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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

काण्ड ] स्त्रियोंके रोगोंकी चिकित्सा, ग्रहदोषके उपाय, ऋतुचर्या तथा पथ्यकारक सर्वौषधियाँ ३२५


सेंधा नमकको पीसकर पीना विषनाशक है। घृत-मिश्रित सिंहोरकी जड़का क्वाथ पीनेसे भी विष-दोष दूर हो जाता है।

जो औषधि वृद्धावस्थाको दूर करनेका सामर्थ्य रखती है, उसको रसायन<sup></sup> कहा जाता है। रसायनकी अभिलाषा करनेवाले लोगोंको वर्षा आदि ऋतुओंमें यथाक्रम सेंधा नमक, शर्करा, सोंठ, पिप्पली, मधु तथा गुड़के साथ हरीतकी नामक औषधिका प्रयोग करना चाहिये अर्थात् वर्षाकालमें सेंधा नमक, शरत्कालमें शर्करा, हेमन्तकालमें सोंठ, शिशिरकालमें पिप्पली, वसन्तकालमें मधु तथा ग्रीष्मकालमें गुड़के साथ हरीतकीका सेवन प्राणियोंके लिये रसायनका कार्य करता है।

ज्वरकी समाप्तिपर व्यक्ति एक हरीतकी, दो बहेड़ा, चार आँवला, मधु और घृतका सेवन करके सौ वर्षतक जीवित रहता है। दूध तथा घृतके साथ अश्वगन्धा नामक औषधि तो प्राणियोंके शरीरमें होनेवाले सभी रोगोंका विनाश करती है। मण्डूकपर्णी और विदारीकन्दका रस अमृतके समान है। मनुष्य तिल, आँवले और भृंगराजके सेवनसे शतायु बन जाता है। त्रिकटु, त्रिफला, चित्रक, गुडूची, शतावरी, विडंग और लौहचूर्ण मधुके साथ मिलाकर खाना सभी रोगोंका विनाशक बन जाता है। त्रिफला, पिप्पली, सोंठ, गुडूची, शतावरी, विडंग तथा भृंगराज आदिका सिद्ध रस भी सभी रोगोंको विनष्ट करनेकी शक्तिसे सम्पन्न होता है। एक भाग शतावरी तथा दस भाग दुग्धसे कल्क बनाकर शर्करा, पिप्पली और मधुसे युक्त घृतपाक अत्यन्त पौष्टिक होता है।

चिकित्सामें प्रतिमर्ष, अवपीड, नस्य, प्रवपन तथा शिरोविरेचन—ये पाँच कर्म कहे जाते हैं। क्रमशः माघ आदि प्रत्येक दो मासकी एक ऋतु होती है। इस प्रकार एक वर्षमें छः ऋतुएँ<sup></sup> होती हैं। इन सभी ऋतुओंमें अग्निसेवन, मधु, दूध और दहीके विवर्त आदिका सेवन करना चाहिये। मनुष्यको शिशिर-ऋतुमें स्त्रीके साथ रहना चाहिये। वसन्त-ऋतुमें दिनमें सोना उचित नहीं है। वर्षा-ऋतुमें दिवा-निद्रा तथा शरत्कालमें चन्द्रकिरणोंका सेवन मनुष्यके लिये त्याज्य है।

साठी चावल, मूँगकी दाल, वर्षाका जल, क्वाथ और दूध पथ्य हैं। नीम, अलसी, कुसुम्भ<sup></sup>, सहिजन, सरसों, ज्योतिष्मती तथा मूलीका तेल भी प्राणीके लिये पथ्य माना गया है। ये कृमि, कुष्ठ, प्रमेह, वात, श्लेष्मज दोष और सिरमें होनेवाली पीड़ाका नाश करते हैं।

अनार, आँवला, बेर, करौंदा, चिरौंजी, नीबू, नारंगी, आमड़ा और कपित्थ नामक फल भी पथ्य हैं। किंतु ये पित्तवर्धक और अग्निविनाशक हैं तथा इनसे कफजनित दोष होता है। जल, नागरमोथा, इक्षुरस और कुटज मल-मूत्रके अवरोधको दूर करनेमें समर्थ होते हैं।

धामार्गव अर्थात् घिया तरोईको सदैव वमनके रोगमें सेवन करना चाहिये। पूर्वाह्नकालमें वमन करनेके लिये वचके साथ खैर और इन्द्रयवका सेवन लाभप्रद है। पित्तदोष होनेसे प्राणियोंका अन्नादिक कोष्ठ सबल नहीं रह पाता। उनमें एक प्रकारकी मधुरता रहती है। वात और कफदोषका आश्रय मिलनेसे उसमें दोष अधिक ही आ जाते हैं। वात, पित्त और कफ—इन त्रिदोषोंकी समान स्थिति रहनेपर उन कोष्ठोंकी क्षमता मध्यम रह जाती है। (उस स्थितिमें न तो उनकी कार्य-क्षमतामें शिथिलता रहती है और न उनमें दोषोंकी


१-लाभो पाथो हि शस्तानां रसादीनां रसायनम्। (सु० सं० सू० अ० १)
२-च० चि० १। ३-शिशिर, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद् और हेमन्त। ४-कुसुम्भ (बरें)।

१५६- गर्भ-सम्बन्धी रोग, दन्त तथा कर्णशूल एवं रोमशमन आदिका उपचार

३२६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

क्षमताकी अभिवृद्धि। शरीरके अंदर स्थित कोष्ठका कार्य चलता रहता है।) पित्तदोष होनेपर निसोतका सेवन करके विरेचन करना चाहिये। सेंधा नमक, सोंठ, निसोत, हरीतकी तथा विडंगको गोमूत्रसे सिद्धकर शर्करा और मधुके साथ सेवन करनेपर विरेचनमें अधिक लाभ होता है। वातदोषके प्रबल होनेपर उत्पन्न हुए दोषोंमें रोगीको एक भाग एरण्ड तेल और दो भाग त्रिफलाका क्वाथ पान कराकर वमन कराना चाहिये।

छः अंगुल, आठ अंगुल या बारह अंगुल लम्बी बाँस आदिकी नेत्रि अर्थात् पिचकारी बनाकर और उस पिचकारीमें कर्कन्धू (बेर)-फलके समान छिद्र करके रोगीको उत्तान सुलाकर वस्ति-क्रिया करनी चाहिये। निरुहदान या निरुढवस्तिके प्रयोगमें भी यही विधि कही गयी है। इन दोनों विधियोंमें औषधियोंकी मात्रा आधा पल, तीन पल तथा छः पल होनी चाहिये। इसी मात्राको क्रमशः लघु, मध्यम तथा उत्तम कहा जाता है। इस वस्ति-विधिमें शतावरी, गुडूची, भृंगराज तथा सिन्धुवार आदिके रसमें भावित हरीतकी एक भाग, बहेड़ा दो भाग और आँवला चार भाग होना चाहिये। ये औषधियाँ उदररोगकी पीड़ाको समाप्त कर देती हैं। (अध्याय १७२)

मधुर, अम्ल और तिक्त आदि द्रव्योंका वर्ग तथा उनका औषधीय उपयोग

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत! अब मैं रोग-विनाशक मधुर आदि गुणोंसे युक्त द्रव्योंका वर्णन करूँगा।

साठी चावल, गेहूँ, दूध, घृत, रस, मधु, सिंघाड़ेकी गूदी, जौ, कशेरु, फूटनेवाली ककड़ी, गोखरू, गम्भारी, कमलगट्टा, द्राक्षाफल, खजूर, बला, नारियल, इक्षु, सतावर, विदारीकन्द, चिरौंजी, मुलेठी, तालफल और कुम्हड़ा—यह मधुर द्रव्योंका मुख्य वर्ग है।

इन द्रव्योंका यह वर्ग मूर्च्छा और प्रदाह नामक रोगोंका विनाशक तथा जिह्वादि सभी छः इन्द्रियोंका आह्लादक है। इस वर्गके एक भी पदार्थका अत्यधिक सेवन करनेसे प्राणीके शरीरमें कृमि तथा कफजनित रोग उत्पन्न हो जाते हैं। जब श्वास, खाँसी, मुखव्याधि, माधुर्य-दोष, स्वरघात, अर्बुद, गलगण्ड और श्लीपदका रोग हो तो गुड़से बने लेपादिका प्रयोग करना चाहिये।

अनार, आँवला, आम, कपित्थ, करौंद, बिजौरा नींबू, आमड़ा, बेर, इमली, दही, मट्ठा, कांजी, बड़हल, अम्लवेत, अम्ल, सेंधा नमक, सोंठ तथा जीराका वर्ग जठराग्निका उद्दीपक और पाचक होता है। यह वर्ग स्वेदकारक, वातवर्धक, कामोद्दीपक, विदाहकारक और अनुलोमी है। इस वर्गमें संनिहित रहनेवाले अम्ल-पदार्थका अत्यधिक सेवन करनेसे दाँत सिहरने लगते हैं, शरीरमें शिथिलता आ जाती है तथा कण्ठ, मुख और हृदयमें दाह होता है।

सैंधव, सुवर्चल, यवक्षार तथा छज्जी आदि लवण हैं। लवणकी अधिकतासे यह द्रव्य-वर्ग लावण कहलाता है। यह शरीर-शोधक, पाचक, स्वेदकारक, हाथ-पैरमें बेवाई तथा खुजली आदिका विकारोत्पादक है। इनमेंसे एक नमकका सेवन भी मल-मूत्रादिक मार्गोंमें अवरोध तथा अस्थि-मज्जादिकी शक्तियोंको कोमल कर देता है। लवणजन्य रस शरीरमें खुजलाहट, कोष्ठकोंमें शोथ तथा विवर्णता-जनक है। उसके दुष्प्रभावसे रक्तवातज, पित्तरक्तज, कामोद्दीपन और इन्द्रियजनित पीड़ाके उपद्रवकी उत्पत्ति भी होती है।

व्योष (सोंठ, पिप्पली, काली मिर्च), सहिजन, मूली, देवदारु, कुष्ठ (कूट), लहसुन, बकुची,

काण्ड ] मधुर, अम्ल और तिक्त आदि द्रव्योंका वर्ग तथा उनका औषधीय उपयोग [ ३२७


नागरमोथा, गुग्गुल, लांगुली आदि औषधियोंका वर्ग कडुआ, अग्निदीपक, शरीर-शोधक, कुष्ठ, खुजली, कफ, स्थूलता, आलस्य तथा कृमिदोषका विनाशक एवं शुक्र और मेदका विरोधी है। इस वर्गकी एक भी औषधिका अधिक सेवन करनेसे वह भ्रम एवं विदाह उत्पन्न करता है।

कृतमाल (केवड़ा—सोमालिका), करीर (वंशांकुर), हल्दी, इन्द्रयव, स्वादुकण्टक (भुइँकुम्हड़ा), वेतलता, बृहतीद्वय, शंखिनी (चोरपुष्पी), गुडूची, द्रवन्ती (मूसाकर्णी), त्रिवृत् (निशोत), मण्डूकपर्णी (मंजीठ), कारवेल्ल (करैला), वार्त्ताकु (बैगन), करवीर (कनेर), वास (अडूसा), रोहिणी (कंजा), शंखचूर्ण (शंखपुष्पी), कर्कोट (खेखसी), जयन्तिका (वैजयन्ती), जाती (चमेली), वारुणक (वरुण), निम्ब (नीम), ज्योतिष्मती (मालकँगनी) और पुनर्नवा नामक ये सभी औषधियाँ तिक्त रसवाली हैं। इनका रस छेदक, रोचक तथा जठराग्निदीपक है। यह शरीरका अन्तर एवं बाह्य-शोधन करती है। इस रसके सेवनसे ज्वर, तृष्णा, मूर्च्छा तथा कण्ठके रोग विनष्ट हो जाते हैं। इस औषधिवर्गमेंसे किसी एक औषधिका अधिक सेवन करनेपर प्राणीमें विष्ठा, मूत्र, स्वेद तथा शरीर-शुष्कताके विकार जन्म लेते हैं। यथोचित सेवन न करनेसे यह रस हनुस्तम्भ, आक्षेपक, पीड़ा, मस्तिष्क-शूल और व्रण आदिके भी उपद्रवोंका कारण बन जाता है।

त्रिफला, सल्लकी (चीड़), जामुन, आमड़ा, बरगद, तिन्दुक (तेंदू), वकुल (मौलसिरी), शाल, पालङ्की (पालकी), मुद्ग (मूँग) और चिल्लक (बथुआ)-का रस कषाय, ग्राही, रोपी, स्तम्भन, स्वेदन तथा शरीर-शोषक होता है। इनमेंसे किसी एकका अत्यधिक सेवन करनेपर वह हृदयमें पीड़ा, मुखशोष-ज्वर, आध्मान तथा स्तम्भादिक रोगोंका कारण भी हो जाता है।

हल्दी, कुष्ठ, सेंधा नमक, मेषश्रृंगि (मेढासिंगी), बला, अतिबला, कच्छुरा (शूकशिम्बी), सल्लकी (चीड़), पाठा (पाढ़ा), पुनर्नवा, शतावरी, अग्निमन्य (गनियारी), ब्रह्मदण्डी, श्वदंष्ट्रा (गोखरू), एरण्ड, यव (जौ), कोल (बेर) और कुलत्थ (कुलथी) आदि विशेष औषधियोंका पृथक्-पृथक् रस एवं दशमूलका क्वाथ पान करनेवाला मनुष्य अपने शरीरमें उत्पन्न होनेवाले वातज एवं पित्तज विकारोंको विनष्ट करनेमें सफल रहता है।

शतावरी, विदारी, बालक (मोथा), उशीर (खस), चन्दन, दूर्वा, वट, पिप्पली, बेर, सल्लकी, केला, नीलकमल, लालकमल, गूलर, पटोल (परवल), हल्दी, गुड़ तथा कुष्ठ—इन औषधियोंका वर्ग कफ-विनाशक है।

शतपुष्पी (सोआ), जाती (चमेली), व्योष (सोंठ, पिप्पली, काली मिर्च), आरग्वध (अमलतास), लाङ्गली (कलियारी) और घृत-तैलादिसे सिद्ध होनेवाले अन्य स्नेहपाकोंमें प्रशस्त माना गया है। बुद्धि, स्मृति, मेदा तथा अग्निवृद्धिके अभिलाषी जनोंके लिये घृत लाभप्रद है। पैत्तिक विकार होनेपर मात्र घृत और वात-विकार होनेपर उसको सेंधादि नमकके साथ सेवन करना चाहिये। कफकी अत्यधिक विकृति होनेपर रोगीको पिप्पली, सोंठ, काली मिर्च और यवक्षार मिलाकर दिया गया घृत श्रेयस्कर होता है। यह घृत ग्रन्थिदोष, नाड़ी-विकार, कृमि, श्लेष्म, मेदा तथा वात-रोगसे युक्त रोगियोंको भी देना चाहिये।

तैल-पदार्थोंका सेवन शरीरको हल्का और कठोर बनानेके लिये करना चाहिये। यह कठोर कोष्ठकोंवाले प्राणियोंके लिये लाभकारी होता है तथा वायु, धूप, जल, भार, मैथुन और व्यायामके कारण क्षीण हुई धातुओंसे युक्त जनोंके लिये उचित है। शरीरकी रूक्षता, कष्ट, वृद्धावस्था,

१५७- भोज्य पदार्थोंका विहित सेवनकाल, बल-बुद्धिवर्धक औषधियाँ तथा विषदोषशमनके उपाय ..

३२८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

जठराग्निदीपन तथा वातदोषसे घिरे हुए प्राणियोंको स्नेहयुक्त औषधि एवं क्वाथोंका प्रयोग करना चाहिये।

इसके बाद जब प्राणीके सिरमें रोग हो गया हो तो चिकित्सा-शास्त्रके नियमानुसार सिरकी अपेक्षित शिराओंके समूहको गर्म करके प्राणीको धीरे-धीरे सिरका मर्दन करना चाहिये। स्नेह, क्वाथ और वटिका आदिके रूपमें प्रयुक्त औषधियोंकी उत्तम, मध्यम तथा अधम—ये तीन मात्राएँ मानी गयी हैं, जिनमें उत्तम मात्रा एक पल अर्थात् आठ तोला (९६ ग्राम), मध्यम मात्रा तीन अक्ष अर्थात् छः तोला (७२ ग्राम) और अधम मात्रा अर्ध पल अर्थात् चार तोला (४८ ग्राम) होती है। घृतपाक-सेवनमें गुनगुना तथा तैलपाक-सेवनमें शीतल जलका प्रयोग होना चाहिये। स्नेह (सहरई) पित्तविकार तथा तृष्णाजन्य दोषमें मनुष्यको गुनगुना जल पीना चाहिये।

शरीरमें जठराग्निके प्रबल होनेपर प्राणीको वातानुलोम, स्निग्धभाव होनेपर जठराग्निका दीपन, रूक्षभाववाली स्थितिके होनेपर स्नेहन तथा अत्यधिक स्निग्धताके होनेपर रूक्षता उत्पन्न करनेका प्रयास करना चाहिये। साँवाँ, कोदो आदि रूक्ष अन्न, तक्र, तिलकुट तथा सत्तूके अनपेक्षित प्रयोगसे वात तथा कफ-रोगमें अथवा वात-रोगमें स्वेदन-क्रिया करनी चाहिये। किंतु अत्यन्त स्थूल, रूक्ष, दुर्बल और मूर्च्छित व्यक्तिमें यह स्वेदन-क्रिया नहीं करनी चाहिये।
(अध्याय १७३)


ब्राह्मीघृत आदि स्नेहपाकोंकी निर्माण-विधि तथा विविध रोगोंमें उनका उपचार

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत! अब मैं रोगोंको दूर करनेवाले घृत और तैलादि पदार्थोंके विषयमें बताऊँगा, उसे आप सुनें।

शंखपुष्पी, वच, सोमा, ब्राह्मी, ब्रह्मसुवर्चला, अभया (हरीतकी), गुडूची (गिलोय), अटरूषक (अडूसा) तथा वागुजी (वकुची) नामक इन औषधियोंके रसको एक-एक अक्ष अर्थात् दो-दो तोला लेकर उनसे एक प्रस्थ अर्थात् चार सेर घृतका पाक सिद्ध करना चाहिये। उसमें एक प्रस्थ कण्टकारीका रस, एक ही प्रस्थ दूधका मिश्रण भी करना चाहिये। इस घृतपाकका नाम ब्राह्मीघृत है। यह स्मरण और मेधा-शक्तिका अभिवर्धक होता है।

त्रिफला, चित्रक, बला, निर्गुण्डी (सिन्धुवार), नीम, वासक (अडूसा), पुनर्नवा, गुडूची, बृहती और शतावरी नामक इन औषधियोंके रससे सिद्ध घृतपाक सभी रोगोंका विनाशक है।

बलाके रससे बने हुए क्वाथमें आधा आढक अर्थात् दो सेर तिलका तेल पकाना चाहिये। इस क्वाथपाकके साथ मुलेठी, मजीठ, चन्दन, नीलकमल, लालकमल, छोटी इलायची, पिप्पली, कुष्ठ, दारचीनी, बड़ी एला (कपित्थकी छाल), अगरु, केसर, अश्वगन्धा तथा जीवन्तीका कल्क और एक आढक अर्थात् चार सेर दूध मिलाना चाहिये। इस पाकको अग्निकी धीमी आँचमें सिद्ध करके एक रजत-पात्रमें रखना चाहिये। यह तैलपाक समस्त वात तथा धातुरोगोंका नाशक है। इस तैलपाकके सेवनसे कफजन्य क्षयरोग भी विनष्ट हो जाता है। इसका नाम राजवल्लभ है।

एक प्रस्थ शतावरीका रस, एक प्रस्थ दूध, एक-एक कर्ष शतपुष्पी, देवदारु, जटामांसी, शिलाजीत, बला, चन्दन, तगर, कुष्ठ, मैनसिल और मालकँगनी नामक औषधियोंका रस लेकर

१५८- ग्रहणी, अतिसार, अग्निमान्द्य, छर्दि तथा अर्श आदि रोगोंका उपचार

काण्ड ] ज्वर-चिकित्सा ३२९


एक प्रस्थ घृतको अग्निपर सिद्ध करना चाहिये। इस घृतपाकके प्रयोगसे प्राणियोंका लँगड़ापन, बौनापन, लुंजता, बधिरता, व्यंगदोष और कुष्ठरोग विनष्ट हो जाता है। वायुदोषके कारण जिनका शरीर दुर्बल हो गया है, जो मैथुनमें अशक्त हैं, वृद्धावस्थाके कारण जो जर्जर शरीरवाले हो गये हैं, आध्मान नामक रोगके कुप्रभावसे जिनके मुख शुष्क हो गये हैं, उनके उन सभी विकारोंका यह घृत-पदार्थ विनाशक है। जिन प्राणियोंके चर्म, शिरा और स्नायु-तन्त्रिकाओंमें विकृत वायु-समूह प्रविष्ट होकर रोगका रूप धारण कर चुका है, वह सब इस सिद्ध तेलके सेवनसे नष्ट हो जाता है। इस तेलका नाम नारायणतेल है। इस रोगविनाशक तेलकी सिद्धिका विधान स्वयं भगवान् विष्णुने बताया था, इसीलिये इस सिद्ध तेलका नाम उन्हींके नामपर पड़ा है। इन्हीं औषधियोंसे पृथक्-पृथक् अथवा मिश्रण-रूपमें घृत एवं तैलपाक बनाना चाहिये।

शतावरी, गुडूची, चित्रक, बिजौरा नीबूका रस अथवा कण्टकारीके रसादिसे समन्वित निर्गुण्डीका रस या पुनर्नवा और चमेली अथवा त्रिफलाके साथ अडूसा या ब्राह्मी, एरण्ड, भृंगराज, कुष्ठ, मूसली, दशमूल और खदिरकी घिसकर बनायी गयी वटी, वटिका, मोदक या चूर्ण सभी रोगोंको दूर करनेवाला है। घृत, मधु, जल, शर्करा, गुड़, नमक तथा सोंठ, काली मिर्च अथवा पिप्पलीके साथ सेवन करनेसे सभी रोगोंमें यथोचित लाभ होता है। इन औषधियोंका योग सर्व-रोगविनाशक है।

चित्रक, मन्दार और निसोत अथवा अजवाइन तथा कनेर या सुधा (गुडूची), बाला (चमेली), गणिका (गनियारी), सप्तपर्णी (छितवन), सुवर्चिका (पित्तपापड़ा) और ज्योतिष्मती (मालकँगनी) नामकी औषधियोंको एकत्र करके विद्वान्को उनका तैल पाक सिद्ध करना चाहिये। इस योगसे सिद्ध तेलका प्रयोग भगंदर-रोगमें करना चाहिये। शोधन, रोपण तथा सर्ववर्णकारक चित्रकादिक जो महातेल हैं, वे सभी प्रकारके रोगोंका निवारण करते हैं।

अजमोदा, सिन्दूर, हरताल, हल्दी, दारुहल्दी, यवक्षार, छज्जी, समुद्रफेन, अदरक, सरलद्रव, इन्द्रायण, अपामार्ग, केला तथा तिन्दुकको समान भागमें लेकर सरसोंका तेल बकरीके मूत्र तथा गोदुग्धको मिलाकर मन्द-मन्द अग्निकी आँचपर पाक करना चाहिये। इस सिद्ध तैल पाकका नाम अजमोदादि-तेल है। यह गण्डमाला नामक रोगको दूर करता है। विद्वान् व्यक्तिको सबसे पहले इस गण्डमाला नामक रोगमें होनेवाली फुंसियोंको पकाना चाहिये। तदनन्तर उनका शोधन करके इसी अजमोदादि तेलसे घावोंको भरते हुए उसमें कोमलता लानेका प्रयास करे। (अध्याय १७४)


ज्वर-चिकित्सा

श्रीहरिने कहा— हे शंकर! सभी ज्वरोंमें सबसे पहला कार्य लंघन है। उसके बाद क्वाथ, उदकपान तथा वातशून्य स्थानका सेवन करना चाहिये।

हे ईश्वर! अग्निसे तथा स्वेदनकी क्रियाओंको करनेसे सभी ज्वर विनष्ट हो जाते हैं। गुडूची और मोथेका क्वाथ वातज्वर-विनाशक है। दुरालभा* अर्थात् धमासा नामक औषधिके घृतका पान


* च०सू० २५, भा०प्र०, च०द०।

३३०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

करनेसे पित्त-ज्वर दूर होता है। सोंठ, पित्तपापड़ा, नागरमोथा, बालक (हीवेर) खस और चन्दनके क्वाथसे सिद्ध, पित्त-ज्वरका विनाश करता है। दुरालभा तथा सोंठसे सिद्ध घृत-मिश्रित क्वाथ कफ-ज्वरका नाशक है। बालक, सोंठ और पित्तपापड़ासे सभी ज्वर विनष्ट हो जाते हैं। चिरायता, एरण्ड, गुडूची, सोंठ, नागरमोथाके क्वाथसे पित्त-ज्वर दूर होता है। हीवेर, खस, पाठा, कण्टकारी और नागरमोथाका क्वाथ ज्वरका विनाश करता है। देवदारुकी छालका क्वाथ भी लाभदायक है।

हे शंकर! मधुसहित धनिया, नीम, नागरमोथा, परवलकी पत्ती, गुडूची और त्रिफलाका क्वाथ समस्त ज्वरोंका विनाशक है। इसके सेवनसे रोगीकी क्षुधा बढ़ने लगती है एवं वायु-विकार दूर हो जाता है।

हरीतकी, पिप्पली, आँवला, चित्रक, धनिया, खस तथा पित्तपापड़ाका चूर्ण और क्वाथ दोनों ज्वरनाशक हैं। मधुके साथ आँवला, गुडूची तथा चन्दनका सेवन सभी ज्वर-रोगोंको दूर करनेवाला है।

अब आप सन्निपातज ज्वरके विनाशक औषधियोंको सुनें।

हल्दी, नीम, त्रिफला, नागरमोथा, देवदारु, अदरक, चन्दन, परवलकी पत्तीका क्वाथ पीनेसे त्रिदोषजन्य अर्थात् संनिपातज ज्वर दूर हो जाता है।

कण्टकारी, सोंठ, गुडूची, कमल तथा नागबला नामक औषधियोंके योगसे बने चूर्णका सेवन करके रोगी श्वास और खाँसी आदिसे विमुक्त हो जाता है। कफ-वातज ज्वरसे ग्रसित रोगीको प्यास लगनेपर गर्म जल देना चाहिये। सोंठ, पित्तपापड़ा, खस, नागरमोथा तथा चन्दनसे सिद्ध क्वाथ शीतल जलके साथ देना चाहिये। यह तृष्णा, वमन, (पित्त) ज्वर और दाहसे ग्रस्त रोगीके लिये हितकारी है। बिल्व आदि पञ्चमूलका क्वाथ वातज ज्वरमें लाभ करता है। पिप्पलीमूल, गुडूची और सोंठका योग पाचक है। वात-ज्वर होनेपर इसका क्वाथ देना चाहिये। यह परम शान्ति देनेवाला है। मधुके सहित पित्तपापड़ा एवं नीमका क्वाथ पित्तज ज्वरका विनाश करता है।

समुचित उपचार करनेपर भी यदि रोगीकी चेतना नहीं लौटती तो उस रोगीके दोनों पैरके तलुओंमें अथवा मस्तक-भागमें लोहेके गर्म शलाकासे दग्ध(गर्म) करना चाहिये। चिरायता, पाढ़ा, पित्तपापड़ा, विशाला (इन्द्रायण), त्रिफला तथा निसोतका क्वाथ दूधके साथ ग्राह्य है। यह मलावरोधका भेदन करनेवाला एवं समस्त ज्वरोंका विनाशक है।

(अध्याय १७५)


पलितकेश तथा कर्णशूलके उपचार

श्रीभगवान्‌ने कहा— हाथी-दाँतका भस्म एव बकरीके दूधमें मिश्रित रसाञ्जन (रसौत)-का लेप सिरपर करनेसे खल्वाट अर्थात् गंजे प्राणीके सिरमें सात रात्रियोंके बीतते-ही-बीतते सुन्दर बाल उग आते हैं। चार भाग भृंगराजरससे सिद्ध गुंजाफलके चूर्णयुक्त तिलका तेल केशराशिका अभिवृद्धिकारक होता है।

इलायची, जटामांसी, मुरा (शल्लकी), शिव (काला धतूरा), गुंजा (घुँघची)-को समभागमें लेकर उनसे बनाया गया लेप सिरमें लगानेसे इन्द्रलुप्त नामक रोग दूर हो जाता है। आमकी गुठलियोंके चूर्णका लेप करनेसे केश सूक्ष्म अर्थात् पतले हो जाते हैं। करंज, आँवला, इलायची और लाहका लेप बालोंकी लालिमाका विनाशक है।

१५९- सिध्म, अर्श, मूत्रकृच्छ्र, अजीर्ण तथा गण्डमाला आदि रोगोंकी औषधियाँ

काण्ड ] नेत्र, नाक, मुख, गला, अनिद्रा तथा पादरोग और शस्त्राघातादिजनित रोगोंकी चिकित्सा ३३१

आमके गुठलीकी मज्जा तथा आँवलाके चूर्णका सिरमें लेप करनेसे केशराशि जड़से मजबूत, सघन, लम्बी, चिकनी तथा टूट-टूटकर न झरनेवाली हो जाती है।

विडंग और गन्धक अथवा चार गुने गोमूत्रसे युक्त मैनसिलके चूर्णसे सिद्ध तैलपाक उत्तम माना गया है। सिरमें इन तेलोंका लेप करनेसे जूँ और लीख समाप्त हो जाते हैं।

हे वृषभध्वज ! शंखभस्म और सीसक घिसकर सिरमें लगानेसे केश चिकने और अत्यन्त काले हो जाते हैं। भृंगराज, लौहचूर्ण, त्रिफला, बिजौरा नींबू, नीली, कनेर और गुड़को समान भागमें लेकर अग्निपर सिद्ध किया गया पाक एक महौषधि है। इसके लेपसे पक रहे बालोंको पुनः काला किया जा सकता है। आमकी गुठलियोंकी गूदी, त्रिफला, नीली, भृंगराज, शोधित पुराना लौहचूर्ण तथा कांजीका सिद्ध योग भी बालोंको काला करता है।

चक्रमर्दक (चकवड़)-का बीज एवं कुष्ठ एरण्डमूल तथा अत्यन्त खट्टे कांजीके साथ पीसकर लेप करनेसे मस्तकका रोग दूर हो जाता है।

सेंधा नमक, वच, हींग, कुष्ठ, नागकेशर, शतपुष्पा (सौंफ) तथा देवदारु नामक औषधियोंसे शोधित चार गुने गायके गोबरसे निकाले गये रससे युक्त तिलके तेलको एक कण मात्र भी कानमें डालकर अत्यन्त प्रबल कर्णशूलको विनष्ट किया जा सकता है। हे शिव ! भेंड़का मूत्र और सेंधा नमक कानमें डालनेसे पूतिका-दोष अर्थात् बहनेवाला दुर्गन्धपूर्ण पानी और कृमिस्रावादिका विकार विनष्ट हो जाता है। मालती नामक पुष्पकी पत्तियोंका रस या गोमूत्रकानोंमें डालनेसे उनमेंसे बहनेवाला मवाद नष्ट हो जाता है।

कुष्ठ, उड़द, काली मिर्च, तगर, मधु, पिप्पली, अपामार्ग, अश्वगन्धा, बृहती, श्वेत सरसों, यव, तिल और सेंधा नमकका उबटन कल्याणकारी होता है। भल्लातक, बृहती एवं अनारका छिलका तथा कटु तैलके लेपसे या इस उबटनके प्रयोगसे लिंग, बाहु, स्तन और श्रवणशक्तिकी वृद्धि होती है। (अध्याय १७६)


नेत्र, नाक, मुख, गला, अनिद्रा तथा पादरोग और शस्त्राघातादिजनित रोगोंकी चिकित्सा

श्रीहरिने कहा—हे शंकर ! मधुके सहित शोभनक वृक्षकी पत्तियोंका रस आँखोंमें डालनेसे निश्चित ही नेत्रका रोग नष्ट हो जाता है। तिल और चमेलीके अस्सी-अस्सी फूल, नीम, आँवला, सोंठ, पीपल तथा चौलाईके शाकको चावलके जलमें पीसकर उनकी वटी बनानी चाहिये। तदनन्तर छायामें सुखाकर मधुके साथ उसका नेत्रोंमें अंजन करना लाभकारी है। ऐसा करनेसे तिमिरादिक रोग नष्ट हो जाते हैं। बहेड़ेके गुठलीकी गूदी, शंखनाभि, मैनसिल, नीमकी पत्ती एवं काली मिर्चको बकरीके मूत्रमें घिसकर अंजन बनाना चाहिये। इस प्रकारका सिद्ध अंजन नेत्रोंमें होनेवाले पुष्प-दोष अर्थात् फुल्ला, रतौंधी, तिमिर-विकार तथा पटलरोगको नष्ट कर देता है।

शंखभस्म चार भाग, मैनसिल दो भाग एवं सेंधा नमक एक भाग जलमें पीसकर बनायी और छायामें सुखायी गयी वटीका नेत्रोंमें अंजन करनेसे तिमिर, पटल तथा सूजन नष्ट हो जाता है। यह नेत्ररोगोंकी महौषधि है। त्रिकटु, त्रिफला, कंजाके फल, सेंधा नमक और दोनों रजनी, हल्दी,

१६०- गणपतिमन्त्रका औषधिक योग तथा शोथ, अजीर्ण, विसूचिका और पीनस आदि विविध रोगोंके उपचार

३३२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

दारुहल्दीको भृंगराजके रसमें पीसकर उसका नेत्रोंमें अंजन देनेसे तिमिरादिक सभी रोग दूर हो जाते हैं। जंगली अडूसाकी जड़को कांजीमें पीसकर नेत्रोंमें लगानेसे नेत्रशूल नष्ट होता है। तक्र अर्थात् मट्ठेके साथ बेरकी जड़को पीसकर पीनेसे भी नेत्रोंकी पीड़ा दूर होती है। सेंधा नमक, कड़ुआ तेल, अपामार्गकी जड़, दूध और कांजीको ताम्रपात्रमें घिसकर उसका नेत्रोंमें अंजन करनेसे पिंजट अर्थात् कीचड़ निकलना बंद हो जाता है।

बिल्व और नील-वृक्षकी जड़ पीसकर बनाये गये अंजनको नेत्रोंमें लगाने मात्रसे तिमिरादिक रोग निश्चित ही नष्ट हो जाते हैं। पिप्पली, तगर, हल्दी, आँवला, वच और खदिरद्वारा बनायी गयी बत्तीका अंजन लगानेसे नेत्ररोग नष्ट होता है। जो मनुष्य नित्य प्रातः मुँहमें जल भरकर जलका ही छींटा देकर नेत्रोंको धोता है, वह नेत्रोंके सभी रोगोंसे मुक्त हो जाता है।

श्वेत एरण्डकी जड़ एवं पत्तियोंके रससे सिद्ध बकरीके दूधके उष्णपाकके सेंकसे आँखोंका वात-विकार दूर हो जाता है। चन्दन, सेंधा नमक, पुराने पलाशका पत्र और हरीतकी पटल, कुसुम, नीलीका अंजन चक्रिका (चकाचौंधी) नामक नेत्ररोगोंका विनाशक है।

बकरीके मूत्रमें घिसी गयी गुंजाकी जड़का अंजन तिमिररोगको दूर करता है। हे रुद्र! चाँदी, ताँबे तथा सोनेकी शलाकाको हाथपर घिसकर नेत्रोंमें उसका लगाया गया उबटन कामला नामक रोगका निवारक है। घोषाफल अर्थात् सौंफको सूँघने और सेवन करनेसे पीलिया नामक रोगका विनाश होता है।

दूर्वा, अनारपुष्प, लोध्र और हरीतकीका रस नाशार्श तथा वातरक्तके दोषको दूर करता है। हे वृषध्वज! हे नीललोहित! जाङ्गलिकमूल अर्थात् केवाँचकी जड़को भली प्रकारसे पीसकर उसका नस्य लेनेसे नाशार्श-रोग नष्ट हो जाता है। हे रुद्र! गोघृत, सर्जरस (राल), धनिया, सेंधा नमक, धतूर तथा गैरिकसे सिद्ध सिक्थ अर्थात् मोम तेलमें मिलाकर ओठोंपर लगानेसे ओठोंके घाव तथा ओठ फटनेका रोग दूर हो जाता है। चबाकर सेवन की जानेवाली चमेलीकी पत्तियोंका रस भी मुखरोग-विनाशक है।

केसरके बीजोंको खानेसे हिलनेवाले दाँत दृढ़ हो जाते हैं। मुष्टक (मोथा), कुष्ठ, इलायची, मुलेठी, वालक और धनियाको चबानेसे मुखकी दुर्गन्ध दूर हो जाती है। कषाय द्रव्य या त्रिकटु अथवा तेलयुक्त तिक्त शाकके नित्य भक्षणसे भी मुखकी दुर्गन्ध दूर हो जाती है। इससे सभी प्रकारके दाँतोंसे सम्बन्धित घाव भी नष्ट हो जाते हैं। हे शिव! तेलमें सिद्ध कांजीका कुल्ला करनेसे अथवा उसको मुखमें रखनेसे ताम्बूलके साथ खाये गये चूनेके प्रभावसे हुए घाव या अन्य व्याधियोंका विनाश हो जाता है।

सोंठको चबानेसे जिस प्रकार प्राणी कफके रोगसे मुक्ति प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार बिजौरा नींबूके बीज, इलायची, मुलेठी, पिप्पली और चमेलीकी पत्तियोंका चूर्ण (शहदमें) चाटनेसे भी कफ-विकारसे मुक्ति मिल जाती है। शेफालिका (सिन्धुवार) तथा जटामांसीका चूर्ण चबानेसे गलशुण्डि अर्थात् तालुभागकी शोथका विनाश होता है।

गुंजा अर्थात् घुँघचीकी जड़को चबानेसे दाँतमें लगे हुए कीड़ोंका विनाश होता है। हे शिव! मधुसहित काकजंघा (घुँघची), स्नुही (सेंहुड़) और नीलका क्वाथ, दन्ताक्रान्त (दन्ताघात) तथा दाँतके कीट-रोगोंका विनाशक है।

कर्कटपाद (कमलकी जड़)-से सिद्ध घृतपाकका

१६१- प्रमेह, मूत्रनिरोध, शर्करा, गण्डमाला, भगंदर तथा अर्श आदि रोगोंका निदान

काण्ड ] नेत्र, नाक, मुख, गला, अनिद्रा तथा पादरोग और शस्त्राघातादिजनित रोगोंकी चिकित्सा ३३३

मंजन करनेसे दाँतोंकी कटकटाहट दूर हो जाती है। हे शिव ! कर्कटपादका दूधके साथ लेप करनेसे भी इस रोगका विनाश हो जाता है। ज्योतिष्मती (मालकँगनी)-के फलोंको जलमें पीसकर उसके द्वारा तीन सप्ताहतक कुल्ला करनेसे भी इस रोगमें लाभ होता है। विदारीकन्द और हरीतकीके चूर्णका मंजन करनेसे दाँतोंका कालापन विनष्ट होता है।

लोध्र, कुंकुम, मजीठ, अगर, लालचन्दन, यव, चावल तथा मुलेठीको जलमें पीसकर तैयार किया गया मुखलेप स्त्रियोंके मुखको शोभा-सम्पन्न बनाता है। दो प्रस्थ बकरीका दूध, एक प्रस्थ तिलका तेल, एक-एक कर्ष रक्तचन्दन, मंजिष्ठ, लाक्षा-रस, मधुपष्टी और कुंकुमसे सिद्ध लेपपाक एक सप्ताहके अन्तर्गत ही मुखकी शोभाको बढ़ा देता है।

सोंठ, पिप्पली-चूर्ण, गुडूची और कण्टकारीके क्वाथका पान करनेसे जठराग्नि तीव्र हो जाती है। हे महादेव ! कंजा, पित्तपापड़ा, बृहती (भटकटैया), अदरक, हरीतकी तथा गोखरूके द्वारा सिद्ध क्वाथ पीनेसे थकान दूर हो जाती है एवं दाह, पित्त-ज्वर, शारीरिक शुष्कता और मूर्च्छा-दोष भी विनष्ट हो जाते हैं।

मधु, घृत, पिप्पली-चूर्ण एवं दूधसे युक्त क्वाथका पान हृदयरोग, खाँसी तथा विषमज्वरका विनाशक होता है।

हे वृषध्वज ! सामान्यतः क्वाथ तथा औषधियोंकी अनुपान-मात्रा आधा कर्ष अर्थात् एक तोला है। विशेष रूपसे रोगीकी आयुके अनुसार उसके परिमाणपर विचार करना चाहिये।

गौके गोबरसे रस निकालकर दूधके साथ पान करनेसे विषमज्वर दूर हो जाता है। काकजंघा (घुँघची)-का रस भी इस ज्वरका नाशक है। सोंठके चूर्णसे युक्त बकरीके दूधका क्वाथ विषम ज्वरको दूर कर देता है।

मुलेठी, खस, सेंधा नमक तथा भटकटैयाका फल पीसकर उसका नस्य देनेसे पुरुषको नींद आने लगती है। हे शिव ! काली मिर्चका चूर्ण मिलाकर मधुका नस्य लेनेसे भी प्राणीको नींद आ जाती है। काकजंघा (कालाहिस्रा)-की जड़ मस्तकपर लेप करके भी निद्राको लाया जा सकता है। कांजी तथा धूना नामक वृक्षके गोंदसे सिद्ध तैलपाकको शीतल जलमें मिलाकर सिरपर लेप करनेसे सिर-संताप दूर हो जाता है। यह रक्तदोषज ज्वर और दाहसे उत्पन्न होनेवाले संतापको भी दूर करता है।

शिलाजीत, शैवाल, मन्था (मेथी), सोंठ, पाषाणभेदी (पत्थरचट्टा), सहिजन, गोखरू, वरुण और सौभाञ्जनकी जड़—इन सबको एकत्र करके बनाया गया जल या क्वाथ हींग तथा यवक्षारके सहित पान करनेसे वातरोगका विनाश होता है।

हे शिव ! पिप्पली, पिप्पलीमूल तथा भिलावेका जल या क्वाथ भली प्रकारसे शूलरोगको दूर करनेका श्रेष्ठतम योग है।

अश्वगन्धा तथा मूलीके रससे शोधित वामीकी जो मिट्टी होती है, उसको रगड़नेसे दाद और ऊरुस्तम्भ नामक रोग शान्त हो जाते हैं।

बृहतीमूल अर्थात् भटकटैयाकी जड़को पानीमें पीसकर पीनेसे संघातवात नष्ट होता है। अदरक और तगरकी जड़को पीसकर मट्ठेके साथ पीनेसे झिंझिनी अर्थात् झुंझबाईका रोग वैसे ही नष्ट होता है, जैसे वज्रके प्रभावसे वृक्ष धराशायी हो जाता है।

अस्थिसंहारक हरजोड़ अर्थात् ग्रन्थिमान् नामक लताकी जड़को भातके साथ खानेसे अथवा जटामांसीके रसके साथ पान करनेसे वातरोग तथा अस्थिभंगके दोष विनष्ट हो जाते हैं। बकरीके दूध और घृत-मिश्रित सत्तूका लेप दोनों पैरके तलुओंमें करनेसे जलन समाप्त हो जाती है। मधु, घृत,

१६२- आयुर्वृद्धिकारी औषधिके सेवनकी विधि

३३४ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार-


मोम, गुड़, गैरिक, गुग्गुल और रालका रस पैरोंमें लेप करनेसे उनका फटना तथा जलना बंद हो जाता है।

हे वृषध्वज! सरसोंके तेलको पैरोंमें लेपकर निर्धूम अग्निमें जो मनुष्य सेंकता है, उसका पंकिल—मिट्टी खाया हुआ अर्थात् कीचड़में अधिक देरतक रहनेसे दूषित हुआ या उसके समान अन्य किसी कारणसे विकृत हुआ पैर खुजलाहट आदि विकारोंसे रहित हो जाता है।

सर्जरस, मोम, जीरा और हरीतकीसे शोधित घृतपाकका अभ्यङ्ग करनेसे अग्निमें जलनेसे उत्पन्न हुई पीड़ा शान्त हो जाती है। तिलका तेल अग्निमें जलाकर भस्म किये गये यवको प्रचुर मात्रामें बार-बार मिलाकर लेप करनेसे अग्निमें जलनेके कारण उत्पन्न हुए घाव ठीक हो जाते हैं। भैंसके दूधका मक्खन, अग्निमें भूने गये तिलका चूर्ण और भिलावाका रस मिलाकर तैयार किया गया लेप घावको ठीक करता है। इसका नस्य एवं लेप करनेसे हृदय-शूल भी शान्त हो जाता है।

हे हर! दण्ड-प्रहार आदिके कारण शरीरमें उत्पन्न घाव कर्पूर और गोघृत परस्पर मिलाकर भरनेसे ठीक हो जाता है। हे शिव! शस्त्रोंके प्रहारसे होनेवाले घावपर इस औषधिका प्रयोग करके उसे स्वच्छ सफेद कपड़ेसे बाँध देना चाहिये। हे वृषध्वज! इस प्रकारके घाव जब पक रहे हों या उनमें पीड़ा होती हो तो उन्हें हाथका स्पर्श देना (सहलाना) चाहिये। आम्रकी जड़का रस और घृत भरनेसे भी शस्त्राघातका घाव भर जाता है। शरपुंखा (शरफोंका), लज्जालुका (लाजवन्ती) और पाठा (पाढ़ा) नामक औषधियोंकी जड़को जलमें पीसकर उसका लेप लगानेसे भी शस्त्राघातजनित व्रण ठीक हो जाता है। काकजंघाकी जड़को पीसकर शस्त्राघातके घावमें भरनेसे वह घाव तीन रात्रियोंके बीतते ही सूख जाता है। रोहितक नामक या रोहड़ाकी जड़का लेप भी व्रणको नष्ट कर देता है।

लाठी आदिके प्रहारसे उत्पन्न होनेवाली पीड़ा जल एवं तिलके तेलमें सिद्ध अपामार्गकी जड़का लेप लगानेसे तथा आगपर सेंकनेसे शान्त हो जाती है।

हे शंकर! हरीतकी, सोंठ और सेंधा नमक पीसकर जलके साथ खानेसे अजीर्ण रोगका विनाश होता है।

निम्बमूल अर्थात् नीमकी जड़को कमरमें बाँधनेपर नेत्रोंकी पीड़ा दूर हो जाती है। शण (पटसन)-की जड़ और पानका भस्म इन्द्रियजन्य विकारका विनाशक है। यवादिक अन्न, हल्दी, सफेद सरसोंकी जड़ और बिजौरा नीबूके बीज समान भागमें पीसकर इनका उबटन बनाना चाहिये। सात दिनोंतक शरीरमें इसका प्रयोग करनेसे रंग गोरा हो जाता है।

श्वेत अपराजिताकी पत्ती तथा नीमकी पत्तीका रस निकालकर उसका नस्य देनेसे डाकिनी आदि माताओं और ब्रह्मराक्षसोंकी छायासे मुक्ति हो जाती है। हे वृषध्वज ! मधुसार अर्थात् मुलेठीकी जड़का नस्य देनेसे भी उनकी छाया दूर हो जाती है।

हे रुद्र! पिप्पली, लौहचूर्ण, सोंठ, आँवला, सेंधा नमक, मधु तथा शर्कराका समान योग गूलरके फलके बराबरकी मात्रामें एक सप्ताहपर्यन्त सेवन करनेसे पुरुष बलवान् हो जाता है। यदि वह सदैव इसका सेवन करे तो दो सौ वर्षतक जीवित रहता है।

भल्लूकीके दूधसे भावित रोहित मछलीके मांसद्वारा सिद्ध तैलपाकका अभ्यङ्ग करनेसे शरीरमें स्थित समस्त रोग दूर हो जाते हैं।

चन्दनके जलका नस्य लेनेसे शरीरके गिरे हुए रोम पुनः निकल आते हैं।

हस्त नक्षत्रमें लाङ्गलिककन्द अर्थात् कलियारी

१६३- व्रण आदि रोगोंकी चिकित्सा

काण्ड ] गर्भ-सम्बन्धी रोग, दन्त तथा कर्णशूल एवं रोमशमन आदिका उपचार ३३५

या जलपिप्पलीकी जड़को लेकर जो व्यक्ति उसका लेप शरीरमें लगाता है, वह बुढ़ौतीके दर्पको नष्ट कर देता है अर्थात् शरीरमें वृद्धावस्थाका प्रभाव नहीं पड़ता।

पुष्य नक्षत्रमें सुदर्शना (चक्रांगी या वृषकणीं) नामक लताकी जड़को लाकर घरके मध्य डाल देनेसे सर्प घरसे भाग जाते हैं। हे शिव! रविवारको लायी गयी मन्दारवृक्ष तथा अग्नइज्वलिता (जलपिप्पली)-की जड़को पीसकर बनायी गयी बत्ती, सरसोंके तेलसे जलानेपर मार्गमें दंश-प्रहार करनेवाले सर्पका विनाश करती है।

विफला (केतकी) और अर्जुनके पुष्प, भिलावा, शिरीष, लाक्षारस, राल, विड और गुग्गुल—इन सभीके द्वारा बना धूप मक्खियों तथा मच्छरोंका नाश करता है। (अध्याय १७७)


गर्भ-सम्बन्धी रोग, दन्त तथा कर्णशूल एवं रोमशमन आदिका उपचार

श्रीहरिने कहा—हे शिव! मुलेठी तथा कण्टकारी नामक औषधियोंको समभागमें लेकर गोदुग्धमें पाक तैयार करके दूधका चौथा भाग शेष रहनेपर उस पाकको गरम जलके साथ पान करनेपर स्त्रीको गर्भ रुक जाता है। बिजौरा नींबूके बीजोंको दूधके साथ भावित करके उसका पान करनेसे स्त्रीको गर्भ रुकता है। पुत्र प्राप्त करनेकी इच्छुक स्त्रियोंको बिजौरा नींबूके बीज तथा एरण्ड-वृक्षकी जड़को घीके साथ संयोजित करके उसका सेवन करना चाहिये। अश्वगन्धाके क्वाथका दूध एवं घीके साथ सेवन पुत्रकारक है। पलाशके बीजोंको मधुके साथ पीसकर पान करनेसे रजस्वला स्त्री मासिक धर्म तथा गर्भधारणसे रहित हो जाती है।

हरिताल, यवक्षार, पत्राङ्ग (तेजपत्ता), लाल चन्दन, जातिफल (जायफल), हींग तथा लाक्षारसका पाक तैयार करके उसे दाँतोंमें भलीभाँति लगाना चाहिये। किंतु उससे पहले हरीतकीके क्वाथसे दाँतोंको साफ कर ले। ऐसा करनेसे मनुष्यके लाल पड़ गये दाँत भी सफेद हो जाते हैं।

मन्द-मन्द आँचपर मूलीके रसको पकाकर उसको कानमें डालनेसे कर्णस्राव अर्थात् कानका बहना बंद हो जाता है। अर्कके पत्तोंको लेकर मन्द-मन्द आँचपर गरम कर ले। तदनन्तर उसका रस निचोड़कर कानोंमें डाले तो कर्णशूल विनष्ट हो जाता है।

प्रियंगु, मुलेठी, आँवला, कमल, मंजीठ, लोध्र, लाक्षारस और कपित्थ-रससे बने तैलपाकसे स्त्रियोंका योनि-दोष दूर हो जाता है। सूखी मूली तथा सोंठका क्षार और हींग तो इस रोगके लिये महौषधि है। सोया (वनसौंफ), वचा (वच), कूट, हल्दी, सहिजन, रसाञ्जन, काला नमक, यवक्षार, सर्जक (तालवृक्षका रस), सेंधा नमक, पिप्पली, विडंग तथा मोथा—इन सभी औषधियोंको समान भागमें लेकर उनसे चार गुना मधु, बिजौरा नींबू और केलाका रस एकत्र करे। तदनन्तर इन सभी औषधियोंको एकमें मिलाकर उनसे तिलके तेलकी सिद्धि करे। इस प्रकार तैयार किये गये पाकके प्रयोगसे निश्चित ही स्त्रियोंका स्रावादिक रोग दूर हो जाता है, इसमें संदेह नहीं।

सरसोंका तेल कानमें डालनेसे उसके अंदर उत्पन्न हुए कृमि नष्ट हो जाते हैं। हे रुद्र! हल्दी,

१६४- पटल आदि नेत्ररोग, गुल्म, दन्तकृमि, विविध ज्वर तथा विषदोष-शमनके उपाय

३३६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

नीमकी पत्तियाँ, पिप्पली, काली मिर्च, विडंगभद्र, मोथा और सोंठ—इन सात औषधियोंको गोमूत्रके साथ पीसकर वटी बना लेना चाहिये। इसकी एक वटी अजीर्ण और दो वटी विषूचिका (हैजा) नामक रोगको दूर करती है। मधुके साथ इसको घिसकर नेत्रोंमें लगानेसे पटोल अर्थात् परवलके समान आयी हुई सूजन दूर हो जाती है। गोमूत्रके साथ प्रयुक्त होनेपर अर्बुद (कैंसर) नामक रोगका नाश करती है। यह शंकरी वटी नेत्रोंके सभी रोग दूर करती है।

वच, जटामांसी, बिल्व, तगर, पद्मकेसर, नागकेसर और प्रियंगुको समान भागमें लेकर उनका चूर्ण बना लेना चाहिये। इस चूर्णका धूप लेनेसे मनुष्य रूप-सौन्दर्यसे समन्वित हो जाता है।

अर्जुन-वृक्षके फूल, भिलावा, विडंग, बला, राल, सौवीर और सरसोंके योगसे तैयार धूप सर्प, जुएँ, मक्खी तथा मच्छरोंको विनष्ट करता है।

श्रीहरिने पुनः कहा—हे शिव ! ताम्बूल, घृत, मधु तथा नमकको गोदुग्धके साथ ताम्रपात्रमें घिसकर सिद्ध किया गया अञ्जन नेत्रपीड़ाको दूर करनेका उत्तम योग है। खाँसी, श्वास तथा हिचकीका विकार होनेपर हरीतकी, वच, कूट, त्रिकटु अर्थात् विश्वा, उपकल्या, मरिच, हींग और मैनसिल-चूर्णको मधु तथा घृतमें मिलाकर चाटना चाहिये। | पिप्पली और त्रिफलाके चूर्णको मधुके साथ चाटनेसे भयंकर पीनस, खाँसी और श्वासके विकार नष्ट हो जाते हैं। हे वृषध्वज ! मूलसहित चित्रक तथा पिप्पलीके चूर्णको मधुमें मिलाकर चाटना चाहिये। यह श्वास, खाँसी और हिचकीको नष्ट कर देता है।

चावलके जलमें समान भागमें पिसा हुआ नीलकमल, शर्करा, मधु तथा रक्तकमलका योग रक्तविकारको शान्त करता है।

सोंठ, शर्करा और मधु मिलाकर बनायी गयी गुटिका खानेमात्रसे मनुष्यका स्वर कोयलके समान हो जाता है।

हरिताल, शंखचूर्ण, केलेके पत्तेका भस्म—इनका उबटन लगानेसे बाल गिर जाते हैं। लवण, हरिताल, लौकी और लाक्षारससे युक्त उबटन भी रोम गिरानेका उत्तम योग है। सुधा, हरिताल, शंखभस्म तथा मैनसिलको सेंधा नमक एवं बकरेके मूत्रमें मिलाकर पीसकर और उसी क्षण उससे उबटन करनेसे रोम गिर जाते हैं। यह उत्तम औषधि है।

शंख, आँवलेकी पत्तियाँ और धातकीके पुष्पोंको दूधके साथ पीसकर उसे डेढ़ सप्ताहतक मुखमें रखनेसे दाँत चिकने, सफेद तथा स्वच्छ और कान्तिसे युक्त हो जाते हैं। (अध्याय १७८-१८१)


भोज्य पदार्थोंका विहित सेवनकाल, बल-बुद्धिवर्धक औषधियाँ तथा विषदोषशमनके उपाय

श्रीहरिने कहा—हे रुद्र! प्रायः शरद्, ग्रीष्म और वसन्त-ऋतुमें दहीका उपभोग निन्दनीय है तथा हेमन्त, शिशिर एवं वर्षा-ऋतुमें दही प्रशस्त होता है— | शरद्ग्रीष्मवसन्तेषु प्रायशो दधि गर्हितम्।<br>हेमन्ते शिशिरे चैव वर्षासु दधि शस्यते॥<br>(१८२। १)<br>भोजन करनेके पश्चात् नवनीत (मक्खन)-के

काण्ड ] ग्रहणी, अतिसार, अग्निमान्द्य, छर्दि तथा अर्श आदि रोगोंका उपचार ३३७


साथ शर्कराका पान करना बुद्धिकारक होता है। हे शिव ! यदि पुरुष एक पल पुराना गुड़ प्रतिदिन (भोजन करनेके पश्चात्) खाता रहे तो वह बलवान् होकर अनेक स्त्रियोंसे सम्पर्क करनेकी क्षमता प्राप्त कर लेता है।

कुष्ठ (कूट)-को भलीभाँति चूर्ण करके घृत और मधुके साथ सोनेके समय खानेसे बलीपलित दूर हो जाता है। अलसी, उड़द, गेहूँ तथा पिप्पलीका चूर्ण घृतके साथ शरीरमें लगानेसे मनुष्य कामदेवके सदृश सौन्दर्यसम्पन्न हो जाता है।

यव, तिल, अश्वगन्धा, मूसली, सरला (काली तुलसी) और गुड़को परस्पर मिलाकर बनायी गयी वटी खानेसे मनुष्य तरुण तथा बलवान् हो जाता है। हींग, काला नमक और सोंठका काढ़ा बनाकर पीनेसे परिणाम नामक शूल और अजीर्ण रोग विनष्ट हो जाता है। धातकी (धवका फूल) तथा सोमराजी (औषधि) गोदुग्धके साथ पीसकर पान करनेसे दुर्बल मनुष्य भी मोटा हो जाता है। शक्ति चाहनेवाले प्राणीको शर्करा तथा मधुके साथ मक्खन खाना चाहिये। क्षयरोगसे पीड़ित व्यक्तिको दुग्धपान पुष्ट तथा बुद्धिको अत्यधिक प्रखर बना सकता है। गोदुग्धके साथ पान किया गया कुलीरका चूर्ण क्षयरोगको विनष्ट करता है।

भिलावा, विडंग, यवक्षार, सेंधा नमक, मैनसिल तथा शंखचूर्णको तेलमें पकाकर अनपेक्षित रोमसामूहोंको हटानेके लिये उसका प्रयोग करना चाहिये।

मुण्डीत्वक् (गोरखमुण्डी), वच, मोथा, काली मिर्च तथा तगरको एक साथ चबाकर मनुष्य तत्काल ही जिह्वासे अग्निको चाट सकता है। गोरोचन, भृंगराजका चूर्ण एवं घृत समान मात्रामें मिलाकर जलस्तम्भन किया जा सकता है।

हे महेश्वर! यष्टि-मधु (मुलेठी) एक पल, उष्ण जलके साथ पान करनेसे विष्टम्भिका तथा हृदयशूल नामक रोग नष्ट हो जाता है।

हे रुद्र! ‘ॐ हूं जः’ यह मन्त्र सभी प्रकारके बिच्छुओंका विष नष्ट करता है। पिप्पली, मक्खन, शृंगवेर, सेंधा नमक, कालीमिर्च, दही और कूटका नस्य लेने तथा उसका पान करनेपर वह विषदोषको दूर करता है। हे शिव ! त्रिफला, अदरक, कूट और चन्दनको घृतमें मिलाकर पान करने और लेप करनेसे बिच्छूका विष विनष्ट होता है। हे वृषभध्वज ! सेंधा नमक और त्रिकटुके चूर्णको दही, मधु तथा घृतमें मिलाकर लेप करनेसे यह बिच्छूके विषको दूर कर देता है।

हे रुद्र! ब्रह्मदण्डी और तिलका क्वाथ बनाकर उसके साथ त्रिकटु (सोंठ, पिप्पली तथा काली मिर्च) का चूर्ण पान करना चाहिये। यह सभी प्रकारके गुल्म एवं ऋतुकालीन अवरुद्ध रक्त-विकारका विनाशक है। मधु मिलाकर दूधका पान करनेसे रक्तस्रावके विकारको दूर किया जा सकता है। जंगली अडूसेकी जड़को पीसकर प्रसवकालमें स्त्रीके नाभि एवं गुह्यभागमें लेप करनेसे स्त्री सुखपूर्वक प्रसव करती है।

हे वृषध्वज ! चावलके पानीमें शर्करा और मधु मिलाकर पान करनेसे रक्तातिसार नामक रोग शान्त हो जाता है।
(अध्याय १८२)


ग्रहणी, अतिसार, अग्निमान्द्य, छर्दि तथा अर्श आदि रोगोंका उपचार

श्रीहरिने कहा— हे चन्द्रचूड! काली मिर्च, शृंगवेर और कुटजकी छालका पान करनेसे ग्रहणीरोग नष्ट होता है। पिप्पली, पिप्पलीमूल, काली मिर्च,तगर, वच, देवदारुका रस और पाठाको दूधके साथ पीसकर सेवन करनेसे निश्चित ही अतिसाररोग विनष्ट हो जाता है।

१६६- सर्प, बिच्छू तथा अन्य विषैले जीव-जन्तुओंके विषकी चिकित्सा

३३८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

काली मिर्च तथा तिलके पुष्पोंका अञ्जन कामलारोगका विनाशक है। हरीतकी और गुड़को बराबर मात्रामें मधुके साथ मिलाकर खाना चाहिये। हे रुद्र! निस्संदेह यह विरेचनकारी होता है। त्रिफला, चित्रक, चित्र, कटुकरोहिणीका योग ऊरुस्तम्भ रोगका अपहारक है और यह विरेचनकी भी उत्तम औषधि है। हरीतकी, शृंगवेर, देवदारु, चन्दन, अपामार्ग (चिचड़ा)-की जड़को बकरीके दूधमें पकाकर पान करके ऊरुस्तम्भका विनाश किया जा सकता है अथवा जयन्ती (विष्णुक्रान्ता)-की जड़का क्वाथ पीनेसे भी यह रोग सात दिनमें दूर हो जाता है।

अनन्ता (धमासा) और शृंगवेरका समान भागमें चूर्ण बनाकर बराबर मात्रामें ही गुग्गुल और गुड़ मिला ले, तदनन्तर उसकी गोलियाँ बनाकर सेवन करनेसे स्नायुगत वायुविकार तथा अग्निमान्द्य रोग विनष्ट हो जाता है।

पुष्य नक्षत्रमें डंठल एवं पत्तियों-सहित शंखपुष्पीको उखाड़कर बकरीके दूधके साथ पीनेसे अपस्मार (मिरगी)-का रोग दूर होता है। समभागमें अश्वगन्धा तथा हरीतकीके चूर्णको जलके साथ पीनेसे निश्चित ही रक्त-पित्त-विकारका विनाश होता है। हरीतकी और कूटका चूर्ण बनाकर उसको मुखमें रखना चाहिये। पश्चात् शीतल जल पीनेसे सभी प्रकारके छर्दि रोग अर्थात् वमन दूर हो जाते हैं। गुडूची, पद्मकारिष्ट और नीम, धनिया तथा रक्तचन्दन नामक औषधियोंका योग पित्तश्लेष्मक ज्वर, छर्दि, दाह और तृष्णाके विकारका विनाशक एवं अग्निवर्धक है, किंतु इन औषधियोंका प्रयोग 'ॐ हुं नमः' इस मन्त्रसे अभिमन्त्रण करनेके पश्चात् | करना चाहिये—<br>    ॐ जम्भिनी स्तम्भिनी मोहय सर्वव्याधीन् मे वज्रेण ठः ठः सर्वव्याधीन् मे वज्रेण फट्॥ (१८३। १२)<br>    उपर्युक्त मन्त्रसे अभिमन्त्रित शंखपुष्पीको कानमें बाँधनेसे ज्वरको दूर किया जा सकता है। हे रुद्र! इसी मन्त्रसे १०८ बार जप करके अभिमन्त्रित शंखपुष्पीको रोगीके हाथमें रखकर वैद्य उसके नाखूनोंका स्पर्श करे तो चौथिया ज्वर अथवा अन्य सभी प्रकारके ज्वर विनष्ट हो जाते हैं।<br>    जामुनका फल, हल्दी तथा साँपकी केंचुलका धूप सभी प्रकारके ज्वरोंका विनाशक है। यह धूप तो चौथिया ज्वरका भी विनाश कर देता है।<br>    करवीर (कनेर), भृंगराज, नमक, कूट और कर्कट (काकड़ा सींगी) नामक औषधियोंको समान भागमें लेकर चौगुने गोमूत्रके साथ तैलपाक सिद्ध करना चाहिये। इस तेलका अभ्यङ्ग पामा, विचर्चिका तथा कुष्ठरोगके व्रणोंको दूर कर देता है।<br>    हे रुद्र! पिप्पली और मधुका सेवन करने एवं मधुर भोजन करने तथा सूरणके सेवनसे प्लीहा रोग विनष्ट हो जाता है।<br>    गोमूत्रके साथ पिप्पली और हल्दीका चूर्ण मिलाकर उसको गुदाद्वारमें डालनेसे अर्श रोग दूर किया जा सकता है।<br>    बकरीका दूध और अदरखका चूर्ण मिलाकर पान करनेसे प्लीहा आदि रोग विनष्ट हो जाते हैं। सेंधा नमक, विडंग, सोमलता, सरसों, हल्दी, दारुहल्दी, विष और नीमकी पत्तीको गोमूत्रके साथ पीस लेना चाहिये। इसका लेप करनेसे कुष्ठरोगका विनाश होता है। (अध्याय १८३)

१६७- विविध स्नेह-पाकोंद्वारा रोगोंका उपचार, स्मरण तथा मेधाशक्तिवर्धक ब्राह्मीघृतादिके निर्माणकी विधि ..

काण्ड ] \hfill सिध्म, अर्श, मूत्रकृच्छ्र, अजीर्ण तथा गण्डमाला आदि रोगोंकी औषधियाँ \hfill ३३९


सिध्म, अर्श, मूत्रकृच्छ्र, अजीर्ण तथा गण्डमाला आदि रोगोंकी औषधियाँ

श्रीहरिने कहा—[हे चन्द्रचूड़] हल्दी और केलेके क्षारका लेप सिध्मरोगका विनाशक है। एक भाग कूट तथा दो भाग हरीतिकीका चूर्ण उष्ण जलके साथ पान करनेसे कमरका शूल रोग दूर हो जाता है। हरीतिकी, शर्करा और पिप्पलीका चूर्ण नवनीतके साथ सेवन करनेसे वह अर्श-रोगका विनाश करता है। जंगली अडूसेके पत्तोंको घीमें मन्द-मन्द आँचपर पकाकर उसका लेप करना अर्शरोग दूर करनेकी श्रेष्ठतम औषधि है।

गुग्गुल और त्रिफलाका चूर्ण पानकर भगंदर रोगको विनष्ट किया जा सकता है। जीरा, अदरक, दही तथा चावलके माँड़को अग्निमें पकाकर नमकके साथ सेवन करना चाहिये। इससे मूत्रकृच्छ्र नामक रोग दूर होता है। यवक्षार तथा शर्करा भी मूत्रकृच्छ्र-रोगको दूर करता है।

तिलके तेलमें यवको जलाकर उसकी कज्जली बनानी चाहिये। उसके बाद तिलके ही तेलमें उसको मिलाकर अग्निसे जले हुए स्थानपर लेप करनेसे लाभ होता है। घीके सहित लाजवन्ती तथा शरपुंखाकी पत्तियोंका तैयार किया गया लेप भी अग्निजन्य पीड़ाको दूर करता है। निम्न मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके इस लेपका प्रयोग करना चाहिये—

ॐ नमो भगवते ठ ठ छिन्धि छिन्धि ज्वलनं प्रज्वलितं नाशय नाशय हुं फट्॥ (१८४।८)

हाथमें निर्गुण्डीकी जड़ बाँधनेसे ज्वर बहुत ही शीघ्र दूर हो जाता है। श्वेत गुञ्जाफलको सात खण्ड बनाकर उसको हाथमें बाँध लेनेसे अर्श रोग निश्चित ही विनष्ट हो जाता है। विष्णुक्रान्ता (अपराजिता) तथा बकरीके मूत्रका प्रयोग करके चोर और व्याघ्रादि हिंसक जीवोंके प्रहारसे प्राणी अपनी रक्षा कर सकता है। ब्रह्मदण्डीकी जड़ तो सभी कर्मोंमें सिद्धि प्रदान करनेवाली है।

घृतके साथ सिद्ध त्रिफलाका चूर्ण कुष्ठविनाशक है। पुनर्नवा, बिल्व और पिप्पलीके चूर्णसे सिद्ध घृतके द्वारा हिचकी, श्वास तथा खाँसीको दूर किया जा सकता है। इस घृतका पान स्त्रियोंके लिये गर्भकारक होता है।

दूध और घीके साथ वानरी बीज (केवाँच)-को पकाकर घी तथा शर्करामें मिलाकर सेवन करनेसे वीर्य कभी नष्ट नहीं होता।

मधु, घृत तथा दुग्धका पान बलीपलित नामक रोगको दूर करता है।

हे शिव! मधु, घृत, गुड़, करेलेका रस और ताँबेको एक साथ अग्निमें पकानेपर चाँदी बन जाता है। अब आप सोना बनानेकी विधि सुनें।

पीले धतूराका पुष्प और सीसा एक पल तथा लाङ्गलिका (करियारी)-की शाखाको एक साथ मिलाकर अग्निमें पकानेपर सोना बन जाता है।

हे हर! धत्तूरके बीजोंसे निकाले गये तेलद्वारा प्रज्वलित दीपकके प्रकाशमें समाधिस्थ व्यक्तिको देवता भी नहीं देख पाते।

हे शिव! मनुष्यको मदमस्त हाथीके दोनों नेत्रोंमें अपने हाथसे काजल लगाना चाहिये। ऐसा करनेपर वह व्यक्ति युद्धमें विजय प्राप्त करता है और महाबलवान् भी बन जाता है।

डुण्डुभ नामक सर्पके दाँतको मुखमें रखकर मनुष्य जलके बीच भी पृथ्वीके समान ही किसी अन्य विकल्पका आश्रय लिये बिना रह सकता है।

लौहचूर्ण और मट्ठा पान करनेसे पाण्डुरोगका शमन हो जाता है। तण्डुलीयक (चौलाई) तथा

३४०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

गोखरूकी जड़को दूधमें मिलाकर पान करनेसे कामला एवं मुखरोगका विनाश होता है। चमेली और बेरकी जड़को मट्ठेके साथ पीनेसे अजीर्ण रोग दूर होता है।

कुशकी जड़, वानरीमूल, वकुची तथा कांजीका मिश्रित योग दाँतोंके रोगका विनाशक है। इन्द्रवारुणीकी जड़को जलके साथ पीनेसे विषादि-दोष नष्ट होते हैं। हे शिव! चम्पाकी जड़को पान करनेसे भी उक्त दोष दूर हो सकते हैं। कांजीके साथ गुञ्जा (घुँघची)-का चूर्ण मस्तकपर लेप करनेसे सिरका रोग विनष्ट हो जाता है।

बला, अतिबला, मधुयष्टि, शर्करा तथा मधुका पान करके वंध्या स्त्री गर्भ-धारण करनेमें समर्थ हो जाती है। इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।

श्वेत अपराजिताकी जड़, पिप्पली और सोंठका पिसा हुआ लेप सिरमें लगानेसे शूल नष्ट हो जाता है। निर्गुण्डीकी फुनगीको पीसकर पान करनेसे गण्डमाला नामक रोग दूर हो जाता है।

केतकीके पत्तोंका क्षार गुड़के साथ अथवा मट्ठेके साथ शरपुंखाका सेवन करनेसे प्लीहा रोग विनष्ट हो जाता है।

बिजौरा नीबूका निर्यास (गोंद), गुड़ और घीके साथ मिलाकर पान करनेसे वात-पित्तजनित शूल दूर होता है। सोंठ, काला नमक तथा हींगका पान हृदयरोगका विनाशक है। (अध्याय १८४)


गणपतिमन्त्रका औषधिक योग तथा शोथ, अजीर्ण, विसूचिका और पीनस आदि विविध रोगोंके उपचार

श्रीहरिने कहा— हे रुद्र! 'ॐ गं गणपतये नमः' भगवान् गणेशका यह मन्त्र धन और विद्या प्रदान करनेवाला है। इस मन्त्रका एक हजार आठ बार जप करनेके बाद अपनी शिखाको बाँधनेवाला व्यक्ति वाद-विवादके व्यवहारमें विजय प्राप्त करता है। एक सौ बार इस मन्त्रका जप करनेवाला प्राणी अन्य लोगोंका प्रिय बन जाता है।

काले तिलोंको घृतमें मिलाकर इस मन्त्रसे एक हजार आठ आहुतियाँ देनेसे मात्र तीन दिनमें राजा वशमें हो जाता है। अष्टमी और चतुर्दशी तिथिको उपवास रखकर मनुष्य यदि विधिवत् विघ्नराज गणेशका पूजन करे और तिल तथा अक्षतको मिलाकर एक हजार आठ बार उन्हें आहुति प्रदान करे तो वह युद्धमें अपराजित होता है और सभी लोग उसकी सेवा करते हैं। उपर्युक्त मन्त्रका एक हजार आठ अथवा एक सौ आठ बार जप करके अपनी शिखा बाँधनेवाला प्राणी राजकुल तथा वाद-विवादके व्यवहारमें विजय प्राप्त करता है।

भृंगराज, सहदेवी (सहदेई), वचा (वच) और श्वेत अपराजिता नामक औषधियोंके रसका तिलक करके मनुष्य तीनों लोक वशमें कर सकता है।

काकजंघाका मूल और दूधका मिश्रित पान शोथ रोगका विनाशक है।

अश्वगन्धा, नागबला, गुड़ तथा उड़द मिलाकर खानेवाला पुरुष वैसे ही रूप-सौन्दर्यसे युक्त हो जाता है, जैसे नवयुवकोंका सौन्दर्य होता है।

हे रुद्र! लौहचूर्ण और त्रिफलाचूर्णका मधुके साथ प्रयोग करनेसे परिणाम नामक शूलका विनाश होता है। हे वृषध्वज! हींग, काला नमक और सोंठ—इन औषधियोंके क्वाथका पान सभी प्रकारके शूलोंका अपहारक है। सामुद्रलवणसे युक्त अपामार्गकी जड़का सेवन करनेसे अजीर्ण-शूल नष्ट हो जाता है।

काण्ड ] प्रमेह, मूत्रनिरोध, शर्करा, गण्डमाला, भगंदर तथा अर्श आदि रोगोंका निदान ३४१


हे रुद्र! बरगदकी जटाओंका अंकुर चावलके जलमें घिसकर मट्ठेके साथ पीनेसे अतिसार रोग दूर होता है। अंकोट (अंकोल)-की जड़को आधा कर्ष लेकर चावलके जलमें पीसकर पान करनेसे सभी प्रकारके अतिसार तथा ग्रहणी नामक रोगोंका विनाश होता है। काली मिर्च एक भाग, सोंठ दो भाग तथा कुटजकी छालका चूर्ण चार भाग गुड़में मिलाकर काढ़ा बनाकर पीनेसे ग्रहणी नामक रोग दूर होता है। हे शिव! श्वेत अपराजिताकी जड़, हल्दी, सिक्थ, चावल, अपामार्ग (चिचड़ा) और त्रिकटु (काली मिर्च, सोंठ एवं पिप्पली) नामक इन औषधियोंको पीसकर वटी बना लेना चाहिये। यह वटी निस्संदेह विषूचिका नामक रोगका विनाश करती है।

हे भूतेश! त्रिफला, अगरु, शिलाजीत और हरीतकीको समान भागमें लेकर इनके मिश्रित चूर्णको मधुके साथ मिलाकर सेवन करनेसे सभी प्रकारके प्रमेह रोग नष्ट हो जाते हैं।

मदारका दूध एक प्रस्थ अर्थात् चार सेर, तिलका तेल एक प्रस्थ अर्थात् चार सेर, मैनसिल, काली मिर्च तथा सिन्दूर एक-एक पल अर्थात् आठ-आठ तोलेका चूर्ण बनाकर ताँबेके पात्रमें रखकर उसको धूपमें सुखा ले। स्नुही (थूहड़—सेहुँड़)-का दूध और सेंधा नमक मिलाकर इसका सेवन करे तो शूल रोग दूर हो जाता है।

त्रिकटु (काली मिर्च, सोंठ तथा पिप्पली), त्रिफला, नक्त (कंजा), तिलका तेल, मैनसिल, नीमकी पत्ती, चमेलीका पुष्प, बकरीका दूध, बकरीका मूत्र, शंखनाभि और चन्दनको एकमें ही घिसकर बनायी गयी बत्तीसे नेत्रोंमें अञ्जन लगानेसे पटल, काच, पुष्प तथा तिमिर आदि रोग दूर हो जाते हैं।

मधुसे युक्त बहेड़ेका चूर्ण श्वास रोगका विनाशक होता है। मधु तथा सेंधा नमकसे मिश्रित पिप्पली और त्रिफलाका चूर्ण सभी प्रकारके रोगोंसे उत्पन्न होनेवाले ज्वर, श्वास, शोथ तथा पीनसके विकारको दूर करता है।

देवदारु-वृक्षकी छालके चूर्णको इक्कीस बार बकरीके मूत्रसे भावना देकर सिद्ध करना चाहिये। इसका अञ्जन करनेसे रतौंधी, पटलत्ता और रोमपतन नामक रोग दूर हो जाते हैं।

हे रुद्र! पिप्पली, केतकी, हल्दी, आँवला तथा वचा (वच)-को दूधके साथ पीसकर अञ्जन बनाना चाहिये। इस अञ्जनके प्रयोगसे नेत्रोंके सभी रोग विनष्ट हो जाते हैं।

हे शिव! काकजंघा तथा सहिजनकी जड़को मुखमें रखने या चबानेसे दाँतोंमें लगे हुए कीड़ोंका निश्चित ही विनाश होता है। (अध्याय १८५)


प्रमेह, मूत्रनिरोध, शर्करा, गण्डमाला, भगंदर तथा अर्श आदि रोगोंका निदान

**श्रीहरिने कहा—**हे शिव! मधुके साथ गुडूचीका रस पीनेसे प्रमेह रोग विनष्ट हो जाता है। गोहालिका (जलपिप्पली)-की जड़को तिल, दही तथा घीके साथ पान करनेसे यह वस्तिभागमें अवरुद्ध मूत्रको बाहर करता है। काले नमकके साथ इस जड़का पान करनेसे हिचकी रोग भी दूर हो जाता है। गोरक्ष अर्थात् गोरखमुण्डी तथा कर्कटी (ककड़ी)-की जड़को शीतल जलके साथ पीसकर तीन दिन पीनेसे ही शर्करा नामक रोग नष्ट हो जाता है। ग्रीष्मकालमें मालतीकी जड़को भलीभाँति पीसकर

द्रव्य तथा औषध-सेवनमें भगवान् विष्णुके स्मरणकी महिमा

३४२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-


शर्करा और बकरीके दूधमें पीनेसे मूत्रनिरोध, शर्करा-विकार और पाण्डु रोग विनष्ट हो जाता है।

ब्रह्मयष्टी अर्थात् ब्राह्मीकी जड़को चावलके पानीमें घिसकर तैयार किया गया लेप असाध्य गण्डमाला तथा गलगण्डक रोगको दूर करता है। हे रुद्र! करवीर (कनेर)-की जड़का लेप तथा सुपारीका लेप भी पुरुषत्वसे सम्बन्धित विकारको नष्ट करता है। अब मैं अन्य औषधिक योगोंको कहता हूँ।

दन्तीमूल, हल्दी और चित्रकके लेपसे भगंदर रोग विनष्ट होता है। हे उमापते! हे वृषभध्वज! स्नुही (थूहड़—सेहुँड)-के दूधसे अनेक बार भावित हल्दीकी वटीका लेप अर्श रोगको दूर करता है। घोषाफल और सेंधा नमकको पीसकर बनाया गया लेप अर्श रोगको नष्ट करनेका श्रेष्ठतम योग है। हे शिव! पलाश और क्षारसे बने क्वाथके द्वारा शोधित घृतपाकमें तिगुना मिला हुआ त्रिकटु (काली मिर्च, सोंठ और पिप्पली)-का चूर्ण अर्श रोगको विनष्ट करता है। बेलके फलको भूनकर खानेसे खूनी अर्श विनष्ट होता है। मक्खनके साथ काला तिल खानेसे भी खूनी अर्श रोग नष्ट होता है।

हे वृषभध्वज! प्रातःकाल यवक्षार-मिश्रित सोंठके चूर्णको समान मात्रामें गुड़ मिलाकर खानेसे वह जठराग्निकी वृद्धि करता है। सोंठके चूर्णको काढ़ा बनाकर पान करनेसे भी जठराग्निकी वृद्धि होती है। हे रुद्र! हरीतकी, सेंधा नमक, पिप्पली—इन औषधियोंके चूर्णको गरम जलके साथ मिलाकर पान करनेसे भूख बढ़ती है तथा शूकरकन्दका रस घृतके साथ पान करनेसे अति क्षुधा बढ़ती है।

(अध्याय १८६)


आयुर्वृद्धिकारी औषधिके सेवनकी विधि

श्रीहरिने कहा— हे शिव! हे वृषभध्वज! हे रुद्र! यदि मनुष्य हस्तिकर्ण पलाशके पत्तोंका चूर्ण करके सौ पलकी मात्रामें इस चूर्णको दूधके साथ मिलाकर लगातार सात दिनोंतक प्रयोग करे तो वह वेदविद्याविशारद, सिंहके समान पराक्रमी, पद्मरागके समान कान्तियुक्त तथा सौ वर्षकी आयुमें भी सोलह वर्षका नवयुवक बन सकता है, किंतु सतत दुग्धपान करना अत्यावश्यक है।

हे शिव! मधु और घृतसे युक्त दूधका सेवन आयुवर्धक होता है। उक्त हस्तिकर्ण पलाशके चूर्णको मधुके साथ लेनेसे प्राणी दस हजार वर्षकी आयु प्राप्त कर सकता है। यह योग मनुष्यको वेदवेदाङ्गका ज्ञाता और प्रमदा-जनोंका प्रिय बनानेमें समर्थ है। इस चूर्णका सेवन दहीके साथ करनेसे शरीर वज्रके समान शक्तिसम्पन्न हो जाता है। केशरसे युक्त इस चूर्णका प्रयोग करनेसे मनुष्य हजार वर्षकी आयु प्राप्त करता है। यदि मनुष्य इस चूर्णको कांजीके साथ मिलाकर खाता है तो केशोंकी सफेदी और त्वचाकी झुर्रियोंसे रहित होकर सौ वर्षतक वृद्धावस्थासे रहित दिव्य शरीर प्राप्त करता है।

हे वृषभध्वज! त्रिफला चूर्णके साथ मधुका सेवन नेत्रज्योतिको बढ़ाता है। घीके साथ इस चूर्णको खानेसे अंधा व्यक्ति भी देख सकता है। भैंसके दूधमें मिलाकर तैयार किया गया इस चूर्णका लेप प्राणीके श्वेत बालोंको काला बना देता है। खल्वाटके बाल भी इस लेपके प्रयोगसे निकल आते हैं। इस चूर्णको तेलमें मिलाकर शरीरमें लगानेसे बाल पकनेका प्रभाव तथा त्वचाकी झुर्रियोंका प्रकोप समाप्त हो जाता है।

इस चूर्णका मात्र उबटन लगानेसे सभी रोग दूर हो जाते हैं। बकरीके दूधमें मिलाकर इस चूर्णका

काण्ड ] व्रण आदि रोगोंकी चिकित्सा ३४३


अञ्जन एक मास-पर्यन्त नेत्रोंमें लगानेसे निर्बल दृष्टि सबल हो जाती है।

श्रावणमासमें छिलकेसे रहित पलाशके बीजोंको लेकर उनका चूर्ण मक्खनके साथ आधे कर्षकी मात्रामें खाना चाहिये। भगवान् हरिको नित्य प्रणाम करके इस चूर्णका सेवन करना चाहिये। हे हर! इसके सेवनके पश्चात् जल पीते हुए पुराने साठी चावलका भात पथ्य है। इस योगका पालन करनेवाला व्यक्ति वृद्धावस्थासे रहित होकर एक हजार वर्षतक जीवित रह सकता है।

पुष्यनक्षत्रमें भृंगराजकी जड़को लाकर उसका चूर्ण बनाना चाहिये। यदि प्राणी कांजीके साथ उस चूर्णका सेवन करे तो मात्र एक मासमें वह बलीपलित रोगसे रहित हो जाता है। इसका बराबर प्रयोग करनेसे मनुष्य पाँच सौ वर्षतक जीवित रह सकता है और वह हाथीके समान शक्तिसम्पन्न हो जाता है। हे रुद्र! पुष्यनक्षत्रमें ही इस औषधिका प्रयोग करनेपर प्राणी श्रुतिधर अर्थात् वेद-वेदाङ्गका ज्ञाता बन जाता है।

(अध्याय १८७)


व्रण आदि रोगोंकी चिकित्सा

श्रीहरिने कहा— हे रुद्र! प्रहारसे हुआ घाव और मवादयुक्त फोड़ा घीके प्रयोगसे ठीक हो जाता है। दोनों हाथोंसे अपामार्गकी जड़ मलकर उसके रससे चोटके घावको भरनेपर रक्तस्राव रुक जाता है। हे शंकर! लाङ्गलिका मूल तथा इक्षुदर्भ नामक औषधिको पीसकर उसके लेपसे शल्य-काँटायुक्त व्रणका मुख संलिप्त करनेपर काँटा निकल जाता है तथा बहुत दिनोंका गड़ा हुआ भी काँटा घावसे बाहर हो जाता है।

नाड़ीके घावमें बालमूल (मोथा)-की जड़को अथवा मेषशृङ्गी (मेढ़ासिंगी)-की जड़ जलमें घिसकर उसका लेप लगानेसे पुराना घाव भी सूख जाता है। भैंसके दहीमें कोदोका भात मिलाकर खानेसे और हींगकी जड़का चूर्ण घावमें भरनेसे भी नाड़ीका व्रण सूख जाता है।

ब्राह्मीके फलको जलके साथ पीसकर और रगड़कर लेप करनेसे रक्तदोष शान्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं।

हे शंकर! सहिजनका बीज, अलसी और सफेद सरसोंको अम्लरहित मट्ठेमें पीसकर उसका लेप ग्रन्थिक रोगपर लगानेसे वह रोग निश्चित ही नष्ट हो जाता है। श्वेत अपराजिताकी जड़ चावलकी धोवनमें पीसकर उसका नस्य लेनेसे भूत भाग जाते हैं।

हे शिव! काली मिर्चके साथ अगस्त्य-पुष्पके रसका नस्य शूल रोगका विनाशक है। साँपकी केंचुल, हींग, नीमकी पत्ती, यव तथा सफेद सरसों लेकर इनका लेप करनेसे भूत-प्रेतकी बाधा दूर हो जाती है। हे शिव! गोरोचन, मरिच, पिप्पली, सेंधा नमक और मधु—इन सभीका अञ्जन बनाकर आँखमें आँजनेसे प्रेतबाधा दूर हो जाती है। गुग्गुलकी धूप ग्रह-बाधाका नाशक है। काले वस्त्रको ओढ़नेसे चौथिया ज्वर दूर हो जाता है।

(अध्याय १८८)

१७०- सर्वकामप्रदा विद्या

३४४संक्षिप्त गरुड़पुराण[ आचार-

पटल आदि नेत्ररोग, गुल्म, दन्तकृमि, विविध ज्वर तथा विषदोष-शमनके उपाय

श्रीहरिने कहा— हे नीललोहित! श्वेत अपराजिता-पुष्पके रसको नेत्रोंमें डालनेसे पटल नामक नेत्ररोग नष्ट हो जाता है। इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। हे सुरासुरविमर्दन शिव! गोखरूकी जड़ चबाकर दाँतोंमें लगे हुए कीटोंकी व्यथाको दूर किया जा सकता है।

यदि ऋतुकालमें उपवासपूर्वक स्त्री गोदुग्धके साथ मन्दारवृक्षकी जड़को पीसकर पान करती है तो उसके शरीरमें होनेवाला गुल्म और शूलविकार विनष्ट हो जाता है।

हे हर! पलाश अथवा अपामार्गकी जड़ हाथमें बाँधनेपर सभी प्रकारके ज्वरोंका विनाश होता है तथा भूत-प्रेत आदिके द्वारा उत्पन्न होनेवाला कष्ट भी नहीं होता। हे परमेश्वर! वृश्चिकमूल अर्थात् बिछिया-वृक्षकी जड़को बासी जलके साथ पीसकर प्रातःकाल सेवन करनेसे दाहज्वर दूर किया जा सकता है। इसकी जड़को शिखामें बाँधनेसे एकाहिक आदि जो ज्वर हैं, वे भी विनष्ट हो जाते हैं। उस जड़को बासी जलके साथ पीसकर पीनेसे सभी प्रकारका विषदोष विनष्ट हो जाता है।

जो मनुष्य पाढ़ा (पाठा)-की जड़को पीसकर गोघृतके साथ पान करता है, उसका सभी प्रकारका विषदोष दूर हो जाता है। रक्तवर्णवाले चित्रक वृक्षकी जड़को पीसकर कानोंमें डालनेसे कामला रोग विनष्ट हो जाता है, इसमें शंका नहीं है।

श्वेत कोकिलाक्ष (श्वेत तालमखाना)-की जड़को पीसकर बकरीके दूधमें तीन सप्ताहतक पान करनेसे क्षय रोग विनष्ट हो जाता है। नारियल-वृक्षके पुष्पको बकरीके दूधमें मिलाकर पान करनेसे तीनों प्रकारका रक्तवात-विकार नष्ट हो जाता है।

सुदर्शन-वृक्षकी जड़को मालाके मध्य पिरोकर कण्ठमें धारण करनेसे त्र्याहिक (तिजरिया) आदि ज्वर तथा ग्रह एवं भूतादिक व्याधियाँ विनष्ट हो जाती हैं।

हे रुद्र! श्वेत गुञ्जा-वृक्षके पुष्प तथा मूलको लेकर अपने मुखमें रखनेसे नाना प्रकारके विषोंका विनाश हो जाता है। इस औषधिकी जड़को हाथ और कण्ठमें धारण करनेपर ग्रहादिक दोष दूर होता है। हे नीललोहित! कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको लायी गयी इस औषधिकी जड़को कटिप्रदेशमें बाँधकर सिंह आदि हिंसक पशुओंके भयको दूर किया जा सकता है।

हे ईश! विष्णुकान्ता (अपराजिता)-की जड़को रेशमी सूतमें बाँधकर कानमें धारण करनेसे मगरमच्छादिक जन्तुओंका भय नहीं रहता।

(अध्याय १८९)


गण्डमाला, प्लीहा, विद्रधि, कुष्ठ, दद्रु, सिध्म, पीनस तथा छर्दि आदि विविध रोगोंका उपचार और सुगन्धित द्रव्योंके निर्माणकी विधि

श्रीहरिने कहा— हे ईश्वर! गोमूत्रके साथ अपराजिताकी जड़ पीनेसे गण्डमाला रोग शीघ्र ही नष्ट हो जाता है, इसमें संशय नहीं है। इन्द्रवारुणीकी भी जड़ पीनेसे इस रोगका विनाश होता है। जिङ्गणी (मंजीठ), एरण्ड तथा शूकशिम्बी (केवाँच)-को मिलाकर शीतल जलयुक्त लेप लगानेसे भुजाओंमें