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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र १३-१५ ] अध्याय ४ ३६९

सूत्र १३-१५ ] अध्याय ४ ३६९ प्रजापतिके सभाभवनको प्राप्त होते हैं (छा० उ० ८ । १४ । १ ) । उस प्रसङ्गमे भी उपासकका लक्ष्य प्रजापतिके लोकमें रहना नहीं है; किंतु परब्रह्मके परमधाममें जाना ही है, क्योकि वहाँ जिस यशोंके यश यानी महायशका वर्णन है, वह ब्रह्मका ही नाम है, यह बात अन्यत्र श्रुतिमे कही गयी है (श्वेता० उ० ४ । १९ ) तथा उसके पहले (छा० उ० ८ । १३ । १) के प्रसङ्गसे भी यही सिद्ध हो सकता है कि वहाँ साधकका लक्ष्य परब्रह्म ही है। सम्बन्ध-इस प्रकार पूर्वपक्ष और उसके उत्तरकी स्थापना करके अब सूत्रकार अपना मत प्रकट करते हुए सिद्धान्तका वर्णन करते हैं— अप्रतीकालम्बनान्नयतीति बादरायण उभयथा- दोषात्तत्क्रतुश्च ॥ ४ । ३ । १५ ॥ अप्रतीकालम्बनान् = वाणी आदि प्रतीकका अवलम्बन करके उपासना करनेवालोंके सिवा अन्य सब उपासकोको; नयति=( ये अर्चि आदि देवतालोग देवयानमार्गसे ) ले जाते है; उभयथा=( अतः ) दोनों प्रकारकी; अदोषात्= मान्यतामें कोई दोष न होनेके कारण; तत्क्रतुः=उनके सकल्पानुसार परब्रह्मको; च=और कार्यब्रह्मको प्राप्त कराना सिद्ध होता है; इति=यह; बादरायणः =व्यासदेव कहते हैं। व्याख्या—आचार्य बादरायण अपना सिद्धान्त बतलाते हुए यह कहते हैं कि जिस प्रकार वाणी आदिमें ब्रह्मकी प्रतीक-उपासनाका वर्णन है, उसी प्रकार दूसरी-दूसरी वैसी उपासनाओंका भी उपनिषदोंमें वर्णन है। उन उपासकोके सिवा, जो ब्रह्मलोकोंके भोगोको स्वेच्छानुसार भोगनेकी इच्छावाले कार्यब्रह्मके उपासक हैं और जो परब्रह्म परमात्माको प्राप्त करनेकी इच्छासे उस सर्वशक्तिमान् सर्वज्ञ परमेश्वरकी उपासना करनेवाले हैं, उन दोनो प्रकारके उपासकोको उनकी भावना- के अनुसार कार्यब्रह्मके भोगसम्पन्न लोकोमे और परब्रह्म परमात्माके परमधाममे दोनों जगह ही वह अमानव पुरुष पहुँचा देता है, इसलिये दोनों प्रकारकी मान्यतामें कोई दोष नहीं है; क्योंकि उपासकका सकल्प ही इस विशेषतामें कारण है। श्रुतिमें भी यह वर्णन स्पष्ट है कि 'जिनको परब्रह्मके परमधाममे पहुँचाते है, उनका मार्ग भी प्रजापति ब्रह्माके लोकमे होकर ही है ( कौ० उ० १ । ३)। अतः जिनके अन्तःकरणमें लोकोमे रमण करनेके सस्कार होते हैं, उनको वहाँ वे० द० २४—

३७० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ छोड़ देते हैं, जिनके मनमें वैसे भाव नहीं होते, उनको परमधाममें पहुँचा देते हैं; परन्तु देवयानमार्गसे गये हुए दोनों प्रकारके ही उपासक वापस नहीं लौटते । सम्बन्ध-प्रतीकोपासनावालोंको अर्चिर्मार्गसे नहीं ले जानेका क्या कारण है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— विशेषं च दर्शयति ॥ ४ । ३ । १६ ॥ विशेषम् = इसका विशेष कारण; च = भी; दर्शयति = श्रुति दिखाती है । व्याख्या—वाणी आदि प्रतीकोपासनावालोंको देवयानमार्गके अधिकारी क्यो नहीं ले जाते, इसका विशेष कारण उन-उन उपासनाओंके विभिन्न फलका वर्णन करते हुए श्रुति स्वयं ही दिखलाती है, वाणीमें प्रतीकोपासनाका फल जहाँतक वाणीकी गति है, वहाँतक इच्छानुसार विचरण करनेकी शक्ति बताया गया है (छा० उ० ७।२।२)। इसी प्रकार दूसरी प्रतीकोपासनाका अलग- अलग फल बताया है, सबके फलमे एकता नहीं है । इसलिये वे उपासक देवयानमार्गसे न तो कार्यब्रह्मके लोकमे जानेके अधिकारी है और न परब्रह्म परमेश्वरके परमधाममे ही जानेके अधिकारी हैं; अतः उस मार्गके अधिकारी देवताओका अर्चिर्मार्गसे उनको न ले जाना उचित ही है । तीसरा पाद सम्पूर्ण ।

चौथा पाद तीसरे पादमें अर्चि आदि मार्गद्वारा परब्रह्म और कार्यब्रह्मके लोकमें जानेवालोंकी गतिके विषयमें निर्णय किया गया। अब उपासकोंके संकल्पानुसार ब्रह्मलोकमें पहुँचनेके बाद जो उनकी स्थितिका भेद होता है, उसका निर्णय करनेके लिये चौथा पाद आरम्भ किया जाता है। उसमें पहले उन साधकोंके विषयमें निर्णय करते हैं, जिनका उद्देश्य परब्रह्मकी प्राप्ति है और जो उस परब्रह्मके अप्राकृत दिव्य परमधाममें जाते हैं— सम्पद्याविर्भावः स्वेन शब्दात् ॥ ४ । ४ । १ ॥ सम्पद्य=परमधामको प्राप्त होकर (इस जीवका); स्वेन=अपने वास्तविक स्वरूपसे; आविर्भावः=प्राकट्य होता है; शब्दात्=क्योंकि श्रुतिमें ऐसा ही कहा गया है। व्याख्या—'जो यह उपासक इस शरीरसे ऊपर उठकर परम ज्ञानस्वरूप परमधामको प्राप्त हो (वहाँ) अपने वास्तविक स्वरूपसे सम्पन्न हो जाता है। यह आत्मा है—ऐसा आचार्यने कहा—यह (उसको प्राप्त होनेवाला) अमृत है, अभय है और यही ब्रह्म है। निस्सन्देह उस इस (प्राप्तव्य) परब्रह्मका नाम सत्य है।' (छा० उ० ८ । ३ । ४)—इस श्रुतिसे यही सिद्ध होता है कि परमधामको प्राप्त होते ही वह साधक अपने वास्तविक स्वरूपसे सम्पन्न हो जाता है अर्थात् प्राकृत सूक्ष्म शरीरसे रहित, श्रुतिमे बताये हुए पुण्य-पापशून्य, जरा-मृत्यु आदि विकारोंसे रहित, सत्यकाम, सत्य-संकल्प, शुद्ध एवं अजर- अमररूपसे युक्त हो जाता है। (छा० उ० ८ । १ । ५) इस प्रकरणमें जो संकल्पसे ही पितर आदिकी उपस्थिति होनेका वर्णन है, वह ब्रह्मविद्याके माहात्म्यका सूचक है। उसका भाव यह है कि जीवनकालमें ही हृदयाकाशके भीतर संकल्पसे पितृलोक आदिके सुखका अनुभव होता है, न कि ब्रह्मलोकमें जानेके बाद; क्योंकि उस प्रकरणके वर्णनमें यह बात स्पष्ट है। वहाँ जीवनकालमें ही उनका संकल्पसे उपस्थित होना कहा है (छा० उ० ८ । २ । १ से १०)। इसके बाद, उसके लिये प्रतिदिन यहाँ हृदयमें ही परमानन्दकी प्राप्ति होनेकी बात कही है (छा० उ० ८ । ३ । ३)। तदनन्तर शरीर छोड़कर परमधाममें जानेकी

प्रकरणात्=प्रकरणसे (यह सिद्ध होता है कि वह); आत्मा=शुद्ध

३७२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ बात बतायी गयी है ( छा० उ० ८ । ३ । ४) और उसका नाम 'सत्य अर्थात् सत्यलोक कहा है। उसके पूर्व जो यह कहा है कि 'जो यहाँ इस आत्माको तथा इन सत्यकामोको जानकर परलोकमे जाते हैं, उनका सब लोकोमे इच्छानुसार गमन होता है' (छा० उ० ८ । १ । ६) यह वर्णन आत्म-ज्ञान- की महिमा दिखानेके लिये है। किन्तु दूसरे खण्डका वर्णन तो स्पष्ट ही जीवनकालका है। उक्त प्रकरण दहर-विद्याका है और ( दहर ) यहाँ परब्रह्म परमेश्वरका वाचक है, यह बात पहले सिद्ध की जा चुकी है, (ब्र० सू० १ । ३ । १४) इसलिये यहाँ यह नहीं कहा जा सकता कि यह प्रकरण हिरण्यगर्भकी या जीवात्माके अपने स्वरूपकी उपासनाका है। सम्बन्ध-उस परमधाममें जो वह उपासक अपने वास्तविक रूपसे सम्पन्न होता है, उसमें पहलेकी अपेक्षा क्या विशेषता होती है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— मुक्तः प्रतिज्ञानात् ॥ ४ । ४ । २ ॥ प्रतिज्ञानात्=प्रतिज्ञा की जानेके कारण यह सिद्ध होता है कि; मुक्तः= (वह स्वरूप) सब प्रकारके बन्धनोसे मुक्त (होता) है। व्याख्या-श्रुतिमें जगह-जगह यह प्रतिज्ञा की गयी है कि 'उस परब्रह्म परमात्माके लोकको प्राप्त होनेके बाद यह साधक सदाके लिये सब प्रकारके बन्धनोंसे छूट जाता है।' (मु० उ० ३ । २ । ६) इसीसे यह सिद्ध होता है कि अपने वास्तविक स्वरूपसे सम्पन्न होनेपर उपासक सब प्रकारके बन्धनोंसे रहित, सर्वथा शुद्ध, दिव्य, विभु और विज्ञानमय होता है, उसमे किसी प्रकारका विकार नहीं रहता। पूर्वकालमे अनादिसिद्ध कर्मसंस्कारोके कारण जो इसका स्वरूप कर्मानुसार प्राप्त शरीरके अनुरूप हो रहा था; (ब्र० सू० २ । ३ । ३०) परमधाममे जानेके बाद वैसा नहीं रहता। यह सब बन्धनोसे मुक्त हो जाता है। सम्बन्ध-यह कैसे निश्चय होता है कि उस समय उपासक सब बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है ? इसपर कहते हैं— आत्मा प्रकरणात् ॥ ४ । ४ । ३ ॥ प्रकरणात्=प्रकरणसे (यह सिद्ध होता है कि वह); आत्मा=शुद्ध आत्मा ही हो जाता है।

सूत्र .२-५ ] अध्याय ४ ३७३

सूत्र .२-५ ] अध्याय ४ ३७३ व्याख्या—उस प्रकरणमे जो वर्णन है, उसमे यह स्पष्ट कहा गया है कि 'वह ब्रह्मलोकमे प्राप्त होनेवाला स्वरूप आत्मा है' ( छा० उ० ८ । ३ । ४ ) । अतः उस प्रकरणसे ही यह सिद्ध होता है कि उस समय वह सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त होकर परमात्माके समान परम दिव्य शुद्ध स्वरूपसे युक्त हो जाता है। ( गीता १४ । २; तथा मु० उ० ३ । १ । ३ )। सम्बन्ध—अब यह जिज्ञासा होती है कि ब्रह्मलोकमें जाकर उस उपासककी परमात्मासे पृथक् स्थिति रहती है या वह उन्हींमे मिल जाता है। इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं। पहले क्रमशः तीन प्रकारके मत प्रस्तुत करते हैं— अविभागेन दृष्टत्वात् ॥ ४ । ४ । ४ ॥ अविभागेन = ( उस मुक्तात्माकी स्थिति उस परब्रह्ममे ) अविभक्त रूपसे होती है; दृष्टत्वात् = क्योकि यही बात श्रुतिमे देखी गयी है। व्याख्या—श्रुतिमें कहा गया है कि— 'यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति । एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥' 'हे गौतम ! जिस प्रकार शुद्ध जलमे गिरा हुआ शुद्ध जल वैसा ही हो जाता है. उसी प्रकार परमात्माको जाननेवाले मुनिका आत्मा हो जाता है।' ( क० उ० २ । १ । १५ ) । 'जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ नामरूपोको छोड़कर समुद्रमे विलीन हो जाती हैं, वैसे ही परमात्माको जाननेवाला विद्वान् नाम-रूपसे मुक्त होकर परात्पर, दिव्य, परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है ।'* ( मु० उ० ३ । २ । ८ ) । श्रुतिके इस वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि मुक्तात्मा उस परब्रह्म परमात्मामें अविभक्त रूपसे ही स्थित होता है। सम्बन्ध—इस विषयमें जैमिनिका मत बतलाते हैं— ब्राह्मेण जैमिनिरुपन्यासादिभ्यः ॥ ४ । ४ । ५ ॥ जैमिनिः = आचार्य जैमिनि कहते हैं कि; ब्राह्मेण = ब्रह्मके सदृश रूपसे स्थित होता है; उपन्यासादिभ्यः = क्योकि श्रुतिमे जो उसके स्वरूपका निरूपण किया गया है, उसे देखनेसे और श्रुति-प्रमाणमे भी यही सिद्ध होता है।

  • यह मन्त्र पृष्ठ ९४ में अर्थसहित आया है।

३७४ वेदान्त-दर्शन [पाद व्याख्या—आचार्य जैमिनिका कहना है कि श्रुतिमे 'वह निर्मल होकर परम समताको प्राप्त हो जाता है।' (मु० उ० ३ । १ । ३) ऐसा वर्णन मिलता है। तथा उक्त प्रकरणमे भी उसका दिव्य स्वरूपसे सम्पन्न होना कहा गया है (छा० उ० ८। ३। ४) एवं गीतामें भी भगवान्ने कहा है कि 'इस ज्ञानका आश्रय लेकर मेरे दिव्य गुणोंकी समताको प्राप्त हुए महापुरुष सृष्टिकालमे उत्पन्न और प्रलयकालमें व्यथित नहीं होते।' (गीता १४ । २)। इन प्रमाणोंसे यह सिद्ध होता है कि वह उपासक उस परमात्माके सदृश दिव्य स्वरूपसे सम्पन्न होता है। सम्बन्ध—इसी विषयमें आचार्य औडुलोमिका मत उपस्थित करते हैं— चितितन्मात्रेण तदात्मकत्वादित्यौडुलोमिः ॥ ४ । ४ । ६ ॥ चितितन्मात्रेण = केवल चेतनमात्र स्वरूपसे स्थित रहता है; तदात्म- कत्वात् = क्योकि उसका वास्तविक स्वरूप वैसा ही है; इति = ऐसा; औडुलोमिः = आचार्य औडुलोमि कहते हैं। व्याख्या—परमधाममें गया हुआ मुक्तात्मा अपने वास्तविक चैतन्यमात्र स्वरूपसे स्थित रहता है; क्योकि श्रुतिमे उसका वैसा ही स्वरूप बताया गया है। बृहदारण्यकमे कहा है कि 'स यथा सैन्धवघनोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नो रसघन एवैवं वा अरेऽयमात्मानन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव।'-'जिस प्रकार नमकका डला बाहर-भीतरसे रहित सब-का-सब रसघन है, वैसे ही यह आत्मा बाहर- भीतरके भेदसे रहित सब-का-सब प्रज्ञानघन ही है।' (बृह० उ० ४ । ५ । १३) इसलिये उसका अपने स्वरूपसे सम्पन्न होना चैतन्य घनरूपमे ही स्थित होना है। सम्बन्ध—अब आचार्य बादरायण इस विषयमें अपना सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं— एवमप्युपन्यासात् पूर्वभावादविरोधं बादरायणः ॥ ४ । ४ । ७ ॥ एवम् = इस प्रकारसे अर्थात् औडुलोमि और जैमिनिके कथनानुसार; अपि = भी; उपन्यासात् = श्रुतिमे उस मुक्तात्माके स्वरूपका निरूपण होनेसे तथा; पूर्वभावात् = पहले (चौथे सूत्रमें) कहे हुए भावसे भी; अविरोधम् = सिद्धान्तमें कोई विरोध नहीं है; बादरायणः (आह) = यह बादरायण कहते हैं। व्याख्या—आचार्य जैमिनिके कथनानुसार मुक्तात्माका स्वरूप परब्रह्म

सूत्र ६-९ ] अध्याय ४ ३७५

सूत्र ६-९ ] अध्याय ४ ३७५ परमात्माके सदृश दिव्यगुणोंसे सम्पन्न होता है—यह बात श्रुतियों और स्मृतियोंमे कही गयी है तथा आचार्य औडुलोमिके कथनानुसार चेतनमात्र स्वरूपसे स्थित होनेका वर्णन भी पाया जाता है। इसी प्रकार पहले ( ४ । ४ । ४ सूत्रमे ) जैसा बताया गया है, उसके अनुसार परमेश्वरमें अभिन्नरूपसे स्थित होनेका वर्णन भी मिलता है। इसलिये यही मानना ठीक है कि उस मुक्तात्माके भावानुसार उसकी तीनों ही प्रकारसे स्थिति हो सकती है। इसमें कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—यहाँतक परमधाममें जानेवाले उपासकोंके विषयमें निर्णय किया गया। अब जो उपासक प्रजापति ब्रह्माके लोकको प्राप्त होते हैं, उनके विषयमें निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। यहाँ प्रश्न होता है कि उन उपासकोंको ब्रह्मलोकोंके भोगोंकी प्राप्ति किस प्रकार होती है, इसपर कहते हैं— संकल्पादेव तु तच्छ्रुतेः ॥ ४ । ४ । ८ ॥ तु=( उन भोगोंकी प्राप्ति ) तो; संकल्पात्=संकल्पसे; एव=ही होती है; तच्छ्रुतेः=क्योंकि श्रुतिमें यही बात कही गयी है। व्याख्या—'यह आत्मा मनरूप दिव्य नेत्रोंसे ब्रह्मलोकके समस्त भोगोंको देखता हुआ रमण करता है।' (छा० उ० ८ । १२। ५, ६) यह बात श्रुतिमें कही गयी है; इससे यह सिद्ध होता है कि मनके द्वारा केवल संकल्पसे ही उपासकको उस लोकके दिव्य भोगोंका अनुभव होता है। सम्बन्ध—युक्तिसे भी उसी बातको दृढ़ करते हैं— अत एव चानन्याधिपतिः ॥ ४ । ४ । ९ ॥ अत एव=इसीलिये; च=तो; अनन्याधिपतिः=( मुक्तात्माको ) ब्रह्माके सिवा अन्य स्वामीसे रहित बताया गया है। व्याख्या—'वह स्वाराज्यको प्राप्त हो जाता है, मनके स्वामी हिरण्यगर्भको प्राप्त हो जाता है; अतः वह स्वयं बुद्धि, मन, वाणी, नेत्र और श्रोत्र—सबका स्वामी हो जाता है ?' ( तै० उ० १ । ६ ) । भाव यह कि एक ब्रह्माजीके सिवा अन्य किसीका भी उसपर आधिपत्य नहीं रहता, इसीलिये पूर्वसूत्रमें कहा

३७६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ गया है कि 'वह मनके द्वारा संकल्पमात्रसे ही सब दिव्य भोगोंको प्राप्त कर लेता है।' सम्बन्ध—उसे संकल्पमात्रसे जो दिव्य भोग प्राप्त होते हैं, उनके उपभोगके लिये वह शरीर भी धारण करता है या नहीं ? इसपर आचार्य बादरिका मत उपस्थित करते हैं— अभावं बादरिराह ह्येवम् ॥ ४ । ४ । १० ॥ अभावम्=उसके शरीर नहीं होता ऐसा; बादरिः=आचार्य बादरि मानते हैं; हि=क्योंकि; एवम्=इसी प्रकार; आह=श्रुति कहती है। व्याख्या—आचार्य बादरिका कहना है कि उस लोकमे स्थूल शरीरका अभाव है, अतः बिना शरीरके केवल मनसे ही उन भोगोंको भोगता है; क्योकि श्रुतिमे इस प्रकार कहा है—'स वा एष एतेन दैवेन चक्षुषा मनसैतान् कामान् पश्यन् रमते । य एते ब्रह्मलोके।' (छा० उ० ८ । १२ । ५, ६) 'निश्चय ही वह यह आत्मा इस दिव्य नेत्र मनके द्वारा जो ये ब्रह्मलोकके भोग हैं, इनको देखता हुआ रमण करता है।' इसके सिवा, उसका अपने दिव्यरूपसे सम्पन्न होना भी कहा है (८। १२। २)। दिव्य रूप स्थूल देहके बन्धनसे रहित होता है। इसलिये कार्यब्रह्मके लोकमे गये हुए मुक्तात्माके स्थूल शरीरका अभाव मानना ही उचित है। (८ । १३ । १)। सम्बन्ध—इस विषयमें आचार्य जैमिनिका मत बतलाते हैं— भावं जैमिनिर्विकल्पामननात् ॥ ४ । ४ । ११ ॥ जैमिनिः=आचार्य जैमिनि; भावम्=मुक्तात्माके शरीरका अस्तित्व मानते हैं; विकल्पामननात्=क्योंकि कई प्रकारसे स्थित होनेका श्रुतिमें वर्णन आता है। व्याख्या—आचार्य जैमिनिका कहना है कि 'मुक्तात्मा एक प्रकारसे होता है, तीन प्रकारसे होता है, पाँच प्रकारसे होता है, सात प्रकारसे, नौ प्रकारसे तथा ग्यारह प्रकारसे होता है, ऐसा कहा गया है।' (छा० उ० ७ । २६ । २) इस तरह श्रुतिमे उसका नाना भावोंसे युक्त होना कहा है, इससे यही सिद्ध होता है कि उसके स्थूल शरीरका भाव है अर्थात् वह शरीरसे युक्त होता है, अन्यथा इस प्रकार श्रुतिका कहना सङ्गत नहीं हो सकता।

सूत्र १०—१४ ] अध्याय ४ ३७७

सूत्र १०—१४ ] अध्याय ४ ३७७ सम्बन्ध—अब इस विषयमें आचार्य बादरायण अपना मत प्रकट करते हैं— द्वादशाहवदुभयविधं बादरायणोऽतः ॥ ४ । ४ । १२ ॥ बादरायणः=वेदव्यासजी कहते हैं कि; अतः=पूर्वोक्त दोनों मतोंसे; द्वादशाहवत्=द्वादशाह यज्ञकी भाँति; उभयविधम्=दोनों प्रकारकी स्थिति उचित है । व्याख्या—वेदव्यासजी कहते हैं कि दोनों आचार्योंका कथन प्रमाणयुक्त है; अतः उपासकके संकल्पानुसार शरीरका रहना और न रहना दोनों ही सम्भव हैं। जैसे द्वादशाह-यज्ञ श्रुतिमें कहीं अनेककर्तृक होनेपर 'सत्र' और नियत- कर्तृक होनेपर 'अहीन' माना गया है, उसी तरह यहाँ भी श्रुतिमें दोनों प्रकारका कथन होनेसे मुक्तात्माका स्थूल शरीरसे युक्त होकर दिव्य भोगोंका भोगना और बिना शरीरके केवल मनसे ही उनका उपभोग करना भी सम्भव है। उसकी यह दोनों प्रकारकी स्थिति उचित है, इसमें कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—बिना शरीरके केवल मनसे उपभोग कैसे होता है ? इस जिज्ञासा- पर कहते हैं— तन्वभावे सन्ध्यवदुपपत्तेः ॥ ४ । ४ । १३ ॥ तन्वभावे=शरीरके अभावमें; सन्ध्यवत्=स्वप्नकी भाँति ( भोगोंका उपभोग होता है ); उपपत्तेः=क्योंकि यही मानना युक्तिसंगत है । व्याख्या—जैसे स्वप्नमें स्थूल शरीरके बिना केवल मनसे ही समस्त भोगों- का उपभोग होता देखा जाता है, वैसे ही ब्रह्मलोकमें भी बिना शरीरके समस्त दिव्य भोगोंका उपभोग होना सम्भव है; इसलिये बादरायणकी यह मान्यता सर्वथा उचित ही है । सम्बन्ध—शरीरके द्वारा किस प्रकार उपभोग होता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— भावे जाग्रद्वत् ॥ ४ । ४ । १४ ॥ भावे=शरीर होनेपर; जाग्रद्वत्=जाग्रत्-अवस्थाकी भाँति ( उपभोग होना युक्तिसंगत है )।

३७८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ व्याख्या—आचार्य जैमिनिके मतानुसार जिस मुक्तात्माको शरीरकी उपलब्धि होती है, वह उसके द्वारा उसी प्रकार उन भोगोंका उपभोग करता है, जैसे यहाँ जाग्रत्-अवस्थामे साधारण मनुष्य विषयोंका अनुभव करता है। ब्रह्मलोकमें ऐसा होना भी सम्भव है; इसलिये दोनों प्रकारकी स्थिति माननेमें कोई आपत्ति नहीं है। सम्बन्ध—जैमिनिने जिस श्रुतिका प्रमाण दिया है, उसके अनुसार मुक्तात्माके अनेक शरीर होनेकी बात ज्ञात होती है, इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि वे अनेक शरीर निरात्मक होते हैं या उनका अधिष्ठाता इससे भिन्न होता है ? इसपर कहते हैं— प्रदीपवदावेशस्तथा हि दर्शयति ॥ ४ । ४ । १५ ॥ प्रदीपवत्=दीपककी भाँति; आवेशः=सभी शरीरोंमें मुक्तात्माका प्रवेश हो सकता है; हि=क्योंकि; तथा दर्शयति=श्रुति ऐसा दिखाती है। व्याख्या—जैसे अनेक दीपकोंमें एक ही अग्नि प्रकाशित होती है अथवा जिस प्रकार अनेक बल्बोंमे बिजलीकी एक ही शक्ति व्याप्त होकर उन सबको प्रकाशित कर देती है, उसी प्रकार एक ही मुक्तात्मा अपने संकल्पसे रचे हुए समस्त शरीरोंमें प्रविष्ट होकर दिव्यलोकके भोगोंका उपभोग कर सकता है; क्योंकि श्रुतिमें उस एकका ही अनेकरूप होना दिखाया गया है (छा० उ० ७ । २६ । २) । सम्बन्ध—मुक्तात्मा तो समुद्रमें नदियोंकी भाँति नाम-रूपसे मुक्त होकर उस परब्रह्म परमेश्वरमें विलीन हो जाता है (मु० उ० ३ । २ । ८) यह बात पहले कह चुके है। इसके सिवा, और भी जगह-जगह इसी प्रकारका वर्णन मिलता है। फिर यहाँ उनके नाना शरीर धारण करनेकी और यथेच्छ भोगभूमियोंमें विचरनेकी बात कैसे कही गयी है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— स्वाप्ययसम्पत्त्योरन्यतरापेक्षमाविष्कृतं हि ॥ ४ । ४ । १६ ॥ स्वाप्ययसम्पत्त्योः=सुषुप्ति और परब्रह्मकी प्राप्ति—इन दोनोंमेंसे; अन्यतरापेक्षम्=किसी एककी अपेक्षासे कहे हुए (वे वचन हैं); हि=क्योंकि; आविष्कृतम्=श्रुतियोंमें इस बातको स्पष्ट किया गया है।

सूत्र १५—१७] अध्याय ४ ३९९

सूत्र १५—१७] अध्याय ४ ३९९ व्याख्या—श्रुतिमें जो किसी प्रकारका ज्ञान न रहनेकी और समुद्रमें नदीकी भाँति उस परमात्मामें मिल जानेकी बात कही गयी है, वह कार्यब्रह्मके लोकोंको प्राप्त होनेवाले अधिकारियोंके विषयमें नहीं है; अपितु कहीं सुषुप्ति-अवस्थाको लेकर वैसा कथन है, (बृह० उ० ४।३।१९) कहीं प्रलयकालको लक्ष्य करके ऐसा कहा है (प्र० उ० ६।५; उस समय भी प्राणियोंकी स्थिति सुषुप्तिकी भाँति ही रहती है, इसलिये उसका पृथक् उल्लेख सूत्रमें नहीं किया, यही अनुमान होता है)। और कहीं परब्रह्मकी प्राप्ति अर्थात् सायुज्य मुक्तिको लेकर वैसा कहा गया है (मु० उ० ३।२।८; बृह० उ० २। ४।१२)। भाव यह कि लय-अवस्था और सायुज्यमुक्ति इन दोनोंमेंसे किसी एकके उद्देश्यसे वैसा कथन है; क्योंकि ब्रह्मलोकमें जानेवाले अधिकारियोंके लिये तो स्पष्ट शब्दोंमें वहाँके दिव्य भोगोंके उपभोगकी, अनेक शरीर धारण करनेकी तथा यथेच्छ लोकोंमें विचरण करनेकी बात श्रुतिमें उन-उन स्थलोंमें कही गयी है। इसलिये किसी प्रकारका विरोध या असम्भव बात नहीं है। सम्बन्ध—यदि ब्रह्मलोकमें गये हुए मुक्त आत्माओंमें इस प्रकार अपने अनेक शरीर रचकर भोगोंका उपभोग करनेकी सामर्थ्य है, तब तो उनमें परमेश्वरकी भाँति जगत्की रचना आदि कार्य करनेकी भी सामर्थ्य हो जाती होगी? इस जिज्ञासापर कहते हैं— जगद्व्यापारवर्जं प्रकरणादसंनिहितत्वाच्च ॥ ४ । ४ । १७ ॥ जगद्व्यापारवर्जम्=जगत्की रचना आदि व्यापारको छोडकर और बातोंमें ही उनकी सामर्थ्य है; प्रकरणात्=क्योंकि प्रकरणसे यही सिद्ध होता है; च=तथा; असंनिहितत्वात्=जगत्की रचना आदि व्यापारसे इनका कोई निकट सम्बन्ध नहीं दिखाया गया है (इसलिये भी वही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—जहाँ-जहाँ इस जड-चेतनात्मक समस्त जगत्की उत्पत्ति, संचालन और प्रलयका प्रकरण श्रुतियोंमें आया है, (तै० उ० ३।१; छा० उ० ६।२।१—३; ऐ० उ० १।१; बृह० उ० ३।७।३ से २३ तक; शतपथ० १४।३।५।७ से ३१ तक)। वहाँ सभी जगह यह कार्य उस परब्रह्म परमात्माका ही बताया गया है। ब्रह्मलोकको प्राप्त होनेवाले मुक्तात्माओंका सृष्टि-रचनादि कार्यसे सम्बन्ध कहीं नहीं बताया

३८० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ गया है। इन दोनो कारणोंसे यही बात सिद्ध होती है कि इस जडचेतनात्मक समस्त जगत्की रचना, उसका संचालन और प्रलय आदि जितने भी कार्य हैं, उनमें उन मुक्तात्माओंका कोई हाथ या सामर्थ्य नहीं है, वे केवल वहाँके दिव्य भोगोंका उपभोग करनेकी ही यथेष्ट सामर्थ्य रखते हैं। सम्बन्ध—इसपर पूर्वपक्ष उठाकर उसके समाधानपूर्वक पूर्वसूत्रमें कहे हुए सिद्धान्तको पुष्ट करते हैं— प्रत्यक्षोपदेशादिति चेन्नाधिकारिकमण्डलस्थोक्तेः ॥ ४ । ४ । १८ ॥ चेत्=यदि कहो कि; प्रत्यक्षोपदेशात्=वहाँ प्रत्यक्षरूपसे इच्छानुसार लोकोंमे विचरनेका उपदेश है, अर्थात् वहाँ जाकर इच्छानुसार कार्य करनेका अधिकार बताया गया है; इति न=तो यह बात नहीं है; आधिकारिकमण्डल- स्थोक्तेः=क्योकि वह कहना अधिकारियोके लोकोंमें स्थित भोगोंका उपभोग करनेके लिये ही है। व्याख्या—यदि कोई ऐसी शङ्का करे कि 'वह स्वराट् हो जाता है, उसकी, समस्त लोकोंमें इच्छानुसार गमन करनेकी शक्ति हो जाती' है।' (छा० उ० ७ । २५ । २) 'वह स्वाराज्यको प्राप्त हो जाता है।' (तै० उ० १ । ६ । २) इत्यादि श्रुतिवाक्योंमे उसे स्पष्ट शब्दोंमें खराट् ओर स्वाराज्यको प्राप्त बताया है तथा इच्छानुसार भिन्न-भिन्न लोकोंमे विचरनेकी सामर्थ्यसे सम्पन्न कहा गया है, इससे उसका जगत्की रचना आदिके कार्यमें अधिकार है, यह स्वतः सिद्ध हो जाता है, तो ऐसी बात नहीं है, क्योकि वहाँ यह भी कहा है कि 'वह सबके मनके स्वामीको प्राप्त हो जाता है।' (तै० उ० १ । ६ । २)। अतः उसकी सब सामर्थ्य उस ब्रह्मलोककी प्राप्तिके प्रभावसे है और ब्रह्माके अधीन है, इसलिये जगत्के कार्यमे हस्तक्षेप करनेकी उसमे शक्ति नहीं है। उसे जो शक्ति और अधिकार दिये गये हैं, वे केवल उन-उन अधिकारियोंके लोकोमे स्थित भोगोंका उपभोग करनेकी स्वतन्त्रताके लिये ही हैं। अतः वह कथन वहींके लिये है। सम्बन्ध—यदि इस प्रकार उन-उन लोकोंके विकारमय भोगोंका उपभोग करनेके लिये ही वे सब शरीर, शक्ति और अधिकार आदि उसे मिले हैं, तब

सूत्र १८—२० ] अध्याय ४ ३८१

सूत्र १८—२० ] अध्याय ४ ३८१ तो देवलोकोंको प्राप्त होनेवाले कर्माधिकारियोंके सदृश ही ब्रह्मविद्याका भी फल. हुआ; इसमें विशेषता क्या हुई ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— विकारावर्ति च तथा हि स्थितिमाह ॥ ४ । ४ । १९ ॥ च=इसके सिवा; विकारावर्ति=वह मुक्तात्मा जन्मादि विकारोंसे रहित ब्रह्मरूप फलका अनुभव करता है; हि=क्योंकि; तथा=उसकी वैसी; स्थितिम्=स्थिति; आह=श्रुति कहती है । व्याख्या—श्रुतिमें ब्रह्मविद्याका मुख्य फल परब्रह्मकी प्राप्ति बताया गया है, 'जो जन्म, जरा आदि विकारोंको न प्राप्त होनेवाला, अजर-अमर, समस्त पापोंसे रहित तथा कल्याणमय दिव्य गुणोंसे सम्पन्न है ।' ( छा० उ० ८ । १ । ५ ) इसलिये यही सिद्ध होता है कि उसको प्राप्त होनेवाला फल कर्मफलकी भाँति विकारी नहीं है । ब्रह्मलोकके भोग तो आनुषंगिक फल हैं । ब्रह्मविद्याकी सार्थकता तो परब्रह्मकी प्राप्ति करानेमे ही है । श्रुतिमें उस मुक्तात्माकी ऐसी ही स्थिति बतायी गयी है—'यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते । अथ सोऽभयं गतो भवति ।' ( तै० उ० २ । ७ ) अर्थात् 'जब यह जीवात्मा इस देखनेमें न आनेवाले, शरीररहित, बतलानेमें न आनेवाले तथा दूसरेका आश्रय न लेनेवाले परब्रह्म परमात्मामें निर्भयतापूर्वक स्थिति लाभ करता है, तब वह निर्भय पदको प्राप्त हो जाता है ।' सम्बन्ध—पहले कहे हुए सिद्धान्तको ही प्रमाणसे दृढ करते हैं— दर्शयतश्चैवं प्रत्यक्षानुमाने ॥ ४ । ४ । २० ॥ प्रत्यक्षानुमाने=श्रुति और स्मृति; च=भी; एवम्=इसी प्रकार; दर्शयतः= दिखलाती हैं । व्याख्या—श्रुतिमें स्पष्ट कहा है कि 'वह परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने वास्तविक रूपसे सम्पन्न हो जाता है । यह आत्मा है, यही अमृत एवं अभय है और यही ब्रह्म है ।' ( छा० उ० ८ । ३ । ४ ) ब्रह्मलोक अन्य लोकों- की भाँति विकारी नहीं है । श्रुतिमे उसे नित्य ( छा० उ० ८ । १३ । १ ), सब पापोंसे रहित ( छा० उ० ८ । ४ । १ ) तथा रजोगुण आदिसे शून्य— विशुद्ध ( प्र० उ० १ । १६ ) कहा गया है । गीतामें भी कहा है कि 'इस ज्ञानकी

३८२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ उपासना करके मेरे सदृश धर्मोंको अर्थात् निर्लेपता आदि दिव्य कल्याणमय भावोंको प्राप्त हो जाते हैं; अतः वे न तो जगत्की रचनाके कालमे उत्पन्न होते हैं और न प्रलयकालमें मरनेका दुःख ही भोगते हैं ।'* इस प्रकार श्रुतियों और स्मृतियोंमे जगह-जगह मुक्तात्माकी वैसी स्थिति दिखायी गयी है । उसका जो उन-उन अधिकारीवर्गोंके लोकोंमें जाना-आना और वहाँके भोगोंका उपभोग करना है, वह लीलमात्र है, बन्धनकारक या पुनर्जन्मका हेतु नहीं है । सम्बन्ध—ब्रह्मलोकमें जानेवाले मुक्तात्माका जगत्की उत्पत्ति आदिमें अधिकार या सामर्थ्य नहीं है, इस पूर्वोक्त बातको इस प्रकरणके अन्तमें पुनः सिद्ध करते हैं— भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च ॥ ४ । ४ । २१ ॥ भोगमात्रसाम्यलिङ्गात् = भोगमात्रमें समतारूप लक्षणसे; च = भी ( यही सिद्ध होता है कि उसका जगत्की रचना आदिमें अधिकार नहीं होता )। व्याख्या—जिस प्रकार वह ब्रह्म समस्त दिव्य कल्याणमय भोगोंका उपभोग करता हुआ भी उनसे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार यह मुक्तात्मा भी उस ब्रह्मलोकमें रहते समय, उपासनाकालमें की हुई भावनाके अनुसार प्राप्त हुए वहाँके दिव्य भोगोंका विना शरीरके स्वप्नकी भाँति केवल संकल्पसे या शरीर- धारणपूर्वक जाग्रत्की भाँति उपभोग करके भी उनसे लिप्त नहीं होता । इस प्रकार भोगमात्रमे उस ब्रह्मके साथ उसकी समानता है । इस लक्षणसे भी यही सिद्ध होता है कि जगत्की रचना आदि कार्यमे उसका ब्रह्मके समान किसी भी अंशमे अधिकार या सामर्थ्य नहीं है । सम्बन्ध—यदि ब्रह्मलोकको प्राप्त होनेवाले मुक्त आत्माकी सामर्थ्य सीमित है, परमात्माके समान असीम नहीं है, तब तो उसके उपभोगका समय पूर्ण होनेपर उसका पुनर्जन्म भी हो सकता है ? इसपर कहते हैं— अनावृत्तिः शब्दादनावृत्तिः शब्दात् ॥ ४ । ४ । २२ ॥

  • इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ ( गीता १४ । २ )

सूत्र २१—२२ ] अध्याय ४ ३८३

सूत्र २१—२२ ] अध्याय ४ ३८३ अनावृत्तिः=ब्रह्मलोकमें गये हुए आत्माका पुनरागमन नहीं होता; शब्दात्=यह बात श्रुतिके वचनसे सिद्ध होती है; अनावृत्तिः=पुनरागमन नहीं होता; शब्दात्=यह बात श्रुतिके वचनसे सिद्ध होती है । व्याख्या—श्रुतिमें बार-बार यह बात कही गयी है कि ब्रह्मलोकमें गया हुआ साधक वापस नहीं लौटता (बृह० उ० ६ । २ । १५; प्र० उ० १ । १०; छा० उ० ८ । ६ । ६; ४ । १५ । ६; ८ । १५ । १) । इस शब्द-प्रमाणसे यहाँ सिद्ध होता है कि ब्रह्मलोकमें जानेवाला अधिकारी वहाँसे इस लोकमें नहीं लौटता । ‘अनावृत्तिः शब्दात्’ इस वाक्यकी आवृत्ति ग्रन्थकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है। चौथा पाद सम्पूर्ण । श्रीवेदव्यासरचित वेदान्तदर्शन ( ब्रह्मसूत्र ) का चौथा अध्याय पूरा हुआ । वेदान्त-दर्शन सम्पूर्ण ।

सूत्रोंकी वर्णानुक्रमणिका भी दी गयी है ।

श्रीहरिः श्रीहरिकृष्णदासजी गोयन्दकाद्वारा अनुवादित अन्य पुस्तकें १—श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य—[हिन्दी-अनुवादसहित] इसमें मूल श्लोक, भाष्य, हिन्दीमें भाष्यार्थ, टिप्पणी तथा अन्तमें शब्दानुक्रमणिका भी दी गयी है । साइज २२×२९ आठपेजी, पृष्ठ ५२०, तिरंगे चित्र ३, मूल्य २।।।) २—श्रीमद्भगवद्गीता रामानुजभाष्य—[ हिन्दी-अनुवादसहित ] आकार डिमाई आठपेजी, पृष्ठ-सं० ६०८, तीन बहुरंगे चित्र, कपड़ेकी जिल्द, मूल्य २।।) इसमें भी शांकरभाष्यकी तरह ही श्लोक, श्लोकार्थ, मूल भाष्य तथा उसके सामने ही हिन्दी अर्थ दिया है । कई जगह टिप्पणी भी दी गयी है । ३—पातञ्जलयोगदर्शन—[ हिन्दी-व्याख्यासहित ] इसमें महर्षि पतञ्जलिकृत योगदर्शन सम्पूर्ण मूल, उसका शब्दार्थ एवं प्रत्येक सूत्रका दूसरे सूत्रसे सम्बन्ध दिखाते हुए उन सूत्रों- की सरल भाषामें व्याख्या की गयी है । अकारादि-क्रमसे सूत्रोंकी वर्णानुक्रमणिका भी दी गयी है । आकार २०×३०–१६ पेजी, पृष्ठ १७६, मूल्य ।।I), सजिल्द १) पता—गीताप्रेस, पो० गीताप्रेस ( गोरखपुर ) सूचीपत्र मुफ्त मँगवाइये ।

श्रीमद्बादरायणप्रणीतब्रह्मसूत्राणां वर्णानुक्रमणिका अ० पा० सू० अ. अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा चापि दाशकितवादित्वमधीयत एके २ ३ ४३ अकरणत्वाच्च न दोषस्तथा हि दर्शयति ... २ ४ ११ अक्षरधियां त्ववरोधः सामान्य- तद्भावाभ्यामौपसदवत्तदुक्तम् ३ ३ ३३ अक्षरमम्बरान्तधृतेः ... १ ३ १० अग्निहोत्रादि तु तत्कार्यायैव तद्दर्शनात् ... ४ १ १६ अग्न्यादिगतिश्रुतेरिति चेन्न भाक्तत्वात् ... ३ १ ४ अङ्गावबद्धास्तु न शाखासु हि प्रतिवेदम् ... ३ ३ ५५ अङ्गत्वानुपपत्तेश्च ... २ २ ८ अङ्गेषु यथाश्रयभावः ... ३ ३ ६१ अचलत्वं चापेक्ष्य ... ४ १ ९ अणवश्च ... २ ४ ७ अणुश्च ... २ ४ १३ अत एव च नित्यत्वम् ... १ ३ २९ अत एव च सर्वाण्यनु ... ४ २ २ अत एव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षा ३ ४ २५ अत एव चानन्याधिपतिः ४ ४ ९ अत एव चोपमा सूर्यकादिवत् ३ २ १८ अत एव न देवता भूत च ... १ २ २७ अत एव प्राणः ... १ १ २३ अतः प्रबोधोऽस्मात् ... ३ २ ८ अतश्चायनेऽपि दक्षिणे ... ४ २ २० अतस्त्वितरज्ज्यायो लिङ्गाच्च ३ ४ ३९ अतिदेशाच्च ... ३ ३ ४६ अतोऽनन्तेन तथा हि लिङ्गम् ३ २ २६ अतोऽन्यापि ह्येकेषामुभयोः ... ४ १ १७ अत्ता चराचरग्रहणात् ... १ २ ९ वे० द० २५— अ० पा० सू० अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ... १ १ १ अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः ... १ २ २१ अदृष्टानियमात् ... २ ३ ५१ अधिकं तु भेदनिर्देशात् ... २ १ २२ अधिकोपदेशात्तु बादरायणस्यैवं तद्दर्शनात् ... ३ ४ ८ अधिष्ठानानुपपत्तेश्च ... २ २ ३९ अध्ययनमात्रवतः ... ३ ४ १२ अनभिभवं च दर्शयति ... ३ ४ ३५ अनवस्थितेरसंभवाच्च नेतरः ... १ २ १७ अनारब्धकार्ये एव तु पूर्वे तदवधेः ... ४ १ १५ अनाविष्कुर्वन्नन्वयात् ... ३ ४ ५० अनावृत्तिः शब्दादनावृत्तिः शब्दात् ... ४ ४ २२ अनियमः सर्वेषामविरोधः शब्दानुमानाभ्याम् ... ३ ३ ३१ अनिष्टादिकारिणामपि च श्रुतम् ३ १ १२ अनुकृतेस्तस्य च ... १ ३ २२ अनुज्ञापरिहारौ देहसंबन्धाज्ज्यो- तिरादिवत् ... २ ३ ४८ अनुपपत्तेस्तु न शारीरः ... १ २ ३ अनुबन्धादिभ्यः प्रज्ञान्तरपृथ- क्त्ववद्दृष्टश्च तदुक्तम् ... ३ ३ ५० अनुष्ठेयं बादरायणः साम्यश्रुतेः ३ ४ १९ अनुस्मृतेर्बादरिः ... १ २ ३० अनुस्मृतेश्च ... २ २ २५ अनेन सर्वगतत्वमायामशब्दा- दिभ्यः ... ३ २ ३७ अन्तर उपपत्तेः ... १ २ १३ अन्तरा चापि तु तद्दृष्टेः ३ ४ ३६ अन्तरा भूतग्रामवत्स्वात्मनः १ ३ ३५

( २ ) अ० पा० सू० अ० पा० सू० अन्तरा विज्ञानमनसी क्रमेण अबाधाच्च ... ... ३ ४ २९ तल्लिङ्गादिति चेन्नाविशेषात् २ ३ १५ अभावं बादरिराह ह्येवम् ... ४ ४ १० अन्तर्याम्यधिदैवादिषु तद्धर्मव्य- अभिध्योपदेशाच्च ... १ ४ २४ पदेशात् ... ... १ २ १८ अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषा- अन्तवत्त्वमसर्वज्ञता वा ... २ २ ४१ नुगतिभ्याम् ... २ १ ५ अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ... १ १ २० अभिव्यक्तिरित्याश्मरथ्यः ... १ २ २९ अन्त्यावस्थितेश्चोभयनित्यत्वाद- अभिसन्ध्यादिष्वपि चैवम् ... २ ३ ५२ विशेषः ... ... २ २ ३६ अभ्युपगमेऽप्यर्थाभावात् ... २ २ ६ अन्यत्राभावाच्च न तृणादिवत् २ २ ५ अम्बुवदग्रहणात्तु न तथात्वम् ३ २ १९ अन्यथात्वं शब्दादिति चेन्ना- अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात् ३ २ १४ विशेषात् ... ... ३ ३ ६ अर्चिरादिना तत्प्रथितेः ... ४ ३ १ अन्यानुमितौ च ज्ञशक्तिवि- अर्भकौकस्त्वात्तद्व्यपदेशाच्च नेति योगात् ... ... २ २ ९ चेन्न निचाय्यत्वादेवं व्योमवच्च १ २ ७ अन्यथा भेदानुपपत्तिरिति चेन्नो- अल्पश्रुतेरिति चेत्तदुक्तम् ... १ ३ २१ पदेशान्तरवत् ... ... ३ ३ ३६ अवस्थितिवैशेष्यादिति चेन्ना- अन्यभावव्यावृत्तेश्च ... १ ३ १२ द्ध्युपगमाद्धि हि ... २ ३ २४ अन्याधिष्ठितेषु पूर्ववदभिलापात् ३ १ २४ अवस्थितेरिति काशकृत्स्नः ... १ ४ २२ अन्यार्थे तु जैमिनिः प्रश्नव्या- अविभागेन दृष्टत्वात् ... ४ ४ ४ ख्यानाभ्यामपि चैवमेके ... १ ४ १८ अविभागो वचनात् ... ४ २ १६ अन्यार्थश्च परामर्शः ... १ ३ २० अविरोधश्चन्दनवत् ... २ ३ २३ अन्वयादिति चेत्स्यादवधारणात् ३ ३ १७ अशुद्धमिति चेन्न शब्दात् ... ३ १ २५ अपरिग्रहाच्चात्यन्तमनपेक्षा ... २ २ १७ अश्मादिवच्च तदनुपपत्तिः ... २ १ २३ अपि च सप्त ... ... ३ १ १५ अश्रुतत्वादिति चेन्नेष्टादिकारिणां अपि च स्मर्यते ... १ ३ २३ प्रतीतेः ... ... ३ १ ६ अपि च स्मर्यते ... २ ३ ४५ असति प्रतिज्ञोपरोधो यौगपद्य- अपि च स्मर्यते ... ३ ४ ३० मन्यथा ... ... २ २ २१ अपि च स्मर्यते ... ३ ४ ३७ असदिति चेन्न प्रतिषेधमात्रत्वात् २ १ ७ अपि चैवमेके ... ३ २ १३ असद्व्यपदेशान्नेति चेन्न धर्मान्त- अपिसंराधने प्रत्यक्षानुमाना- रेण वाक्यशेषात् ... २ १ १७ भ्याम् ... ... ३ २ २४ असंततेश्चाव्यतिकरः ... २ ३ ४९ अपीतौ तद्वत् प्रसङ्गादसमञ्जसम् २ १ ८ असंभवस्तु सतोऽनुपपत्तेः ... २ ३ ९ अप्रतीकालम्बनानयतीति बाद- असार्वत्रिकी ... ... ३ ४ १० रायण उभयथाऽदोषात् अस्ति तु ... ... २ ३ २ तत्क्रतुश्च ... ... ४ ३ १५ अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति १ १ १९

( ३ ) अ० पा० सू० अ० पा० सू० अन्त्यं चोपपत्तेरेष उपमा ॰॰ ४ २ ११ इ. आ. इतरपरामर्शात्स इति चेन्ना- आकाशस्तल्लिङ्गात् ॰॰॰ १ १ २२ संभवात् ॰॰॰ ॰॰॰ १ ३ १८ आकाशे चाविशेषात् ॰॰॰ २ २ २४ इतरव्यपदेशाद्धिताकरणादि- आकाशोऽर्थान्तरत्वादिव्यपदे- दोषप्रसक्तिः ॰॰॰ ॰॰॰ २ १ २१ शात् ॰॰॰ ॰॰॰ १ ३ ४१ इतरस्याप्येवमसंश्लेषः पाते तु ४ १ १४ आचारदर्शनात् ॰॰॰ ॰॰॰ ३ ४ ३ इतरेतरप्रत्ययत्वादिति चेन्नो- आतिवाहिकास्तल्लिङ्गात् ॰॰॰ ४ ३ ४ त्पत्तिमात्रनिमित्तत्वात् ॰॰॰ २ २ १९ आत्मकृतेः परिणामात् ॰॰॰ १ ४ २६ इतरे त्वर्थसामान्यात् ॰॰॰ ३ ३ १२ आत्मगृहीतिरितरवदुत्तरात् ॰॰॰ ३ ३ १६ इतरेषां चानुपलब्धेः ॰॰॰ २ १ २ आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि ॰॰ २ १ २८ इयदामननात् ॰॰॰ ॰॰॰ ३ ३ ३४ आत्मशब्दाच्च ॰॰॰ ३ ३ १५ ई. आत्मा प्रकरणात् ॰॰॰ ४ ४ ३ ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् सः ॰॰॰ १ ३ १३ आत्मेति तूपगच्छन्ति ग्राह- ईक्षतेर्नाशब्दम् ॰॰॰ ॰॰॰ १ १ ५ यन्ति च ॰॰॰ ॰॰॰ ४ १ ३ उ. आदरादलोपः ॰॰॰ ॰॰॰ ३ ३ ४० उत्क्रमिष्यत एवंभावादित्यौ- आदित्यादिमतयश्चाङ्ग उपपत्तेः ४ १ ६ डुलोमिः ॰॰॰ ॰॰॰ १ ४ २१ आख्यानाय प्रयोजनाभावात् ॰॰ ३ ३ २४ उत्क्रान्तिगत्यागतीनाम् ॰॰॰ २ ३ १९ आनन्दमयोऽभ्यासात् ॰॰॰ १ १ १२ उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु ॰॰॰ १ ३ १९ आनन्दादयः प्रधानस्य ॰॰॰ ३ ३ ११ उत्तरोत्पादे च पूर्वनिरोधात् ॰॰॰ २ २ २० आनर्थक्यमिति चेन्न तदपेक्षत्वात् ३ १ १० उत्पत्त्यसंभवात् ॰॰॰ ॰॰॰ २ २ ४२ आनुमानिकमप्येकेषामिति चेन्न उदासीनानामपि चैवं सिद्धिः २ २ २७ शरीरूपकविन्यस्तगृहीतैर्दर्श- उपदेशभेदान्नेति चेन्नोभयस्मि- यति च ॰॰॰ ॰॰॰ १ ४ १ न्नप्यविरोधात् ॰॰॰ ॰॰॰ १ १ २७ आपः ॰॰॰ ॰॰॰ २ ३ ११ उपपत्तेश्च ॰॰॰ ॰॰॰ ३ २ ३५ आ प्रायणात्तत्रापि हि दृष्टम् ॰॰ ४ १ १२ उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च ॰॰ २ १ ३६ आभासएव च ॰॰॰ २ ३ ५० उपपन्नस्तल्लक्षणार्थोपलब्धे- आमनन्ति चैनमस्मिन् ॰॰॰ १ २ ३२ र्लोकवत् ॰॰॰ ॰॰॰ ३ ३ ३० आर्त्विज्यमित्यौडुलोमिस्तस्मै हि उपपूर्वमपि त्वेके भावमशन- परिक्रीयते ॰॰॰ ३ ४ ४५ वत्तदुक्तम् ॰॰॰ ॰॰॰ ३ ४ ४२ आवृत्तिरसकृदुपदेशात् ॰॰॰॰ ४ १ १ उपमर्दे च ॰॰॰ ॰॰॰ ३ ४ २६ आसीनः संभवात् ॰॰॰ ४ १ ७ उपलब्धिवदनियमः ॰॰॰ २ ३ ३७ आह च तन्मात्रम् ॰॰॰ ३ २ १६ उपसंहारदर्शनान्नेति चेन्न क्षीरवद्धि ॰॰॰ २ १ २४

( ४ ) अ० पा० सू० उपसंहारोऽर्थाभेदाद्विधिशेष- वत्समाने च ... ३ ३ ५ उपस्थितेऽतस्तद्वचनात् ... ३ ३ ४१ उपादानात् ... २ ३ ३५ उभयथा च दोषात् ... २ २ १६ उभयथा च दोषात् ... २ २ २३ उभयथापि न कर्मातस्तदभावः २ २ १२ उभयव्यपदेशात्त्वहिकुण्डलवत् ३ २ २७ उभयव्यामोहात्तत्सिद्धेः ... ४ ३ ५ ऊ. ऊर्ध्वरेतःसु च शब्दे हि ... ३ ४ १७ ए. एक आत्मनः शरीरे भावात् ... ३ ३ ५३ एतेन मातरिश्वा व्याख्यातः ... २ ३ ८ एतेन योगः प्रत्युक्तः ... २ १ ३ एतेन शिष्टापरिग्रहा अपि व्याख्याताः ... ... २ १ १२ एतेन सर्वे व्याख्याता व्याख्याताः ... ... १ ४ २८ एवं चात्माकात्स्न्र्यम् ... २ १ ३४ एवं मुक्तिफलानियमस्तदवस्था- वधृतेस्तदवस्थावधृतेः ... ३ ४ ५२ एवमप्युपन्यासात्पूर्वभावाद- विरोधं बादरायणः ... ४ ४ ७ ऐ. ऐहिकमप्यप्रस्तुतप्रतिबन्धे तद्- र्शनात् ... ... ३ ४ ५१ क. कम्पनात् ... १ ३ ३९ करणवच्चेन्न भोगादिभ्यः ... २ २ ४० कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात् ... २ ३ ३३ कर्मकर्तृव्यपदेशाच्च ... १ २ ४ कल्पनोपदेशाच्च मध्वादिषद- विरोधः ... ... १ ४ १० अ० पा० सू० कामकारेण चैके ... ... ३ ४ १५ कामाच्च नानुमानापेक्षा ... १ १ १८ कामाद्यैतरत्र तत्र चायतना- दिभ्यः ... ३ ३ ३९ काम्यास्तु यथाकामं समुच्चीये- रन्न वा पूर्वहेत्वभावात् ३ ३ ६० कारणत्वेन चाकाशादिषु यथा- व्यपदिष्टोक्तेः ... १ ४ १४ कार्ये बादरिरस्य गत्युपपत्तेः ... ४ ३ ७ कार्याख्यानादपूर्वम् ... ३ ३ १८ कार्यात्यये तदध्यक्षेण सहातः परमभिधानात् ... ... ४ ३ १० कृतप्रयत्नापेक्षस्तु विहितप्रति- षिद्धावैय्यर्थ्यादिभ्यः ... २ ३ ४१ कृतात्ययेऽनुशयवान्दृष्टस्मृतिभ्यां ययेतमनेवं च ... ३ १ ८ कृत्स्नभावात्तु गृहिणोपसंहारः ... ३ ४ ४८ कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्द- कोपो वा ... ... २ १ २६ क्षणिकत्वाच्च ... ... २ २ ३१ क्षत्रियत्वंगतेश्चोत्तरत्र चैत्ररथेन लिङ्गात् ... ... १ ३ ३५ ग. गतिशब्दाभ्यां तथा हि दृष्टं लिङ्गं च ... ... १ ३ १५ गतिसामान्यात् ... ... १ १ १० गतेरर्थवत्त्वमुभयथान्यथा हि विरोधः ... ... ३ ३ २९ गुणसाधारण्यश्रुतेश्च ... ३ ३ ६४ गुणाद्वा लोकवत् ... २ ३ २५ गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि तद्दर्शनात् ... ... १ २ ११ गौणश्चेन्नात्मशब्दात् ... १ १ ६