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हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

Hind Swaraj by Mahatma Gandhi

मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

हिन्द स्वराज अपने दुनियावी लोभ की हद बाँधनी चाहिए और धार्मिक लोभ को खुला छोड़ देना चाहिए। हमारा उत्साह धार्मिक लोभ में ही रहना चाहिए। पाठक : इससे तो मालूम होता है कि आप पाखंडी बनने की तालीम देते हैं। धर्म के बारे में ऐसी बातें करके ठग लोग दुनिया को ठगते आये हैं और आज भी ठग रहे हैं। संपादक : आप धर्म पर गलत आरोप लगाते हैं। पाखंड तो सब धर्मों में है। जहाँ सूरज है वहाँ अंधेरा रहता ही है। परछाईं हर एक चीज़ के साथ जुड़ी मुझे तो धर्म प्यारा है, इसलिए पहला दुःख मुझे यह है कि हिंदुस्तान धर्मभ्रष्ट होता जा रहा है। धर्म का अर्थ मैं यहाँ हिन्दू, मुस्लिम या जरथोस्ती धर्म नहीं करता, लेकिन इन सब धर्मों के अन्दर जो ‘धर्म’ है वह हिंदुस्तान से जा रहा है, हम ईश्वर से विमुख होते जा रहे हैं। रहती है। धार्मिक ठगों को आप दुनियावी ठगों से अच्छे पायेंगे। सभ्यता में जो पाखंड मैं आपको बता चुका हूँ, वैसा पाखंड धर्म में मैंने कभी नहीं देखा। पाठक : यह कैसे कहा जा सकता है? धर्म के नाम पर हिन्दू-मुसलमान लड़े, धर्म के नाम पर ईसाइयों में बड़े-बड़े युद्ध हुए। धर्म के नाम पर हज़ारों बेगुनाह लोग मारे गए, उन्हें जला दिया गया, उन पर बड़ी-बड़ी मुसीबतें गुज़ारी गईं। यह तो सभ्यता से बदतर ही माना जाएगा। संपादक : तो मैं कहूँगा कि यह सब सभ्यता के दुःख से ज्यादा बरदाश्त हो सकने जैसा है। आपने जो कुछ कहा वह पाखंड है, ऐसा सब लोग समझते हैं। इसलिए पाखंड में फँसे हुए लोग मर गए कि सारा सवाल हल हो गया। जहाँ भोले लोग हैं वहाँ ऐसा ही चलता रहेगा, लेकिन उसका असर हमेशा के लिए बुरा नहीं रहता। सभ्यता की होली में जो लोग जल मरे हैं, उनकी तो कोई हद ही नहीं है। उसकी खूबी यह है कि लोग उसे अच्छा मानकर उसमें कूद पड़ते हैं। फिर वे न तो रहते दीन के और न रहते दुनिया के। वे सच बात को बिल्कुल भूल जाते हैं। सभ्यता चूहे की तरह फूँककर काटती है। उसके असर जब हम जानेंगे तब पुराने वहम के मुकाबले में हमें मीठे लगेंगे। 54

हिन्द स्वराज्य मेरा कहना यह नहीं कि हमें उन वहमों को कायम रखना चाहिए। नहीं, उनके ख़िलाफ तो हम लड़ेंगे ही, लेकिन वह लड़ाई धर्म को भूलकर नहीं लड़ी जाएगी, बल्कि सही तौर पर धर्म को समझकर और उसकी रक्षा करके लड़ी जाएगी। पाठक : तब तो आप यह भी कहेंगे कि अंग्रेजों ने हिन्दुस्तान में शान्ति का जो सुख हमें दिया है वह बेकार है। संपादक : आप भले शांति देखते हों, पर मैं तो शान्ति का सुख नहीं देखता। पाठक : तब तो ठग, पिंडारी, भील वगैरह देश में जो त्रास गुजारते थे उसमें आपके ख़्याल से कोई बुराई नहीं थी? संपादक : आप जरा सोचेंगे तो मालूम होगा कि उनका त्रास बहुत कम था। अगर सचमुच उनका त्रास भयंकर होता, तो प्रजा का जड़ मूल से कभी का नाश हो जाता और हाल की शान्ति तो नाम की ही है। मैं यह कहना चाहता हूँ कि इस शान्ति से हम नामर्द, नपुंसक और डरपोक बन गये हैं। भीलों और पिंडारियों का स्वभाव अंग्रेजों ने बदल दिया है, ऐसा हम न मान लें। हम पर ऐसा जुल्म होता हो तो हमें उसे बरदाश्त करना चाहिए, लेकिन दूसरे लोग हमें उस जुल्म से बचाएं, यह तो हमारे लिए बिल्कुल कलंक जैसा है। हम कमजोर और डरपोक बनें, इससे तो भीलों के तीर-कमान से मरना मुझे ज्यादा पसंद है। उस हालत में जो हिन्दुस्तान था, उसका जोश कुछ दूसरा ही था। मैकॉले ने हिन्दुस्तानियों को नामर्द माना, वह उसकी अधम अज्ञान दशा को बताता है। हिन्दुस्तानी नामर्द कभी नहीं थे। यह जान लीजिये कि जिस देश में पहाड़ी लोग बसते हैं, जहाँ बाघ-भेड़िए रहते हैं, उस देश के रहने वाले अगर सचमुच डरपोक हों तो उनका नाश ही हो जाए। आप कभी खेतों में गए हैं? आप कभी खेतों में गये हैं? मैं आपसे यकीनन कहता हूँ कि खेतों में हमारे किसान आज भी निर्भय होकर सोते हैं, जबकि अंग्रेज और आप वहाँ सोने के लिए आनाकानी करेंगे। बल तो निर्भयता में है, बदन पर माँस के लोंदे होने में बल नहीं है। 55

हिन्द स्वराज्य मैं आपसे यकीनन कहता हूँ कि खेतों में हमारे किसान आज भी निर्भय होकर सोते हैं, जब कि अंग्रेज और आप वहाँ सोने के लिए आनाकानी करेंगे। बल तो निर्भयता में है, बदन पर माँस के लोंदे होने में बल नहीं है। आप थोड़ा भी सोचेंगे तो इस बात को समझ जाएँगे और आपको, जो स्वराज्य चाहने वाले हैं, मैं सावधान करता हूँ कि भील, पिंडारी और ठग ये सब हमारे ही देशी भाई हैं। उन्हें जीतना मेरा और आपका काम है। जब तक आपके ही भाई का डर आपको रहेगा, तब तक आप कभी मक़सद हासिल नहीं कर सकेंगे। 56

उपकारी की संपत्ति बढ़ती ही रहती है, कहा भी है : पुण्य की जड़ पाताल तक जाती है। 57

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हिन्दुस्तान की दशा-दो पाठक : हिन्दुस्तान की शान्ति के बारे में मेरा जो मोह था वह आपने ले लिया। अब तो याद नहीं आता कि आपने मेरे पास कुछ भी रहने दिया हो। संपादक : अब तक तो मैंने आपको सिर्फ धर्म की दशा का ही ख़्याल कराया है, लेकिन हिन्दुस्तान रंक क्यों है? इस बारे में मैं अपने विचार आपको बताऊंगा तब तो शायद आप मुझसे नफ़रत ही करेंगे, क्योंकि आज तक हमने और आपने जिन चीज़ों को लाभकारी माना है, वे मुझे तो नुकसानदेह ही मालूम होती हैं। पाठक : वे क्या हैं? अच्छा करने वाले के मन संपादक : हिन्दुस्तान को रेलों ने, वकीलों ने और में स्वार्थ नहीं रहता। वह डॉक्टरों ने कंगाल बना दिया है। यह एक ऐसी जल्दी नहीं करेगा। वह हालत है कि अगर हम समय पर नहीं चेतेंगे, तो जानता है कि आदमी पर चारों ओर से घिर कर बरबाद हो जाएँगे। अच्छी बात का असर पाठक : मुझे डर है कि हमारे विचार कभी मिलेंगे डालने में बहुत समय या नहीं! आपने तो जो कुछ अच्छा देखने में आया लगता है। बुरी बात ही है और अच्छा माना गया है, उसी पर धावा बोल तेजी से बढ़ सकती है। दिया है! अब बाकी क्या रहा ? घर बनाना मुश्किल है, तोड़ना सरल है। संपादक : आपको धीरज रखना होगा। सभ्यता नुकसान करने वाली कैसे है- यह तो मुश्किल से मालूम हो सकता है। डॉक्टर आपको बतलायेंगे कि क्षय का मरीज मौत के दिन तक भी जीने की आशा रखता है। क्षय का रोग बाहर दिखाई देने वाली हानि नहीं पहुँचाता और वह रोग आदमी को झूठी लाली देता है। इससे बीमार विश्वास में बहता रहता है और आखिर डूब जाता है। सभ्यता को भी ऐसा ही समझिये। वह एक अदृश्य रोग है। उससे चेतकर रहिये। पाठक : अच्छा, तो अब आप रेलपुराण सुनाइये। 59

हिन्द स्वराज्य संपादक : आपके दिल में यह बात तुरन्त उठेगी कि अगर रेल न हो तो अंग्रेजों का क़ाबू हिन्दुस्तान पर जितना है उतना तो नहीं ही रहेगा। रेल से महामारी फैली है। अगर रेलगाड़ी न हो तो कुछ ही लोग एक जगह से दूसरी जगह जाएँगे और इस कारण संक्रामक रोग सारे देश में नहीं पहुँच पायेंगे। पहले हम कुदरती तौर पर ही 'सेग्रोगेशन' सूतक पालते थे। रेल से अकाल बढ़े हैं, क्योंकि रेलगाड़ी की सुविधा के कारण लोग अपना अनाज बेच डालते हैं। जहाँ महँगाई हो वहाँ अनाज खिंच जाता है, लोग लापरवाह बनते हैं और उससे अकाल का दुःख बढ़ता है। रेल से दुष्टता बढ़ती है। बुरे लोग अपनी बुराई तेजी से फैला सकते हैं। हिन्दुस्तान में जो पवित्र स्थान थे, वे अपवित्र बन गये हैं। पहले लोग बड़ी मुसीबत से वहाँ जाते थे। ऐसे लोग वहाँ सच्ची भावना से ईश्वर भजने जाते थे, अब तो ठगों की टोली सिर्फ़ ठगने के लिए वहाँ जाती है।

[हाशिया / Sidebar]: रेलगाड़ी की सुविधा के कारण लोग अपना अनाज बेच डालते हैं। जहाँ महँगाई हो वहाँ अनाज खिंच जाता है, लोग लापरवाह बनते हैं और उससे अकाल का दुः ख बढ़ता है। रेल से दुष्टता बढ़ती है। बुरे लोग अपनी बुराई तेजी से फैला सकते हैं। हिन्दुस्तान में जो पवित्र स्थान थे, वे अपवित्र बन गए हैं।

पाठक : यह तो आपने इकतरफा बात कही। जैसे खराब लोग वहाँ जा सकते हैं वैसे अच्छे भी तो जा सकते हैं। वे क्या रेलगाड़ी का पूरा लाभ नहीं लेते ? संपादक : जो अच्छा होता है वह बीरबहूटी की तरह धीरे चलता है। उसकी रेल से नहीं बनती। अच्छा करने वाले के मन में स्वार्थ नहीं रहता। वह जल्दी नहीं करेगा। वह जानता है कि आदमी पर अच्छी बात का असर डालने में बहुत समय लगता है। बुरी बात ही तेजी से बढ़ सकती है। घर बनाना मुश्किल है, तोड़ना सरल है। इसलिए रेलगाड़ी हमेशा दुष्टता का ही फैलाव करेगी, यह बराबर समझ लेना चाहिए। उससे अकाल फैलेगा या नहीं, इस बारे में कोई शास्त्रकार मेरे मन में घड़ी भर शंका पैदा कर सकता है, लेकिन रेल से दुष्टता बढ़ती है यह बात जो मेरे मन में जम गयी है वह मिटने वाली नहीं है। पाठक : लेकिन रेल का सबसे बड़ा लाभ दूसरे सब नुकसानों को भुला देता है। रेल है तो आज हिन्दुस्तान में एक राष्ट्र का जोश देखने में आता है। 60

हिन्द स्वराज्य इसलिए मैं तो कहूँगा कि रेल के आने से कोई नुकसान नहीं हुआ। संपादक : यह आपकी भूल ही है। आपको अंग्रेज़ों ने सिखाया है कि आप एक राष्ट्र नहीं थे और एक राष्ट्र बनने में आपको सैकड़ों बरस लगेंगे। यह बात बिल्कुल बेबुनियाद है। जब अंग्रेज हिन्दुस्तान में नहीं थे तब हम एक राष्ट्र थे, हमारे विचार एक थे, हमारा रहन-सहन एक था, तभी तो अंग्रेज़ों ने यहाँ एक राज्य क़ायम किया। भेद तो हमारे बीच बाद में उन्होंने पैदा किये। पाठक : यह बात मुझे ज्यादा समझनी होगी। संपादक : मैं जो कहता हूँ वह बिना सोचे- समझे नहीं कहता। एक राष्ट्र का यह अर्थ नहीं कि हमारे बीच कोई मतभेद नहीं था, लेकिन हमारे मुख्य लोग पैदल या बैलगाड़ी में हिन्दुस्तान का सफ़र करते थे, वे एक- दूसरे की भाषा सीखते थे और उनके बीच कोई अन्तर नहीं था। जिन दूरदर्शी पुरुषों ने सेतुबंध रामेश्वर, जगन्नाथपुरी और हरिद्वार की यात्रा ठहराई, उनका आपकी राय में क्या ख़्याल होगा ? वे मूर्ख नहीं थे, यह तो आप क़बूल करेंगे। वे जानते थे कि ईश्वर भजन घर बैठे भी होता है। उन्हीं ने हमें यह सिखाया है कि मन चंगा तो कठौती में गंगा, लेकिन उन्होंने सोचा कि कुदरत ने


[दाहिनी ओर का उद्धरण / Side Box Text] जिन दूरदर्शी पुरुषों ने सेतुबंध रामेश्वर, जगन्नाथपुरी और हरिद्वार की यात्रा ठहराई, उनका आपकी राय में क्या ख़्याल होगा ? वे मूर्ख नहीं थे, यह तो आप क़बूल करेंगे। वे जानते थे कि ईश्वर भजन घर बैठे भी होता है। उन्हीं ने हमें यह सिखाया है कि मन चंगा तो कठौती में गंगा, लेकिन उन्होंने सोचा कि कुदरत ने हिन्दुस्तान को एक-देश बनाया है, इसलिए वह एक राष्ट्र होना चाहिए।

हिन्दुस्तान को एक देश बनाया है, इसलिए वह एक राष्ट्र होना चाहिए। इसलिए उन्होंने अलग-अलग स्थान तय करके लोगों को एकता का विचार इस तरह दिया, जैसा दुनिया में और कहीं नहीं दिया गया है। दो अंग्रेज जितने एक नहीं हैं उतने हम हिन्दुस्तानी एक थे और एक हैं। सिर्फ़ हम और आप, जो खुद को सभ्य मानते हैं, उन्हीं के मन में ऐसा भ्रम पैदा हुआ कि हिन्दुस्तान में हम अलग-अलग राष्ट्र हैं। रेल के कारण हम अपने को अलग राष्ट्र मानने लगे और रेल के कारण एक-राष्ट्र का ख़्याल फिर से हमारे मन में आने लगा, ऐसा आप मानें तो मुझे हर्ज नहीं है। अफ़ीमची कह सकता है कि अफ़ीम 61

हिन्द स्वराज के नुकसान का पता मुझे अफ़ीम से चला, इसलिए अफ़ीम अच्छी चीज़ है। यह सब आप अच्छी तरह सोचिये। अभी आपके मन में और भी शंकाएँ उठेंगी, लेकिन आप खुद उन सबको हल कर सकेंगे। पाठक : आपने जो कुछ कहा उस पर मैं सोचूँगा, लेकिन एक सवाल मेरे मन में इसी समय उठता है। मुसलमान हिन्दुस्तान में आये उसके पहले के हिन्दुस्तान की बात आपने की, लेकिन अब तो मुसलमानों, पारसियों, ईसाइयों की हिन्दुस्तान में बड़ी संख्या है, वे एक राष्ट्र नहीं हो सकते। कहा जाता है कि हिन्दू-मुसलमानों में कट्टर बैर है। हमारी कहावतें भी ऐसी ही हैं। ‘मियाँ और महादेव की नहीं बनेगी।' हिन्दू पूर्व में ईश्वर को पूजता है, तो मुस्लिम पश्चिम में पूजता है। मुसलमान हिन्दू को बुतपरस्त (मूर्तिपूजक) मानकर उससे नफ़रत करता है। हिन्दू मूर्तिपूजक है, मुसलमान मूर्ति को तोड़ने वाला है। हिन्दू गाय को पूजता है, मुसलमान उसे मारता है। हिन्दू अहिंसक है, मुसलमान हिंसक। यों पग-पग पर जो विरोध है, वह कैसे मिटे और हिन्दुस्तान एक कैसे हो ? 62

जो धर्म इस लोक की बात छोड़कर परलोक की बात करता है वह धर्म नहीं हो सकता। 63

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हिन्दुस्तान की दशा-तीन संपादक : आपका आख़िरी सवाल बड़ा गम्भीर मालूम होता है, लेकिन सोचने पर वह सरल मालूम होगा। यह सवाल उठा है, उसका कारण भी रेल, वकील और डॉक्टर हैं। वकीलों और डॉक्टरों का विचार तो अभी करना बाकी है। रेलों का विचार हम कर चुके। इतना मैं जोड़ता हूँ कि मनुष्य इस तरह पैदा किया गया है कि अपने हाथ-पैर से बने उतनी ही आने-जाने वगैरह की हलचल उसे करनी चाहिए। अगर हम रेल वगैरह साधनों से दौड़धूप करें ही नहीं, तो बहुत पेचीदे सवाल हमारे सामने आयेंगे ही नहीं। हम खुद होकर दुः ख को न्योतते हैं। भगवान ने मनुष्य की हद उसके शरीर की बनावट से ही बाँध दी, लेकिन मनुष्य ने उस भगवान ने मनुष्य की बनावट की हद को लाँघने के उपाय ढूँढ निकाले। हद उसके शरीर की मनुष्य को अक्ल इसलिए दी गई है कि उसकी मदद बनावट से ही बाँध से वह भगवान को पहचाने, पर मनुष्य ने अक्ल का दी, लेकिन मनुष्य ने उपयोग भगवान को भूलने में किया। मैं अपनी कुदरती उस बनावट की हद हद के मुताबिक अपने आसपास रहने वालों की ही को लाँघने के उपाय सेवा कर सकता हूँ, पर मैंने तुरन्त अपनी मगरूरी में ढूँढ निकाले। ढूँढ निकाला कि मुझे तो सारी दुनिया की सेवा अपने तन से करनी चाहिए। ऐसा करने में अनेक धर्मों के और कई तरह के लोगों का साथ होगा। यह बोझ मनुष्य उठा ही नहीं सकता और इसलिए अकुलाता है। इस विचार से आप समझ लेंगे कि रेलगाड़ी सचमुच एक तूफानी साधन है। मनुष्य रेलगाड़ी का उपयोग करके भगवान को भूल गया है। पाठक : पर मैं तो अब जो सवाल मैंने उठाया है उसका जवाब सुनने को अधीर हो रहा हूँ। मुसलमानों के आने से हमारा एक राष्ट्र रहा या मिटा ? संपादक : हिन्दुस्तान में चाहे जिस धर्म के आदमी रह सकते हैं, उससे वह एक राष्ट्र मिटने वाला नहीं है। जो नये लोग उसमें दाखिल होते हैं, वे उसकी प्रजा को तोड़ नहीं सकते, वे उसकी प्रजा में घुलमिल जाते हैं। ऐसा हो तभी कोई मुल्क एक राष्ट्र माना जाएगा। ऐसे मुल्क में दूसरे लोगों का समावेश करने का गुण होना चाहिए। हिन्दुस्तान ऐसा था और आज भी है। यों तो 65

हिन्द स्वराज्य जितने आदमी उतने धर्म ऐसा मान सकते हैं। एक राष्ट्र होकर रहने वाले लोग एक-दूसरे के धर्म में दखल नहीं देते, अगर देते हैं तो समझना चाहिए कि वे एक राष्ट्र होने लायक नहीं हैं। अगर हिन्दू मानें कि सारा हिन्दुस्तान सिर्फ़ हिन्दुओं से भरा होना चाहिए, तो यह एक निरा सपना है। मुसलमान अगर ऐसा मानें कि उसमें सिर्फ़ मुसलमान ही रहें, तो उसे भी सपना ही समझिए। फिर भी हिन्दू, मुसलमान, पारसी, ईसाई, जो इस देश को अपना वतन मानकर बस चुके हैं। एक देशी, एक मुल्की हैं, वे देशी भाई हैं और उन्हें एक-दूसरे के स्वार्थ के लिए भी एक होकर रहना पड़ेगा। दुनिया के किसी भी हिस्से में एक राष्ट्र का अर्थ एक धर्म नहीं किया गया है, हिन्दुस्तान में तो ऐसा था ही नहीं। पाठक : लेकिन दोनों कौमों के कट्टर बैर का क्या ? उन्हें इतिहास लिखने की आदत है, हर एक जाति के रीति-रिवाज जानने का वे दंभ करते हैं। ईश्वर ने हमारा मन तो छोटा बनाया है, फिर भी वे ईश्वरी दावा करते आये हैं और तरह-तरह के प्रयोग करते हैं। संपादक : ‘कट्टर बैर’ शब्द दोनों के दुश्मन ने खोज निकाला है। जब हिन्दू-मुसलमान झगड़ते थे तब वे ऐसी बातें भी करते थे। झगड़ा तो हमारा सबका बंद हो गया है। फिर कट्टर बैर काहे का ? और इतना याद रखिये कि अंग्रेजों के आने के बाद ही हमारा झगड़ा बन्द हुआ ऐसा नहीं है। हिन्दू लोग मुसलमान बादशाहों के मातहत और मुसलमान हिन्दू राजाओं के मातहत रहते आये हैं। दोनों को बाद में समझ में आ गया कि झगड़ने से कोई फायदा नहीं, लड़ाई से कोई अपना धर्म नहीं छोड़ेंगे और कोई अपनी ज़िद भी नहीं छोड़ेंगे। इसलिए दोनों ने मिलकर रहने का फ़ैसला किया। झगड़े तो फिर से अंग्रेजों ने शुरू करवाये। ‘मियाँ और महादेव की नहीं बनती’ इस कहावत को भी ऐसा ही समझिए। कुछ कहावतें हमेशा के लिए रह जाती हैं और नुकसान करती ही रहती हैं। हम कहावत की धुन में इतना भी याद नहीं रखते कि बहुतेरे हिन्दुओं और मुसलमानों के बाप-दादे एक ही थे, हमारे अंदर एक ही खून है। क्या धर्म बदला इसलिए हम आपस में दुश्मन बन गये ? धर्म तो एक ही जगह पहुँचने के अलग-अलग रास्ते हैं। हम दोनों अलग-अलग रास्ते लें, इसमें क्या हो गया ? उसमें लड़ाई काहे की ? 66

हिन्द स्वराज्य और ऐसी कहावतें तो शैवों और वैष्णवों में भी चलती हैं, पर इससे कोई यह नहीं कहेगा कि वे एक-राष्ट्र नहीं हैं। वेदधर्मियों और जैनों के बीच बहुत फर्क माना जाता है, फिर भी इससे वे अलग राष्ट्र नहीं बन जाते। हम गुलाम हो गये हैं, इसीलिए अपने झगड़े हम तीसरे के पास ले जाते हैं। जैसे मुसलमान मूर्ति का खंडन करने वाले हैं, वैसे हिन्दुओं में भी मूर्ति का खंडन करने वाला एक वर्ग देखने में आता है। ज्यों-ज्यों सही ज्ञान बढ़ेगा त्यों-त्यों हम समझते जाएँगे कि हमें पसंद न आने वाला धर्म दूसरा आदमी पालता हो, तो भी उससे बैरभाव रखना हमारे लिए ठीक नहीं, हम उस पर जबरदस्ती न करें। पाठक : अब गोरक्षा के बारे में अपने विचार बताइये। संपादक : मैं खुद गाय को पूजता हूँ यानी मान देता हूँ। गाय हिन्दुस्तान की रक्षा करने वाली है, मैं अपनी कुदरती हद के क्योंकि उसकी संतान पर हिन्दुस्तान का, जो खेती मुताबिक अपने आसपास प्रधान देश है, आधार है। गाय कई तरह से रहने वालों की ही सेवा कर उपयोगी है। यह तो मुसलमान भाई भी कुबूल सकता हूँ, पर मैंने तुरन्त करेंगे। अपनी मगरूरी में ढूँढ लेकिन जैसे मैं गाय को पूजता हूँ वैसे मैं निकाला कि मुझे तो सारी मनुष्य को भी पूजता हूँ। जैसे गाय उपयोगी है दुनिया की सेवा अपने वैसे मनुष्य भी, फिर चाहे वह मुसलमान हो या तन से करनी चाहिए। हिन्दु उपयोगी है। तब क्या गाय को बचाने के लिए मैं मुसलमान से लड़ूँगा? क्या उसे मैं मारूँगा? ऐसा करने से मैं मुसलमान का और गाय का भी दुश्मन बनूँगा। इसलिए मैं कहूँगा कि गाय की रक्षा करने का एक यही उपाय है कि मुझे अपने मुसलमान भाई के सामने हाथ जोड़ने चाहिए और उसे देश की खातिर गाय को बचाने के लिए समझाना चाहिए। अगर वह न समझे तो मुझे गाय को मरने देना चाहिए, क्योंकि वह मेरे बस की बात नहीं। अगर मुझे गाय पर अत्यंत दया आती हो तो अपनी जान दे देनी चाहिए, लेकिन मुसलमान की जान नहीं लेनी चाहिए। वही धार्मिक कानून है, ऐसा मैं तो मानता हूँ। 'हाँ' और 'नहीं' के बीच हमेशा बैर रहता है। अगर मैं वाद-विवाद करूँगा, तो मुसलमान भी वाद-विवाद करेगा। अगर मैं टेढ़ा बनूँगा, तो वह भी टेढ़ा बनेगा। अगर मैं बालिशत भर नमूँगा, तो वह हाथ भर नमेगा और अगर वह नहीं भी नमे तो मेरा नमना ग़लत नहीं कहलायेगा। जब हमने ज़िद 67

हिन्द स्वराज्य की तब गोकशी बढ़ी। मेरी राय है कि गोरक्षा प्रचारिणी सभा गोवध प्रचारिणी सभा मानी जानी चाहिए। ऐसी सभा का होना हमारे लिए बदनामी की बात है। जब गाय की रक्षा करना हम भूल गये तब ऐसी सभा की ज़रूरत पड़ी होगी। मेरा भाई गाय को मारने दौड़े, तो मैं उसके साथ कैसा बरताव करूँगा? उसे मारूँगा या उसके पैरों में पड़ूँगा? अगर आप कहें कि मुझे उसके पाँव पड़ना चाहिए, तो मुझे मुसलमान भाई के भी पाँव पड़ना चाहिए। गाय को दुःख देकर हिन्दू गाय का वध हिन्दू-मुसलमान दोनों जोश में करता है, इससे गाय को कौन छुड़ाता है? जो आते हैं तब अक्सर गलत हिन्दू गाय की औलाद को पैना (आर) भोंकता काम कर बैठते हैं। उन्हें हमें है, उस हिन्दू को कौन समझाता है? इससे सहन करना होगा, लेकिन हमारे एक राष्ट्र होने में कोई रुकावट नहीं ऐसी तकरार को भी बड़ी आई है। वकालत बघारकर हम अंग्रेजों अंत में, हिन्दू अहिंसक और मुसलमान की अदालत में न ले जाएँ। हिंसक है, यह बात अगर सही हो तो अहिंसक दो आदमी लड़ें लड़ाई में का धर्म क्या है? अहिंसक को आदमी की दोनों के सिर या एक का सिर हिंसा करनी चाहिए, ऐसा कहीं लिखा नहीं है। फूटे तो उसमें तीसरा क्या अहिंसक के लिए तो राह सीधी है। उसे एक न्याय करेगा? को बचाने के लिए दूसरे की हिंसा करनी ही नहीं चाहिए। उसे तो मात्र चरण-वंदना करनी चाहिए, सिर्फ़ समझाने का काम करना चाहिए। इसी में उसका पुरुषार्थ है। लेकिन क्या तमाम हिन्दू अहिंसक हैं? सवाल की जड़ में जाकर विचार करने पर मालूम होता है कि कोई भी अहिंसक नहीं है, क्योंकि जीव को तो हम मारते ही हैं, लेकिन इस हिंसा से हम छूटना चाहते हैं, इसलिए अहिंसक कहलाते हैं। साधारण विचार करने से मालूम होता है कि बहुत से हिन्दू माँस खाने वाले हैं, इसलिए वे अहिंसक नहीं माने जा सकते। खींचतान कर दूसरा अर्थ करना हो तो मुझे कुछ कहना नहीं है। जब ऐसी हालत है तब मुसलमान हिंसक और हिन्दू अहिंसक हैं, इसलिए दोनों की नहीं बनेगी, वह सोचना बिल्कुल गलत है। ऐसे विचार स्वार्थी धर्म शिक्षकों, शास्त्रियों और मुल्लाओं ने हमें दिये हैं और इसमें जो कमी रह गई थी, उसे अंग्रेजों ने पूरा किया है। उन्हें इतिहास 68

हिन्द स्वराज लिखने की आदत है, हर एक जाति के रीति-रिवाज जानने का वे दंभ करते हैं। ईश्वर ने हमारा मन तो छोटा बनाया है, फिर भी वे ईश्वरी दावा करते आये हैं और तरह-तरह के प्रयोग करते हैं। वे अपने बाजे खुद बजाते हैं और हमारे मन में अपनी बात सही होने का विश्वास जमाते हैं। हम भोलेपन में उस सब पर भरोसा कर लेते हैं। जो टेढ़ा नहीं देखना चाहते वे देख सकेंगे कि कुरान शरीफ़ में ऐसे सैकड़ों वचन हैं, जो हिन्दुओं को मान्य हों, भगवद् गीता में ऐसी बातें लिखी हैं कि जिनके ख़िलाफ गाय को दुःख देकर मुसलमान को कोई भी ऐतराज नहीं हो सकता। हिन्दू गाय का वध करता कुरान शरीफ़ का कुछ भाग मैं न समझ पाऊँ या है, इससे गाय को कौन कुछ भाग मुझे पसंद न आए, इस वजह से क्या मैं छुड़ाता है? जो हिन्दू गाय उसे मानने वाले से नफ़रत करूँ? झगड़ा दो से ही की औलाद को पैना हो सकता है। मुझे झगड़ा नहीं करना हो तो (आर) भोंकता है, उस मुसलमान क्या करेगा? और मुसलमान को झगड़ा हिन्दू को कौन समझाता न करना हो तो मैं क्या कर सकता हूँ? हवा में हाथ है? इससे हमारे एक राष्ट्र उठाने वाले का हाथ उखड़ जाता है। सब अपने- होने में कोई रुकावट अपने धर्म का स्वरूप समझकर उससे चिपके रहें नहीं आई है। और शास्त्रियों तथा मुल्लाओं को बीच में न आने दें तो झगड़े का मुँह हमेशा के लिए काला ही रहेगा। पाठक : अंग्रेज दोनों क़ौमों का मेल होने देंगे? संपादक : यह सवाल डरपोक आदमी का है। यह सवाल हमारी हीनता को दिखाता है। अगर दो भाई चाहते हों कि उनका आपस में मेल बना रहे, तो कौन उनके बीच में आ सकता है? अगर तीसरा आदमी दोनों के बीच झगड़ा पैदा कर सके, तो उन भाइयों को हम कच्चे दिल के कहेंगे। उसी तरह अगर हम हिन्दू और मुसलमान कच्चे दिल के होंगे, तो फिर अंग्रेजों का कुसूर निकालना बेकार होगा। कच्चा घड़ा एक कंकड़ से नहीं तो दूसरे कंकड़ से फूटेगा ही। घड़े को बचाने का रास्ता यह नहीं है कि उसे कंकड़ से दूर रखा जाए, बल्कि यह है कि उसे पक्का बनाया जाए, जिससे कंकड़ का भय ही न रहे। उसी तरह हमें पक्के दिल के बनना है। हम दोनों में से कोई एक भी 69

हिन्द स्वराज

पक्के दिल के होंगे, तो तीसरे की कुछ नहीं चलेगी। यह काम हिन्दू आसानी से कर सकते हैं। उनकी संख्या बड़ी है, वे अपने को ज्यादा पढ़े-लिखे मानते हैं, इसलिए वे पक्का दिल रख सकते हैं। दोनों क़ौमों के बीच अविश्वास है, अगर दो भाई चाहते हों कि इसलिए मुसलमान लॉर्ड मॉर्ले से कुछ हक उनका आपस में मेल बना रहे, माँगते हैं। इसमें हिन्दू क्यों विरोध करें? तो कौन उनके बीच में आ अगर हिन्दू विरोध न करें तो अंग्रेज चौंकेंगे, सकता है ? अगर तीसरा आदमी मुसलमान धीरे-धीरे हिन्दुओं का भरोसा दोनों के बीच झगड़ा पैदा कर करने लगेंगे और दोनों का भाईचारा बढ़ेगा। सके, तो उन भाइयों को हम अपने झगड़े अंग्रेजों के पास ले जाने में हमें कच्चे दिल के कहेंगे। उसी तरह शरमाना चाहिए। ऐसा करने से हिन्दू कुछ अगर हम हिन्दू और मुसलमान खोने वाले नहीं हैं, इसका हिसाब आप खुद कच्चे दिल के होंगे, तो फिर लगा सकेंगे। जिस आदमी ने दूसरे पर अंग्रेजों का कुसूर निकालना विश्वास किया, उसने आज तक कुछ खोया बेकार होगा। कच्चा घड़ा एक नहीं है। कंकड़ से नहीं तो दूसरे कंकड़ मैं यह नहीं कहना चाहता कि हिन्दू- से फूटेगा ही। घड़े को बचाने मुसलमान कभी झगड़ेंगे ही नहीं। दो भाई का रास्ता यह नहीं है कि उसे साथ रहें तो उनके बीच तकरार होती है। कंकड़ से दूर रखा जाए। कभी हमारे सिर भी फूटेंगे। ऐसा होना ज़रूरी नहीं है, लेकिन सब लोग एक सी अक्ल के नहीं होते। दोनों जोश में आते हैं तब अक्सर गलत काम कर बैठते हैं। उन्हें हमें सहन करना होगा, लेकिन ऐसी तकरार को भी बड़ी वकालत बघारकर हम अंग्रेजों की अदालत में न ले जाएँ। दो आदमी लड़ें, लड़ाई में दोनों के सिर या एक का सिर फूटे तो उसमें तीसरा क्या न्याय करेगा ? जो लड़ेंगे वे जख्मी भी होंगे। बदन से बदन टकरायेगा तब कुछ निशानी तो रहेगी ही। उसमें न्याय क्या हो सकता है?

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न्याय की अदालतों से भी एक बड़ी अदालत होती है। वह अदालत अंतर की आवाज़ की है और वह अन्य सब अदालतों से ऊपर की अदालत है।

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हिन्दुस्तान की दशा-चार पाठक : आप कहते हैं कि दो आदमी झगड़ें तब उसका न्याय भी नहीं कराना चाहिए। यह तो आपने अजीब बात कही। संपादक : इसे अजीब कहिये या दूसरा कोई विशेषण लगाइये, पर बात सही है। आपकी शंका हमें वकील-डॉक्टरों की पहचान कराती है। मेरी राय है कि वकीलों ने हिन्दुस्तान को गुलाम बनाया है, हिन्दू-मुसलमानों के झगड़े बढ़ाये हैं और अंग्रेजी हुकूमत को यहाँ मजबूत किया है। पाठक : ऐसे इल्जाम लगाना आसान है, लेकिन उन्हें साबित करना मुश्किल होगा। वकीलों के सिवा दूसरा कौन हमें आजादी का मार्ग बताता ? उनके सिवा गरीबों का बचाव कौन करता ? उनके सिवा कौन हमें न्याय दिलाता ? देखिये, स्व. मनमोहन घोष ने कितनों को बचाया ? खुद एक कौड़ी भी उन्होंने नहीं ली। कांग्रेस, जिसके आपने ही बखान किये हैं, वकीलों से निभती है और उनकी मेहनत से ही उसमें काम होते हैं। इस वर्ग की आप निंदा करें, यह इन्साफ़ के साथ गैर इन्साफ़ करने जैसा है। वह तो आपके हाथ में अखबार आया इसलिए चाहे जो बोलने की छूट लेने जैसा लगता है। [बाजू का बॉक्स:] हिन्दू-मुसलमान आपस में लड़े हैं। तटस्थ आदमी उनसे कहेगा कि आप गयी-बीती को भूल जाएँ, इसमें दोनों का क़ुसूर रहा होगा। अब दोनों मिलकर रहिए, लेकिन वे वकील के पास जाते हैं। वकील का फ़र्ज़ हो जाता है कि वह मुवक्किल की ओर ज़ोर लगाए। अगर वह ऐसा नहीं करता तो माना जाएगा कि वह अपने पेशे को बट्टा लगाता है। इसलिए वकील तो आमतौर पर झगड़ा आगे बढ़ाने की ही संपादक : जैसा आप मानते हैं वैसा ही मैं भी एक समय मानता था। वकीलों ने कभी कोई अच्छा काम नहीं किया, ऐसा मैं आपसे नहीं कहना चाहता। मि. मनमोहन घोष की मैं इज़्ज़त करता हूँ। उन्होंने गरीबों की मदद की थी यह बात सही है। कांग्रेस में वकीलों ने कुछ काम किया है, यह भी हम मान सकते हैं। वकील भी आखिर मनुष्य हैं और मनुष्य जाति में कुछ तो अच्छाई है ही। वकीलों की भलमनसी के जो बहुत से किस्से देखने में 73