हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
ऽअ० २६ ] भाषाटीकासमेता । ( ३८३ ) ग्राममें रहनेवाले बकरे आदि जीव, अनूपदेशके जीवोंका मांस, नमक, सूखा शाक, नवीन अन्न, गुड़ का भोजन, पीठीका भोजन, दही और खिचडी, जलसे रहित सूखा अन्न, मदिरा, धान्य, शोजा करनेवाला पदार्थ, भारी, प्रकृतिसे रहित और विदाही पदार्थ, रात्रिमें भी सोना, मैथुन इनको शोजावाला पुरुष त्याग देवे ॥ ६६ ॥ भिलावा, तिल, मुलहटी इनको दूधमें पीस नोनी घृत मिला लेप करनेसे शोजाका नाश होता है अथवा भिलावाके वृक्षकी जडकी माटी, बांसके पत्ते, नेत्रवाला इनका लेप करनेसे शोजाका नाश होता है ॥ ६७ ॥ और विषसे उपजे हुए शोजमें विषोंको शांत करनेवाली चिकित्सा करे, लंघन, दीपन, स्निग्ध अर्थात् तेल आदि गरम वातको संचालन करना ॥ ६८ ॥ बृंहण पदार्थ, ऐसा अन्न सब गुल्मरोगवालोंको विषके समान है और सूखा मांस, मूली, मच्छी, सूखा शाक, वैदल ॥ ६९ ॥ और आलुकादि कंद, मधुर पदार्थ इनको गुल्मरोगवाला पुरुष नहीं खावे ॥ ७० ॥ अथ रक्तगुल्ममें पाचन । सरक्तगुल्मे न तु पाचनं तु न हिङ्गुपानं कटिमर्दनं च॥ न चैव संस्वेदनमर्दनञ्च न चक्रमं नोत्प्लवनं हितं च ॥ ७१ ॥ रोध्रार्जुनं खदिरमागधिकासमङ्गकाथोऽम्लवेतसमधुघृतसंप्रयुक्तः॥ गुल्मं सरक्तमपि चाथ निहन्ति चाशु हृत्क्लेदनं च विनिहन्ति च क्रुद्धरक्तम् ॥ ७२ ॥ रक्तसहित गुल्मरोगमें पाचन औषध नहीं देवे, और हिंगुआदि औषध पान, कटि मसलना, पसीने दिवाने, मालिस करनी, ऊपरको लफना, कूदना ये हित नहीं हैं ॥ ७१ ॥ लोध्र, अर्जुन वृक्ष, खैर, पीपली, मंजीठ, अम्लवेत, इनका काथ बना शहद और घृत मिला खानेसे रक्तसहित गुल्मका शीघ्र ही नाश होता है और हृदयकी पीडा, अत्यंत रक्तरोग इनका नाश होता है ॥ ७२ ॥ अथ रक्तगुल्ममें पथ्य । क्षीरपानं प्रदातव्यं घृतसौवर्चलान्वितम् ॥ रक्तगुल्मविनाशाय यकृद्विक्षतजेऽपि वा ॥७३॥ न च हिङ्गुयुतं पथ्यं न चोष्णं न विदाहि च॥ रक्तजे क्षतजे गुल्मे मांसानि जाङ्ग्लानि च॥७४॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने गुल्मचिकित्सा नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
( ३८४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- रक्तके गुल्मके नाशके वास्ते तथा यकृत् भंगसे उपजे गुल्मके नाशके वास्ते घृत, काला नमक इनसे युक्त दूधको पीना चाहिये ॥ ७३ ॥ हिंगूपंयुक्त औषध और गरम तथा विदाही पदार्थ हित नहीं हैं और रक्तने उपजे तथा चोटसे उपजे गुल्ममें जांगल देशके जीवोंका मांस हित नहीं है ॥७४॥ इति वेरीननिवासिशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनु- वादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने गुल्मचिकित्सानाम षडूविंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
सप्तविंशोऽध्यायः २७. अथ जलोदरका निदान तथा लक्षण । आत्रेय उवाच॥विषमासनोपवेशात्पीततोयात्तथापि वा॥श्रमा- ध्वश्वासनिष्क्रान्ते अतिव्यायामितेऽपि वा॥पीतं त्दूदरमेवं च तस्माज्जातं जलोदरम्॥१॥उदरं सजलं यस्य सघोषमतिवर्द्धितः॥ श्वयथुः पादयोः शोषो जलोदरस्य लक्षणम् ॥ २ ॥ विषम आसनपै बैठनेसे, ज्यादे जल पीनेसे, श्रम, मार्ग, इनकी पीड़ा होनेसे अथवा अत्यंत कसरत करनेसे पीला उदर हो जाता है इनसे जलोदरसंज्ञक रोग हो जाता है ॥ १ ॥ जिसका उदर जलसहित दीखे, शब्द हो और अत्यंत बढ जावे, पैरोंमें शोजा हो यह जलोदरका लक्षण है ॥ २ ॥
अथ जलोदररोगकी चिकित्सा । विरेकं वमनं कुर्य्यात्पाचनानि च कारयेत् ॥ क्षारयोगश्च वटकस्तेन तदुपशाम्यति ॥ ३ ॥ तस्मान्नाभेर्वलीभागे वर्जि- त्वाङ्गुलमात्रकम् ॥ जलनाडी चानुमान्य कुशमात्रेण वेष्टयेत् ॥ ४ ॥ एरण्डजलनालं च तत्र सञ्चारयेद्बुधः ॥ अन्तर्गतं जलं स्राव्यं ततः संधारयेद्द्रुतम् ॥५॥ यदा न धरते तच्च तदा दाहः प्रशस्यते ॥ कणकल्कं परिस्राव्य घृतं देयं चतुर्गुणम् ॥६॥ शुण्ठीविषासमं पाच्य पानमालेपनं हितम्॥शस्त्रकर्म भिषक्छ्रेष्ठो विज्ञातेनैव कारयेत् ॥ ७ ॥ दुष्करं शस्त्रकर्मैव न कुर्याद्यत्र तत्र तु ॥ अक्रियायां ध्रुवो मृत्युः क्रियायां संशयो भवेत् ॥ ८ ॥
अ० २८ ] भाषाटीकासमेता । ( ३८५ )
तस्मादवश्यं कर्त्तव्यमीश्वरं साक्षिकारिणा ॥ ९॥ इत्यात्रेयभा- षिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने जलोदरचिकित्सा नाम सप्तविं- शोऽध्यायः ॥ २७ ॥ इस रोगमें जुलाब, वमन, पाचन औषध इनको करवावे और क्षार योग, गोलीआदिक इनसे यह रोग शान्त होता है ॥ ३ ॥ इस रोगमें नाभिके वलीभागसे एक अंगुल मात्र जगह वर्जके जलकी नाडीका अनुमान जानके कुशासे बांध देवे ॥ ४ ॥ पीछे बुद्धिमान् जन वहां अरंडीके जलकी नालीको प्रयुक्त करे, भीतरको प्राप्त हुए सब जलको झिरा देवे पीछे शीघ्र बंद कर देवे ॥ ५ ॥ और जो इस प्रकार करनेसे वहां आराम नहीं होवे तो दाह करना श्रेष्ठ कहा है। गेहूओंके कणीके चूनको छान तिसमें चौगुना घृत मिला ॥ ६ ॥ सोंठ अतीश इनको चूनके समान भाग मिला पका लेवे पीछे इसका पीना और लेप करना हित है और उत्तम वैद्यको अच्छी तरह जाने बिना शस्त्रकर्म नहीं करना चाहिये ॥ ७ ॥ शस्त्रकर्म अत्यंत दुष्कर है इसवास्ते जहां तहां सब जगह नहीं करना चाहिये। अन्यथा चिकित्सा होनेमें निश्चय मृत्यु हो जाती है। यथार्थ चिकित्सा करनेमें भी सन्देह रहता है ॥ ८॥ इसवास्ते अवश्य ईश्वरको साक्षी करके कर्म करना चाहिये ॥ ९ ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्य- नुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां जलोदरचिकित्सानाम सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥ अष्टाविंशोऽध्यायः २८. अथ प्रमेहचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ विंशत्येवं प्रमेहास्तु नराणामिह लक्षणम् ॥ १ ॥ श्रमाद्व्यवायाच्च तथैव घर्मविरुद्धतीक्ष्णोष्णविभोज- नेन ॥ मद्येन वा क्षीरकद्रुप्रसेवनान्मेहप्रसूतिः कथिता मुनीन्द्रैः ॥ २ ॥ जलप्रमेहो रुधिरप्रमेहः पूयप्रमेहो लवणप्रमेहः ॥ तक्र- प्रमेहः खटिकाप्रमेहः शुक्रप्रमेहः कथितः पुरस्तात् ॥३॥ स्या- च्छर्करामेहो वसाप्रमेहो रसप्रमेहोऽन्यघृतप्रमेहः ॥ पित्तप्रमेही कफमेहिनश्च मधुप्रमेहीति विभावयेच्च ॥ ४ ॥ यथा च नामानि तथैव लक्षणं बलक्षयं वापि नरस्य देहे ॥ कुर्वन्ति शीघ्रं भिषजां वरिष्ठाः कुर्यात्क्रियाञ्च शमनाय हेतुम् ॥ ५ ॥ २५
( ३८६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- आत्रेयजी कहते हैं-मनुष्योंके बीस प्रकारके प्रमेह रोग होते हैं ॥ १ ॥ श्रम कर- नेसे, घाम, तीक्ष्ण, विरुद्ध भोजन इनसे, मदिरा, दूध, चर्बरा इन वस्तुओंके सेवनेसे मुनि- जनोंने प्रमेह रोगकी उत्पत्ति कही है ॥ २ ॥ जलप्रमेह १ रुधिरप्रमेह २ पूयप्रमेह ३ लवण- प्रमेह ४ तक्रप्रमेह ५ खटिकाप्रमेह ६ शुक्रप्रमेह ७ ॥ ३ ॥ शर्कराप्रमेह ८ वसाप्रमेह ९ रस- प्रमेह १० घृतप्रमेह ११ पित्तप्रमेह १२ कफप्रमेह १३ मधुप्रमेह १४ इस प्रकारसे हैं ॥ ४ ॥ जैसे इनके नाम हैं वैसेही लक्षण हैं । ये प्रमेहरोग मनुष्यके देहमें बलका क्षय कर देते हैं इस वास्ते इस रोगके नाशके लिये शीघ्र ही उत्तम वैद्यको चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ५ ॥ अथ प्रमेहचिकित्सा । धवार्ज्जुनं चन्दनशालछल्लीक्वाथो हितः स्याच्च जलप्रमेहे ॥ रक्त- प्रमेहे शिशिरं पयश्च द्राक्षान्वितं यष्टिकचन्दनेन ॥ ६ ॥ स्त्रीसे- वनं चाल्पतरञ्च पूयमेहे हितः क्वाथो धवार्ज्जुनस्य ॥ दूर्व्वाकसेरु- कदलीनलिन्या लवणस्य मेहे च कषाय उक्तः ॥७॥ कदम्बशा- लार्जुनदीप्यकानां विडङ्गदार्वाधवशल्लकीनाम् ॥ सर्वे तथैते मधु- ना कषायाःकफप्रमेहेषु निषेवणीयाः॥८॥रोध्रार्जुनः शीरमरिष्ट- पत्रात्तत्रैव धात्रीफलचन्दनानि ॥ तक्रप्रमेहे खटिकाप्रमेहे देयो हितः क्वाथगुडावटश्च ॥ ९ ॥ दूर्वा च मूर्वा कुशकाशमूलं दन्ती समङ्गा सह शाल्मली च ॥ शुक्रप्रमेहे कथितं जलेन पानं हितं वा रुधिरप्रमेहे ॥ १० ॥ फलत्रिकारग्वधमूलमूर्वाशोभाञ्जना- रिष्टदलानि मोचा ॥ द्राक्षायुतो वा कथितः कषायः सर्पिः- प्रमेहस्य निवारणाय ॥ ११ ॥ कुष्ठं तथा पर्पटकं च तिक्ता सिता प्रगाढं कथितः कषायः ॥ मूर्वारिकापाटलिकानियुक्तो दुरालभाकिंशुकटुण्डुकानाम् ॥ रसप्रमेहे च सदा हितःस्यान्न किञ्चिदत्रास्ति विचारणीयम् ॥१२॥ नीलोत्पलार्जुनकलिङ्ग- धवाम्लिकानां धात्रीफलानि पिचुमन्ददलानि तोये॥निष्क्वाथ्य शर्करयुतै मनुजस्य पाने पित्तप्रमेहशमनाय वदन्ति धीराः ॥ १३ ॥ विडङ्गसर्जार्जुनकट्फलानां कदम्बरोध्राशनवृक्षका- णाम्॥जलेन क्वाथश्च हितो नराणां कफप्रमेहं विनिहन्ति तेषाम्
अ० २८ ] भाषाटीकासमेता । ( ३८७ ) ॥ १४॥ मुस्ता फलत्रिकनिशा सुरदारु मूर्वा इन्द्रा च रोध्रस- लिलेन कृतः कषायः॥ पाने हितः सकलमेहभवे गदे च मूत्र- ग्रहेषु सकलेषु नियोजनीयः ॥१५॥ यच्चाभयालोहरजो निकु- म्भचूर्णं हितं शर्करया समेतम् ॥ फलत्रिकाया मधुना च लेहं सर्वप्रमेहेषु हितं वदन्ति ॥ १६ ॥ मधुमेहे प्रयोक्तव्यं घृतपानं सुधीमता ॥ क्षीरं वा शर्करायुक्तं क्वाथो वा गुटिकानि च ॥१७॥ न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थप्लक्षारग्वधटुण्डकम् ॥ पियालं कुकुभं जम्बूंकपित्थाम्रातकानि च ॥१८॥ मधुकं यष्टिमधुकं रोध्रं वै पारिभद्रकम् ॥ पटोलं चारिणी चैव दन्ती मेषविषाणिका १९ चित्रकं च करञ्जञ्च शक्राङ्गं त्रिफलायुतम्॥ भल्लातकानाञ्च समं त्रिगन्धं कटुकत्रयम् ॥२०॥ सूक्ष्मचूर्णं प्रदातव्यं न्यग्रोधाद्यं गुणाधिकम् ॥ मधुना संयुतं लेहो हन्याच्च मधुमेहकम्॥२१॥ क्वाथो वा तैलपाको वा घृतपाकोऽथवापि च ॥ पानाभ्यङ्गे प्रशस्तः स्याद्धन्ति वै मूत्रजं गदम् ॥ २२ ॥ न्यग्रोधाद्यमिदं चूर्णं पेयं वा क्षीरसंयुतम्॥ मधुमेहे तु नान्योऽस्ति यथालाभेन योजितः ॥२३॥ माक्षीकं धातुमाक्षीकं शिलोद्भेदं शिलाजतु॥ चन्दनं रक्तधातुश्च तथा कर्पूरकं कणाः ॥२४॥ वंशरोचनकं चैव क्षीरेण सहितं पिबेत् ॥ मधुमेहं हरति मूत्ररोगाद्वि- मुच्यते ॥ २५ ॥ धव, अर्जुन वृक्ष, चन्दन, शालवृक्ष इनकी छालका क्वाथ बना पीना जलप्रमेहमें हित है और रक्तप्रमेहमें दाख, मुलहटी, चन्दन इनसे युक्त ठंडा दूध पीना हित है ॥ ६ ॥ मैथुन स्वल्प करना, धव, अर्जुनवृक्ष इसका क्वाथ पीना पूयप्रमेहमें हित है और दूध, कसेरु, केला, कमलिनी इनका क्वाथ लवणप्रमेहमें हित है ॥ ७ ॥ कदंब, अर्जुनवृक्ष, शाल, अजमोद, बायविडंग, दारुहलदी, धव, शल्लकीवृक्ष, इनकी क्वाथ शहदके संग पीना कफप्रमेहमें हित है ॥ ८ ॥ लोध्र, अर्जुनवृक्ष, दूध, नींवके पत्ते, आंवला, चन्दन, इनका क्वाथ अथवा गुड़में मिलाके गोली देना तक्रप्रमेह, खटिकाप्रमेह इनमें हित है ॥ ९ ॥ और दूब, मूर्वा, कुशा, कांस इनकी जड़, जमालघोटाकी जड़, मँजीठ, शालबन इनका Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus Kathmandu
( ३८८ ) हार्रीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने काथ बनाके पीना शुक्रप्रमेहमें और रुधिरप्रमेहमें हित है ॥ १० ॥ त्रिफला, अमलतासकी जड़, मूर्वा, सहोजना, नींवके पत्ते, मोचरस, दाख इनका काथ पीनेसे घृतप्रमेहका निवारण होता है ॥ ११ ॥ कूठ, पित्तपापडा, कुटकी, मिश्री इनका अच्छीतरह काथ बना पीना अथवा मूर्वा, खैर, पाड़लवृक्ष, जवासा, टेशू, टेंवूवृक्षका काथ पीना रसप्रमेहमें सदा हित है ॥ १२ ॥ नीला कमल, अर्जुनवृक्ष, इंद्रजव, धव, अमली, आंवला, नींवके पत्ते इनका काथ बना उसमें खांड मिला मनुष्यको पीनेसे पित्तप्रमेह शांत होता है ऐसे वैद्यजन कहते हैं ॥ १३ ॥ वायविडंग, रालवृक्ष, अर्जुनवृक्ष, त्रिफला, कदंब, लोध, आसना इनका काथ बना पीनेसे कफप्रमेहका नाश होता है ॥ १४ ॥ नागरमोथा, त्रिफला, हलदी, देवदार, मूर्वा, इन्द्रायण, इनका काथ बना पीनेसे सब प्रकारके प्रमेहरोग और मूत्रग्रह अर्थात् मूत्र बंद होना ये दूर होते हैं ॥ १५ ॥ हरड़ै, लौहाकी रज, जमालघोटाकी जड इनका चूर्ण बना खांडके संग खानेसे अथवा त्रिफलाके चूर्णकों शहदमें मिला लेह बना चाटनेसे सबप्रकारके प्रमेहरोग दूर होते हैं ॥ १६ ॥ वैद्यजनको मधुमेहमें घृतका पान कराना चाहिये और खांडसे युक्त दूधके काथका पान करावे तथा गोली देवे ॥ १७ ॥ बड़, गूलर, पीपल, पिलखन, अमलतास, टेटूवृक्ष, चिरौंजीका वृक्ष, अर्जुनवृक्ष, जामन, कथ, अंवाडा वृक्ष ॥ १८ ॥ सहआ वृक्ष, मुलहटी, लोध, नींव, परवल, अरणी, जमालघोटाकी जड़, मेंढासींगी ॥ १९ ॥ चीता, करंज वृक्ष, देवदार, त्रिफला, मिलावें, त्रिगंध, दालचीनी, तेजपात, इलायची, सोंठ, मिर्च, पीपल ॥ २० ॥ इन सब औषधोंका चूर्ण बना शहदमें मिला लेह बना खानेसे मधुमेहका नाश होता है ॥ २१ ॥ अथवा इन औषधोंका काथ तथा तैलपाक अथवा घृतपाक बनाके पीनेमें और मालिस करनेमें हित कहा है और सब प्रकारके मूत्ररोगोंको नाशता है ॥ २२ ॥ बड़आदि औषधोंका यह चूर्ण दूधके संग पीना हित है। मधु प्रमेहमें इसके समान औषध नहीं है । इसमें कही हुई जितनी औषध मिलें उतनी ही मिला देवे ॥ २३ ॥ और शहद, सोनामाखी, पाषाणभेद, शिलाजीत, चंदन, गेरू, कपूर, पीपल ॥ २४ ॥ वंशलोचन इनके चूर्णको दूधके संग पीवे । मधुमेहको नाशता है और संपूर्ण मूत्ररोगोंको दूर करता है ॥ २५ ॥ अथ प्रमेहपिटिकाकी चिकित्सा । प्रमेहपिटिकानाञ्च वक्ष्यामोऽथ चिकित्सितम् ॥ धवार्जुनकद- म्बानां बदरीखदिरशिशपे ॥ पारिभद्रकमेतेषां मेहनस्य प्रधाव- नम् ॥ २६ ॥ अर्जुनस्य कदम्बस्य तिण्डुकी वान्तरत्वचा ॥ पाके पूयविशोधार्थं मेहनस्य प्रशस्यते ॥ २७ ॥ भृङ्गराजरसं गृह्य तथा च सुरसादलम्॥निष्पावकपटोलानां पत्राणि काञ्जि-
अ० २८] भाषाटीकासमेता। (३८९) केन तु ॥२८॥ पिष्ट्वा वातपिटिकानां लेपनं मेहनस्य च ॥२९॥ यष्टीमधु तथा कुष्ठं चन्दनं रक्तचन्दनम्॥ उशीरं कत्तृणं चैव रक्तधातुमृणालकम् ॥३०॥ क्षीरमण्डकसंयुक्तं यथालाभं भिष- ग्वर ॥ लेपनं पित्तरक्तानां मेहदाहः प्रशाम्यति ॥ ३१॥ धावनं शीतपयसा नवनीतेन मर्दनम् ॥ कणं कदम्बार्जुनपिण्याकप- त्राणि दाडिमस्य च ॥ ३२ ॥ खदिरस्य दलानां तु तथा चाम- लकीदलान् ॥ उष्णेन वारिणा पिष्ट्वा सोमपाके च मेहने ॥३३॥ त्रिफलायाश्च वा चूर्णं शुष्कपूयनिवारणम्॥ धावनं काञ्जिके- नाथ तक्रेणाथ तुषाम्बुना ॥ ३४ ॥ अतिशीतेन तोयेन मेहपाके च धावनम् ॥ अब प्रमेहकी पिड़िकाओंकी चिकित्साको कहते हैं,धव, अर्जुनवृक्ष, कदंब, वेर, खैर, सीसम, नींव इनकी छालके काथसे प्रमेहरोगकी पिड़िकाओंको धोवे ॥ २६ ॥ अर्जुनवृक्ष, कदंब, टेंटूवृक्षकी भीतरकी वकलके काथसे पकी हुई पिड़िकाओंकी राधको शोधनेके वास्ते धोवें ॥ २७ ॥ मंगरेका रस, तुलसीके पत्तोंका रस, मोठ, परवल इनके पत्ते कांजीसे ॥ २८ ॥ पीस वातसे उपजी हुई प्रमेहकी पिड़िकाओंपै लेप करे ॥ २९ ॥ मुलहटी, कूठ, चंदन, लाल चंदन, खश, रोहिसतृण, गेरू,कमलकी नाली ॥ ३० ॥ दूधमें तथा चावलोंके मांडमें पीसके लेप करनेसे शिश्नका दाह शांत होता है ॥ ३१ ॥ चावलोंके धोवनसे ठंढे पानीमें वा नोनी घृतमें पीस और गेहूंके कणका रवा, कदंबवृक्ष, तिलोंका वृक्ष इनके पत्ते और अनार ॥ ३२ ॥ खैर, आंवला इनके पत्ते गरम जलमें पीस सोमपाक प्रमेहरोगमें देवे ॥ ३३ ॥ त्रिफलाका चूर्ण शुष्कपूय प्रमेहका निवारण करता है अथवा कांजी, तक्र, शीतल जलसे इंद्रियका धोना हित है ॥ ३४ ॥ और प्रमेहपाकमें अत्यंत ठंढे जलसे इंद्रियका धोना श्रेष्ठ है ॥ अथ प्रमेहमें पथ्यापथ्य । रक्तशालिश्च षष्टीकश्चाढकी वा कुलत्थकः ॥ ३५ ॥ घृतं च मधुरं किञ्चिद्रोजनार्थे विधीयते ॥ क्षाराम्लकटुकं वापि दिवा स्वप्नं विशेषतः ॥ ३६ ॥ स्त्रीदर्शनं व्यवायञ्च तथा चात्यशनं तथा ॥ चलनं धावनं चेति तथा मूत्रविरोधनम् ॥ ३७ ॥ वस्त्रपातं रक्तवस्त्रं वर्जयेद्भिषजां वरः ॥ एकान्ते गृहमध्ये च
गानस्त्रीबालकं रमः ॥ ३८ ॥ न चाभरणताम्बूलं कोपशोषं जहाति च ॥ दूरे चैतानि वर्जेत्तु यदीच्छेत्सुखसम्पदः ॥३९॥ लाल चावल, सांठी चावल, अरहर, कुलथी ॥ ३५ ॥ घृत, किंचित् मधुर अन्न इनको भोजनके वास्ते देवे और खारा, चर्चरा पदार्थ, दिनमें सोना विशेष करके वर्ज देवे ॥ ३६ ॥ स्त्रीका दर्शन, मैथुन, ज्यादे भोजन करना, मार्गमें चलना, भाजना, मूत्रका रोकना ॥ ३७ ॥ वस्त्रसे वायु करना, रक्तवस्त्र पहिरना वैद्यजन इस रोगमें वर्ज देवे । एकांतमें, घरके मध्यमें, गाना, स्त्री बालक इनके संग प्यार करना ॥ ३८ ॥ आभूषण पहिरना, पान चबाना, क्रोध करना इनको इस रोगमें दूरसे ही त्याग देवे तब सुख होता है ॥ ३९ ॥ पीतप्रमेहपर हरिद्रादिक्वाथ । हरिद्राद्वितयं शुण्ठी विडङ्गानि हरीतकी ॥ कफप्रमेहे विहितः क्वाथोऽयं मधुना सह ॥ ४० ॥ नीलोत्पलमुशीरञ्च पथ्यामल- कमुस्तकम् ॥ पिबेत्पीतप्रमेहार्त्तः क्वाथं मधुविमिश्रितम् ॥४१॥ दोनों हल्दी, सोंठ, वायविडंग, हरडै इनका क्वाथ शहदके संग पीना कफप्रमेहमें श्रेष्ठ कहा है ॥ ४० ॥ नीलाकमल, खश, हरडै, आंवला, नागरमोथा इनका क्वाथ शहदके संग पीनेसे पीतप्रमेहका नाश होता है ॥ ४१ ॥ अथ पित्तप्रमेहपर कमलादिक्वाथ । कमलञ्च तथा रोध्रमुशीरमर्जुनान्वितम् ॥ पित्तप्रमेहे विहितः क्वाथोऽयं मधुना सह ॥ ४२ ॥ कमल, लोध, खश, अर्जुनवृक्ष इनका क्वाथ शहदके संग पीना पित्तप्रमेहमें हित कहा है ॥ ४२ ॥ अथ आमलक्यादिचूर्ण । आमलकस्य स्वरसं मधुना च विमिश्रितम् ॥ हरीतक्याश्च चूर्णं वा सर्वमेहनिवारणम् ॥ ४३ ॥ आंवलोंके रसमें शहद मिला अथवा हरडैके चूर्णमें शहद मिला खानेसे सब प्रकारके प्रमेह रोगोंका नाश होता है ॥ ४३ ॥ अथ खदिरादि चूर्ण । खदिरं शर्करा दारु हरिद्रा मुस्तमेव च ॥ चूर्णितं तु पिबेत्सर्वप्रमेहगदशान्तये ॥ ४४ ॥
: अ० २९] भाषाटीकासमेता । (३९१) : खैर, खांड, देवदारु, हलदी, नागरमोथा इनके चूर्णको पीनेसे सब प्रमेहरोग शांत : होते हैं॥ ४४ ॥ : अथ कुष्ठादि चूर्ण। : कुष्ठं हरिद्राद्वयदेवदारु पाठा गुडूची त्रिफला च मुस्तम्॥एषां : हि चूर्णं मधुना विमिश्रं मूत्रप्रमेहं हरते व्यथाञ्च॥४५॥इत्या- : त्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने प्रमेहचिकित्सा नाम : अष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥ : कूठ, दोनों हलदी, देवदार, पाठा, गिलोय, त्रिफला, नागरमोथा इनके चूर्णको शहदके : संग पीनेसे सब मूत्रप्रमेहरोग और पीडा इनका नाश होता है॥ ४५ ॥ : इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां : तृतीयस्थाने प्रमेहचिकित्सानम अष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥ : एकोनत्रिंशोऽध्यायः २९. : अथ मूत्रकृच्छ्रचिकित्सा । : आत्रेय उवाच ॥ एला शिलाजतुयुतं मागधिकापाषाणभेदसंचू- : र्णम्॥तण्डुलजलेन पीतं प्रमेहरोगं हरत्येव ॥ १ ॥ एरण्डमूल- : पाषाणभेदगोक्षुरकास्तथा॥ एलाटरूषपिप्पल्यो यष्टीमधुसम- : न्विताः ॥२॥ एषां क्वाथं पिबेज्जन्तुः शिलादित्येन योजितम्॥ : अश्मरीशर्करायाञ्च शर्करायाः पलद्वयम् ॥३॥ सुशीतलं जलं : कर्षमात्रंस्यान्मूत्रकृच्छ्रहृत्॥दध्यम्बुना च संमिश्रमयश्चूर्णं सुख- : प्रदम् ॥४॥ मूत्रकृच्छ्रे यवक्षारचूर्ण हिंगुप्रयोजितम् ॥ कूष्माण्डं : च समादाय शर्करासहितं पिबेत् ॥५॥ यो हि त्रिदोषसम्भू- : तमूत्रकृच्छ्रनिवारणः ॥ पिबेच्छतावरीमूलं शीतपानीयचूर्णित : म् ॥६॥ अतः शर्करारोगातें शर्करां संप्रयोजयेत् ॥ आरग्व- : धफलं मूलं दुरालभा धान्यकशतावर्य्यः ॥७॥ पाषाणभेदप- : थ्ये क्वाथोऽयं मूत्रकृच्छ्रे स्यात् ॥ ८ ॥ पाषाणभेदस्त्रिवृता : Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
( ३९२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- च पथ्या दुरालभा गोक्षुरपुष्करं वा ॥ एला कुरण्टाप्यथकर्कटीजं बीजं कषायः सुनिरुद्धमूत्रे ॥ ९ ॥ कुलत्थयुक्तः पटोलीमू- लकषायः प्रतिपाकः ॥ पुष्करमूलविमिश्रः प्रमेहपाषाणरोगघ्नः स्यात् ॥ १० ॥ यो मातुलुङ्गिकामूलं पिबेत्पर्युषिताम्बुना ॥ तस्यान्तः शर्करोद्भूतं दुःखं सद्यो विलीयते ॥ ११ ॥ गवां तक्रेण संंपिष्टं क्षिप्रनामकमौषधम् ॥ पिबेच्चिरेण तक्रञ्च शर्करादोषदू- षितः ॥ १२ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने मूत्र- कृच्छ्रचिकित्सा नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥ आत्रेयजी कहते हैं--इलायची, शिलाजीत, पीपल, पाषाणभेद इनके चूर्णको चावलोंके धोवनके जलके संग पीनेसे प्रमेहरोगका नाश होता है ॥ १ ॥ अरंडकी जड़, पाषाणभेद, गोखुरू, इलायची, वांसा, पीपली, मुलहटी इनका क्वाथ बना शिलाजीत मिला पीनेसे मूत्रकृच्छ्र दूर होता है ॥ २ ॥ और पथरीरोग, शर्करारोग, इनमें ८ तोला प्रमाण खांड मिला पीना चाहिये ॥ ३ ॥ एक तोला प्रमाण ठण्डा जल पीनेसे मूत्रकृच्छ्ररोग दूर होता है तथा दहीके पानीसे लोहचूर्णको पान करे ॥ ४ ॥ और मूत्रकृ- च्छ्ररोगमें जवाखारका चूर्ण, हींग, कोहला, खांड इनको जलके संग पीवे ॥ ५ ॥ और शीतल जलके संग शतावरीके जड़को पीनेसे त्रिदोषसे उपजा मूत्रकृच्छ्र दूर होता है ॥ ६ ॥ और शर्करारोगमें खाँड़को पीवे और अमलतास, मूली, जवांसा धनियां शतावरी ॥ ७ ॥ पाषाणभेद, हरड़ै इनका क्वाथ पीनेसे मूत्रकृच्छ्ररोग दूर होता है ॥ ८ ॥ पाषाणभेद, निशोत, हरड़ै, जवासा, गोखरू, पोहकरमूल, इलायची, कोरंटा, काकड़ीका बीज, इनका क्वाथ मूत्रबन्धमें पीना श्रेष्ठ है ॥ ९ ॥ कुलथी, परवल, मूली, पोहकरमूल इनका क्वाथ बना पीनेसे प्रमेह, पथरीरोग इनका नाश होता है ॥ १० ॥ जो पुरुष बिजौराकी जड़को बासी जलके संग पीता है वह शर्करारोगसे छूट जाता है ॥ ११ ॥ और गौकी तक्रके संग कायफलको पीस पीनेसे शर्करारोग दूर होता है ॥ १२ ॥ इति वेरीनवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशा- स्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने मूत्रकृच्छ्रचिकित्सानामैकोनत्रिंशोऽध्यायः २९॥ त्रिंशोऽध्यायः ३०. अथ मूत्ररोधचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ पिबेत्कर्कटिकाबीजं त्रिफलासैन्धवान्वितम् ॥
अ० ३० ] भाषाटीकासमेता । ( ३९३ ) उष्णांबुचूर्णितं पीतं मूत्ररोधं शमं नयेत् ॥ १ ॥ यस्तिलकाण्ड- क्षारं दधिमधुसंमिश्रितं पिबेत् ॥ स नरश्च मूत्ररोधं हत्वा सद्यः सुखमायाति ॥२॥ अजाक्षीरेण संमिश्रं जातीमूलं प्रपेषितम् ॥ पिबेत्सदाहमूत्रोष्णवेदनाशनमं यतः ॥ ३ ॥ तैलेन पद्मिनी- कन्दं पक्वगोमूत्रमिश्रितम् ॥ पिबेन्मूत्रनिरोधे तु सतीव्रवेदना- न्विते ॥ ४ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-काकड़ीके बीज त्रिफला, सेन्धानमक, इनके साथ पीस गरम जलके संग पीनेसे मूत्ररोध दूर होता है ॥ १ ॥ तिलोंकी नालियोंका क्षार, दही, शहद इनको मिला पीनेसे मूत्ररोध रोग दूर होता है, तत्काल सुख होता है ॥ २ ॥ जायफलको बकरीके दूधमें पीस पीनेसे दाह, गरम, मूत्रकी पीड़ाकी शांति होती है ॥ ३ ॥ कमलकंदको तेलमें पीस गोमूत्रमें मिला पीनेसे तीव्र पीड़ासे युक्त मूत्रकृच्छ्ररोग दूर होता है ॥ ४ ॥ अथ मूत्रकृच्छ्रका कारण । पित्तप्रकोपनैर्द्रव्यैः कट्वम्ललवणैस्तथा ॥ गौरास्त्रीसेवनेनापि रक्तं वापि प्रवर्त्तते ॥५॥ मद्यपानेन चोष्णेन श्रमव्यायामपी- डितैः ॥ पित्तं प्रकोपयेच्छीघ्रं करोति मूत्रकृच्छ्रकम् ॥ ६॥ तेन मूत्रयते कृच्छ्रं चोष्णधारा प्रवर्त्तते ॥ मूत्रस्रोतश्च हरति रक्तं चापि प्रवर्त्तते॥तस्य वक्ष्यामि भैषज्यं येन संपद्यतेसुखम्॥७॥ पित्तको कोप करनेवाले द्रव्य, चर्चरा, खट्टा, नमक इनके खानेसे और गौरस्त्रीके सेवनसे इन्द्रि- यमें रक्त प्रवृत्त होजाता है ॥ ५ ॥ गरम मदिरा पीनेसे, श्रम, कसरत, इनकी पीड़ा होनेसे शीघ्र ही पित्त कुपित हो जाता है, वह मूत्रकृच्छ्र रोगको कर देता है ॥ ६॥ उससे कष्टसे मूत्र उतरे । गरम गरम धार जावे और मूत्रका वेग बंद हो जावे तथा रक्त गिरने लगे ॥ ७ ॥ अथ मूत्रकृच्छ्रपर उपाय । यष्टीमधुकमृद्वीका चन्दनं रक्तचन्दनम् ॥रक्ततण्डुलतोयेन मूत्र- कृच्छ्ररुजापहम् ॥८॥ वटप्ररोहमालासु द्राक्षाशर्करयान्वितः॥ लेहोऽयं मूत्रकृच्छ्रस्य नाशनो भिषजां वर ॥९॥ देहोपशमनः प्रोक्तः शीतगाहनकोपततः ॥ मूत्रकृच्छ्रे तु तत्प्रोक्तं भोजनं मधुरं हितम् ॥ १० ॥ उत्तानस्य रतौ भङ्गाद्दाहव्यायामजातके ॥
( ३९४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
मूत्ररोधे वचा वर्या दद्यात्तत्रानिरोधकान् ॥११॥ अव्यायामे शुभं भोज्ये शीतावगाहिता नरे ॥ एतैस्तु कुपितो वायुर्मूत्रद्वारं प्ररुन्धति ॥ १२ ॥ श्लेष्मसहितः पापिष्ठ उक्तः कष्टतमो गदः ॥ शृणु तस्य प्रतीकारं कषायं वानुवासनम् ॥ १३ ॥ बस्ति- निरूहक्वाथं च मूत्ररोधे हितो विधिः॥सर्वसंस्वेदनं चैव स्थानं वक्रमणाविव ॥१४॥ तुरङ्गशकटारोहधावनं च हितं मतम् ॥ फलत्रिकं समगुडं क्वाथः क्षीररसेन तु ॥१५॥ पानं मूत्रनिरो- धेषु पित्ताद्वा लवणाम्लकम् ॥ पाटला टुण्टका चैव निम्बगो- क्षुरकं तथा॥१६॥एलात्वक् च तथा पत्रं क्वाथस्त्रिफलयान्वितः॥ गुडेन संयुतं पीतं हन्ति मूत्रनिरोधकम् ॥ १७ ॥ दाडिमाम्ल- युतं चैव हितं मूत्ररुजां नृणाम् ॥ त्रिफलेक्षुसिताक्वाथगुडेन सह सैन्धवम् ॥१८॥ मूत्ररोधं वारयति पथ्या वा गुडसंयुता ॥ अथवा तोदनन्नारीमैथुनं च विधेयकम् ॥ १९ ॥ तेन सौख्यं भवेच्छीघ्रं स्त्रीणाञ्च योनिमर्दनम्॥२०॥इत्यात्रेयभाषितेहारीतो त्तरे तृतीयस्थाने मूत्ररोधचिकित्सानाम त्रिंशोऽध्यायः ॥३०॥ अब तिसक्री औषधोंको कहते हैं जिससे सुख होवे है-मुलहटी, महुआ, मुनक्का, दाख, चन्दन, लाल चन्दन ॥ ८ ॥ इनको लाल चावलोंके धोवनके जलमें पीस पीनेसे मूत्रकृच्छ्रकी पीड़ा दूर होती है। और बड़के पत्तोंके अंकुर, दाख, खांड, ये मिला लेह बना खानेसे मूत्रकृच्छ्ररोगका नाश होता है ॥ ९ ॥ और यह लेह देहको शांत करनेवाला है और शीतल जलमें गोता मारनेसे उपजे हुए मूत्रकृच्छ्ररोगमें मधुर भोजन हित कहा है ॥ १० ॥ मोधा सोवनेसे मैथुनके भंग होनेसे, दाह और कसरतके परिश्रमसे उपजे हुए मूत्ररोधमें वच, शतावरी इनको देवे ॥ ११ ॥ कसरत नहीं करना, सुन्दर तथा ज्यादे भोजन करना, शीतल जलमें गोता मारना, इनसे कुपित हुआ वायु मूत्रद्वारको रोकलेता है ॥ १२ ॥ और अत्यंत कष्टवाला पापवाला यह रोग कफ सहित होता है। अब इसरोगका इलाज कह- ते हैं, अनुवासन बस्तिमें क्वाथ वरतना चाहिये ॥ १३ ॥ मूत्ररोधमें निरूह बस्तिद्वारा क्वाथ देना चाहिये और सब शरीरमें पसीना दिलाना हित है जैसे टेढी मणिमें स्थान दीखता है ऐसे ही मूत्ररोग जानना ॥ १४ ॥ घोड़ा, गाड़ी इनकी सवारीपर चढ़के भागना हित कहा है और त्रिफला, गुड़ इनको समान भागले गुड़में क्वाथ बनादेना हित है ॥ १५ ॥
अ० ३१ ] भाषाटीकासमेता । ( ३९५ ) और पित्तसे उपजे मूत्ररोधमें नमक, कांजीका पीना हित कहा है और पाडलवृक्ष, टेंटूवृक्ष, नींव, गोखरू ॥ १६ ॥ इलायची, दालचीनी, तेजपात, त्रिफलाका काथ बना गुड़के संग मिला पीनेसे मूत्ररोध दूर होता है ॥ १७ ॥ अनारदानाकी कांजी पीना मूत्ररोगवाले पुरुषोंको हित है और त्रिफला, ईख, मिश्रीका काथ बना गुड़, सेंधा- नमकके संग पीनेसे ॥ १८ ॥ या हरड़ैं गुड़ इनके खानेसे मूत्ररोधका निवारण होता है अथवा इंद्रियोंको मलना अथवा स्त्रीके संग मूत्र आनेके समय विषय करना श्रेष्ठ है ॥ १९ ॥ और स्त्रीके मूत्र बंध होवे तो उसकी योनि मर्दन करे तो शीघ्र ही सुख उत्पन्न होता है ॥ २० ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने मूत्ररोधचिकित्सा नाम विंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥ एकत्रिशोऽध्यायः ३१. अथ अश्मरी अर्थात् पथरी रोगकी चिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ पितृमातृकदोषेण अथवा मूत्ररोधनात् ॥ अप- थ्यसेवनाचारैर्जायते चाश्मरीगदः ॥ १ ॥ मूत्राविष्टौ च पितरौ सुरतं कुरुतो यदि ॥ मूत्रेण सहितं युक्तं च्यवते गर्भसम्भवम् ॥ ॥२॥ पश्च यस्य सदेहस्य स च तत्र प्रजायते॥मूत्रं मूत्रस्य संस्था- ने करोति बन्धनं त्रिषु ॥ ३ ॥ सोऽप्यसाध्यो मूत्रगदश्चाल्पाङ्ग- वति मानुषे ॥ तारुण्ये चापि साध्यश्च जायते मूत्रशर्करा ॥४॥ विपरीतेन चोत्ताने स्त्रिया च पुरुषेण वा ॥ शुक्रञ्च प्रबलेत्तस्य स्त्री शुक्रं विचिनोति च ॥५॥ पुनश्च मेहने वासो वातेन शो- णितं च तत् ॥ द्वयं दत्तं प्रपद्येत मूत्रद्वारं प्ररुध्यति ॥ ६ ॥ तेन मूत्रप्ररोधश्च जायते तीव्रवेदना ॥ अण्डसन्धिस्यिता याति शर्करा शस्त्रसाध्यका ॥ ७ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-माता पिताके दोषसे अथवा मूत्रके रोकनेसे पथ्य वस्तुओंके सेवन नहीं करनेसे पथरीरोग होजाता है ॥१॥ मूत्रके वेगसे युक्त हुए माता पिता जब मैथुन करते हैं तब गर्भको उत्पन्न करनेवाला वीर्य मूत्र सहित झिरता है ॥ २ ॥ फिर उस गर्भके शरीरमें वह मूत्र उसीस्थानमें प्राप्त होजाता है वह मूत्र मूत्रके स्थानमें बंधाकर देताहै ॥ ३ ॥ यह पथरी-
( ३९६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- रोग असाध्य होता है बालक अवस्थामें ही यह पथरी रोग होता है । यह तीन प्रकार से होता है ॥ ४ ॥ और जवान अवस्थामें मूत्रशर्करा रोग होता है वह साध्य होता है स्त्री और पुरुषके विपरीत तथा मोहेहोके मैथुन करनेसे जो वीर्य झिरता है और स्त्रीका वीर्य इकट्ठा होता है ॥ ५ ॥ वह वीर्य तो मूत्रके संग वासमें युक्त होता है और स्त्रीका रुधिर वातके संग युक्त होजाता है फिर इन दोनोंके गर्भमें संयुक्त होनेसे मूत्रद्वारा रुक जाता है ॥ ६ ॥ वह जो बालक उत्पन्न होवे उसके मूत्ररोध रोग होवे, तीव्र पीड़ा हो यह अंडसंधिमें शर्करासंज्ञक रोग हो जाता है यह शस्त्रसाध्य होता है ॥ ७ ॥ अथ अश्मरीरोगपर चिकित्सा । अतो वक्ष्यामि भैषज्यं शृणु पुत्र महामते ॥ शुण्ठी गोक्षुरकं चैव वरुणस्य त्वचस्तथा ॥ ८ ॥ क्वाथो गुडयवक्षारयुक्तश्चाश्मरि- नाशनः ॥ कुशकाशनलं वेणु अग्निमन्थाक्षनृत्तकम् ॥ ९ ॥ श्वदं- ष्ट्रा मोरटा वापि तथा पाषाणभेदकम् ॥ पलाशत्रिफलाक्वाथो गुडेन परिमिश्रितः ॥ १० ॥ पाने मूत्राश्मरीं हन्ति शूलब- स्तौ व्यपोहति ॥ ११ ॥ हे पुत्र, हे महामते ! अब इन्होंकी औषध कहते हैं सुनो सोंठ, गोखरू, वरणाकी छाल ॥ ८ ॥ गुड, जवाखार इनका क्वाथ बना पीनेसे पथरीका नाश होता है ॥ ९ ॥ कुशा, कास, उशीर, बांस, अरणी, बहेड़ा, बेत, गोखरू, मोरबेल, पाषाणभेद ॥ १० ॥ टेसू, त्रिफला, इनका क्वाथ बना गुडमें मिला खानेसे पथरीका नाश होता है और वस्तिशूल दूर होता है ॥ ११ ॥ अथ एलादि क्वाथ । एलाकणावृषत्रिकण्टकरेणुकाचपाषाणभेदमधुकं च फलत्रि- कञ्च ॥ एरण्डतैलकशिलाजतुशर्कराद्यं क्वाथोऽश्मरीघ्नइति सोष्णजलस्य पानम् ॥ १२ ॥ इलायची, पीपल, बांसा, दोनों कटेहली, गोखरू, रेणुका, पाषाणभेद, त्रिफला, अरंडीका तेल, शिलाजीत, खांड इनका क्वाथ बना गरम २ पीनेसे पथरी रोग दूर होता है ॥ १२ ॥ अथ गोक्षुरकादि चूर्ण । गोक्षुरकस्य बीजानां धातुमाक्षिकसंयुतम् ॥ अश्मरीपातनं चूर्ण महिषीदुग्धभक्षितम् ॥ १३ ॥
अ० ३२ ] भाषाटीकासमेता । ( ३९७ ) और गोखरूके बीज, सोनामाखी इन्होंके चूर्णको भैंसके दूधके संग पीनेसे पथरी गिरती है ॥ १३ ॥ अथ अन्य उपाय। शस्त्रविधिरुत्तरीय सूत्रस्थाने प्रोक्तं घृताध्याये च स्मृतम्॥१४ पुराणषष्टिका शालिरक्ततण्डुलकास्तथा ॥ श्यामाकः कोद्रवो दालो मर्कटी तृणधान्यकम् ॥१५॥ यवगोधूमकुलत्थास्तथा चैवाढकी भिषक्॥वातहराः प्रयोक्तव्या भोजने वातरोगिणाम् ॥१६॥॥क्रौञ्चाद्यानि च मांसानि पथ्यान्यश्मरीनाशने ॥१७॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने अश्मरीचिकित्सा- नामैकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥ उत्तर सूत्रस्थानमें शस्त्रविधि कहदी है, तैलाध्यायमें तैल कह दिया है और घृता- ध्यायमें घृत कह दिया है ॥ १४ ॥ पुराने सांठी चावल, शालिसंज्ञक चावल, लाल चावल, शामक, कोदूधान्य, दाल, क्रौंच, तृणधान्य आदि अन्न ॥ १५ ॥ जब, गेहूं, कुलथी, आढकी धान्य, इन भोजनोंको देवे और वातरोगवाले पुरुषोंको वातनाशक भोजनोंको देवे ॥ ॥ १६ ॥ पथरी रोगके नाशके वास्ते क्रूंजि आदि पक्षियोंका मांस देना चाहिये ॥ १७ ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने अश्मरीचिकित्सानामैकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥ द्वात्रिंशोऽध्यायः ३२. अथ वृषणचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ अत ऊर्ध्वमण्डवृद्धिर्हृश्यते भिषजां वर ॥ बाल्ये मातुः पितुर्दोषाज्जायते वृषणानुगा॥१॥दुष्टादाराविहा- राच्च वातो बस्तिगतो भृशम् ॥ अण्डस्थानं च संप्राप्य तस्य वृद्धिं करोति वै॥२॥एकैकसन्निपातश्च चतुर्थः सन्निपातिकः ॥ पित्तदोषात्सन्निपातात्तथाऽसाध्या इमे स्मृताः ॥ ३ ॥ आत्रेय कहते हैं-हे उत्तमवैद्य ! हारीत ! इसके उपरांत अंडवृद्धि रोग होता है
( ३९८ ) हारीतसंहिता। [ तृतीयस्थाने
सो बालकके मातापिताके दोषसे वृषणोंका रोग होता है ॥ १ ॥ दूषित स्त्रीके संग मैथुन करनेसे वस्तिस्थानमें प्राप्त हुआ बहुतसा वायु अंडस्थानमें प्राप्त होके अंडवृद्धि करदेता है॥२॥ एक एक दोषसे तीन प्रकारका और चौथा सन्निपातसे होता है और पित्तके दोषसे उपजे हुए और सन्निपातसे उपजे हुए अंडवृद्धिरोग असाध्य कहे हैं ॥ ३ ॥ दोषान् वक्ष्याम्यौषधानि शृणु तानि भिषग्वर॥स्वेदनान्यभ्य- ञ्जनानि क्वाथ्यपानं विधीयते ॥ ४ ॥ शिरःस्रावो भिषक्श्रेष्ठ तेषां वक्ष्यामि लक्षणम् ॥ कंपश्च मृदुवातेन पित्तेन दाहकृ- ज्वरः ॥ ५ ॥ कफाद्दृढश्च शोषश्च कठिनो वृषणो भवेत् ॥ रसालशल्लकीक्वाथस्तर्कारी कटुतुम्बिका ॥ ६ ॥ क्वाथसं- सेवनार्था च मुष्कवृद्धिः सवातिके ॥ शीततोयावगाहो वा शीतसंसेवनं तथा॥शीतशीतैश्च लेपश्च पित्तमुष्के प्रशस्यते॥७॥ हे उत्तमवैद्य ! अब दोषोंको और औषधोंको कहते हैं सुनो । पसीना दिलाना, मालिस करनी और क्वाथ पान, नसोंका स्राव ये विधि करनी चाहिये ॥ ४ ॥ अब इनके लक्ष- णोंको कहेंगे, वातदोषसे उपजे अंडवृद्धिरोगमें कंपनाहो कोमलहो और पित्तसे दाहहो, ज्वरहो ॥ ५ ॥ कफसे कड़ाहो, शोषहो, कठिन अंड हो, वातसे उपजे अंडवृद्धिरोगमें आंब, शल्लकी वृक्ष, अरणी, कडुई तुंबी, इनका क्वाथ बना सेवन करना चाहिये ॥ ६ ॥ और पित्तसे उपजे अंडवृद्धिरोगमें शीतल जलमें गोता मारना, शीतल वस्तुसे बना और चंदन, कपूर चीता इनका लेप करना श्रेष्ठ है ॥ ७ ॥ वृषणवृद्धिपर चिकित्सा । वचालवणतोयेन कदम्बार्जुनसर्षपैः॥कषायसेवनैः प्रोक्तं कफ- मुष्केऽहितापहम् ॥ ८ ॥ अरुणवरुणकोलं च शालिपर्णी शता- वरी॥क्वाथः पित्तसन्निपातमुष्कवृद्धौ विदां वर ॥ ९ ॥ वरुण- वृक्षादनी चैव दशमूली शतावरी॥क्वाथपानं वातिके च मुष्क- वृद्धौ हितावहम् ॥१०॥ एतेन भवते सौख्यं तदा कर्मावकार- येत्॥कर्णकोषस्य मध्ये तु रक्तान्निर्हारयेच्छिराम् ॥ ११ ॥ वामकोष्ठस्य वृद्ध्या तु दक्षिणां हारयेच्छिराम्॥उभाभ्यां द्वे शिरे वेध्ये तेन वा तत्सुखं भवेत् ॥१२॥ इति चाण्डक्रिया प्रोक्ता
अ० ३३] भाषाटीकासमेता । (३९९) सा चैवोन्नीतरोगिणे ॥१३॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृती- यस्थाने वृषणवृद्धिचिकित्सा नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥ कफसे उपजे अण्डवृद्धिमें वच, नमक, कदंबवृक्ष, सरसों, इनका क्वाथ बना सेवन करना हित है ॥८॥ लाल ऊंगा, वायवरणा, कंकोल, शालपर्णी, शतावरी, इनका क्वाथ पित्त और सन्निपातसे उपजे अंडवृद्धिरोगमें हित है ॥ ९ ॥ अमरवेल, वायवरणा, दशमूल, शतावरी, इनका क्वाथ वातके अंडवृद्धिरोगमें पीना हित है ॥ १०॥ इस करके सुख हो जाता है पीछे अन्यकर्म करें। कानके मध्यमें रहनेवाली रक्तको धारण करनेवाली नाड़ीको विंधावे ॥ ११ ॥ बाईंतर्फ अंडवृद्धि होवे तो दाहिने कानकी नस विंधावे और दोनोंतर्फ अंडवृद्धि होवे तो दोनों कानोंकी नसोंको विंधावे ऐसे करनेसे सुख उत्पन्न होता है ॥ १२ ॥ यह दारुण क्रिया कही है जिसके ज्यादा अंडवृद्धि हो रही हो उस रोगीके करनी चाहिये ॥ १३ ॥ इति वेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने वृषणवृद्धिचिकित्सानाम द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ३३. अथ विसर्परोगकी चिकित्सा । आत्रेय उवाच॥ लवणाम्लक्षारकटुकैरुष्णस्वेदातिदोषतः॥ रक्त- पित्तं प्रकुप्येत स विसर्पी भिषग्वर ॥१॥ स सप्तधा परिज्ञेयः पृथग्दोषैश्च द्वन्द्वजैः॥ केवलो रक्तजस्त्वन्यः सन्निपातेन सप्तमः ॥ २ ॥ तथापरे प्रवक्ष्यन्ते नामानि च पृथक्पृथक्॥ आग्नेयो ग्रन्थिको घोरः कर्दमश्च तथापरः ॥३॥ आग्नेयो वातपित्तेन ग्रन्थिकः पित्तश्लेष्मणा॥ कदमो वातश्लेष्मोत्थो घोरः स्यात्सा- न्निपातिकः ॥४॥ रक्तंलसीकात्वङ्मांसं दूष्यं दोषास्त्रयो मलाः॥ विसर्पाणां समुत्पत्तौ विज्ञेयाः सप्तधातवः ॥५॥ न्यग्रोधबि- ल्वखदिरकषायो धावने हितः ॥ काञ्जिकाम्लैः पिच्छिलया सौवीरकरसेन वा ॥६॥ मातुलुङ्गरसेनापि धावनं वातसर्पिषु ॥ क्षीरेण शीततोयेन धावनं पित्तसर्पिणि ॥ ७ ॥ श्लेष्मविसर्पिणे
(४००) हारीतसंहिता । [तृतीयस्थाने- वाथ धवार्जुनकदम्बकम् ॥ धावनं सर्पिणे शस्तं सुरासौवीर- केण वा ॥ ८ ॥ धावनञ्च हितं तस्य सन्निपाते विसर्पिणे ॥ यवाग्निमन्थैश्च शटीन्यग्रोधैश्च ससर्षपैः ॥९॥ क्वाथः स्यात्स- न्निपातोत्थविसर्पधावने हितः॥पञ्चजीरकपवित्थांश्च काञ्जिकेन तु पेषयेत्॥ मातुलुङ्गरसेनापि लेपनं वातसर्पिणे ॥१०॥ धवा- रोध्रतिलाश्रैलविदारीकण्टकं तथा ॥ लेपः पित्तविसर्पे वा गुआपत्रैस्तु लेपनम् ॥११॥ सैन्धवारिष्टतुम्बीकापटोलपत्रकै- घृतम्॥पाचितं लेपने शस्तं विसर्पाणां निवारणम् ॥ १२ ॥ रक्तजेषु विसर्पेषु कुर्य्याद्रक्तावसेचनम् ॥ पश्चाद्धवकदम्बानां सर्वदा गृहधूमकम् ॥१३॥ लेपने हितकृत्प्रोक्तं धावनं काञ्जि- केन तु ॥ कुठेरकाश्च सुरसा चक्रमर्दो निशायुगम् ॥ १४ ॥ सर्षपाः काञ्जिकेनापि पिष्ट्वा च लेपनं हितम् ॥१५॥ इत्या- त्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने विसर्पचिकित्सा नाम त्रयास्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-नमक, खट्टा, खारा, चर्चरा, गरम, ऐसा पदार्थ सेवनेसे और पसीनेके दोषसे रक्तपित्त कुपित हो जाता है वह विसर्परोग कहाता है ॥ १ ॥ वह जुदे जुदे दोषों करके और द्वंदज दोषों करके सात प्रकारका होता है और केवल रक्तसे उपजा हुआ सन्निपातसे युक्त सातवां होता है ॥ २ ॥ अन्य कईक जन जुदे २ नामोंवाले इन रोगोंको कहते हैं । आक्षेपनामवाला, ग्रंथिकनामवाला, घोरनामवाला और कर्दमनामवाला ऐसे तीन प्रकारसे होता है ॥३॥ आक्षेप विसर्परोग वातपित्तसे होता है और ग्रंथिक पित्तकफसे होता है, कर्दमनामवाला पिसर्प वातकफसे होता है और घोरनामक सन्निपातसे होता है ॥४॥ रक्तक्रांति, त्वचा, मांस इनसे दूषित हुए तीनों दोष और सात धातु ये विसर्प रोगोंकी उत्पत्तिमें हेतु कहे हैं ॥ ५ ॥ और बड़,बेलगिरी, खैर इनके काथसे शरीरका धोवना हित है और कांजीका खटाई- के झागोंसे अथवा सौवीर संज्ञक कांजीके रससे ॥ ६ ॥ अथवा बिजौराके रससे धोवना वातसे उपजे विसर्परोगमें हित है और पित्तके विसर्पमें दूध और शीतल जलकरके धोवना हित हैं ॥७॥कफके विसर्परोगमें धव, अर्जुनवृक्ष,इनके काथसे अथवा मदिरा सौवीर संज्ञक कांजी इनसे धोवना हित है ॥ ८ ॥ सन्निपातके विसर्पमें भी मदिरा, सौवीर संज्ञक कांजी इनसे धोवना हित है और अजवायन,अरणी,कचूर,बड़,सरसों॥९॥इनके क्वाथसे सन्निपातसे उपजे विसर्पको
अ० ३४] भाषाटीकासमेता । (४०१) धोना हित है और पांच प्रकारके जीरे, कैथ, इनको कांजीमें पीस बिजौराके रसके संग वातके विस- र्पमें लेप करना हित है ॥१०॥ धव, लोध, तिल, एलवालुक, विदारीकंद, गोखरूको पीस लेप करना अथवा चिरमठीके पत्तोंका लेप करना हित है ॥ ११ ॥ सैंधानमक, नींव, तुंबी, परवलके पत्ते इनको घृतमें पका लेप करनेसे सब प्रकारके विसर्पोका नाश होता है ॥ १२ ॥ रक्तसे उपजे हुए विसर्परोगमें फस्तखुलानी चाहिये पीछे धव, कदंब, वरका धुवां ॥ १३ ॥ इनका लेप करना हित है और कांजीसे धोवना हित है और आजबला, तुलसी, पुआड़, दोनोँ प्रकारकी हल्दी ॥ १४ ॥ सरसों इनको कांजीमें पीस लप करना हित है ॥ १५ ॥ इति वेरीनिवार्सिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटी- कायां तृतीयस्थाने विसर्पचिकित्सानाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ३४. अथोपसर्गचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ चतुर्विधो भवेद्दोषो वातरक्तसमुद्भवः ॥ गन्धदोषेण जायन्ते नामान्येषां पृथक् पृथक् ॥१॥ क्षुद्रतश्चा- न्तको घोरोऽथवा चान्यमसूरिका ॥ वसन्तः सर्षपाकारा पिटका यस्य दृश्यते ॥ २ ॥ सोऽपि क्षुद्रतरः प्रोक्तः पित्तरक्तप्रदोषतः ॥ अग्निदग्धवत्स दाहः पिटिका यस्य दृश्यते ॥ ३ ॥ सोऽप्यतीव विसर्पी स्यादसुखी च निरन्तरम् ॥ ४ ॥ सघनाः पीडका यस्य पाक्यति समः कफः ॥ दाहोऽरतिर्विवर्णत्वं तस्य सद्यः प्रजायते ॥५॥ वर्त्तुलमसूरिकावत् पिटका यस्य दृश्यते ॥ शाम्यति शीघ्रं पाकेन सा विज्ञेया मसूरिका॥तस्य वक्ष्यामि भेषज्यं यथाविधि महामते ॥ ६ ॥ आत्रेयजी कहते हैं--वातरक्तसे उपजाहुआ चारप्रकारका दोष होता है सो गंधके दोषसे उत्पन्न होते हैं उनके जुदे २ नामोंको कहते हैं ॥ १ ॥ क्षुद्रक, अंतक, घोर, मसूरिका ये हैं और जिसके गौर सरसोंके आकार फुनसी दीखें ॥ २ ॥ वह क्षुद्ररोग, पित्तरक्तके दोषसे होता है और जिसमें अग्निके दग्ध होनेके समान दाह हो ॥ ३ ॥ निरंतर सुखी नहीं हो वह अति घोर विसर्परोग होता है ॥ ४ ॥ कड़ी तथा पकीहुईके समान पिड़िका हो, दाह हो, २६
( ४०२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
ग्लानि हो, विवर्ण हो वह तात्काल अंतक रोग होता है ॥ ५ ॥ जिसके मसूरिकाके समान गोल पिडिका हो जल्दी ही पकके शांत होजावे वह मसूरिका कहाती है । हे महामते ! इसकी यथार्थ विधिको कहते हैं ॥ ६ ॥ अथ मसूरिकामें चिकित्सा । गुप्ताकारं सुरक्षेच्च रक्षायोगविधानतः ॥ न स्त्रीणां नाधमानाञ्च संसर्गं वा प्रसङ्गकम् ॥ ७॥ सुशीतं शीतलं स्थानं कारयेत्सु- प्रयत्नतः ॥ क्षुद्रकस्योपसर्गस्य लेपनं चात्र कारयेत् ॥ ८ ॥ कुष्ठं सोशीरन्यग्रोधस्तथोदुम्बरिकत्वचः ॥ प्रलेपनं प्रशस्तं स्यात्क्षुद्रोपसर्गवारणम् ॥ ९ ॥ मधुशर्करया युक्तं क्षीरपानं सुखावहम् ॥ जम्ब्वाम्रपल्लवानाञ्च विष्टं दधिमधुयुतम् ॥१०॥ पाययेत् क्षुद्रकस्यास्य अतिसाराग्निनाशनम् ॥ गोक्षुरश्वाति- विषा च कर्कटाद्यं सपर्पटम् ॥ ११॥ कल्कमेतत्प्रयोक्तव्यं मधु- शर्करया युतम् ॥ हरीतकीमातुलुङ्गस्वरसं शर्करायुतम् ॥१२॥ क्षुद्रकस्योपसर्गस्य वमिशोषनिवारणम् ॥ अग्निकोऽप्युपसर्गे च योज्यं चैतत्प्रलेपनम् ॥ १३ ॥ रक्तचन्दनमञ्जिष्ठानिम्बप- त्राणि चार्जुनम् ॥ क्षीरेण नवनीतेन हितं स्याल्लेपनं तथा ॥१४॥ गुप्त आकारसे रक्षायोगके विधानसे उस रोगीको रक्खे और स्त्री तथा नीच जन इनका मेल नहीं होनेदेवे ॥ ७ ॥ अत्यंत यत्नसे शीतल स्थान रक्खे और क्षुद्रक उपसर्गमें लेप करना चाहिये ॥ ८ ॥ कूठ, खश, बड़, गूलरकी छाल इनका लेप करनेसे क्षुद्र उप- सर्गरोगका निवारण होता है ॥ ९ ॥ शहद, खांड इनसे युक्त दूधका पीना सुखदायक है और जामन, आंब इनके पत्तोंको पीस दही और शहद मिला॥ १० ॥पीनेसे क्षुद्रकरोग अतीसारकी अग्नि इनका नाश होता है। और गोखरू, अतीशा, काकडासींगी, पित्तपापड़ा ॥ ११॥ इनका कल्क बना शहद और खांड मिला ॥ १२ ॥ खानेसे क्षुद्र रोगवाले पुरुषका वमन, शोष, इनका निवारण होता है और अग्निसरीखे दाहवाले उपसर्गरोगमें ॥ १३ ॥ लाल चंदन, मँजीठ, नींबके पत्ते, अर्जुनवृक्षकी छाल इनको दूध, नौनीघृतमें पीस लेप करना हित है ॥ १४ ॥ घोरं चोपद्रवं दृष्ट्वा न स्वेदं न च मर्दनम्॥प्रलेपनं न कुर्वन्ति यथायोगेन पण्डिताः ॥१५॥ अरण्यगोमयक्षारतैलेन चालनं हितम् ॥ न तैलेनापि चाभ्यङ्गं लेपेनैव च कारयेत् ॥ १६ ॥