ) १. समोऽस्माद् (च) for (समोस्माद्)
(वि०—यहां क्रमसंख्या ४७ दी है)
२. भूछायेंदु for (भूछायानेंदुमतो)
(ग) ३. राहुः ॥४७॥ for (राहुः)
४. बिंदुर्वा for (बिंदुर्वा)
(वि०—इस श्लोक का उत्तरार्ध, ४८ वें श्लोक का पूर्वार्ध है) (च)
(च) २. भूछायातेंदुमतो for (भूछायानेंदुमतो) ४. नार्किंबिंदुवति for (नार्किंबिंदुर्वा)
५. क्रम संख्या लुप्त
(ङ) ६. भूछायेन्द्रोर्व्यास for (भूछायेंदुव्यास)
२. भूछायेंदुमतो for (भूछायानेंदुमतो)
४८. (घ) १. तद्व्यास (ग) (ङ) for (तद्व्यास) २. राहुं for (राहु)
३. (वि०—यहां क्रमसंख्या ४८ अंकित है) (च)
(ग) ३. सूर्यैः ॥४८॥ for (सूर्यौ)
(वि०—इस श्लोक का उत्तरार्ध ४६ वें श्लोक का पूर्वार्ध है) (च)
(च) १. र्छस्तद्वचास for (तत्स्थस्तद्व्यास) ४. क्रमसंख्या लुप्त
(ङ) (वि०—प्रथम पंक्ति समाप्ति पर ‘ग्रहण वासना’ समाप्त)
✛अथगोलबन्धाधिकारः ✛आरम्भ ।
२. राहुश्छादयति for (राहुछादयति)
( २६२ ) परिकरवृत्तन्मध्ये भूगोलस्थित<sup>१</sup>द्रष्टुः । पूर्वापरयोर्लग्नं याम्योत्तरयो<sup>२</sup>र्नतोन्नतं क्षितिजात् ॥ ४६<sup>३</sup> ॥ स्वा<sup>५</sup>क्षांशैरुन्<sup>१</sup>मण्डलमहानिशो वृ<sup>६</sup>द्धिहानिकरम् । विषुवन्मण्डलमूर्ध्वं सम<sup>३</sup>मंडलस्थितं स्व<sup>४</sup>कक्षांशैः ॥ ५०<sup>२</sup> ॥ याम्ये<sup>२</sup>नोत्तरतोधः क्षितिजे<sup>३</sup> प्राच्यपरयो र्लग्नम्<sup>१</sup> । • विषुवन्मण्डललग्नं मेषतुलादावुदक्कु<sup>४</sup>लीरादौ ॥ ५१<sup>५</sup> ॥
४६. (घ) १. भूगोलस्तस्थित द्रष्टुः (ङ) for (भूगोलस्थितद्रष्टुः)
(वि०—यहां कोई क्रमसंख्या नहीं दी गई) (च)
(ग) १. स्थस्थितद्रष्टुः ॥४६॥ for (स्थितद्रष्टुः)
२. याम्योत्तरयोनंतं क्षितिजात् for (याम्योत्तरयोर्नतोन्नतं
( २६३ ) ⁵जिनभागै¹र्याम्येन मृगादावपमंडलमिहार्कः² । पातश्चंद्रादिनां³ भ्रमंति⁶ भार्द्धे⁴ खेश्च भूछाया ॥ ५२ ॥⁷ ¹पातदयमंडल वह्नि मंडलानि³ स्वविक्षेपैः² । सौम्यं विमंडलाद्धं प्रथमं याम्यं द्वितीयमेतेषु⁴ ॥ ५३ ॥५ चन्द्रकुज जीवमंदा भ्रमंति शीघ्रेण बुधशुक्रौ¹ । दृग्मंडलाद्धं मूर्द्धं³ यत्तत्परिधि स्थितं ग्रहं द्रष्टाः² ॥ ५४ ॥४ पश्यति यतः क्षितिस्थस्तद्भ्रमति² ततो ग्रहाभिमुखं¹ । क्षितिजापमंडलद्युतिर्लग्नं लग्नाग्रतो³ दिशंवलनं⁵ ॥ ५५ ॥⁴
५२. (ख) १. र्घमोन for (र्याम्येन)
२. (वि०— यहां क्रमसंख्या ५२ दी हुई है) (ग) (च)
३. पाताश्चंद्रादीनां (ग) (ङ) for (पातश्चन्द्रादिनां)
४. भार्द्ध for (भार्द्धं) (ग) ५. निज for (जिन)
६. भ्रमंते for (भ्रमंति)
(वि०— इस श्लोक का उत्तरार्ध ५३ वें श्लोक का पूर्वार्ध है) (च)
(च) ३. पाताश्चंद्रादीनां for (पातश्चन्द्रादिनां) ७. क्रमसंख्या लुप्त
५३. (घ) १. पातादषमंडल (ग) पातादपमंडलवत् for (पातदयमंडलवद्)
२. (वि०— यहां क्रमसंख्या ५३ दी है) (ग) (च)
(ग) ३. विमंडनानि for (द्विमंडलानि)
(वि०— इस श्लोक का उत्तरार्ध ५४ वें श्लोक का पूर्वार्ध है) (च)
४. द्वितीयामातष्ट for (द्वितीयमेतेषु)
(च) १. पातदपमंडल for (पातदयमंडल) ५. क्रमसंख्या लुप्त
(ङ) १. पाताद्वपमंडलवद् for (पातदयमंडलवद्)
५४. (घ) १. (वि०— यहां क्रमसंख्या ५४ दी है) (ग) (च)
२. द्रष्टा (ग) दृष्टा for (द्रष्टाः) (ग) ३. मूर्द्ध for (मूर्द्धं)
(वि०— इस श्लोक का उत्तरार्ध ५५ वें श्लोक का पूर्वार्ध है) (च)
(च) २. द्रष्टा for (द्रष्टाः) ४. क्रमसंख्या लुप्त
(ङ) ३. मूर्द्ध्वं for (मूर्द्धं) २. द्रष्टा for (द्रष्टाः)
५५. (घ) १. (वि०— यहां क्रमसंख्या '५५' दी गई है) (ग) (च)
(ग) २. तद्धमति for (तद्भ्रमति) ३. यादिशं for (तोदिशं)
(वि०— इस श्लोक का उत्तरार्ध ५६ वें श्लोक का पूर्वार्ध है) (च)
(च) ४. क्रमसंख्या लुप्त (ङ) ३. लग्नाग्रया for (लग्नाग्रतो)
५. दिशा लग्नम् for (दिशंवलनं)
( २६४ ) हृ²क्षेपं मंडलं दक्षिणोत्तरं³ वित्रिभं विलग्नम्⁴ ॥ ५६ ॥ विषवदुदग्बधनीया क्रंत्यांश¹समांतरेष्वजादीनाम् । वृत्ततृतीयं⁴ व्यस्तं कर्कादीनां² तुलादीनाम् ॥ ५७ ॥ विषवद्दक्षिणतो न्यन्³मकरादीनां तदेव विपरीतम् । स्वाहोरात्रान्येषां¹ व्यासा⁴ पृगवेव² मिष्टमपि ॥ ५८ ॥ लंका समपश्चिमगं प्राणेन कला¹भूमंडलं³ भ्रमति । अपमंडलस्यराशीद्वादशभागाः⁴ क्षितिजलग्नाः² ॥ ५६ ॥
५६. (घ) १. तृभ विलग्ने (ग) for (वित्रिभविलग्नम्)
(ग) २. दृक्षेपमंडलं for (दृक्षेपं मंडलं)
३. दक्षगोत्तरं for (दक्षिणोत्तरं)
(च) २. दृक्षेपमंडलं for (हृक्षेपं मंडलं)
४. विलग्ने for (विलग्नं)
(ङ) २. दृक्क्षेपमंडलं for (हृक्षेपं मंडलं)
१. वित्रिभविलग्ने for (वित्रिभ विलग्नम्)
५७. (घ) १. क्रांत्यंश (ग) (च) (ङ) for (क्रंत्यांश)
२. कक्र्यादीनां (ङ) for(कर्कादीनां)
(ग) ३. विषविदुद्गग्बन्धनीयात् for (विषवदुदग्बधनीया)
४. वृत्तत्रितयं (ङ) for (वृत्ततृतीयं)
(च) २. कवर्कादीनां for (कर्कादीनां)
(ङ) ३. विषबुदुदग्वन्धनीयात् for (विषवदुदम्बधनीया)
५८. (घ) १. रात्राण्येषां (ग) (च) (ङ) for (रात्रान्येषां)
२. पृथगेव (ग) (ङ) for (पृगवेव)
४. व्यासाः (ङ) for (व्यासा)
(च) २. पृथगेव for (पृगवेव)
(ङ) ३. दक्षिणतोऽन्यन् for (दक्षिणतोन्यन्)
५९. (घ) १. कलां (ग) (ङ) for (कला)
२. जलग्नाः for (जलग्नाः)
(ग) ३. भमंडनं for (भूमंडलं) ४. भाग for (भागाः)
(ङ) ३. भमण्डलं for (भूमण्डलं) ४. भागः for (भागाः)
( २९५ ) यात्यूदयं¹ मेषाद्या यत²स्त⁵स्त³दुदयानकालसमाः । क्रांतिवशालं⁴कायां तदूनताधिक्यमक्ष⁶वशात् ॥ ६० ॥ क्षितिजोन्मण्डलयोर्यत्स्वाहो³रात्रांतरं¹ चरदलं तत् । क्षितिजेग्राप्राच्यपरं स्वाहोरात्रांतरां²शज्या ॥ ६१ ॥ स्वाहोरात्रे क्षितिजां¹द् दिनगतशेषो²न्नतारवेः³ शंकुः । तस्माद्⁵ दिनगतशेषं शंकु कुमध्यांतरं दृग्ज्या⁴ ॥ ६२ ॥ दृग्मंडले नतां¹शज्या दृग्ज्या शंकूरुन्नतांशज्या । अर्को⁵दयास्तसूत्रा³द्दिनशंकोःदक्षिणो² नृतलम्⁴ ॥ ६३ ॥ क्षितिजे भू²दललिप्ताः कक्ष्यायां दृ³ग्गतिर्नभो मध्यात् । अवनति लिप्ता याम्योत्तरार्क ग्रहवदन्यतः⁴ ॥ ६४ ॥
६०. (घ) यांत्युदयं (ग) यात्युदयं (
ग्)"?
Wait, there's a dot near (ग) in line 21?
Let's look at :
"(गं)"? No, it's "(ग)" with maybe a stray dot or "(गं)"?
Wait, above in it's "(ग)". In it's "(ग)". In it's "(ग)". In it's "(ग)". In it's "(ग)".
The manuscripts are usually (क), (ख), (ग), (घ), (ङ), (च).
There is no manuscript (गं). It's (ग), with a stray spot/dot: "(ग)". Let's write (ग).
Wait, look at line 20: "३. गृहे (च) for (ग्रहे) ४. न्यहकर्म (ग) (ङ) for (न्यहक्कर्म)" Line 21: "५. रुदक् for (रूदग्) ६. गुणधनं for (गुणमृणधनं)" Wait, does it have (ग) before ५? Yes, "(ग) ५. रुदक् for (रूदग्) ६. गुणधनं for (गुणमृणधनं)".
Line 22: "६७. (ग) १. कक्ष्या for (कक्षा)
( २६७ ) यत्स्पष्टीकरणार्थं गोलादुत्क्षेप$^१$तत्कृतं सर्वं$^३$ गोलाध्यायः$^२$ । सप्तत्यार्याणामेक$^४$ विंशोयम् ॥ ७० ॥ मध्याद्यमिह यदुक्तं तत्प्रत्यक्षमिव दर्शयति यस्मात् । तस्मादाचार्यत्वं गोलविदो$^१$ भवति नान्यस्य ॥ ७१ ॥ आचार्येण$^१$ ज्ञातः$^२$ श्रीषेणार्यभटविष्णुचंद्राद्यैः$^३$ । गोले$^४$ यस्मात्तस्माद् ब्राह्मो$^५$ गोलः कृतः स्पष्टः ॥ ७२ ॥ गणितज्ञो गोलज्ञो गोलज्ञो ग्रहगतिं विजानाति । यो गणितगोलबाह्यो जानाति ग्रहगतिं$^२$ सः$^३$ कथम् ॥ ७३ ॥ $^१$इति ब्रह्मगुप्ते गोलाध्यायः (२१ अध्यायः समाप्तः) एक विंशतितमः समाप्तः
७०. (घ) १. दुत्प्रेक्ष (ग) दुत्प्रेक्ष्य (ङ) for (दुत्क्षेप)
२. (वि०- यह दूसरी पंक्ति का आरम्भिक शब्द है) (ग) (ङ)
(ग) ३. सर्वा for (सर्वं) ४. समाप्ति सूचक ॥ छः ॥ ॥छः॥ ॥छः॥
(च) १. दुत्प्रेक्षतत्कृतं for (दुत्क्षेपतत्कृतं)
(ङ) +इति श्री ब्राह्मस्फुट सिद्धान्ते गोलाध्यायो नामैकविंशतितमो ऽध्यायः+
(वि०-वस्तुतः गोलाऽध्याय यहां ७० वें श्लोक पर समाप्त हो गया है।
परन्तु उपर्युक्त प्रति में यन्त्राध्याय के पहले तीन श्लोक मिलाकर ७३ पर
समाप्त किया है)
७१. (घ) १. गोलो भवति for (गोलविदो भवति) (वि० - इसकी क्रमसंख्या १ है)
(ङ) वि० - यह 'यन्त्राध्याय' का प्रथम श्लोक है)
७२. (घ) १. आचार्येर्न (ङ) for (आचार्येण) (ग) २. ज्ञाता for (ज्ञातः)
३. 'विष्णु' पद लुप्त है। ४. गोलो (ङ) (च) for (गोले)
५. ब्राह्मो (ङ) for (ब्राह्मो) (वि०-इसकी क्रमसंख्या २ है)
१. आचार्येर्न for (आचार्येण) (ङ) (वि० - यह यन्त्राध्याय का द्वितीय श्लोक है)
७३. (घ) १. इति भह जिष्णुसुतब्रह्मगुप्त विरचिते ब्रह्मस्फुट सिद्धांतो गोलाध्यायः एक
विंशतितमः । for (इति ब्रह्मगुप्ते गोलाध्यायः)
(ग) २. ग्रहति for (ग्रहगतिं) ३. स (ङ) (च) for (सः)
१. ये पद लुप्त है (वि० - इसकी क्रमसंख्या ३ है)
(च) १. इति भह जिष्णुसुत ब्रह्मगुप्त विरचिते ब्राह्म स्फुटसिद्धांतो गोलाध्यायः
एक विंशतितमः for (इति ब्रह्मगुप्ते गोलाध्यायः २१ अध्यायः समाप्तः)
(ङ) (वि० - यह यन्त्राध्यायः का तीसरा श्लोक है)
( २६८ ) अथ यन्त्राध्यायो नाम द्वाविंशः कालस्य² परिच्छेदः⁴ कर्तुं यन्त्रै¹र्विना यतो शक्यः³ । संक्षिप्तं स्पष्टार्थं यन्त्राध्यायं ततो वक्ष्ये ॥ १ ॥ सप्तदशकालयन्त्राण्यतो धनुस्तुर्यगोलकश्चक्रम्⁴ । यष्टि⁵र्शंकु¹र्धटिका² कपालकं कर्त्तरिकीटम्³ ॥ २ ॥ सलिल¹भ्रमो²वलंबः करां³श्छाया दिनार्द्धमर्कोक्षः । नव⁴काल ज्ञानार्थं तेषां⁵ संसाधनानान्यष्टौ ॥ ३ ॥
१. (घ) १. विना (ग) (च) (ङ) for (विना)
(ग) २. गोलस्य (ङ) for (कालस्य)
३. यतोऽशक्यः (ङ) for (यतोशक्यः)
(वि०—इसकी श्लोक संख्या ४ है)
(ङ) (वि०—श्लोक संख्या ४ है इसके पूर्ववर्ती तीन श्लोकों को गोलाध्याय के
अंत में रख दिया गया है)
४. परिच्छेदः for (परिच्छेद)
२. (घ) १. वंटिका for (घंटिका) २. कत्तंरी . (ग) (च) (ङ) for (कर्त्तरि)
३. फीटं (ग) पीठम् for (कीटम्)
(ग) ४. गोलकं चक्रम् for (गोलतश्चक्रम्)
५. यष्टिः (च) (ङ) for (यष्टि)
(वि०—इसकी श्लोक संख्या ५ है)
(च) ३. फीटा for (कीटम्)
(ङ) ३. पीठम् for (कीटम्)
३. (ग) १. सलिलं (ङ) for (सलिल) २. वमो for (भ्रमो)
३. करांश्छाया (ङ) for (करांछाया) ४. नय for (नव)
५. यहां अनुस्वारलुप्त है ।
(वि०—इसकी श्लोक संख्या ६ है)
(च) २. ऽवलंबः for (वलंबः) ६. मक्रोक्षः for (मर्कोक्षः)
(ङ) २. भ्रमोऽवलम्बः for (भ्रमोवलंबः)
६. मर्कोऽक्षः for (मर्कोक्षः) ४. नत for (नव)
( २६६ ) सलिले न समं साध्यं भ्रामेण$^{१}$वृत्तमवलंब केनोर्द्धम्$^{४}$ । तिर्यक्$^{५}$ कर्णौनान्यैः$^{२}$ कथितैश्च नव प्रसाध्यति$^{३}$ ॥ ४ ॥ धार्यं धनुस्तथाग्र$^{१}$च्छायासाम्यं यथोन्नता भागाः$^{२}$ । दिनगतशेषा घटिकाश्चलंबमुक्ता$^{४}$ धनुर्मध्यात्$^{३}$ ॥ ५ ॥ धार्यं$^{४}$ समं तथा वा ज्या छाया पृथगा$^{१}$ यथा भवति अग्रादम्$^{२}$ । शक घटिका ज्यामध्यच्छाया मुक्ता$^{५}$ ॥ ६ ॥ घटिका$^{४}$ स्वशंकुभागैः पृष्ठगतै$^{७}$ लंब$^{५}$ भूसमं$^{६}$ समज्यार्द्धात् । सशीति$^{१}$ शतांशकं चक्रास्यार्द्धं$^{३}$ धनुर्यंत्रम् ॥ ७ ॥
४. (घ) १. भ्रमेरा (ग) (ङ) for (भ्रामेण)
२. तिर्यक्कर्णौनान्यैः (ग) (ङ) तिर्यक्करणैनान्यैः for (तिर्यककर्णौनान्यैः)
३. प्रसाध्यानि (ग) प्रवक्षामि for (प्रसाध्यति)
(ग) ४. केनोर्ध्वम् (ङ) for (केनोर्द्धम्) ५. तिर्यक् (ङ) for (तिर्यक)
(वि०-इसकी श्लोक संख्या ७ है)
(च) ५. तिर्यकर्णौनान्यैः for (तिर्यककर्णौनान्यैः)
३. प्रसाध्यानि for (प्रसाध्यति) (ङ) ३. प्रवक्ष्यामि for (प्रसाध्यति)
५. (ग) १. तथान्य for (तथाग्र) (वि०-इसकी श्लोक संख्या ८ है)
२. भागम् for (भागाः) ३. धनुर्मुक्तान् for (धनुर्मध्यात्)
(ङ) १. तथाऽन्यत् for (तथाग्र) ४. स्वलम्बमुक्ता for (स्वलंबमुक्ता)
६. (घ) १. पृष्टगा (ग) for (पृथगा) २. (वि०-दूसरी पंक्ति का आरम्भिक पद) (ग)
३. छायाया (ग) छाया यथा for (छायया) (ग) ४. धार्यं (ङ) for (धार्यं)
२. अग्रादश for (अग्रादम्) ५. भुक्ताः ॥६॥ (ङ) for (मुक्ता)
(वि०-इसकी श्लोक संख्या ६ है) (च) ३. छायाया for (छायया)
(ङ) १. मध्यगा for (पृथगा) २. अग्रादिष्ट्रा for (अग्रादम्) ६. 'शक' लुप्त
७. (घ) १. सशीति (ग) साशीति (ङ) for (सशिति)
२. शताशाकं (ग) शाकं (ङ) for (शतांशकं)
३. चक्रस्याद्धं (ग) for (चक्रास्यार्द्धं) (ग) ४. घटिकाः (च) for (घटिका)
५. लंब (ङ) for (लंब) ६. 'समं' पद लुप्त है।
(वि० इसकी श्लोकसंख्या १० है)
(च) १. सशीति for (सशिति) २. शतांशाकं for (शतांशकं)
३. चक्रस्याद्धं for (चक्रास्याद्धं) (ङ) ७. पृथमातै for (पृष्ठगतै)
६. भू for (भूसमं)
( ३०० ) मघ्यादिनोन्नतांशै ³ दिनार्द्ध नाड्यो ⁴ वदंति तुल्या ये ⁵ । ते ⁶ सूर्य्यास्त ¹ छादृष्ट ² छाया समान यतः ॥ ८ ॥ जीवा स्वाहोरात्रं परिकल्पाप्ता ¹ नतोन्नतत्रिज्या । अनुपातात् ⁵ तत्कार्या सूर्य्यगोलके ² चक्रे ³ चैवम् ॥ ९ ॥ दिन घटिकांकितपृष्टे ³ व्यस्त न तज्याग्रोन्नंतज्या ⁴ । चदिग्मध्ये ¹ च शलाकातच्छायाग्रं ² न तानाड्यः ॥ १० ॥ ८. (घ) १. दृष्ट (ग) छायादृष्ट for (छादृष्ट) २. समानयत for (समानयतः) (ग) ३. मध्यादिनोन्नतांशै for (मघ्यादिनोन्नतांशै) ४. नाडी for (नाड्यो) ५. तुल्यायै for (तुल्याये) ६. मूर्षास्त for (सूर्यास्त) (वि०-इसकी श्लोक संख्या ११ है) (च) १. छादृष्ट for (छादृष्ट) २. युतः for (यतः) (ङ) ३. मध्यदिवसोन्नतांशै for (मध्यादिनोन्नतांशै) ४. नाडीवंदन्ति for (नाड्योवदन्ति) ६. ते मूर्खास् for (ते सूर्यास्) १. तच्छाया इष्ट for (तच्छादृष्ट) ९. (घ) १. न्रतो (ग) नतेन्नत for (नतोन्नत) २. स्तुर्या (ग) स्तुर्ये for (सूर्ये) ३. चक्रके (ङ) for (चक्रे) (ग) ४. प्रकल्प्यग्रो for (परिकल्पाप्ता) ५. अनुपातातात्कार्या for (अनुपातात्तत्कार्या) (वि०-इसकी श्लोक संख्या १२ है) (च) १. न्तोन्नतत्रिज्या for (नतोन्नतत्रिज्या) २. स्तुर्यगोलके for (सूर्यगोलके) (ङ) ६. जीवां स्वाहोरात्रे for (जीवास्वाहोरात्रं) ४. (परिकल्याप्ता) for (परिकल्पाप्ता) १. न्रतोन्नतविज्याः for (नतोन्नतत्रिज्या) २. कार्यास्तुर्यगोलके for (कार्या सूर्यगोलके) १०. (घ) १. (च) (वि०-पहली पंक्ति का अंतिम पद) (ङ) २. 'दिग्मध्ये' से आरम्भ (ग) दिनमध्ये for (दिग्मध्ये) (ग) ३. पृष्टि for (पृष्टे) ४. व्यस्तनज्याग्र for (व्यस्तनतज्याग्रो) ५. उन्नतज्या च for (न्नोन्नतज्या) ६. शिलाका for (शलाका) ७. यान्नता नाड्यः for (ग्रं नतानाड्यः) (वि०-इसकी श्लोक संख्या १३ है) (ङ) ३. षटे for (पृष्टे) ५. प्रमुन्नतज्या for (न्नोन्नतज्या) ७. तच्छायाग्रान्नता for (तच्छायाग्रंनता)
( ३०१ ) ¹पृष्टो ⁷नेष्टो वेध्यो ज्यामध्यसंस्थाया।² ³द्रष्टृचा ⁴द्रष्टांतरं न ⁶तज्या धनुषि छायोन्नत ज्याया ॥ ११ ॥⁵ ⁴ज्यार्द्धे ¹द्रष्टिं ²दृग्ज्यान्नत ⁵जीवा शंकुमन्नतज्या च।⁶ धनुषि ⁷प्रकल्पयोज्यां ⁶यष्ट्युक्तं नाडिकाद्यंता ॥ १२ ॥³ अवलंबनं शलाकां ज्यार्द्धं ⁴यष्टि प्रकल्पवा धनुषि। ²भूम्युच्छ्रायं ⁵बहुशो ⁶यष्ट्युक्तं रानयेत्कर्णैः ॥ १३ ॥⁷
११. (घ) १. धनुषपृष्टेनेष्टौ वेध्यो (ग) धनुष प्रिष्टं नेष्टौवेध्यो for (पृष्टोनेष्टौ वेध्यो)
२. संस्थया (ग) (च) (ङ) for (संस्थाया)
३. दृष्टचा (ग) दृष्टघा (ङ) for (द्रष्टृचा) (वि - पहली पंक्ति का अंतिम पद)
४. इष्टांतरं (ग) (ङ) for (द्रष्टांतरं) ५. ज्यायाः (ङ) for (ज्याया)
(ग) (वि०—इसकी क्रमसंख्या १४ है)
(च) १. धनुषपृष्टे for (पृष्टो) ३. दृष्टघा for (द्रष्टृचा)
६. तद्यां for (तज्या) ५. ज्यायाः for (ज्याया)
(ङ) १. धनुषः पृष्ठे द्रष्ट्रा for (पृष्टो नेष्टो) ७. वेध्या for (वेध्यो)
३. ४. इष्टांतरं for (द्रष्टृचा द्रष्टांतरं) ३. दृष्टचा for (द्रष्टृचा)
१२. (घ) १. दृष्टिं (ग) यष्टि for (द्रष्टिं) २. दृग्ज्या (ग) दृग्ज्यां (ङ) for (दृग्ज्या)
३. नाडिकाद्यन्ता (ग) नाडिकाद्यं च for (नाडिकद्यंता)
(ग) ४. ज्यार्द्ध (ङ) for (ज्यार्द्धे) ५. नतजीवां for (न्नतजीवा)
६. ज्यां च for (ज्याच) ७. प्रकल्प्य for (प्रकल्प)
८. योज्यं for (योज्यां) (वि०—इसकी श्लोकसंख्या १५ है)
(च) १. दृष्टि for (द्रष्टि) २. दृग्ज्या for (द्रग्ज्या)
५. न्ततजीवाँ for (न्नतजीवा) ६. ज्याव for (ज्याच)
(ङ) १. दृष्टेर् for (द्रष्टिं) ६. यद्युक्तं for (यष्ट्युक्तं)
१३. (घ) १. ज्यार्द्दे for (ज्यार्द्धं)
२. भूम्युच्छ्रायं (ग) भूम्युद्ध्राया for (भूम्युच्छ्रायं)
(ग) २. अवलंबन for (अवलंबनं) ४. प्रकल्प्य (ङ) for (प्रकल्पं)
५. द्वाहुःशो for (बहुशो) ६. येष्ट्युक्तं for (यष्ट्युक्तं)
(वि० - इसकी श्लोक संख्या १६ है)
(च) २. भूम्युद्ध्रायं for (भूम्युच्छ्रायं) ७. करणैः (ङ) for (कर्णैः)
(ङ) २. भूम्युच्छ्राया for (भूम्युच्छ्रायं) ५. ल्लम्बो for (बहुशो)
( ३०४ ) यष्टि व्यासाद्धं$^४$ तु विवृत्तं भगणांशांकितं$^१$ कृत्वा$^७$ । यष्टिकीलप्रोते$^२$ मूले$^५$ पृथग्भगग्रयो$^६$ विद्धे$^३$ ॥ २१ ॥ ताभ्यां$^१$ सूर्यशशांकौ वेध्यावर्ग$^४$स्थितेन सूत्रेण । सूत्रज्यायांतरां शायेतेऽर्क$^५$ विभाजिता स्थितयः$^३$ ॥ २२ ॥ सूत्राद्धंगुणा त्रिज्या यष्टिहता$^१$ फलधनुर्द्धिगुणितं$^२$ वा । रविचंद्रातरमिष्टव्यासाद्धोल्लित$^३$वृत्तस्य ॥ २३ ॥ मध्यधृतायायष्टे लंबकशंकुप्रवेशनिर्गमने । क्रांतिवशात्प्राच्यपरे मत्साद्याम्योत्तरे$^१$ साध्ये ॥ २४ ॥ २१. (घ) १. भगणांशकांकितं (ग) (च) for (भगणांशांकितं) २. यष्टी (ग) (ङ) (च) for (यष्टि) ३. विद्धे (ग) विधि: (विधेः) for (विद्धे) (ग) ४. व्यासाद्धू वि (ङ) for (व्यासाद्धात्तुवि) ५. मूल for (मूले) ६. प्रथग्रयो (च) for (पृथग्भगग्रयो) (वि०—इसकी श्लोकसंख्या २४ है) (च) ४. भुविवृत्तं for (तुविवृत्तं) ७. क्रत्वा for (कृत्वा) ३. विद्धं for (विद्धे) (ङ) १. भगणांशकं for (भगणांशांकितं) ६. पृथगग्रयो for (पृथग्भगग्रयो) ३. बंद्धे for (विद्धे) २२. (घ) १. वाभ्यां for (ताभ्यां) २. ज्यायंतरांशा (ग) (च) (ङ) for (सूत्रज्यायांतरांशा) ३. स्तितयः (ग) (च) (ङ) for (स्थितयः) (ग) ४. वग्र (च) (ङ) for (वर्ग) ५. येनेऽर्क for (येतेऽर्क) (वि०—इसकी श्लोकसंख्या २५ है) (च) ५. येतेऽर्कं for (येतेऽर्क) २३. (घ) १. हृता (ग) (ङ) (च) for (हता) २. द्विगुणितं (ग) (ङ) (च) for (द्धिगुणितं) ३. व्यासाद्धोल्लिखित (ग) (ङ) (च) for (व्यासाद्धोल्लित) (ग) ४. रविचंद्रांतर (च) for (रविचंद्रातर) (वि०—इसकी श्लोकसंख्या २६ है) २४. (घ) १. मत्स्याद्यामोत्तरे (ङ) (ग) मत्स्याद्याम्योत्तरे for (मत्साद्याम्योत्तरे) (ग) २. (वि०—इसकी श्लोकसंख्या २७ है) (च) १. मत्स्याद्यामोत्तरे for (मत्साद्यामोत्तरे)
ं: It has प्र, ोmatra, thenशwithच? Or हwithय? Wait, look at line 14: ४. प्रोज्यपद for (प्रोह्यपद)In line 10:प्रोthenश्च? Wait, श्+चisश्च. Yes, प्रोश्चपदं`!
Let's check line 13:
(च) १. शंकुतलग्नांतर for (शंकुतलनांतर) २. दिशौ for (दिशो)
Wait, does it say (शंकुतलनांतर) or (शंकुतलानांतर)?
It says (शंकुतलनांतर) - without the ा on ला!
Let's check line 14:
३. कृतेः for (कृतेः) ४. प्रोज्यपद for (प्रोह्यपद)
Wait, in line 14, ३. कृतेः for (कृतेः)? Why would it say कृतेः for (कृतेः)?
Wait, in the main text (line 3): कर्णकृतेः!
Wait, in line 14: is it कृतेः or कृतिः?
Look at the first word in line 14:
३. कृतेः? No! The matra is ि: `३. कृति
( ३०६ ) शंकुप्राच्यपरांतरं शंकुवर्गाद्वधमुदयांतरं याम्ये । लब्धगुणं यष्टिगुणं क्रांति ज्यातो रविः प्राग्वत् ॥ २८ ॥ अपसृतिरन्यशलाका गुणशलाक्षांतरेण भक्ता भूः । भू स्वशलाका गुणिता गुणिताद्रष्टि विभक्ता ॥ २६ ॥
२८. (घ) १. हृतं (ग) for (गुणं)
(ग) २. प्राच्या for (प्राच्य) (वि०—इसकी श्लोक संख्या ३१ है)
३. मुदगंतरं यामे for (मुदयांतरं याम्ये)
(च) १. हृतं (ङ) for (गुणं)
(ङ) ३. मुदगंतरं for (मुदयांतरं)
४. लम्बगुणं for (लब्धगुणं)
२६. (घ) १. शलाक्ष्यंतरेण (ग) शलाकांतरेण (ङ) for (शलाक्षांतरेण)
२. 'गुणिता' लुप्त
३. दृष्टि (ग) द्रिष्टि for (द्रष्टि)
(वि०—इसकी क्रमसंख्या ३० है)
(ङ) ६. भूः for (भू)
३. ४. यष्टि विभक्ता गृहाद्यौच्चम् for (गुणिता द्रष्टि विभक्ता)
(ग) (वि०—इसकी श्लोकसंख्या ३२ है)
४. 'गृहाद्योच्यम्' पंक्ति का अंतिम शब्द । ३. दृष्टि for (द्रष्टि)
५. (वि०—इसकी क्रमसंख्या ३० अंकित है)
४. + 'गृहाद्योच्चं' यह पद पृष्ठ के नीचे अन्य हाथ से लिखा हुआ है ।
दृष्ट्या गुणितापसृति दृष्टि विशेषभाजिता भूमिः ।
भूमिस्व द्रिष्टिभक्ता शलाकाया संगुणोच्छ्रायम् ॥ ३३ ॥
(च) यह अतिरिक्त श्लोक यहां पृष्ठ के निम्नोपांत पर अन्यहस्तसे लिखा हुआ है ।
१. र्दृष्टि for (दृष्टि) २. भूः for (भूमिः)
३. द्रष्टि for (द्रिष्टि)
४. शलाकया (ङ) for (शलाकाया)
५. संगुणोद्धाय (ङ) for (संगुणोच्छ्रायम्)
(वि०—इसकी भी क्रमसंख्या ३० अंकित है)
(ङ) १. र्दृष्टि विशेषेण
( ३०७ ) लंबनिपातांतरकं लंबौच्यांतरविभक्तमधिकगुणम् । भूलँबांतर¹गुणिता लबनिपातांतर²विभक्ता³ ॥ ३० ॥⁴ लब्धोनाद्रक्¹ लम्बोदग्लम्बा² दग्रलंबके हीने । अधिकेऽधिको ग्रहोच्चं³ तलाग्रवेध⁴ द्वया⁵ षष्ट्या ॥ ३१ ॥⁶ दृष्टिद्रंक्¹ लंबगुणा विभाजिताद्यः² शलाकया भूमिः । सकलशलाका गुणिता³ भूमिहृष्टद्या⁴ हतोच्छायः⁵ ॥ ३२ ॥
३०. (घ) १. भूर्लबांतर for (भूलँबांतर)
२. लंबनिपातांतर for (लंबनिपातांतरकं)
३. विभक्ताः for (विभक्ता)
(वि०—इसकी क्रम संख्या ३१ है)
(ग) (वि०—इसकी श्लोकसंख्या ३४ है)
(च) १. भूर्लबातर for (भूलँबातर)
४. (वि०—यहां क्रमसंख्या ३१ अंकित है)
३१. (घ) १. लब्धोनाहक् (ग) सशेनो द्रिग् for (लब्धोनाद्रक्)
२. लंबोद्गलंबा (ग) (च) (ङ) for (लंबोदग्लंबा)
३. गृहोच्चं (ग) (च) (ङ) for (ग्रहोच्चं)
४. तल ग्रेवेध (ग) तलाग्रवे बध्यया for (तलाग्रवेध)
५. द्वया यष्ट्या (ग) द्विष्या ॥ ३५ ॥ for (द्वयाषष्ट्या)
(वि०—इसकी क्रमसंख्या ३२ है)
(ग) (वि०—इसकी श्लोक संख्या ३५ है)
(च) १. नाहकं for (नाद्रक्) ५. द्वया यष्ट्या for (द्वया षष्ट्या)
६. (वि०— क्रमसंख्या ३२ अंकित है)
(ङ) १. लब्धोनोहग् for (लब्धोनाद्रक्) ४. तलाग्रके for (तलाग्र)
५. विद्ध्या दृष्ट्या for (वेधद्वयाषष्ट्या)
३२. '(घ) (वि०—इसकी क्रमसंख्या ३३ है)
१. यष्टियैलग्नंबगुणा (ग) दृष्टिट्रंग्लंबगुणा for (दृष्टिट्रंकलंबगुणो)
२. विभाजिताद्यः (ग) (च) (ङ) for (विभाजिताद्यः)
३. गुणिताः (च) for (गुणिता) ४, भूमिहृष्ट्या (ङ) for (भूमिहृष्टद्या)
५. हतोच्छ्रायः (ग) (च) (ङ) for (हतोच्छायः)
(ग) (वि०—इसकी श्लोकसंख्या ३६ है)
(च) १. द्रष्टिद्रक् for (दृष्टिद्रंक्) ६. (वि०—यहाँ क्रमसंख्या ३३ अंकित है)
(ङ) १. दृष्टिट्रंग्लम्ब for (दृष्टिट्रंकलम्ब)
( ३०८ ) मित्वाग्रै$^१$हैकदेशे$^६$ विद्धे$^७$ष्टं शलाकया न्या$^८$सर्वम् । प्रथमशलका$^२$भक्तं मीत$^३$ द्वितीया$^४$ गुणितमौच्यम्$^५$ ॥ ३३ ॥ षष्ट्याहूता$^१$ शलाका त्रिज्याघात$^२$ धनु गृहांतर्कं$^३$ । यैरूक्तं$^४$ मूर्खस्ते यतो न द्रष्टघंतरं$^५$ द्रग्ज्या$^६$ ॥ ३४ ॥ मूलेद्वं$^१$गुलविपुलः$^५$ शुच्यग्रो$^२$ द्वादशांगुलोच्छ्रायः$^८$ । शंकुतलाग्र$^३$विद्धोग्रवेध$^६$ लम्बा$^७$द्धार्यः$^४$ ॥ ३५ ॥
३३. (घ) १. गृहैक (ग) (च) (ङ) for (ग्रहैक) (वि०-इसकी क्रमसंख्या ३४ है)
२. शलाका (ग) शिलाका for (शलका)
३. मिति (ग) मितं (ङ) for (मीत
( ३०६ ) छायांहृज्ज्या यष्टिश्छायाकर्णं मवलम्बकम् शंकुं । परिकल्प्यां शंकु यन्त्रे योज्यं घटिकादिषुष्टद्युक्तम् ॥ ३६ ॥ घटिकाकलशार्द्धं कृतिताम्र पात्रं तले गुरुच्छिद्रम् । मध्येतज्जलमज्जन षष्टचा द्युन्निशं यथा भवति ॥ ३७ ॥ मध्याध्व्यस्तनतांशैः कपालकं दिवकत्थ सूत्रात् मग्रात् । व्यस्तोन्नतांशा विवरे सूत्र क्या पाततो नाड्यः ॥ ३८ ॥ ३६. (घ) (वि०--इसकी क्रम संख्या ३७ है) १. छायाकर्णं (ग) (च) (ङ) for (छायाकर्ण) २. परिकल्प्या (ग) परिकल्प्य (ङ) for (परिकल्प्यां) ३. घटिकादि पुष्टद्युक्तम् (ग) घटिकादि यद्युक्तम् for (घटिकादि पुष्टद्युक्तम्) (ग) ४. हृज्ज्यां (ङ) for (हृज्ज्या) (वि०--इसकी श्लोकसंख्या ४० है) (च) २. परिकल्प्य शंकु for (परिकल्प्यांशंकु) ३. घटिकादिसंयुक्तम् for (घटिकादिषु पृद्युक्तम्) (वि०--क्रमसंख्या ३७ अंकित है) (ङ) ५. दृष्टि for (यष्टि) ३७. (घ) (वि०--इसकी क्रमसंख्या ३८ है) १. कलशार्द्धाकृति (ग) कलाशताद्धा for (कलशार्द्धं) (ग) २. कृतिताम्रं for (कृतिताम्रं) ३. पृथु for (गुरु) ४. मज्ञान for (मज्जन) (वि०--इसकी श्लोकसंख्या ४१ है) (च) २. कृतिताम्रं (ङ) for (कृतिताम्रं) (वि०--इसकी क्रमसंख्या ३८ अंकित है) (ङ) कलसार्धा for (कलशार्द्धं) ३. पृथुच्छिद्रम् for (गुरुच्छिद्रम्) ३८. (घ) (वि०--इसकी क्रमसंख्या ३६ है) १. द्वस्त (ग) मध्यद्वस्तनतांशै for (मध्यस्तनतांशैः) २. दिवक्स्थ (ग) दिवस्थ (ङ) for (दिवकत्थ) ३. सूत्रमग्राग्रात् (ग) मूत्रमग्रात् for (सूत्रात्मग्रात्) (ग) (वि०--इसकी श्लोकसंख्या ४२ है) ४. व्यस्तोन्नत्यंश for (व्यस्तोन्नतांशा) (च) १. द्वस्त for (ध्यस्त) २. दिकस्थ for (दिवकत्थ) ३. सूत्रमग्राग्रात् for (सूत्रात्मग्रात्) ४. व्यस्तोन्नतांश for (व्यस्तोन्नतांशा) ५. विववरे for (विवरे) ६. (वि०--क्रमसंख्या ३६ for (३८) (ङ) १. मध्याद्यस्त्वनतांशैः for (मध्याध्यस्तनतांशैः) ३. सूत्रमध्याग्रात् for (सूत्रात्मग्रात्) ४. व्यस्तोन्नतांश for (व्यस्तोन्नतांशा)
( ३१० ) अथवा कपालके नाडिकोदिसर्वं धनुष्फक्तं कर्त्तरि यंत्रम् । स्थुलं कृतं यतोन्येर्वदामि ततः ॥ ३६ ॥ दिक्स्थितफलकद्वियुतिस्तले तदग्रस्थ सूत्रयोर्मध्ये । कीलस्तत्छायाग्रात् कर्त्तर्यानाडिका स्थूलाः ॥ ४० ॥ दृष्टोच्यं समपीठ यष्टि व्यासाद्धैर्मंकितं परिधौ । दिग्भगणांशे मूर्द्धन्यग्रा घटिकादि यष्टद्युक्तम् ॥ ४१ ॥ नलकोमूले विद्धस्तच्छ्रूति घटिकोद्भूत समुच्छ्रायः । लब्धांगुलैस्तुतैर्नाडिका क्रियायंत्रसिद्धिरतः ॥ ४२ ॥
३६. (घ) १. स्थूलं (ग) (ङ) for (स्थुलं) (वि० - इसकी क्रमसंख्या ४० है)
(ग) २. नाडिकादिकं सर्वम् for (नाडिकादिसर्वं)
३. या धनुयुक्तं for (धनुष्फक्तं) ४. पत्रम् for (यंत्रम्)
(वि०- इसकी श्लोकसंख्या ४३ है) (च) १. स्थूलं for (स्थुलं)
५. (वि०- क्रमसंख्या अंकित है)
(ङ) ३. यया धनुयुक्तं for (धनुष्फक्तं)
४. 'कर्त्तरियंत्रम्' दूसरी पंक्ति का आरम्भिकपद ।
४०. (घ) १. स्वछायाग्रा for (स्तच्छायाग्रात्) (वि०--इसकी क्रमसंख्या ४१ है)
२. कर्त्तर्या (ग) for (कर्त्तया) ३. नाडिकाः for (नाडिका)
(ग) (वि०- इसकी श्लोक संख्या ४१ है)
(च) २. कर्त्तर्यानाडिकाः for (कर्त्तयानाडिका) (वि० - इसकी क्रमसंख्या ४१ है)
(वि०-इसकी क्रमसंख्या ४१ है)
(ङ) २. कर्त्तयां for (कर्त्तया)
४१. (घ) (वि०-इसकी संख्याक्रम ४२ है)
१. दृष्टोच्यसमं (ग) दृष्टोच्यं (ङ) for (दृष्टौच्यं)
२. पीठं (ग) (ङ) for (पीठ) (ग) ३. ष्युक्तम् for (यष्टद्युक्तम्)
(च) १. दृष्टोच्यं समं for (दृष्टोच्यं सम) २. पीठं for (पीठ)
४. मूर्द्धन्यप्रा for (मूर्द्धन्यग्रा) (वि०-इसकी क्रम संख्या ४२ है)
(ङ) ५ मन्तिकं for (मंकितं) ३. रुक्तम् for (यष्टद्युक्तम्)
४२. (घ) (वि०-इसकी क्रमसंख्या ४३ है)
१. विद्धस्त (ग) विद्धस्तच्छ्रुति for (विद्धस्तच्छ्रूति) २. स्रुति for (छ्रूति)
३. दृतस्तदुद्ध्रायः for (समुच्छ्राय) (ग) ४. घटिकोद्धतः (ङ) for(घटिकोद्भूत)
(वि०-इसकी श्लोक संख्या ४६ है) (च) (वि०-श्लोक संख्या ४३ है)
(ङ) १. तवूस्रुति for (तच्छ्रूति)