भारतकोश
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हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

Hind Swaraj by Mahatma Gandhi

मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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इंग्लैंड की हालत पाठक : आप जो कहते हैं उस पर से तो मैं यही अंदाज़ा लगाता हूँ कि इंग्लैंड में जो राज्य चलता है वह ठीक नहीं है और हमारे लायक नहीं है। संपादक : आपका यह ख़्याल सही है। इंग्लैंड में आज जो हालत है वह सचमुच तरस खाने लायक है। मैं तो भगवान से यही माँगता हूँ कि हिन्दुस्तान की ऐसी हालत कभी न हो। जिसे आप पार्लियामेन्टों की माता कहते हैं, वह पार्लियामेन्ट तो बाँझ और बेसवा है। ये दोनों शब्द बहुत कड़े हैं, तो भी उसे अच्छी तरह लागू होते हैं। मैंने उसे बाँझ कहा, क्योंकि अब तक उस पार्लियामेन्ट ने अपने आप पार्लियामेन्ट का काम एक भी अच्छा काम नहीं किया। अगर उस पर इतना सरल होना चाहिए दबाव डालने वाला कोई न हो तो वह कुछ भी कि दिन-ब-दिन उसका न करे, ऐसी उसकी कुदरती हालत है और वह तेज बढ़ता जाए और लोगों बेसवा है, क्योंकि जो मंत्रिमंडल उसे रखे उसके पर उसका असर होता पास वह रहती है। आज उसका मालिक जाए, लेकिन इससे उल्टे एसक्विथ है, तो कल बालफर होगा और परसों इतना तो सब क़ुबूल करते कोई तीसरा। हैं कि पार्लियामेन्ट के पाठक : आपके बोलने में कुछ व्यंग्य है। बाँझ मेम्बर दिखावटी और शब्द को अब तक आपने लागू नहीं किया। स्वार्थी पाये जाते हैं। पार्लियामेन्ट लोगों की बनी है, इसलिए बेशक लोगों के दबाव से ही वह काम करेगी। वही उसका गुण है, उसके ऊपर का अंकुश है। संपादक : यह बड़ी गलत बात है। अगर पार्लियामेन्ट बाँझ न हो तो इस तरह होना चाहिए, लोग उसमें अच्छे से अच्छे मेम्बर चुनकर भेजते हैं। मेम्बर तनख्वाह नहीं लेते, इसलिए उन्हें लोगों की भलाई के लिए पार्लियामेन्ट में जाना चाहिए। लोग खुद सुशिक्षित-संस्कारी माने जाते हैं, इसलिए उनसे भूल नहीं होती ऐसा हमें मानना चाहिए। ऐसी पार्लियामेन्ट को अर्जी की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए, न दबाव की। उस पार्लियामेन्ट का काम इतना सरल होना 35

हिन्द स्वराज्य चाहिए कि दिन-ब-दिन उसका तेज बढ़ता जाए और लोगों पर उसका असर होता जाए, लेकिन इससे उल्टे इतना तो सब कुबूल करते हैं कि पार्लियामेन्ट के मेम्बर दिखावटी और स्वार्थी पाये जाते हैं। सब अपना मतलब साधने की सोचते हैं। सिर्फ डर के कारण ही पार्लियामेन्ट कुछ काम करती है। जो काम आज किया वह कल उसे रद्द करना पड़ता है। आज तक एक भी चीज को पार्लियामेन्ट ने ठिकाने लगाया हो ऐसी कोई मिसाल देखने में नहीं आती। बड़े सवालों की चर्चा जब पार्लियामेन्ट

[बायाँ स्तंभ] पार्लियामेन्ट को मैंने बेसवा | [दायाँ स्तंभ] में चलती है, तब उसके मेम्बर पैर फैलाकर [बायाँ स्तंभ] कहा, वह भी ठीक है। | [दायाँ स्तंभ] लेटते हैं या बैठे-बैठे झपकियाँ लेते हैं। [बायाँ स्तंभ] उसका कोई मालिक नहीं है। | [दायाँ स्तंभ] उस पार्लियामेन्ट में मेम्बर इतने जोरों से [बायाँ स्तंभ] उसका कोई एक मालिक | [दायाँ स्तंभ] चिल्लाते हैं कि सुनने वाले हैरान-परेशान हो [बायाँ स्तंभ] नहीं हो सकता, लेकिन मेरे | [दायाँ स्तंभ] जाते हैं। उसके एक महान लेखक ने उसे [बायाँ स्तंभ] कहने का मतलब इतना ही | [दायाँ स्तंभ] ‘दुनिया की बातूनी’ जैसा नाम दिया है। [बायाँ स्तंभ] नहीं है। जब कोई उसका | [दायाँ स्तंभ] मेम्बर जिस पक्ष के हों उस पक्ष के लिए [बायाँ स्तंभ] मालिक बनता है, जैसे | [दायाँ स्तंभ] अपना मत वे बगैर सोचे-विचारे देते हैं, देने [बायाँ स्तंभ] प्रधानमंत्री, तब भी उसकी | [दायाँ स्तंभ] को बंधे हुए हैं। अगर कोई मेम्बर इसमें [बायाँ स्तंभ] चाल एक सरीखी नहीं | [दायाँ स्तंभ] अपवाद रूप निकल आये, तो उसकी [बायाँ स्तंभ] रहती। जैसे बुरे हाल बेसवा | [दायाँ स्तंभ] कम्बख्ती ही समझिये। [बायाँ स्तंभ] के होते हैं, वैसे ही सदा | [दायाँ स्तंभ] जितना समय और पैसा पार्लियामेन्ट खर्च [बायाँ स्तंभ] पार्लियामेन्ट के होते हैं। | [दायाँ स्तंभ] करती है उतना समय और पैसा अगर अच्छे लोगों को मिले तो प्रजा का उद्धार हो जाए। ब्रिटिश पार्लियामेन्ट महज़ प्रजा का खिलौना है और वह खिलौना प्रजा को भारी खर्च में डालता है। ये विचार मेरे खुद के हैं ऐसा आप न मानें। बड़े विचारशील अंग्रेज़ ऐसा विचार रखते हैं। एक मेम्बर ने तो यहाँ तक कहा है कि पार्लियामेन्ट धर्मिष्ठ आदमी के लायक नहीं रही। दूसरे मेम्बर ने तो कहा है कि पार्लियामेन्ट एक ‘बच्चा’ है। बच्चों को कभी आपने हमेशा बच्चा ही रहते देखा है? आज सात सौ बरस के बाद भी अगर पार्लियामेन्ट बच्चा ही हो, तो वह बड़ी कब होगी? पाठक : आपने मुझे सोच में डाल दिया। यह सब मुझे तुरन्त मान लेना चाहिए, ऐसा तो आप नहीं कहेंगे। आप बिल्कुल निराले विचार मेरे मन में 36

हिन्द स्वराज्य पैदा कर रहे हैं। मुझे उन्हें हज़्म करना होगा। अच्छा, अब ‘बेसवा’ शब्द की विवेचना कीजिए। संपादक : मेरे विचारों को आप तुरन्त नहीं मान सकते, यह बात ठीक है। उसके बारे में आपको जो साहित्य पढ़ना चाहिए वह आप पढ़ेंगे तो आपको कुछ ख़्याल आयेगा। पार्लियामेन्ट को मैंने बेसवा कहा, वह भी ठीक है। उसका कोई मालिक नहीं है। उसका कोई एक मालिक नहीं हो सकता, लेकिन मेरे कहने का मतलब इतना ही नहीं है। जब कोई उसका मालिक बनता है, जैसे प्रधानमंत्री, तब भी उसकी चाल एक सरीखी नहीं रहती। जैसे बुरे हाल बेसवा के होते हैं, वैसे ही सदा पार्लियामेन्ट के होते हैं। प्रधानमंत्री को पार्लियामेन्ट की थोड़ी ही परवाह रहती है। वह तो अपनी सत्ता के मद में मस्त रहता है। अपना दल कैसे जीते इसी की लगन उसे रहती है। पार्लियामेन्ट सही काम कैसे करे? इसका वह बहुत कम विचार करता है। अपने दल को बलवान बनाने के लिए प्रधानमंत्री पार्लियामेन्ट से कैसे-कैसे काम करवाता है, इसकी मिसालें जितनी चाहिए उतनी मिल सकती हैं। यह सब सोचने लायक है। मुझे प्रधानमंत्रियों से द्वेष नहीं है, लेकिन तजुरबे से मैंने देखा है कि वे सच्चे देशाभिमानी नहीं कहे जा सकते। जिसे हम घूस कहते हैं, वह घूस वे खुल्लमखुल्ला नहीं लेते-देते, इसलिए भले ही वे ईमानदार कहे जाएँ, लेकिन उनके पास वसीला काम कर सकता है। वे दूसरों से काम निकालने के लिए उपाधि वगैरह की घूस बहुत देते हैं। पाठक : तब तो आज तक जिन्हें हम देशाभिमानी और ईमानदार समझते आए हैं, उन पर भी आप टूट पड़ते हैं। संपादक : हाँ, यह सच है। मुझे प्रधानमंत्रियों से द्वेष नहीं है, लेकिन तजुरबे से मैंने देखा है कि वे सच्चे देशाभिमानी नहीं कहे जा सकते। जिसे हम घूस कहते हैं, वह घूस वे खुल्लमखुल्ला नहीं लेते-देते, इसलिए भले ही वे ईमानदार कहे जाएँ, लेकिन उनके पास वसीला काम कर सकता है। वे दूसरों से काम निकालने के लिए उपाधि वगैरह की घूस बहुत देते हैं। मैं हिम्मत के साथ कह सकता हूँ कि उनमें शुद्ध भावना और सच्ची ईमानदारी नहीं होती। 37

हिन्द स्वराज पाठक : जब आपके ऐसे ख़्याल हैं तो जिन अंग्रेजों के नाम से पार्लियामेन्ट राज करती है उनके बारे में अब कुछ कहिये, ताकि उनके स्वराज्य का पूरा ख़्याल मुझे आ जाए। संपादक : जो अंग्रेज 'वोटर' हैं, उनकी धर्म पुस्तक (बाइबल) तो है अखबार। वे अखबारों से अपने विचार बनाते हैं। अखबार अप्रामाणिक होते हैं, एक ही बात को दो शक्लें देते हैं। एक दल वाले उसी बात को बड़ी बनाकर दिखलाते हैं, तो दूसरे दल वाले उसी को छोटी कर डालते हैं। एक अखबार वाला किसी अंग्रेज नेता को प्रामाणिक मानेगा, तो दूसरा अखबार वाला उसको अप्रामाणिक मानेगा। जिस देश में ऐसे अखबार हैं उस देश के आदमियों की कैसी दुर्दशा होगी? पाठक : यह तो आप ही बताइये। संपादक : उन लोगों के विचार घड़ी-घड़ी में बदलते हैं। उन लोगों में यह कहावत है कि सात-सात बरस में रंग बदलता है। घड़ी के लोलक की तरह वे इधर-उधर घूमा करते हैं। जमकर वे बैठ ही नहीं सकते। कोई दौर-दमाम वाला आदमी हो और उसने अगर बड़ी-बड़ी बातें कर दीं या दावतें दे दीं, तो वे नक्कारची की तरह उसी के ढोल पीटने लग जाते हैं। ऐसे लोगों की पार्लियामेन्ट भी ऐसी ही होती है, उनमें एक बात ज़रूर है। वह यह कि वे अपने देश को खोयेंगे नहीं। अगर किसी ने उस पर बुरी नजर डाली तो वे उसकी मिट्टी पलीद कर देंगे, लेकिन इससे उस प्रजा में सब गुण आ गये या उस प्रजा की नक़ल की जाए, ऐसा नहीं कह सकते। अगर हिन्दुस्तान अंग्रेज प्रजा की नक़ल करे तो हिन्दुस्तान पामाल हो जाए, ऐसा मेरा पक्का ख़्याल है। पाठक : अंग्रेज प्रजा ऐसी हो गई है, इसके आप क्या कारण मानते हैं? संपादक : इसमें अंग्रेजों का कोई ख़ास कुसूर नहीं है, पर यूरोप की आजकल की सभ्यता का कुसूर है। वह सभ्यता नुकसानदेह है और उससे यूरोप की प्रजा पामाल होती जा रही है। 38

आज तक आम लोग, लाखों की संख्या में हमारे जीवन का पोषण करने के लिए मरते आए हैं, अब उनके जीवन का पोषण करने के लिए हमें मरना होगा। बेशक, उनके मरने में और हमारे मरने में बुनियादी फ़र्क़ होगा। वे बिन-जाने और अनिच्छापूर्वक मरे हैं। उनके इस विवश बलिदान ने हमें गिराया है। अब यदि हम ज्ञानपूर्वक और इच्छापूर्वक मरेंगे तो हमारा बलिदान हमें और हमारे समूचे राष्ट्र को ऊपर उठायेगा। यदि हम एक आज़ाद और स्वावलम्बी देश की तरह जीना चाहते हैं, तो इस आवश्यक बलिदान से हमें अपना क़दम पीछे नहीं हटाना चाहिए। 39

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सभ्यता का दर्शन पाठक : अब तो आपको सभ्यता की भी बात करनी होगी। आपके हिसाब से तो यह सभ्यता बिगाड़ करने वाली है। संपादक : मेरे हिसाब से ही नहीं, बल्कि अंग्रेज लेखकों के हिसाब से भी यह सभ्यता बिगाड़ करने वाली है। उसके बारे में बहुत किताबें लिखी गई हैं। वहाँ इस सभ्यता के खिलाफ़ मंडल भी क़ायम हो रहे हैं। एक लेखक ने 'सभ्यता उसके कारण हिन्द स्वराज्य की और उसकी दवा' नाम की किताब लिखी है। उसमें सच्ची खुमारी उसी उसने यह साबित किया है कि यह सभ्यता एक तरह को हो सकती है, जो का रोग है। आत्मबल अनुभव करके शरीर बल से पाठक : यह सब हम क्यों नहीं जानते ? नहीं दबेगा और निडर रहेगा तथा सपने में संपादक : इसका कारण तो साफ है। कोई भी आदमी भी तोप बल का अपने खिलाफ़ जाने वाली बात करे ऐसा शायद ही उपयोग करने की होता है। आज की सभ्यता के मोह में फँसे हुए लोग बात नहीं सोचेगा। उसके खिलाफ़ नहीं लिखेंगे, उल्टे उसको सहारा मिले ऐसी ही बातें और दलीलें ढूँढ निकालेंगे। यह वे जान- बूझकर करते हैं ऐसा भी नहीं है। वे जो लिखते हैं उसे खुद सच मानते हैं। नींद में आदमी जो सपना देखता है, उसे वह सही मानता है। जब उसकी नींद खुलती है तभी उसे अपनी गलती मालूम होती है। ऐसी ही दशा सभ्यता के मोह में फँसे हुए आदमी की होती है। हम जो बातें पढ़ते हैं वे सभ्यता की हिमायत करने वालों की लिखी बातें होती हैं। उनमें बहुत होशियार और भले आदमी हैं। उनके लेखों से हम चौंधिया जाते हैं। यों एक के बाद दूसरा आदमी उसमें फँसता जाता है। पाठक : यह बात आपने ठीक कही। अब आपने जो कुछ पढ़ा और सोचा है, उसका ख़्याल मुझे दीजिए। संपादक : पहले तो हम यह सोचें कि सभ्यता किस हालत का नाम है। इस सभ्यता की सही पहचान तो यह है कि लोग बाहरी दुनिया की खोजों में और 41

हिन्द स्वराज्य शरीर के सुख में धन्यता, सार्थकता और पुरुषार्थ मानते हैं। इसकी कुछ मिसालें लें। सौ साल पहले यूरोप के लोग जैसे घरों में रहते थे उनसे ज्यादा अच्छे घरों में आज वे रहते हैं, यह सभ्यता की निशानी मानी जाती है। इसमें शरीर के सुख की बात है। इसके पहले लोग चमड़े के कपड़े पहनते थे और भालों का इस्तेमाल करते थे। अब वे लंबे पतलून पहनते हैं और शरीर को सजाने के लिए तरह-तरह के कपड़े बनवाते हैं और भाले के बदले एक के बाद एक पाँच गोलियाँ छोड़ सके ऐसी चक्कर वाली बन्दूक इस्तेमाल करते

सभ्यता के हिमायती साफ कहते हैं कि उनका काम लोगों को धर्म सिखाने का नहीं है। धर्म तो ढोंग है, ऐसा कुछ लोग मानते हैं और कुछ लोग धर्म का दंभ भरते हैं, नीति की बातें भी करते हैं। फिर भी मैं आपसे बीस बरस के अनुभव के बाद कहता हूँ कि नीति के नाम से अनीति सिखलाई जाती है।

हैं। यह सभ्यता की निशानी है। किसी मुल्क के लोग, जो जूते वगैरह नहीं पहनते हों, जब यूरोप के कपड़े पहनना सीखते हैं तो जंगली हालत में से सभ्य हालत में आए हुए माने जाते हैं। पहले यूरोप में लोग मामूली हल की मदद से अपने लिए जात-मेहनत करके ज़मीन जोतते थे। उसकी जगह आज भाप के यंत्रों से हल चलाकर एक आदमी बहुत सारी ज़मीन जोत सकता है और बहुत सा पैसा जमा कर सकता है। यह सभ्यता की निशानी मानी जाती है। पहले लोग कुछ ही किताबें लिखते थे और वे अनमोल मानी जाती थीं। आज हर कोई चाहे जो लिखता, छपवाता और लोगों के मन को भरमाता है। यह सभ्यता की निशानी है। पहले लोग बैलगाड़ी से रोज बारह कोस की मंजिल तय करते थे। आज रेलगाड़ी से चार सौ कोस की मंजिल मारते हैं। यह तो सभ्यता की चोटी मानी गई है। यह सभ्यता जैसे-जैसे आगे बढ़ती जाती है वैसे-वैसे यह सोचा जाता है कि लोग हवाई जहाज़ से सफ़र करेंगे और थोड़े ही घंटों में दुनिया के किसी भी भाग में जा पहुँचेंगे। लोगों को हाथ-पैर हिलाने की ज़रूरत नहीं रहेगी। एक बटन दबाया कि आदमी के सामने पहनने की पोशाक हाज़िर हो जाएगी, दूसरा बटन दबाया कि उसे अखबार मिल जाएँगे, तीसरा दबाया कि उसके लिए गाड़ी तैयार हो जाएगी, हमेशा नये भोजन मिलेंगे, हाथ-पैर का काम ही नहीं पड़ेगा, सारा काम कल (यंत्र) से ही किया जाएगा। पहले जब लोग लड़ना चाहते थे तो एक-दूसरे 42

हिन्द स्वराज का शरीर बल आज़माते थे। आज तो तोप के एक गोले से हजारों जानें ली जा सकती हैं। यह सभ्यता की निशानी है। पहले लोग खुली हवा में अपने को ठीक लगे उतना काम स्वतन्त्रता से करते थे। अब हजारों आदमी अपने गुज़रे के लिए इकट्ठा होकर बड़े कारखानों में या खानों में काम करते हैं। उनकी हालत जानवर से भी बदतर हो गई है। उन्हें सीसे वगैरह के कारखानों में जान को जोखिम में डालकर काम करना पड़ता है। इसका लाभ पैसेदार लोगों को मिलता है। पहले लोगों को मार- पीट कर गुलाम बनाया जाता था, आज लोगों को पैसे का और भोग का लालच देकर गुलाम पैगम्बर मोहम्मद साहब की बनाया जाता है। पहले जैसे रोग नहीं थे वैसे रोग सीख के मुताबिक यह आज लोगों में पैदा हो गये हैं और उसके साथ शैतानी सभ्यता है। हिन्दू धर्म डॉक्टर खोज करने लगे हैं कि ये रोग कैसे इसे निरा 'कलजुग' कहता मिटाए जाएँ। ऐसा करने से अस्पताल बढ़े हैं। है। मैं आपके सामने इस यह सभ्यता की निशानी मानी जाती है। पहले सभ्यता का हूबहू चित्र नहीं लोग पत्र लिखते थे तब खास क़ासिद उसे ले खींच सकता। यह मेरी जाता था और उसके लिए काफी खर्च लगता शक्ति के बाहर है, लेकिन था। आज मुझे किसी को गालियाँ देने के लिए आप समझ सकेंगे कि इस पत्र लिखना हो, तो एक पैसे में मैं गालियाँ दे सभ्यता के कारण अंग्रेज सकता हूँ, किसी को मुझे मुबारकबाद देना हो प्रजा में सड़न ने घर कर तो भी मैं उसी दाम में पत्र भेज सकता हूँ, यह लिया है। यह सभ्यता दूसरों सभ्यता की निशानी है। पहले लोग दो या तीन का नाश करने वाली और बार खाते थे और वह भी खुद हाथ से पकाई खुद नाशवान है। हुई रोटी और थोड़ी तरकारी। अब तो हर दो घंटे पर खाना चाहिए और वह यहाँ तक कि लोगों को खाने से फुरसत ही नहीं मिलती और कितना कहूँ? यह सब आप किसी भी पुस्तक में पढ़ सकते हैं। ये सब सभ्यता की सच्ची निशानियाँ मानी जाती हैं और अगर कोई भी इससे भिन्न बात समझाए, तो वह भोला है ऐसा निश्चय ही मानिये। सभ्यता तो मैंने जो बतायी वही मानी जाती है। उसमें नीति या धर्म की बात ही नहीं है। सभ्यता के हिमायती साफ कहते हैं कि उनका काम लोगों को धर्म सिखाने का नहीं है। धर्म तो ढोंग है, ऐसा कुछ लोग मानते हैं और कुछ लोग धर्म का दंभ भरते हैं, नीति की बातें भी करते हैं। फिर भी मैं आपसे बीस बरस के 43

हिन्द स्वराज

अनुभव के बाद कहता हूँ कि नीति के नाम से अनीति सिखलाई जाती है। ऊपर की बातों में नीति हो ही नहीं सकती, यह कोई बच्चा भी समझ सकता है। शरीर का सुख कैसे मिले, यही आज की सभ्यता ढूँढ़ती है और यही देने की वह कोशिश करती है, परंतु वह सुख भी नहीं मिल पाता। यह सभ्यता तो अधर्म है और यह यूरोप में इतने दरजे तक फैल गयी है कि वहाँ के लोग आधे पागल जैसे देखने में आते हैं। उनमें सच्ची कुव्वत नहीं है, वे नशा करके अपनी ताक़त क़ायम रखते हैं। एकान्त में वे बैठ ही नहीं सकते। जो स्त्रियां घर की रानियाँ होनी चाहिए, उन्हें गलियों में भटकना पड़ता है, या कोई मज़दूरी करनी पड़ती है। इंग्लैंड में ही चालीस लाख गरीब औरतों को पेट के लिए सख्त मज़दूरी करनी पड़ती है और आजकल इसके कारण 'सफ्रीजेट' (महिला मताधिकार) का आन्दोलन चल रहा है। यह सभ्यता ऐसी है कि अगर हम धीरज धरकर बैठे रहेंगे, तो सभ्यता की चपेट में आए हुए लोग खुद की जलायी हुई आग में जल मरेंगे। पैगम्बर मोहम्मद साहब की सीख के मुताबिक यह शैतानी सभ्यता है। हिन्दू धर्म इसे निरा 'कलजुग' कहता है। मैं आपके सामने इस सभ्यता का हूबहू चित्र नहीं खींच सकता। यह मेरी शक्ति के बाहर है, लेकिन आप समझ सकेंगे कि इस सभ्यता के कारण अंग्रेज प्रजा में सड़न ने घर कर लिया है। यह सभ्यता दूसरों का नाश करने वाली और खुद नाशवान है। इससे दूर रहना चाहिए और इसीलिये ब्रिटिश और दूसरी पार्लियामेन्ट बेकार हो गई हैं। ब्रिटिश पार्लियामेन्ट अंग्रेज प्रजा की गुलामी की निशानी है, यह पक्की बात है। आप पढ़ेंगे और सोचेंगे तो आपको भी ऐसा ही लगेगा। इसमें आप अंग्रेजों का दोष न निकालें। उन पर तो हमें दया आनी चाहिए। वे काबिल प्रजा हैं इसलिए किसी दिन उस जाल से निकल जाएँगे ऐसा मैं मानता हूँ। वे साहसी और मेहनती हैं। मूल में उनके विचार अनीति भरे नहीं हैं, इसलिए उनके बारे में मेरे मन में उत्तम ख्याल ही हैं। उनका दिल बुरा नहीं है। यह सभ्यता उनके लिए कोई अमिट रोग नहीं है, लेकिन अभी वे उस रोग में फँसे हुए हैं, यह तो हमें भूलना ही नहीं चाहिए।

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अध्याय ६-१०: सभ्यता की कसौटी, भारत की दुर्दशा व हिन्दू-मुस्लिम एकता

यह जगत का निजी अनुभव है कि आधा छटांक भर आचरण का जितना फल होता है उतना मन भर भाषणों अथवा लेखों का नहीं होता। 45

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हिन्दुस्तान कैसे गया ? पाठक : आपने सभ्यता के बारे में बहुत कुछ कहा और मुझे विचार में डाल दिया। अब तो मैं इस संकट में आ पड़ा हूँ कि यूरोप की प्रजा से मैं क्या लूँ? और क्या न लूँ? लेकिन एक सवाल मेरे मन में तुरन्त उठता है, अगर आज की सभ्यता बिगाड़ करने वाली है, एक रोग है, तो ऐसी सभ्यता में फँसे हुए अंग्रेज हिन्दुस्तान को कैसे ले सके ? इसमें वे कैसे रह सकते हैं ? संपादक : आपके इस सवाल का जवाब कुछ आसानी से दिया जा सकेगा और अब थोड़ी देर में हम स्वराज्य के बारे में भी विचार कर सकेंगे। आपके इस सवाल का जवाब अभी देना बाकी है, यह मैं भूला नहीं हूँ, लेकिन आपके आखिरी सवाल पर हम आयें। हिन्दुस्तान अंग्रेजों ने लिया सो बात नहीं है, बल्कि हमने उन्हें दिया है। हिन्दुस्तान में वे अपने बल से नहीं टिके हैं, बल्कि हमने उन्हें टिका रखा है। वह कैसे सो देखें। आपको मैं याद दिलाता हूँ कि हमारे देश में वे दरअसल व्यापार के लिए आए थे। आप अपनी कंपनी बहादुर को याद कीजिए। उसे बहादुर किसने बनाया ? वे बेचारे तो राज करने का इरादा भी नहीं हमारे देश में वे दरअसल व्यापार के लिए आये थे। आप अपनी कंपनी बहादुर को याद कीजिये। उसे बहादुर किसने बनाया ? वे बेचारे तो राज करने का इरादा भी नहीं रखते थे। कंपनी के लोगों की मदद किसने की ? उनकी चाँदी को देखकर कौन मोह में पड़ जाता था ? उनका माल कौन बेचता था ? इतिहास सबूत देता है कि यह सब हम ही करते थे। जल्दी पैसा पाने के मतलब से हम उनका स्वागत करते थे। रखते थे। कंपनी के लोगों की मदद किसने की? उनकी चाँदी को देखकर कौन मोह में पड़ जाता था? उनका माल कौन बेचता था? इतिहास सबूत देता है कि यह सब हम ही करते थे। जल्दी पैसा पाने के मतलब से हम उनका स्वागत करते थे। हम उनकी मदद करते थे। मुझे भाँग पीने की आदत हो और भाँग बेचने वाला मुझे भाँग बेचे, तो कुसूर बेचने वाले का निकालना चाहिए या अपना खुद का? बेचने वाले का 47

हिन्द स्वराज कुसूर निकालने से मेरा व्यसन थोड़े ही मिटने वाला है? एक बेचने वाले को भगा देंगे तो क्या दूसरे मुझे भाँग नहीं बेचेंगे? हिन्दुस्तान के सच्चे सेवक को अच्छी तरह खोज करके इसकी जड़ तक पहुँचना होगा। ज्यादा खाने से अगर मुझे अजीर्ण हुआ हो, तो मैं पानी का दोष निकालकर अजीर्ण दूर नहीं कर सकूँगा। सच्चा डॉक्टर तो वह है जो रोग की जड़ खोजे। आप अगर हिन्दुस्तान के रोग के डॉक्टर होना चाहते हैं तो आपको रोग की जड़ खोजनी ही पड़ेगी।

[बायाँ बॉक्स] उस वक्त हिन्दू-मुसलमानों के बीच बैर था। कंपनी को उससे मौका मिला। इस तरह हमने कंपनी के लिए ऐसे संजोग पैदा किये, जिससे हिन्दुस्तान पर उसका अधिकार हो जाए। इसलिए हिन्दुस्तान गया ऐसा कहने के बजाय ज्यादा सच यह कहना होगा कि हमने हिन्दुस्तान अंग्रेजों को दिया।

[दायाँ मुख्य पाठ] पाठक : आप सच कहते हैं। अब मुझे समझाने के लिए आपको दलील करने की ज़रूरत नहीं रहेगी। मैं आपके विचार जानने के लिए अधीर बन गया हूँ। अब हम बहुत ही दिलचस्प विषय पर आ गये हैं, इसलिए मुझे आप अपने ही विचार बताएँ। जब उनके बारे में शंका पैदा होगी तब मैं आपको रोकूँगा। संपादक : बहुत अच्छा। पर मुझे डर है कि आगे चलने पर हमारे बीच फिर से मतभेद ज़रूर होगा। फिर भी जब आप मुझे रोकेंगे तभी मैं दलील में उतरूँगा। हमने देखा कि अंग्रेज

व्यापारियों को हमने बढ़ावा दिया तभी वे हिन्दुस्तान में अपने पैर फैला सके। वैसे ही जब हमारे राजा लोग आपस में झगड़े तब उन्होंने कंपनी बहादुर से मदद माँगी। कंपनी बहादुर व्यापार और लड़ाई के काम में कुशल थी। उसमें उसे नीति-अनीति की अड़चन नहीं थी। व्यापार बढ़ाना और पैसा कमाना यही उसका धंधा था। उसमें जब हमने मदद दी तब उसने हमारी मदद ली और अपनी कोठियाँ बढ़ाईं। कोठियों का बचाव करने के लिए उसने लश्कर रखा। उस लश्कर का हमने उपयोग किया, इसलिए अब उसे दोष देना बेकार है। उस वक्त हिन्दू-मुसलमानों के बीच बैर था। कंपनी को उससे मौका मिला। इस तरह हमने कंपनी के लिए ऐसे संजोग पैदा किये, जिससे हिन्दुस्तान पर उसका अधिकार हो जाए। इसलिए हिन्दुस्तान गया ऐसा कहने के बजाय ज्यादा सच यह कहना होगा कि हमने हिन्दुस्तान अंग्रेजों को दिया।

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हिन्द स्वराज्य

पाठक : अब अंग्रेज हिन्दुस्तान को कैसे रख सकते हैं सो कहिये। संपादक : जैसे हमने हिन्दुस्तान उन्हें दिया वैसे ही हम हिन्दुस्तान को उनके पास रहने देते हैं। उन्होंने तलवार से हिन्दुस्तान लिया ऐसा उनमें से कुछ कहते हैं और ऐसा भी कहते हैं कि तलवार से वे उसे रख रहे हैं। ये दोनों बातें गलत हैं। हिन्दुस्तान को रखने के लिए तलवार किसी काम में नहीं आ सकती, हम खुद ही उन्हें यहाँ रहने देते हैं।

नेपोलियन ने अंग्रेजों को व्यापारी प्रजा कहा है। वह बिलकुल ठीक बात है। वे जिस देश को अपने क़ाबू में रखते हैं, उसे व्यापार के लिए रखते हैं, यह जानने लायक है। उनकी फ़ौजें और जंगी बेड़े सिर्फ़ व्यापार की रक्षा के लिए हैं। जब ट्रान्सवाल में व्यापार का लालच नहीं था तब मि. ग्लेडस्टन को तुरन्त सूझ गया कि ट्रान्सवाल अंग्रेजों को नहीं रखना चाहिए। जब ट्रान्सवाल में व्यापार का आकर्षण देखा तब उससे लड़ाई की गई और मि. चेम्बरलेन ने यह ढूंढ निकाला कि ट्रान्सवाल पर अंग्रेजों की हुकूमत है। मरहूम प्रेसिडेन्ट क्रूगर से किसी ने सवाल कियाः ‘चाँद में सोना है या नहीं?’ उसने जवाब दिया: ‘चाँद में सोना होने की संभावना नहीं है, क्योंकि सोना होता तो अंग्रेज़ अपने राज के साथ उसे जोड़ देते।' पैसा उनका खुदा है, यह ध्यान में रखने से सब बातें साफ हो जाएँगी।

नेपोलियन ने अंग्रेजों को व्यापारी प्रजा कहा है। वह बिल्कुल ठीक बात है। वे जिस देश को अपने क़ाबू में रखते हैं, उसे व्यापार के लिए रखते हैं, यह जानने लायक है। उनकी फ़ौजें और जंगी बेड़े सिर्फ़ व्यापार की रक्षा के लिए हैं। हमने यह साबित कर दिया कि अंग्रेज़ व्यापार के लिए यहाँ आये, व्यापार के लिए यहाँ रहते हैं और उनके रहने में हम ही मददगार हैं। उनके हथियार तो बिल्कुल बेकार हैं।

तब अंग्रेजों को हम हिन्दुस्तान में सिर्फ़ अपनी ग़रज़ से रखते हैं। हमें उनका व्यापार पसंद आता है। वे चालबाजी करके हमें रिझाते हैं और रिझाकर हमसे काम लेते हैं। इसमें उनका दोष निकालना उनकी सत्ता को निभाने जैसा है। इसके अलावा हम आपस में झगड़कर उन्हें ज्यादा बढ़ावा देते हैं। अगर आप ऊपर की बात को ठीक समझते हैं, तो हमने यह साबित कर दिया कि अंग्रेज़ व्यापार के लिए यहाँ आये, व्यापार के लिए यहाँ

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रहते हैं और उनके रहने में हम ही मददगार हैं। उनके हथियार तो बिल्कुल बेकार हैं। इस मौके पर मैं आपको याद दिलाता हूँ कि जापान में अंग्रेजी झंडा लहराता है ऐसा आप मानिये। जापान के साथ अंग्रेजों ने जो करार किया है वह अपने व्यापार के लिए किया है और आप देखेंगे कि जापान में अंग्रेज लोग अपना व्यापार खूब जमाएँगे। अंग्रेज अपने माल के लिए सारी दुनिया को अपना बाजार बनाना चाहते हैं। यह सच है कि ऐसा वे नहीं कर सकेंगे। इसमें उनका कोई कुसूर नहीं माना जा सकता। अपनी कोशिश में वे कोई कसर नहीं रखेंगे।

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यदि लाखों साधु जनता के सेवक बन जाएं तो देश के रचनात्मक निर्माण के लिए इतनी बड़ी फौज सहज ही तैयार हो सकती है। साधु में यदि आध्यात्मिक निधि नहीं है, तो वह मानवता पर कलंक है।

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हिन्दुस्तान की दशा-एक पाठक : हिन्दुस्तान अंग्रेजों के हाथ में क्यों है? यह समझा जा सकता है। अब मैं हिन्दुस्तान की हालत के बारे में आपके विचार जानना चाहता हूँ। संपादक : आज हिन्दुस्तान की रंक दशा है। हिन्दू, मुस्लिम, जरथोस्ती, यह आपसे कहते हुए मेरी आँखों में पानी भर ईसाई सब धर्म सिखाते हैं आता है और गला सूख जाता है। यह बात मैं कि हमें दुनियावी बातों के आपको पूरी तरह समझा सकूँगा या नहीं, इस बारे में मंद और धार्मिक बारे में मुझे शक है। मेरी पक्की राय है कि बातों के बारे में उत्साही हिन्दुस्तान अंग्रेजों से नहीं, बल्कि आजकल रहना चाहिए। हमें अपने की सभ्यता से कुचला जा रहा है, उसकी चपेट दुनियावी लोभ की हद में वह फँस गया है। उसमें से बचने का अभी बाँधनी चाहिए और भी उपाय है, लेकिन दिन-ब-दिन समय धार्मिक लोभ को खुला बीतता जा रहा है। छोड़ देना चाहिए। हमारा मुझे तो धर्म प्यारा है, इसलिए पहला दुःख उत्साह धार्मिक लोभ में ही मुझे यह है कि हिन्दुस्तान धर्मभ्रष्ट होता जा रहना चाहिए। रहा है। धर्म का अर्थ मैं यहाँ हिन्दू, मुस्लिम या जरथोस्ती धर्म नहीं करता, लेकिन इन सब धर्मों के अन्दर जो 'धर्म' है वह हिन्दुस्तान से जा रहा है, हम ईश्वर से विमुख होते जा रहे हैं। पाठक : सो कैसे ? संपादक : हिन्दुस्तान पर यह तोहमत है कि हम आलसी हैं और गोरे लोग मेहनती और उत्साही हैं। इसे हमने मान लिया है, इसलिए हम अपनी हालत को बदलना चाहते हैं। हिन्दू, मुस्लिम, जरथोस्ती, ईसाई सब धर्म सिखाते हैं कि हमें दुनियावी बातों के बारे में मंद और धार्मिक बातों के बारे में उत्साही रहना चाहिए। हमें 53