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गुरुकुल शिक्षा: भारत-पुनर्निर्माण

Gurukul Shiksha: Bharat Punarnirman

राजीव दीक्षित / रोबिन सिराना द्वारा

स्रोत: Swadeshi Shiksha Series · Swadeshi Robin Sirana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

दो व्यक्ति भारत की एक भाषा जानते हों और इस पर भी उनमें से कोई दूसरे को अंग्रेजी में पत्र लिखे ये एक-दूसरे से अंग्रेजी में बोले तो उसे कम से कम छः महीने की सख्त सजा दी जाएगी।।

-गांधी जी

(‘स्वभाषा लाओ, अंग्रेजी हटाओ’ पुस्तक से साभार)

जो शिक्षा हमें अच्छे-बुरे का भेद करना और अच्छे को ग्रहण करना तथा बुरे का त्याग करना नहीं सिखाती, वह शिक्षा सच्ची शिक्षा नहीं है।

-गांधी जी

जब मैं राष्ट्रपति बनकर यहाँ आया तो हिंदी, उर्दू और गुरुमुखी के अखबार पढ़ने की इच्छा हुई, लेकिन ये अखबार मुझे नहीं मिले। मुझसे यह कहा गया कि राष्ट्रपति भवन में केवल अंग्रेजी के अखबार आते हैं। मुझे बहुत तकलीफ हुई। आजाद भारत में राष्ट्रपति भवन में जब भारतीय भाषाओं का कोई स्थान नहीं तो देश की एकता कैसे रह सकती है?

-पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह

कम पढ़े तो गाँव छोड़ दे, ज्यादा पढ़े तो देश छोड़ दे।

अमेरिका से लौटते समय पत्रकारों ने स्वामी विवेकानंद से पूछा- ‘अमेरिका की अमीरी देखने के बाद गरीबी से त्रस्त भारत के बारे में आप क्या सोचते हैं?’ स्वामीजी का जवाब इतिहास में अंकित हो गया – ‘अब तक मैं अपने देश की इज्जत करता था, लेकिन अब पूजा करूँगा।

गुरुकुल की शिक्षा जीवन-विज्ञान से जुड़ी थी। या यूं कहें कि मात्र जीवन का वैज्ञानिक स्वरूप ही विद्यार्थियों को सिखाया जाता

था। राजपुत्रों से लेकर सामान्य परिवारों की संतानों के साथ प्रशिक्षण और अनुशासन पालन में कोई भेदभाव नहीं होता था। राजपुत्रों से लेकर सामान्य परिवारों की संतानों के साथ प्रशिक्षण और अनुशासन पालन में कोई भेदभाव नहीं होता था। खेती करना, गाय पालना, अपना भोजन स्वयं तैयार करना, जंगलों से लकड़ियाँ काट कर लाना, कुटिया लीपना या धोती-दुपट्टा पहन कर नंगे पैर घूमना, सूर्य नमस्कार करना, शिक्षा की बुनियादी बातें थीं। इस शिक्षा ने अभिमन्यु, लव-कुश, श्रवणकुमार और चाणक्य पैदा किए। महावीर और गौतमबुद्ध दिए। विवेकानंद और दयानंद सरस्वती बनाए।

आज तो यह हाल है कि जो कम पढ़ लिख लेता है, वह गाँव छोड़ देता है, ज्यादा पढ़-लिख लेता है, वह देश छोड़ देता है।

आज का लाड़ला बच्चा.....

पहले समय पर उठते थे, बड़ों को नमन करते थे। मुख से राम-राम कहते थे, पढ़ते भी थे और खेतों खलियानों और घरों में खट के काम करते थे। समय पर खाते थे, खेलते थे और समय पर आराम करते थे। अब उठते हैं देर से उठते ही शिकवे करते हैं ढेर से।

‘प्रणाम’ की जगह ‘हाय’ और ‘गुडमोर्निंग’ कहते हैं। आंखे मसलते उबासी लेते, बिना मुंह धोये ही रामू को जोर से चिल्लाकर चाय का आर्डर देते हैं काम करना तो हीनता है, अखबार के पन्ने पलटते पलटते कितने घंटे बीत गए गिनता है। फिर दोस्तो से बातें करने फोन की लार्डिन मिलाएँ स्कूल से ही कौन सी पिक्चर जाएं फिर कौन से होटल में खाएं कहाँ-कहाँ घूमने जाएँ। मार्केट से क्या-क्या खरीद कर लाएँ, इन्हीं सब कामों की सूची बनाएं। जब इस तरह की दिनचर्या में पलता है भारत का भावी कर्णधार भारत का होनहार आज का लाडला बच्चा। तो इस पीढ़ी की जब निकलेगी जमात जिससे बनेगा भावी भारत का समाज देश कितना करेगा तरक्की सोचकर सिंहल जाता हूँ।

हे भगवान्! इनको कहीं पीसने न पड़े फिर किसी फ़िरंगी की चक्की। मेरा दर्द कह उठता है। वतन को फिर कहीं गिरवी न राख देना नादानों! शहीदों ने बड़ी मुश्किल से ये कर्ज चुकाए हैं, अपनी जिंदगी के चिराग बुझा कर हमारे घरों के दीप जलाए हैं।

सुराज्य के महाअभियान में शामिल होइए

यह एक प्रमाणित तथ्य है कि कुछ सौ वर्ष पूर्व यह देश संसार का शिरमोर था। कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, साहित्य, संगीत, कला, तकनीक, अर्थव्यवस्था, प्रशासन आदि सभी दृष्टिओं से हम अग्रणी थे। इस देश की सम्पूर्ण धरोहर को विदेशी आक्रांताओं द्वारा बार-बार बुरी तरह रौंद दिये जाने की भरसक कोशिशों के बाद भी महारौली का सीना ताने खड़ा बिना जंग लगा लौह स्तंभ, देश के कोने-कोने में बिखरे पड़े वास्तु कला के उत्कृष्ट नमूने, चरक-सुश्रुत में वर्णित आधुनिक चिकित्सा विज्ञान को भी चुनौती देने वाला शल्य-क्रिया विज्ञान, आज भी जहाँ-तहाँ दिख जाने वाला लोककलाओं का अद्भुत संसार, ढाका के मलमल सरीखे वस्त्रों की बानगी- आदि अनगिनत ऐतिहासिक-तथ्य अगर आज भी अपनी गौरवगाथा सुनाते दिख रहे हैं, तो कल्पना कीजिए कि विदेशी आक्रमणों से पूर्व भारत का अतीत कितना वैभवशाली रहा होगा।

हॉर्न धीरे बजाएं देश सो रहा है

लेकिन वर्तमान स्थिति यह है कि विदेशी लुटेरों के चलते महादानीयों का यह देश भिखारी बन चुका है। खास बात यह है कि लूट के लंबे इतिहास में भी हमारी सबसे ज्यादा लूट अंग्रेजों ने की। अंग्रेजों की गुलामी के दौर में सम्पत्ति-संसाधनों के साथ-साथ हमारी संस्कृति को भी तबाह करने की साजिश रची गई। अपने साम्राज्य की जड़ें मजबूत करने के लिए अंग्रेजों ने भारत की सारी व्यवस्थाओं को ही अपने अनुसार बदलने की मुहिम चलाई। इस मुहिम में वे काफी हद तक सफल भी रहें। अगर कुछ कसर बाकी रह गया था, तो आजादी के बाद अंग्रेजों के मानसपुत्रों ने आजादी के दीवानों के लाखों बलिदानों को बेमानी बना दिया हो।

कटु सत्य यह है कि हम आजादी के भ्रम में जी रहे हैं। अंग्रेज चाहते थे कि हम मानसिक रूप से गुलाम हो जाएँ, तो उन्हें बंदूकों-तोपों की भाषा न बोलनी पड़े, सो अब वही हो गया है। हमारा शासन-प्रशासन और विकास का संपूर्ण ढाँचा अब भी लगभग जस-का-तस है। इसी का नतीजा है कि आज हम कहीं ज्यादा बड़ी लूट के शिकार हो रहे हैं। जब हम एक ईस्ट इंडिया कंपनी की जेब अनिच्छा के बावजूद अंग्रेजी कोड़ों-बंदूकों के डर से भरते थे, पर अब मानसिक गुलामी के वशीभूत हम हजारों बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जेब स्वेच्छा से भर रहे हैं।

देश लगातार कंगाल हो रहा है और नतीजे के रूप में बेरोजगारी भुखमरी का भयावह दृश्य सामने है। विकास के पश्चिमी तौर-तरीके के

चलते संस्कृति का संकट भी अब भयानक रूप में दिखने लगा है। हिंसा, भ्रष्टाचार, बलात्कार, देश-समाज के प्रति संवेदनहीनता जैसी ढेरों समस्याएँ इसी की अनिवार्य परिणतियाँ हैं।

सवाल यह है कि क्या इस देश के वजूद को तिल-तिल कर समाप्त होते हुए हम देखते रहेंगे?

संसाधनों के अकूत भंडार से समृद्ध भारत की धरती पर रहते हुए और मेहनत कश होते हुए भी क्या इस देश की एक बड़ी आबादी फुटपाथों पर जिंदगी गुजारने और भूख से पेट मरोड़ने को ही हमेशा अभिशास रहेगी? ऋषि-मुनिओं के इस देश में क्या अब माइकल जैक्सनों और मेडोनाओं के कार्टून ही तैयार होते रहेंगे?

अगर आप देश की इस वर्तमान दिशा और दशा से संतुष्ट हैं तो हमें आपसे कुछ नहीं कहना है। लेकिन यदि आप भी हमारी तरह चाहते हैं कि यह राष्ट्र स्वावलम्बी बनें, यहाँ का समाज खुशहाल हो, हर तरफ अमन-चैन हो, दया-करुणा-ईमानदारी-संयम का सांस्कृतिक प्रवाह इस देश में फिर कायम हो, तो हमें आपकी जरूरत है। हमारी अपील है कि आप भी सच्चे सुराज्य के लिए चल रहे इस महायज्ञ में शामिल होइए।

यदि भारत की अर्थव्यवस्था, कृषि-व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य-व्यवस्था तथा न्याय-व्यवस्था का सम्पूर्ण स्वदेशीकरण हो जाए तो यह देश स्वावलंबी बन जाएगा, बेरोजगारी की समस्या नहीं रहेगी और सच्चे अर्थों में हमें स्वराज्य प्राप्त होगा। इस देश के विकास का ढाँचा, इस देश के सांस्कृतिक मूल्योंं भौगोलिक परिस्थितियों, संसाधनों और यहाँ की जनता की समझ व जरूरतों को ध्यान में रखकर ही बनाय जाना चाहिए, तभी अनगिनत समस्याओं से मुक्ति मिल पाएगी और एक बार फिर हम दुनिया के मार्गदर्शक की भूमिका में आ सकेंगे।

जिनमें अकेले चलने के हौंसले होते हैं, उनके पीछे एक दिन काफिले होते हैं।

हम जो इंजीनियरिंग करते हैं, ये अंग्रेजों का बनाया पाठ्यक्रम है, ताकि अंग्रेज अपने लिए इंजीनियर तैयार कर सके, और हम भी उनके के लिए काम करते हैं, ज्यादातर इंजीनियर या तो देश के बाहर काम करता है, या फिर देश के अन्दर विदेशी कम्पनी में जिसे हम मल्टीनेशनल कम्पनी कहते हैं, हमारे देश में सन् 1200 से इंजीनियरिंग चली आ रही है, जब 18 विषय होते थे, ये बात कोई नहीं जानता क्योंकि अंग्रेजों ने हमारे सारे दास्तावेज जला दिये थे। हमारे भारत में सबसे कम खर्चे पर इंजीनियर तैयार हो जाते हैं, इसलिए अमेरिका और यूरोप वाले भारत में अपने लिए इंजीनियर तैयार करते हैं, और उनका ऐसा ही पाठ्यक्रम पढ़ाते हैं जो उनके देश के काम आ सके, यह पाठ्यक्रम कभी भी भारत के लिए काम नहीं आ सकता। इसलिए हमारी मानसिकता ऐसी बन जाती है कि हम या तो विदेश में जाकर काम करते हैं या फिर अपने देश में बहुराष्ट्रीय कम्पनी में। अमेरिका और यूरोप वालों का कहना है की भारतीयों को सबसे कम आय पर सबसे अच्छी सर्विस देते हैं, वे तो बस डॉलर में सैलरी सुनते हैं खुश हो जाते हैं।

A black and white line drawing. On the left, a man in a suit and tie stands with his right hand pointing towards a person on the ground. The person on the ground is in a crawling or kneeling position. To the right, another man in a suit stands with his hands on his hips, looking towards the person on the ground. A small ball is on the ground between them, with a dotted line extending from it towards the man on the right.

अब जागो और अपने देश के लिए काम करो।

जापान का इंजीनियर जापान के लिए काम करता है.

चीन का इंजीनियर चीन के लिए काम करता है.

जर्मनी का इंजीनियर जर्मनी के लिए काम करता है.

इसी तरह लगभग सारे देश अपने देश के लिए काम करते हैं.

लेकिन हमारे देश के लोगों को गुलाम बनने की आदत हो गयी है।

अब जागो और स्वदेश अपनाओं, गुरुकुल में ही शिक्षा दें।।

-रोबिन सिराना

दोस्तो आप वेस्टर्न कल्चर अपना रहे है तो कोई दिक्कत नहीं लेकिन यह जरूर याद रखें – सूरज जब भी वेस्ट(पश्चिम) में गया है, तब हमेशा डूबा ही हैं।

सौजन्य से हेमचन्द्राचार्य गुरुकुलम्

हीरा जैन सोसायटी के निकट, रामनगर, साबरमती, अहमदाबाद, गुजरात दूरभाष – 9033543543

संग्रहकर्ता रोबिन सिराना

स्वदेशी अपनाओं, देश बचाओ

स्वदेशी अपनाओं, देश बचाओ

अमर शहीद राजीव दीक्षित जी

आज भी गुलाम

भाषा - अंग्रेजी भूषा - अंग्रेजी स्वनापीना - अंग्रेजी चिकित्सा - अंग्रेजी जरूरतें - अंग्रेजी

दिमाग में सोच भी अंग्रेजी, किस मुहँ से कहते हो हम आजाद हैं। अधिकांश भारतीय वो मानसिक गुलाम है जिसका आज तक इलाज नहीं हुआ