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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

१६ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

मुझसे अभीष्ट वर माँग लें।

उस समय गरुडने कहा—हे हरि! नागोंने मेरी माता विनताको दासी बना लिया है। हे देव! आप प्रसन्न होकर मुझे यह वर प्रदान करें कि मैं उनको जीतकर अमृत प्राप्त करनेमें समर्थ हो सकूँ और माँको (नागोंकी माता) कद्रूकी दासतासे मुक्त करा सकूँ, मैं आपका वाहन बन सकूँ, महान् बली, महान् शक्तिशाली, सर्वज्ञ और नागोंको विदीर्ण करनेमें समर्थ हो सकूँ तथा जिस प्रकार पुराण-संहिताका रचनाकार हो सकूँ वैसा ही करनेकी कृपा करें।

श्रीविष्णु बोले—हे पक्षिराज गरुड! आपने जैसा वर माँगा है, वैसा ही सब कुछ होगा। आप नागोंकी दासतासे अपनी माता विनताको मुक्त करवा सकेंगे। सभी देवताओंको जीतकर अमृत ग्रहण करनेमें आपको सफलता प्राप्त होगी। अत्यन्त शक्तिसम्पन्न होकर आप मेरे वाहन होंगे। विषोंके विनाशकी शक्ति भी आपको प्राप्त होगी। मेरी कृपासे आप मेरे ही माहात्म्यको कहनेवाली पुराण-संहिताका प्रणयन करेंगे। मेरा जैसा स्वरूप कहा गया है, वैसा ही आपमें भी प्रकट होगा। आपके द्वारा प्रणीत यह पुराणसंहिता आपके 'गरुड' नामसे लोकमें प्रसिद्ध होगी।

हे विनतासुत! जिस प्रकार देव-देवोंके मध्य मैं ऐश्वर्य और श्रीरूपमें विख्यात हूँ, उसी प्रकार हे गरुड! सभी पुराणोंमें यह गरुडमहापुराण भी ख्याति अर्जित करेगा। जैसे विश्वमें मेरा कीर्तन होता है, वैसे ही गरुडके नामसे आपका भी संकीर्तन होगा। हे पक्षिश्रेष्ठ! अब आप मेरा ध्यान करके उस पुराणका प्रणयन करें।

हे रुद्र! मेरे द्वारा यह वरदान दिये जानेके बाद इसी सम्बन्धमें कश्यप ऋषिके द्वारा पूछे जानेपर गरुडने इसी पुराणको उन्हें सुनाया। कश्यपने इस गरुडमहापुराणका श्रवण करके गारुडीविद्याके बलसे एक जले हुए वृक्षको भी जीवित कर दिया था। गरुडने स्वयं (भी) इसी विद्याके द्वारा अनेक प्राणियोंको जीवित किया था। 'यक्षि ॐ उं स्वाहा' यह जप करनेयोग्य गारुडी पराविद्या है। हे रुद्र! मेरे स्वरूपसे परिपूर्ण गरुडद्वारा कहे गये इस गरुडमहापुराणको आप सुनें। (अध्याय २)


गरुडपुराणके प्रतिपाद्य विषयोंका निरूपण

सूतजीने कहा— हे शौनक! जिस गरुडमहापुराणको ब्रह्मा और शिवने भगवान् विष्णुसे, मुनिश्रेष्ठ व्यासने ब्रह्मासे और मैंने व्याससे सुना था, उसे ही इस नैमिषारण्यमें आप सबको मैं सुना रहा हूँ। इस गरुडमहापुराणके प्रारम्भमें सर्गवर्णन तदनन्तर देवार्चन, तीर्थमाहात्म्य, भुवनवृत्तान्त, मन्वन्तर, वर्णधर्म, आश्रमधर्म, दानधर्म, राजधर्म, व्यवहार, व्रत, वंशानुचरित, निदानपूर्वक अष्टाङ्ग आयुर्वेद,

४- सृष्टि-वर्णन

काण्ड ] सृष्टि-वर्णन १७

प्रलय, धर्म, काम, अर्थ, उत्तम ज्ञान और भगवान् विष्णुकी मायामय एवं सहज लीलाओंको विस्तारपूर्वक कहा गया है। भगवान् वासुदेवके अनुग्रहसे इस गरुडमहापुराणके उपदेष्टारूपमें श्रीगरुड सब प्रकारसे अत्यन्त सामर्थ्यवान् हो गये और उसीके प्रभावसे उन्हींके वाहन बनकर वे सृष्टि, स्थिति तथा प्रलयके कारण भी बन गये। देवोंको जीतकर (अपनी माताको दासतासे मुक्त करानेके लिये) अमृत प्राप्त करनेमें भी उन्होंने सफलता प्राप्त की।

जिन भगवान् विष्णुके उदरमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड विद्यमान है, उनकी क्षुधाको भी उन्होंने (अपनी भक्तिसे) शान्त किया। जिनके दर्शन या स्मरणमात्रसे सर्पोंका विनाश हो जाता है, जिस गारुडमन्त्रके बलसे कश्यप ऋषिने जले हुए वृक्षको भी जीवित कर दिया था, उन्हीं हरिरूप गरुडने इस गरुडमहापुराणका वर्णन श्रीकश्यपसे किया था।

हे शौनक! यह श्रीमद्गरुडमहापुराण अत्यन्त पवित्र तथा पाठ करनेपर सब कुछ प्रदान करनेवाला है। व्यासजीको नमस्कार करके मैं यथावत् उसे कह रहा हूँ। आप सब उसको सुनें। (अध्याय ३)


सृष्टि-वर्णन

रुद्रजी बोले— हे जनार्दन! आप सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर एवं वंशानुचरित—इन सबका विस्तारपूर्वक वर्णन करें।

श्रीहरिने कहा— हे रुद्र! सर्ग आदिके साथ ही पापोंका नाश करनेवाली सृष्टि-स्थिति एवं प्रलयरूप भगवान् विष्णुकी सनातन क्रीडाका अब मैं वर्णन करूँगा, उसको आप सुनें।

नरनारायण-रूपमें उपास्य वे वासुदेव प्रकाशस्वरूप परमात्मा परब्रह्म और देवाधिदेव हैं तथा इस जगत्की सृष्टि-स्थिति एवं प्रलयके कर्ता हैं। यह सब जो कुछ दृष्ट-अदृष्ट है, उन भगवान्का ही व्यक्त और अव्यक्त स्वरूप है। वे ही पुरुष एवं कालरूपमें विद्यमान हैं। जिस प्रकार बालक क्रीडा करता है, उसी प्रकार व्यक्तरूपमें भगवान् विष्णु और अव्यक्तरूपमें काल एवं पुरुष (निराकार ब्रह्म)-की क्रीडा होती है। उन्हीं लीलाओंको आप भी सुनें।

उन परमात्मा परमेश्वरका आदि और अन्त नहीं है, वे ही जगत्को धारण करनेवाले अनन्त पुरुषोत्तम हैं। उन्हीं परमेश्वरसे अव्यक्तकी उत्पत्ति होती है और उन्हींसे आत्मा (पुरुष) भी उत्पन्न होता है। उस अव्यक्त प्रकृतिसे बुद्धि, बुद्धिसे मन, मनसे आकाश, आकाशसे वायु, वायुसे तेज, तेजसे जल और जलसे पृथिवीकी उत्पत्ति हुई है।

हे रुद्र! इसके पश्चात् हिरण्मय अण्ड उत्पन्न हुआ। उस अण्डमें वे प्रभु स्वयं प्रविष्ट होकर जगत्की सृष्टिके लिये सर्वप्रथम शरीर धारण करते हैं। तदनन्तर चतुर्मुख ब्रह्माके रूपमें शरीर धारणकर रजोगुणके आश्रयसे उन्हीं देवने इस चराचर विश्वकी सृष्टि की।

देव, असुर एवं मनुष्योंसहित यह सम्पूर्ण जगत् उसी अण्डमें विद्यमान है। वे ही परमात्मा स्वयं स्रष्टा (ब्रह्मा)-के रूपमें जगत्की संरचना करते हैं, विष्णुरूपमें जगत्की रक्षा करते हैं और अन्तमें संहर्ता शिवके रूपमें वे ही देव संहार करते हैं। इस प्रकार एकमात्र वे ही परमेश्वर ब्रह्माके रूपमें सृष्टि, विष्णुके रूपमें पालन और कल्पान्तके समय रुद्रके रूपमें सम्पूर्ण जगत्को विनष्ट करते हैं। सृष्टिके समय वे ही वराहका रूप धारणकर अपने दाँतोंसे जलमग्न पृथिवीका उद्धार करते हैं। हे शङ्कर! संक्षेपमें ही मैं देवादिकी सृष्टिका वर्णन कर रहा हूँ; आप उसको सुनें।

१८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

सबसे पहले उन परमेश्वरसे महत्तत्त्वकी सृष्टि होती है। वह महत्तत्त्व उन्हीं ब्रह्मका विकार है। पञ्च तन्मात्राओं (रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द)-की उत्पत्तिसे युक्त द्वितीय सर्ग है। उसे भूत-सर्ग कहा जाता है। (इन पञ्च तन्मात्राओंसे पृथिवी, जल, तेज, वायु तथा आकाशरूपमें महाभूतोंकी सृष्टि होती है।) तीसरा वैकारिक सर्ग है, (इसमें कर्मेन्द्रिय एवं ज्ञानेन्द्रियोंकी सृष्टि आती है इसलिये) इसे ऐन्द्रिक भी कहा जाता है। इसकी उत्पत्ति बुद्धिपूर्वक होती है, यह प्राकृत-सर्ग है। चौथा सर्ग मुख्य-सर्ग है। पर्वत और वृक्षादि स्थावरोंको मुख्य माना गया है। पाँचवाँ सर्ग तिर्यक्-सर्ग कहा जाता है, इसमें तिर्यक्स्रोता^१ (पशु-पक्षी आदि) आते हैं। इसके पश्चात् ऊर्ध्वस्रोतोंकी^२ सृष्टि होती है। इस छठे सर्गको देव-सर्ग भी कहा गया है। तदनन्तर सातवाँ सर्ग अर्वाक्स्रोतोंका^३ होता है। यही मानुष-सर्ग है।

आठवाँ अनुग्रह नामक सर्ग है। वह सात्त्विक और तामसिक गुणोंसे संयुक्त है। इन आठ सर्गोंमें पाँच वैकृत-सर्ग और तीन प्राकृत-सर्ग कहे गये हैं। कौमार नामक सर्ग नवाँ सर्ग है। इसमें प्राकृत और वैकृत दोनों सृष्टियाँ विद्यमान रहती हैं।

हे रुद्र ! देवोंसे लेकर स्थावरपर्यन्त चार प्रकारकी सृष्टि कही गयी है। सृष्टि करते समय ब्रह्मासे (सबसे पहले) मानसपुत्र उत्पन्न हुए। तदनन्तर देव, असुर, पितृ और मनुष्य—इस सर्गचतुष्टयका प्रादुर्भाव हुआ।

इसके बाद जल-सृष्टिकी इच्छासे उन्होंने अपने मनको सृष्टि-कार्यमें संलग्न किया। सृष्टि-कार्यमें प्रवृत्त होनेपर प्रजापति ब्रह्मासे तमोगुणका प्रादुर्भाव हुआ। अतः सृष्टिकी अभिलाषा रखनेवाले ब्रह्माकी जङ्घासे सर्वप्रथम असुर उत्पन्न हुए। हे शङ्कर ! तदनन्तर ब्रह्माने उस तमोगुणसे युक्त शरीरका परित्याग किया तो उस शरीरसे निकली हुई तमोगुणकी मात्राने स्वयं रात्रिका रूप धारण कर लिया। उस रात्रिरूप सृष्टिको देखकर यक्ष और राक्षस बहुत ही प्रसन्न हुए।

हे शिव ! उसके बाद सत्त्वगुणकी मात्राके उत्पन्न होनेपर प्रजापति ब्रह्माके मुखसे देवता उत्पन्न हुए। तदनन्तर जब उन्होंने सत्त्वगुण-समन्वित अपने उस शरीरका परित्याग किया तो उससे दिनका प्रादुर्भाव हुआ, इसीलिये रात्रिमें असुर और दिनमें देवता अधिक शक्तिशाली होते हैं। उसके पश्चात् ब्रह्माके उस सात्त्विक शरीरसे पितृगणोंकी उत्पत्ति हुई।

इसके बाद ब्रह्माके द्वारा उस सात्त्विक शरीरका परित्याग करनेपर संध्याकी उत्पत्ति हुई जो दिन और रात्रिके मध्य अवस्थित रहती है। तदनन्तर ब्रह्माके रजोगुणमय शरीरसे मनुष्योंका प्रादुर्भाव हुआ। जब ब्रह्माने उसका परित्याग किया तो उससे ज्योत्स्ना (प्रभातकाल) उत्पन्न हुई, जो प्राक्सन्ध्याके नामसे जानी जाती है। ज्योत्स्ना, रात्रि, दिन और सन्ध्या—ये चारों उस ब्रह्माके ही शरीर हैं।

तत्पश्चात् ब्रह्माके रजोगुणमय शरीरके आश्रयसे क्षुधा और क्रोधका जन्म हुआ। उसके बाद ब्रह्मासे ही भूख-प्याससे आतुर एवं रक्त-मांस पीने-खानेवाले राक्षसों तथा यक्षोंकी उत्पत्ति हुई। राक्षसोंसे रक्षणके कारण राक्षस^४ कहा गया और भक्षणके


१. जिनका स्रोत (आहार-संचार) तिर्यक् (वक्र) होता है उन्हें 'तिर्यक्स्रोता' कहते हैं, इसीलिये पशु-पक्षियोंको तिर्यक्स्रोता कहा जाता है। इनके द्वारा खाये गये अन्न-जल आदिका इनके उदर (पेट)-में वक्र (टेढ़ी-तिरछी) गतिसे संचरण होता है।
२. 'ऊर्ध्वस्रोता' शब्द देवताओंका वाचक है, क्योंकि इनका आहार-संचार ऊपरकी ओर होता है।
३. 'अर्वाक्स्रोता' शब्द मनुष्योंका वाचक है, क्योंकि इनका आहार-संचार अर्वाक् (नीचेकी ओर) होता है।
४. जिससे सब लोग अपनी रक्षा करें, वह राक्षस है। इसी दृष्टिसे रक्षणका आशय यह है—जिनसे अपना रक्षण—बचाव आवश्यक है, वे राक्षस हैं।

५- मानस-सृष्टि-वर्णन, दक्ष प्रजापतिद्वारा मिथुनधर्मसे सृष्टिका विस्तार

काण्ड ] मानस-सृष्टि-वर्णन, दक्ष प्रजापतिद्वारा मिथुनधर्मसे सृष्टिका विस्तार १९


कारण यक्षोंको यक्ष*-नामकी प्रसिद्धि प्राप्त हुई। तदनन्तर ब्रह्माके केशोंसे सर्प उत्पन्न हुए। ब्रह्माके केश उनके सिरसे नीचे गिरकर पुनः उनके सिरपर आरूढ हो गये—यही सर्पण है। इसी सर्पण (गतिविरोध)-के कारण उन्हें सर्प कहा गया। उसके बाद ब्रह्माके क्रोधसे भूतोंका जन्म हुआ। (इसीलिये इन प्राणियोंमें क्रोधकी मात्रा अधिक होती है।) तदनन्तर ब्रह्मासे गन्धर्वोंकी उत्पत्ति हुई। गायन करते हुए इन सभीका जन्म हुआ था, इसलिये इन्हें गन्धर्व और अप्सराकी ख्याति प्राप्त हुई।

उसके बाद प्रजापति ब्रह्माके वक्षःस्थलसे स्वर्ग और द्युलोक उत्पन्न हुआ। उनके मुखसे अज, उदर-भागसे तथा पार्श्व-भागसे गौ, पैर-भागसे हाथीसहित अश्व, महिष, ऊँट और भेड़की उत्पत्ति हुई। उनके रोमोंसे फल-फूल एवं औषधियोंका प्रादुर्भाव हुआ।

गौ, अज, पुरुष—ये मेध्य (पवित्र) हैं। घोड़े, खच्चर और गदहे ग्राम्य पशु कहे जाते हैं। अब मुझसे वन्य पशुओंको सुनो—इन वन्य जन्तुओंमें पहले श्वापद (हिंसक व्याघ्रादि) पशु, दूसरे दो खुरोंवाले, तीसरे हाथी, चौथे बंदर, पाँचवें पक्षी, छठे कच्छपादि जलचर और सातवें सरीसृप जीव (उत्पन्न हुए) हैं।

उन ब्रह्माके पूर्वादि चारों मुखोंसे ऋक्, यजुष्, साम तथा अथर्व—इन चार वेदोंका प्रादुर्भाव हुआ। उन्हींके मुखसे ब्राह्मण, भुजाओंसे क्षत्रिय, उरु-भागसे वैश्य तथा पैरोंसे शूद्र उत्पन्न हुए। उसके बाद उन्होंने ब्राह्मणोंके लिये ब्रह्मलोक, क्षत्रियोंके लिये इन्द्रलोक, वैश्योंके लिये वायुलोक और शूद्रोंके लिये गन्धर्वलोकका निर्धारण किया। उन्होंने ही ब्रह्मचारियोंके लिये ब्रह्मलोक, स्वधर्मनिरत गृहस्थाश्रमका पालन करनेवाले लोगोंके लिये प्राजापत्यलोक, वानप्रस्थाश्रमियोंके लिये सप्तर्षिलोक और संन्यासी तथा इच्छानुकूल सदैव विचरण करनेवाले परम तपोनिधियोंके लिये अक्षयलोकका निर्धारण किया। (अध्याय ४)


मानस-सृष्टि-वर्णन, दक्ष प्रजापतिद्वारा मिथुनधर्मसे सृष्टिका विस्तार

**श्रीहरिने पुनः कहा—**हे रुद्र ! प्रजापति ब्रह्माने परलोकमें रहनेवाली मानस-प्रजाओंकी सृष्टिके अनन्तर सृष्टि-विस्तार करनेवाले मानस-पुत्रोंकी सृष्टि की। उनसे धर्म, रुद्र, मनु, सनक, सनातन, भृगु, सनत्कुमार, रुचि, श्रद्धा, मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ और नारदका प्रादुर्भाव हुआ। साथ ही बर्हिषद्, अग्निष्वात्त, क्रव्याद, आज्यप, सुकालिन, उपहूत एवं दीप्य नामक (सात पितृगण) उत्पन्न हुए। इन बर्हिषदादि सप्त पितृगणोंमें प्रथम तीन पितृगण अमूर्तरूप और शेष चार मूर्तिमान् हैं।

कमलयोनि ब्रह्माके दक्षिण अँगूठेसे ऐश्वर्यसम्पन्न दक्ष प्रजापति और वाम अँगूठेसे उनकी भार्याका जन्म हुआ। प्रजापतिने अपनी उस पत्नीके गर्भसे अनेक शुभ लक्षणोंवाली कन्याओंको उत्पन्न किया और उन्हें ब्रह्माके मानस पुत्रोंको समर्पित कर दिया। उन्होंने सती नामक पुत्रीका विवाह रुद्रके साथ किया, उनसे रुद्रके असंख्य महापराक्रमशाली पुत्रोंकी उत्पत्ति हुई।

दक्षने असाधारण रूपवती सुन्दर लक्षणोंवाली


* यक्ष धनके देवता हैं। ये धनके लिये पूज्य होते हैं। भक्षण पूजाका एक भाग है। यक्ष धन प्रदान करनेके लिये धनकी कामना करनेवालोंसे भक्षणकी अपेक्षा रखते हैं, इसी दृष्टिसे भक्षणके आधारपर यक्ष नाम समझना चाहिये। यक्षका अर्थ पूजा भी हो सकता है। इसके लिये ऋग्वेद (७।६१।५)-का सायणभाष्य भी द्रष्टव्य है।

२० संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-


ख्याति नामक पुत्री भृगुको समर्पित की, जिससे भृगुके धाता और विधाता नामक दो पुत्र हुए। उसी ख्यातिसे भगवान् नारायणकी जो श्री नामक पत्नी हैं, उनकी भी उत्पत्ति हुई। उन श्रीके गर्भसे हरिने 'बल' और 'उन्माद' नामके दो पुत्रोंको उत्पन्न किया है।

महात्मा मनुके आयति और नियति नामवाली दो कन्याएँ हुईं, जिनका विवाह भृगुपुत्र धाता और विधाताके साथ हुआ। उन दोनोंसे एक-एक पुत्रका जन्म हुआ। आयतिके गर्भसे धाताने प्राण और नियतिके गर्भसे विधाताने 'मृकण्डु' को उत्पन्न किया। उन्हीं मृकण्डुसे महामुनि मार्कण्डेयकी उत्पत्ति हुई।

मरीचिकी पत्नी सम्भूतिने पौर्णमास नामक एक पुत्रको जन्म दिया। उस महात्मा पौर्णमासके दो पुत्र हुए, जिनका नाम विरजा और सर्वग है।

अङ्गिराने दक्षकन्या स्मृतिसे अनेक पुत्र और सिनीवाली, कुहू, राका तथा अनुमति नामक चार कन्याओंको जन्म दिया।

अनसूयाने अत्रिके चन्द्रमा, दुर्वासा एवं योगी दत्तात्रेय नामक तीन पुत्रोंको उत्पन्न किया। पुलस्त्यकी पत्नी प्रीतिसे दत्तोली नामक पुत्र हुआ। प्रजापति पुलहकी पत्नी क्षमासे कर्मश, अर्थवीर तथा सहिष्णु नामक तीन पुत्र उत्पन्न हुए। ऋतुकी पत्नी सुमतिसे साठ हजार बालखिल्य ऋषियोंकी उत्पत्ति हुई। ये सभी ऊर्ध्वरेता, अङ्गुष्ठपर्व परिमाणवाले तथा देदीप्यमान सूर्यके समान तेजस्वी हैं।

वसिष्ठकी पत्नी ऊर्जासे रज, गात्र, ऊर्ध्वबाहु, शरण, अनघ, सुतपा और शुक्र—ये सात पुत्र हुए। ये सभी सप्तर्षि थे।

हे हर! उस दक्ष प्रजापतिने शरीरधारी अग्निको स्वाहा नामक पुत्री प्रदान की थी। उस स्वाहादेवीने अग्निदेवसे पावक, पवमान तथा शुचि* नामक ओजस्वी तीन पुत्रोंको प्राप्त किया।

दक्षकन्या स्वधाने पितरोंसे मेना तथा वैतरणी नामवाली दो पुत्रियोंको जन्म दिया। वे दोनों कन्याएँ 'ब्रह्मवादिनी' थीं। मेनाका विवाह हिमाचलके साथ हुआ। हिमाचलने मेनासे मैनाक नामक पुत्र उत्पन्न किया था तथा गौरी (पार्वती)-नामसे प्रसिद्ध पुत्रीको उत्पन्न किया, जो पूर्वजन्ममें सती थीं।

हे शिव! तदनन्तर भगवान् ब्रह्माने अपने ही समान गुणवाले स्वायम्भुव मनुको जन्म दिया और उन्हें प्रजापालनके कार्यमें नियुक्त किया। उन्हीं ब्रह्मासे देवी शतरूपाका आविर्भाव हुआ। सर्ववैभवसम्पन्न महाराज स्वायम्भुव मनुने तपस्याके प्रभावसे परम शुद्ध तपस्विनी उस शतरूपा नामक कन्याको पत्नीरूपमें ग्रहण किया, जिससे प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक दो पुत्र तथा प्रसूति, आकूति और देवहूति नामकी तीन पुत्रियोंका जन्म हुआ। उनमेंसे मनुने आकूति नामक कन्याका विवाह प्रजापति 'रुचि' के साथ किया। प्रसूति तथा देवहूति क्रमशः दक्ष एवं कर्दममुनिको प्रदान की गयीं।

रुचिसे यज्ञ और दक्षिणाका जन्म हुआ। यज्ञसे दक्षिणाके बारह पुत्र हुए, जो महाबलशाली 'याम' (देवगण विशेष)-के नामसे प्रसिद्ध हैं।

दक्ष प्रजापतिने (प्रसूतिसे) चौबीस श्रेष्ठ कन्याओंकी उत्पत्ति की। उन कन्याओंमें श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, ऋद्धि और कीर्ति नामकी जो तेरह कन्याएँ थीं, उनको पत्नीके रूपमें दक्षिणाके पुत्र धर्मने स्वीकार किया। इसके बाद शेष जो


* पावक, पवमान और शुचि नामक तीन अग्नियाँ कही गयी हैं। उनमें विद्युत्-सम्बन्धी अग्निको 'पावक' तथा मन्थनसे उत्पन्न अग्निको 'पवमान' कहा जाता है और जो यह सूर्य चमकता है वही 'शुचि' (नामक) अग्नि कहलाता है— पावकः पवमानश्च शुचिरग्निश्च ते त्रयः। निर्मथ्यः पवमानः स्याद् वैद्युतः पावकः स्मृतः ॥ यश्चासौ तपते सूर्यः शुचिरग्निस्त्वसौ स्मृतः। (कूर्मपुराण, पूर्वविभाग १२। १५-१६)

६- ध्रुववंश तथा दक्ष प्रजापतिकी साठ कन्याओंकी संततियोंका वर्णन

काण्ड ] ध्रुववंश तथा दक्ष प्रजापतिकी साठ कन्याओंकी सन्ततियोंका वर्णन २१

ख्याति, सती, सम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा, सन्नति, अनसूया, ऊर्जा, स्वाहा और स्वधा नामक ग्यारह कन्याएँ थीं, उनका विवाह क्रमशः मुनिश्रेष्ठ भृगु, महादेव, मरीचि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अत्रि, वसिष्ठ, अग्नि और पितृगणोंके साथ हुआ।

श्रद्धाने काम, लक्ष्मीने दर्प, धृतिने नियम, तुष्टिने संतोष तथा पुष्टिने लोभको उत्पन्न किया। मेधासे श्रुतका तथा क्रियासे दण्ड, लय और विनय नामक तीन पुत्रोंका जन्म हुआ। बुद्धिने बोधको, लज्जाने विनयको, वपुने व्यवसाय एवं शान्तिने क्षेमको उत्पन्न किया। ऋद्धिसे सुख और कीर्तिसे यश उत्पन्न हुए। ये सभी धर्मके पुत्र हैं। धर्मके पुत्र कामकी पत्नीका नाम रति है, उसके पुत्रको हर्ष कहा गया है।

दक्ष प्रजापतिने किसी समय अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान किया। उस यज्ञमें रुद्र और सतीके अतिरिक्त निमन्त्रित दक्षके सभी जामाता अपनी पत्नियोंके साथ उपस्थित हुए। ऐसा देखकर बिना बुलाये ही सती भी उस यज्ञमें जा पहुँचीं, किंतु वहाँ अपने पिता दक्षके द्वारा किये गये तिरस्कारपूर्ण व्यवहारको देखकर उनसे न रहा गया और उन्होंने वहींपर अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया। वे ही सती पुनः हिमालयसे मेनाके गर्भमें उत्पन्न हुईं और गौरीके नामसे प्रसिद्ध होकर शम्भुकी पत्नी बनीं। तदनन्तर उनसे गणेश और कार्तिकेय हुए। (सतीके देहत्यागसे) अत्यन्त क्रुद्ध महातेजस्वी भृङ्गीश्वर पिनाकपाणि भगवान् शङ्करने यज्ञका विध्वंस करके उस दक्षको यह शाप दिया कि तुम ध्रुवके वंशमें मनुष्य होकर जन्म ग्रहण करोगे। (अध्याय ५)

ध्रुववंश तथा दक्ष प्रजापतिकी साठ कन्याओंकी सन्ततियोंका वर्णन

श्रीहरिने (रुद्रसे) कहा—उत्तानपादकी सुरुचि नामक पत्नीसे उत्तम और सुनीति नामवाली भार्यासे ध्रुव नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, उनमें ध्रुवने देवर्षि नारदकी कृपासे प्राप्त उपदेशके द्वारा देवाधिदेव भगवान् जनार्दनकी आराधना करके श्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया।

ध्रुवके महाबलशाली एवं पराक्रमशील श्लिष्ट नामका पुत्र हुआ। उससे प्राचीनबर्हि नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। उससे उदारधी नामक पुत्रने जन्म लिया। उसके दिवञ्जय नामक पुत्र हुआ। उसका पुत्र रिपु हुआ। रिपुसे चाक्षुष नामक पुत्रने जन्म लिया। उसीने चाक्षुष मनुकी ख्याति प्राप्त की थी। उस चाक्षुष मनुसे रुरु उत्पन्न हुआ। तदनन्तर उसके भी ऐश्वर्यसम्पन्न अङ्ग नामवाला एक पुत्र हुआ। उस पुत्रसे वेण (वेन)-ने जन्म लिया, जो नास्तिक एवं धर्मच्युत था। मुनियोंके द्वारा किये गये कुशाघातसे उस अधर्मी वेनकी मृत्यु हुई। उसके बाद पुत्र प्राप्त करनेके लिये तपस्वियोंने उसके ऊरु-भागका मन्थन किया, जिससे एक पुत्र हुआ, जो अत्यन्त छोटा और कृष्णवर्णका था। मुनियोंने उससे कहा 'त्वं निषीद' अर्थात् तुम बैठो। इसी शब्दके कथनसे उसको निषाद नामकी प्रसिद्धि प्राप्त हुई और वह विन्ध्याचलमें निवास करनेके लिये चला गया।

तदनन्तर उन मुनियोंने पुनः उस वेनके दाहिने हाथका मन्थन किया। उस मन्थन-कर्मसे वेनको विष्णुका मानसरूप धारण करनेवाला पृथु नामका पुत्र हुआ। राजा पृथुने प्रजाकी जीवन-रक्षाके लिये पृथिवीका दोहन किया। उस पृथुराजका अन्तर्धान नामक एक पुत्र था। उससे हविर्धान नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। उस हविर्धानका पुत्र प्राचीनबर्हि हुआ, जो पृथिवीका एकच्छत्र सम्राट् था। उसने

२२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

लवण-समुद्रकी पुत्री सामुद्रीके साथ विवाह किया। उस प्राचीनबर्हिसे सामुद्रीने दस पुत्रोंको जन्म दिया। ये सभी प्राचेतस नामवाले धनुर्वेदमें निष्णात हुए। धर्माचरणमें निरत रहते हुए इन लोगोंने दस हजार वर्षोंतक जलमें निमग्न होकर अत्यन्त कठिन तपस्या की। (तपस्याके प्रभावसे) प्रजापतिका पद प्राप्त करनेवाले उन तपस्वियोंका विवाह मारिषा नामक कन्यासे हुआ।

शिवके शापसे ग्रस्त दक्षने इसी मारिषाके गर्भसे पुनः जन्म ग्रहण किया। दक्षने सबसे पहले चार प्रकारकी मानस प्रजाओंकी सृष्टि की, किंतु महादेवके शापसे उन मानस संतानोंकी अभिवृद्धि नहीं हुई। अतः उन प्रजापतिने 'स्त्री-पुरुष'के संयोगसे होनेवाली मैथुनी सृष्टिकी इच्छा की।

इसके बाद दक्षने प्रजापति वीरणकी पुत्री असिक्नीके साथ विवाह किया। इस असिक्नीके गर्भसे उन दक्षके हजार पुत्र उत्पन्न हुए। नारदके उपदेशसे वे सभी पृथिवीकी अन्तिम सीमाको जाननेके लिये निकल पड़े, किंतु पुनः वापस नहीं आये।

हे हर! इस प्रकार उन हजार पुत्रोंके नष्ट हो जानेपर दक्षने पुनः हजार पुत्रोंको जन्म दिया। वे सभी 'शबलाश्व' नामसे प्रसिद्ध हुए। उन लोगोंने भी अपने बड़े भाइयोंके मार्गका ही अनुसरण किया। पुत्रोंके ऐसे विनाशको देखकर (क्रुद्ध) दक्षने नारदको शाप दे दिया कि 'तुम्हें भी (पृथ्‍वीपर) जन्म लेना होगा।' अतः नारद कश्यपमुनिके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए।

इसके बाद दक्ष प्रजापतिने असिक्नीसे साठ रूपवती कन्याओंको जन्म दिया, जिनमेंसे उन्होंने दो कन्याओंका विवाह अङ्गिराके साथ किया। उनके द्वारा दो कन्याएँ कृशाश्व, दस कन्याएँ धर्म, चौदह कन्याएँ कश्यप तथा अट्ठाईस कन्याएँ चन्द्रमाको दी गयीं। हे महादेव! इसके पश्चात् दक्षने मनोरमा, भानुमती, विशाला तथा बहुदा नामक चार कन्याओंका विवाह अरिष्टनेमिके साथ किया।

दक्ष प्रजापतिने कृशाश्वको सुप्रजा और जया नामक कन्याओंको प्रदान किया। अरुन्धती, वसु, यामी, लम्बा, भानुमती, मरुत्वती, सङ्कल्पा, मुहूर्ता, साध्या तथा विश्वा—ये धर्मकी दस पत्नियाँ कही गयी हैं। अब मैं कश्यपकी पत्नियोंके नामोंको भी कहता हूँ, उनके नाम हैं—अदिति, दिति, दनु, काला, अनायु, सिंहिका, मुनि, कद्रू, साध्या, इरा, क्रोधा, विनता, सुरभि और खगा।

हे रुद्र! (धर्मकी पत्नी) विश्वासे विश्वेदेव और साध्यासे साध्यगणोंकी उत्पत्ति हुई है। मरुत्वतीसे मरुत्वान् तथा वसुसे (आठ) वसुगणोंका आविर्भाव हुआ। हे शङ्कर! भानुसे (द्वादश) भानु और मुहूर्तासे मुहूर्तगणोंकी उत्पत्ति हुई। लम्बासे घोष तथा यामीसे नागवीथिका जन्म हुआ और सङ्कल्पासे सर्वात्मक सङ्कल्पका प्रादुर्भाव हुआ।

आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष तथा प्रभास—ये आठ वसु माने गये हैं। आपके वेतुण्डि, श्रम, श्रान्त और ध्वनि नामक चार पुत्र हुए। ध्रुवके पुत्ररूपमें भगवान् कालका जन्म हुआ, जो लोकके संहारक हैं। सोमसे पुत्ररूपमें भगवान् वर्चाहए, जिनकी कृपासे ही मनुष्य वर्चस्वी होता है। मनोहरासे धरके द्रुहिण, हुत, हव्यवह, शिशिर, प्राण और रमण नामवाले पुत्र उत्पन्न हुए। अनिलकी पत्नीका नाम शिवा है। अनिल और शिवासे पुलोमज तथा अविज्ञातगति नामके दो पुत्र उत्पन्न हुए। अनल (अग्नि)-के पुत्र कुमार हैं, जिनकी उत्पत्ति शरकाननपर हुई थी। कृत्तिकाओंके पालित पुत्र होनेसे इन्हें कार्तिकेय भी कहा जाता है। इनके शाख, विशाख और नैगमेय नामक तीन अन्य छोटे भाई भी हैं।

काण्ड ] ध्रुववंश तथा दक्ष प्रजापतिकी साठ कन्याओंकी सन्ततियोंका वर्णन २३


महर्षि देवलको प्रत्यूष नामक वसुका पुत्र माना गया है। प्रभासवसुसे विख्यात देवशिल्पी विश्वकर्माका जन्म हुआ। विश्वकर्माके महाबलवान् अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, त्वष्टा तथा पराक्रमी रुद्र—ये चार पुत्र हुए। त्वष्टाके विश्वरूप नामक एक महातपस्वी पुत्र हुआ। हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी, रैवत, मृगव्याध, शर्व और कपाली—ये ग्यारह रुद्र कहे गये हैं। ये तीनों लोकोंके स्वामी हैं।

कश्यपकी पत्नी अदितिसे द्वादश सूर्योंकी उत्पत्ति हुई है। उन्हें विष्णु, शक्र, अर्यमा, धाता, त्वष्टा, पूषा, विवस्वान्, सविता, मित्र, वरुण, अंशुमान् तथा भग कहा गया है। ये ही द्वादश आदित्य कहे जाते हैं।

रोहिणी आदि जो प्रसिद्ध सत्ताईस नक्षत्र हैं, वे सब सोम (चन्द्रमा)-की पत्नियाँ हैं। दितिके गर्भसे हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए तथा सिंहिका नामकी एक कन्या भी हुई, जिसका विवाह विप्रचित्तिके साथ हुआ। हिरण्यकशिपुके महापराक्रमशाली चार पुत्र हुए। उनके नाम अनुह्लाद (अनुह्राद), ह्लाद (ह्राद), प्रह्लाद (प्रह्राद) तथा संह्लाद (संह्राद) हैं। उनमें प्रह्लाद विष्णुपरयण भक्तके रूपमें प्रसिद्ध हुए। संह्लादके आयुष्मान्, शिवि और वाष्कल नामक तीन पुत्र हुए। प्रह्लादके पुत्र विरोचन हुए। विरोचनसे बलिकी उत्पत्ति हुई। हे वृषभध्वज! बलिके सौ पुत्र हुए, जिनमें बाण सबसे ज्येष्ठ है।

हिरण्याक्षके सभी पुत्र महाबलवान् थे। उनके नाम उत्कुर, शकुनि, भूतसन्तापन, महानाभ, महाबाहु तथा कालनाभ हैं।

दनुके द्विमूर्धा, शङ्कुर, अयोमुख, शङ्कुशिरा, कपिल, शम्बर, एकचक्र, महाबाहु, तारक, महाबल, स्वर्भानु, वृषपर्वा, पुलोमा, महासुर और पराक्रमी विप्रचित्ति नामक पुत्र विख्यात हुए।

स्वर्भानुकी कन्या सुप्रभा तथा वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठा थी। इसके अतिरिक्त उसे उपदानवी और हयशिरा नामकी दो अन्य श्रेष्ठ कन्याएँ हुईं।

वैश्वानरकी दो पुत्रियाँ थीं। उनका नाम पुलोमा तथा कालका था। उन दोनों परम सौभाग्यशालिनी कन्याओंका विवाह मरीचिके पुत्र कश्यपके साथ हुआ था। उन दोनोंसे साठ हजार श्रेष्ठ दानव उत्पन्न हुए। कश्यपके इन पुत्रोंको पौलोम और कालकञ्ज कहा गया है।

विप्रचित्तिके पुत्रोंका जन्म सिंहिकासे हुआ। उनके नाम व्यंश, शल्य, बलवान्, नभ, महाबल, वातापि, नमुचि, इल्वल, खसृमान्, अंजक, नरक तथा कालनाभ हैं।

प्रह्लादके कुलमें निवातकवच नामक दैत्योंकी उत्पत्ति हुई। ताम्रासे सत्त्वगुणसम्पन्न छः कन्याओंका जन्म हुआ। उनके नाम शुकी, श्येनी, भासी, सुग्रीवी, शुचि और गृध्रिका हैं।

शुकीसे शुक, उलूक एवं उलूकोंके प्रतिपक्षी काकादि उत्पन्न हुए। श्येनीसे श्येन (बाज), भासीसे भास, गृध्रिकासे गृध्र (गीध), शुचिसे जलचर पक्षिगण तथा सुग्रीवीसे अश्व, ऊँट और गधोंका जन्म हुआ। इसको ताम्रावंश कहा गया है।

विनताके गर्भसे गरुड और अरुण नामक दो विख्यात पुत्र हुए। सुरसाके गर्भसे अपरिमित तेजसम्पन्न सहस्रों सर्पोंकी उत्पत्ति हुई। कद्रूसे भी अत्यधिक तेजस्वी सहस्रों सर्प हुए। इन सभी सर्पोंमें प्रधान सर्प शेष, वासुकि, तक्षक, शङ्ख, श्वेत, महापद्म, कम्बल, अश्वतर, एलापत्र, नाग, कर्कोटक और धनञ्जय हैं। इस सर्पसमूहको क्रोधसे परिपूर्ण जानें। इन सभीके बड़े-बड़े दाँत हैं।

क्रोधाने महाबली पिशाचोंको उत्पन्न किया। सुरभिसे गायों और भैंसोंका जन्म हुआ। इरासे समस्त वृक्ष, लता-वल्लरी और तृणोंकी उत्पत्ति हुई।

खगासे यक्ष-राक्षस, मुनिसे (नृत्य-गान करनेवाली) अप्सराएँ तथा अरिष्टासे परम सत्त्वसम्पन्न

७- देवपूजा-विधान, विष्णुपूजोपयोगी वज्रनाभमण्डल, विष्णुदीक्षा तथा लक्ष्मी-पूजा

२४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

गन्धर्व उत्पन्न हुए। दितिसे मरुत् नामक उनचास देवोंका जन्म हुआ।

उन मरुद्गणोंमें एकज्योति, द्विज्योति, त्रिज्योति, चतुर्ज्योति, एकशुक्र, द्विशुक्र तथा महाबलशाली त्रिशुक्र—इन सातोंका एक गण है। ईदृक्, सदृक्, अन्यादृक्, प्रतिसदृक्, मित, समित, सुमित नामवाले मरुतोंका परम शक्तिसम्पन्न दूसरा गण है। ऋतजित्, सत्यजित्, सुषेण, सेनजित्, अतिमित्र, अमित्र तथा दूरमित्र नामक मरुतोंका तीसरा अजेय गण है। ऋत, ऋतधर्म, विहर्ता, वरुण, ध्रुव, विधारण और दुर्धर्षा नामवाले मरुतोंका चौथा गण है। ईदृक्ष, सदृक्ष, एतादृक्ष, मिताशन, एतेन, प्रसदृक्ष और सुरत नामक महातपस्वी मरुतोंका पाँचवाँ गण है। हेतुमान्, प्रसव, सुरभ, नादिरुग्र, ध्वनिर्भास, विक्षिप तथा सह नामवाला मरुतोंका छठा गण है। द्युति, वसु, अनाधृष्य, लाभ, काम, जयी विराट् तथा उद्वेषण नामका सातवाँ वायु-गण (स्कन्ध) है।

ये सभी उनचास मरुद्गण भगवान् विष्णुके ही रूप हैं। राजा, दानव, देव, सूर्यादि ग्रह तथा मनु आदि इन्हीं श्रीहरिका पूजन करते हैं।

(अध्याय ६)


देवपूजा-विधान, विष्णुपूजोपयोगी वज्रनाभमण्डल, विष्णुदीक्षा तथा लक्ष्मी-पूजा

**श्रीहरिने कहा—**हे रुद्र! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करनेवाली सूर्यादि देवोंकी पूजाका मैं वर्णन करता हूँ। हे वृषभध्वज! ग्रहदेवताओंके आसनकी पूजाकर निम्न मन्त्रों—

ॐ नमः सूर्यमूर्तये। ॐ हां हीं सः सूर्याय नमः। ॐ सोमाय नमः। ॐ मङ्गलाय नमः। ॐ बुधाय नमः। ॐ बृहस्पतये नमः। ॐ शुक्राय नमः। ॐ शनैश्चराय नमः। ॐ राहवे नमः। ॐ केतवे नमः। ॐ तेजश्चण्डाय नमः—से आसन, आवाहन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नमस्कार, प्रदक्षिणा और विसर्जन आदि उपचारोंको प्रदान करके सूर्यादि ग्रहोंकी पूजा करनी चाहिये।

ॐ हां शिवाय नमः-मन्त्रसे आसनकी पूजाकर ॐ हां शिवमूर्तये शिवाय नमः-मन्त्रसे नमस्कार करे और साधक शिवपूजामें सर्वप्रथम—ॐ हां हृदयाय नमः। ॐ हीं शिरसे स्वाहा। ॐ हूं शिखायै वषट्। ॐ हैं कवचाय हुं। ॐ हौं नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ हः अस्त्राय नमः—इन मन्त्रोंसे षडङ्गन्यास करे। तत्पश्चात्—ॐ हां सद्योजाताय नमः। ॐ हीं वामदेवाय नमः। ॐ हूं अघोराय नमः। ॐ हैं तत्पुरुषाय नमः। ॐ हौं ईशानाय नमः—इन मन्त्रोंसे शिवके पाँचों मुखोंको नमस्कार करना चाहिये।

इसी प्रकार विष्णुपूजामें ॐ वासुदेवासनाय नमः-मन्त्रसे भगवान् विष्णुके आसनकी पूजा करे और—ॐ वासुदेवमूर्तये नमः। ॐ अं ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः। ॐ आं ॐ नमो भगवते सङ्कर्षणाय नमः। ॐ अं ॐ नमो भगवते प्रद्युम्नाय नमः। ॐ अः ॐ नमो भगवते अनिरुद्धाय नमः—इन मन्त्रोंके द्वारा साधक हरिके चतुर्व्यूहको नमन करे। उसके बाद—ॐ नारायणाय नमः। ॐ तत्सद्ब्रह्मणे नमः। ॐ हूं विष्णवे नमः। ॐ क्षौं नमो भगवते नरसिंहाय नमः। ॐ भूः ॐ नमो भगवते वाराहाय नमः। ॐ कं टं पं शं वैनतेयाय नमः। ॐ जं खं रं सुदर्शनाय

काण्ड ] देवपूजा-विधान, विष्णुपूजोपयोगी वज्रनाभमण्डल २५


नमः। ॐ खं ठं फं षं गदायै नमः। ॐ वं लं मं
क्षं पाञ्चजन्याय नमः। ॐ घं ढं भं हं श्रियै नमः।
ॐ गं डं वं सं पुष्ट्यै नमः। ॐ धं षं वं सं
वनमालायै नमः। ॐ सं दं लं श्रीवत्साय नमः।
ॐ ठं चं भं यं कौस्तुभाय नमः। ॐ गुरुभ्यो
नमः। ॐ इन्द्रादिभ्यो नमः। ॐ विष्वक्सेनाय
नमः—इन मन्त्रोंसे भगवान् श्रीहरिके अवतारों,
आयुधों एवं वाहन आदिको नमस्कार करते हुए
उन्हें आसनादि उपचार प्रदान करने चाहिये।

हे वृषभध्वज! भगवान् विष्णुकी शक्ति देवी
सरस्वतीकी मङ्गलकारिणी पूजामें ॐ ह्रीं सरस्वत्यै
नमः—इस मन्त्रसे देवी सरस्वतीको नमस्कारकर
निम्न मन्त्रोंसे षडङ्गन्यास करना चाहिये—

ॐ हां हृदयाय नमः। ॐ ह्रीं शिरसे नमः।
ॐ हूं शिखायै नमः। ॐ हैं कवचाय नमः। ॐ
हौं नेत्रत्रयाय नमः। ॐ ह्रः अस्त्राय नमः।

इसी प्रकार श्रद्धा, ऋद्धि, कला, मेधा, तुष्टि,
पुष्टि, प्रभा तथा मति—ये जो सरस्वतीदेवीकी
आठ शक्तियाँ हैं, इनका पूजन निम्न नाममन्त्रोंसे
करे—

ॐ ह्रीं श्रद्धायै नमः। ॐ ह्रीं ऋद्धयै नमः।
ॐ ह्रीं कलायै नमः। ॐ ह्रीं मेधायै नमः। ॐ ह्रीं
तुष्ट्यै नमः। ॐ ह्रीं पुष्ट्यै नमः। ॐ ह्रीं प्रभायै
नमः। ॐ ह्रीं मत्यै नमः।

[इन शक्तियोंकी पूजा करनेके पश्चात्] क्षेत्रपाल,
गुरु और परम गुरुका ॐ क्षेत्रपालाय नमः। ॐ
गुरुभ्यो नमः। ॐ परमगुरुभ्यो नमः—इन मन्त्रोंसे
नमस्कार करना चाहिये।

तदनन्तर कमलवासिनी सरस्वतीदेवीको
आसनादि उपचार प्रदान करने चाहिये। पूजनके
अनन्तर सूर्यादि देवताओंके लिये प्रयुक्त होनेवाले
मन्त्रोंसे उनका पवित्रारोहण करना चाहिये।

श्रीहरिने कहा—हे शिव! भगवान् विष्णुकी
विशेष पूजाके लिये पाँच प्रकारके रंगोंसे बने हुए
चूर्णके द्वारा वज्रनाभ-मण्डलका निर्माण करना
चाहिये, जो सोलह समान कोष्ठकोंसे संयुक्त हो।

वज्रनाभ-मण्डल बनाकर सबसे पहले न्यास
करे और उसके बाद भगवान् श्रीहरिकी पूजा करे।
हृदयके मध्यमें भगवान् विष्णु, कण्ठमें सङ्कर्षण,
सिरपर प्रद्युम्न, शिखाभागमें अनिरुद्ध, सम्पूर्ण
शरीरमें ब्रह्मा तथा दोनों हाथोंमें श्रीधरका न्यास
करे। तत्पश्चात् ‘अहं विष्णुः’ (मैं ही विष्णु हूँ)—
ऐसा ध्यान करते हुए पद्मके कर्णिका-भागमें
भगवान् श्रीहरिकी स्थापना करे। इसी प्रकार
मण्डलके पूर्वमें सङ्कर्षण, दक्षिणमें प्रद्युम्न, पश्चिममें
अनिरुद्ध और उत्तरमें ब्रह्माकी स्थापना करे। तदनन्तर
ईशानकोणमें श्रीधर तथा पूर्वाद दिशाओंमें इन्द्रादि
देवोंकी स्थापना करनी चाहिये। यथा—पूर्व दिशामें
(ॐ इन्द्राय नमः मन्त्रसे) इन्द्र, अग्निकोणमें
(ॐ अग्नये नमः मन्त्रसे) अग्नि, दक्षिण दिशामें
(ॐ यमाय नमः मन्त्रसे) यम, नैर्ऋत्यकोणमें
(ॐ निर्ऋतये नमः मन्त्रसे) निर्ऋति, पश्चिम दिशामें
(ॐ वरुणाय नमः मन्त्रसे) वरुण, वायव्यकोणमें
(ॐ वायवे नमः मन्त्रसे) वायु, उत्तर दिशामें
(ॐ कुबेराय नमः मन्त्रसे) कुबेर और ईशानकोणमें
(ॐ ईशानाय नमः मन्त्रसे) ईशान नामक दिक्पालकी
स्थापना करे। उसके बाद उन सभी देवोंकी गन्धादि
उपचारोंके द्वारा पूजा करनी चाहिये। इससे साधक
परमपदको प्राप्त हो जाता है।

श्रीहरिने पुनः कहा—हे रुद्र! दीक्षित शिष्यको
वस्त्रसे अपने दोनों नेत्र बंद करके अग्निमें देवताके
मूलमन्त्रसे एक सौ आठ आहुतियाँ प्रदान करनी
चाहिये। हे रुद्र! पुत्र-लाभके लिये द्विगुण (दो सौ
सोलह), साधनासिद्धिके निमित्त त्रिगुण (तीन सौ
चौबीस) और मोक्ष-प्राप्तिकी कामनासे देशिक
(उपदेष्टा आचार्य)-को चाहिये कि वह चतुर्गुण

२६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

(चार सौ बत्तीस) आहुतियाँ उसी विष्णु-मन्त्रसे प्रदान करे।

विद्वान् देशिकको सबसे पहले भगवान्‌का ध्यान करना चाहिये। तदनन्तर वे वायवी कला (यं बीज-मन्त्र)-से शिष्योंकी स्थिति, आग्नेय कला (रं बीज-मन्त्रके)-द्वारा उनकी मनस्ताप-वेदना तथा वारुण कला (वं बीज-मन्त्र)-से हृदयकी स्थिति (धर्मकी अभिरुचि)-का विचार करें। इसके बाद देशिकको उस परम तेजमें आत्मतेजका निक्षेप करके जीवात्मा और परमात्माके ऐक्य अर्थात् अभेद-ज्ञानका चिन्तन करना चाहिये। तदनन्तर वे आकाश-तत्त्वमें 'ॐकार' का ध्यानकर शरीरमें स्थित अन्य कारणभूत वायु, अग्नि, जल तथा पृथिवी-तत्त्वका चिन्तन करें। इस प्रकार प्रणव (ॐकार)-मन्त्रका चिन्तन करते हुए प्रत्येक कारणभूत तत्त्वोंपर जो साधक विजय प्राप्त करता है, वह शरीरधारी होनेके कारण उस पञ्चमहाभूतके ज्ञानरूपी शरीरको ग्रहण कर लेता है। अतः हे वृषभध्वज! अपने अन्तःकरणमें उस सूक्ष्म शरीरधारी (क्षेत्रज्ञ) ज्ञानको उत्पन्न करके प्रत्येक महाभूतको उसीमें संयुक्त करनेका प्रयत्न करना चाहिये।

मण्डलादिके निर्माणमें जो लोग असमर्थ हैं, वे मात्र मानसमण्डलकी कल्पना करके भगवान् श्रीहरिका पूजन करें। [शरीरमें ब्रह्मतीर्थादिकी कल्पना की गयी है। अतएव] उसी क्रमसे वह (मानस-मण्डल भी) चार द्वारोंसे युक्त है। हाथको पद्म तथा अँगुलियोंको पद्मपत्र कहा गया है। हथेली उस पद्मकी कर्णिका है और नख उसके केशर हैं, इसलिये साधकको उस हाथरूपी कमलमें सूर्य, चन्द्र, इन्द्र, अग्नि तथा यमसहित श्रीहरिका ध्यान करके उनकी पूजा करनी चाहिये।

उसके बाद वह देशिक सावधान होकर अपने उस हाथको शिष्यके सिरपर रखे, [क्योंकि हाथमें विष्णु विद्यमान रहते हैं, अतः] यह हाथ स्वयं विष्णु-स्वरूप है। उस हाथके स्पर्शमात्रसे शिष्यके समस्त पाप विनष्ट हो जाते हैं। तदनन्तर गुरु शिष्यकी विधिवत् पूजा करे और उस शिष्यका नामकरण करे।

श्रीहरिने (रुद्रसे) कहा— [अब मैं] सिद्धि प्राप्त करनेके लिये स्थण्डिल आदिमें की जानेवाली श्रीलक्ष्मीकी पूजाके सम्बन्धमें कह रहा हूँ। सबसे पहले—ॐ श्रीं ह्रीं महालक्ष्म्यै नमः—यह कहकर साधक—'श्रां श्रीं श्रूं श्रैं श्रौं श्रः'—इन बीजमन्त्रोंसे क्रमशः हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र और अस्त्रमें* इस प्रकारसे षडङ्गन्यास करे—

'ॐ श्रां हृदयाय नमः। ॐ श्रीं शिरसे स्वाहा। ॐ श्रूं शिखायै वषट्। ॐ श्रैं कवचाय हुम्। ॐ श्रौं नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ श्रः अस्त्राय फट्।'

साधनारत भक्तको अङ्गन्यास करके आसनसहित श्रीमहालक्ष्मीकी पूजा करनी चाहिये।

इसके बाद चार प्रकारके वर्णोंसे अनुरञ्जित पद्मगर्भ चार द्वार और चौंसठ प्रकोष्ठोंसे युक्त मण्डलके मध्य लक्ष्मी और उनके अङ्गोंका तथा एक कोणमें दुर्गा, गण एवं गुरुका, तदनन्तर अभीष्ट सिद्धि प्राप्त करनेके लिये तत्पर साधक अग्नि आदि कोणोंमें क्षेत्रपाल देवोंकी पूजा करके हवन करे। तत्पश्चात् वह—'ॐ घं टं डं हं श्रीमहालक्ष्म्यै नमः'—इस महामन्त्रसे पूर्व उल्लिखित परिवारके सहित श्रीमहालक्ष्मीदेवीका पूजन करे।

तदनन्तर उस साधकको 'ॐ सौं सरस्वत्यै नमः।' 'ॐ ह्रीं सौं सरस्वत्यै नमः।' 'ॐ ह्रीं वद वद वाग्वादिनि स्वाहा।', 'ॐ ह्रीं सरस्वत्यै नमः'—इन मन्त्रोंको कहकर सरस्वतीको नमस्कार करना चाहिये।

(अध्याय ७—१०)


* समस्त शरीरकी रक्षक आवरक शक्ति 'अस्त्र' की कल्पना दोनों हाथोंमें की जाती है।

८- नवव्यूहार्चनविधि, पूजानुक्रम-निरूपण

काण्ड ] नवव्यूहार्चनविधि, पूजानुक्रम-निरूपण २७


नवव्यूहार्चनविधि, पूजानुक्रम-निरूपण

श्रीहरिने (रुद्रसे) कहा—(गरुड़ने) कश्यप ऋषिको जो नवव्यूहकी पूजाका वर्णन सुनाया था, उसको (अब) मैं कह रहा हूँ, आप सुनें।

साधक सबसे पहले [योग-क्रियाके द्वारा] जीवात्माको मस्तक, नाभि और [हृदयरूपी] आकाश नामक तत्त्वमें प्रविष्ट करे। तदनन्तर वह 'रं' (इस अग्निबीज) मन्त्रसे पाञ्चभौतिक शरीरका शोधन करे। उसके बाद वह 'यं' (इस वायु) बीजमन्त्रसे उस सम्पूर्ण शरीरके लयकी भावना करे। तत्पश्चात् वह 'लं' इस बीजमन्त्रसे चराचर जगत्-(के साथ उस विलीन हुए शरीर)-के सम्प्लावित होनेकी भावना करे। उसके बाद वह 'वं' इस बीजमन्त्रसे पुनः स्वयंमें अमरत्वकी भावना करे। तदनन्तर [अमृतके] बुद्बुदोंके बीच 'मैं ही पीताम्बरधारी चतुर्भुज भगवान् श्रीहरि हूँ' ऐसा मानकर आत्मतत्त्वके ध्यानमें निमग्न हो जाय।

इसके बाद शरीर तथा हाथमें तीन प्रकारका मन्त्र-न्यास करना चाहिये। पहले द्वादशाक्षर बीजमन्त्रसे, तदनन्तर कहे गये बीजमन्त्रसे न्यास और बादमें षडङ्गन्यास करे। इससे साधक साक्षात् नारायणस्वरूप हो जाता है। साधक दक्षिण अङ्गुष्ठसे प्रारम्भकर मध्यमा अङ्गुलिपर्यन्त न्यास करे। उसके बाद वह पुनः मध्य अङ्गुलिपर ही दो बीजमन्त्रसे न्यास करके पुनः शरीरके विभिन्न अङ्गोंपर न्यास करे। क्रमशः हृदय, सिर, शिखा, कवच, मुख, नेत्र, उदर और पीठ-भागसे अङ्गन्यास करते हुए दोनों बाहु, दोनों हाथ, दोनों जानु और दोनों पैरोंमें भी न्यास करना चाहिये।

तदनन्तर अपने दोनों हाथोंको कमलवत् आकृति प्रदान करके उसके मध्य-भागमें दोनों अङ्गुष्ठोंको संनिविष्ट करे। तत्पश्चात् उसी मुद्राकृतिमें परमतत्त्वस्वरूप, अनामय, सर्वेश्वर भगवान् नारायणका चिन्तन करे।

इसके बाद इन्हीं बीजमन्त्रोंसे क्रमशः तर्जनी आदि अङ्गुलियोंमें न्यास करके यथाक्रम सिर, नेत्र, मुख, कण्ठ, हृदय, नाभि, गुह्य, जानुद्वय तथा पादद्वयमें भी न्यास करना चाहिये।

बीजमन्त्रोंसे दोनों हाथोंमें न्यास तथा षडङ्गन्यास करके सम्पूर्ण शरीरमें न्यास करना चाहिये। वह अङ्गुष्ठसे कनिष्ठा अङ्गुलितक पाँच बीजमन्त्रोंसे न्यास करे। उसके बाद हाथके मध्य-भागमें नेत्रके बीजमन्त्रसे न्यास करनेका विधान है। अङ्गन्यासमें भी इसी क्रमसे हृदय-भागमें हृदय, मस्तकमें मस्तक, शिखामें शिखा, दोनों स्तन-प्रदेशमें कवच, नेत्रद्वयमें नेत्र तथा दोनों हाथोंमें अस्त्र-बीजमन्त्रको अवस्थित करना चाहिये।

तदनन्तर उन्हीं बीजमन्त्रोंसे दिशाओंको प्रतिबद्ध करके साधक पूजनकी क्रिया प्रारम्भ करे। सबसे पहले एकाग्रचित्त होकर उसको अपने हृदयमें योगपीठका ध्यान करना चाहिये। उसके बाद वह आग्नेयादिसे पूर्व दिशाओंमें यथाक्रम धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यको विन्यस्त करके पूर्वादि दिशाओंमें अधर्मादिका न्यास करे। यथा— अग्निकोणमें 'ॐ धर्माय नमः', नैर्ऋत्यकोणमें 'ॐ ज्ञानाय नमः', वायुकोणमें 'ॐ वैराग्याय नमः' और ईशानकोणमें 'ॐ ऐश्वर्याय नमः', पूर्व दिशामें 'ॐ अधर्माय नमः', दक्षिण दिशामें 'ॐ अज्ञानाय नमः', पश्चिम दिशामें 'ॐ अवैराग्याय नमः' तथा उत्तर दिशामें 'ॐ अनैश्वर्याय नमः' कहकर न्यास करे।

साधक इस प्रकार इन न्यास-विधियोंसे आच्छादित अपने शरीरको आराध्यका पीठ और स्वयंको उसीका स्वरूप समझकर पूर्वाभिमुख

२८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

उन्नत अवस्थामें स्थिर होकर अनन्त भगवान् विष्णुको अपनेमें प्रतिष्ठित करे। तदनन्तर ज्ञानरूपी सरोवरमें उत्पन्न ऊपरकी ओर उठी हुई कर्णिकासे युक्त शतपत्रवाले आठों दिशाओंमें प्रसरित श्वेत अष्टदल-कमलका ध्यान करे।

तत्पश्चात् साधकको ऋग्वेदादिके मन्त्रोंसे सूर्य, चन्द्र तथा अग्निस্বরূপ मण्डलोंका क्रमशः एकके ऊपर एकका ध्यान करना चाहिये। उसके बाद वह पूर्वादि दिशाओंमें भगवान् केशवके पास ही अवस्थित विमलादि शक्तियोंको अष्टदल-कमलपर विन्यस्त करके नवीं शक्तिको कर्णिकामें स्थापित करे।

इस प्रकार ध्यान करके उस साधकको योगपीठकी विधिवत् पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् वह पुनः मनसे भगवान् विष्णुका अङ्गसहित आवाहनकर [उस योगपीठमें उन्हें] प्रतिष्ठित करे। तदनन्तर पूर्वादि चारों दिशाओंमें अवस्थित चतुर्दल-कमलपर हृदयादिन्यास करना चाहिये। कमलके मध्यभागमें तथा कोणोंपर अस्त्रमन्त्रका न्यास करे। अर्थात् उसके पूर्व दलमें 'हृदयाय नमः', दक्षिण दलमें 'शिरसे स्वाहा', पश्चिम दलमें 'शिखायै वषट्', उत्तर दलमें 'कवचाय हुम्', मध्यमें 'नेत्रत्रयाय वौषट्' तथा कोणमें 'अस्त्राय फट्' कहकर न्यास करना चाहिये।

तत्पश्चात् पूर्वादि दिशाओंमें यथाक्रम सङ्कर्षण आदिके बीजमन्त्रोंको विन्यस्त करनेका विधान है। तदनन्तर वह पूर्व और पश्चिम दिशाके द्वारपर 'ॐ वैनतेयाय नमः' कहकर वैनतेयको प्रतिष्ठित करे। उसके बाद दक्षिण द्वारपर 'ॐ सुदर्शनाय नमः', 'ॐ सहस्राराय नमः' का उच्चारण करके हजार अरोंवाले सुदर्शन चक्रकी वह स्थापना करे। तदनन्तर दक्षिण द्वारपर 'ॐ श्रियै नमः' मन्त्रसे श्रीका न्यास करके उत्तर द्वारपर 'ॐ लक्ष्म्यै नमः' मन्त्रसे लक्ष्मीको प्रतिष्ठित करे।

साधकको इसके बाद उत्तर दिशामें 'ॐ गदायै नमः' मन्त्रसे गदा, कोणोंमें 'ॐ शङ्खायै नमः' मन्त्रसे शङ्खका न्यास करना चाहिये।

तत्पश्चात् उन विष्णुदेवके दोनों ओर आयुधोंका न्यास करना चाहिये। विद्वान् साधक दक्षिणकी ओर शार्ङ्ग (धनुष) तथा देवके बायीं ओर इषु (बाणों)-का न्यास करे। इसी प्रकार दोनों भागोंमें खड्ग और चर्मका न्यास करे।

तदनन्तर वह साधक मण्डलके मध्य दिशाभेदके अनुसार पूर्वादि दिशाओंमें इन्द्रादि लोकपालोंको प्रतिष्ठित करे और उनके आयुधोंको भी स्थापित करे। उसके बाद विद्वान् साधकको ऊपरकी ओर 'ॐ ब्रह्मणे नमः' मन्त्रसे ब्रह्मा तथा नीचेकी ओर 'ॐ अनन्ताय नमः' मन्त्रसे अनन्तदेवका न्यास करना चाहिये।

इस प्रकार साधक सभी देवोंका न्यास एवं ध्यान करके उनकी पूजा करे और उनके सामने उनकी ही मुद्राका प्रदर्शन करे। अञ्जलिबद्ध होना प्रथम मुद्रा है। इसके प्रदर्शनसे शीघ्र ही देवसिद्धि हो जाती है। दूसरी वन्दिनी मुद्रा है और तीसरी मुद्रा हृदयासक्ता है। इस मुद्रामें बायें हाथकी मुट्ठीसे दाहिने हाथके अँगूठेको बाँधकर बायें हाथके अँगूठेको ऊपर उठाये हुए हृदयभागसे संलग्न रखना चाहिये। व्यूह-पूजामें मूर्तिभेदसे इन तीन मुद्राओंको साधारण मुद्रा माना गया है। दोनों हाथोंमें अँगूठेसे कनिष्ठापर्यन्त तीन अँगुलियोंको नवाकर क्रमशः उन्हें मुक्त करनेसे आठ मुद्राएँ बनती हैं।

दोनों हाथोंके अँगूठोंसे अपने-अपने हाथकी मध्यमा, अनामिका तथा कनिष्ठा अँगुलियोंको नीचेकी ओर झुकाकर जो मुद्रा बनायी जाती है, उसको 'नरसिंह-मुद्रा' कहते हैं। दाहिने हाथके ऊपर बायें हाथको उत्तान स्थितिमें रखकर प्रतिमाके

९- पूजानुक्रम-निरूपण

काण्ड ] पूजानुक्रम-निरूपण [ २९


ऊपर धीरे-धीरे घुमानेको 'वाराही मुद्रा' कहते हैं। भगवान् वाराहको सदा ही यह प्रिय है। दोनों मुट्ठियोंको उत्तान रखकर क्रमशः एक-एक अँगुली सीधे खोलते हुए सभीको खोल दे। तदनन्तर उन सभी अँगुलीयोंकी पुनः मुट्ठी बाँध ले। यह 'अङ्गमुद्रा' कहलाती है। साधकको इन मुद्राओंका प्रदर्शन क्रमशः दसों दिक्पालोंके लिये करना चाहिये।

भगवान् वासुदेव, बलराम, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध क्रमशः प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ देव-स्थानके अधिकारी देव हैं। साधकको—'ॐ अं वासुदेवाय नमः' मन्त्रसे वासुदेव, 'ॐ आं बलाय नमः' मन्त्रसे बलराम, 'ॐ अं प्रद्युम्नाय नमः' मन्त्रसे प्रद्युम्न तथा 'ॐ अः अनिरुद्धाय नमः' मन्त्रसे अनिरुद्धकी पूजा करनी चाहिये।

ॐकार, तत्सत्, हुं, क्षौं तथा भूः—ये पाँच क्रमशः नारायण, ब्रह्मा, विष्णु, नरसिंह और महावराहभगवान्‌के बीजमन्त्र हैं, इसलिये साधक—'ॐ नारायणाय नमः' मन्त्रसे भगवान् नारायण, 'ॐ तत्सद् ब्रह्मणे नमः' मन्त्रसे पद्मयोनि ब्रह्मा, 'ॐ हुं विष्णवे नमः' मन्त्रसे विष्णु, 'ॐ क्षौं नरसिंहाय नमः' मन्त्रसे नरसिंह तथा 'ॐ भूः महावराहाय नमः' मन्त्रसे आदिवराहका पूजन करे।

उपर्युक्त इन नौ देवताओं (वासुदेव, बलराम, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, नारायण, ब्रह्मा, विष्णु, नरसिंह तथा महावराह) (नवव्यूह)-का वर्ण क्रमशः श्वेत, अरुण, हरिद्रावत् पीत, नील, श्यामल, लोहित, मेघवत् श्याम, अग्निवत् पीत एवं मधु पिङ्गल है। अर्थात् वासुदेव श्वेत, बलदेव अरुण, प्रद्युम्न हरिद्रावत् पीत, अनिरुद्ध नील, नारायण श्याम, ब्रह्मा रक्ताभ, विष्णु मेघवत् श्याम, नरसिंह अग्निवत् पीत तथा वराहदेव मधु पिङ्गल वर्णकी तेजस्वी आभासे सुशोभित रहते हैं।

'(ॐ) कं टं पं शं' बीजमन्त्रसे गरुड, '(ॐ) जं खं वं' बीजमन्त्रसे सुदर्शन, '(ॐ) षं चं फं षं' बीजमन्त्रसे गदादेवी, '(ॐ) वं लं मं क्षं' बीजमन्त्रसे शङ्ख, '(ॐ) घं ढं भं हं' बीजमन्त्रसे श्रीलक्ष्मी, '(ॐ) गं जं वं शं' बीजमन्त्रसे पुष्टि, '(ॐ) घं वं' बीजमन्त्रसे वनमाला, '(ॐ) दंसं' बीजमन्त्रसे श्रीवत्स और '(ॐ) छं डं पं यं' बीजमन्त्रसे कौस्तुभमणि युक्त हैं। [इसके अतिरिक्त] मैं स्वयं अनन्त (विष्णु) हूँ। ये सभी उस देवाधिदेव विष्णुके अङ्ग हैं।

गरुड कमलके समान लाल, गदा कृष्णवर्ण, पुष्टि शिरीष-पुष्परंगके समान आभासे समन्वित तथा लक्ष्मी सुवर्ण-कान्तिसे सुशोभित हैं। शङ्ख पूर्ण चन्द्रकी कान्तिके समान श्वेत और कौस्तुभमणि नवोदित अरुणके सदृश वर्णवाला है। चक्र सहस्र सूर्योंकी कान्तिके सदृश और श्रीवत्स कुन्द पुष्पके समान श्वेत है। वनमाला पाँच वर्णोंसे युक्त पञ्चवर्णी और अनन्त भगवान् मेघकी भाँति श्याम वर्णका है। जिन अस्त्रोंके रंगोंका वर्णन यहाँ नहीं किया गया है, वे सभी विद्युत्-कान्तिके समान हैं। (भगवान् विष्णुके इन समस्त अङ्गोंको) 'पुण्डरीकाक्ष' नामक विद्यासे अर्घ्य और पाद्यादि समर्पित करने चाहिये। (अध्याय ११)


पूजानुक्रम-निरूपण

**श्रीहरिने कहा—**हे रुद्र! देवके पूजनका जो क्रम है, उसके ज्ञानके लिये पूजाविधिके क्रमको कहा जा रहा है। सर्वप्रथम साधकको 'ॐ नमः' मन्त्रसे परमात्माका स्मरण करना चाहिये। तदनन्तर वह 'यं रं वं लम्' इन बीजमन्त्रोंके द्वारा शरीरकी शुद्धि करके 'ॐ नमः' इस मन्त्रसे चतुर्भुज भगवान् विष्णुके रूपमें ही अपनेको मान ले।

तत्पश्चात् करन्यास तथा देहन्यास करे। तदनन्तर हृदयमें योगपीठकी पूजाका विधान है। जिसको इन मन्त्रोंसे करे—

३०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

‘ॐ अनन्ताय नमः। ॐ धर्माय नमः। ॐ ज्ञानाय नमः। ॐ वैराग्याय नमः। ॐ ऐश्वर्याय नमः। ॐ अधर्माय नमः। ॐ अज्ञानाय नमः। ॐ अवैराग्याय नमः। ॐ अनैश्वर्याय नमः। ॐ पद्माय नमः। ॐ आदित्यमण्डलाय नमः। ॐ चन्द्रमण्डलाय नमः। ॐ वह्निमण्डलाय नमः। ॐ विमलायै नमः। ॐ उत्कर्षिण्यै नमः। ॐ ज्ञानायै नमः। ॐ क्रियायै नमः। ॐ योगायै नमः। ॐ प्रह्व्यै नमः। ॐ सत्यायै नमः। ॐ ईशानायै नमः। ॐ सर्वतोमुख्यै नमः। ॐ साङ्गोपाङ्गाय हरेरासनाय नमः।’

इसके बाद साधक कर्णिकाके मध्यमें ‘अं वासुदेवाय नमः’ कहकर भगवान् वासुदेवको नमस्कार करके निम्न मन्त्रोंसे हृदयादिन्यास करे—

‘आं हृदयाय नमः। ईं शिरसे नमः। ऊँ शिखायै नमः। ऐं कवचाय नमः। औं नेत्रत्रयाय नमः। अः फट् अस्त्राय नमः।’

तदनन्तर—‘आं सङ्कर्षणाय नमः। अं प्रद्युम्नाय नमः। अः अनिरुद्धाय नमः। ॐ अः नारायणाय नमः। ॐ तत्सद्ब्रह्मणे नमः। ॐ हुं विष्णवे नमः। क्षौं नरसिंहाय नमः। भूर्वराहाय नमः।’—इन मन्त्रोंसे संकर्षण आदि व्यूहदेवोंको नमस्कार करे।

तत्पश्चात् साधक निम्न मन्त्रोंसे भगवान् विष्णुके वाहन एवं आयुधादिको नमस्कार करे—

‘कं टं जं शं वैनतेयाय (नमः)। जं खं वं सुदर्शनाय (नमः)। खं चं फं षं गदायै (नमः)। वं लं मं क्षं पाञ्चजन्याय (नमः)। घं ढं भं हं श्रियै (नमः)। गं डं वं शं पुष्ट्यै (नमः)। धं वं वनमालायै (नमः)। दं शं श्रीवत्साय (नमः)। छं डं यं कौस्तुभाय (नमः)। शं शार्ङ्गाय (नमः)। इंड्षुधिभ्यां (नमः)। चं चर्मणे (नमः)। खं खड्गाय (नमः)।

तत्पश्चात् इन बीजमन्त्रोंसे इन्द्रादि दिक्पालोंको नमस्कार करना चाहिये।

(ॐ) लं इन्द्राय सुराधिपतये (नमः)। (ॐ) रं अग्नये तेजोऽधिपतये (नमः)। (ॐ) यमाय धर्माधिपतये (नमः)। (ॐ) क्षं नैर्ऋताय रक्षोऽधिपतये (नमः)। (ॐ) वं वरुणाय जलाधिपतये (नमः)। (ॐ) यों वायवे प्राणाधिपतये (नमः)। (ॐ) धां धनदाय धनाधिपतये (नमः)। (ॐ) हां ईशानाय विद्याधिपतये (नमः)।

इसके बाद क्रमशः पूर्वोक्त इन्द्र आदि दिक्पाल देवताओंके निम्न आयुधोंको प्रणाम करनेका विधान है—

(ॐ) वज्राय (नमः)। (ॐ) शक्त्यै (नमः)। (ॐ) दण्डाय (नमः)। (ॐ) खड्गाय (नमः)। (ॐ) पाशाय (नमः)। (ॐ) ध्वजाय (नमः)। (ॐ) गदायै (नमः)। (ॐ) त्रिशूलाय (नमः)।

इसके बाद भगवान् अनन्त तथा ब्रह्मदेवको इस मन्त्रसे प्रणाम करे—

(ॐ) लं अनन्ताय पातालाधिपतये (नमः)। (ॐ) खं ब्रह्मणे सर्वलोकाधिपतये (नमः)।

अब इसके बाद साधक भगवान् वासुदेवको नमस्कार करनेके लिये द्वादशाक्षर-मन्त्रका प्रयोग करे, साथ ही द्वादशाक्षर-मन्त्रके बीजमन्त्रों और दशाक्षर-मन्त्रके बीज-मन्त्रोंको इस प्रकार नमस्कार करे—

‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः।’

ॐ ॐ नमः। ॐ नं नमः। ॐ मों नमः। ॐ ॐ भं नमः। ॐ गं नमः। ॐ वं नमः। ॐ तें नमः। ॐ वां नमः। ॐ सुं नमः। ॐ दें नमः। ॐ वां नमः। ॐ यं नमः। ॐ ॐ नमः। ॐ नं नमः। ॐ मों नमः। ॐ नां नमः। ॐ रां नमः। ॐ यं नमः। ॐ णां नमः। ॐ यं नमः।

द्वादशाक्षर-मन्त्र—ॐ नमो भगवते वासुदेवाय, दशाक्षरमन्त्र—ॐ नमो नारायणाय नमः तथा

काण्ड ] पूजानुक्रम-निरूपण [ ३१


अष्टाक्षरमन्त्र—ॐ पुरुषोत्तमाय नमः—इन मन्त्रोंका यथाशक्ति जप करके निम्न मन्त्रसे भगवान् पुण्डरीकाक्षको नमस्कार करे—

नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन।
सुब्रह्मण्य नमस्तेऽस्तु महापुरुष पूर्वज ॥

हे पुण्डरीकाक्ष ! (कमलनयन) आपको नमस्कार है। हे विश्वके कारणभूत ! आपको मेरा प्रणाम है। हे ब्रह्मण्यदेव ! आपको नमस्कार है। हे महापुरुष ! हे पूर्वज ! आपको मेरा प्रणाम है।

इस प्रकार भगवान् विष्णुकी स्तुति करके साधकको हवन करना चाहिये। तदनन्तर साधक (महापुरुषविद्या नामक) मन्त्रका विधिपूर्वक एक सौ आठ बार जप करके अर्घ्य प्रदान करे और ‘जितं तेन’ (यह स्तोत्र ही महापुरुषविद्या है) इसी स्तोत्रसे उन भगवान् नारायणको बारम्बार प्रणाम करना चाहिये।

तत्पश्चात् [अग्निकी स्थापना करके] साधक उस अग्निदेवकी पूजा करनेके बाद हवन करे। अपने (यथाविहित) बीजमन्त्रसे देवाधिदेव भगवान् विष्णु तथा अङ्गमन्त्रोंके द्वारा अच्युतादि आङ्गिक देवताओंको आहुति प्रदान करे। सबसे पहले मन्त्रविद् साधकको कुण्डमें ॐकारके द्वारा [तीन रेखाओंका] उल्लेखन करना चाहिये और उसके बाद यज्ञकुण्डका अभ्युक्षण* करना चाहिये। तदनन्तर यथाविधि भ्रामणपूर्वक हवनकुण्डमें अग्नि स्थापित करके उत्तम फल आदिसे सविधि उसकी पूजा करनी चाहिये।

पहले साङ्गोपाङ्ग देव ब्रह्मका मनसे ध्यानकर मण्डलमें उन सभीको स्थापित करे। तदनन्तर वह साधक वासुदेव-मन्त्रसे एक सौ आठ बार आहुति दे। तत्पश्चात् वह सङ्कर्षण आदि देवोंके बीजमन्त्रसे उन छः देवोंकी भी पूजा करके अङ्ग देवताओंको तीन-तीन और दिक्पालोंको एक-एक आहुति प्रदान करे। उसके बाद हवन पूर्ण होनेपर साधकको पुनः एकाग्रचित्त स्थित होकर पूर्णाहुति देनी चाहिये।

तदनन्तर वह साधक ‘वाणीसे अतीत उस परमात्मा’ में अपने आत्माको लीन करे और निम्नलिखित मन्त्रसे वासुदेव और उन सभी देवोंका विसर्जन करे—

'गच्छ गच्छ परं स्थानं यत्र देवो निरञ्जनः॥
गच्छन्तु देवताः सर्वाः स्वस्थानस्थितिहेतवे।'

‘हे देवाधिदेव भगवान् वासुदेव! अब आप उस अपने परम स्थानको प्राप्त करें, जहाँपर निर्मल (प्रकाशस्वरूप) परम ब्रह्मका निवास है। अङ्गदेव, सङ्कर्षणादि और इन्द्रादि दिक्पाल! आप सभी देव अपने-अपने स्थानमें निवास करनेके लिये प्रस्थान करें!’

सुदर्शन, श्रीहरि, अच्युत, त्रिविक्रम, चतुर्भुज, वासुदेव, प्रद्युम्न, सङ्कर्षण और पुरुषसे युक्त देवोंका (एक जो समूह है उसे) नवव्यूह माना गया है। इसमें दसवें परम तत्त्वका योग होनेसे यह दशात्मक कहा जाता है। इसी नवव्यूहमें अनिरुद्ध तथा अनन्तका संनिवेश होनेसे यह एकादश व्यूह द्वादशात्मक कहलाता है।

अङ्कित चक्रोंमें उस प्रधान देवकी पूजा करनेपर वह (साधकके) घर आदिकी रक्षा करता है। अतः निम्न मन्त्रोंसे चक्रादिकी पूजा करनी चाहिये—

ॐ चक्राय स्वाहा। ॐ विचक्राय स्वाहा। ॐ सुचक्राय स्वाहा। ॐ महाचक्राय स्वाहा। ॐ असुरान्तकृत् हुं फट्। ॐ हुं सहस्रार हुं फट्।

उपर्युक्त मन्त्रोंसे की गयी पूजा द्वारकाचक्रकी पूजा कही जाती है। इस प्रकार सम्पन्न की गयी चक्रकी पूजा ‘घरमें’ सब प्रकारसे रक्षा करनेवाली तथा मङ्गलदायिनी है।

(अध्याय १२)


* ‘अभ्युक्षण’ जलके द्वारा पवित्र करनेकी एक शास्त्रीय विधि है।

१०- विष्णुपञ्जरस्तोत्र

३२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

विष्णुपञ्जरस्तोत्र¹

श्रीहरिने पुनः कहा— हे रुद्र! अब मैं विष्णुपञ्जर नामक स्तोत्र कहता हूँ। यह स्तोत्र (बड़ा ही) कल्याणकारी है। उसे सुनें—

[मूल संस्कृत श्लोक]

प्रवक्ष्याम्यधुना ह्येतद्वैष्णवं पञ्जरं शुभम्।
नमो नमस्ते गोविन्द चक्रं गृह्य सुदर्शनम्॥
प्राच्यां रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गतः।
गदां कौमोदकीं गृह्य पद्मनाभ नमोस्तु ते॥
याम्यां रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गतः।
हलमादाय सौनन्दं नमस्ते पुरुषोत्तम॥
प्रतीच्यां रक्ष मां विष्णो त्वामहं शरणं गतः।
मुसलं शातनं गृह्य पुण्डरीकाक्ष रक्ष माम्॥
उत्तरस्यां जगन्नाथ भवन्तं शरणं गतः।
खड्गमादाय चर्माथ अस्त्रशस्त्रादिकं हरे॥
नमस्ते रक्ष रक्षोघ्न ऐशान्यां शरणं गतः।
पाञ्चजन्यं महाशङ्खमनुघोष्यं च पङ्कजम्॥
प्रगृह्य रक्ष मां विष्णो आग्नेय्यां यज्ञशूकर²।
चन्द्रसूर्य समागृह्य खड्गं चान्द्रमसं तथा॥
नैर्ऋत्यां मां च रक्षस्व दिव्यमूर्ते नृकेसरिन्।
वैजयन्तीं सम्प्रगृह्य श्रीवत्सं कण्ठभूषणम्॥
वायव्यां रक्ष मां देव हयग्रीव नमोऽस्तु ते।
वैनतेयं समारुह्य त्वन्तरिक्षे जनार्दन॥
मां रक्षस्वाजित सदा नमस्तेऽस्त्वपराजित।
विशालाक्षं³ समारुह्य रक्ष मां त्वं रसातले॥
अकूपार⁴ नमस्तुभ्यं महामीन नमोऽस्तु ते।
करशीर्षाद्यङ्गुलीषु सत्य त्वं बाहुपञ्जरम्॥
कृत्वा रक्षस्व मां विष्णो नमस्ते पुरुषोत्तम।
एतदुक्तं शङ्कराय वैष्णवं पञ्जरं महत्॥
पुरा रक्षार्थमीशान्याः कात्यायन्या वृषध्वज।
नाशयामास सा येन चामरं महिषासुरम्॥
दानवं रक्तबीजं च अन्यांश्च सुरकण्टकान्।
एतज्जपन्नरो भक्त्या शत्रून् विजयते सदा॥
(१३। १—१४)


[हिन्दी अनुवाद]

हे गोविन्द! आपको नमस्कार है। आप सुदर्शनचक्र लेकर पूर्व दिशामें मेरी रक्षा करें। हे विष्णो! मैं आपकी शरणमें हूँ। हे पद्मनाभ! आपको मेरा नमन है। आप अपनी कौमोदकी गदा धारणकर दक्षिण दिशामें मेरी रक्षा करें। हे विष्णो! मैं आपकी शरणमें हूँ। हे पुरुषोत्तम! आपको मेरा प्रणाम है। आप सौनन्द नामक हल लेकर पश्चिम दिशामें मेरी रक्षा करें। हे विष्णो! मैं आपकी शरणमें हूँ। हे पुण्डरीकाक्ष! आप शातन नामक मुसल हाथमें लेकर उत्तर दिशामें मेरी रक्षा करें। हे जगन्नाथ! मैं आपकी शरणमें हूँ। हे हरे! आपको मेरा नमस्कार है। आप खड्ग, चर्म (ढाल) आदि अस्त्र-शस्त्र ग्रहणकर ईशानकोणमें मेरी रक्षा करें। हे दैत्यविनाशक! मैं आपकी शरणमें हूँ। हे यज्ञवराह (महावराह)! आप पाञ्चजन्य नामक महाशङ्ख और अनुघोष (अनुबोध) नामक पद्म ग्रहणकर अग्निकोणमें मेरी रक्षा करें। हे विष्णो! मैं आपकी शरणमें हूँ। आप मेरी रक्षा करें। हे दिव्य-शरीर भगवान् नृसिंह! आप सूर्यके समान देदीप्यमान और चन्द्रके समान चमत्कृत खड्गको धारणकर नैर्ऋत्यकोणमें मेरी रक्षा करें। हे भगवान् हयग्रीव! आपको प्रणाम है। आप वैजयन्ती माला तथा कण्ठमें सुशोभित होनेवाले श्रीवत्स नामक आभूषणसे विभूषित होकर वायुकोणमें मेरी रक्षा करें। हे जनार्दन! आप वैनतेय गरुडपर


१. 'पञ्जर'का अर्थ है—रक्षक। यह विष्णुका स्तोत्र हम सबका रक्षक है, इसलिये 'विष्णुपञ्जरस्तोत्र' कहा जाता है।
२. वामनपुराण अध्याय १७ के अनुसार 'यज्ञशूकर' पाठ उचित है।
३. विशालाक्ष —गरुडवंशविशेष (शब्दकल्पद्रुम)।
४. अकूपार —कूर्मराज (मेदिनीकोश)।

११- ध्यान-योगका वर्णन

गीताप्रेस, गोरखपुर

भगवान् शंकरद्वारा भगवान् विष्णुकी स्तुति

१२- विष्णुसहस्रनाम

सूतजीद्वारा पुराणका प्रवचन


(चित्रान्तर्गत पाठ) गीताप्रेस, गोरखपुर

काशीमरण-मुक्ति

गीताप्रेस, गोरखपुर