चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ४ ] निदानस्थानम् ४५३
अ० ४ ] निदानस्थानम् ४५३
हरिद्रोदकसंकाशं कटुकं यः प्रमेहति ।
पित्तस्य परिकोपात्तु विद्याद्वारिद्रमेहितम् ॥ ३१ ॥
इत्येते षट्प्रमेहाः पित्तप्रकोपनिमित्ता व्याख्याता भवन्ति ॥ ३२ ॥
(१) क्षारमेह-जो मनुष्य पित्तप्रकोप के कारण क्षार के समान गन्ध, वर्ण
रस और स्पर्शवाला मूत्र करता है वह क्षारमेह का रोगी होता है ।
(२) कालमेह-जो मनुष्य पित्तप्रकोप के कारण स्याही के समान काला
एवं गरम मूत्र बार-बार करता हो उसको कालमेह का रोगी जानना चाहिये ।
(३) नीलमेह-जो मनुष्य पित्तप्रकोप के कारण चाष (नीलकण्ठ) पक्षी
के पंख के समान नीले रंग का एवं अम्ल मूत्र त्याग करता है, उसे 'नीलमेह'
का रोगी समझना चाहिये ।
(४) रक्तमेह-जो मनुष्य पित्तप्रकोप के कारण दुर्गन्धयुक्त, नमकीन, गरम
एवं लाल रंग का मूत्र त्याग करता है, उसको रक्तमेह का रोगी समझना चाहिये ।
(५) मंजिष्ठामेह-जो मनुष्य पित्तप्रकोप के कारण मंजीठ के समान या ताम्बे
के रंगवाला, दुर्गन्धयुक्त, मात्रा में बहुत, बार-बार मूत्र त्याग करता है,
उसको मंजिष्ठामेह का रोगी समझना चाहिये ।
(६) हारिद्रमेह-जो मनुष्य पित्तप्रकोप के कारण हल्दी के पानी के
समान पीला, एवं कडुवा मूत्र त्याग करता है, उसको हारिद्रमेह का रोगी समझना
चाहिये । इस प्रकार से पित्तप्रकोप के कारण होनेवाले छः प्रमेहों का वर्णन-
कर दिया ॥२६-३२॥
रूक्ष-कटु-कषाय-तिक्त-लघु-शीत-व्यवाय-व्यायाम-वमन-विरेचना-
स्थापनशिरोविरेचनातियोग-संधारणानशनाभिघातातपोद्वेग-शोक-शोणि-
तातिसेक-जागरण-विषम-शरीरन्यासानुपसेवमानस्य तथात्मकशरीरस्यव
क्षिप्रं वायुः प्रकोपमापद्यते । स प्रकुपितस्तथात्मके शरीरे विसर्पन् यदा
वसामादाय मूत्रवहानि स्रोतांसि प्रतिपद्यते, तदा वसामेहमभिनिर्वर्तयति
यदा पुनर्मज्जानं मूत्रबस्तावार्कर्षति, तदा मज्जमेहमभिनिर्वर्तयति; यदा
लसीकां मूत्राशयेऽभिवहन्मूत्रमनुबन्धं च्योतयति लसीकाविबहुत्वाद्वि-
क्षेपणाच्च वायोः खल्वस्यातिमूत्रप्रवृत्तिसङ्गं करोति, तदा स मत्त इव
गजः क्षरत्यजस्रं मूत्रमवेगं, तं हस्तिमेहिनमाचक्षते; ओजः पुनर्मधुर-
स्वभावं, तद्यदा रौक्ष्याद्वायोः कषायत्वेनाभिसंसृज्य मूत्राशयेऽभिवहति
। मधुमेहं करोति ॥ ३३ ॥
तानिमांश्चतुरः प्रमेहान् वातजानसाध्यानाचक्षते भिषजः, महात्य-
यत्वाद्विरुद्धोपक्रमत्वाच्च । तेषामपि च पूर्ववद् गुणविशेषेण नामवि-
४४४ चरकसंहिता [ अ० ४
शेषा भवन्ति । तद्यथा—वसामेहश्च, मज्जमेहश्च, हस्तिमेहश्च, मधुमे-
हश्चेति ॥ ३४ ॥
वातजमेह के कारण—रूक्ष, कटु, कषाय, तिक्त, लघु,शीत पदार्थों के उप-
योग से स्त्रीसंग, व्यायाम, वमन, विरेचन, बस्तिकर्म और शिरोविरेचन इनके
अतियोग से, वेगों को रोकना, अनशन ( उपवास ), चोट लगने से, धूप, शोक,
उद्वेग, रक्त के अधिक निकलनेसे, जागने मे, शरीर को विषम अवस्था
में रखने से, वातप्रकृतिवाले पुरुष में वायु तत्काल प्रकुपित हो जाता है ।
( १ ) वसाप्रमेह की सम्प्राप्ति—इन कारणों से कुपित वायु, वात प्रकृति
वाले मनुष्य के शरीर में फैलता हुआ जब वसा के साथ मिलकर मूत्रवह स्रोतों-
में पहुंच जाता है, तब वसामेह को उत्पन्न करता है ।
( २ ) मजमेह—और जब वायु मज्जा को मूत्रबस्ति में खींचकर ले जाताहै
उस समय 'मज्जमेह' उत्पन्न होता है ।
( ३ ) हस्तिमेह—जिस समय वायु लसीका १ से मिल कर मूत्राशय में
जाकर मूत्र रूप से बाहर निकलता है, उस समय लसीका की अधिकता एवं
वायु की विक्षेपण शक्ति के कारण मूत्र बहुत अधिक मात्रा में आता है । तब
पुरुष मस्त हाथी के समान निरन्तर वेग से रहित मूत्र बहाया करता है, इसको
'हस्तिमेह' कहते हैं ।
( ४ ) मधुमेह—शरीर में स्थित ओज का स्वभाव मधुर है । इस के साथ
वायु का रूक्ष एवं कषाय गुण ( वायु अपनी शक्ति से ओज को कषाय में
बदल देता है ) मिलकर जब मूत्राशय में जाता है, तब 'मधुमेह' रोग उत्पन्न
होता है ।
सब वातजमेह असाध्य—वैद्य लोग इन चार वातजन्य प्रमेहों को असाध्य
मानते हैं। क्योंकि मज्जा आदि सार रूप धातुओं का क्षय हो जाता है और
चिकित्सा विपरीत पड़ती है, क्योंकि वायु के लिये स्निग्ध आदि पदार्थ पथ्य हैं,
यही मेद के लिये अपथ्य और जो रूक्ष आदि मेद के लिये पथ्य हैं वह वायु के
लिये अपथ्य हैं । इनके भी नाम पूर्व की भाँति गुणविशेष को लेकर हैं ।
यथा—१. वसामेह, २. मज्जमेह, ३. हस्तिमेह और ४. मधुमेह ॥ ३१-३४ ॥
तत्र श्लोका वातप्रमेहविशेषविज्ञानार्था भवन्ति—
वातप्रमेहों को विशेष रूप से कहने के लिये ये निम्नलिखित श्लोक हैं—
१ लसीका का अर्थ मांस की त्वचा के अन्दर रहने वाले जलीय भाग
जैसा कहेंगे—'षण्मांसत्वगन्तरे उदकं तल्लसीकाशब्दं लभते ।'
अ० ४ ] निदानस्थानम् ४४५
अ० ४ ] निदानस्थानम् ४४५
वसासमिश्रं वसाभं च मुहुर्मेहति यो नरः ।
वसामेहिनमाहुस्तमसाध्यं वातकोषतः ॥ ३५ ॥
मज्जानं सह मूत्रेण मुहुर्मेहति यो नरः
मज्जमेहिनमाहुस्तमसाध्यं वातकोपतः ॥ ३६ ॥
हस्ती मत्त इवाजस्रं मूत्रं क्षरति यो भृशम् ।
हस्तिमेहिनमाहुस्तमसाध्यं वातकोपतः ॥ ३७ ॥
कषायमधुरं पाण्डुं रूक्षं मेहति यो नरः ।
वातकोपादसाध्यं तं प्रतीयान्मधुमेहिनम् ॥ ३८ ॥
इत्येते चत्वारः प्रमेहा वातप्रकोपनिमित्ता व्याख्याता भवन्ति ॥ ३९ ॥
(१) वसामेह—जो मनुष्य वात के प्रकोप के कारण वसामिश्रित या
वसा के समान रंगवाला मूत्र बार-बार करता है, उसको वसामेह का रोगी
जानना चाहिये, यह रोग असाध्य है।
(२) मज्जमेह—जो मनुष्य वायु के प्रकोप से मजा से युक्त मूत्र बारबार
त्याग करता हो, उसको मज्जमेह का रोगी जानना चाहिये । यह भी रोग
असाध्य है।
(३) हस्तिमेह—जो मनुष्य वायु के प्रकोप से मस्त हाथी की भांति एक
समान मूत्र, निरन्तर और बहुत अधिक करता है, उसको हस्तिमेह का रोगी
कहते हैं, यह भी असाध्य है।
(४) मधुमेह—जो मनुष्य वायु के प्रकोप से कषाय, मधुर, पाण्डुवर्ण
और रूक्ष मूत्र त्याग करता है उसको मधुमेह का रोगी जानना चाहिये। यह भी
असाध्य है। ये चार प्रमेह वायु के प्रकोप के कारण होते हैं ॥ ३५-३९ ॥
त एवं त्रिदोषप्रकोपनिमित्ता विंशतिः प्र ॓हा व्याख्याता भवन्ति ४०
इस प्रकार से तीनो दोषो से उत्पन्न होने वाले सम्पूर्ण बीस प्रकार के
प्रमेहो का वर्णन कर दिया है ॥ ४० ॥
त्रयस्तु दोषाः प्रकुपिताः प्रमेहानभिनिर्वर्तयिष्यन्त इमानि पूर्व-
रूपाणि दर्शयन्ति । तद्यथा—जटिलीभावं केशेषु, माधुर्यमास्ये, करपा-
दयोः सुप्ततादाहौ, मुखतालुकण्ठशोषं, पिपासां, आलस्यं, मलं च काये,
कायच्छिद्रेषूपदेहं, परिदाहं, सुप्ततां चाङ्गेषु, षट्पद-पिपीलिकाभिश्च
शरीरमूत्राभिसरणं, मूत्रे च मूत्रदोषान्, विस्रं शरीरगन्धं, तन्द्रां च
॓र्छादमिति ॥ ४१ ॥
। का पूर्वरूप—तीनों दोष कुपित होकर प्रमेह रोग को उत्पन्न करते
समय ये पूर्वरूप दिखाई देते हैं। यथा—बालों का उलझ जाना,
४४६ चरकसंहिता [ अ० ४
मुख में मिठास, हाथ-पांव में शून्यता और जलन, मुख, तालु और कण्ठ
में शुष्कता, प्यास का लगना, आलस्य, कार्य करने में अनिच्छा, शरीर में
मल का जमना, शरीर के रोम-छिद्रों का बन्द हो जाना, अंगों में जलन एवं
शून्यता, शरीर या मूत्र पर भौंरों या चिउंटी का चढ़ना, मूत्र में मूत्र के दोष
शरीर से दुर्गन्ध आना, तथा हर समय आंखों में नींद या तन्द्रा ( भारीपन )
रहता है ॥ ४१ ॥
उपद्रवास्तु खलु प्रमेहिणां—तृष्णातीसार-ज्वर-दाह-दौर्बल्यारोच-
काविपाकाः पूति-मांस-पिडकाऽलजी-विद्रध्यादयश्च तत्प्रसंगाद्भवन्ति॥४२॥
तत्र साध्यान् प्रमेहान् संशोधनोपशमनैर्यथार्हमुपपाद्यैश्चि-
कित्सेदिति ॥ ४३ ॥
प्रमेह के उपद्रव—प्रमेह के रोगियों में ये उपद्रव उत्पन्न होते हैं । यथा-
तृष्णा, प्यास, अतिसार, ज्वर, दाह, दुर्बलता, अरुचि, अविपाक, अपचन,
मांस में दुर्गन्धयुक्त पिड़कायें, अलजी, विद्रधि आदि ये सब उपद्रव प्रमेह के
कारण होते हैं ।
चिकित्सा—इन सब प्रमेहो में जो प्रमेह साध्य हों, उनकी यथायोग्य रीति
से संशोधन या सशमनविधि से चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ४२-४३ ॥
भवन्ति चात्र—गृद्धमभ्यवहार्येषु स्नानचङ्क्रमणद्विषम् ।
प्रमेहः क्षिप्रमभ्येति नीडद्रुममिवाण्डजः ॥ ४४ ॥
मन्दोत्साहमतिस्थूलमतिस्निग्धं महाशनम् ।
मृत्युः प्रमेहरूपेण क्षिप्रमादाय गच्छति ॥ ४५ ॥
यस्त्वाहारं शरीरस्य धातुसाम्यकरं नरः ।
सेवते विविधांश्चान्याश्चेष्टाः स सुखमश्नुते ॥ ४६ ॥
प्रमेह किसको होता है—घोंसले की ओर जिस प्रकार पक्षी जल्दी पहुंच
जाता है, उसी प्रकार खाने-पीने के लालची, स्नान एवं चलने-फिरने से
द्वेष करने वाले पुरुष को प्रमेह बहुत शीघ्र लग जाता है । मन्द उत्साहवाले
निरुत्साही, अतिस्थूल, अत्यन्त स्निग्ध शरीर वाले एवं बहुत खाने वाले पुरुष
को मृत्यु प्रमेह रूप लेकर चली आती है । जो मनुष्य शरीर के धातुओं को
समान करने वाले आहार तथा अन्य प्रकार की चेष्टाओं ( विहार ) का सेवन
करता है, वह सुख भोगता है ॥ ४४-४६ ॥
तत्र श्लोकाः—हेतुर्व्याधिविशेषाणां प्रमेहाणां च कारणम् ।
दोषधातुसमायोगो रूपं विविधमेव च ॥ ४७ ॥
अ० ५ ] निदानस्थानम् ४६३
अ० ५ ] निदानस्थानम् ४६३
दशश्लेष्मकृता यस्मात्प्रमेहाः षट् च पित्तजाः ।
यथा करोति वायुश्च प्रमेहांश्चतुरो बली ॥ ४८ ॥
साध्यासाध्यविशेषाश्च पूर्वरूपाण्युपद्रवाः ।
प्रमेहाणां निदानेऽस्मिन् क्रियासूत्रं च भाषितम् ॥ ४६ ॥
इस प्रमेह-अध्याय में हेतु, व्याधि, प्रमेहों के कारण, दोष एवं दूष्य का
वर्णन, इनके नाना रूप, दस प्रकार कफजन्य, छः प्रकार के पित्तजन्य और
चार प्रकार के वातजन्य प्रमेह, उनके साध्य-असाध्य भेद, प्रमेहों के पूर्वरूप,
उपद्रव और क्रियासूत्र ये सब विषय कह दिये हैं ॥ ४७-४१ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने प्रमेह-
निदानं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
पञ्चमोऽध्यायः
अथातः कुष्ठनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे कुष्ठनिदान का व्याख्यान करते हैं । जैसा कि भगवान्
आत्रेय ने कहा था ॥२।
सप्त द्रव्याणि कुष्ठानां प्रकृति-विकृतिमापन्नानि भवन्ति । तद्यथा—
त्रयो दोषा वातपित्तश्लेष्माणः प्रकोपणविकृताः । दूष्याश्च शरीरधात-
वस्त्वङ्-मांस-शोणित-लसीकाश्चतुर्धा दोषोपघातविकृताः; इत्येतत्सप्तानां
सप्तधातुकमेकंगत्वमाजननं कुष्ठानाम्, अतः प्रभावण्यभिनिर्वर्तमानानि
केवलं शरीरमुपतपन्ति ॥ ३ ॥
शरीर के अन्दर सात द्रव्य विकृत होकर कुष्ठ रोग के कारण बनते हैं ।
यथा—प्रकोपकारक पदार्थों के संयोग से वात, पित्त और कफ ये तीन दोष
विकृत होकर, त्वचा, मांस, रक्त और लसीका इन चार दूष्य ( धातु तथा उप-
धातुओं ) को अपने संसर्ग से विकृत करते हैं । इस प्रकार से ये सात द्रव्य
विकृत होकर कुष्ठ रोग को उत्पन्न करते हैं । १ इन सातों धातुओं से उत्पन्न
१. वीसर्प और कुष्ठ रोग में दोष और दूष्य एक समान ही हैं ।' इस
समानता पर भी वीसर्प फैलाने वाला तथा रक्त का प्रधान दोष इसमें रहता है ।
अकेकी और सब चिकित्साओं के समान है। रक्तजन्य
कण्डू, पूय, त्वक्-शून्यता, पसीने का न आना होता है जो वीसर्प में
वर्ण-संस्थान-प्रभाव-नाम-चिकित्सित-विशेषः ॥ ४ ॥
५४८ चरकसंहिता [ अ० ५
कुष्ठ सात धातुओं में अपना प्रभाव प्रकट करता हुआ सम्पूर्ण शरीर को
पीड़ित करता है ॥ ३॥
न च किंचिदस्ति कुष्ठमेकदोषप्रकोपनिमित्तं, अस्ति तु खलु समान-
प्रकृतीनामपि समानां कुष्ठानां दोषांशांश-विकल्प-स्थान-विभागेन वेदना-
वर्ण-संस्थान-प्रभाव-नाम-चिकित्सित-विशेषः ॥ ४ ॥
कोई भी कुष्ठ एक दोष के प्रकोप से उत्पन्न नहीं होता । सातों प्रकार
के कुष्ठों में प्रकृति के समान होने पर दोष, अंश, बल, विकल्प तथा
स्थान भेद से, वेदना, १ रंग, स्थिति, प्रभाव एवं नाम से चिकित्सा में भेद
आजाता है ॥ ४ ॥
स सप्तविधोऽष्टादशविधोऽपरिसंख्येयविधो वा भवति । दोषा
हि विकल्पैर्विकल्प्यमाना विकल्पयन्ति विकारान्, अन्यत्रासाध्यभा-
वात्; तेषां विकल्प-विकार-संख्यानेऽतिप्रसंगमभिसमीक्ष्य सप्तविधमेव
कुष्ठविशेषमुपदेक्ष्यामः ॥ ५ ॥
इस प्रकार से कुष्ठ सात प्रकार का, अठारह प्रकार का अथवा असंख्य
प्रकार का हो जाता है ।
कुष्ठ के सात भेद—दोष अनेक प्रकार की विकल्पनाओं के कारण
भिन्न होते हुए नाना प्रकार से नाना रोग उत्पन्न कर देते हैं । अर्थात्
व्याधि, करण और दोष इनके भेद से कार्यरूप व्याधि के भी बहुत से भेद
हो जाते हैं । इसलिये दोषभेद से उत्पन्न भेदों को असाध्य भेद में नहीं गिना
जाता । अतः इन कुष्ठों के भेदों की गणना को बहुत विस्तृत जान कर यहां
पर केवल सात प्रकार के कुष्ठों का उपदेश करेंगे ॥५॥
इह वातादिषु त्रिषु प्रकुपितेषु त्वगादींश्चतुरः प्रदूषयत्सु वातेऽ-
धिकतरे कापालकुष्ठमभिनिर्वर्तते, पित्ते त्वौदुम्बरं, श्लेष्मणि मण्डल-
कुष्ठं, वातपित्तयोर्ऋष्यजिह्वं, पित्तश्लेष्मणोः पुण्डरीकं, श्लेष्ममारुतयोः
सिध्म, सर्वदोषाभिवृद्धौ काकणकमभिनिर्वर्तते; इत्येवमेष सप्तविधः
कुष्ठविशेषो भवति ॥ ६ ॥
स चैष भूयस्तरमतः प्रकृतौ विकल्पमानायां भूयसीं विकारवि-
कल्पसंख्यामापद्यते ॥ ७ ॥
१. वेदनाविशेष—कापालं तोदबहुलम् । वर्णविशेष—काकणन्तिकावर्णम्
संस्थान—ऋष्यजिह्वासंस्थानम् । प्रभाव—साध्यताऽसाध्यतादि । नामविधे-
कापालः, —ये उदाहरण हैं ।
अ० ५] २६ निदानस्थानम् ४४९
अ० ५] २६ निदानस्थानम् ४४९
वातादि दोष के अनुसार कुष्ठ—वात आदि तीनों दोष प्रकुपित होकर
जब त्वचा, मांस, रक्त और लसीका इन चारों को दूषित करते हैं, तब कुष्ठ-
रोग उत्पन्न होता है । इनमें वात की अधिकता से कापालकुष्ठ, पित्त की
अधिकता से औदुम्बर-कुष्ठ, कफ की अधिकता से मण्डल-कुष्ठ, वात-पित्त की
अधिकता से ऋष्यजिह्व-कुष्ठ, पित्त-कफ की अधिकता से पुण्डरीक-कुष्ठ, कफ-
वायु की अधिकता से सिध्म-कुष्ठ होता है और सब दोषो की वृद्धि होने से
काकणक-कुष्ठ उत्पन्न होता है । इस प्रकार से सात कुष्ठ उत्पन्न होते हैं ।
यही सात प्रकार के कुष्ठ प्रकृति के तर-तम अर्थात् न्यूनाधिक भेद के
कारण नाना प्रकार के कुष्ठों के असंख्य भेद उत्पन्न कर देते हैं ॥७॥
तत्रे॒दं सर्वकुष्ठनिदानं समासेनोपदेक्ष्यामः । शीतोष्णव्यत्यासमननु-
पूर्व्योपसेवमानस्य तथा संतर्पणापतर्पणाभ्यवहार्यव्यत्यासं च, मधु-फा-
णित-मत्स्य-मूल-काकमाचीश्च सततमतिमात्रमप्यजीर्णेऽन्ने समश्नतश्चि-
लिचिमं च पयसा,हायनक-यवक-चीनकोद्दालक-कोरदूषप्रायाणि चान्नानि
क्षीर-दधि-तक्र-कोल-कुलत्थ-माषातसी-कुसुम्भ-परुष-स्नेहवन्ति, एतैरेवा-
तिमात्रं सुहितभक्षितस्य च व्यवाय-व्यायाम-संतापानत्युपसेवमानस्य,
अतिभयश्रमसंतापोपहतस्य च सहसा शीतोदकमवतरतो, विदग्धं
चाऽऽहारजातमनुल्लिख्य विदाहीन्यभ्यवहरतः, छर्दिं च प्रतिघ्नतः,
स्नेहांश्चातिचरतो युगपत् त्रयो दोषाः प्रकोपमापद्यन्ते, त्वगादयश्चत्वारः
शैथिल्यमापद्यन्ते, तेषु शिथिलेषु त्रयो दोषाः प्रकुपिताः स्थानमभिगम्य
संतिष्ठमानास्तानेव त्वगादीन् दूषयन्तः कुष्ठान्यभिनिर्वर्तयन्ति ॥ ८ ॥
कुष्ठ रोग के कारण—अब संक्षेप से सब कुष्ठों का निदान कहते हैं।
शीत और उष्ण के परिवर्त्तन से, शीत और उष्ण के परित्याग से (अर्थात्
उष्ण सेवन करके सहसा शीत सेवन या इसके विपरीत तथा अनुचित काल में
शीतोष्ण सेवन से ), संतर्पण एवं अतर्पण दोनों के उलट फेर से, मधु, फाणित
(राब), मछली, मूली, काकमाची (मकोय), इनके निरन्तर या अधिक मात्रा
में खाने से, अजीर्ण में भोजन करने से, दूध के साथ चिलचिम-मछली के
उपयोग से, हायनक, यवक, चीनक, उद्दालक, कोद्रव आदि कुधान्यों के बहुत
खाने से, दूध, दही, छाछ, बेर, कुलथी, उड़द, अलसी, धनिया, इनके तेल
में तैयार किये पदार्थों के अतिसेवन से, मैथुन, व्यायाम और सन्ताप के
करने से, भय, श्रम और सन्ताप से युक्त होने पर एकदम ठण्डे पानी
से (ठण्डी वायु के स्पर्श से भी), विदाहकारक पदार्थों का वमन
४५० चरकसंहिता [ अ० ५
न करके पुनः विदाहकारक पदार्थों के खाने से; वमन के वेग को रोकने से,
स्निग्ध पदार्थों के अति भोजन से, तीनों दोष एक साथ में कुपित होजाते हैं,
तथा त्वचा, रक्त, मांस और लसीका चारों धातु शिथिल होजाते हैं। इन
शिथिल हुए धातुओं में कुपित हुए दोष किसी एक भाग में स्थान पाकर घर
कर लेते हैं। वहां पर रहकर त्वचा आदि को दूषित बनाकर कुष्ठरोग उत्पन्न
करते हैं ॥८॥
तेषामिमानि खलु पूर्वरूपाणि । तद्यथा—अस्वेदनमतिस्वेदनं
पारुष्यमतिश्लक्ष्णता वैवर्ण्यं कण्डूर्निस्तोदः सुप्तता परिदाहः परिहर्षो
लोमहर्षः खरत्वमुष्णायनं गौरवं श्वयथुर्विसर्पागमनमभीक्ष्णं कायच्छि-
द्रेषूपदेहः पक-दग्ध-दष्ट-क्षतोपस्खलितेष्वतिमात्रं वेदना स्वल्पानामपि च
व्रणानां दुष्टिरसंरोहणं चेति कुष्ठपूर्वरूपाणि भवन्ति ॥ ६ ॥
कुष्ठरोग के पूर्वरूप ये हैं—जैसे पसीने का सर्वथा न आना या बहुत
पसीना आना, त्वचा में कर्कशता या कठोरता, अथवा बहुत चिकनापन, रंग
परिवर्तन, खाज, सुई चुभने की सी वेदना, स्पर्शज्ञान की शून्यता, जलन,
रोमांच, हर्ष, रूक्षता, उष्णता, भारीपन, सूजन, वीसर्प रोग का होना, शरीर
के छिद्रों में बार बार लेप सा होना, अवरोध, पकने या जलने या कटने या
चोट लगने या गिरने पर बहुत दर्द होना, थोड़े से व्रण का भी संक्रान्त होना
या शीघ्र न भरना, ये कुष्ठ के पूर्वरूप हैं ॥६॥
तेभ्योऽनन्तरं कुष्ठानि जायन्ते । तेषामिदं वेदना-वर्ण-संस्थान-
प्रभाव-नाम-विशेष-विज्ञानं भवति । तद्यथा—रूक्षारुणपरुषाणि विष-
मविस्तृतानि खरपर्यन्तानि तनुन्युद्गच्छद्बहिरस्तनूनि सुप्तसुप्तानि हृषितलो-
माचितानि निस्तोदबहुळान्यल्पकण्डू-दाह-पूय-लसीकान्याशुगतिसमु-
त्थानान्याशुभेदीनि जन्तुमन्ति कृष्णारुणकपालवर्णानि च कापालकुष्ठा-
नीति विद्यात् ॥ १० ॥
उनके पीछे कुष्ठ उत्पन्न होते हैं । इसके आगे इनके वेदना, वर्ण,
संस्थान, प्रभाव, नाम विशेष वर्णन करते हैं ।
कापाल-कुष्ठ—रूक्ष, अरुण वर्ण, कर्कश, विषम, फैला, तथा किनारों
पर खरखर, बाह्य पार्श्व से पतला तथा थोड़ा उभरा हुआ, पतला, फैला, सोये
हुये के समान सोया, बहरा ( स्पर्शज्ञान शून्य ), रोमांच सहित, अतिशय
चुभने की वेदनावाले, थोड़ी, खाज, दाह, पूय, लसीका युक्त; शीघ्रता
उत्पन्न होनेवाले, शीघ्र फटनेवाले, कीड़ेवाले, काले लाल, कपाल वर्ण के,
को 'कापाल कुष्ठ' कहते हैं । कपाल-मिट्टी का ठीकरा, उसके समान ॥ १ ॥
अ० ५ ] निदानस्थानम ४५१
अ० ५ ] निदानस्थानम ४५१
वसन्तानि ताम्र-खर-रोम-राजीभिसन्ततानि बहलानि बहुबहल-
रक्त-पूय-लसीकानि कण्डू-क्लेद-कोथ-दाह-पाकवन्त्याशुगतिसमुत्थानभे-
दीनि ससंतापकृमीणि पक्कोदुम्बरफलसवर्णाम्युदुम्बरकुष्ठानीति वि-
द्यात् ॥ ११ ॥
उदुम्बर-कुष्ठ—जो कुष्ठ ताम्बे के समान या ताम्बे के समान रंगवाले
तथा कर्कश रोमवाले; बहुत रक्त-पूय और लसी का से युक्त, जिन
में खाज, क्लेद ( स्राव ), कोथ ( गलना ), दाह एवं पाक हो, शीघ्रता
से उत्पन्न होनेवाले एवं पकनेवाले, जिनमें ताप एवं कृमि हों, जिनका रंग
पके हुए गूलर के समान हो उनको 'उदुम्बर कुष्ठ' जानना चाहिये ॥ ११ ॥
स्निग्धानि गुरुण्युत्सेधवन्ति श्लक्ष्णस्थिरपीनपर्यन्तानि शुक्लरक्ता-
वभासानि शुक्लरोमराजीसन्ततानि बहुल-बहल-शुक्ल-पिच्छिल-स्रावाणि
बहु-क्लेद-कण्डू-कृमीणि सक्तगतिसमुत्थानभेदीनि परिमण्डलानि मण्डल-
कुष्ठानीति विद्यात् ॥ १२ ॥
मण्डल कुष्ठ—जो कुष्ठ स्निग्ध, भारी, ऊंचाईवाले, चिकने, स्थिर,
किनारों से मोटे, सफेद या लाल रंग के, सफेद बालों ( रोम ) से व्याप्त,
जिनमें बहुत, गाढ़ा एवं सफेद तथा चिकना स्राव होता हो, जो बहुत स्राव,
खाज तथा कृमि से युक्त हों, जिनकी गति और उत्पत्ति धीरे २ होती हो, जिनका
आकार चक्र के समान गोलाकार हो, उनको 'मण्डलकुष्ठ' कहते हैं ॥ १२ ॥
परुषाण्यरुणवर्णानि बहिरन्तःश्यावानि नील-पीत-ताम्रावभासान्या-
शुगतिसमुत्थानान्यल्प-कण्डू-क्लेद-कृमीणि दाह-भेद-निस्तोद-पाक-बहुला-
नि शूकोपहतोपमानवेदनान्युत्सन्नमध्यानि तनुपर्यन्तानि कर्कशपिड़का-
चितानि दीर्घपरिमण्डलानि ऋष्यजिह्वाकृतीनि ऋष्यजिह्वानीति
विद्यात् ॥ १३ ॥
ऋष्यजिह्व-कुष्ठ—जो कुष्ठ बाहर के पार्श्व में खरखर तथा लाल रंग के, अन्दर
से काले रंग के, जिनमें नीले, पीले, ताम्बे के रंग की झांई दीखती हो, जो कि
शीघ्रता से बढ़ते या उत्पत्ति वाले हों, जिनमें कण्डू, कृमि और क्लेद कम हो,
जिनमें दाह, फटना, वेदना तथा पाक बहुत हो, जिनमें शूक ( जल शूक, कृमि )
के लगने के समान पीड़ायें हों, बीच से उठे हुए न हों, किनारों से पतले,
[ स्पर्शवाली फुन्सियों द्वारा चारों ओर से घिरे हों, बड़े २ चकतेवाले
जीभ के समान आकृतिवाले कुष्ठों को ऋष्यजिह्वकुष्ठ जानना
। १३ ॥
४५२ चरकसंहिता [ अ० ५
शुक्लरक्तावभासानि रक्तपर्यन्तानि रक्तराजीसंतवान्युत्सेधवन्ति
बहु-बहल-रक्त-पूय-लसीकानि कण्डू-कृमि-दाह-पाकवन्त्याशुगतिसमुत्था-
नभेदीनि पुण्डरीकपलाशसंकाशानि पुण्डरीकानीति विद्यात् ॥ १४ ॥
पुण्डरीककुष्ठ—सफेद या लाल रंग की चमक वाले, किनारों पर लाल,
लाल रोम (बालों) से व्याप्त, त्वचा से ऊपर उठे हुए न हों, गाढ़ी पूय (पीप),
रक्त एवं लसीका बहुत हो, खाज, कृमि, दाह और पाकयुक्त, जल्दी बढ़ने एवं
उत्पन्न होने वाले, शीघ्रभेदी, कमल के पत्तों के समान आकारवाले कुष्ठों को
'पुण्डरीक-कुष्ठ' कहते हैं ॥ १४ ॥
परुषारुणविशीर्णबहिस्तनून्यन्तःस्निग्धानि बहून्यल्पवेदनान्थल्प-क-
ण्डू-दाह-पूय-लसीकानि लघुसमुत्थानान्यल्पभेदकृमीण्यलाबु-पुष्प-संका-
शानि सिध्मकुष्ठानीति विद्यात् ॥ १५ ॥
सिध्मकुष्ठ--जो कुष्ठ बाहर से कठिन, लाल वर्ण, किनारों से कटे-फटे,
अन्दर से स्निग्ध, जिनमें सफेद या लाल रंग की चमक हो, जो कि बहुत
अधिक हों जिनमें पीड़ा कण्डू, दाह, पूय, लसीका कम हो, जिनकी उत्पत्ति धीरे-
धीरे हो, जो अल्पभेदी हों, जिनमें कृमि थोड़े हों और जिनका रंग दूधिया, घीया
कद्दू के फूल के समान हो उनको 'सिध्म कुष्ठ' कहते हैं ॥१५॥
काकणन्तिकावर्णान्यादौ पश्चात्सर्व-कुष्ठ-लिङ्ग-समन्वितानि पापीयसा
सर्वकुष्ठलिङ्गसंभवेनानेकवर्णानि काकणकानीति विद्यात्, तान्यसा-
ध्यानि साध्यानि पुनरितराणि ॥ १६ ॥
काकणक-कुष्ठ—जिन कुष्ठों का रंग प्रथम लाल रत्ती के समान हो और
पीछे से उनमें सम्पूर्ण कुष्ठों के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं, उनको 'काकणक
कुष्ठ' कहते हैं । (इनमें अनेक रंग उत्पन्न हो जाते हैं, ) ये कुष्ठ पापी
मनुष्यों को होते हैं। इनमें सब कुष्ठों के लक्षण होने से अनेक प्रकार के रोग
उत्पन्न हो जाते हैं ॥ १६ ॥
तत्र यदसाध्यं, तदसाध्यतां नातिवर्तते, साध्यं पुनः किंचित्साध्य-
तामतिवर्तते कदाचिदपचारात् । साध्यानीह षट् काकणकवर्ज्यान्य-
चिकित्स्यमानान्यपचारतो वा दोषैरभिष्यन्दमानान्यसाध्यतामुपयान्ति १७
साध्य-असाध्य भेद—इन कुष्ठों में से कुछ कुष्ठ साध्य हैं, और कुछ कुष्ठ
असाध्य हैं, वे कभी अच्छे नहीं होते। परन्तु जो साध्य हैं, वे अपचार और
मिथ्या आहार-विहार के कारण असाध्य होजाते हैं। काकणक-कुष्ठ को छोड़कर
शेष छः कुष्ठ भी चिकित्सा के न करने से अथवा दोषों के बढ़
असाध्य होजाते हैं ॥१७॥
अ० ५ ] निदानस्थानम् ४५१
अ० ५ ] निदानस्थानम् ४५१
साध्यानामपि ह्युपेक्ष्यमाणानामेषां त्वङ्-मांस-शोणित-लसीका-को-
थ-क्लेद-संस्वेदजाः कृमयोऽभिमूर्च्छन्ति । ते भक्षयन्तस्त्वगादीन् दोषांश्च
पुनर्दुष्यन्त इमानुपद्रवान् पृथक्पृथगुत्पादयन्ति ।
साध्य कुष्ठों में भी उपेक्षा करने से त्वचा, मांस, रक्त, लसीका में सड़ना,
स्राव और पसीने से कीड़े उत्पन्न होजाते हैं। ये कृमि त्वचा आदि को खाते
हैं, और वात आदि दोष और अधिक दूषित होकर नीचे लिखे उपद्रवों को
पृथक् पृथक् रूप में उत्पन्न करते हैं।
तत्र वातः श्यावारुणवर्णपरुषतामपि च रौक्ष्य-शूल-शोष-तोद-वेपथु-
व्यथा-हर्ष-संकोचाऽऽयास-स्तम्भ-सुप्ति-भेद-भङ्गान्, पित्तं पुनर्दाह-स्वेद-
क्लेद-कोथ-कण्डू-स्राव-पाक-रागान्, श्लेष्मा त्वस्य श्वैत्य-शैत्य-स्थैर्य-
कण्डू-गौरवोत्सेधोपस्नेहोपलेपान्, कृमयस्त्वगादींश्चातुरः शिराः स्नायूनि
मांसान्यस्थीन्यपि च तरुणानि खादन्ति ॥ १८ ॥
अस्यामवस्थायामुपद्रवाः कुष्ठिनं स्पृशन्ति । तद्यथा—प्रस्रवण-
मङ्गभेदः पतनान्यङ्गावयवानां तृष्णा-ज्वरातिसार-दाह-दौर्बल्यारोचका-
विपाकाश्च, तद्विधमसाध्यं विद्यादिति ॥ १९ ॥
उपद्रव—वायु के कोप के कारण रंग लाल, काला, कर्कशता, रूक्षता, शूल
चुभने की सी वेदना, बींधने का सा अनुभव, रोमांच, हर्ष, कम्प, संकोच,
श्रम, स्तम्भ, अंग का सो जाना, भेदन या भंग अर्थात् अंगों का टूटना—ये
उपद्रव होते हैं। पित्तप्रकोप के कारण दाह, पसीना, क्लिन्नता, सड़ना, खाज,
स्राव, पकना इत्यादि उपद्रव होते हैं। कफ के प्रकोप के कारण, श्वेत वर्ण,
शीतलता, खाज, स्थिरता, भारीपन, उभार, चिकनास, उपलेप होना ये—
उपद्रव होते हैं।
इस प्रकार से उत्पन्न कीड़े त्वचा आदि चार धातुओ को तथा शिरा,
स्नायु, मांस एवं कोमल अस्थियों (जैसे नाक की कोमल अस्थि) को
खाने लगते हैं। इस अवस्था में कुष्ठरोगी को निम्न लिखित उपद्रव घेर लेते
हैं। यथा-स्राव का बहना, अंगों का फटना या टूटना, अंगों का गिरना, तृष्णा,
ज्वर, अतिसार, दाह, निर्बलता, अरुचि, अविपाक ये उपद्रव होते हैं। इस
अवस्था में रोग असाध्य हो जाता है ॥ १८-१९ ॥
चात्र—साध्योऽयमिति यः पूर्वं नरो रोगमुपेक्षते ।
स किंचित्कालमासाद्य मृत एवावबुध्यते ॥ २० ॥
यस्तु प्रागेव रोगेभ्यो रोगेषु तरुणेषु च ।
४५४ चरकसंहिता [ अ० ६
भेषजं कुरुते सम्यक् स चिरं सुखमश्नुते ॥ २१ ॥
यथा स्वल्पेन यत्नेन छिद्यते तरुणस्तरुः ।
स एवातिप्रवृद्धस्तु छिद्यतेऽतिप्रयत्नतः ॥ २२ ॥
एवमेव विकारोऽपि तरुणः साध्यते सुखम् ।
विवृद्धः साध्यते कृच्छ्रादसाध्यो वाऽपि जायते ॥ २३ ॥
जो मनुष्य रोग के आरम्भ में 'साध्य' है ऐसा समझ कर उपेक्षा कर देता
है, वह थोड़े समय पीछे ही मुर्दा होकर ( असाध्यावस्था में आकर ) ही चेतता
है, और रोग के असाध्य होने पर ही उसकी नींद टूटती है । जो मनुष्य-रोग
के आक्रमण से पूर्व ही या रोग की नवीन अवस्था में ही औषध उपचार कर
लेता है, वह देर तक सुख ( जीवन ) का उपभोग करता है । जिस प्रकार थोड़े
से परिश्रम से ही छोटा वृक्ष काटा जा सकता है, वही वृक्ष बड़ा होने पर बहुत
परिश्रम से कटता है, इसी प्रकार नवीन अवस्था में रोग भी सुगमता से अच्छा
हो जाता है और यही रोग बढ़ने पर कठिनाई से अच्छा होता है, अथवा
असाध्य रूप में बदल जाता है ॥२०-२३॥
तत्र श्लोकाः-संख्या द्रव्याणि दोषाश्च हेतवः पूर्वरक्षणम् ।
रूपाण्युपद्रवाश्चोक्ताः कुष्ठानां कौष्ठिके पृथक् ॥ २४ ॥
इस कुष्ठनामक अध्याय में कुष्ठों की संख्या, द्रव्य, हेतु, दोष, पूर्वरूप,
और उपद्रव ये सब विषय पृथक् पृथक् कह दिये हैं ॥ २४ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थाने कुष्ठनिदानं
नाम पंचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
षष्ठोऽध्यायः ।
अथातः शोषनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब शोष के निदान की व्याख्या करते हैं, ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश
किया है ॥१-२॥
इह खलु चत्वारि शोषस्याऽऽयतनानि । तद्यथा-साहसं, संधा...
क्षयो, विषमाशनमिति ॥ ३ ॥
शोष रोग के चार कारण होते हैं जैसे-( १ ) साहस, ( २ ) सन्...
( मल मूत्रादि के उपस्थित वेगों को रोकना ), ( ३ ) क्षय, ( ४ ) विषमाशन
( विषम गुणों वाले अन्नों का भोजन करना ), ॥ ३ ॥
तत्र यदुक्तं साहसं शोषस्याऽऽयतनमिति तदनुव्याख्यास्यामः—यदा
पुरुषो दुर्बलो हि सन् बलवता सह विगृह्णाति, अतिमहता वा धनुषा
व्यायच्छति, जल्पति वाऽप्यतिमात्रं, अतिमात्रं वा भारमुद्वहति, अप्सु
वा प्लवते चातिदूरं, उत्सादनपदाघाताने वाऽतिप्रगाढमासेवते, अति-
प्रकृष्टं वाऽध्वानं द्रुतमभिधावति, अभिहन्यते वाऽन्यद्वा किंचिदेवंविधं
विषममतिमात्रं वा, व्यायामजातमारभते; तस्यातिमात्रेण कर्मणा उरः
क्षण्यते ॥
साहस शोषरोग का कारण है, यह जो कहा है, इसकी व्याख्या करेंगे—
जब कोई दुर्बल पुरुष अपने से बलवान् व्यक्ति के साथ कुश्ती आदि करता है,
बहुत बड़े धनुष को तानता है, अथवा बहुत अधिक बोलता है, बहुत अधिक
बोझ को उठाता है, पानी में बहुत तैरता है, बहुत ऊंचा लम्बा कूदता है, जोर
से भूमि पर पांव पटकता है, या बहुत लम्बे या कठिन रास्ते को बहुत तेज़ो
से पार करता है, अथवा ऊंचे-नीचे या किसी भारी दुःसह कार्य द्वारा
चोट खाता है या और कोई ऐसा ही विषम या बहुत अधिक व्यायाम
करता है अथवा आरम्भ किये कार्य को बहुत अधिक करता है; इससे उस की
छाती फट पड़ती है ॥
तस्योरःक्षतमुपस्रवते वायुः, स तत्रावस्थितः श्लेष्माणमुरःस्थमुपसं-
सृज्य शोषयन् विहरत्यूर्ध्वमधस्तिर्यक् च । योऽशस्तस्य शरीरसंधीना-
विशति तेनास्य जृम्भाऽङ्गमर्दो ज्वरश्चोपजायते, यस्त्वमाशयमभ्युपैति
तेनास्य वर्चो भिद्यते, यस्तु हृदयमाविशति तेन रोगा भवन्त्युरस्याः,
यो रसनां तेनास्यारोचकश्च, यः कण्ठं प्रपद्यते, कण्ठस्तेनोद्ध्वंस्यते
स्वरश्चावसीदति, यः प्राणवहानि स्रोतांस्यन्वेति तेन श्वासः प्रतिश्या-
यश्चोपजायते, यः शिरस्यवतिष्ठते शिरस्तेनोपहन्यते ॥३॥
इन घावों में वायु प्रवेश कर जाता है । वायु प्रवेश करके छाती में स्थित
कफ के साथ मिलकर इसको सुखाकर ऊपर, नीचे या तिर्यक् दशा में स्वयं
गमन करने लगता है । इस वायु का जो अंश शरीर की सन्धियों में जाता है,
जम्भाई, अंगों का टूटना और ज्वर उत्पन्न हो जाता है और जो अंश
में पहुँचता है उससे मल पतला आता है, जो भाग हृदय में पहुँचता
हृदय ( छाती ) में अन्य रोग होते हैं । जो जीभ में पहुँचता है उससे
४५६ चरकसंहिता [ अ० ६
अरुचि, जो भाग कण्ठ में पहुँचता है, उससे कण्ठ नष्ट होता तथा स्वरभंग
हो जाता है, जो भाग प्राणवह स्रोतों में पहुँचता है उससे श्वास और प्रतिश्याय
उत्पन्न होते हैं और जो भाग शिर में पहुंचता है उससे शिरोरोग होता है ॥३॥
ततः क्षणाच्चैबोरसो विषमगतित्वाच्च वायोः कण्ठस्य चोद्ध्वं-
सनात्कासः सततमस्य संजायते, स कासप्रसङ्गादुरसि क्षते शोणितं
ष्ठीवति, शोणितागमाच्चास्य दौर्गन्ध्यमुपजायते, एवमेते साहसप्रभवाः
साहसिकमुपद्रवाः स्पृशन्ति । ततः सोऽप्युपशोषणैरेतैरुपद्रवैरुपद्रुतः
शनैः शनैरुपशुष्यति । तस्मात्पुरुषो मतिमान् बलमात्मनः समीक्ष्य
तदनुरूपाणि कर्माण्यारहभेत कर्तुं, बलसमाधानं हि शरीरं, शरीरमूलश्च
पुरुष इति ॥ ४ ॥
इसके अनन्तर छाती में व्रण होने और वायु की विषम गति होने से तथा
कण्ठ के खर्खर बनने से निरन्तर कास (खाँसी), उत्पन्न हो जाता है । कास
के होने से छाती में व्रण बनने से थूक में रक्त आ जाता है, रक्त के आने से
दुर्गन्ध उत्पन्न हो जाती है । इस प्रकार से साहस करने वाले पुरुष को साहस
से उत्पन्न होने वाले उपद्रव घेर लेते हैं । इन शुष्क करने वाले उपद्रवों से
आक्रान्त होकर पुरुष भी धीरे-धीरे सूख जाता है । इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य
को चाहिये कि अपने बल को देखकर तदनुसार कार्य का आरम्भ करे । बल के
कारण ही शरीर अच्छे प्रकार से धारण किया जाता है और शरीर ही पुरुष
अर्थात् आत्मा का मुख्य आश्रय है ॥ ४ ॥
भवति चात्र-साहसं वर्जयेत्कर्म रक्षञ्जीवितमात्मनः ।
जीवन् हि पुरुषस्त्विष्टं कर्मणः फलमश्नुते ॥ ५ ॥
अपना जीवन चाहने वाले पुरुष को साहस के कार्य छोड़ देने चाहिये,
क्योंकि जीता हुआ पुरुष ही अपने कर्म का इष्टफल भोग सकता है ॥५॥
अथ संधारणं शोषस्याऽऽयतनमिति यदुक्तं तदनुव्याख्यास्यामः-
यदा पुरुषो राजसमीपे भर्तृसमीपे वा गुरोर्वा पादमूले द्यूतसभामन्यं
सतां समाजं स्त्रीमध्यं वाऽनुप्रविश्य यानैर्वाऽप्युच्चावचैरभियन् भयात्
प्रसंगात् ह्रीमत्त्वाद् घृणित्वाद्रा निरुणद्ध्यागतानि वातमूत्रपुरीषाणि,
तदा तस्य संधारणाद्वायुः प्रकोपमाद्यते । स प्रकुपितः पित्तश्लेष्माणौ
समुदीर्योर्ध्वमधस्तिर्यक् च विहरति । तत्रग्दांशविशेषेण पूर्वं
वयवविशेषं प्रविश्य शूलं जनयति, भिनत्ति पुरीषमुच्छोष
पार्श्वे चातिरुजति, अंसौ चावमृद्नाति, कण्ठमुरश्चावधमति,
अ० ६ ] निदानस्थानम ४५७
अ० ६ ] निदानस्थानम ४५७
च्छोपहन्ति, कासं श्वासं ज्वरं स्वरभेदं प्रतिश्यायं चोपजनयति । ततः
सोऽप्युपशोषणैरेतै रुपद्रवैरुपद्रुतः शनैः शनैरुपशुष्यति । तस्मात्पुरुषो
मतिमानात्मनः शरीरेष्वेव योगक्षेमकरेषु प्रयतेत । शरीरं ह्यस्य मूलं,
शरीरमूलश्च पुरुषो भवतीति ॥ ६ ॥
भवति चात्र—सर्वमन्यत्परित्यज्य शरीरमनुपालयेत् ।
तद्भावे हि भावानां सर्वाभावः शरीरिणाम् ॥ ७ ॥ इति ॥
( २ ) वेग सन्धारण मल मूत्रादि के उपस्थित वेगों को रोकना शोष का
कारण है, यह जो कहा है उसकी व्याख्या करते हैं—
जिस समय पुरुष राजा के समीप, स्वामी के समीप, गुरु की चरणसेवा में,
जुआखाने मे, अथवा इसी प्रकार दूसरे सज्जन मनुष्यों की सभा में, या स्त्रियों के
बीच में घुसकर, या ऊंची-नीची सवारी पर यात्रा करते समय, भय से, प्रसंग से,
लज्जा से वा घृणा से वायु मूत्र या मल के उपस्थित वेगों को रोक लेता है, तब
उनके रोकने से वायु प्रकुपित हो जाता है । यह प्रकुपित हुआ वायु, पित्त और
कफ को कुपित करके ऊपर-नीचे या तिरछे रूप में बहता है और तब किसी
भाग से शरीर के अवयव विशेष में प्रवेश करके पूर्व की भांति शूल उत्पन्न करता
है, मल का भेदन अथवा शोषण करता है । रोगी के पार्श्वों में पीड़ा उत्पन्न
करता है, कन्धों को तोड़ सा डालता है, (कन्धों का आकार बोतल की गर्दन
के समान हो जाता है, समकोण नहीं रहता ), कण्ठ और छाती पीड़ित होते हैं,
शिर में वेदना होती है । कास, श्वास, ज्वर, स्वरभेद, प्रतिश्याय रोग उत्पन्न
हो जाते हैं । रोगी भी इन शोषण करनेवाले उपद्रवों से धीरे-धीरे सूखने लगता
है । इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि अपना शरीर जिस प्रकार से सुखी,
स्वस्थ रहे, उस प्रकार का विशेष रूप से प्रयत्न करे, क्योंकि जो भी कोई
अमूल्य अलभ्य वस्तु है वह शरीर से ही होती है और पुरुष का शरीर ही
आधार है ।
इसलिये और सब कुछ छोड़कर शरीर को रक्षा करनी चाहिये । शरीर के न
रहने पर सब वस्तुओं का होना या न होना एक समान है । शरीर के होने पर
ही और सब पदार्थ उपयोगी होते हैं ॥ ६-७ ॥
क्षयः शोषस्याऽऽयतनमिति यदुक्तं तदनुव्याख्यास्यामः—यदा पुरु-
। शोक-चिन्ता-परीत-हृदयो भवति, ईर्ष्योत्कण्ठा-भय-क्रोधा-
ते, कृशो वा सन् रूक्षान्नपानसेवी भवति, दुर्बल-
हारोऽल्पाहारो वाऽऽस्ते, तदा तस्य हृदयस्थायी रसः क्षयमु-
४५८ चरकसंहिता [ अ० ६
पैति, स तस्योपक्षयात्संशोषं प्राप्नोति, अप्रतीकाराच्चानुबध्यते यक्ष्मणा
ऽथोपदेक्ष्यमाणरूपेण ॥ ८ ॥
(३) 'क्षय' शोषरोग का कारण है, यह जो पहिले कहा है, उसकी व्याख्या
करेंगे—जिस मनुष्य के हृदय में शोक वा चिन्ता, बहुत काम, ईर्ष्या, उत्कण्ठा,
भय, क्रोध (लोभ, मोह) आदि भाव मन में बहुत प्रवेश कर जायें वा जो कृश
होता हुआ फिर रूखे खान-पान का सेवन करे, शरीर से दुर्बल प्रकृति हो कर
उपवास या आवश्यकता से न्यून भोजन ले, तब उस के हृदय में रहनेवाला
रस (ओज) क्षय होने लगता है और इस रस (ओज) के क्षय होने से
मनुष्य सूखने लगता है और इसका प्रतिकार न करने से पुरुष राजयक्ष्मा
रोग से पीड़ित होता है। जैसा कि आगे उपदेश करेंगे ॥ ८ ॥
यदा वा पुरुषोऽतिप्रहर्षात्प्रसक्तभावः स्त्रीष्वतिप्रसङ्गारभते, तस्या-
तिमात्रप्रसङ्गाद्रेतः क्षयमुपैति । क्षयमपि चोपगच्छति रेतसि यदि मनः
स्त्रीभ्यो नैवास्य निवर्त्तते एव । तस्य चातिप्रणीतसंकल्पस्य मैथुनमा-
पद्यमानस्य शुक्रं च न प्रवर्त्तते, अतिमात्रोपक्षीणत्वात् ; अथास्य वायु-
र्व्यायच्छमानशरीरस्यैव धमनीरनुप्रविश्य शोणितवाहिनीस्ताभ्यः
शोणितं प्रच्यावयति, तच्छुक्रक्षयाच्छुक्रमार्गेण शोणितं प्रवर्त्तते वातानु-
सृप्तलिङ्गम् । अथास्य शुक्रक्षयाच्छोणितप्रवर्त्तनाच्च संघयः शिथिलीभ-
वन्ति, रौक्ष्यमुपजायते, भूयः शरीरं दौर्बल्यमाविशति, वायुः प्रकोप-
मापद्यते । स प्रकुपितोऽवशिष्टं शरीरमनुसर्पन् परिशोषयति मांस-
शोणिते, प्रच्यावयति श्लेष्मपित्ते, संसृजति पार्श्वे, चावगृह्णात्यंसौ,
कण्ठमुद्ध्वंसयति, शिरः श्लेष्माणमुपक्लेद्य प्रतिपूरयति श्लेष्मणा
संधींश्च प्रपीडयन् करोत्यङ्गमर्दमरोचकाविपाकौ च, पित्तश्लेष्मोत्क्ले-
शात्प्रतिलोमगत्वाच्च वायुर्ज्वरं कासं स्वरभेदं प्रतिश्यायं चोपजन-
यतिः, ततः सोऽप्युपशोषणैरुपद्रवैरुपद्रुतः शनैःशनैरुपशुष्यति । तस्मा-
त्पुरुषो मतिमानात्मनः शरीरमनुरक्षन् शुक्रमनुरक्षेत् । परा ह्येषा फल-
निर्वृत्तराहारस्येति ॥ ६ ॥
भवति चात्र—आहारस्य परं धाम शुक्रं तद्रक्ष्यमात्मनः ।
क्षयो ह्यस्य बहून् रोगान्मरणं वा नियच्छति ॥ १० ॥
शुक्रक्षय—जिस समय पुरुष अति कामवेग के ...
में आसक्त होकर अति सम्भोग आरम्भ कर देता है, उस का ...
करने से वीर्य का क्षय हो जाता है। वीर्य के क्षय होने पर भी जब मन स्त्रीसंग से
नहीं हटता और संग करता ही जाता है तब अति प्रचण्ड कामवासना के कारण
मैथुन करने पर भी वीर्य उत्पन्न नहीं होता। क्योंकि वीर्य बहुत अधिक क्षीण हो
चुका होता है। इस समय सम्भोग रूप परिश्रम करते हुए वायु रक्तवाहिनी धम-
नियों में प्रवेश करके इनसे रक्त बहाने लगता है। तब शुक्र (वीर्य) के क्षय से
शुक्रमार्ग द्वारा वायु के साथ मिला रक्त बाहर आने लगता है। इस अवस्था में
वीर्य के क्षय से तथा रक्त के निकलने से शरीर की सन्धियां शिथिल हो जाती हैं,
शरीर में रूक्षता आ जाती है, शरीर और अधिक कमजोर हो जाता है और
वायु का प्रकोप हो जाता है। इस प्रकार से प्रकुपित वायु शून्य (अशक्त)
शरीर में संचार करता हुआ मांस और रक्त को शुष्क कर देता है, कफ और पित्त
को बाहर निकालता है, पाश्र्वों में पीड़ा उत्पन्न करता है, कन्धों को दबा देता है,
गले को बिगाड़ देता है, कफ को कुपित करके शिर को कफ से भर देता है,
सन्धियों को पीड़ित करके अंगों में वेदना उत्पन्न करता है, पित्त और कफ को
कुपित करके अरुचि एवं अपचन उत्पन्न करता है। वायु की प्रतिलोम गति
होने से ज्वर, कास, श्वास, स्वरभेद और प्रतिश्याय रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
इस अवस्था में पुरुष शोषण करने वाले इन उपद्रवों से पीड़ित होकर धीरे धीरे
शुष्क हो जाता है। इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि अपने शरीर की
रक्षा करता हुआ शुक्र अर्थात् वीर्य की रक्षा करे। यही शुक्र (वीर्य) आहार
का सर्वोत्तम फल होता है।
आहार का सर्वोत्कृष्ट सार वीर्य है, इसका रक्षण करना परम आवश्यक है।
इसका क्षय बहुत से रोगों वा मृत्यु का भी कारण होता है ॥६-१०॥
विषमाशनं शोषस्याऽयतनमिति यदुक्तं, तदनुव्याख्यास्यामः-यदा
पुरुषः पानाशनभक्ष्यलेह्योपयोगान् प्रकृति-करण-संयोग-राशि-
देश-कालोपयोग-संस्थोपशय-विषमानासेबते, तदा तस्य बातपित्त-
श्लेष्माणो वैषम्यमापद्यन्ते, ते विषमाः शरीरमनुसृत्य यदा स्रोतसाम-
यनमुखानि प्रतिवार्यावतिष्ठन्ते तदा जन्तुर्यद्यदाहारजातमाहरति तत्त-
दस्य मूत्रपुरीषमेवोपजायते भूयिष्ठं नान्यस्तथा शरीरधातुः, स पुरी-
षोपष्टम्भाद्वर्तयति, तस्माच्छुष्यतो विशेषेण पुरीषमनुरक्ष्यं, तथा
त्यर्थकृशदुर्बलानां, तस्यानाप्याय्यमानस्य विषमाशनोपचिता
स्ते पृथगुपद्रवैर्युञ्जन्तो भूयः शरीरमुपशोषयन्ति । तत्र वातः-
कण्ठोद्ध्वंसनं पार्श्वशूलनमंसावमर्दनं स्वरभेदं प्रतिश्यायं
४६० चरकसंहिता [ अ० ६
षोपजनयति, पित्तं पुनर्ज्वरमतीसारमन्तर्दाहं च, श्लेष्मा तु प्रति-
श्यायं शिरसो गुरुत्वं कासमरोचकं च । स कासप्रसंगादुरसि क्षते
शोणितं ष्ठीवति, शोणितगमनाच्चास्य दौर्बल्यमुपजायते । एवमेते
विषमाशनोपचिता दोषा राजयक्ष्माणमभिनिर्वर्तयन्ति । तैरुपशो-
षणैरुपद्रवैरुपद्रुतः शनैः शनैरुपशुष्यति । तस्मात्पुरुषो मतिमान् प्र-
कृति-करण-संयोग-राशि-देश-कालोपयोग-संस्थोपशयादविषममाहारमा-
हरेदिति ॥ ११ ॥
भवति चात्र—हिताशी स्यान्मिताशी स्यात्कालभोजी जितेन्द्रियः ।
पश्यन् रोगान् बहून्कष्टान्बुद्धिमान्विषमाशनात् ॥ १२ ॥ इति ।
( ४ ) विषमाशन—विषमाशन शोष रोग का कारण है, यह जो कहा है
अब उस की व्याख्या करेंगे—
जब मनुष्य प्रकृति, करण, संयोग, राशि, देश, काल, उपयोग, संस्था
तथा उपशय के विरुद्ध, पान-अशन, भक्ष्य और लेह्य रूप में अन्न-पान
का उपयोग करता है, तब उस के वात, पित्त और कफ विषम हो जाते हैं ।
ये विकृत दोष जिस समय शरीर में फैलकर स्रोतसों वा नाड़ियों के मुखों को
घेर लेते हैं तब मनुष्य जो भी भोजन खाता है उस का अधिक भाग मूत्र और
मल में बदलकर इन को ही अधिक बढ़ाता है, इस प्रकार शरीर के अन्य धातु
नहीं बढ़ते । पुरुष मल के रुकने से ही जीवन धारण किया करता है । इसलिये
शुष्क होते हुए पुरुष के मल की रक्षा विशेष रूप से करनी चाहिये । इस
प्रकार कृश होते हुए मनुष्य के विषम भोजन से बढ़े हुए दोष नाना उपद्रवों
से युक्त होकर और भी शरीर को सुखा देते हैं; तब कुपित हुआ वातशूल, अंगों
का टूटना, कण्ठभेद, पाश्र्वों में पीड़ा, कन्धों का टूटना, स्वरभेद और प्रतिश्याय
उत्पन्न करता है । पित्तज्वर, अतिसार और अन्तर्दाह को उत्पन्न करता है ।
श्लेष्मा—प्रतिश्याय, शिर का भारीपन, कास और अरुचि उत्पन्न करता है ।
कास के कारण छाती में व्रण होने से थूक में रक्त आता है । रक्त के निकलने
से कमज़ोरी आ जाती है । इस प्रकार से विषम भोजन द्वारा एकत्रित हुए दोष
राजयक्ष्मा रोग को उत्पन्न करते हैं। शोषण करने वाले इन उपद्रवों से पीड़ित
होने पर धीरे धीरे मनुष्य सूखने लगता है । इसलिये बुद्धिमान् पुरुष को चाहिये
कि प्रकृति, करण, संयोग, राशि, देश, काल, उपयोग, संस्था और उपशय के
अनुकूल खान पान करे१ ।
१. इस का विस्तार 'रस-विमान' नामक अध्याय में कहेंगे ।
अ० ६ ] निदानस्थानम् ४६१
अ० ६ ] निदानस्थानम् ४६१
बुद्धिमान् मनुष्य विषमाशन के कारण नाना प्रकार के कष्टदायक रोगों की
उत्पत्ति को देखकर, हितकारक, परिमित और समय पर भोजन करने वाला
और जितेन्द्रिय बने ॥ ११-१२ ॥
एवमेतैरैश्चतुर्भिः शोषस्याऽऽयतनैरभ्युपसेवितैर्वात-पित्त-श्लेष्माणः
प्रकोपमापद्यन्ते, ते प्रकुपिता नानाविधैरुपद्रवैः शरीरमुपशोषयन्ति ।
तं सर्वरोगाणां कष्टतमत्वाद्राजयक्ष्माणमाचक्षते भिषजः । यस्माद्वा पूर्व-
मासीद्भगवतः सोमस्योडुराजस्य तस्माद्राजयक्ष्मेति ॥ १३ ॥
राजयक्ष्मा शब्द की निरुक्ति—शोष रोग के कहे हुए इन चार कारणों के
सेवन करने से, वात, पित्त, कफ ये तीनों दोष प्रकुपित हो जाते हैं । ये दोष
कुपित होकर नाना प्रकार के उपद्रवों से शरीर का शोषण करते हैं । यह रोग
सब रोगों में अधिक कष्टसाध्य है, इसलिये वैद्य लोग इस को 'राजयक्ष्मा' कहते
है । अथवा यह क्षय पहले नक्षत्रराज चन्द्रमा को रहा, इसलिये इस का नाम
'राजयक्ष्मा' है ॥ १३ ॥
तस्येमानि पूर्वरूपाणि भवन्ति । तद्यथा—प्रतिश्यायः क्षवथुरभीक्ष्णं
श्लेष्मप्रसेको मुखमाधुर्यमनन्नाभिलाषोऽन्नकाले चाऽस्यासो दोषदर्शन-
मदोषेष्वल्पदोषेषु वा पात्रोदकान्न-सूपोपदंश-परिवेशकेषु मुक्तवतो हृल्ला-
सस्तथोल्लेखनमाहारस्यान्तरान्तरा मुखस्य पादयोश्च शोषः पाण्योरवा-
वेक्षणमत्यर्थमक्ष्णोः श्वेतावभासता चातिमात्रं बाहोश्च प्रमाणजिज्ञासा
स्त्रीकामताऽतिघृणित्वं बीभत्सदर्शनता चास्य काये स्वप्ने चाभीक्ष्णं
दर्शनमनुदकानामुदकस्थानानां, शून्यानां च ग्राम-नगर-निगमन-जनपदानां
शुष्कदग्धावभग्नानां च वनानां कृकलास-मयूर-वानर-शुक-सर्प-काको-
लूकादिभिः संस्पर्शनमधिरोहणं वा यानं च श्वोष्ट्र-खर-वराहैः केशास्थि-
भस्म-तुषाङ्गार-राशीनां चाधिरोहणमिति शोषपूर्वरूपाणि भवन्ति ॥१४॥
शोष के पूर्वरूप—शोष रोग के ये पूर्व रूप हैं । यथा—प्रतिश्याय (जुकाम),
छींक आना, बार बार कफ का गिरना, मुख में मिठास, भोजन की अनिच्छा,
भोजन करते समय थकान की प्रतीति, पात्र, पानी, अन्न, दाल, चटना, शाक
आदि निर्दोष या अल्प दोषवाली वस्तुओं में भी दोष देखना, भोजन करते
समय जी मचलाना, मुंह में पानी बहुत आना, खाये हुए अन्न का वमन होना,
मुख और पांव का सूखना, हाथों को बहुत अधिक देखते रहना, आंखों का
जाना ( रक्त की न्यूनता ), भुजाओं में मोटाई, जांचने की प्रवृत्ति,
, अपने शरीर से घृणा या अपने शरीर में भयंकर रूप देखना
५६२ चरकसंहिता [ अ० ६.
और स्वप्न में पानी से रहित स्थानों में पानी को देखना, शून्य स्थानों में ग्राम,
नगर, जनपदों की प्रतीति होना जंगों का जकना, शुष्क होना या टूटना
देखना, गिरगट, मोर, बन्दर, तोता, सांप, कौवा, उल्लू आदि के साथ स्पर्श
की प्रतीति, कुशा, ऊंट, गधा, सुअर आदि पर चढ़कर सवारी करना, केश,
अस्थि, भस्म, भूसा, अंगारे के ढेरों पर चढ़ना आदि देखना, ये शोष रोग के
पूर्वरूप हैं ॥ १४ ॥
अत ऊर्ध्वमेकादश रूपाणि तस्य भवन्ति, तद्यथा—शिरसः प्रति-
पूरणं कासः श्वासः स्वरभेदः श्लेष्मणश्छर्दनं शोणित-ष्ठीवनं पार्श्वसं-
रुजनमंसावमर्दो ज्वरोऽतीसारस्तथाऽरोचक इति ॥ १५ ॥ -
ग्यारह रूप—इस के बाद राजयक्ष्मा के ग्यारह लक्षण हो जाते हैं । यथा-
( १ ) शिर का कफ से भरना, ( २ ) कास, ( ३ ) श्वास, ( ४ ) स्वरभेद,
( ५ ) कफ का गिरना, ( ६ ) थूक में रक्त आना, ( ७ ) पाश्र्वों में दर्द, ( ८ )
कन्धों का नीचे दबना, ( ६ ) ज्वर, ( १० ) अतिसार और ( ११ ) अरोचक
( अरुचि ) ॥ १५ ॥
तत्रापरिक्षीण-मांस-शोणितो बलवानजातारिष्टः सर्वैरपि शोषलिङ्गै-
रुपद्रुतः साध्यो ज्ञेयः, बलवर्णोपचयोपचितो हि सहिष्णुत्वाद् व्या-
ध्यौषधबलस्य कामं सुबहुलिङ्गोऽप्यल्पलिङ्ग एव मन्तव्यः । दुर्बलं त्व-
विक्षीण-मांस-शोणितमल्पलिङ्गमप्यजातारिष्टमपि बहुलिङ्गमेव जाता-
रिष्टमेव विद्यात्, तदसङ्गत्वद् व्याध्यौषधबलस्य, तं परिवर्जयेत्,
क्षणेन हि प्रादुर्भवन्त्यरिष्टानि, अनिमित्तश्चारिष्टप्रादुर्भाव इति ॥१६॥
साध्य और असाध्य रूप—जिस रोगी के मांस और रक्त कम नहीं हुए,
और शक्ति बनी हुई है और अरिष्ट-लक्षण उत्पन्न नहीं हुए, ऐसे रोगी को यदि
सब उपद्रव भी घेर लें तो भी रोगी साध्य है, क्योंकि जिस रोगी के बल और
वर्ण सुरक्षित हैं, यह व्याधि और औषध के बल को सुगमता से सह सकता है ।
इसलिये इस प्रकार का रोगी बहुत लक्षणों से युक्त होने पर भी थोड़े लक्षणों
वाला ही गिनना चाहिये । जो रोगी मांस और रक्त के क्षीण होने से बहुत
दुर्बल हो गया हो, इस में लक्षण चाहे थोड़े ही हों और कोई अरिष्ट-लक्षण न
भी उत्पन्न हुआ हो तो भी ऐसे रोगी को बहुत लक्षणों वाला और अरिष्ट लक्षणों
से युक्त ही गिनना चाहिये, क्योंकि यह रोगी औषधि और रोग के
सहन नहीं कर सकता, इसलिये छोड़ देना चाहिये । इस रोगी में