देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| अ० ४ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७३७ |
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| गन्धमादनमासाद्य पुण्यां देवधुनीं शुभाम्।<br>स्नात्वा कुशासनं कृत्वा संस्थितश्च स्थिरासनः॥ ५६ | गन्धमादनपर्वतपर पहुँचकर पवित्र और मंगलकारिणी देवनदी गंगाजीमें स्नान करके कुशका आसन बिछाकर वह दृढ़तापूर्वक बैठ गया॥ ५६॥ | | त्यक्त्वाऽन्नं वारिपानं च योगाभ्यासपरायणः।<br>ध्यायन्विश्वसृजं चित्ते सोपविष्टः स्थिरासने॥ ५७ | अन्न और जलका त्याग करके योगाभ्यासमें तत्पर होकर मनमें विश्वस्रष्टा ब्रह्माजीका ध्यान करता हुआ वह दृढ़भावसे आसनपर बैठा रहा॥ ५७॥ | | मघवा तं तपस्यन्तं ज्ञात्वा चिन्तातुरो ह्यभूत्।<br>गन्धर्वान्प्रेषयामास विघ्नार्थं पाकशासनः॥ ५८<br>यक्षांश्च पन्नगान्सर्पान्किन्नरानमितौजसः।<br>विद्याधरानप्सरसो देवदूताननेकणः॥ ५९<br>उपायैस्तैः कृताः सम्यक् तपोविघ्नाय मायिभिः।<br>न चचाल ततो ध्यानात्त्वाष्ट्रः परमतापसः॥ ६० | उसे तपस्या करता हुआ जानकर इन्द्र चिन्तासे व्यग्र हो उठे। तब [उसके तपमें] विघ्न डालनेके लिये इन्द्रने गन्धर्वों, अत्यन्त ओजस्वी यक्षों, नागों, सर्पों, किन्नरों, विद्याधरों, अप्सराओं और अनेक देवदूतोंको भेजा। उन मायावियोंद्वारा तपमें विघ्नके लिये भलीभाँति उपाय किये गये, किंतु परम तपस्वी त्वष्टापुत्र वृत्र ध्यानसे विचलित नहीं हुआ॥ ५८-६०॥ |
<div align="center">इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितयां षष्ठस्कन्धे ब्रह्मणः<br>समाराधनाय त्वष्ट्रा वृत्रोपदेशवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
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अथ चतुर्थोऽध्यायः
तपस्यासे प्रसन्न होकर ब्रह्माजीका वृत्रासुरको वरदान देना, त्वष्टाकी प्रेरणासे वृत्रासुरका स्वर्गपर आक्रमण करके अपने अधिकारमें कर लेना, इन्द्रका पितामह ब्रह्मा और भगवान् शंकरके साथ वैकुण्ठधाम जाना
</div>| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| निर्गतास्ते परावृत्तास्तपोविघ्नकराः सुराः।<br>निराशाः कार्यसंसिद्धौ तं दृष्ट्वा दृढचेतसम्॥ १ | उस वृत्रासुरको दृढ़प्रतिज्ञ देखकर तपमें विघ्न डालनेके लिये गये हुए देवगण अपने कार्यकी सिद्धिसे निराश होकर वापस लौट आये॥ १॥ |
| जाते वर्षशते पूर्णे ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>तत्राजगाम तरसा हंसारूढश्चतुर्मुखः॥ २ | सौ वर्ष पूर्ण होनेपर लोकपितामह चतुर्मुख ब्रह्मा हंसपर आरूढ़ हो शीघ्रतापूर्वक उसके पास आये॥ २॥ |
| आगत्य तमुवाचेदं त्वष्टृपुत्र सुखी भव।<br>त्यक्त्वा ध्यानं वरं ब्रूहि ददामि तव वाञ्छितम्॥ ३ | आकर उन्होंने उससे यह कहा—हे त्वष्टाके पुत्र! तुम सुखी होओ, ध्यानका त्यागकर वरदान माँगो, मैं तुम्हारा इच्छित वर दूँगा॥ ३॥ |
| तपसा तेऽद्य तुष्टोऽस्मि त्वां दृष्ट्वा चातिकर्शितम्।<br>वरं वरय भद्रं ते मनोऽभिलषितं तव॥ ४ | तुम्हें तपस्यासे अत्यन्त कृशकाय देखकर मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हारा कल्याण हो, अब तुम अपना मनोभिलषित वर माँग लो॥ ४॥ |
| व्यास उवाच<br>वृत्रस्तदातिविशदां पुरतो निशम्य<br>वाचं सुधासमरसां जगदेककर्तुः।<br>सन्त्यज्य योगकलनां सहसोदतिष्ठ-<br>त्तज्जातहर्षणयनाश्रुकलाकलापः ॥ ५ | **व्यासजी बोले—**अपने समक्ष खड़े जगत्के एकमात्र स्रष्टा [ब्रह्माजी]-की अत्यन्त गम्भीर और अमृतरसतुल्य वाणी सुनकर वह वृत्रासुर योग-ध्यान त्यागकर सहसा उठ खड़ा हुआ। हर्षातिरेकसे उसके नेत्रोंसे अश्रुधारा बहने लगी॥ ५॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—24 A
| ७३८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पादौ प्रणम्य शिरसा प्रणयाद्विधातु-<br>र्बद्धाञ्जलिः पुरत एव समाससाद।<br>प्रोवाच तं सुवरदं तपसा प्रसन्नं<br>प्रेम्णातिगद्गदगिरा विनयेन नम्रः॥ ६ | प्रेमपूर्वक विधाता ब्रह्माजीके चरणोंमें सिर रखकर प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर वह उनके समक्ष स्थित हो गया और तपस्यासे प्रसन्न तथा उत्तम वर देनेवाले ब्रह्माजीसे विनयावनत होकर प्रेमपूर्ण गद्गद वाणीमें कहने लगा— ॥ ६॥ |
| प्राप्तं मया सकलदेवपदं प्रभोऽद्य<br>यद्दर्शनं तव सुदुर्लभमाशु जातम्।<br>वाञ्छास्ति नाथ मनसि प्रवणे दुरापा<br>तां ब्रब्रवीमि कमलासन वेत्सि भावम्॥ ७ | हे प्रभो! मैंने आज समस्त देवताओंका पद प्राप्त कर लिया जो कि मुझे शीघ्र ही आपका अत्यन्त दुर्लभ दर्शन प्राप्त हो गया। हे नाथ! हे कमलासन! आप सबके मनके भाव जानते हैं, फिर भी मेरे भक्तिपूर्ण मनमें एक दुर्लभ अभिलाषा है, उसे मैं आपसे कह रहा हूँ॥ ७॥ |
| मृत्युश्च मा भवतु मे किल लोहकाष्ठ-<br>शुष्कार्द्रवंशनिचयैरपरैश्च शस्त्रैः।<br>वृद्धिं प्रयातु मम वीर्यमतीव युद्धे<br>यस्माद्द्भवामि सबलैर्म्मरैरजेयः॥ ८ | लोहे, काष्ठ, सूखे या गीले बाँसद्वारा निर्मित तथा अन्य किसी शस्त्रसे मेरी कभी मृत्यु न हो। मेरा पराक्रम अत्यन्त बढ़ जाय, जिससे युद्धमें मैं उन बलवान् देवताओंसे अजेय हो जाऊँ॥ ८॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्थं सम्प्रार्थितो ब्रह्मा तमाह प्रहसन्निव।<br>उत्तिष्ठ गच्छ भद्रं ते वाञ्छितं सफलं सदा॥ ९ | व्यासजी बोले— उसके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर ब्रह्माजी उससे हँसते हुए बोले—[हे वत्स!] उठो और [घर] जाओ, तुम्हारा मनोरथ निश्चय ही पूर्ण होगा। तुम्हारा कल्याण हो॥ ९॥ |
| न शुष्केण न चार्द्रेण न पाषाणेन दारुणा।<br>भविष्यति च ते मृत्युरिति सत्यं ब्रवीम्यहम्॥ १० | न सूखी, न गीली वस्तुसे, न तो पत्थर या लकड़ीद्वारा निर्मित शस्त्रसे ही तुम्हारी मृत्यु होगी—यह मैं सत्य कह रहा हूँ॥ १०॥ |
| इति दत्त्वा वरं ब्रह्मा जगाम भुवनं परम्।<br>वृत्रस्तु तं वरं लब्ध्वा मुदितः स्वगृहं ययौ॥ ११ | ऐसा वरदान देकर ब्रह्माजी अपने दिव्य लोकको चले गये और वृत्रासुर भी वरदान प्राप्तकर प्रसन्नतापूर्वक अपने घर चला गया॥ ११॥ |
| शशंस पितुरग्रे तद्वरदानं महामतिः।<br>त्वष्टा तु मुदितः प्राप्तं पुत्रं प्राप्तवरं तदा॥ १२ | महाबुद्धिमान् वृत्रासुरने पिताके सम्मुख उस वरदानको सुनाया, तब त्वष्टा भी पुत्रके वरदान प्राप्त करनेसे अत्यन्त प्रसन्न हो गये॥ १२॥ |
| स्वस्ति तेऽस्तु महाभाग जहि शक्रं रिपुं मम।<br>हत्वागच्छ त्रिशिरसो हन्तारं पापसंयुक्तम्॥ १३ | उन्होंने कहा—हे महाभाग! तुम्हारा कल्याण हो, मेरे शत्रु और त्रिशिराके हत्यारे पापी इन्द्रको मार डालो; उसे मारकर आ जाओ॥ १३॥ |
| भव त्वं त्रिदशाधीशः सम्प्राप्य विजयं रणे।<br>ममाधिं छिन्धि विपुलं पुत्रनाशसमुद्भवम्॥ १४ | युद्धमें विजय प्राप्तकर तुम देवताओंके अधिपति बनो। पुत्रहत्यासे उत्पन्न मेरे महान् मानसिक सन्तापको तुम दूर करो॥ १४॥ |
| जीवतो वाक्यकरणात्क्षयाहे भूरिभोजनात्।<br>गयायां पिण्डदानाच्च त्रिभिः पुत्रस्य पुत्रता॥ १५ | जीवित [अवस्थामें] पिताकी आज्ञाका पालन करने, मृत्युकतिथिपर पर्याप्त भोजन कराने तथा गयामें पिण्डदान करने—इन तीनोंसे ही पुत्रका पुत्रत्व सार्थक होता है॥ १५॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—24 B
अ० ४] षष्ठ स्कन्ध ७३९
अ० ४] षष्ठ स्कन्ध ७३९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्मात्पुत्र ममात्यर्थं दुःखं नाशितुमर्हसि।<br>त्रिशिरा मम चित्तात्तु नापसर्पति कर्हिचित् ॥ १६ | अतः हे पुत्र! तुम मेरे बहुत बड़े दुःखको दूर करनेमें समर्थ हो; त्रिशिरा मेरे चित्तसे कभी हटता नहीं है॥ १६॥ |
| सुशीलः सत्यवादी च तापसो वेदवित्तमः।<br>अपराधं विना तेन निहतः पापबुद्धिना ॥ १७ | उस सुशील, सत्यवादी, तपस्वी और वेदवेत्ताको बिना किसी अपराधके ही पापबुद्धिवाले उस इन्द्रने मार डाला॥ १७॥ |
| व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा वृत्रः परमदुर्जयः।<br>रथमारुह्य तरसा निर्जगाम पितुर्गृहात् ॥ १८<br><br>रणदुन्दुभिनिर्घोषं शङ्खनादं महाबलम्।<br>कारयित्वा प्रयाणं स चकार मदगर्वितः ॥ १९ | व्यासजी बोले— उनकी ऐसी बात सुनकर परम दुर्जय वृत्रासुर रथपर सवार हो शीघ्र ही [अपने] पिताके घरसे निकल पड़ा। रणभेरियोंकी ध्वनि तथा महान् शंखनाद कराकर उस मदोन्मत्तने प्रस्थान किया॥ १८-१९॥ |
| निर्ययौ नयसंयुक्तः सेवकानिति संवदन्।<br>हत्वा शक्रं ग्रहीष्यामि सुरराज्यमकण्टकम् ॥ २० | ‘इन्द्रको मारकर निष्कण्टक देव-राज्य अधिकृत कर लूँगा’—ऐसा सेवकोंसे कहते हुए वह नीतिवान् वृत्र निकल पड़ा॥ २०॥ |
| इत्युक्त्वा निर्जगामाशु स्वसैन्यपरिवारितः।<br>महता सैन्यनादेन भीषयन्नमरावतीम् ॥ २१ | ऐसा कहकर सैनिकोंके महान् घोषसे अमरावती (इन्द्रपुरी)-को भयभीत करता हुआ वह अपनी सेनाके साथ शीघ्रतापूर्वक निकला॥ २१॥ |
| तमागच्छन्तमाज्ञाय तुराषाडपि सत्वरः।<br>सेनोद्योगं भयत्रस्तः कारयामास भारत ॥ २२ | हे भारत! उसे आता हुआ जानकर भयभीत इन्द्र भी शीघ्रतापूर्वक सेनाकी तैयारी कराने लगे॥ २२॥ |
| सर्वानाहूय तरसा लोकपालानरिन्दमः।<br>युद्धार्थं प्रेरयन्सर्वान्व्यरोचत महाद्युतिः ॥ २३ | उन शत्रुदमन इन्द्रने शीघ्र ही सभी लोकपालोंको बुलाकर उन्हें युद्धकी तैयारी करनेके लिये प्रेरित किया, उस समय वे अत्यन्त कान्तिमान् लग रहे थे॥ २३॥ |
| गृध्रव्यूहं ततः कृत्वा संस्थितः पाकशासनः।<br>तत्राजगाम वेगात्तु वृत्रः परबलार्दनः ॥ २४ | तत्पश्चात् गृध्रव्यूहका निर्माण करके इन्द्र युद्धके लिये डट गये; उसी समय शत्रुसेनाका विध्वंस कर डालनेवाला वृत्रासुर भी वहाँ वेगपूर्वक आ पहुँचा॥ २४॥ |
| देवदानवयोस्तावत्संग्रामस्तुमुलोऽभवत् ।<br>वृत्रवासवयोः संख्ये मनसा विजयैषिणोः ॥ २५ | तब युद्धक्षेत्रमें अपने-अपने मनमें विजयकी इच्छा रखनेवाले इन्द्र तथा वृत्रासुरकी देव-दानव सेनाओंमें भीषण संग्राम होने लगा॥ २५॥ |
| एवं परस्परं युद्धे सन्दीप्ते भयदे भृशम्।<br>आकूतं देवताः प्रापुर्दैत्याश्च परमां मुदम् ॥ २६ | इस प्रकार परस्पर युद्धके उग्र और भयंकर हो जानेपर देवगण व्याकुल और दानव अत्यन्त प्रसन्न हो गये॥ २६॥ |
| तोमरैर्भिन्दिपालैश्च खड्गैः परशुपट्टिशैः।<br>जघ्नुः परस्परं देवदैत्याः स्वस्ववरायुधैः ॥ २७ | उस युद्धमें तोमर, भिन्दिपाल, तलवार, परशु और पट्टिश—इन अपने-अपने श्रेष्ठ आयुधोंसे देवता और दैत्य एक-दूसरेपर प्रहार कर रहे थे॥ २७॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—24 C
| ७४० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एवं युद्धे वर्तमाने दारुणे लोमहर्षणे।<br>शक्रं जग्राह सहसा वृत्रः क्रोधसमन्वितः॥ २८ | इस प्रकारके हो रहे रोमांचकारी और भयंकर संग्राममें क्रोधाभिभूत वृत्रासुरने अचानक इन्द्रको पकड़ लिया॥ २८॥ |
| अपावृत्य मुखे क्षिप्त्वा स्थितो वृत्रः शतक्रतुम्।<br>मुदितोऽभून्महाराज पूर्ववैरमनुस्मरन्॥ २९ | हे महाराज! वृत्रासुर इन्द्रको कवच-वस्त्र आदिसे रहित करके अपने मुखमें डालकर स्थित हो गया और पूर्ववैरका स्मरण करते हुए वह अत्यन्त प्रसन्न हुआ॥ २९॥ |
| शक्रे ग्रस्तेऽथ वृत्रेण संभ्रान्ता निर्जरास्तदा।<br>चुक्रुशुः परमार्तास्ते हा शक्रेति मुहुर्मुहुः॥ ३० | वृत्रासुरके द्वारा इन्द्रको निगला गया देखकर देवता विस्मित हो गये और अत्यन्त दुःखी होकर 'हा इन्द्र! हा इन्द्र!' कहकर चिल्लाने लगे॥ ३०॥ |
| अपावृतं मुखे शक्रं ज्ञात्वा सर्वे दिवौकसः।<br>बृहस्पतिं प्रणम्योचुर्दीना व्यथितचेतसः॥ ३१ | जब देवताओंको यह ज्ञात हुआ कि इन्द्रको वृत्रने मुखमें रखकर छिपा लिया है तो वे अत्यन्त दुःखित होकर बृहस्पतिके पास गये और उनसे दीन वाणीमें बोले—॥ ३१॥ |
| किं कर्तव्यं द्विजश्रेष्ठ त्वमस्माकं गुरुः परः।<br>शक्रो ग्रस्तस्तु वृत्रेण रक्षितो देवतान्तरैः॥ ३२ | हे द्विजश्रेष्ठ! देवसेनासे सुरक्षित इन्द्रको वृत्रासुरने अपने मुखमें रख लिया है। अब हम क्या करें? आप हमारे परम गुरु हैं॥ ३२॥ |
| विना शक्रेण किं कुर्मः सर्वे हीनपराक्रमाः।<br>अभिचारं कुरु विभो सत्वरः शक्रमुक्तये॥ ३३ | इन्द्रके बिना हमलोग क्या करें, हम सब पराक्रमहीन हो गये हैं। हे विभो! इन्द्रकी मुक्तिके लिये आप शीघ्र ही अभिचार-क्रिया कीजिये॥ ३३॥ |
| बृहस्पतिरुवाच<br>किं कर्तव्यं सुराः क्षिप्तो मुखमध्येऽस्ति वासवः।<br>वृत्रेणोत्सादितो जीवन्नस्ति कोष्ठान्तरे रिपोः॥ ३४ | बृहस्पति बोले—हे देवताओ! क्या किया जाय? उसने इन्द्रको मुखमें रख लिया है, वृत्रासुरके द्वारा पीड़ित वे इन्द्र उस शत्रुके मुखमें भी जीवित हैं॥ ३४॥ |
| व्यास उवाच<br>देवाश्चिन्तातुराः सर्वे तुरासाहं तथाकृतम्।<br>दृष्ट्वा विमृश्य तरसा चक्रुर्यत्नं विमुक्तये॥ ३५ | व्यासजी बोले—इन्द्रको उस स्थितिमें प्राप्त देखकर चिन्तित देवताओंने भलीभाँति सोचकर उनकी मुक्तिके लिये शीघ्र ही एक उपाय किया॥ ३५॥ |
| असृजन्त महासत्त्वां जृम्भिकां रिपुनाशिनीम्।<br>ततो विजृम्भमाणः स व्यावृतास्यो बभूव ह॥ ३६ | उन्होंने अत्यन्त शक्तिशाली और शत्रुनाशिनी जम्हाईका सृजन किया; इससे उसे जम्हाई आते ही उस वृत्रासुरका मुख खुल गया॥ ३६॥ |
| विजृम्भमाणस्य ततो वृत्रस्यास्यादवापतत्।<br>स्वान्यङ्गान्यपि संक्षिप्य निष्क्रान्तो बलसूदनः॥ ३७ | तत्पश्चात् जम्हाई लेते हुए वृत्रासुरके मुखसे बल नामक दैत्यका नाश करनेवाले इन्द्र अपने अंगोंको संकुचित करके बाहर निकल आये॥ ३७॥ |
| ततः प्रभृति लोकेषु जृम्भिका प्राणिसंस्थिता।<br>जहृषुश्च सुराः सर्वे शक्रं दृष्ट्वा विनिर्गतम्॥ ३८ | उसी समयसे संसारके सभी प्राणियोंके शरीरमें जम्हाई विद्यमान रहने लगी। इन्द्रको बाहर निकला हुआ देखकर सभी देवता हर्षित हो उठे॥ ३८॥ |
| ततः प्रवृत्ते युद्धं तयोर्लोकभयप्रदम्।<br>वर्षाणामयुतं यावद्दारुणं लोमहर्षणम्॥ ३९ | तब उन दोनोंमें तीनों लोकोंके लिये भयदायक, रोमांचकारी और भीषण युद्ध प्रारम्भ हो गया, जो दस हजार वर्षोंतक चला॥ ३९॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—24 D
अ० ४ ] षष्ठ स्कन्ध ७४१
अ० ४ ] षष्ठ स्कन्ध ७४१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एकतश्च सुराः सर्वे युद्धाय समुपस्थिताः ।<br>एकतो बलवांस्त्वाष्ट्रः संग्रामे समवर्तत ॥ ४० | युद्ध करनेके लिये संग्राममें एक ओर सभी देवता उपस्थित थे तो दूसरी ओर त्वष्टाका बलशाली पुत्र वृत्रासुर डटा हुआ था ॥ ४० ॥ |
| यदा व्यवर्धत रणे वृत्रो वरमदावृतः ।<br>पराजितस्तदा शक्रस्तेजसा तस्य धर्षितः ॥ ४१ | वरदानके अहंकारसे उन्मत्त वृत्रासुरका उत्कर्ष जब रणमें प्रबल हो गया, तब उसके तेजसे पराक्रमहीन इन्द्र पराजित हो गये ॥ ४१ ॥ |
| विव्यथे मघवा युद्धे ततः प्राप्य पराजयम् ।<br>विषादमगमन्देवा दृष्ट्वा शक्रं पराजितम् ॥ ४२ | उससे युद्धमें पराजय प्राप्त करके इन्द्रको बहुत व्यथा हुई और उन्हें पराजित देखकर देवगण भी विषादग्रस्त हो गये ॥ ४२ ॥ |
| जग्मुस्त्यक्त्वा रणं सर्वे देवा इन्द्रपुरोगमाः ।<br>गृहीतं देवसदनं वृत्रेणागत्य रंहसा ॥ ४३ | तब इन्द्र आदि समस्त देवता युद्ध छोड़कर भाग गये और वृत्रासुरने शीघ्रतापूर्वक आकर अमरावतीपर अधिकार कर लिया ॥ ४३ ॥ |
| देवोद्यानानि सर्वाणि भुङ्क्तेऽसौ दानवो बलात् ।<br>ऐरावतोऽपि दैत्येन गृहीतोऽसौ गजोत्तमः ॥ ४४ | अब वह दानव समस्त देवोद्यानोंका बलपूर्वक उपभोग करने लगा। उस दैत्य वृत्रासुरके द्वारा गजश्रेष्ठ ऐरावत भी अधिकारमें कर लिया गया ॥ ४४ ॥ |
| विमानानि च सर्वाणि गृहीतानि विशाम्पते ।<br>उच्चैःश्रवा हयवरो जातस्तस्य वशे तदा ॥ ४५ | हे राजन्! तत्पश्चात् उसने समस्त विमानोंको ग्रहण कर लिया और अश्वश्रेष्ठ उच्चैःश्रवाको भी अपने अधीन कर लिया ॥ ४५ ॥ |
| कामधेनुः पारिजातो गणश्चाप्सरसां तथा ।<br>गृहीतं रत्नमात्रं तु तेन त्वष्टृसुतेन ह ॥ ४६ | उसी प्रकार कामधेनु, कल्पवृक्ष, अप्सराओंका समूह तथा रत्न आदि जो कुछ था; वह सब उस त्वष्टापुत्र वृत्रने अपने अधिकारमें कर लिया ॥ ४६ ॥ |
| स्थानभ्रष्टाः सुराः सर्वे गिरिदुर्गेषु संस्थिताः ।<br>दुःखमापुः परिभ्रष्टा यज्ञभागात्सुरालयात् ॥ ४७ | अब राज्यच्युत होकर सभी देवता पर्वतोंकी कन्दराओंमें रहकर अत्यन्त दुःख प्राप्त करने लगे। वे यज्ञभाग और देवसदन—दोनोंसे वंचित हो गये ॥ ४७ ॥ |
| वृत्रः सुरपदं प्राप्य बभूव मदगर्वितः ।<br>त्वष्टातीव सुखं प्राप्य मुमोद सुतसंयुतः ॥ ४८ | वृत्रासुर देव-राज्य पाकर मदोन्मत्त हो गया। त्वष्टा भी अत्यन्त सुख प्राप्तकर पुत्रके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ ४८ ॥ |
| अमन्त्रयन्हितं देवा मुनिभिः सह भारत ।<br>किं कर्तव्यमिति प्राप्ते विचिन्त्य भयमोहिताः ॥ ४९<br><br>जग्मुः कैलासमचलं सुराः शक्रसमन्विताः ।<br>महादेवं प्रणम्योचुः प्रह्वाः प्राञ्जलयो भृशम् ॥ ५० | हे भारत! देवगण अपने कल्याणके लिये मुनियोंके साथ विचार-विमर्श करने लगे कि इस स्थितिके प्राप्त होनेपर अब हमें क्या करना चाहिये—ऐसा विचार करके भयमोहित वे देवगण इन्द्रके साथ कैलासपर्वतपर गये और वहाँ देवाधिदेव भगवान् शंकरको प्रणाम करके विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर कहने लगे— ॥ ४९-५० ॥ |
| देवदेव महादेव कृपासिन्धो महेश्वर ।<br>रक्षास्मान्भयभीतांस्तु वृत्रेणातिपराजितान् ॥ ५१ | हे देव! हे महादेव! हे कृपासागर! हे महेश्वर! वृत्रासुरसे पूर्णतः पराजित हम भयभीत देवताओंकी रक्षा कीजिये ॥ ५१ ॥ |
| ७४२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
|---|
| गृहीतं देवसदनं तेन देव बलीयसा।<br>किं कर्तव्यमतः शम्भो ब्रूहि सत्यं शिवाद्य नः॥ ५२ | हे देव! उस महाबलीने देवलोकपर अधिकार कर लिया है। हे शम्भो! हे शिव! अब हमें क्या करना चाहिये, आप हमें सही-सही बताइये॥ ५२॥ | | किं कुर्मः क्व च गच्छामः स्थानभ्रष्टा महेश्वर।<br>दुःखस्य नाधिगच्छामो विनाशोपायमीश्वर॥ ५३ | हे महेश्वर! हम राज्यभ्रष्ट क्या करें और कहाँ जायँ? हे ईश्वर! हम इस दुःखके विनाशके लिये कोई भी उपाय नहीं जान पा रहे हैं॥ ५३॥ | | साहाय्यं कुरु भूतेश व्यथिताः स्म कृपानिधे।<br>वृत्रं जहि मदोत्सिक्तं वरदानबलाद्विभो॥ ५४ | हे भूतेश! हमारी सहायता कीजिये। हे कृपानिधान! हम सब बहुत दुःखी हैं। हे विभो! वरदानके प्रभावसे मदोन्मत्त वृत्रासुरका वध कीजिये॥ ५४॥ | | शिव उवाच<br>ब्रह्माणं पुरतः कृत्वा वयं सर्वे हरेः क्षयम्।<br>गत्वा समेत्य तं विष्णुं चिन्तयामो वधोद्यमम्॥ ५५ | शिवजी बोले—ब्रह्माजीको आगे करके हमलोग विष्णुलोक चल करके वहाँ उन श्रीहरिके पास जाकर उस वृत्रासुरके वधके उपायपर विचार करेंगे॥ ५५॥ | | स शक्तश्च छलज्ञश्च बलवान्बुद्धिमत्तरः।<br>शरण्यश्च दयाब्धिश्च वासुदेवो जनार्दनः॥ ५६ | वे जनार्दन भगवान् विष्णु शक्तिशाली, छलकार्यमें निपुण, बलवान्, सबसे बुद्धिमान्, शरणदाता और दयाके सागर हैं॥ ५६॥ | | विना तं देवदेवेशं नार्थसिद्धिर्भविष्यति।<br>तस्मात्तत्र च गन्तव्यं सर्वकार्यार्थसिद्धये॥ ५७ | उन देवदेवेशके बिना हमारा प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा, इसलिये सभी कार्योंकी सिद्धिके लिये हमें वहीं चलना चाहिये॥ ५७॥ | | व्यास उवाच<br>इति सञ्चिन्त्य ते सर्वे ब्रह्मा शक्रः सशङ्करः।<br>जग्मुर्विष्णोः क्षयं देवाः शरण्यं भक्तवत्सलम्॥ ५८ | व्यासजी बोले—ऐसा विचारकर ब्रह्मा, शिव तथा इन्द्र आदि सभी देवता शरणदाता और भक्तवत्सल भगवान् विष्णुके लोक गये॥ ५८॥ | | गत्वा विष्णुपदं देवास्तुष्टुवुः परमेश्वरम्।<br>हरिं पुरुषसूक्तेन वेदोक्तेन जगद्गुरुम्॥ ५९ | वैकुण्ठधाममें पहुँचकर वे देवता वेदोक्त पुरुषसूक्तसे उन परमेश्वर जगद्गुरु श्रीहरिकी स्तुति करने लगे॥ ५९॥ | | प्रत्यक्षोऽभूज्जगन्नाथस्तेषां स कमलापतिः।<br>सम्मान्य च सुरान्सर्वानित्युवाच पुरःस्थितः॥ ६० | तब भगवान् जगन्नाथ कमलापति विष्णु उनके सम्मुख उपस्थित हो गये और सभी देवताओंका सम्मान करके उनसे बोले—॥ ६०॥ | | किमागताः स्म लोकेशा हरब्रह्मसमन्विताः।<br>कारणं कथयध्वं वः सर्वेषां सुरसत्तमाः॥ ६१ | हे लोकपालगण! आपलोग ब्रह्मा और शिवजीके साथ यहाँ क्यों आये हैं? हे श्रेष्ठ देवताओ! आप सभी अपने आगमनका कारण बतायें॥ ६१॥ | | व्यास उवाच<br>इति श्रुत्वा हरेर्वाक्यं नोचुर्देवा रमापतिम्।<br>चिन्ताविष्टाः स्थिताः प्रायः सर्वे प्राञ्जलयस्तथा॥ ६२ | व्यासजी बोले—भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर भी देवगण उन रमापतिसे कुछ बोल न सके और वे चिन्तातुर होकर हाथ जोड़े खड़े ही रहे॥ ६२॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे ब्रह्मनेतृत्वे सेन्द्रैः सुरैर्विष्णोः शरणगमनवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
अ० ५ ] षष्ठ स्कन्ध ७४३
अ० ५ ] षष्ठ स्कन्ध ७४३
अथ पञ्चमोऽध्यायः
भगवान् विष्णुकी प्रेरणासे देवताओंका भगवतीकी स्तुति करना और प्रसन्न होकर भगवतीका वरदान देना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— हे राजन्! तब सभी तत्त्वोंके ज्ञाता माधव भगवान् विष्णु समस्त देवताओंको चिन्तासे व्याकुल तथा अत्यन्त प्रेमविह्वल देखकर कहने लगे ॥ १ ॥ | | तथा चिन्तातुरान्वीक्ष्य सर्वान्सर्वार्थतत्त्ववित् ।<br>प्राह प्रेमभरोद्भ्रान्तान्माधवो मेदिनीपते ॥ १ | | | विष्णुरुवाच<br>किं मौनमाश्रिता यूयं ब्रुवन्तु कारणं सुराः ।<br>सदसद्वापि यच्छ्रुत्वा यतिष्ये तन्निवारणे ॥ २ | विष्णु बोले— हे देवगण! आप सबने मौन धारण क्यों कर रखा है ? आप सब अपने दुःखका सत्-असत् जो भी कारण हो बतायें, जिसे सुनकर मैं उसे दूर करनेका उपाय करूँगा ॥ २ ॥ | | देवा ऊचुः<br>किमज्ञातं तव विभो त्रिषु लोकेषु वर्तते ।<br>सर्वं वेद भवान्कार्यं किं पृच्छसि पुनः पुनः ॥ ३ | देवता बोले— हे विभो! तीनों लोकोंमें कौन-सी वस्तु आपसे अज्ञात है, आप हमारा सारा कार्य [ भली प्रकारसे ] जानते हैं; तो क्यों बार-बार पूछ रहे हैं ? ॥ ३ ॥ | | त्वया पूर्वं बलिर्बद्धः शक्रो देवाधिपः कृतः ।<br>वामनं वपुरास्थाय क्रान्तं त्रिभुवनं पदैः ॥ ४ | पूर्वकालमें आपने बलिको बाँध लिया था और इन्द्रको देवताओंका राजा बनाया था; आपने वामन-शरीर धारणकर तीनों लोकोंको अपने चरणोंसे नाप लिया था ॥ ४ ॥ | | अमृतं त्वाहृतं विष्णो दैत्याश्च विनिपातिताः ।<br>त्वं प्रभुः सर्वदेवानां सर्वापद्विनिवारणे ॥ ५ | हे विष्णो ! आपने ही अमृत छीनकर दैत्योंका नाश किया था; आप सभी देवताओंकी समस्त विपत्तियोंको दूर करनेमें समर्थ हैं ॥ ५ ॥ | | विष्णुरुवाच<br>न भेतव्यं सुरवरा वेद्युपायं सुसम्मतम् ।<br>तद्वधाय प्रवक्ष्यामि येन सौख्यं भविष्यति ॥ ६ | विष्णु बोले— हे श्रेष्ठ देवताओ! आपलोग भयभीत न हों। मैं उस वृत्रासुरके वधका सुसंगत उपाय जानता हूँ, उसे मैं बताऊँगा, जिससे आपलोगोंको सुख होगा ॥ ६ ॥ | | अवश्यं करणीयं मे भवतां हितमात्मना ।<br>बुद्ध्या बलेन चार्थेन येन केनच्छलेन वा ॥ ७ | अपनी बुद्धिसे, बलसे, धनसे या जिस किसी भी उपायसे मुझे आपलोगोंका हित अवश्य करना है ॥ ७ ॥ | | उपायाः खलु चत्वारः कथितास्तत्त्वदर्शिभिः ।<br>सामादयः सुहृत्स्वेव दुर्हृत्सु विशेषतः ॥ ८ | मित्रों और विशेषरूपसे शत्रुओंके प्रति [प्रयोगहेतु] तत्त्वदर्शियोंने साम, दान, दण्ड, भेद—ये चार उपाय बताये हैं ॥ ८ ॥ | | ब्रह्मणास्य वरो दत्तस्तपसाराधितेन च ।<br>दुर्जयत्वं च सम्प्राप्तं वरदानप्रभावतः ॥ ९ | वृत्रासुरकी तपस्यासे प्रसन्न होकर ब्रह्माजीने इसे वरदान दिया है और उस वरदानके प्रभावसे यह दुर्जय हो गया है ॥ ९ ॥ |
| ७४४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ |
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| अजेयः सर्वभूतानां त्वष्ट्रा समुपपादितः।<br>ततो बलेन वृद्धिं स प्राप्तः परपुरञ्जयः ॥ १० | त्वष्टाके द्वारा उत्पन्न किया गया यह वृत्रासुर समस्त प्राणियोंके लिये अजेय हो गया है। शत्रुओंके राज्यको जीत लेनेवाला वह अपनी शक्तिसे अधिक प्रबल हो गया है ॥ १० ॥ |
| दुःसाध्योऽसौ सुराः शत्रुर्विना सामप्रतारणम्।<br>प्रलोभ्य वशमानेयो हन्तव्यस्तु ततः परम् ॥ ११ | हे देवताओ! बिना सामनीतिके प्रयोगके वह वृत्रासुर देवताओंके लिये दुःसाध्य है, अतः पहले इसे प्रलोभन देकर वशमें करना चाहिये, तत्पश्चात् मार डालना चाहिये ॥ ११ ॥ |
| गच्छध्वं सर्वगन्धर्वा यत्रास्ति बलवत्तरः।<br>साम तस्य प्रयुञ्जध्वं तत एनं विजेष्यथ ॥ १२ | हे गन्धर्वगण! जहाँ वह बलवान् वृत्रासुर रहता है, वहाँ तुमलोग जाओ और उसपर सामनीतिका प्रयोग करो; तभी उसपर विजय प्राप्त कर सकोगे ॥ १२ ॥ |
| सङ्गम्य शपथान्कृत्वा विश्वास्य समयेन हि।<br>मित्रत्वं च समाधाय हन्तव्यः प्रबलो रिपुः ॥ १३ | वहाँ जाकर अनेक शपथें खाकर सन्धिके द्वारा उसे विश्वासमें ले करके और पुनः मित्रताकर बादमें उस प्रबल शत्रुको मार डालना चाहिये ॥ १३ ॥ |
| अदृश्यः सम्प्रवेक्ष्यामि वज्रमस्य वरायुधम्।<br>साहाय्यं च करिष्यामि शक्रस्याहं सुरोत्तमाः ॥ १४ | हे श्रेष्ठ देवगण! मैं अदृश्य रूपमें इन्द्रके श्रेष्ठ आयुध वज्रमें प्रवेश कर जाऊँगा और उनकी सहायता करूँगा ॥ १४ ॥ |
| समयं च प्रतीक्षध्वं सर्वथैवायुषः क्षये।<br>मरणं विबुधास्तस्य नान्यथा सम्भविष्यति ॥ १५ | हे देवताओ! अब आपलोग समयकी प्रतीक्षा करें, वृत्रासुरकी आयुके क्षीण होनेपर ही उसकी मृत्यु होगी, अन्य किसी भी प्रकारसे नहीं ॥ १५ ॥ |
| गच्छध्वमृषिभिः सार्धं गन्धर्वाः कपटावृताः।<br>इन्द्रेण सह मित्रत्वं कुरुध्वं वाक्यदानतः ॥ १६ | हे गन्धर्वगण! तुमलोग वेष बदलकर ऋषियोंके साथ उसके पास जाओ और वचनबद्धतापूर्वक इन्द्रके साथ उसकी मित्रता करा दो ॥ १६ ॥ |
| यथा स याति विश्वासं तथा कार्यं प्रतारणम्।<br>गुप्तोऽहं सम्प्रवेक्ष्यामि पविं सञ्छादितं दृढम् ॥ १७ | जिस प्रकारसे उसका विश्वास दृढ़ हो जाय, वैसा ही आप सबको करना चाहिये। मैं सुदृढ़ तथा आवरणयुक्त वज्रमें गुप्तरूपसे प्रवेश कर जाऊँगा ॥ १७ ॥ |
| विश्वस्तं मघवा शत्रुं हनिष्यति न चान्यथा।<br>विश्वासस्य कृते पापं कृत्वा शक्रस्तु पृष्ठतः ॥ १८<br><br>मत्सहायोऽथ वज्रेण शातयिष्यति पापिनम्।<br>न दोषोऽत्र शठे शत्रौ शाठ्यमेव प्रकुर्वतः ॥ १९<br><br>नान्यथा बलवान्वध्यः शूरधर्मेण जायते।<br>वामनं रूपमाधाय माययं वञ्चितो बलिः ॥ २० | जब वृत्रासुरको पूर्ण विश्वास हो जाय तभी इन्द्र उस शत्रु का वध करेंगे। उसके वधका अन्य कोई उपाय नहीं है। वे इन्द्र विश्वासघात करके मेरी सहायतासे वज्रद्वारा पीछेसे उस पापीको मार डालेंगे। इस दुष्ट शत्रुके साथ शठता करनेमें दोष नहीं है। अन्यथा वह बलवान् वीरधर्मसे नहीं मारा जा सकेगा। पूर्वकालमें मैंने भी वामनरूप धारणकर बलिको वंचित किया था और मोहिनीरूप धारणकर सभी दैत्योंको छला था ॥ १८–२० १/२ ॥ |
| कृत्वा च मोहिनीवेषं दैत्याः सर्वेऽपि वञ्चिताः।<br>भवन्तः सहिताः सर्वे देवीं भगवतीं शिवाम् ॥ २१ | हे देवताओ! अब आप सब लोग एक साथ देवी भगवती शिवाकी शरणमें जायँ और भावपूर्वक |
| अ० ५ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७४५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गच्छध्वं शरणं भावैः स्तोत्रमन्त्रैः सुरोत्तमाः।<br>साहाय्यं सा योगमाया भवतां संविधास्यति॥ २२ | स्तोत्रों और मन्त्रोंसे उनकी स्तुति करें। वे भगवती योगमाया आपलोगोंकी सहायता करेंगी॥ २१-२२॥ |
| वन्दामहे सदा देवीं सात्त्विकीं प्रकृतिं पराम्।<br>सिद्धिदां कामदां कामां दुरापामकृतात्मभिः॥ २३ | हम सभी उन सात्त्विकी, परा प्रकृति, सिद्धिदात्री, कामनास्वरूपिणी, भक्तोंकी कामना पूर्ण करनेवाली और दुराचारियोंके लिये दुर्लभ देवीकी सदा वन्दना करते हैं॥ २३॥ |
| इन्द्रोऽपि तां समाराध्य हनिष्यति रिपुं रणे।<br>मोहिनी सा महामाया मोहयिष्यति दानवम्॥ २४<br><br>मोहितो मायया वृत्रः सुखसाध्यो भविष्यति।<br>प्रसन्नायां पराम्बायां सर्वं साध्यं भविष्यति॥ २५<br><br>नोचेन्मनोरथावाप्तिर्न कस्यापि भविष्यति।<br>अन्तर्यामिस्वरूपा सा सर्वकारणकारणा॥ २६<br><br>तस्मात्तां विश्वजननीं प्रकृतिं परमादृताः।<br>भजध्वं सात्त्विकैर्भावैः शत्रुनाशाय सत्तमाः॥ २७ | इन्द्र भी उनकी आराधना करके युद्धमें शत्रुको मार डालेंगे। वे मोहिनी महामाया उस दानव वृत्रासुरको मोहित कर देंगी। तब मायासे मोहित वृत्रासुर सुगमतापूर्वक मारा जा सकेगा। उन पराम्बाके प्रसन्न होनेपर सब कुछ साध्य हो जायगा। अन्यथा किसीकी भी कामनाकी पूर्ति नहीं होगी। वे भगवती सबकी अन्तर्यामिस्वरूपिणी और सभी कारणोंकी भी कारण हैं। इसलिये हे श्रेष्ठ देवगण! शत्रुके विनाशके लिये सात्त्विक भावोंसे युक्त होकर उन प्रकृतिस्वरूपा जगज्जननीका परम आदरपूर्वक भजन कीजिये॥ २४-२७॥ |
| पुरा मयापि संग्रामं कृत्वा परमदारुणम्।<br>पञ्चवर्षसहस्राणि निहतौ मधुकैटभौ॥ २८<br><br>स्तुता मया तदात्यर्थं प्रसन्ना प्रकृतिः परा।<br>मोहितौ तौ तदा दैत्यौ छलेन च मया हतौ॥ २९<br><br>विप्रलब्धौ महाबाहू दानवौ मदगर्वितौ।<br>तथा कुरुध्वं प्रकृतेर्भजनं भावसंयुताः॥ ३०<br><br>सर्वथा कार्यसिद्धिं सा करिष्यति सुरोत्तमाः।<br>एवं ते दत्तमतयो विष्णुना प्रभविष्णुना॥ ३१ | पूर्वकालमें मैंने भी पाँच हजार वर्षोंतक अत्यन्त भीषण युद्ध करके मधु-कैटभका वध किया था। उस समय मैंने उन पराप्रकृतिकी स्तुति की थी, तब वे अत्यन्त प्रसन्न हो गयी थीं। तत्पश्चात् उनके द्वारा मोहित दोनों दैत्योंको मैंने छलपूर्वक मार डाला था। मोहित किये गये विशाल भुजाओंवाले वे दोनों दानव अत्यन्त मदोन्मत्त थे। इसलिये आपलोग भी उसी प्रकार भावपूर्वक उन पराप्रकृतिका भजन कीजिये। हे देवगण! वे सब प्रकारसे कार्यकी सिद्धि करेंगी॥ २८-३० १/२॥ |
| जग्मुस्ते मेरुशिखरं मन्दारद्रुममण्डितम्।<br>एकान्ते संस्थिता देवाः कृत्वा ध्यानं जपं तपः॥ ३२<br><br>तुष्टुवुर्जगतां धात्रीं सृष्टिसंहारकारिणीम्।<br>भक्तकामदुघामम्बां संसारक्लेशनाशिनीम्॥ ३३ | इस प्रकार भगवान् विष्णुसे परामर्श प्राप्त करके वे मन्दार वृक्षोंसे सुशोभित सुमेरुपर्वतके शिखरपर चले गये। वे देवता वहाँ एकान्तमें बैठकर ध्यान, जप और तप करके जगत्का सृजन-पालन-संहार करनेवाली, भक्तोंके लिये कामधेनुस्वरूपा एवं संसारके क्लेशोंका नाश करनेवाली पराम्बा भगवतीकी इस प्रकार स्तुति करने लगे॥ ३१-३३॥ |
| देवा ऊचुः<br>देवि प्रसीद परिपाहि सुरान्प्रतप्तान्<br>वृत्रासुरेण समरे परिपीडितांश्च।<br>दीनार्तिनाशनपरे परमार्थतत्त्वे<br>प्राप्तांस्त्वदङ्घ्रिकमलं शरणं सदैव॥ ३४ | **देवता बोले—**हे देवि! हे दीनोंके कष्ट दूर करनेवाली! हे परमार्थतत्त्वस्वरूपिणि! हमपर प्रसन्न हों, वृत्रासुरके द्वारा सताये गये, युद्धमें अत्यन्त पीड़ित किये गये तथा आपके चरणकमलकी शरणमें सदासे पड़े हुए हम देवताओंकी रक्षा कीजिये॥ ३४॥ |
| ७४६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| त्वं सर्वविश्वजननी परिपालयास्मान्<br>पुत्रानिवातिपतितान् रिपुसङ्कटेऽस्मिन् ।<br>मातर्न तेऽस्त्यविदितं भुवनत्रयेऽपि<br>कस्मादुपेक्षसि सुरानसुरप्रतप्तान् ॥ ३५ | हे माता! आप समस्त विश्वकी जननी हैं, शत्रुद्वारा उपस्थित किये गये इस संकटमें पड़े हुए हम सबका आप पुत्रोंके समान परिपालन कीजिये। आपसे तीनों लोकोंमें कुछ भी अज्ञात नहीं है, तो आप असुरोंके द्वारा पीड़ित देवताओंकी उपेक्षा क्यों कर रही हैं?॥ ३५॥ |
| त्रैलोक्यमेतदखिलं विहितं त्वयैव<br>ब्रह्मा हरिः पशुपतिस्तव वासनोत्थाः।<br>कुर्वन्ति कार्यमखिलं स्ववशा न ते ते<br>भ्रूभङ्गचालनवशाद्विहरन्ति कामम् ॥ ३६ | आपने ही इस सम्पूर्ण त्रिलोकीकी रचना की है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव आपके ही संकल्पसे उत्पन्न हुए हैं। आपके भृकुटि-विलासमात्रसे वे [सृजन, पालन तथा संहार] समस्त कार्य करते हैं और यथेच्छ विहार करते हैं; वे भी स्वतन्त्र नहीं हैं॥ ३६॥ |
| माता सुतान्यरिभवात्परिपाति दीनान्<br>रीतिस्त्वयैव रचिता प्रकटापराधान्।<br>कस्मान्न पालयसि देवि विनापराधा-<br>नस्मांस्त्वदङ्घ्रिशरणान्करुणारसाब्धे ॥ ३७ | हे देवि! माता प्रत्यक्ष अपराधवाले अपने दुःखी पुत्रोंकी भी कष्टसे सब प्रकारसे रक्षा करती है—यह रीति आपके ही द्वारा निर्मित है; तब हे करुणारसकी समुद्रस्वरूपिणि! आप अपने चरणोंकी शरणमें पड़े हुए हम निरपराध देवताओंका पालन क्यों नहीं कर रही हैं?॥ ३७॥ |
| नूनं मदङ्घ्रिभजनाप्तपदाः किलैते<br>भक्तिं विहाय विभवे सुखभोगलुब्धाः।<br>नेमे कटाक्षविषया इति चेन्न चैषा<br>रीतिः सुते जननकर्तरि चापि दृष्टा ॥ ३८ | हे जननि! यदि आप सोचती हों कि मेरे चरणकमलोंकी आराधनासे राज्य प्राप्त करके देवता मेरी भक्ति छोड़कर वैभव-सुखोंके भोगमें आसक्त हो जायेंगे और इन्हें मेरे कृपाकटाक्षकी आवश्यकता नहीं रह जायगी तो ऐसा सामान्यतः होता ही है, फिर भी जन्म देनेवाली माता अपने पुत्रके प्रति ऐसी भावना रखे—यह रीति कहीं देखी नहीं गयी॥ ३८॥ |
| दोषो न नोऽत्र जननि प्रतिभाति चित्ते<br>यत्ते विहाय भजनं विभवे निमग्नाः।<br>मोहस्त्वया विरचितः प्रभवत्यसौ न-<br>स्तस्मात्स्वभावकरुणे दयसे कथं न॥ ३९ | हे जननि! आपका भजन त्यागकर हमलोग जो भोगमें निमग्न हैं—इसमें हमारे चित्तमें अपना दोष नहीं प्रतीत होता; क्योंकि मोहकी रचना आपने ही की है और वह हमलोगोंको मोहित कर देता है। ऐसी परिस्थितिमें हे करुणामय स्वभाववाली! आप हमपर दया क्यों नहीं करतीं?॥ ३९॥ |
| पूर्वं त्वया जननि दैत्यपतिर्बलिष्ठो<br>व्यापादितो महिषरूपधरः किलाजौ।<br>अस्मत्कृते सकललोकभयावहोऽसौ<br>वृत्रं कथं न भयदं विधुनोषि मातः॥ ४० | हे जननि! पूर्वकालमें आपने हमलोगोंके कल्याणार्थ सभीके लिये भयकारी महिषरूप धारण करनेवाले बलवान् दैत्यराजका वध किया था। हे माता! भय प्रदान करनेवाले वृत्रासुरका भी वध आप क्यों नहीं करतीं?॥ ४०॥ |
| अ० ५ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७४७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शुम्भस्तथातिबलवाननुजो निशुम्भ-<br>स्तौ भ्रातरौ तदनुगा निहता हतौ च।<br>वृत्रं तथा जहि खलं प्रबलं दयार्द्वे<br>मत्तं विमोहय तथा न भवेद्यथासौ॥ ४१<br><br>त्वं पालयाद्य विबुधानसुरेण मातः<br>सन्तापितानतितरां भयविह्वलांश्च।<br>नान्योऽस्ति कोऽपि भुवनेषु सुरार्तिहन्ता<br>यः क्लेशजालमखिलं निदहेत्स्वशक्त्या॥ ४२ | शुम्भ और उसके बलवान् भाई निशुम्भ—उन दोनों भाइयोंको आपने मार डाला था और उनके अनुचरोंका भी वध कर दिया था। उसी प्रकार हे दयासे आर्द्रहृदयवाली! अत्यन्त बलशाली, उन्मत्त तथा दुष्ट वृत्रासुरको भी मार डालिये। आप इसे विमोहित कर दें, जिससे यह भी उनकी तरह न हो सके। हे माता! असुरोंके द्वारा अत्यधिक पीड़ित किये गये तथा भयसे व्याकुल हम देवताओंका अब आप ही पालन कीजिये; क्योंकि तीनों लोकोंमें ऐसा कोई नहीं है जो देवताओंका दुःख दूर कर सके और अपनी शक्तिसे सम्पूर्ण कष्टके समूहको नष्ट कर सके॥ ४१-४२॥ |
| वृत्रे दया तव यदि प्रथिता तथापि<br>जह्येनमाशु जनदुःखकरं खलं च।<br>पापात्समुद्धर भवानि शरैः पुनाना<br>नोचेत्प्रयास्यति तमो ननु दुष्टबुद्धिः॥ ४३ | यदि वृत्रासुरपर आपकी अत्यधिक दया हो तो भी आप हमलोगोंके लिये संतापकारक इस दुष्टको शीघ्र ही मार डालिये। हे भवानि! अपने बाणोंसे इसको पवित्र करती हुई आप पापसे इसका उद्धार कर दीजिये, अन्यथा यह दुष्टबुद्धि वृत्रासुर नरक प्राप्त करेगा॥ ४३॥ |
| ते प्रापिताः सुरवनं विबुधारयो ये<br>हत्वा रणेऽपि विशिखैः किल पावितास्ते।<br>त्राता न किं निरयपातभयाद्दयार्दे<br>यच्छत्रवोऽपि न हि किं विनिहंसि वृत्रम्॥ ४४ | जिन दानवोंको युद्धमें आपने बाणोंद्वारा मारकर पवित्र बना दिया, वे नन्दनवनको प्राप्त हो गये। हे दयार्द्र स्वभाववाली! क्या आपने नरकमें गिरनेके भयसे उन शत्रुओंकी रक्षा नहीं की? तो फिर आप वृत्रासुरको क्यों नहीं मारती हैं॥ ४४॥ |
| जानीमहे रिपुरसौ तव सेवको न<br>प्रायेण पीडयति नः किल पापबुद्धिः।<br>यस्तावकस्त्विह भवेदमरानसौ किं<br>त्वत्पादपङ्कजरतान्ननु पीडयेद्वा॥ ४५ | हम यह जानते हैं कि वह आपका सेवक नहीं, शत्रु ही है; क्योंकि वह दुष्ट पापबुद्धि हम सबको सदैव सताया करता है। आपके चरणकमलोंकी भक्तिमें रत हम देवताओंको पीड़ित करनेवाला वह (वृत्रासुर) आपका भक्त कैसे हो सकता है?॥ ४५॥ |
| कुर्मः कथं जननि पूजनमद्य तेऽम्ब<br>पुष्पादिकं तव विनिर्मितमेव यस्मात्।<br>मन्त्रा वयं च सकलं परशक्तिरूपं<br>तस्माद्भवानि चरणे प्रणताः स्म नूनम्॥ ४६ | हे जननि! हे अम्ब! हम आज आपकी पूजा कैसे करें; क्योंकि पुष्पादि [पूजोपचार] तो आपके द्वारा ही बनाये गये हैं। मन्त्र, हमलोग तथा अन्य सब कुछ आपकी पराशक्तिके ही रूप हैं, अतः हे भवानि! हम केवल आपके चरणोंकी शरण ले सकते हैं॥ ४६॥ |
| धन्यास्त एव मनुजा हि भजन्ति भक्त्या<br>पादाम्बुजं तव भवाब्धिजलेषु पोतम्।<br>यं योगिनोऽपि मनसा सततं स्मरन्ति<br>मोक्षार्थिनो विगतरागविकारमोहाः॥ ४७ | वे ही मनुष्य धन्य हैं, जो भवसागरसे पार उतारनेवाले पोतसदृश आपके चरणकमलका निरन्तर भक्तिभावसे भजन करते हैं और राग, मोह आदि विकारोंसे रहित मोक्षकामी योगी भी मनसे जिसका निरन्तर स्मरण करते हैं॥ ४७॥ |
| ७४८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ये याज्ञिकाः सकलवेदविदोऽपि नूनं<br>त्वां संस्मरन्ति सततं किल होमकाले।<br>स्वाहां तु तृप्तिजननीममरेश्वराणां<br>भूयः स्वधां पितृगणस्य च तृप्तिहेतुम्॥ ४८ | समस्त वेदोंमें पारंगत वे यज्ञकर्ता भी निश्चय ही धन्य हैं, जो हवनके समय देवताओंको तृप्ति देनेवाली स्वाहा और पितरोंको तृप्ति देनेवाली स्वधाके रूपमें आपका निरन्तर स्मरण करते हैं॥ ४८ ॥ |
| मेधासि कान्तिरसि शान्तिरपि प्रसिद्धा<br>बुद्धिस्त्वमेव विशदार्थकरी नराणाम्।<br>सर्वं त्वमेव विभवं भुवनत्रयेऽस्मिन्-<br>कृत्वा ददासि भजतां कृपया सदैव॥ ४९ | आप ही मेधा हैं, आप ही कान्ति हैं, आप ही शान्ति हैं और मनुष्योंका महान् मनोरथ पूर्ण करनेवाली प्रख्यात बुद्धि भी आप ही हैं। समस्त ऐश्वर्यकी रचना करके आप इस त्रिलोकीमें कृपा करके अपनी आराधना करनेवालेको वैभव प्रदान करती रहती हैं॥ ४९ ॥ |
| व्यास उवाच<br>एवं स्तुता सुरैर्देवी प्रत्यक्षा साभवत्तदा।<br>चारुरूपधरा तन्वी सर्वाभरणभूषिता॥ ५० | व्यासजी बोले— इस प्रकार देवताओंके स्तुति करनेपर वे भगवती प्रकट हो गयीं। उन्होंने सुन्दर रूप धारण कर रखा था, वे कोमल विग्रहवाली थीं और समस्त आभूषणोंसे सुसज्जित थीं॥ ५० ॥ |
| पाशांकुशवराभीतिलसद्बाहुचतुष्टया ।<br>रणत्किङ्किणिकाजालरसनाबद्धसत्कटिः ॥ ५१ | वे पाश, अंकुश, वर और अभयमुद्रासे सुशोभित चार भुजाओंसे युक्त थीं, उनकी कमरमें बँधी हुई करधनीके घुँघरू बज रहे थे॥ ५१ ॥ |
| कलकण्ठीरवा कान्ता क्वणत्कङ्कणनूपुरा।<br>चन्द्रखण्डसमाबद्धरत्नमौलिर्विराजिता ॥ ५२ | उन कान्तिमयी भगवतीकी ध्वनि कोयलके समान थी, उनके हाथोंके कंकण और चरणोंके नूपुर बज रहे थे। उनके मस्तकपर अर्धचन्द्रसे मण्डित रत्नमुकुट सुशोभित हो रहा था॥ ५२ ॥ |
| मन्दस्मितारविन्दास्या नेत्रत्रयविभूषिता।<br>पारिजातप्रसूनाच्छनालवर्णसमप्रभा ॥ ५३ | वे मन्द-मन्द मुसकरा रही थीं, उनका मुख कमलके समान सुशोभित हो रहा था, वे तीन नेत्रोंसे विभूषित थीं तथा पारिजातके पुष्प-नालकी भाँति उनके शरीरकी कान्ति रक्तवर्ण थी॥ ५३ ॥ |
| रक्ताम्बरपरीधाना रक्तचन्दनचर्चिता।<br>प्रसादसुमुखी देवी करुणारससागरा॥ ५४<br><br>सर्वशृङ्गारवेषाढ्या सर्वद्वैतारणिः परा।<br>सर्वज्ञा सर्वकर्त्री च सर्वाधिष्ठानरूपिणी॥ ५५<br><br>सर्ववेदान्तसंसिद्धा सच्चिदानन्दरूपिणी।<br>प्रणेमुस्तां समालोक्य सुरा देवीं पुरःस्थिताम्॥ ५६<br>तानाह प्रणतानम्बा किं वः कार्यं ब्रुवन्तु माम्। | वे लाल रंगके वस्त्र धारण किये हुए थीं और उनके शरीरपर रक्त चन्दन अनुलिप्त था। करुणारसकी सागर वे भगवती प्रसन्न मुख-मण्डलसे शोभा पा रही थीं। वे समस्त शृंगार-वेषसे विभूषित थीं। वे देवी द्वैतभावके लिये अरणीस्वरूपा, परा, सब कुछ जाननेवाली, सबकी रचना करनेवाली, सबकी अधिष्ठानस्वरूपा, सभी वेदान्तोंद्वारा प्रतिपादित और सच्चिदानन्दरूपिणी हैं। उन देवीको अपने सम्मुख स्थित देखकर देवताओंने उन्हें प्रणाम किया। तब उन प्रणत देवताओंसे भगवती अम्बिकाने कहा—आपलोग मुझे अपना कार्य बतायें॥ ५४—५६ १/२ ॥ |
| अ० ६ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७४९ |
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| देवा ऊचुः | देवता बोले— आप देवताओंके लिये अत्यन्त दुःखदायी इस शत्रु वृत्रासुरको विमोहित कर दीजिये। उसे आप ऐसा विमोहित कर दें, जिससे वह देवताओंपर विश्वास करने लगे और हमारे आयुधमें इतनी शक्ति भर दीजिये, जिससे यह शत्रु मारा जा सके॥ ५७-५८॥ | | मोहयैनं रिपुं वृत्रं देवानामतिदुःखदम्॥ ५७ | | | यथा विश्वसते देवांस्तथा कुरु विमोहितम्। | | | आयुधे च बलं देहि हतः स्याद्येन वा रिपुः॥ ५८ | | | व्यास उवाच | व्यासजी बोले— तब 'तथास्तु'—ऐसा कहकर भगवती वहीं अन्तर्धान हो गयीं और देवता भी प्रसन्न होकर अपने-अपने भवनोंको चले गये॥ ५९॥ | | तथेत्युक्त्वा भगवती तत्रैवान्तरधीयत। | | | स्वानि स्वानि निकेतानि जग्मुर्देवा मुदान्विताः॥ ५९ | |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे देवीसमाराधनाय देवकृतस्तुतिवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
अथ षष्ठोऽध्यायः
भगवान् विष्णुका इन्द्रको वृत्रासुरसे सन्धिका परामर्श देना, ऋषियोंकी मध्यस्थतासे इन्द्र और वृत्रासुरमें सन्धि, इन्द्रद्वारा छलपूर्वक वृत्रासुरका वध
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— इस प्रकार वरप्राप्त उन देवता और तपस्वी ऋषिगणोंने (परस्पर मन्त्रणा करके वृत्रासुरके उत्तम आश्रमके लिये प्रस्थान किया) वहाँ तेजसे प्रकाशमान वृत्रासुरको देखा, जो तीनों लोकोंको भस्मसात् करने और देवताओंको निगल जानेके लिये उद्यत प्रतीत होता था। ऋषियोंने वृत्रासुरके समीप जाकर देवताओंकी कार्य-सिद्धिके लिये उससे सामनीतिपूर्ण तथा रसमय प्रिय वचन कहा॥ १-२ ½॥ |
|---|---|
| एवं प्राप्तवरा देवा ऋषयश्च तपोधनाः।<br>( जग्मुः सर्वे च सम्मन्त्र्य वृत्रस्याश्रममुत्तमम् ।)<br>ददृशुस्तत्र तं वृत्रं ज्वलन्तमिव तेजसा॥ १ | |
| धक्ष्यन्तमिव लोकांस्त्रीन्ग्रसन्तमिव चामरान्।<br>ऋषयोऽथ ततोऽभ्येत्य वृत्रमूचुः प्रियं वचः॥ २ | |
| देवकार्यार्थसिद्धयर्थं सामयुक्तं रसात्मकम्। | |
| ऋषय ऊचुः | ऋषि बोले— सब लोकोंके लिये भयंकर हे महाभाग वृत्रासुर! आपने इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको व्याप्त कर लिया है, परंतु इन्द्रके साथ आपका वैर आपके सुखको नष्ट करनेवाला है। यह आप दोनोंके लिये दुःखद और चिन्ता बढ़ानेका परम कारण है। न आप सुखसे सो पाते हैं, न ही इन्द्र सन्तुष्ट होकर सोते हैं; क्योंकि आप दोनोंको शत्रु-जन्य भय बना रहता है। आप दोनोंको युद्ध करते हुए भी बहुत समय व्यतीत हो गया है; इससे देवताओं, राक्षसों तथा मनुष्योंसहित समस्त प्रजाको कष्ट हो रहा है॥ ३-६ ½॥ |
| वृत्र वृत्र महाभाग सर्वलोकभयङ्कर॥ ३ | |
| व्याप्तं त्वयैतत्सकलं ब्रह्माण्डमखिलं किल।<br>शक्रेण तव वैरं यत्तत्तु सौख्यविघातकम्॥ ४ | |
| युवयोर्दुःखदं कामं चिन्तावृद्धिकरं परम्।<br>न त्वं स्वपिषि सन्तुष्टो न चापि मघवा तथा॥ ५ | |
| सुखं स्वपिति चिन्तार्तो द्वयोर्यद्वैरिजं भयम्।<br>युवयोर्युध्यतोः कालो व्यतीतस्तु महानिह॥ ६ | |
| पीड्यन्ते च प्रजाः सर्वाः सदेवासुरमानवाः। |
| ७५० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| संसारेऽत्र सुखं ग्राह्यं दुःखं हेयमिति स्थितिः॥ ७<br>न सुखं कृतवैरस्य भवतीति विनिर्णयः।<br>संग्रामरसिकाः शूराः प्रशंसन्ति न पण्डिताः॥ ८<br>युद्धं शृङ्गारचतुरा इन्द्रियार्थविघातकम्।<br>पुष्पैरपि न योद्धव्यं किं पुनर्निशितैः शरैः॥ ९ | इस संसारमें सुख ही ग्राह्य है और दुःख सर्वथा त्याज्य है—यही परम्परा है। वैर करनेवालेको सुख नहीं प्राप्त होता, यह निश्चित सिद्धान्त है। इसलिये युद्धप्रेमी वीर इन्द्रिय सुखको नष्ट करनेवाले युद्धकी प्रशंसा करते हैं, किंतु शृंगाररसके प्रेमी विद्वान् उसकी प्रशंसा नहीं करते। पुष्पोंसे भी युद्ध नहीं करना चाहिये, फिर तीक्ष्ण बाणोंकी तो बात ही क्या?॥ ७–९॥ |
| युद्धे विजयसन्देहो निश्चयं बाणताडनम्।<br>दैवाधीनमिदं विश्वं तथा जयपराजयौ॥ १०<br>दैवाधीनाविति ज्ञात्वा न योद्धव्यं कदाचन।<br>कालेऽथ भोजनं स्नानं शय्यायां शयनं तथा॥ ११<br>परिचर्यापरा भार्या संसारे सुखसाधनम्।<br>किं सुखं युध्यतः संख्ये बाणवृष्टिभयङ्करे॥ १२<br>खड्गपातातिरौद्रे च तथारातिसुखप्रदे।<br>संग्रामे मरणात्स्वर्गसुखप्राप्तिरिति स्फुटम्॥ १३ | युद्धमें विजय ही हो—यह सन्देहास्पद है, परंतु उसमें बाणोंसे शरीरको पीड़ा प्राप्त होना निश्चित है। यह समस्त विश्व दैवके अधीन है, उसी प्रकार जय-पराजय भी उसीके अधीन हैं। अतः इन्हें दैवाधीन जानकर युद्ध कभी नहीं करना चाहिये। समयपर स्नान, भोजन, शय्यापर शयन और सेवा-परायण पत्नी—ये ही संसारमें सुखके साधन हैं। बाणवर्षासे भयंकर, खड्ग-प्रहारसे अत्यन्त रौद्र तथा शत्रुको सुख प्रदान करनेवाले संग्राममें युद्ध करनेसे क्या सुख प्राप्त हो सकता है?॥ १०–१२½॥ |
| प्रलोभनपरं वाक्यं नोदनार्थं निरर्थकम्।<br>छित्त्वा देहं व्यथां प्राप्य शृगालकरटादिभिः॥ १४<br>पश्चात्स्वर्गसुखावाप्तिं को वा वाञ्छति मन्दधीः।<br>सख्यं भवतु ते वृत्र शक्रेण सह नित्यदा॥ १५ | ऐसा स्पष्ट कथन है कि युद्धमें मरनेसे स्वर्ग-सुखकी प्राप्ति होती है—यह तो प्रलोभन और प्रेरणा देनेवाला तथा निरर्थक वचन है। ऐसा कौन मन्दबुद्धि है जो शरीरको अस्त्र-शस्त्रोंसे घायल कराकर सियार और कौओंसे नोचवाकर स्वर्गसुखकी प्राप्तिकी कामना करेगा!॥ १३-१४½॥ |
| अवाप्स्यसि सुखं त्वं च शक्रश्चापि निरन्तरम्।<br>वयं च तापसाः सर्वे गन्धर्वाश्च निजाश्रमे॥ १६<br>सुखवासं गमिष्यामः शान्ते वैरेऽधुनैव वाम्।<br>संग्रामे युवयोर्धीर वर्तमाने दिवानिशम्॥ १७<br>पीड्यन्ते मुनयः सर्वे गन्धर्वाः किन्नरा नराः।<br>सर्वेषां शान्तिकामनां सख्यमिच्छामहे वयम्॥ १८ | हे वृत्र! इन्द्रके साथ तुम्हारी स्थायी मैत्री हो जाय, जिससे तुम्हें और इन्द्र—दोनोंको निरन्तर सुखकी प्राप्ति हो। आप दोनोंका वैर शान्त हो जानेसे हम सब तपस्वी और गन्धर्वगण भी अपने-अपने आश्रमोंमें सुखपूर्वक रह सकेंगे। हे धीर! आप दोनोंके दिन-रातके युद्धमें हम सभी मुनियों, गन्धर्वों, किन्नरों और मनुष्योंको कष्ट प्राप्त होता है। सभी लोगोंको शान्ति प्राप्त हो सके—इस कामनासे हम सब आप दोनोंमें मैत्री कराना चाहते हैं॥ १५–१८॥ |
| मुनयस्त्वं च शक्रश्च प्राप्नुवन्तु सुखं किल।<br>मध्यस्थाश्च वयं वृत्र युवयोः सख्यकारणे॥ १९<br>शपथं कारयित्वात्र योजयामो मिथः प्रियम्।<br>शक्रस्तु शपथान्कृत्वा यथोक्तांश्च तवाग्रतः॥ २० | हे वृत्र! मुनिगण, तुम्हें और इन्द्रको सुख प्राप्त हो। हमलोग तुम दोनोंकी मित्रता करानेमें मध्यस्थ बनेंगे। हम शपथ कराकर आप दोनोंको एक-दूसरेका प्रिय मित्र बना देंगे। आप जैसा कहेंगे, वैसे ही इन्द्र भी आपके सम्मुख शपथ लेकर आपके मनको प्रेमसे |
| अ० ६ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७५१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| चित्तं ते प्रीतिसंयुक्तं करिष्यति तु साम्प्रतम्।<br>सत्याधारा धरा नूनं सत्येन च दिवाकरः॥ २१<br>तपत्ययं यथाकालं वायुः सत्येन वात्यथ।<br>उदन्वानपि मर्यादां सत्येनैव न मुञ्चति॥ २२<br>तस्मात्सत्येन सख्यं वा भवत्वद्य यथासुखम्।<br>एकत्र शयनं क्रीडा जलकेलिः सुखासनम्॥ २३<br>युवाभ्यां सर्वथा कार्यं कर्तव्यं सख्यमेत्य च। | परिपूर्ण कर देंगे। सत्यके आधारपर ही यह पृथ्वी स्थित है, सत्यसे ही भगवान् सूर्य नित्य तपते हैं, सत्यसे ही समयके अनुसार वायु बहती है और सत्यके कारण ही समुद्र भी अपनी मर्यादाका परित्याग नहीं करता। इसलिये सत्यके आधारपर ही आज आप दोनोंमें मित्रता हो जाय, जिससे आपलोग सुखपूर्वक साथ-साथ शयन, क्रीडा, जलकेलि कर सकें और बैठ सकें। इसलिये आप दोनोंको एकत्रित होकर अवश्य ही मित्रता कर लेनी चाहिये॥ १९—२३ १/२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>महर्षिवचनं श्रुत्वा तानुवाच महामतिः॥ २४<br>अवश्यं भगवन्तो मे माननीयास्तपस्विनः।<br>भवन्तो मुनयः क्वापि न मिथ्यावादिनो भृशम्॥ २५<br>सदाचाराः सुशान्ताश्च न विदुश्छलकारणम्।<br>कृतवैरे शठे स्तब्धे कामुके च गतत्विषि॥ २६<br>निर्लज्जे नैव कर्तव्यं सख्यं मतिमता सदा।<br>निर्लज्जोऽयं दुराचारो ब्रह्महा लम्पटः शठः॥ २७<br>न विश्वासस्तु कर्तव्यः सर्वथैवेदृशे जने।<br>भवन्तो निपुणाः सर्वे न द्रोहमतयः सदा॥ २८<br>अनभिज्ञास्तु शान्तत्वाच्चित्तानामतिवादिनाम्। | व्यासजी बोले—उन महर्षियोंका वचन सुनकर अत्यन्त बुद्धिमान् वृत्रासुरने कहा—हे भगवन्! आप सभी तपस्वीगण मेरे मान्य हैं। आप मुनिगण कभी असत्य भाषण नहीं करते। आपलोग सदाचारी तथा अति शान्त स्वभाववाले हैं और छल करना नहीं जानते। किंतु वैरी, मूर्ख, जड़, कामी, कलंकित और निर्लज्जसे बुद्धिमान्को मित्रता नहीं करनी चाहिये। यह (इन्द्र) निर्लज्ज, दुराचारी, ब्राह्मणघाती, लम्पट और मूर्ख है—इस प्रकारके व्यक्तिका विश्वास नहीं करना चाहिये। आप सभी लोग कुशल हैं, किंतु द्रोह-बुद्धिवाले कभी नहीं हैं। आप सब शान्तचित्त होनेके कारण अतिवादियोंके मनकी बात नहीं जानते॥ २४—२८ १/२ ॥ |
| मुनय ऊचुः<br>जन्तुः कृतस्य भोक्ता वै शुभस्य त्वशुभस्य च॥ २९<br>द्रोहं कृत्वा कुतः शान्तिमाप्नुयान्नष्टचेतनः।<br>विश्वासघातकर्तारो नरकं यान्ति निश्चयम्॥ ३०<br>दुःखं च समवाप्नोति नूनं विश्वासघातकः।<br>निष्कृतिर्ब्रह्महन्तॄणां सुरापानां च निष्कृतिः॥ ३१<br>विश्वासघातिनां नैव मित्रद्रोहकृतामपि।<br>समयं ब्रूहि सर्वज्ञ यथा ते चेतसि ध्रुवम्॥ ३२<br>तेनैव समयेनाद्य सन्धिः स्यादुभयोः किल। | मुनि बोले—प्रत्येक प्राणी अपने किये हुए शुभाशुभ कर्मोंका फल भोगता है। जिसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी हो, वह द्रोह करके भी क्या शान्ति प्राप्त कर सकता है? विश्वासघात करनेवाले निश्चय ही नरकमें जाते हैं। विश्वासघाती निश्चितरूपसे दुःख प्राप्त करता है। ब्राह्मणकी हत्या करनेवालों और मद्यपान करनेवालोंके लिये तो प्रायश्चित्त है, परंतु विश्वासघातियों और मित्रद्रोहियोंके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं है। अतः हे सर्वज्ञ! आपने मनमें जो शर्त निश्चय कर रखी हो, उसे बताइये; जिससे उस शर्तके अनुसार आज ही आप दोनोंमें सन्धि हो जाय॥ २९—३२ १/२ ॥ |
| वृत्र उवाच<br>न शुष्केण न चार्द्रेण नाश्मना न च दारुणा॥ ३३<br>न वज्रेण महाभाग न दिवा निशि नैव च।<br>वध्यो भवेयं विप्रेन्द्राः शक्रस्य सह दैवतैः॥ ३४<br>एवं मे रोचते सन्धिः शक्रेण सह नान्यथा। | वृत्रासुर बोला—हे महाभाग! सभी देवताओंसहित इन्द्र न शुष्क या गीली वस्तुसे, न पत्थरसे, न काष्ठसे, न वज्रसे, न दिनमें और न रातमें मेरा वध कर सकें। हे विप्रेन्द्रो! इसी शर्तपर मैं इन्द्रसे सन्धि करना चाहता हूँ, अन्यथा नहीं॥ ३३—३४ १/२ ॥ |
| ७५२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ |
|---|
| व्यास उवाच | **व्यासजी बोले—**ऋषियोंने उससे आदरपूर्वक कहा—'ठीक है' और तत्पश्चात् देवराज इन्द्रको वहाँ बुलाकर उन्हें वह शर्त सुना दी। इन्द्रने भी मुनियोंकी उपस्थितिमें अग्निको साक्षी करके शपथें लीं और वे सन्तापसे मुक्त हो गये। वृत्रासुर भी उनकी बातोंसे विश्वासमें आ गया और इन्द्रके साथ मित्रकी भाँति व्यवहारपरायण हो गया॥ ३५—३७\frac{१}{२}॥ | | ऋषयस्तं तदा प्राहुर्बाढमित्येव चादृताः ॥ ३५<br>समयं श्रावयामासुस्तत्रानीय सुरेश्वरम् ।<br>इन्द्रोऽपि शपथांस्तत्र चकार विगतज्वरः ॥ ३६<br>साक्षिणं पावकं कृत्वा मुनीनां सन्निधौ किल ।<br>वृत्रस्तु वचनैस्तस्य विश्वासमगमत्तदा ॥ ३७ | | | बभूव मित्रवच्चक्रे सहचर्यापरायणः ।<br>कदाचिन्नन्दने चोभौ कदाचिद् गन्धमादने ॥ ३८<br>कदाचिदुदधेस्तीरे मोदमानौ विचेरतुः ।<br>एवं कृते च सन्धाने वृत्रः प्रमुदितोऽभवत् ॥ ३९<br>शक्रोऽपि वधकामस्तु तदुपायमचिन्तयत् ।<br>रन्ध्रान्वेषी समुद्विग्नस्तदासीन्मघवा भृशम् ॥ ४० | वे दोनों कभी नन्दनवनमें, कभी गन्धमादनपर्वतपर और कभी समुद्रके तटपर आनन्दपूर्वक विचरण करते थे। इस प्रकार सन्धि हो जानेपर वृत्रासुर बहुत प्रसन्न रहता था। लेकिन वधकी इच्छावाले इन्द्र उसके वधके उपाय सोचा करते थे। इन्द्र उसकी कमजोरी ढूँढ़नेके लिये सदा उद्विग्न रहते थे॥ ३८—४०॥ | | एवं चिन्तयतस्तस्य कालः समभवर्तत ।<br>विश्वासं परमं प्राप वृत्रः शक्रेऽतिदारुणे ॥ ४१<br>एवं कतिचिदब्दानि गतानि समये कृते ।<br>वृत्रस्य मरणोपायान्मनसीन्द्रोऽप्यचिन्तयत् ॥ ४२ | इन्द्रके इस प्रकार विचार करते हुए कुछ समय बीत गया। वृत्रासुरको अत्यन्त क्रूर इन्द्रपर अत्यधिक विश्वास हो गया। इस प्रकार सन्धिके कुछ वर्ष बीत जानेपर इन्द्रने मन-ही-मन वृत्रासुरके मरणका उपाय सोच लिया॥ ४१—४२॥ | | त्वष्टैकदा सुतं प्राह विश्वस्तं पाकशासने ।<br>पुत्र वृत्र महाभाग शृणु मे वचनं हितम् ॥ ४३<br>न विश्वासस्तु कर्तव्यः कृतवैरे कथञ्चन ।<br>मघवा कृतवैरस्ते सदासूयापरः परैः ॥ ४४ | एक बार त्वष्टाने इन्द्रपर बहुत अधिक विश्वास करनेवाले पुत्रसे कहा—हे पुत्र वृत्रासुर! हे महाभाग! मेरी हितकर बात सुनो, जिसके साथ शत्रुता हो चुकी हो, उसका विश्वास कभी नहीं करना चाहिये। इन्द्र तुम्हारा शत्रु है, वह दूसरोंके द्वारा तुम्हारे गुणोंमें सदा दोष ढूँढ़ा करता है॥ ४३-४४॥ | | लोभान्मत्तो द्वेषरतः परदुःखोत्सवान्वितः ।<br>परदारलम्पटः स पापबुद्धिः प्रतारकः ॥ ४५<br>रन्ध्रान्वेषी द्रोहपरो मायावी मदगर्वितः ।<br>यः प्रविश्योदरे मातर्गर्भच्छेदं चकार ह ॥ ४६<br>सप्तकृत्वः सप्तकृत्वः क्रन्दमानमनातुरः ।<br>तस्मात्पुत्र न कर्तव्यो विश्वासस्तु कथञ्चन ॥ ४७<br>कृतपापस्य का लज्जा पुनः पुत्र प्रकुर्वतः । | वह सदा लोभसे उन्मत्त रहनेवाला, सबसे द्वेष रखनेवाला, दूसरोंका दुःख देखकर सुखी रहनेवाला, परस्त्रीगामी, पापबुद्धि, कपटी, छिद्रान्वेषी, दूसरोंसे द्रोह करनेवाला, मायावी और अहंकारी है, जिसने कि एक बार माताके उदरमें प्रवेश करके उसके गर्भको सात भागोंमें काट डाला। तब उन्हें रोते देखकर उस निर्दयीने उनके भी पृथक्-पृथक् सात भाग कर दिये।* इसलिये हे पुत्र! उसपर किसी प्रकार भी विश्वास नहीं करना चाहिये। हे पुत्र! पाप करनेवालेको दोबारा पाप करनेमें क्या लज्जा!॥ ४५—४७\frac{१}{२}॥ |
* वे ही उनचास मरुद्गण बने।
अ० ६ ] षष्ठ स्कन्ध ७५३
अ० ६ ] षष्ठ स्कन्ध ७५३
| व्यास उवाच<br>एवं प्रबोधितः पित्रा वचनैर्हेतुसंयुतैः ॥ ४८<br>न बुबोध तदा वृत्र आसन्नमरणः किल। | व्यासजी बोले— इस प्रकार पिताद्वारा कल्याणकारी वचनोंसे समझाये जानेपर भी आसन्न-मृत्यु वृत्रासुरको कुछ भी चेत नहीं हुआ॥ ४८ १/२ ॥ | | स कदाचित्समुद्रान्ते तमपश्यन्महासुरम्॥ ४९<br>सन्ध्याकाल उपावृत्ते मुहूर्तेऽतीव दारुणे।<br>ततः सञ्चिन्त्य मघवा वरदानं महात्मनाम्॥ ५०<br>सन्ध्येयं वर्तते रौद्रा न रात्रिर्दिवसो न च।<br>हन्तव्योऽयं मया चाद्य बलेनैव न संशयः॥ ५१ | एक दिन उन्होंने (इन्द्रने) उस महान् दैत्यको समुद्रके तटपर देखा। उस समय संध्याकालका अत्यन्त भयंकर मुहूर्त उपस्थित था। तब इन्द्रने महात्मा मुनियोंद्वारा निर्धारित शर्त—वरदानपर यह विचार करके कि यह भयंकर संध्याकाल है, इस समय न दिन है, न रात है, अतः मुझे आज ही इसे अपनी शक्तिसे मार डालना चाहिये; इसमें सन्देह नहीं है॥ ४९—५१॥ | | एकाकी विजने चात्र सम्प्राप्तः समयोचितः।<br>एवं विचार्य मनसा सस्मार हरिमव्ययम्॥ ५२<br>तत्राजगाम भगवानदृश्यः पुरुषोत्तमः।<br>वज्रमध्ये प्रविश्यासौ संस्थितो भगवान्हरिः॥ ५३ | यहाँ एकान्त है और यह अकेला है तथा समय भी अनुकूल है—ऐसा विचारकर उन्होंने अपने मनमें अविनाशी भगवान् श्रीहरिका स्मरण किया। [स्मरण करते ही] पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु वहाँ अदृश्यरूपसे आ गये और वे प्रभु श्रीहरि इन्द्रके वज्रमें प्रविष्ट होकर विराजमान हो गये॥ ५२-५३॥ | | इन्द्रो बुद्धिं चकाराशु तदा वृत्रवधं प्रति।<br>इति सञ्चिन्त्य मनसा कथं हन्यां रिपुं रणे॥ ५४<br>अजेयं सर्वथा सर्वदेवैश्च दानवैस्तथा।<br>यदि वृत्रं न हन्यद्य वञ्चयित्वा महाबलम्॥ ५५<br>न श्रेयो मम नूनं स्यात्सर्वथा रिपुरक्षणात्।<br>अपां फेनं तदापश्यत्समुद्रे पर्वतोपमम्॥ ५६ | तब इन्द्र वृत्रासुरको मारनेकी युक्ति सोचने लगे कि सभी देवताओं तथा दानवोंसे सर्वथा अजेय इस शत्रुको युद्धमें कैसे मारूँ? यदि छल करके इस महाबलीको आज नहीं मारता तो इस शत्रुके जीवित रहते किसी भी प्रकार कल्याण नहीं है। इन्द्र ऐसा विचार कर ही रहे थे तभी उन्होंने समुद्रमें पर्वतके समान जलफेनको देखा॥ ५४—५६॥ | | नायं शुष्को न चार्द्रोऽयं न च शस्त्रमिदं तथा।<br>अपां फेनं तदा शक्रो जग्राह किल लीलया॥ ५७ | यह न सूखा है, न गीला है और यह न तो कोई शस्त्र है, [ऐसा विचारकर] इन्द्रने उस समुद्रफेनको लीलापूर्वक उठा लिया॥ ५७॥ | | परां शक्तिं च सस्मार भक्त्या परमया युतः।<br>स्मृतमात्रा तदा देवी स्वांशं फेने न्यधापयत्॥ ५८ | तदनन्तर उन्होंने परम भक्तिपूर्वक, पराशक्ति जगदम्बाका स्मरण किया, तब स्मरण करते ही देवीने अपना अंश उस फेनमें स्थापित कर दिया॥ ५८॥ | | वज्रं तदावृतं तत्र चकार हरिसंयुतम्।<br>फेनावृतं पविं तत्र शक्रश्चिक्षेप तं प्रति॥ ५९ | इन्द्रने भगवान् श्रीहरिसे युक्त वज्रको उस फेनसे आवृत कर दिया और उस फेनसे आवृत वज्रको वृत्रासुरके ऊपर फेंका॥ ५९॥ | | सहसा निपपाताशु वज्राहत इवाचलः।<br>वासवस्तु प्रहृष्टात्मा बभूव निहते तदा॥ ६० | उस वज्रके अचानक प्रहारसे वह पर्वतकी भाँति गिर पड़ा। तब उसके मर जानेपर इन्द्र अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो उठे | | ऋषयश्च महेन्द्रं तमस्तुवन्विविधैः स्तवैः।<br>हतशत्रुः प्रहृष्टात्मा वासवः सह दैवतैः॥ ६१ | और ऋषिगण विविध स्तोत्रोंसे देवराज इन्द्रकी स्तुति करने लगे। उस शत्रुके मारे जानेसे प्रसन्नचित्त इन्द्रने देवताओंके साथ उन भगवतीकी |
| ७५४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
|---|
| देवीं सम्पूजयामास यत्प्रसादाद्धतो रिपुः।<br>प्रसादयामास तदा स्तोत्रैर्नानाविधैरपि॥ ६२ | पूजा की तथा विविध स्तोत्रोंसे उन्हें प्रसन्न किया, जिनकी कृपासे शत्रु मारा गया॥ ६०–६२॥ | | देवोद्याने पराशक्तेः प्रासादमकरोद्धरिः।<br>पद्मरागमयीं मूर्तिं स्थापयामास वासवः॥ ६३<br><br>त्रिकालं महतीं पूजां चक्रुः सर्वेऽपि निर्जराः।<br>तदाप्रभृति देवानां श्रीदेवी कुलदैवतम्॥ ६४ | तत्पश्चात् इन्द्रने देवोद्यान नन्दनवनमें पराशक्ति भगवतीका मन्दिर बनवाया और उसमें पद्मराग मणियोंसे निर्मित मूर्तिकी स्थापना की और सभी देवता भी तीनों समय उनकी महती पूजा करने लगे; तभीसे श्रीदेवी ही उन देवताओंकी कुलदेवी हो गयीं॥ ६३-६४॥ | | विष्णुं त्रिभुवनश्रेष्ठं पूजयामास वासवः।<br>ततो हते महावीर्ये वृत्रे देवभयङ्करे॥ ६५<br><br>प्रववौ च शिवो वायुर्जहृषुर्दैवतास्तथा।<br>हते तस्मिन्सगन्धर्वा यक्षराक्षसकिन्नराः॥ ६६ | तब महापराक्रमी और देवताओंके लिये भयंकर वृत्रके मारे जानेपर इन्द्रने तीनों लोकोंमें श्रेष्ठ भगवान् विष्णुकी पूजा की। उस वृत्रासुरके मर जानेपर कल्याणकारी वायु बहने लगी तथा देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और किन्नरगण हर्षित हो उठे॥ ६५-६६॥ | | इत्थं वृत्रः पराशक्तिप्रवेशयुतफेनतः।<br>तया कृतविमोहाच्च शक्रेण सहसा हतः॥ ६७<br><br>ततो वृत्रनिहन्त्रीति देवी लोकेषु गीयते।<br>शक्रेण निहतत्वाच्च शक्रेण हत उच्यते॥ ६८ | इस प्रकार भगवती पराशक्तिके समुद्रफेनसे संयुक्त होने और उनके द्वारा ही विमोहित किये जानेके कारण वृत्रासुर सहसा इन्द्रके द्वारा मारा गया। इसलिये वे भगवती देवी संसारमें 'वृत्रनिहन्त्री' इस नामसे विख्यात हुईं और वह वृत्रासुर चूँकि प्रकटरूपसे इन्द्रके द्वारा मारा गया था, इसलिये उसे इन्द्रके द्वारा मारा गया, ऐसा कहा जाता है॥ ६७-६८॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे छद्मनेन्द्रेण फेनद्वारा पराशक्तिस्मरणपूर्वकं वृत्रहननवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
अथ सप्तमोऽध्यायः
त्वष्टाका वृत्रासुरकी पारलौकिक क्रिया करके इन्द्रको शाप देना, इन्द्रको ब्रह्महत्या लगना, नहुषका स्वर्गाधिपति बनना और इन्द्राणीपर आसक्त होना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
|---|---|
| अथ तं पतितं दृष्ट्वा विष्णुर्विष्णुपुरीं ययौ।<br>मनसा शङ्कमानस्तु तस्य हत्याकृतं भयम्॥ १ | इस प्रकार उसे गिरा हुआ देखकर मन-ही-मन हत्याके भयसे सशंकित भगवान् विष्णु वैकुण्ठलोकको चले गये॥ १॥ |
| इन्द्रोऽपि भयसंत्रस्तो ययाविन्द्रपुरीं ततः।<br>मुनयो भयसंविग्ना ह्यभवन्निहते रिपौ॥ २<br><br>किमस्माभिः कृतं पापं यदसौ वञ्चितः किल।<br>मुनिशब्दो वृथा जातः सुरेशस्य च सङ्गमात्॥ ३ | तत्पश्चात् इन्द्र भी भयभीत होकर इन्द्रपुरीको चल दिये। उस शत्रु (वृत्रासुर)-के मारे जानेपर मुनिगण भी भयग्रस्त हो गये कि हमने छलपूर्ण यह कैसा पापकृत्य कर डाला। इन्द्रका साथ देनेसे हमारा 'मुनि' नाम व्यर्थ हो गया॥ २-३॥ |
| अस्माकं वचनाद् वृत्रो विश्वासमगमत्किल।<br>विश्वासघातिनः सङ्गाद्वयं विश्वासघातकाः॥ ४ | हमारी ही बातोंसे वृत्रासुरको विश्वास आया; विश्वासघातीके संगसे हम सब भी विश्वासघाती हो गये॥ ४॥ |
अ० ७ ] षष्ठ स्कन्ध [ ७५५
अ० ७ ] षष्ठ स्कन्ध [ ७५५
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| धिगियं ममता पापमूलमेवमनर्थकृत्।<br>यदस्माभिश्चलं कृत्वा शपथैर्वञ्चितोऽसुरः॥ ५ | पापकी जड़ और अनर्थकारी इस ममताको धिक्कार है, जिसके कारण हमलोगोंने छलपूर्वक शपथ ली और उस असुर (वृत्रासुर)-को धोखा दिया॥ ५॥ |
| मन्त्रकृद् बुद्धिदाता च प्रेरकः पापकारिणाम्।<br>पापभाक्स भवेन्नूनं पक्षकर्ता तथैव च॥ ६ | पाप करनेका परामर्श देनेवाला, पाप करनेके लिये बुद्धि देनेवाला, पापकी प्रेरणा देनेवाला तथा पाप करनेवालोंका पक्ष लेनेवाला भी निश्चय ही पापकर्ताके समान पापभाजन होता है॥ ६॥ |
| विष्णुनापि कृतं पापं यत्साहाय्यमवाप्तवान्।<br>वज्रं प्रविश्य येनासौ पातितः सत्त्वमूर्त्तिना॥ ७ | वज्रमें प्रविष्ट होकर वृत्रकी हत्या करनेमें सत्त्वगुणके मूर्तरूप भगवान् विष्णुने इन्द्रकी सहायता की और उसे मारा, अतः उन्होंने भी पाप किया॥ ७॥ |
| नूनं स्वार्थपरः प्राणी न पापात् त्रासमश्नुते।<br>हरिणा हरिसङ्गेन सर्वथा दुष्कृतं कृतम्॥ ८ | स्वार्थपरायण प्राणी पापसे भयभीत नहीं होता। विष्णुने इन्द्रका साथ देकर सर्वथा दुष्कृत कर्म किया॥ ८॥ |
| द्वावेव स्तः पदार्थानां द्वावेव निधनं गतौ।<br>प्रथमश्च तुरीयश्च यौ त्रिलोक्यां तु दुर्लभौ॥ ९ | चार पदार्थों (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष)-मेंसे दो ही रह गये हैं और दो समाप्त हो गये हैं। उनमें भी प्रथम पदार्थ धर्म और चतुर्थ पदार्थ मोक्ष दोनों त्रिलोकमें दुर्लभ ही हो गये हैं॥ ९॥ |
| अर्थकामौ प्रशस्तौ द्वौ सर्वेषां सम्मतौ प्रियौ।<br>धर्माधर्मेति वाग्वादो दम्भोऽयं महतामपि॥ १० | अर्थ और काम ही सबके प्रिय और प्रशस्त माने गये हैं। धर्म और अधर्मकी विवेचना—यह बड़े लोगोंका वाचिक दम्भमात्र ही रह गया है॥ १०॥ |
| मुनयोऽपि मनस्तापमेवं कृत्वा पुनः पुनः।<br>जग्मुः स्वानाश्रमानेव विमनस्का हतोद्यमाः॥ ११ | इस प्रकार मुनिगण भी बार-बार मनमें सन्ताप करके उदासमनसे हतोत्साह होकर अपने-अपने आश्रमोंको चले गये॥ ११॥ |
| त्वष्टा तु निहतं श्रुत्वा पुत्रमिन्द्रेण भारत।<br>रुरोद दुःखसन्तप्तो निर्वेदमगमत्पुनः॥ १२ | हे भारत! उधर अपने पुत्रको इन्द्रद्वारा मारा गया सुनकर त्वष्टा दुःखसे सन्तप्त होकर अत्यन्त दुःखित हो रोने लगे; उन्हें इससे बहुत वेदना हुई॥ १२॥ |
| यत्रासौ पतितस्तत्र गत्वा वीक्ष्य तथागतम्।<br>संस्कारं कारयामास विधिवत्पारलौकिकम्॥ १३ | तदनन्तर जहाँ वह (वृत्र) गिरा पड़ा था, वहाँ जाकर उसे उस स्थितिमें देखकर त्वष्टाने विधिपूर्वक उसका पारलौकिक संस्कार कराया॥ १३॥ |
| स्नात्वास्य सलिलं दत्त्वा कृत्वा चैवौर्ध्वदैहिकम्।<br>शशापेन्द्रं स शोकार्तः पापिष्ठं मित्रघातकम्॥ १४<br><br>यथा मे निहतः पुत्रः प्रलोभ्य शपथैर्भृशम्।<br>तथेन्द्रोऽपि महद्दुःखं प्राप्नोतु विधिनिर्मितम्॥ १५ | तत्पश्चात् स्नान करके, जलाञ्जलि देकर उसका और्ध्वदैहिक कर्म सम्पन्न करनेके पश्चात् उन शोकसन्तप्त त्वष्टाने पापी और मित्रघाती इन्द्रको इस प्रकार शाप दे दिया कि जिस प्रकार शपथोंसे प्रलोभितकर इन्द्रने मेरे पुत्रको मार डाला है, उसी प्रकार वह भी विधाताद्वारा दिये हुए महान् दुःख प्राप्त करे॥ १४–१५॥ |
| ७५६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| इति शप्त्वा सुरेशानं त्वष्टा तापसमन्वितः।<br>मेरोः शिखरमास्थाय तपस्तेपे सुदुष्करम्॥ १६ | इस प्रकार देवराज इन्द्रको शाप देकर सन्तप्त त्वष्टा सुमेरुपर्वतके शिखरका आश्रय लेकर अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगे॥ १६॥ |
| जनमेजय उवाच<br>हत्वा त्वाष्ट्रं सुरेशोऽथ कामवस्थामवाप्तवान्।<br>सुखं वा दुःखमेवाग्रे तन्मे ब्रूहि पितामह॥ १७ | जनमेजय बोले— हे पितामह ! वृत्रासुरको मारनेके बाद इन्द्रकी क्या दशा हुई ? उन्हें बादमें सुख मिला या दुःख, इसे मुझे बताइये॥ १७॥ |
| व्यास उवाच<br>किं पृच्छसि महाभाग सन्देहः कीदृशस्तव।<br>अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्॥ १८<br><br>बलिष्ठैर्दुर्बलैर्वापि स्वल्पं वा बहु वा कृतम्।<br>सर्वथैव हि भोक्तव्यं सदेवासुरमानुषैः॥ १९ | व्यासजी बोले— हे महाभाग ! तुम क्या पूछ रहे हो, [इस विषयमें] तुम्हें क्या सन्देह है ? किये गये शुभ-अशुभ कर्मका फल तो अवश्य ही भोगना पड़ता है। देवता, राक्षस और मनुष्यसहित बलवान् या दुर्बल कोई भी हो—सभीको अपने द्वारा किये गये अत्यन्त अल्प या अधिक कर्मका फल सर्वथा भोगना ही पड़ता है॥ १८-१९॥ |
| शक्रायेत्थं मतिर्दत्ता हरिणा वृत्रघातिने।<br>प्रविष्टोऽथ पविं विष्णुः सहायः प्रत्यपद्यत॥ २०<br><br>न चापदि सहायोऽभूद्वासुदेवः कथञ्चन।<br>समये स्वजनः सर्वः संसारेऽस्मिन्नराधिप॥ २१<br><br>दैवे विमुखतां प्राप्ते न कोऽप्यस्ति सहायवान्।<br>पिता माता तथा भार्या भ्राता वाथ सहोदरः॥ २२<br><br>सेवको वापि मित्रं वा पुत्रश्चैव तथौरसः।<br>प्रतिकूले गते दैवे न कोऽप्येति सहायताम्॥ २३ | भगवान् विष्णुने वृत्रघाती इन्द्रको इस प्रकारकी मति प्रदान की थी। वे विष्णु उनके वज्रमें प्रविष्ट हुए थे तथा उनके सहायक बने थे; परंतु विपत्तिमें उन्होंने किसी भी तरह सहायता नहीं की। हे राजन् ! इस संसारमें अच्छे समयमें सभी लोग अपने बन जाते हैं, किंतु दैवके प्रतिकूल होनेपर कोई भी सहायक नहीं होता। पिता, माता, पत्नी, सहोदर भाई, सेवक, मित्र एवं औरस पुत्र—कोई भी दैवके प्रतिकूल हो जानेपर सहायता नहीं करता। पाप या पुण्य करनेवाला ही उसका भागी होता है॥ २०–२३ १/२॥ |
| भोक्ता पापस्य पुण्यस्य कर्ता भवति सर्वथा।<br>वृत्रं हत्वा गताः सर्वे निस्तेजस्कः शचीपतिः॥ २४<br><br>शेपुस्तं त्रिदशाः सर्वे ब्रह्महत्येत्यब्रुवञ्छनैः।<br>को नाम शपथान्कृत्वा सत्यं दत्त्वा वचः पुनः॥ २५<br><br>जिघांसति सुविश्वस्तं मुनिं मित्रत्वमागतम्।<br>देवगोष्ठ्यां सुरोद्याने गन्धर्वाणां समागमे॥ २६<br><br>सर्वत्रैव कथा तस्य विस्तारमगमत्किल।<br>किं कृतं दुष्कृतं कर्म शक्रेणाद्य जिघांसता॥ २७<br><br>वृत्रं छलेन विश्वस्तं मुनिभिश्च प्रतारितम्।<br>वेदप्रमाणमुत्सृज्य स्वीकृतं सौगतं मतम्॥ २८ | वृत्रके मारे जानेपर अन्य सभी लोग चले गये; इन्द्र तेजहीन हो गये। सभी देवता उसकी निन्दा करने लगे और ‘यह ब्रह्महत्या है’—ऐसा मन्द स्वरमें कहने लगे। कौन ऐसा होगा जो शपथ खाकर और वचन देकर अत्यन्त विश्वासमें आये हुए तथा मित्रताको प्राप्त मुनिको मारनेकी इच्छा करेगा ! उसकी यह बात देवताओंकी सभामें, देवोद्यानमें तथा गन्धर्वोंके समाजमें सर्वत्र फैल गयी। हत्या करनेकी इच्छावाले इन्द्रने आज यह कैसा दुष्कृत कर्म कर डाला ! मुनियोंके द्वारा विश्वास दिलाये गये वृत्रासुरको छलपूर्वक मार करके (मानो) इन्द्रने वेदोंकी प्रामाणिकताका त्यागकर सौगतोंका मत स्वीकार कर लिया। इन्द्रने छल करके अत्यन्त साहससे शत्रुको |