ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
प्रथम उद्योतः ८७ लोचनम् हननोद्भूतेन साहचर्यध्वंसनेनोत्थितो यः शोकः स्थायिभावो निरपेक्षभावत्वा- द्विप्रलम्भशृङ्गारोचितरतिस्थायिभावादन्य एव, स एव तथाभूतविभावतदुत्था- क्रन्दाद्यनुभावचर्वणया हृदयसंवादतन्मयीभवनक्रमादास्वाद्यमानतां प्रतिपन्नः करुणरसरूपतां लौकिकशोकव्यतिरिक्तां स्वचित्तद्रुतिसमास्वाद्यसारां प्रतिपन्नो रसपरिपूर्णकुम्भोच्छलनवच्चित्तवृत्तिनिःष्यन्दस्वभाववाग्विलापादिवच्च समयानपेक्ष- त्वेऽपि चित्तवृत्तिव्यञ्जकत्वादिति नयेनाकृतकतयैवावेशवशात्समुचितशब्दच्छ- न्दोवृत्तादिनियन्त्रितश्लोकरूपतां प्राप्तः— ( साथ ) के ध्वंस हो जाने के कारण उत्पन्न जो शोक रूप स्थायीभाव, निरपेक्षभाव होने के कारण विप्रलम्भ शृङ्गार के उचित रतिरूप स्थायीभाव से अतिरिक्त ही है। वही ( शोक ) उस प्रकार के विभाव और उससे उत्पन्न आक्रन्द आदि अनुभाव की चर्वणा द्वारा, हृदय के संवाद और फिर तन्मयीभाव के क्रम से आस्वाद्यमान अवस्था को प्राप्त, लौकिक शोक के अतिरिक्त, चर्वयिता के अपने चित्त की द्रुति के द्वारा समास्वाद्य-सार करुणरसरूपता को प्राप्त, जैसे जल से भरा घड़ा झलकता है और जैसे चित्तवृत्ति के निष्यन्द रूप वाग्विलाप आदि होते हैं उसी प्रकार 'समय' ( शब्द के सङ्केत ) की अपेक्षा न रखने पर भी ( वचन ) चित्तवृत्ति के व्यञ्जक होते हैं' इस न्याय से अकृत्रिम रूप से ही, आवेश के कारण, समुचित शब्द, छन्द, वृत्त आदि से नियन्त्रित हुआ, 'श्लोक' की अवस्था को प्राप्त होता है'— १. 'शोक श्लोक की अवस्था को प्राप्त है' आचार्य आनन्दवर्धन का यह निर्देश एक ऐतिहासिक घटना को सूचित करता है, जो 'वाल्मीकीय रामायण' से विदित होती है। किसी समय वाल्मीकि अपने आश्रम से समिद्कुशाहरण के लिए निकल कर वनप्रान्त में घूम रहे थे। तभी उन्होंने व्याध के द्वारा बाण से बिधे एक क्रौञ्च को देखा, जिसके वियोग-व्यथा से व्याकुल होकर क्रौञ्ची अत्यन्त कातर होकर चिल्ला रही थी। तत्काल ऋषि के मुख से शापयुक्त छन्दोमयी वाणी निकल पड़ी, जो निर्दिष्ट 'मा निषाद' के रूप में प्रसिद्ध है। इसे ही 'शोकः श्लोकत्वमागतः' कहा गया है। महाकवि कालिदास ने भी 'रघुवंश महाकाव्य' के चौदहवें सर्ग में इस घटना का स्मरण किया है— तामभ्यगच्छद् रुदितानुसारी कविः कुशेध्माहरणाय यातः। निषादविद्धाण्डजदर्शनोत्थः श्लोकत्वमापद्यत यस्य शोकः ॥ प्रस्तुत में आचार्य ने 'रस' को काव्य का आत्मा सिद्ध करने के उद्देश्य से इस प्रसंग का उल्लेख किया है। लोचनकार ने इस प्रसंग का जो व्याख्यान किया है उसका स्पष्टीकरण यह है— यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि विप्रलम्भ शृङ्गार का स्थायीभाव रति तब होती है जब नायक-नायिका दोनों विद्यमान रहते हैं, केवल दोनों का एकमिलन न सम्पन्न होने के कारण दोनों में सापेक्षता रहती है अर्थात् विप्रलम्भ शृङ्गार की रति सापेक्ष भाव है। इसके विपरीत शोक रूप स्थायीभाव में आलम्बन विभाव नायिका और नायक में कोई एक दिवङ्गत हो जाता है और पुनर्मिलन की आशा समाप्त हो जाती है अर्थात् शोक रूप स्थायीभाव निरपेक्ष होता है। प्रस्तुत पद्य 'मा निषाद' में क्रौञ्च के जोड़े में से एक व्याध के बाण से मारा गया है इस प्रकार साहचर्य के ध्वंस होने से यहाँ विप्रलम्भ शृङ्गार का स्थायीभाव रति न होकर करुण का स्थायी भाव शोक ही माना गया है।
८८ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ॥ इति । न तु मुनेः शोक इति मन्तव्यम् । एवं हि सति तद्दुःखेन सोऽपि दुःखित इति कृत्वा रसस्यात्मतेति निरवकाशं भवेत् । न च दुःखसन्तप्तस्यैषा दशेति । एवं चर्वणोचितशोकस्थायिभावात्मककरुणरससमुच्छलनस्वभावत्वात्स एव काव्यस्यात्मा सारभूतस्वभावोऽपरशाब्दवैलक्षण्यकारकः । एतदेवोक्तं हृदयदर्पणे—'यावत्पूर्णो न चैतेन तावन्नैव वमत्यमुम्' इति । 'हे व्याध, काम से मोहित क्रौञ्च पक्षी के जोड़े में से एक को तू ने मार डाला है इसलिए अनन्तकाल तक प्रतिष्ठा को प्राप्त न हो ।' न कि मुनि का शोक है यह मानना चाहिए । क्योंकि ऐसा होने पर उस ( क्रौञ्च ) के दुःख से वह भी दुखित हो जाते हैं, फिर रसात्मकता की बात नहीं बनेगी । दुःख से जो प्राणी सन्तप्त हो उसकी ऐसी दशा ( कि शाप देने के लिए श्लोक का निर्माण करे ) नहीं होती । इस प्रकार चर्वणा के योग्य शोकरूप स्थायीभाव वाले करुणरस से प्रवाहित होने के स्वभाव के कारण वही काव्य का आत्मा अर्थात् सारभूतस्वभाव एवं दूसरे शब्दबोध से वैलक्षण्य करने वाला है । 'हृदयदर्पण' में इसे ही कहा है—'जब तक इस रस से भर नहीं जाता तब तक यहाँ क्रौञ्च रूप आलम्बन में उत्पन्न शोक आक्रन्दन आदि अनुभावों की चर्वणा से अलौकिक स्थिति में हृदय-संवाद और तन्मयीभाव के क्रम से आ जाता है । इस प्रकार ऋषि ने उस अलौकिक शोक को चित्त की द्युति द्वारा आस्वादन किया । यह आस्वादन उस शोक का परिवर्तित रूप 'करुण रस' ही है । इस प्रकार जब ऋषि ने करुण रस का अनुभव किया तभी उनके मुख से छन्दोमयी वाणी अनायास निकल पड़ी, यह उसी प्रकार हुआ जैसे कि भरा हुआ घड़ा छलक पड़ता है अथवा जैसे दुःख आदि की चित्तवृत्ति के होने पर अनायास मुंह से शब्द निकल पड़ते हैं । इस प्रकार शोक करुण रस की स्थिति में पहुँच कर श्लोक बन गया । क्रौञ्च वाल्मीकि | | शोक ( लौकिक ) शोक ( अलौकिक ) | ( हृदयसंवाद और तन्मयीभाव ) | करुणरस | छन्दोमयी वाणी १. आचार्य का यह भी निर्देश है कि शोक को भ्रम से मुनि का नहीं समझ लेना चाहिए । अन्यथा क्रौञ्च के दुःख से सन्तप्त ऋषि के मुख से इस प्रकार श्लोक-रचना अस्वाभाविक प्रतीत होती है । अतः वह शोक वस्तुतः ऋषि के द्वारा आस्वाद्यमान होकर अलौकिक हो गया और ऋषि ने चित्तद्रुति के द्वारा उसे करुण रस की स्थिति में अनुभव किया, जो सर्वथा आनन्दमयता की स्थिति है । इस प्रकार इस युक्ति से करुण रस ही प्रस्तुत छन्दोमयी वाणी का सार होने के कारण 'काव्य का आत्मा' निश्चित होता है ।
प्रथम उद्योतः ८९ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः विविधवाच्यवाचकरचनाप्रपञ्चचारुणः काव्यस्य स एवार्थः सारभूतः । चादिकवेर्वाल्मीकेः निहतसहचरीविरहकातरक्रौञ्चाक्रन्द- जनितः शोक एव श्लोकतया परिणतः । विविध वाच्य, वाचक और रचना के प्रपञ्च से सुन्दर काव्य का वही अर्थ सारभूत है । जैसा कि आदिकवि वाल्मीकि का निहत¹ सहचरी के वियोग से कातर क्रौञ्च की चीख (आक्रन्द) से उत्पन्न शोक ही श्लोकरूप से परिणत हो गया । लोचनम् अगम इति च्छान्दसेनाडागमेन । स एवैत्येवकारेणोदमाह—नान्य आत्मेति । तेन यदाह भट्टनायकः— शब्दप्राधान्यमाश्रित्य तत्र शास्त्रं पृथग्विदुः । अर्थतत्त्वेन युक्तं तु वदन्त्याख्यानमेतयोः ॥ द्वयोर्गुणत्वे व्यापारप्राधान्ये काव्यधीर्भवेत् । इति तदपास्तम् । व्यापारो हि यदि ध्वननात्मा रसनास्वभावस्तन्नापूर्व- मुक्तम् । अथाभिधैव व्यापारस्तथाप्यस्याः प्राधान्यं नेत्यावेदितं प्राक् । श्लोकं व्याचष्टे—विविधेति । विविधं तत्तदभिव्यञ्जनीयरसानुगुण्येन विचित्रं कृत्वा वाच्ये वाचके रचनायां च प्रपञ्चेन यच्चारु शब्दार्थालङ्कारगुणयुक्त- उसे वमन नहीं करता है।' (वाल्मीकि के पद्य में) 'अगमः' में वैदिक नियमानुसार अडागम हुआ है । 'वही' इस 'एव' ( 'ही' ) कहने से यह कहा है—दूसरा आत्मा नहीं है । इस लिए जो कि 'भट्टनायक' कहते हैं— 'शब्द के प्राधान्य का आश्रयण करके शास्त्र को अलग मानते हैं, अर्थतत्त्व से युक्त को 'आख्यान' कहते हैं और इन दोनों (शब्द-अर्थ) के गुणीभूत होने की स्थिति में व्यापार का प्राधान्य होने पर काव्य की धी होती है ।' वह निरस्त हो जाता है । यदि ध्वनन रूप व्यापार रसना-स्वभाव है आपने अपूर्व नहीं कहा । यदि अभिधा ही व्यापार है तथापि उसका प्राधान्य नहीं है, यह पहले बताया जा चुका है ! श्लोक की व्याख्या करते हैं—विविध— । विविध अर्थात् उस-उस अभिव्यञ्जनीय रस के आनुगुण्य से विचित्र बनाकर, वाच्य, वाचक और रचना में प्रपञ्च जो चारु 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 १. 'वाल्मीकि रामायण' में उल्लिखित 'क्रौञ्चवध' घटना के अनुसार क्रौञ्च के जोड़े में से नर क्रौञ्च का ही वध निर्दिष्ट है और उसके वियोग में क्रौञ्ची रुदन करती है—'तं शोणितपरीताङ्गं चेष्टमानं महीतले । दृष्ट्वा क्रौञ्ची रुरोदार्ता करुणं खे परिभ्रमा ॥' प्रस्तुत ग्रन्थ में क्रौञ्चयुगल में सहचरी के वध और क्रौञ्च के आक्रन्द का उल्लेख है, इतना ही नहीं, 'लोचन' से भी सहचरी क्रौञ्ची का वध ही सिद्ध होता है । साथ ही 'काव्यमीमांसा' में राजशेखर ने भी 'निपादनिहतसह- चरीकं क्रौञ्चयुवानम्' उल्लेख द्वारा क्रौञ्ची का वध माना है । यहाँ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है
९० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् मित्यर्थः । तेन सर्वत्रापि ध्वननसद्भावेऽपि न तथा व्यवहारः । आत्मस- द्भावेऽपि क्वचिदेव जीवव्यवहार इत्युक्तं प्रागेव । तेनैतन्निरवकाशम्; यदुक्तं हृदय- दर्पणे—‘सर्वत्र तर्हि काव्यव्यवहारः स्यात्’ इति । निहतसहचरीति विभाव उक्तः । आक्रन्दितशब्देनानुभावः । जनित इति । चर्वणागोचरत्वेनेति शेषः । अर्थात् शब्द और अर्थ के अलङ्कार और गुणों से युक्त है। इस लिए सर्वत्र ध्वनन के होते हुए भी काव्य का व्यवहार नहीं होता है ।¹ पहले ही कह चुके हैं कि आत्मा के सद्भाव में भी कहीं-कहीं पर ही 'जीव' का व्यवहार होता है ! इस लिए इस बात का कोई अवकाश ही नहीं जो कि 'हृदयदर्पण' में कही गई है—'तब तो सर्वत्र काव्य का व्यवहार होगा ।' 'निहतसहचरी' के द्वारा विभाव कहा है, 'आक्रन्दित' से अनुभाव । उत्पन्न— । शेष यह कि चर्वणा के गोचर होने से । कि यदि वृत्तिकार, लोचनकार एवं राजशेखर तीनों ने यह जानते हुए कि 'रामायण' में क्रौञ्च के ही वध का निर्देश है, प्रस्तुत में जो विरुद्धार्थ का प्रतिपादन किया है, उसमें निमित्त क्या है ? दीधितिकार ने मूल वृत्तिग्रन्थ और लोचन का पाठ ही परिवर्तित कर दिया है, उनका पाठ है—'निहतसहचर-विरहक्रौञ्च्याक्रन्दजनितः ।' परन्तु कुछ लोगों ने क्लिष्ट समास करके मूल का परिवर्तन न करते हुए भी व्याख्यान किया है जिससे उनका अभिमत क्रौञ्च का वध और क्रौञ्ची का आक्रन्द सिद्ध हो जाता है, इसके अनुसार—'निहतः सहचरीविरहकातरः यः क्रौञ्चः तदुद्देशकः क्रौञ्चीकर्तृको यः आक्रन्दः तज्जनितः' होगा । इस प्रकार रामायण का विरोध भी नहीं होता और न यथास्थित मूल का परिवर्तन ही करना पड़ता है । कुछ विद्वानों का तीसरा पक्ष यह है कि क्यों न यही माना जाय कि रामायण का विरोध होने पर भी यथास्थित मूल का पाठ ही ठीक है ? यह इस लिए भी कह सकते हैं कि ध्वन्यालोक और लोचन की प्रायः सभी प्रतियों में ऐसा ही पाठ मिलता है । उसे सर्वथा 'गलत' करार देना ठीक नहीं कहा जा सकता । दूसरे, उपपत्ति यह मिलती है कि 'ध्वन्यालोक' ग्रन्थ प्रधान रूप से ध्वनि का प्रतिपादन करता है, अतः इसे ध्वन्यर्थ ही अभिप्रेत है । 'मा निषाद०' का भी ध्वन्यर्थ है कि 'हे निषाद ! ( रावण ! ) राम और सीता के जोड़े में से एक को ( अर्थात् सीता को ) जो तू ने वध किया ( बल्कि वध से भी अधिक पीड़ा दी ) उस कारण तू ( लङ्का में अधिष्ठान रूप ) प्रतिष्ठा को न प्राप्त कर ।' तो, नहीं स्वीकार किया जाय कि ध्वन्यालोककार ने जानबूझ कर रामायण की घटना को अपने अनुकूल ढालकर ध्वन्यर्थ के उचित यह उदाहरण प्रस्तुत किया है ! यह ध्वन्यर्थ 'रामायण' के प्राचीन टीकाकारों के अनुसार एवं करुण रस के अनुकूल है । अतः यह पक्ष बहुत अंश में मन्तव्य प्रतीत होता है । १. यह तो सिद्धान्त ही है कि ध्वनि काव्य का आत्मा है, सारभूत तत्त्व है। किन्तु सारभूत उस ध्वनि तत्त्व के रहने मात्र से काव्य की पूर्णता नहीं होती, किन्तु उसके साथ ही उस काव्य को अभिव्यञ्जनीय रस के आनुगुण्य से वाच्य, वाचक और रचना के प्रपञ्च से 'चारु' होना चाहिए । तात्पर्य यह है कि रस के अनुकूल शब्द और अर्थ के अलङ्कार और गुण का भी वहाँ योग होना चाहिए । अन्यथा ध्वनि तो बिलकुल साधारण किसी वाक्य में भी हो सकता है, ऐसी स्थिति में सर्वत्र 'ध्वनि' के व्यवहार की आपत्ति का वारण नहीं हो सकता । जैसा कि लोक में भी देखते हैं कि आत्मा के सद्भाव होने पर भी जीव का व्यवहार सर्वत्र नहीं, बल्कि कहीं-कहीं पर ही होता है । वही स्थिति प्रस्तुत में समझनी चाहिए । इसी उद्देश्य से मूल वृत्तिग्रन्थ में 'काव्य' के विशेषण रूप में 'विविधवाच्यवाचक-रचनाप्रपञ्चचारु' कहा है ।
प्रथम उद्योतः ९१ ध्वन्यालोकः शोको हि करुणस्थायिभावः। प्रतीयमानस्य चान्यभेददर्श- नेऽपि रसभावमुखेनैवोपलक्षणं प्राधान्यात्। शोक करुण का स्थायीभाव है। प्रतीयमान के अन्य भेदों के रहते हुए भी प्राधान्य के कारण रस और भाव द्वारा ही उनका उपलक्षण (बोधन) है। लोचनम् ननु शोकचर्वणातो यदि श्लोक उद्भूतस्तत्प्रतीयमानं वस्तु काव्यस्या- त्मेति कुत इत्याशङ्क्याह—शोको हीति। करुणस्य तच्चर्वणागोचरात्मनः स्थायिभावः। शोके हि स्थायिभावे ये विभावातुभावास्तत्समुचिता चित्तवृत्ति- श्चर्व्यमाणात्मा रस इत्यौचित्यात्स्थायिनो रसतापत्तिरित्युच्यते। प्राक्स्वसंवि- दितं परत्रानुमितं च चित्तवृत्तिजातं संस्कारक्रमेण हृदयसंवादमादधानं चर्वणा- यामुपयुज्यते यतः। ननु प्रतीयमानरूपमात्मा तत्र त्रिभेदं प्रतिपादितं न तु रसैकरूपम्, अनेन चेतिहासेन रसस्यैवात्मभूतत्वमुक्तं भवतीत्याशङ्कयाभ्युपग- मेनैवोत्तरमाह—प्रतीयमानस्य चेति। अन्यो भेदो वस्त्वलङ्कारात्मा। भावग्रहणेन यदि शोक की चर्वणा से श्लोक उद्भूत हुआ तो प्रतीयमान (रसरूप) वस्तु 'काव्य का आत्मा' कैसे है? यह आशङ्का करके कहते हैं—शोक। उस (शोक) की चर्वणा के विषय रूप करुण का स्थायीभाव। शोक के स्थायीभाव होने पर जो विभाव, अनुभाव हैं उनके समुचित चित्तवृत्ति चर्व्यमाण रूप रस हो जाती है, इस औचित्य के बल से स्थायीभाव रस की अवस्था को प्राप्त करता है, ऐसा कहा जाता है। पहले अपने में संविदित (अनुभूत) और दूसरे में अनुमित चित्तवृत्तिसमूह संस्कार के क्रम से हृदय-संवाद को प्राप्त करता हुआ चर्वणा¹ में उपयोगी होता है। जब कि प्रतीयमान रूप आत्मा है, उसमें तीन भेदों का प्रतिपादन हुआ है न कि एकमात्र रस रूप प्रतीयमान (ही प्रतिपादित है), और इस इतिहास से रस का ही आत्मभूतत्व कहा गया है, यह आशङ्का करके अभ्युपगम द्वारा ही उत्तर कहते हैं— प्रतीयमान के—। अन्य भेद अर्थात् वस्तु और अलङ्कार रूप भेद। 'भाव'² के ग्रहण से चर्वणा के गोचर व्यभिचारीभाव की उतने मात्र में विश्रान्ति न होने पर भी, स्थायी- १. 'चर्वणा' एक पुनः पुनः आस्वादन रूप अलौकिक व्यापार है। इसा के द्वारा चित्तवृत्ति का रसानुभूति की अवस्था में आस्वादन होता है। इसके पूर्व चित्तवृत्ति हृदय-संवाद की स्थिति में आकर तन्मयीभाव को प्राप्त करती है। तभी उसकी 'चर्वणा' होती है। यह प्रसंग पहले भी आ चुका है। २. रस के साथ भाव के उल्लेख का तात्पर्य यह है कि भाव के व्यञ्जित होने पर भी काव्यात्मत्व सुरक्षित रहता है। यद्यपि व्यभिचारी भाव, चर्वणा की स्थिति में न तो स्वरूप मात्र में विश्रान्त होगा और न रस की प्रतिष्ठा को, जो स्थायी भाव की चर्वणा से प्राप्त होती है, प्राप्त करेगा। तथापि उस व्यभिचारी भाव की चर्वणा से भी चमत्कार अवश्य होता है इस लिए भाव आदि भी संग्राह्य हैं।
९२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः सरस्वती स्वादु तदर्थवस्तु निःष्यन्दमाना महतां कवीनाम् । अलोकसामान्यमभिव्यनक्ति परिस्फुरन्तं प्रतिभाविशेषम् ॥ ६॥ उस स्वादु ( रसस्वभावरूप ) अर्थ वस्तु को प्रवर्त्तित करती ( प्रवाहित करती ) हुई महाकवियों की सरस्वती ( वाणी ) अलौकिक, परिस्फुरित होते हुए प्रतिभा-विशेष को अभिव्यक्त करती है ॥ ६ ॥ लोचनम् व्यभिचारिणोऽपि चर्व्यमाणस्य तावन्मात्राविश्रान्तावपि स्थायिचर्वणापर्यव- सानोचितरसप्रतिष्ठामनवाप्यापि प्राणत्वं भवतीत्युक्तम् । यथा— नखं नखाग्रेण विघट्टयन्ती विवर्तयन्ती वलयं विलोलम् । आमन्द्रमाशिञ्जितनूपुरेण पादेन मन्दं भुवमालिखन्ती ॥ इत्यत्र लज्जायाः । रसभावशब्देन च तदाभासतत्प्रशमावपि संगृहीतावेव; अवान्तरवैचित्र्येऽपि तदेकरूपत्वात् । प्राधान्यादिति । रसपर्यवसानादित्यर्थः । तावन्मात्राविश्रान्तावपि चान्यशाब्दवैलक्षण्यकारित्वेन वस्त्वलङ्कारध्वनेरपि जीवितत्वमौचित्यादुक्तमिति भावः ॥ ५ ॥ एवमितिहासमुखेन प्रतीयमानस्य काव्यात्मतां प्रदर्श्य स्वसंवित्तिसिद्धमप्येत- दिति दर्शयति—सरस्वतीति । वाग्रूपा भगवतीत्यर्थः । वस्तुशब्देनार्थशब्दं तत्त्वशब्देन च वस्तुशब्दं व्याचष्टे—निःष्यन्दमानेति । दिव्यमानन्दरसं स्वयमेव प्रस्नुवानेत्यर्थः । यदाह भट्टनायकः— भाव की चर्वणा के पर्यवसान रूप उचित रस की प्रतिष्ठा को न प्राप्त करके भी प्राणत्व बन जाता है, यह कहा है । जैसे— 'नख को नखाग्र से लिखती, चंचल वलय को घुमाती और गम्भीर स्वर में बजते नूपुरों से युक्त अपने पैर से धीरे-धीरे जमीन पर लिखती हुई।' यहाँ लज्जा का । 'रसभाव' शब्द से उनके आभास और प्रशम भी संगृहीत ही हुए; क्योंकि अवान्तर वैचित्र्य होने पर भी वे एक ही रूप के हैं । प्राधान्य से— । अर्थात् रस में पर्यवसान से । भाव यह कि वस्तु अलङ्कार के स्वरूप मात्र में विश्रान्ति के न होने पर भी दूसरे शब्द से वैलक्षण्यकारी होने के कारण वस्तुध्वनि और अलङ्कार ध्वनि का भी जीवितत्व औचित्य से कहा है । इस प्रकार इतिहास के प्रकार से 'प्रतीयमान' का काव्यात्मत्व प्रदर्शित करके '(सहृदय जनों के) अपने अनुभव से भी सिद्ध है' यह दिखाते हैं—सरस्वती— । 'वस्तु' शब्द से 'अर्थ' शब्द की और 'तत्त्व' शब्द से 'वस्तु' शब्द की व्याख्या करते हैं—प्रवाहित करती हुई— । अर्थात् दिव्य आनन्द को स्वयं ही प्रस्तुत करती हुई । जैसा कि भट्टनायक ने कहा है— १. कारिकाग्रन्थ में 'अर्थवस्तु' का प्रयोग है और वृत्तिग्रन्थ में उसकी व्याख्या 'वस्तु' शब्द से
प्रथम उद्योतः ९३ लोचनम् वाग्धेनुर्दुग्ध एतं हि रसं यद्बालतृष्णया । तेन नास्य समः स स्याद् दुह्यते योगिभिर्हि यः ॥ तदावेशेन विनाप्याक्रान्त्या हि यो योगिभिर्दुह्यते । अत एव— यं सर्वशैलाः परिकल्प्य वत्सं मेरौ स्थिते दोग्धरि दोहदक्षे । भास्वन्ति रत्नानि महौषधींश्च पृथूपदिष्टां दुदुहुर्धरित्रीम् ॥ इत्यनेन साराग्रयवस्तुपात्रत्वं हिमवत उक्तम् । 'अभिव्यनक्ति परिस्फु- रन्तमिति । प्रतिपत्तॄन् प्रति सा प्रतिभा नानुनीयमाना, अपि तु तदावेशेन भासमानेत्यर्थः । यदुक्तमस्मदुपाध्यायभट्टतौतेन—'नायकस्य कवेः श्रोतुः समानोऽनुभवस्ततः ।' इति । 'प्रतिभा' अपूर्ववस्तुनिर्माणक्षमा प्रज्ञा; तस्या '( सहृदय जन रूप ) वत्स में स्नेह के कारण वाणीरूप धेनु इस रस को जो कि प्रस्तुत करती है, इस लिए इसके समान वह ( रस ) रस नहीं हो सकता जिसे योगी लोग दुहा करते हैं ।' जिसे योगी लोग रसावेश के बिना ही केवल बलात्कारपूर्वक दुहा करते हैं । अत एव— 'दोहन कार्य में चतुर दुहने वाले मेरुपर्वत के विद्यमान रहने पर सारे पर्वतों ने जिस हिमालय को वत्स बनाकर पृथु के द्वारा प्रदर्शित पृथिवी से प्रदर्शित चमकदार रत्नों और महौषधियों का दोहन किया ।' इससे सारवस्तुओं का पात्रत्व हिमवान् का कहा है । 'परिस्फुरित होते हुए को अभिव्यञ्जित करती है ।' अर्थात् प्रतिपत्ता ( सहृदय ) जनों के प्रति वह प्रतिभा अनुमीयमान नहीं होती, बल्कि उसके ( प्रतिभा के विषयीभूत रस के ) आवेश से भासित होता है । जैसा कि हमारे उपाध्याय भट्ट तौत ने कहा है—'नायक, कवि और श्रोता का उससे ( उस कारण ) समान अनुभव होता है ।' अपूर्व वस्तु के निर्माण में समर्थ प्रज्ञा 'प्रतिभा' ( कहलाती ) है, उसका 'विशेष', रसावेश के कारण की गई है । लोचनकार का कहना है कि 'वस्तु' शब्द 'अर्थ' की व्याख्या है और 'तत्त्व' शब्द 'वस्तु' की व्याख्या है । तात्पर्य यह कि वस्तु, अलङ्कार और रस रूप अर्थों अर्थात् वस्तुओं में जो वस्तु अर्थात् तत्त्व या सार । १. आचार्य ने महाकवियों की वाणी को व्यङ्ग्यार्थ को प्रवाहित करने वाली कहा है। यह एक प्रकार की धेनु है जो सहृदयरूपी वत्सों को स्वयं दिव्य रस पिलाकर आनन्दित करती है । यहाँ लोचनकार ने 'वचन' उद्धृत करके यह निर्देश किया है कि वह आनन्द, जो सहृदयों को कविता से प्राप्त होता है, तथा वह आनन्द, जो योगियों को समाधि में मिलता है, दोनों में बहुत अन्तर है । इस प्रकार कवियों के प्रतिभा-विशेष का पता चलता है । जो कविता जितना ही रस का अनुभव कराती है उतना ही उससे कवि की प्रतिभाविशेष का अन्दाजा मिलता है । और उसी अभिव्यक्त प्रतिभा-विशेष के आधार पर ही कवि की महाकवि की कोटि में गणना होती है । संसार में हजारों की संख्या में कवि होते आए हैं, किन्तु वह प्रतिभा-विशेष का ही चमत्कार है जो कालिदास प्रभृति कुछ ही कवि महाकवि की श्रेणी में आते हैं ।
९४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तत् वस्तुतत्त्वं निःष्यन्दमाना महतां कवीनां भारती अलोकसामान्यं प्रतिभाविशेषं परिस्फुरन्तमभिव्यनक्ति । येनास्मिन्नतिविचित्रकविपर- म्परावाहिनि संसारे कालिदासप्रभृतयो द्वित्राः पञ्चषा वा महाकवय इति गण्यन्ते । इदं चापरं प्रतीयमानस्यार्थस्य सद्भावसाधनं प्रमाणम्— शब्दार्थशासनज्ञानमात्रेणैव न वेद्यते । वेद्यते स तु काव्यार्थतत्त्वज्ञैरेव केवलम् ॥ ७ ॥ उस वस्तुतत्त्व को प्रवाहित करती हुई महान् कवियों की सरस्वती (वाणी) परिस्फुरित होते हुए अलोकसामान्य प्रतिभा-विशेष को अभिव्यक्त करती है। जिससे अतिविचित्र कवियों की परम्परा से युक्त इस संसार में कालिदास प्रभृति दो-तीन अथवा पाँच-छः महाकवि गिने जाते हैं। और यह दूसरा प्रतीयमान अर्थ के सद्भाव का साधन प्रमाण है— केवल शब्द-अर्थ के शासनों (नियमों) के ज्ञानमात्र से नहीं जाना जाता है, बल्कि केवल वह तो काव्यार्थ के तत्त्वज्ञ लोगों द्वारा ही जाना जाता है ॥ ७ ॥ लोचनम् ‘विशेषो’ रसावेशवैशद्यसौन्दर्य काव्यनिर्माणक्षमत्वम् । यदाह मुनिः—‘कवेर- न्तर्गतं भावम्’ इति । येनेति । अभिव्यक्तेन स्फुरता प्रतिभाविशेषेण निमित्तेन महाकवित्वगणनेति यावत् ॥ ६ ॥ इदं चेति । न केवलं ‘प्रतीयमानं पुनरन्यदेव’ इत्येतत्कारिकासूचितौ स्वरूप- विषयभेदावेव; यावद्भिन्नसामग्रीवेद्यत्वमपि वाच्यातिरिक्तत्वे प्रमाणमिति यावत् । वेद्यत इति । न तु न वेद्यते, येन न स्यादसाविति भावः । काव्यस्य तत्त्वभूतो योऽर्थस्तस्य भावना वाच्यातिरेकेणानवरतचर्वणा तत्र विमुखानाम् । उत्पन्न वैशद्यप्रयुक्त सौन्दर्य रूप काव्य-निर्माण की क्षमता है। जैसा कि मुनि ने कहा है—‘कवि के अन्तर्गत भाव को।' जिससे—। मतलब यह कि अभिव्यक्त या स्फुरित होते हुए प्रतिभा विशेष रूप निमित्त से महाकवित्व की गणना (कहाकवियों में गणना) होती है। और यह—। न केवल ‘प्रतीयमानं पुनरन्यदेव' इस कारिका से सूचित स्वरूप और विषयगत भेद, बल्कि भिन्न सामग्री द्वारा वेद्यत्व भी (प्रतीयमान = व्यङ्ग्य के) वाच्य से अतिरिक्त (पृथक्) होने में प्रमाण है। जाना जाता है—। भाव यह कि न कि नहीं जाना जाता है जिससे वह नहीं होता। काव्य का तत्त्वभूत जो अर्थ उसकी भावना, वाच्य के अतिरेकपूर्वक निरन्तर चर्वणा उसमें विमुख। स्वर, षड्ज
प्रथम उद्योतः ९५ ध्वन्यालोकः सोऽर्थो यस्मात्केवलं काव्यार्थतत्त्वज्ञैरेव ज्ञायते । यदि च वाच्यरूप एवासावर्थः स्यात्तद्वाच्यवाचकरूपपरिज्ञानादेव तत्प्रतीतिः स्यात् । अथ च वाच्यवाचक लक्षणमात्रकृतश्रमाणां काव्यतत्त्वार्थभाव- नाविमुखानां स्वरश्रुत्यादिलक्षणमिवाऽप्रगीतानां गान्धर्वलक्षणविदाम- गोचर एवासावर्थः । वह अर्थ जिस कारण काव्यार्थ के तत्त्वज्ञ लोगों द्वारा ही जाना जाता है। और, यदि वह अर्थ वाच्यरूप ही होता तो वाच्य और वाचक के रूप के परिज्ञान से ही उसकी प्रतीति होती । और भी, वाच्य-वाचक के लक्षणमात्र में जिन्होंने श्रम किया है तथा काव्यतत्त्वार्थ की भावना से पराङ्मुख हैं उनके लिए यह अर्थ, गाने में असमर्थ किन्तु सङ्गीतशास्त्र (गान्धर्व) के लक्षणों को जाननेवालों के लिए स्वर और श्रुति आदि के तत्त्व की भाँति, अगोचर ही है। लोचनम् स्वराः षड्जादयः सप्त । श्रुतिर्नाम शब्दस्य वैलक्षण्यमात्रकारि यद्रूपान्तरं तत्परिमाणा स्वरतदन्तरालोभयभेदकल्पिता द्वाविंशतिविधा । आदिशब्देन जात्यंशकग्रामरागभाषाविभाषान्तरभाषादेशीमार्गा गृह्यन्ते । प्रकृष्टं गीतं गानं येषां ते प्रगीताः, गातुं वा प्रारब्धा इत्यादिकर्मणि क्तः । प्रारम्भेण चात्र फलप- र्यन्तता लक्ष्यते ॥ ७ ॥ आदि सात । शब्द का वैलक्षण्यकारी जो रूपान्तर है उसके परिमाण की ‘श्रुति’ होती है वह स्वर, स्वरान्तराल, और उभय के भेद से बाईस¹ प्रकार की होती है । ‘आदि’ शब्द से जात्यंश,² ग्राम, राग, भाषा, विभाषा, अन्तरभाषा, देशी मार्ग गृहीत होते हैं। प्रकृष्ट गीत या गान है जिनका वे ‘प्रगीत’ हैं अथवा गाने के लिए ‘प्रारब्ध’ इस प्रकार ‘आदिकर्म’ में ‘क्त’ प्रत्यय है। यहाँ ‘प्रारम्भ’ से फलपर्यन्तता लक्षित होती है। १. मूल में ‘अप्रगीत’ और ‘प्रगीत’ दोनों पाठ हैं। लोचनकार ने दोनों के अनुसार व्याख्यान किया है; ‘अप्रगीत’ का अर्थ करते हैं कि वे लोग प्रगीत नहीं अर्थात् प्रकृष्ट गान नहीं करते हैं । ‘प्रगीत’ का व्याख्यान है कि जिन्होंने गान का प्रारम्भ ही किया है अर्थात् जो अभी गाने में सफल नहीं हैं । स्पष्टार्थ यह कि जिस प्रकार गान-विद्या में निपुणता हासिल कर लेने वाला यदि गान का अभ्यास न करने पर स्वर और श्रुति आदि के तत्त्वों से अपरिचित रहता है उसी प्रकार केवल वाच्य-वाचक मात्र में श्रम करने वाले तथा काव्यतत्त्वार्थ की भावना से विमुख लोग उस प्रतीयमान अर्थ को नहीं समझ सकते । स्वर और श्रुति आदि सङ्गीत-शास्त्रीय तत्त्वों का विशकलन ग्रन्थान्तर से अवगत करना चाहिए । ‘सङ्गीतरत्नाकर’ में इनका विवेचन विशद रूप से मिलता है।
९६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः एवं वाच्यव्यतिरेकिणो व्यङ्ग्यस्य सद्भावं प्रतिपाद्य प्राधान्यं तस्यैवेति दर्शयति— इस प्रकार वाच्य से व्यतिरेक ( पार्थक्य ) रखनेवाले व्यङ्ग्य का सद्भाव प्रतिपादन करके 'प्राधान्य उसका ही है' यह दिखलाते हैं— लोचनम् एवमिति । स्वरूपभेदेन भिन्नसामग्रीज्ञेयत्वेन चेत्यर्थः । प्रत्यभिज्ञेयावि- त्याहार्थे कृत्यः, सर्वो हि तथा यतते इतीयता प्राधान्ये लोकसिद्धत्वं प्रमाण- मुक्तम् । नियोगाथेन च कृत्येन शिक्षाक्रम उक्तः । प्रत्यभिज्ञेयशब्देनेदमाह— 'काव्यं तु जातु जायेत कस्यचित्प्रतिभावतः ।' इस प्रकार— । अर्थात् स्वरूप-भेद और भिन्न सामग्री द्वारा ज्ञेय होने के कारण । 'प्रत्यभिज्ञेय' यहाँ अहार्थ में 'कृत्य' प्रत्यय हुआ है, सब लोग इस अंश में प्रयत्न करते हैं, 'सहृदयों द्वारा प्रत्यभिज्ञेय है' इतने से व्यङ्ग्य के प्राधान्य के सम्बन्ध में लोकसिद्धत्व को प्रमाण कहा है । नियोगाथक 'कृत्य' प्रत्यय द्वारा शिक्षा का क्रम सूचित किया है ।' 'प्रत्यभिज्ञेय' शब्द से यह कहते हैं— 'काव्य तो कदाचित् किसी प्रतिभावान् से उत्पन्न होता है ।' १. 'उन अर्थ और शब्द महाकवि के प्रत्यभिज्ञेय हैं' आचार्य के इस कथन का एक अभिप्राय यह भी हो सकता है कि सहृदय लोगों द्वारा महाकवि के शब्द-अर्थ प्रत्यभिज्ञेय या पहचानने योग्य हैं और दूसरा यह भी हो सकता है कि महाकवि को स्वयं उन्हीं शब्द-अर्थ का प्रत्यभिज्ञान करना चाहिए । 'प्रत्यभिज्ञेय' 'अर्हार्थ' में 'कृत्य' प्रत्यय मानने पर प्रथम पक्ष के अनुकूल व्याख्यान होगा । इसलिए लोचनकार ने यहाँ यह अर्थ उद्भावित किया है कि व्यङ्ग्य अर्थ का प्राधान्य इसलिए है कि सभी लोग उस प्रकार के शब्द अर्थ के ज्ञान की इच्छा से प्रयत्न करते हैं । इस प्रकार तथाविध अर्थ और शब्द के प्राधान्य में लोकसिद्धत्व यह प्रमाण या हेतु कहा गया । किसी भी अप्रधान वस्तु के लिए लोकप्रवृत्ति नहीं होती । यहाँ 'लोक' शब्द से 'सहृदय' ही समझना चाहिए । दूसरे अभिप्राय के अनुसार यहाँ कृत्य-प्रत्यय नियोगाथक है । अर्थात् आचार्य कवियों को यह शिक्षा देते हैं कि उन्हें पूर्वोक्त' शब्द-अर्थ का प्रत्यभिज्ञान करना चाहिए । क्योंकि जैसा वृत्तिग्रन्थ भी निर्देश करता है कि व्यङ्ग्य अर्थ और व्यञ्जक शब्द का ही सुप्रयोग करके महाकवि महाकवि बनता है अतः उसके लिए उनका प्रत्यभिज्ञान अनिवार्य है । २. 'प्रत्यभिज्ञेय'—लोचनकार की दृष्टि में ग्रन्थकार का यह प्रयोग विशेष तात्पर्य रखता है । ग्रन्थकार का कहना है कि शब्द अर्थ जो सामान्य रूप से व्यवहार में विदित होते हैं उन्हें काव्य के क्षेत्र में उसी रूप में नहीं जानना चाहिए । यद्यपि 'प्रत्यभिज्ञान' ज्ञात वस्तु का ही पुनः ज्ञान होता है, तथापि यहाँ ज्ञान का विशेष रूप से अनुसन्धान को ही 'प्रत्यभिज्ञान' से समझना चाहिए । जब तक लोकव्यवहार की स्थिति है, शब्द-अर्थ अपने साधारण रूप से होते हैं किन्तु काव्य के क्षेत्र में उनकी सीमा का विस्तार हो जाता है और उनका स्वरूप भी बहुत कुछ निखर जाता है अतः केवल ज्ञात का पुनः ज्ञान न करके ज्ञात का पुनः पुनः अनुसन्धान रूप विशेष निरूपण या प्रत्यभिज्ञान करना चाहिए । यह प्रतिभावान् महाकवि के लिए उतना ही अपेक्षित है जितना सहृदय के लिए । लोचनकार ने प्रस्तुत वक्तव्य को अपने रंग में ढालते हुए
प्रथम उद्योतः ९७ ध्वन्यालोकः सोऽर्थस्तद्व्यक्तिसामर्थ्ययोगी शब्दश्च कश्चन । यत्नतः प्रत्यभिज्ञेयौ तौ शब्दार्थौ महाकवेः ॥ ८ ॥ व्यङ्ग्योऽर्थस्तद्व्यक्तिसामर्थ्ययोगी शब्दश्च कश्चन, न शब्दमात्रम् । तावेव शब्दार्थौ महाकवेः प्रत्यभिज्ञेयौ । व्यङ्ग्यव्यञ्जकाभ्यामेव सुप्रयु- क्ताभ्यां महाकवित्वलाभो महाकवीनां, न वाच्यवाचकरचनामात्रेण । 'वह अर्थ है और उसकी अभिव्यक्ति की सामर्थ्य रखनेवाला कोई शब्द है। वे शब्द और अर्थ महाकवि के यत्नपूर्वक प्रत्यभिज्ञेय हैं' ॥ ८ ॥ व्यंग्य अर्थ है और उसकी अभिव्यक्ति की सामर्थ्य रखनेवाला कोई शब्द है, न कि शब्दमात्र । वे ही शब्द-अर्थ महाकवि के प्रत्यभिज्ञान के योग्य हैं। क्योंकि, व्यंग्य और व्यंजक के ही सुन्दर ढङ्ग से प्रयोग करने पर महाकवियों को महाकवित्व का लाभ है, न कि वाच्य-वाचक-रचनामात्र से ॥ ८ ॥ लोचनम् इति नयेन यद्यपि स्वयमस्यैतत्परिसफुरति, तथापीदमित्थमिति विशेषतो निरूप्यमाणं सहस्रशाखीभवति । यथोक्तमस्मत्परमगुरुभिः श्रीमदुत्पलपादैः— तैस्तैरप्युपयाचितैरुपगतस्तन्व्याः स्थितोऽप्यन्तिके कान्तो लोकसमान एवमपरिज्ञातो न रन्तुं यथा । लोकस्यैष तथानवेक्षितगुणः स्वात्मापि विश्वेश्वरो नैवालं निजवैभवाय तदियं तत्प्रत्यभिज्ञोदिता ॥ इति ॥ तेन ज्ञातस्यापि विशेषतो निरूपणमनुसन्धानात्मकमत्र प्रत्यभिज्ञानं, न तु तदेवेदमित्येतावन्मात्रम् । महाकवेरिति। यो महाकविरहं भूयासमित्याशास्ते। इस न्याय से यद्यपि स्वयं उसे (कवि को) यह स्फुरित होता है, तथापि 'यह इत्थं है' इस प्रकार विशेष रूप से निरूपण करने पर हजारों शाखाओं का हो जाता है । जैसा कि हमारे परमगुरु श्रीमदुत्पलपाद ने कहा है— 'अपरिज्ञात एवं उन-उन प्रार्थनाओं द्वारा कृशाङ्गी के समीप में आया हुआ भी कान्त साधारण व्यक्ति के समान जिस प्रकार रमणकार्य नहीं कर पाता उस प्रकार जिसके गुण पहले नहीं देखे गए हैं ऐसा स्वात्मरूप भी विश्वेश्वर लोक के (समक्ष) अपना वैभव (विकास) नहीं कर पाता; इस कारण यह उसकी प्रत्यभिज्ञा बताई गई है।' इस लिए ज्ञात का भी विशेष रूप से अनुसन्धानात्मक निरूपण यह 'प्रत्यभिज्ञान' पदार्थ है, न कि 'वही यह है' केवल इतना ही । महाकवि के—। जो आशा करता है अपने गुरु श्रीमदुत्पलाचार्य का जो श्लोक उद्धृत किया है। कल्पना कीजिए कि कोई नायिका किसी व्यक्ति को बिना देखे ही उसके रूप का वर्णन सुन कर अपना 'प्रिय' मान लेती है और ७ ध्व०
९८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः इदानीं व्यङ्ग्यव्यञ्जकयोः प्राधान्येऽपि यद्वाच्यवाचकावेव प्रथम- मुपाददते कवयस्तदपि युक्तमेवेत्याह— आलोकार्थी यथा दीपशिखायां यत्नवाञ्जनः । तदुपायतया तद्वदर्थे वाच्ये तदादृतः ॥ ९ ॥ अब जो कि व्यंग्य और व्यंजक के प्राधान्य में भी कवि लोग पहले वाच्य और वाचक का ही उपपादन करते हैं वह भी ठीक ही है, यह कहते हैं— जिस प्रकार आलोक चाहनेवाला व्यक्ति उसका उपाय होने के कारण दीपशिखा के लिए यत्न करता है, उसी प्रकार उस (व्यंग्य अर्थ) के प्रति आदरयुक्त जन वाच्य अर्थ के लिए यत्न करता है ॥ ९ ॥ लोचनम् एवं व्यङ्ग्यस्यार्थस्य व्यञ्जकस्य शब्दस्य च प्राधान्यं वदता व्यङ्ग्यव्यञ्जक- भावस्यापि प्राधान्यमुक्तमिति ध्वनति, ध्वन्यते, ध्वननमिति त्रितयमप्युपपन्न- मित्युकम् ॥ ८ ॥ ननु प्रथमोपादीयमानत्वाद्वाच्यवाचकतद्भावस्यैव प्राधान्यमित्याशङ्क्योपा- यानामेव प्रथममुपादानं भवतीत्यभिप्रायेण विरुद्धोऽयं प्राधान्ये साध्ये हेतुरिति दर्शयति-इदानीमित्यादिना । आलोकनमालोकः; वनितावदनारविन्दादिविलो- कनमित्यर्थः । तत्र चोपायो दीपशिखा ॥ ९ ॥ कि मैं महाकवि होऊं । इस प्रकार व्यङ्ग्य अर्थ और व्यञ्जक शब्द का प्राधान्य कहते हुए व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव (व्यञ्जना व्यापार) का भी प्राधान्य सूचित किया । इस तरह 'ध्वनन करता है', 'ध्वनित होता है' और 'ध्वनन' ये तीनों उपपन्न हो जाते हैं, यह कहा गया । प्रथम उपादीयमान होने के कारण वाच्य, वाचक और उनके व्यापार (भाव) का ही प्राधान्य है, यह आशङ्का करके उपायों का ही पहले प्राधान्य होता है, इस अभिप्राय से प्राधान्य रूप साध्य में यह हेतु (प्रथमोपादीयमानत्व रूप) पत्र-लेखनादि उपायों द्वारा उसे अपने पास बुलाने के लिए प्रयत्नशील रहती हैं । अकस्मात् वह कान्त उसके समक्ष पहुँच आता है । ऐसी स्थिति में क्या सम्भव है कि नायिका उसके साथ रमण करे ? नहीं । क्योंकि जब तक नायिका को यह विशेष रूप से ज्ञान नहीं हो जाता कि जिस व्यक्ति के मिलन के लिए वह बहुत दिनों से प्रयत्न कर रही है वहीं यह उपस्थित है तब तक वह व्यक्ति उसके लिए अन्य साधारण व्यक्ति के समान ही रहता है । यही बात आध्यात्मिक क्षेत्र में भी है कि ईश्वर आत्मा से अभिन्न होकर भी अपना विशेष रूप से प्रत्यभिज्ञान न किए जाने पर अपना वैभव नहीं प्रकट करता । यह यहाँ ज्ञातव्य है कि आचार्य अभिनवगुप्त 'प्रत्यभिज्ञा- दर्शन' के परममान्य आचार्य हैं अतः स्वाभाविक है कि उनके प्रायः प्रस्तुत साहित्यिक विवेचनों में उनके दार्शनिक सिद्धान्त का भी प्रभाव पड़ा है ।
प्रथम उद्योतः ९९ ध्वन्यालोकः यथा ह्यालोकार्थी सन्नपि दीपशिखायां यत्नवाञ्जनो भवति तदुपाय- तया । न हि दीपशिखामन्तरेणालोकः सम्भवति । तद्वद्व्यङ्ग्यार्थं प्रत्यादृतो जनो वाच्येऽर्थे यत्नवान् भवति । अनेन प्रतिपादकस्य कवेर्व्यङ्ग्यार्थं प्रति व्यापारो दर्शितः ॥ ९ ॥ प्रतिपाद्यस्यापि तं दर्शयितुमाह— यथा पदार्थद्वारेण वाक्यार्थः सम्प्रतीयते । वाच्यार्थपूर्विका तद्वत्प्रतिपत्तस्य वस्तुनः ॥ १० ॥ जैसे प्रकाश को चाहने वाला होता हुआ भी व्यक्ति दीपशिखा के लिए उस ( आलोक ) का उपाय होने के कारण यत्नवान् होता है, क्योंकि दीपशिखा के विना आलोक सम्भव नहीं, उसी प्रकार व्यंग्य अर्थ के प्रति आदरयुक्त जन वाच्य अर्थ में यत्नवान् होता है । इससे प्रतिपादक ( वक्ता ) कवि का व्यंग्य अर्थ के प्रति व्यापार दिखाया ॥ ९ ॥ प्रतिपाद्य के भी उस ( व्यापार ) को दिखाने के लिए कहते हैं— जिस प्रकार पदार्थ के द्वारा वाक्यार्थ प्रतीत किया जाता है उसी प्रकार उस वस्तु की प्रतिपत् ( प्रतीति ) वाच्यार्थपूर्विका होती है ॥ १० ॥ लोचनम् प्रतिपदिति भावे क्विप् । 'तस्य वस्तुन' इति व्यङ्ग्यरूपस्य सारस्येत्यर्थः । अनेन श्लोकेनात्यन्तसहृदयो यो न भवति तस्यैष स्फुटसंवेद्य एव क्रमः । विरुद्ध¹ है यह दिखाते हैं—अव इत्यादि द्वारा । आलोकन ( देखना ) आलोक है, अर्थात् वनिता के मुखारविन्द आदि का विलोकन । उसके लिए उपाय दीपशिखा है ॥९॥ 'प्रतिपत्'² इसमें भाव में 'क्विप्' प्रत्यय है । 'उस वस्तु की' अर्थात् व्यङ्ग्य रूप १. आशङ्का होती है कि जब वाच्य, वाचक और अभिधा व्यापार का पहले उपादान किया जाता है तब इसी कारण क्यों नहीं इन्हें ही प्रधान मानते हैं ? व्यङ्ग्य के प्राधान्य का पक्ष इस प्रकार ठीक नहीं । इसके समाधान में यह कहना है कि जो आप प्रथम उपादान को प्राधान्य का हेतु मानते हैं वह विरुद्ध है, अर्थात् इस हेतु द्वारा अप्राधान्य भी सिद्ध हो जाता है। मतलब यह कि किसी वस्तु को प्रधान इस लिए माना नहीं जा सकता कि उसका उल्लेख पहले होता है । तब तो जो उपाय होता है वह उपेय से पहले उल्लिखित होता है, ऐसी स्थिति में आप उपाय को भी प्रधान कहेंगे ! प्रस्तुत में वाच्य-वाचक-भाव भी प्रधानभूत व्यङ्ग्य-व्यञ्जक-भाव के उपाय हैं अतः उनका पहले उपादान होता है। इस प्रकार प्रथम उपादान मात्र से उन्हें प्रधान नहीं कहा जा सकता । जिस प्रकार आदमी जब किसी वस्तु को रात्रि में देखना चाहता है तब वह दीपशिखा के लिए यत्नवान् होता है । इस प्रकार दीपशिखा प्रथम उपादीयमान होने पर भी उपेयभूत वस्तु के दर्शन का उपाय होने के कारण अप्रधान है । २. निर्णयसागरीय संस्करण में 'प्रतिपत्तव्यस्य' पाठ माना है, किन्तु 'लोचन' के प्रस्तुत
१०० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यथा हि पदार्थद्वारेण वाक्यार्थावगमस्तथा वाच्यार्थप्रतीतिपूर्विका व्यङ्ग्यस्यार्थस्य प्रतिपत्तिः ॥ १० ॥ इदानीं वाच्यार्थप्रतीतिपूर्वकत्वेऽपि तत्प्रतीतेर्व्यङ्ग्यस्यार्थस्य प्राधान्यं यथा न व्यालुप्यते तथा दर्शयति— जिस प्रकार पदार्थ के द्वारा वाक्यार्थ का अवगम होता है उसी प्रकार व्यंग्य अर्थ की प्रतिपत्ति वाच्यार्थप्रतीतिपूर्विका होती है ॥ १० ॥ अब, उस (व्यंग्य) की प्रतीति के वाच्यार्थप्रतीतिपूर्वक होने पर भी, व्यंग्य अर्थ का प्राधान्य जिस प्रकार व्यालुप्त नहीं होता, वह दिखाते हैं— लोचनम् यथात्यन्तशब्दवृत्तज्ञो यो न भवति तस्य पदार्थवाक्यार्थक्रमः । काष्ठाप्राप्तसहृ- दयभावस्य तु वाक्यवृत्तकुशलस्येव सन्नपि क्रमोऽभ्यस्तानुमानाविनाभावस्मृ- त्यादिवदसंवैद्य इति दर्शितम् ॥ १० ॥ न व्यालुप्यत इति । प्राधान्यादेव तत्पर्यन्तानुसरणरणरणकत्वरिता मध्ये विश्रान्तिं न कुर्वत इति क्रमस्य सतोऽप्यलक्ष्णं प्राधान्ये हेतुः । स्वसामर्थ्य- सार पदार्थ की। इस श्लोक से यह दिखाया कि जो व्यक्ति अत्यन्त सहृदय नहीं है उसके लिए यह क्रम स्फुट संवेद्य है। जिस प्रकार जो व्यक्ति अत्यन्त शब्दवृत्तज्ञ (वाक्य को जानने वाला) नहीं है उसके लिए पदार्थ और वाक्यार्थ का क्रम है। और जो सहृदयता की काष्ठा (उत्कर्ष) तक पहुंचा है, उस वाक्यवृत्त-कुशल पुरुष की भाँति होता हुआ भी क्रम उस प्रकार असंवेद्य है जिस प्रकार अनुमान, व्याप्तिस्मृति आदि के अभ्यस्त व्यक्ति के लिए ॥ १० ॥ व्यालुप्त नहीं होता—। प्राधान्य के कारण ही उस (व्यङ्ग्य अर्थ) तक अनुसरण के रणरणक (औत्सुक्य) से त्वरित हुए (सहृदय लोग) बीच में विश्राम निर्देश से वह प्रामादिक समझना चाहिए। दूसरे यदि निर्णयसागरीय पक्ष को ही मानते हैं तो मूल कारिका में ‘वाच्यार्थपूर्विका’ इस विशेषण के लिए ‘प्रतिपत्तिः’ इस विशेषण के आक्षेप का गौरव करना पड़ता है। १. नियमतः पदार्थ के ज्ञान के द्वारा वाक्यार्थ का ज्ञान होता है अर्थात् पहले पदार्थ का ज्ञान होता है तब वाक्यार्थ का यह क्रम है। किन्तु जो व्यक्ति वाक्यवृत्तकुशल है उसे यह क्रम स्पष्ट रूप से संवेद्य नहीं होता है। उसी प्रकार पहले वाच्य अर्थ की प्रतीति होती है और तब व्यङ्ग्य अर्थ की, यह क्रम है। किन्तु जो अत्यन्त सहृदय व्यक्ति है उसे यह क्रम नहीं प्रतीत होता है। इस लिए आगे ध्वनि को ‘असंलक्ष्यक्रम’ भी कहा गया है। अनुमान आदि में भी जिसे विषय का अभ्यास होता है उसे व्याप्तिस्मृति और अनुमिति का क्रम स्पष्ट ज्ञात नहीं होता। ‘संकेत’-ज्ञान और ‘अर्थ’ ज्ञान के क्रम के सम्बन्ध में भी यही बात है।
प्रथम उद्योतः १०१ ध्वन्यालोकः स्वसामर्थ्यवशेनैव वाक्यार्थं प्रतिपादयन् । यथा व्यापारनिष्पत्तौ पदार्थो न विभाव्यते ॥ ११ ॥ यथा स्वसामर्थ्यवशेनैव वाक्यार्थं प्रकाशयन्नपि पदार्थो व्यापार- निष्पत्तौ न भाव्यते विभक्ततया ॥ ११ ॥ अपनी सामर्थ्य के वश ही वाक्यार्थ का प्रतिपादन करता हुआ पदार्थ जिस प्रकार व्यापार के निष्पन्न ( पूर्ण ) हो जाने पर विभावित नहीं होता ( अलग प्रतीत नहीं होता ) ॥ ११ ॥ जिस प्रकार अपनी सामर्थ्य के वश ही वाक्यार्थ को प्रकाशित करता हुआ भी पदार्थ व्यापार की निष्पत्ति की स्थिति में विभक्तरूप से भावित ( प्रतीत ) नहीं होता । लोचनम् माकाङ्क्षायोग्यतासन्निधयः । विभाव्यत इति । विशब्देन विभक्ततोक्ता; विभक्त- तया न भाव्यत इत्यर्थः । अनेन विद्यमान एव क्रमो न संवेद्यत इत्युक्तम् । तेन यत्स्फोटाभिप्रायेणासन्नेव क्रम इति व्याचक्षते तत्प्रत्युत विरुद्धमेव । वाच्येऽर्थे विमुखो विश्रान्तिनिबन्धनं परितोषमलभमान आत्मा हृदयं येषामि- त्यनेन सचेतसामित्यस्यैवार्थोऽभिव्यक्तः । सहृदयानामेव तर्ह्ययं महिमास्तु, नहीं करते हैं, इस प्रकार होते हुए भी क्रम का लक्षित नहीं होना ( व्यङ्ग्य अर्थ के ) प्राधान्य में हेतु है । अपनी सामर्थ्य१ अर्थात् आकांक्षा, योग्यता, सन्निधि । विभावित होता है— । 'वि' शब्द से 'विभक्तता' कही गई; अर्थात् विभक्त रूप में नहीं भावित ( प्रतीत ) होता है । इससे जो 'स्फोट के अभिप्राय से नहीं रहता हुआ भी क्रम' ऐसा व्याख्यान करते हैं, वह ( व्याख्यान ) प्रत्युत विरुद्ध ही है । वाच्य अर्थ में विमुख अर्थात् विश्रान्तिमूलक परितोष को न पाये आत्मा ( हृदय ) है जिनका, इससे 'सहृदयों का' इतने का ही अर्थ अभिव्यक्त है । तब तो यह सहृदयों की ही महिमा १. पदार्थों में जब तक योग्यता, आकांक्षा और सन्निधि ये तीनों विद्यमान नहीं रहते तब तक वाक्य स्वरूप-लाभ नहीं करता । 'योग्यता' पदार्थों के परस्पर सम्बन्ध में बाधा का अभाव है । पदसमूह में इस 'योग्यता' के अभाव में किसी प्रकार वह वाक्य नहीं कहा जा सकता, जैसे 'वह्निना सिञ्चति' । यह पदसमूह योग्यतारहित है, क्योंकि सेचन कार्य की योग्यता अग्नि में नहीं है, इसलिए यह वाक्य नहीं है । पदसमूह को वाक्य बनने में 'आकांक्षा' भी होनी चाहिए, अर्थात् एक पद से दूसरे पद के अन्वय का अनुभावन होना चाहिए, आकांक्षारहित पदसमूह, जैसे 'गौरश्वः पुरुषो हस्ती शकुनिर्मृगो ब्राह्मणः' इत्यादि । यहाँ एक पद से दूसरे का अन्वय प्रतीत नहीं होता । 'सन्निधि' या 'आसत्ति' बुद्धि का अविच्छेद है, अर्थात् एक पद का दूसरे से सामयिक व्यवधान नहीं होना चाहिए । जैसे कोई पदसमूह अंशतः घण्टे-घण्टे के व्यवधान से कहा जाय तब उसमें सन्निधि का अभाव होता है अतः वह वाक्य नहीं कहला सकता । जैसे 'घटम्' कहने के एक घण्टे बाद यदि 'आनय' कहा तो यह पदसमूह वाक्य नहीं हो सकता । इस प्रकार ये तीनों ही पदसमूह के वे धर्म हैं जिनसे वाक्य स्वरूपलाभ करता है । यद्यपि 'आकांक्षा' श्रोता की
१०२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तद्वत्सचेतसां सोऽर्थो वाच्यार्थविमुखात्मनाम् । बुद्धौ तत्त्वार्थदर्शिन्यां झटित्येवावभासते ॥ १२ ॥ एवं वाच्यव्यतिरेकिणो व्यङ्ग्यस्यार्थस्य सद्भावं प्रतिपाद्य प्रकृत उपयोजयन्नाह— यत्रार्थः शब्दो वा तमर्थमुपसर्जनीकृतस्वार्थौ । व्यङ्क्तः काव्यविशेषः स ध्वनिरिति सूरिभिः कथितः॥१३॥ उसी प्रकार वह अर्थ वाच्यार्थ से विमुख आत्मा वाले सहृदयजनों की तत्त्वार्थ- दर्शिनी बुद्धि में झट से ही अवभासित हो जाता है ॥ १२ ॥ इस प्रकार वाच्यार्थ से अतिरिक्त व्यंग्यार्थ के सद्भाव का प्रतिपादन करके प्रकृत में उसका उपयोग करते हुए कहते हैं— जहाँ अर्थ अपने-आपको अथवा शब्द अपने अर्थ को गुणीभूत करके (प्रतीयमान) अर्थ को व्यक्त ( अभिव्यक्त ) करते हैं वह ‘काव्यविशेष' विद्वान् लोगों द्वारा 'ध्वनि' कहा जाता है ॥ १३ ॥ लोचनम् न तु काव्यस्यासौ कश्चिदतिशय इत्याशङ्कयाह—अवभासत इति । तेनात्र विभक्ततया न भासते, न तु वाच्यस्य सर्वथैवानवभासः। अत एव तृतीयोद्द्योते घटप्रदीपदृष्टान्तबलाद्व्यङ्ग्यप्रतीतिकालेऽपि वाच्यप्रतीतिर्न विघटत इति यद्वक्ष्यति तेन सहास्य ग्रन्थस्य न विरोधः ॥ ११-१२ ॥ सद्भावमिति । सत्तां साधुभावं प्राधान्यं चेत्यर्थः । द्वयं हि प्रतिपिपादयि- है, न कि यह, कोई काव्य का अपना अतिशय है, यह आशङ्का करके कहते हैं— अवभासित होता है— । इस लिए यहाँ विभक्त रूप से भासित नहीं होता, न कि वाच्य का सर्वथा ही अनवभास होता है । अत एव तृतीय 'उद्योत' में घट और प्रदीप के दृष्टान्त १ के बल से जो यह कहेंगे कि व्यङ्ग्य की प्रतीति के काल में भी वाच्यप्रतीति नहीं विघटित होती है उसके साथ इस ग्रन्थ का विरोध नहीं है॥११-१२॥ सद्भाव२—। सत्ता अर्थात् साधुभाव और प्राधान्य । क्योंकि दोनों ही प्रतिपादन की जिज्ञासा रूप है तथापि परम्परा-सम्बन्ध द्वारा पदार्थ का भी धर्म है। अपनी इस 'सामर्थ्य' के द्वारा ही पदार्थ वाक्यार्थ का बोध कराते हैं। १. वाच्यार्थ से व्यङ्ग्यार्थ का द्योतन होता है। इसका मतलब है कि जिस प्रकार दीपक अपने प्रकाश से घट को प्रकाशित करता हुआ अपने को भी प्रकाशित करता है उसी प्रकार वाच्यार्थ भी व्यङ्ग्य अर्थ को प्रतीत कराता हुआ स्वयं भी प्रतीत होता है। वाच्यार्थ से विमुख सहृदय लोग झटिति उस व्यङ्ग्य अर्थ का ज्ञान करते हैं। इससे क्रम रहता हुआ भी उन्हें क्रम अभिलक्षित नहीं होता है। यहाँ यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि सहृदयों की विशेषता है जो इस प्रकार व्यङ्ग्य अर्थ का ज्ञान करते हैं, बल्कि व्यङ्ग्यार्थ उन्हें इस प्रकार अवभासित होता है। २. 'सद्भाव' शब्द सत्ता या अस्तित्व के अर्थ में प्रयुक्त होता है, साथ ही उस वस्तु की
प्रथम उद्योतः १०३ लोचनम् षितम् । प्रकृत इति लक्षणे । उपयोजयन् उपयोगं गमयन् । तमर्थमिति चायमुप- योगः । स्वशब्द आत्मवाची । स्वश्चार्थश्च तौ स्वार्थौ; तौ गुणीकृतौ याभ्याम्, यथासंख्येन तेनार्थो गुणीकृतात्मा, शब्दो गुणीकृताभिधेयः । तमर्थमिति । ‘सरस्वती स्वादु तदर्थवस्तु’ इति यदुक्तम् । व्यङ्क्तः द्योतयतः । व्यङ्क्त इति द्विवचनेनेदमाह—यद्यप्यविवक्षितवाच्ये शब्द एव व्यञ्जकस्तथाप्यर्थस्यापि सहकारिता न त्रुट्यति, अन्यथा अज्ञातार्थोऽपि शब्दस्तद्व्यञ्जकः स्यात् । विवक्षितान्यपरवाच्ये च शब्दस्यापि सहकारित्वं भवत्येव, विशिष्टशब्दाभि- धेयतया विना तस्यार्थस्याव्यञ्जकत्वादिति सर्वत्र शब्दार्थयोरुभयोरपि ध्वननं व्यापारः । तेन यद्भट्टनायकेन द्विवचनं दूषितं तद् गजनिमीलिकयैव । अर्थः शब्दो वेति तु विकल्पाभिधानं प्राधान्याभिप्रायेण । काव्यं च तद्विशेषश्चासौ काव्यस्य वा विशेषः । काव्यग्रहणाद् गुणालङ्कारोपस्कृतशब्दार्थपृष्ठपाती ध्वनि- इच्छा के विषय हैं। प्रकृत में—। अर्थात् लक्षण में । उपयोग बताते हुए— । ‘उस प्रतीयमान अर्थ का’ यह उपयोग है । स्व और अर्थ दोनों स्वार्थ हुए, वे स्वार्थ जिनके द्वारा गुणीभूत हुए । उस क्रम से अर्थ अपने आपको गुणीभूत करता है और शब्द अभिधेय ( वाच्य ) का गुणीभूत करता है । उस अर्थ को— । जिसे ‘सरस्वती स्वादु तदर्थवस्तु’ कहा है । ‘व्यक्त करते हैं’ अर्थात् द्योतन करते हैं । ‘व्यङ्क्तः’ ( व्यक्त करते हैं ) इस द्विवचन से यह कहते हैं—यद्यपि ‘अविवक्षितवाच्य’ ध्वनि में शब्द ही व्यञ्जक है, तथापि अर्थ की भी सहकारिता नहीं टूटती है, अन्यथा जिस शब्द का अर्थ ज्ञात नहीं है वह भी उसका व्यञ्जक हो जाता । और ‘विवक्षितान्यपर- वाच्य’ ध्वनि में शब्द भी सहकारी होता ही है, क्योंकि विशिष्ट शब्द द्वारा अभिधान नहीं किया जायगा तो ऐसी स्थिति में वह शब्द उस अर्थ का व्यञ्जक नहीं हो सकता । इस प्रकार सर्वत्र ‘ध्वनन’ शब्द और अर्थ दोनों का ही व्यापार है । इस लिए जो कि भट्टनायक ने ‘द्विवचन’ में दोष बताया था वह तो गजनिमीलिका के कारण ही । ‘अर्थ अथवा शब्द’ इस प्रकार जो विकल्प कहा है वह प्राधान्य१ के अभिप्राय से । अच्छाई और श्रेष्ठता भी इस शब्द से अभिहित होती है—सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते । प्रस्तुत में बड़े विस्तार से आचार्य ने ध्वनि के सद्भाव का जो प्रतिपादन किया है उससे केवल ध्वनि का अस्तित्व या मौजूदगी ही सिद्ध नहीं की है बल्कि उसे साधु और प्रधान भी सिद्ध किया है । १. ‘अर्थ अथवा शब्द’ यह विकल्प प्राधान्य के अभिप्राय से कहा है। अर्थात् जैसा कि यह ऊपर की पंक्तियों में कह चुके हैं कि केवल शब्द या केवल अर्थ व्यञ्जक नहीं होते, बल्कि एक दूसरे की सहायता से व्यञ्जक होते हैं । इस प्रकार जब अर्थ प्रधान रूप से व्यङ्ग्य की व्यञ्जना करता है तब शब्द उसका सहकारी होता है और जब शब्द प्रधान रूप से व्यञ्जक होता है तब अर्थ उसका सहकारी होता है । इसी प्राधान्य के अभिप्राय से आचार्य ने ‘विकल्प’ का प्रयोग किया है और शब्द-अर्थ की इसी सम्मिलित व्यञ्जकता के कारण ‘व्यङ्क्तः’ इस द्विवचन के प्रयोग को भी सार्थकता है । भट्टनायक द्वारा ‘द्विवचन’ का दूषण उनका अज्ञान प्रकट करता है।
१०४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यत्रार्थो वाच्यविशेषः वाचकविशेषः शब्दो वा तमर्थं व्यङ्क्तः, स काव्यविशेषो ध्वनिरिति । जहाँ अर्थ याने वाच्यविशेष अथवा वाचकविशेष शब्द उस अर्थ को अभिव्यक्त करते हैं वह काव्यविशेष 'ध्वनि' (कहलाता) है । लोचनम् लक्षण 'आत्मे'त्युक्तम् । तेनैतन्निरवकाशं श्रुतार्थापत्तावपि ध्वनिव्यवहारः स्यादिति । यच्चोक्तम्—'चारुत्वप्रतीतिस्तर्हि काव्यस्यात्मा स्यात्' इति तदङ्गी- कुर्म एव । नाम्नि खल्वयं विवाद इति । यच्चोक्तम्—'चारुणः प्रतीतिर्यदि काव्यात्मा प्रत्यक्षादिप्रमाणादपि सा भवन्ती तथा स्यात्' इति । तत्र शब्दार्थ- मयकाव्यात्माभिधानप्रस्तावे क एष प्रसङ्ग इति न किञ्चिदेतत् । स इति । अर्थो वा शब्दो वा, व्यापारो वा । अर्थोऽपि वाच्यो वा ध्वनतीति, शब्दोऽप्ये- 'काव्य और उसका विशेष' इस प्रकार (कर्मधारय समास) है, या 'काव्य का विशेष' इस प्रकार (षष्ठी तत्पुरुष समास) है । 'काव्य' के ग्रहण से यह कहा कि जो ध्वनि रूप आत्मा है वह गुण और अलङ्कार से उपस्कृत शब्द और अर्थ का पृष्ठपाती है । इस लिए इस बात का कोई अवकाश नहीं कि (स्थूलकाय देवदत्त दिन में भोजन नहीं करता' इस) "श्रुतार्थापत्ति' में भी 'काव्य' का व्यवहार होने लगेगा । और जो कि कहा है—'तब तो चारुत्व की प्रतीति काव्य का आत्मा होगा' यह हम स्वीकार करते ही हैं। यह विवाद तो नाम में है ! और जो कि कहा है—'चारु की प्रतीति यदि काव्य का आत्मा है तो प्रत्यक्ष आदि प्रमाण से भी चारु की होतीं हुई प्रतीति उस प्रकार (काव्य का आत्मा) होगी।' वहाँ जब कि शब्दार्थरूप काव्यात्मा के कथन का प्रसङ्ग है, फिर यह कौन प्रसङ्ग है ? अतः यह कुछ भी नहीं । (कारिका में प्रयुक्त) वह—। अर्थ अथवा शब्द, अथवा व्यापार । 'ध्वनति' या ध्वनन करता है, (इस व्युत्पत्ति के अनुसार) वाच्य अर्थ 'ध्वनि' है, इस प्रकार शब्द भी । 'ध्वन्यते' १. आचार्य का यह निर्देश पहले भी हो चुका है कि 'ध्वनि' काव्य का आत्मा अवश्य है किन्तु केवल ध्वनि से काव्य का व्यवहार नहीं होता । बल्कि 'ध्वनि' के साथ शब्द-अर्थ का गुण और अलङ्कार से उपस्कृत भी होना आवश्यक है । इस प्रकार प्रकृत 'कारिका' में 'काव्य' यह साभिप्राय है । यदि केवल ध्वनि के अस्तित्व मात्र से 'काव्य' मान लेने की छूट दे दी जाय तो मीमांसकों के यहाँ प्रसिद्ध 'श्रुतार्थापत्ति' का स्थल भी 'काव्य' के रूप में व्यवहृत होगा । जैसे 'यह मोटा ताजा देवदत्त दिन में नहीं खाता है' (पीनोऽयं देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते) इस श्रुत वाक्य से जो दिन में भोजन के अभाव में पीनत्व रूप अर्थ ज्ञात होता है उसकी अन्यथानुपपत्ति को लेकर 'रात्रि में भोजन करता है' (रात्रौ भुङ्क्ते) इस रात्रिभोजन रूप अर्थ के प्रतिपादक अन्य वाक्य की कल्पना करते हैं । परन्तु यहाँ 'ध्वनि' होते हुए भी गुण-अलङ्कार से उपस्कृत शब्द-अर्थ का अभाव है अतः यहाँ काव्य-व्यवहार नहीं हो सकता । इसका निर्देश 'काव्यस्यात्मा स एवार्थः' (१।५) कारिका की वृत्ति में 'विविधवाच्यवाचकरचनाप्रपञ्चचारुणः काव्यस्य' में किया है । इस स्थल के लोचन में इसका स्पष्टीकरण दर्शनीय है ।
प्रथम उद्योतः १०५ ध्वन्यालोकः अनेन वाच्यवाचकचारुत्वहेतुभ्य उपमादिभ्योऽनुप्रासादिभ्यश्च विभक्त एव ध्वनेर्विषय इति दर्शितम् । यदप्युक्तम्—‘प्रसिद्धप्रस्थाना- तिक्रमिणो मार्गस्य काव्यहानेर्ध्वनिर्नास्ति’ इति, तदप्ययुक्तम् । यतो लक्षणकृतामेव स केवलं न प्रसिद्धः, लक्ष्ये तु परीक्ष्यमाणे स एव सहृदय- हृदयाह्लादकारि काव्यतत्त्वम् । ततोऽन्यच्चित्रमेवेत्यग्रे दर्शयिष्यामः । इससे वाच्य और वाचक की चारुता के हेतु उपमा आदि और अनुप्रास आदि से ध्वनि का विषय विभक्त ही है, यह दिखाया । जो कि कहा है—‘प्रसिद्ध प्रस्थानों को अतिक्रमण करनेवाला मार्ग काव्यत्व से रहित होता है, अतः ध्वनि नहीं है।’ वह भी ठीक नहीं; क्योंकि लक्षणकारों के लिए ही वह केवल प्रसिद्ध नहीं है, लक्ष्य की परीक्षा करने पर वही सहृदयजनों के हृदय को आह्लादित करनेवाला काव्यतत्त्व है । उससे दूसरा ही ‘चित्र’ है, यह आगे चलकर दिखायेंगे । लोचनम् वम् । व्यङ्ग्यो वा ध्वन्यत इति व्यापारो वा शब्दार्थयोर्ध्वननमिति’ । कारिकया तु प्राधान्येन समुदाय एव काव्यरूपो मुख्यतया ध्वनिरिति प्रतिपादितम् । विभक्त इति । गुणालङ्काराणां वाच्यवाचकभावप्राणत्वात् । अस्य च तदन्यव्यङ्ग्य- व्यञ्जकभावसारत्वान्नास्य तेष्वन्तर्भाव इति । अनन्यत्र भावो विषयशब्दार्थः । एवं तद्व्यतिरिक्तः कोऽयं ध्वनिरिति निराकृतम् । लक्षणकृतामेवेति । लक्षण- (इस व्युत्पत्ति के अनुसार) व्यंग्य ‘ध्वनि’ है, और शब्द और अर्थ का व्यापार ‘ध्वननम्’ ( इस व्युत्पत्ति के अनुसार ) ‘ध्वनि’ है । कारिका द्वारा तो प्रधानतया समुदाय¹ ही काव्यरूप मुख्यरूप से ‘ध्वनि’ है, ऐसा प्रतिपादन किया है । विभक्त —। क्योंकि गुण और अलङ्कार का प्राणभूत तत्त्व वाच्यवाचकभाव है, और इस ध्वनि का सार उसके अतिरिक्त व्यंग्यव्यञ्जकभाव है, इसलिए इसका उनमें अन्तर्भाव नहीं है । ‘विषय’² शब्द का अर्थ है अन्यत्र सद्भाव का अभाव । इस प्रकार उन ( गुण और अलङ्कार ) से व्यतिरिक्त यह ‘ध्वनि’ क्या है, इसका निराकरण किया । लक्षणकारों के लिए ही—। १. मूल कारिकाग्रन्थ में जिस काव्य विशेष को ‘ध्वनि’ कहा गया है वह मुख्य रूप से रूढि द्वारा समुदाय रूप ध्वनि है । ‘ध्वनति’, ‘ध्वन्यते’ और ‘ध्वननम्’ शब्द, वाच्य, व्यङ्ग्य और व्यञ्जन इनका समुदाय यहाँ ‘ध्वनि’ है । पहले भी ‘लोचन’ में ध्वनि की व्युत्पत्तियों का निर्देश हो चुका है । २. व्युत्पत्ति के अनुसार ‘विषय’ शब्द का यह अर्थ है कि जो अपने सम्बन्ध के पदार्थ को बांध देता है, सीमित कर देता है ( विशेषण सिनोति बध्नातीति विषयः ) । प्रस्तुत में ध्वनि का भी अपनी सीमा से बाहर सद्भाव नहीं है, अर्थात् वह सीमा में बँधा हुआ है । अतः ध्वनि को उपमा आदि के अन्तर्गत नहीं लाया जा सकता है । उपमा आदि वाच्य और वाचक के चारुत्व के हेतु हैं किन्तु ध्वनि का प्राण व्यङ्ग्य-व्यञ्जक भाव है और यहाँ स्वयं यह चारुत्व की प्रतीति है ।
१०६ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् काराप्रसिद्धता विरुद्धो हेतुः, तत एव हि यत्नेन लक्षणीयता । लक्ष्ये त्वप्रसिद्धत्व- मसिद्धो हेतुः । यच्च नृत्तगीतादिकल्पं, तत्काव्यस्य न किञ्चित् । चित्रमिति । विस्मयकृद्वृत्त्यादिवशात्, न तु सहृदयाभिलषणीयचमत्कारसाररसनिःष्यन्दमय- मित्यर्थः । काव्यानुकारित्वाद्वा चित्रम्, आलेखमात्रत्वाद्वा, कलामात्रत्वाद्वा । अथ इति । लक्षणकारों में अप्रसिद्धतारूप विरुद्ध¹ हेतु है; इसी कारण यत्नपूर्वक ( आचार्य ने ध्वनि को ) लक्षणीय किया है ! लक्ष्य में 'अप्रसिद्धत्व' रूप हेतु असिद्ध है । और जो कि नृत्त, गीत आदि² के समान है, वह काव्य का ( ध्वनि के रूप में लक्षित काव्य का ) कुछ नहीं है । चित्र—। अर्थात् नृत्त³ आदि के कारण विस्मय उत्पन्न करने वाला, न कि सहृदयजनों द्वारा अभिलषणीय चमत्कारसार रसका निष्पन्दमय । काव्य का अनुकरण करनेवाला होने के कारण 'चित्र' है, अथवा आलेखमात्र अथवा कलामात्र होने के कारण ! आगे—। १, पहले ध्वनि के निराकरण के प्रसङ्ग में यह कह चुके हैं कि प्रसिद्ध प्रस्थान ( अर्थात् वह मार्ग जो परम्परा से व्यवहार में आता है, जैसे प्रस्तुत में शब्द-अर्थ तथा उनके गुण और अलङ्कार आदि ) में 'ध्वनि' का निर्देश न होने के कारण उसे काव्य नहीं माना जा सकता । तात्पर्य यह कि ध्वनि इस कारण नहीं है कि वह प्रसिद्ध प्रस्थानों में नहीं आता उन्हें अतिक्रमण करने वाला है, इस प्रकार ध्वनि का विरोध किया गया है । इसी को 'न्याय' की भाषा में इस प्रकार कह सकते हैं—ध्वनिर्नाम काव्यप्रकारो नास्ति, प्रसिद्धप्रस्थानातिकामित्वात् । इस 'हेतु' के तात्पर्य के रूप में दो बातें प्रतीत होती हैं, एक यह कि प्राचीन अलङ्कार-शास्त्र के लक्षणकारों में यह 'ध्वनि' तत्त्व प्रसिद्ध नहीं था और दूसरी यह कि यह कोई अप्रसिद्ध लक्ष्य था । इन दोनों का निराकरण करते हुये मूल-वृत्ति ग्रन्थ में जैसा कहा है कि लक्षणकारों के लिये ही वह केवल प्रसिद्ध नहीं है, किन्तु लक्ष्य की परीक्षा करने पर वही सहृदयों को आह्लादित करने वाला काव्य तत्त्व है । इस प्रकार 'लक्षणकाराप्रसिद्धता' रूप हेतु विरुद्ध है और 'लक्ष्याप्रसिद्धता' रूप हेतु असिद्ध है । ध्वनि लक्षणकारों के लिये अप्रसिद्ध है तो इसका यह अर्थ नहीं कि वह नहीं है, बल्कि इससे तो यह समझना चाहिये कि वह यत्नपूर्वक लक्षणीय है, क्योंकि वह सिर्फ 'काव्य' नहीं बल्कि 'काव्यविशेष' है । अतः यह हेतु विरुद्ध है । दूसरे यह कहना कि वह लक्ष्य में प्रसिद्ध नहीं, बिलकुल ठीक नहीं, क्योंकि परीक्षा करके लक्ष्य में देखने पर वही सहृदयहृदयाह्लादकारी तत्त्व दिखाई देता है । अतः यह हेतु असिद्ध है । २. जैसे नाटक आदि में शोभा के लिये नृत्त, गीत आदि का आयोजन करते हैं उसी प्रकार यह ध्वनि भी कोई शोभाकारी तत्त्व हो सकता है । जिस प्रकार नृत्त-गीत कवनीय न होने के कारण काव्य नहीं हैं उसी प्रकार ध्वनि भी काव्य नहीं है यह पहले ध्वनि के काव्य के रूप में लक्षित करने के प्रसङ्ग में कह चुके हैं । प्रस्तुत में 'ध्वनि' को 'काव्यविशेष' रूप में सिद्ध करके यह निर्णय कर दिया कि वह एक कवनीय तत्त्व है अतः वह 'काव्य' है । ऐसी स्थिति में उसे नृत्त-गीतादि की समानता की कोटि में नहीं ला सकते हैं, क्योंकि नृत्त-गीत आदि काव्य से कोई सम्बन्ध नहीं रखते, वे सर्वथा कवनीय नहीं हैं और ध्वनि कवनीय है, कवि के व्यापार का विषय है । ३. लोचन में 'वृत्तादि' छपा है, 'बालप्रिया' में 'वृत्त' शब्द से यमक-उपमा आदि का परिग्रह किया है । क्योंकि यमक-उपमा आदि अलङ्कारों के कारण 'विस्मय' होता है । परन्तु 'दिव्याङ्गना'