हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
४२ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ८४- काकः पुनराह— 'भक्षितेनापि भवता नाहारो मम पुष्कलः । त्वयि जीवति जीवामि चित्रग्रीव इवानघ ! ॥ ८४ ॥ फिर कौवा बोला—'तुझे खा लेनेसे भी तो मेरा बहुत आहार नहीं होगा. मैं निष्कपट चित्रग्रीवके समान तेरे जीनेसे जीता रहूंगा ॥ ८४ ॥ अन्यच्च,— तिरश्चामपि विश्वासो दृष्टः पुण्यैककर्मणाम् । सतां हि साधुशीलत्वात्स्वभावो न निवर्तते ॥ ८५ ॥ और (पुण्यात्मामें) मृग-पक्षियोंकाभी विश्वास देखा जाता है; क्योंकि, पुण्यही करने वाले सज्जनोंका स्वभाव सज्जनताके कारण कभी नहीं पलटता है ॥ ८५ ॥ किंच,— साधोः प्रकोपितस्यापि मनो नायाति विक्रियाम् । न हि तापयितुं शक्यं सागराम्भस्तृणोल्कया' ॥ ८६ ॥ और चाहे जैसे क्रोधमें क्यों न हो सज्जनका स्वभाव कभी डामाडोल न होगा, जैसे (जलते हुए) तनकोंकी आंचसे समुद्रका जल कौन गरम कर सकता है ?' ॥ ८६ ॥ हिरण्यको ब्रूते—'चपलस्त्वम् । चपलेन सह स्नेहः सर्वथा न कर्तव्यः । हिरण्यकने कहा—'तू चंचल है. ऐसे चंचलके साथ स्नेह कभी नहीं करना चाहिये. तथा चोक्तम्,— मार्जारो महिषो मेषः काकः कापुरुषस्तथा । विश्वासात्प्रभवन्त्येते विश्वासस्तत्र नोचितः ॥ ८७ ॥ जैसा कहा है कि—बिल्ली, भैंसा, भेड़, काक और ओछा (नीच) आदमी विश्वास करनेसे ये अपनी प्रभुता दिखाते हैं, इसलिये इनमें विश्वास करना उचित नहीं है ॥ ८७ ॥ किं चान्यत्, शत्रुपक्षो भवानस्माकम् । और दूसरा—तुम मेरे वैरीयोंके पक्षके हो;
-९२ ] कौवेकी प्रीति-याचना ४३ उक्तं चैतत्,― शत्रुना न हि संदध्यात् सुश्लिष्टेनापि संधिना । सुतप्तमपि पानीयं शमयत्येव पावकम् ॥ ८८ ॥ और यह कहा है कि वैरी चाहे जितना मीठा बन कर मेल करे परन्तु उसके साथ मेल न करना चाहिये, क्योंकि पानी चाहे जितनाभी गरम हो आगको बुझाही देता है ॥ ८८ ॥ दुर्जनः परिहर्त्तव्यो विद्ययालंकृतोऽपि सन् । मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकरः ? ॥ ८९ ॥ दुर्जन विद्यावान्भी हो परन्तु उसे छोड़ देना चाहिये, क्योंकि रत्नसे शोभायमान सर्प क्या भयंकर नहीं होता है ? ॥ ८९ ॥ यदशक्यं न तच्छक्यं यच्छक्यं शक्यमेव तत् । नोदके शकटं याति न च नौर्गच्छति स्थले ॥ ९० ॥ जो बात नहीं हो सकती है वह कदापि नहीं हो सकती है, और जो हो सकती है वह हो ही सकती है; जैसे पानी पर गाड़ी नहीं चलती और जमीन पर नाव नहीं चल सकती है ॥ ९० ॥ अपरं च,― महताप्यर्थसारेण यो विश्वसिति शत्रुपु । भार्यासु च विरक्तासु तदन्तं तस्य जीवनम्' ॥ ९१ ॥ और दूसरे-जो मनुष्य अधिक प्रयोजनसे शत्रुओं और व्यभिचारिणी स्त्रियों पर विश्वास करता है उसके जीनेका अंत आपहुँचा है ( मृत्यु संनिध है)' ॥९१॥ लघुपतनको ब्रूते—'श्रुतं मया सर्वम् । तथापि मम चैतावान्संक- ल्पः-'त्वया सह सौहृद्यमवश्यं करणीयम्' इति । नो चेदनाहा- रेणात्मानं व्यापादयिष्यामि । लघुपतनक कौवा बोला-'मैंने सब सुन लिया, तोभी मेरा इतना संकल्प है कि तेरे संग मित्रता अवश्य करनी चाहिये. नहीं तो भूखा मर अपघात करूंगा. तथा हि,― मृद्धटवत् सुखभेद्यो दुःसंधानश्च दुर्जनो भवति । सुजनस्तु कनकघटवद्दुर्भेद्यश्चाशु संधेयः ॥ ९२ ॥
४४ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ९३- और देख-दुर्जन मनुष्य मट्टीके घड़ेके समान सहज टूटा जा सकता है और फिर उसका जुड़ना कठिन है. और सजन सोनेके घड़ेके समान है कि कभी टूट नहीं सकता और जो टूटे भी तो शीघ्र जुड़ सकता है ॥ ९२ ॥ किंच,— द्रवत्वात्सर्वलोहानां निमित्तान्मृगपक्षिणाम् । भयाल्लोभाच्च मूर्खाणां संगतं दर्शनात्सताम् ॥ ९३ ॥ और सोना, चांदी आदि धातुओंका गलानेसे, पशुपक्षियोंका पूर्वजन्मके संस्कारसे, मूर्खोंका भय और लोभसे, और सज्जनोंका केवल दर्शनसेही मेल होता है ॥ ९३ ॥ किंच,— नारिकेलसमाकारा दृश्यन्ते हि सुहृज्जनाः । अन्ये बदरिकाकारा बहिरेव मनोहराः ॥ ९४ ॥ और सजन पुरुष नारियलके समान बाहरसे दीखते हैं अर्थात ऊपरसे सख्त और भीतरसे मीठे, और दुर्जन बेरफलके आकारके समान बाहरहीसे मनोहर होते हैं ॥ ९४ ॥ स्नेहच्छेदेऽपि साधूनां गुणा नायान्ति विक्रियाम् । भङ्गेऽपि हि मृणालानामनुबध्नन्ति तन्तवः ॥ ९५ ॥ स्नेह टूट जाय तो भी सज्जनोंके गुण नहीं पलटते हैं, जैसे कमलकी डंडीके टूटने परभी उसके तंतु जुड़ेही रहते हैं ॥ ९५ ॥ अन्यच्च,— शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः । दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः ॥ ९६ ॥ और दूसरे-पवित्रता अर्थात् निष्कपटता, दानशीलता, शूरता, सुख-दुःखमें समानता, अनुकूलता, प्रीति और सत्यता ये मित्रोंके गुण हैं ॥ ९६ ॥ एतैर्गुणैरुपैतो भवदन्यो मया कः सुहृत्प्राप्तव्यः ?' इत्यादि तद्वचन- माकर्ण्य हिरण्यको बहिर्निःसृत्याह—'आप्यायितोऽहं भवतामनेन वचनामृतेन । इन गुणोंसे युक्त तुम्हें छोड़ और किसको मित्र पाऊंगा' उसकी ऐसी (मीठी) बातें सुन कर हिरण्यक बाहर निकल कर बोला-'तुम्हारे वचनरूपी अमृतसे मैं तृप्त हुआ;
-१०१ ] मैत्रीपथमें कौवेकी सफलता ४५ तथा चोक्तम्,- घर्मार्तं न तथा सुशीतलजलैः स्नानं न मुक्तावली न श्रीखण्डविलेपनं सुखयति प्रत्यङ्गमप्यर्पितम् । प्रीत्या सज्जनभाषितं प्रभवति प्रायो यथा चेतसः सद्युक्त्या च पुरस्कृतं सुकृतिनामाकृष्टिमन्त्रोपमम् ॥ ९७ ॥ जैसा कहा है कि-सुन्दर २ युक्तियोंसे शोभायमान, पुण्यात्माओंके आकर्षण मंत्रके समान प्रीतिसे कहा हुआ सज्जनोंका वचन जैसा चित्तको अत्यन्त सुख- कारी होता है वैसा शीतल जलसे स्नान, मोतियोंकी माला और अंगअंगमें लगा हुआ लेपन किया हुआ चंदन भी धूपके सताये हुएको सुख नहीं देता है ॥९७॥ अन्यच्च,- रहस्यभेदो याञ्ज्ञा च नैष्ठुर्यं चलचित्तता । क्रोधो निःसत्यता द्यूतमेतन्मित्रस्य दूषणम् ॥ ९८ ॥ और दूसरे-गुप्त बातको प्रकट करना, धन आदिकी याचना, कठोरता, चित्तकी चंचलता, क्रोध, झूठ और जुआ, ये मित्रके दूषण हैं ॥ ९८ ॥ अनेन वचनक्रमेण तदेकमपि दूषणं त्वयि न लक्ष्यते । सो तुम्हारी बातोंके ढंगसे उनमेंसे एकभी दोष तुममें नहीं दीखता है. यतः,- पटुत्वं सत्यवादित्वं कथायोगेन बुध्यते । अस्तब्धत्वमचापल्यं प्रत्यक्षेणावगम्यते ॥ ९९ ॥ क्योंकि-चातुर्य और सत्य यह बातचीतसे जान लिये जाते हैं, और नम्रता और शांतता ये प्रत्यक्ष जानी जाती हैं ॥ ९९ ॥ अपरं च,- अन्यथैव हि सौहार्दं भवेत्स्वच्छान्तरात्मनः । प्रवर्ततेऽन्यथा वाणी शाठ्योपहतचेतसः ॥ १०० ॥ और दूसरे-निष्कपट चित्त वालेकी मित्रता अन्यही तरहकी होती है और जिसका हृदय शठतासे बिगड़ रहा है उसकी वाणी औरही प्रकारकी होती है ॥ मनस्यन्यद्वचस्यन्यत् कार्यमन्यद्दुरात्मनाम् । मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम् ॥ १०१ ॥
४६ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १०२- दुर्जनोंके मनमें कुछ, वचनमें और काममें कुछ; और सज्जनोंके जीमें, बच- नमें और काममें एक बात होती है ॥ १०१ ॥ तद्भवतु भवतोऽभिमतमेव।' इत्युक्त्वा हिरण्यको मैत्र्यं विधाय भोजनविशेषैर्वायसं संतोष्य विवरं प्रविष्टः । वायसोऽपि स्वस्थानं गतः। ततः प्रभृति तयोरन्योन्याहारप्रदानेन कुशलप्रश्नैर्विश्रम्भा- लापैश्च कालोऽतिवर्तते । इसलिये तेरा ही मनोरथ हो।' यह कह कर हिरण्यक मित्रता करके विविध प्रकारके भोजनसे कौवेको संतुष्ट करके बिलमें घुस गया। और कौवाभी अपने स्थानको चला गया। उस दिनसे उन दोनोंका आपसमें भोजनके देने-लेनेसे, कुशल पूछनेसे और विश्वासयुक्त बातचीतसे समय कटने लगा। एकदा लघुपतनको हिरण्यकमाह - 'सखे ! कष्टतरलभ्याहार- मिदं स्थानं परित्यज्य स्थानान्तरं गन्तुमिच्छामि।' हिरण्यको ब्रूते-'मित्र ! क्व गन्तव्यम् ? एक दिन लघुपतनकने हिरण्यकसे कहा-'मित्र ! इस स्थानमें बड़ी मुश्किलीसे भोजन मिलता है, इसलिये इस स्थानको छोड़ कर दूसरे स्थानमें जाना चाहता हूं'। हिरण्यकने कहा-'मित्र ! कहां जाओगे ? तथा चोक्तम् ,— चलत्येकेन पादेन तिष्ठत्येकेन बुद्धिमान् । नाऽसमीक्ष्य परं स्थानं पूर्वमायतनं त्यजेत्' ॥ १०२ ॥ ऐसा कहा है कि-बुद्धिमान् एक पैरसे चलता है और दूसरेसे ठहरता है । इसलिये दूसरा स्थान निश्चय किये विना पहला स्थान नहीं छोड़ना चाहिये ॥ १०२ ॥ वायसो ब्रूते-'अस्ति सुनिरूपितस्थानम् ।' हिरण्यकोऽवदत्- 'किं तत् ?' । वायसो ब्रूते - 'अस्ति दण्डकारण्ये कर्पूरगौराभिधानं सरः । तत्र चिरकालोपार्जितः प्रियसृहन्मे मन्थराभिधानः कच्छपो धार्मिकः प्रतिवसति । कौवा बोला- 'एक अच्छी भांति देखा भाला स्थान है'। हिरण्यक बोला- 'कौनसा है ?'. कौआ कहने लगा - 'दण्डकवनमें कर्पूरगौर नाम एक सरोवर है, उसमें मन्थरनाम एक धर्मशील कछुआ मेरा बड़ा पुराना और प्यारा मित्र रहता है.
-१०६ ] सबका स्थानत्याग और कछुएसे मिलन ४७ यतः,- परोपदेशे पाण्डित्यं सर्वेषां सुकरं नृणाम् । धर्मे स्वीयमनुष्ठानं कस्यचित्तु महात्मनः ॥ १०३ ॥ क्योंकि-दूसरोंको उपदेश करना सब मनुष्योंको सहज है, परन्तु आपका धर्म पर चलना किसी विरलेही महात्मासे होता है ॥ १०३ ॥ स च भोजनविशेषैर्मां संवर्धयिष्यति ।' हिरण्यकोऽप्याह—'तत्कि- मत्रावस्थाय मया कर्तव्यम् ? और वह विविध प्रकारके भोजनोंसे मेरा सत्कार करेगा' । हिरण्यक भी बोला—'तो मैं यहां रह कर क्या करूंगा ? यतः,- यस्मिन्देशे न संमानो न वृत्तिर्न च बान्धवः । न च विद्यागमः कश्चित्तं देशं परिवर्जयेत् ॥ १०४ ॥ क्योंकि—जिस देशमें न सन्मान, न जीविकाका साधन, न भाई ( या संबंधी ) और कुछ विद्याका भी लाभ न हो उस देशको छोड़ देना चाहिये ॥ १०४ ॥ अपरं च,- लोकयात्राऽभयं लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता । पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात्तत्र संस्थितिम् ॥ १०५ ॥ और दूसरे-जीविका, अभय, लज्जा, सज्जनता तथा उदारता, ये पांच बातें जहां न हो वहां नहीं रहना चाहिये ॥ १०५ ॥ तत्र मित्र ! न वस्तव्यं यत्र नास्ति चतुष्टयम् । ऋणदाता च वैद्यश्च श्रोत्रियः सजला नदी ॥ १०६ ॥ और हे मित्र ! जहां ऋण देने वाला, वैद्य, वेदपाठी और सुन्दर जलसे भरी नदी, ये चार न हो वहां नहीं रहना चाहिये ॥ १०६ ॥ ततो मामपि तत्र नय ।' अथ वायसस्तत्र तेन मित्रेण सह विचि- त्रालापैः सुखेन तस्य सरसः समीपं ययौ । ततो मन्थरो दूरादव- लोक्य लघुपतनकस्य यथोचितमातिथ्यं विधाय मूषकस्यातिथि- सत्कारं चकार । इसलिये मुझे भी वहां ले चल ।' पीछे कौवा उस मित्रके साथ अच्छी अच्छी बातें करता हुआ बेखटके उस सरोवरके पास पहुंचा । फिर मन्थरने उसे
४८ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १०७-
दूरसे देखतेही लघुपतनकका यथोचित अतिथिसत्कार करके चूहेकाभी अतिथि- सत्कार किया। यतः,- बालो वा यदि वा वृद्धो युवा वा गृहमागतः । तस्य पूजा विधातव्या सर्वस्याभ्यागतो गुरुः ॥ १०७ ॥ क्योंकि-बालक, बूढ़ा तथा युवा इनमेंसे घर पर कोई आया हो उसका आदर सत्कार करना चाहिये, क्योंकि अभ्यागत सब (चारों वर्णों) का पूज्य है ॥१०७॥ गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः । पतिरेको गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरुः ॥ १०८ ॥ ब्राह्मणोंको अग्नि, चारों वर्णोंको ब्राह्मण, स्त्रियोंको पति और सबको अभ्यागत सर्वदा पूजनीय है ॥ १०८ ॥ वायसोऽवदत्—'सखे मन्थर ! सविशेषपूजामस्मै विधेहि । यतो- ऽयं पुण्यकर्मणा धुरीणः कारुण्यरत्नाकरो हिरण्यकनामा मूषिक- राजः । एतस्य गुणस्तुतिं जिह्वासहस्रद्वयेनापि सर्पराजो न कदाचित्कथयितुं समर्थः स्यात् ।' इत्युक्त्वा चित्रग्रीवोपाख्यानं वर्णितवान् । मन्थरः सादरं हिरण्यकं संपूज्याह—'भद्र ! आत्मनो निर्जनवनागमनकारणमाख्यातुमर्हसि ।' हिरण्यकोऽवदत्—'कथ- यामि । श्रूयताम्,— कौआ बोला—'मित्र मन्थर ! इसका अधिक सत्कार कर, क्योंकि यह पुण्या- त्माओंका मुखिया और करुणाका समुद्र हिरण्यक नाम चूहोंका राजा है । इसके गुणोंकी बड़ाई दो सहस्र जीभोंसे शेष नागभी कभी नहीं कर सकता है' । यह कह कर चित्रग्रीवका वृत्तान्त कह सुनाया । मन्थर बड़े आदरसे हिरण्यकका सत्कार करके पूछने लगा—'हे मित्र । इस निर्जन वनमें अपने आनेका भेद तो कहो' । हिरण्यक बोला—'मैं कहता हूँ, सुनो— कथा ४ [ संन्यासी और धनिक चूहेकी कहानी ४ ] अस्ति चम्पकाभिधानायां नगर्य्यां परिव्राजकावसथः । तत्र चूडाकर्णो नाम परिव्राट् प्रतिवसति । स च भोजनावशिष्टभिक्षा- ऽन्नसहितं भिक्षापात्रं नागदन्तकेऽवस्थाप्य स्वपिति । अहं च तद- ऽन्नमुत्प्लुत्य प्रत्यहं भक्षयामि। अनन्तरं तस्य प्रिय सुहृद्वीणाकर्णो नाम-
-१०९ ] बूढा बनिया और उसकी स्त्रीकी कहानी ४९
-१०९ ] बूढा बनिया और उसकी स्त्रीकी कहानी ४९
परिव्राजकः समायातः। तेन सह कथाप्रसङ्गावस्थितो मम त्रासार्थं जर्जरवंशखण्डेन चूडाकर्णो भूमिमताडयत्। वीणाकर्ण उवाच— ‘सखे ! किमिति मम कथाविरक्तोऽन्यासक्तो भवान् ?’ चूडाकर्णे- नोक्तम्—‘मित्र ! नाहं विरक्तः। किंतु पश्यायं मूषिको ममापकारी सदा पात्रस्थं भिक्षान्नमुत्प्लुत्य भक्षयति।’ वीणाकर्णो नागदन्तकं विलोक्याह—‘कथं मूषिकः स्वल्पबलोऽप्येतावद्दूरमुत्पतति ? तदत्र केनापि कारणेन भवितव्यम् । चम्पका नाम नगरीमें संन्यासियोंकी एक वस्ती है । वहां चूडाकर्ण नाम संन्यासी रहता था। और वह भोजनसे बचेखुचे भिक्षाके अन्नसहित भिक्षा- पात्रको खूंटीपर टांग कर सोजांया करता था। और मैं उस भोजनके पदार्थको उछल उछल कर नित्य खाया करता था । उसके उपरान्त उसका प्रिय मित्र वीणाकर्ण नाम संन्यासी आया । चूडाकर्णने उसके साथ नानाभांतिकी कथाके प्रसंगमें लग कर मुझको डरानेके लिये एक पुराने बाँसके टुकड़ेसे पृथिवी खटखटायी. वीणाकर्ण बोला—‘मित्र ! यह क्या बात है ? कि (तुम) मेरी कथामें विरक्त और दूसरीमें लगे हो’॥ चूडाकर्णने कहा कि ‘मित्र ! मैं विरक्त नहीं हूं। परन्तु देखो—यह चूहा मेरा अपकारी है, पात्रमें धरे हुए भिक्षाके अन्नको सदा उछल उछल कर खा जाता है.’ वीणाकर्णने खूंटीकी ओर देख कर कहा—‘यह दुबला पतला-सा भी चूहा कैसे इतना ऊपर उछलता है ? इसलिये इसमें कुछ न कुछ कारण होना चाहिए । तथा चोक्तम्— अकस्माद्युवती वृद्धं केशेष्वाकृष्य चुम्बति । पतिं निर्दयमालिङ्ग्य हेतुरत्र भविष्यति’ ॥ १०९ ॥ जैसा कहा है कि—यकायक एक जवान स्त्रीने केश पकड़ कर और प्रेमसे आलिंगन करके अपने बूढ़े पतिका मुख चुम्बन किया (वैसाही) इसमें कोई कारण होगा’ ॥ १०९ ॥ चूडाकर्णः पृच्छति—‘कथमेतत् ?’ । वीणाकर्णः कथयति— चूडाकर्ण पूछने लगा—‘यह कथा कैसे है?’ वीणाकर्ण कहने लगा— कथा ५ [ बूढा बनिया और उसकी व्यभिचारिणी स्त्रीकी कहानी ५ ] अस्ति गौडीये कौशाम्बी नाम नगरी । तस्यां चन्दनदासनामा वणिङ्महाधनो निवसति । तेन पश्चिमे वयसि वर्तमानेन कामाधि- हि० ४
ष्टितचेतसा धनदर्पल्लीलावती नाम वणिक्पुत्री परिणीता। सा च मकरकेतोर्विजयवैजयन्तीव यौवनवती बभूव । स च वृद्धपति- स्तस्याः संतोषाय नाभवत् । बंगाल देशमें कौशाम्बी नाम एक नगरी है । उसमें चन्दनदास नाम एक बड़ा धनवान् बनिया रहता था । उसने बुढ़ापेमें कामातुर हो कर धनके मदसे लीलावती नाम एक बनियेकी बेटीसे विवाह कर लिया । वह लीलावती काम- देवकी विजयपताकाके समान तारुण्यतरङ्गिता हुई. पर वह बूढ़ा पति उसके संतोष करनेके लिये योग्य नहीं था । यतः,— शशिनीव हिमार्तानां घर्मार्तानां रवाविव । मनो न रमते स्त्रीणां जराजीर्णेन्द्रिये पत्यौ ॥ ११० ॥ क्योंकि—जैसे पालेसे मरे हुओंका चित्त चन्द्रमामें, और धूपसे दुःखियों का सूरजमें नहीं लगता है वैसेही स्त्रियोंका मन शिथिल इन्द्रियोंवाले पतिमें नहीं लगता है ॥ ११० ॥ अन्यच्च,— पतितेषु हि दृष्टेषु पुंसः का नाम कामिता ? । भेषज्यमिव मन्यन्ते यदन्यमनसः स्त्रियः ॥ १११ ॥ और दूसरे—जब बाल श्वेत हो गये तब पुरुषको कामकी योग्यता कहां ? क्योंकि जिन स्त्रियोंका दिल अन्य पुरुषोंसे लग रहा है वे (ऐसे पतिको) औषधके समान समझती हैं ॥ १११ ॥ स च वृद्धपतिस्तस्यामतीवानुरागवान् । और वह बूढ़ा पति उस पर अत्यंत आसक्त था. यतः,— धनाशा जीविताशा च गुर्वी प्राणभृतां सदा । वृद्धस्य तरुणी भार्या प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥ ११२ ॥ क्योंकि-प्राणधारियोंको धन और जीवनकी बड़ी आशा होती है, लेकिन बूढ़ेको तरुण स्त्री प्राणोंसेभी अधिक प्यारी होती है ॥ ११२ ॥ नोपभोक्तुं न च त्यक्तुं शक्नोति विषयाञ्जरी । अस्थि निर्दशनः श्वेव जिह्वया लेढि केवलम् ॥ ११३ ॥
बूढ़ा मनुष्य न तो विषयोंको भोग सकता है और न त्यागभी कर सकता है। जैसे दंतहीन कुत्ता हड्डीको चबा नहीं सकता है, (पर आसक्त होनेसे) केवल जीभसे चाटता है ॥ ११३ ॥ अथ सा लीलावती यौवनदर्पादतिक्रान्तकुलमर्यादा केनापि वणिक्पुत्रेण सहानुरागवती बभूव । फिर उस लीलावतीने यौवनके मदसे अपनी कुलकी मर्यादाको छोड़ किसी बनियेके पुत्रसे प्रेमवश हुई. यतः,— स्वातन्त्र्यं पितृमन्दिरे निवसतिर्यात्रोत्सवे संगति- र्गोष्ठी पुरुषसंनिधावनियमो वासो विदेशे तथा । संसर्गः सह पुंश्चलीभिरसकृद्वृत्तेर्निजायाः क्षतिः पत्युर्वार्धकमीर्षितं प्रवसनं नाशस्य हेतुः स्त्रियः ॥ ११४ ॥ क्योंकि-स्वतन्त्रता, पिताके घरमें (ज्यादह काल) रहना, यात्रा आदि उत्सवमें किसीका संग, पुरुषके साथ गप लडाना, नियममें न रहना, परदेशमें रहना, व्यभिचारिणी स्त्रियोंके सहवासमें रहना, वार वार अपने सच्चरित्रका खोना, पतिका बूढ़ा होना, ईर्ष्या करना, और स्वामीका परदेशमें रहना ये स्त्रियोंके नाश(बिगड़ने)के कारण हैं ॥ ११४ ॥ अपरं च,— पानं दुर्जनसंसर्गः पत्या च विरहोऽटनम् । स्वप्नश्चान्यगृहे वासो नारीणां दूषणानि षट् ॥ ११५ ॥ और दूसरे—मद्यपान, दुष्ट लोगोंका सहवास, पतिका विरह, इधर उधर घूमते रहना, दूसरेके घरमें सोना अगर रहना, ये छः स्त्रियोंके दूषण हैं ॥११५॥ स्थानं नास्ति क्षणं नास्ति नास्ति प्रार्थयिता नरः । तेन नारद ! नारीणां सतीत्वमुपजायते ॥ ११६ ॥ हे नारद ! (व्यभिचारके लिये) ऐकांत स्थान, मौका और प्रार्थना करने वाला मनुष्य इनके न होनेसे स्त्रियोंका पतिव्रतधर्म रहता है ॥ ११६ ॥ न स्त्रीणामप्रियः कश्चित्प्रियो वापि न विद्यते । गावस्तृणमिवारण्ये प्रार्थयन्ति नवं नवम् ॥ ११७ ॥
[Page Header] ५२ हितोपदेशः [मित्रलाभः ११८-
स्त्रियोंका कोई अप्रिय अथवा प्रियभी नहीं है, जैसे वनमें गायें नये नये तृणको चाहती हैं वैसेही स्त्रियें भी नवीन नवीन पुरुषको चाहती हैं ॥११७॥ अपरं च,— घृतकुम्भसमा नारी तप्ताङ्गारसमः पुमान् । तस्माद्घृतं च वह्निं च नैकत्र स्थापयेद्बुधः ॥ ११८ ॥ और,—स्त्री घीके घड़ेके समान है और पुरुष जलते हुये अंगारके समान है, इसलिये बुद्धिमानको चाहिए कि घी और अग्निको पास पास न रखे ॥ ११८ ॥ मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा नो विविक्तासनो भवेत् । बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ॥ ११९ ॥ पुरुषको, माता, बहिन और बेटी, इनके पासभी एकांतमें नहीं बैठना चाहिये, क्योंकि इंद्रियां बड़ी बलवान् हैं, ये जितेन्द्रियकोभी वशमें कर लेती हैं ॥ ११९ ॥ न लज्जा न विनीतत्वं न दाक्षिण्यं न भीरुता । प्रार्थनाभाव एवैकं सतीत्वे कारणं स्त्रियाः ॥ १२० ॥ स्त्रियोंको पतिव्रत रखनेमें न लज्जा, न विनय, न चतुरता और न भय कारण है, परन्तु केवल प्रार्थनाका न होना (अर्थात् परपुरुषसे संभोगकी प्रार्थना न होना) ही एक कारण है ॥ १२० ॥ पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने । पुत्रश्च स्थाविरे भावे न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥ १२१ ॥ बचपनमें पिता, जवानीमें पति, और बुढ़ापेमें पुत्र रक्षा करता है, एवं स्त्रीको कदापि स्वतंत्रता योग्य नहीं है ॥ १२१ ॥ एकदा सा लीलावती रत्नावलीकिरणकर्बुरे पर्यङ्के तेन वणि- क्पुत्रेण सह विश्रम्भालापैः सुखासीना तमलक्षितोपस्थितं पति- मवलोक्य सहसोत्थाय केशेष्वाकृष्य गाढमालिङ्ग्य चुम्बितवती । तेनावसरेण जारश्च पलायितः । एक दिन (पतिकी अनुपस्थितिमें) वह लीलावती रत्नोंकी बाढ़की झलकसे रंगबिरंगे पलंग पर उस बनियेके पुत्रके साथ जी खोल कर बातें करती हुई आनन्दसे बैठी थी इतनेमें अचानक आये हुए उस अपने पतिको देख कर यकायक उठी और बाल पकड़ कर, अत्यन्त चिपट कर उसको चूमने लगी और इस अवसरमें (मौका देख कर) यारभी भाग गया;
१२३ ] धनकी प्रशंसा ५३ उक्तं च,— उशना वेद यच्छास्त्रं यच्च वेद बृहस्पतिः । स्वभावेनैव तच्छास्त्रं स्त्रीबुद्धौ सुप्रतिष्ठितम् ॥ १२२ ॥ और कहा भी है कि—जो शास्त्र शुक्राचार्य जानते हैं और जो शास्त्र बृहस्पतिजी जानते हैं वह शास्त्र स्त्रीकी बुद्धिमें स्वभावहीसे होता है ॥ १२२ ॥ तदालिङ्गनमवलोक्य समीपवर्तिनी कुट्टन्यचिन्तयत्—'अकस्मा- दियमेनमुपगूढवती' इति ततस्तया कुटन्या तत्कारणं परिज्ञाय सा लीलावती गुप्तेन दण्डिता; अतोऽहं ब्रवीमि—"अकस्माद्युवती वृद्धम्” इत्यादि । मूषिकबलोपष्टम्मेन केनापि कारणेनात्र भवितव्यम् ।' बूढे पतिके साथ स्त्रीका आलिंगन देख कर पास बैठने वाली कुटनी चिंता करने लगी कि, 'भला यह जवान औरत इस बूढेको क्यों लिपट गई ?' फिर उस कुटनीने उसका कारण जान कर लीलावतीको अकेली देखकर डाटा; इसलिये मैं कहता हूं "अचानक जवान स्त्रीने वृद्धको" इत्यादि ॥ चूहेको बलका अहंकार यहां परभी किसी न किसी कारणसेही है ॥ क्षणं विचिन्त्य परिव्राजकेनोक्तम्—'कारणं चात्र धनबाहुल्यमेव भविष्यति । थोड़ी देर विचार कर संन्यासीने कहा—'इसमें धनकी अधिकताका कारण होगा, यतः,— धनवान् बलवाँल्लोके सर्वः सर्वत्र सर्वदा । प्रभुत्वं धनमूलं हि राज्ञामप्युपजायते' ॥ १२३ ॥ क्योंकि—सर्वत्र, संसारमें सब मनुष्य धनसेही सदा बलवान् होते हैं और राजाओंकी प्रभुताकी जड़ धनही होता है ॥ १२३ ॥ ततः खनित्रमादाय तेन विवरं खनित्वा चिरसंचितं मम धनं गृहीतम् । ततः प्रभृति निजशक्तिहीनः सत्त्वोत्साहरहितः स्वाहार- मप्युत्पादयितुमक्षमः सत्रासं मन्दं मन्दमुपसर्पञ्चूडाकर्णेनावलो- कितः ।
५४ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १२४- फिर कुदाली लाकर उसने बिलको खोद कर मेरा बहुत दिनका इकट्ठा किया हुआ धन ले लिया। उसी दिनसे अपने सामर्थ्यसे हीन, बल और उत्साहसे रहित, अपना आहारभी ढूंढ़नेके अयोग्य, डरके मारे धीरे धीरे चलते हुए मुझको चूड़ाकर्णने देखा ॥ ततस्तेनोक्तम्— 'धनेन बलवाँल्लोके धनाद्भवति पण्डितः । पश्यैनं मूषिकं पापं स्वजातिसमतां गतम् ॥ १२४ ॥ फिर उसने कहा कि, दुनियामें आदमी धनसे बलवान् और धनसेही पण्डित माना जाता है ॥ इस पापी चूहेको देखो ( धनहीन होनेसे ) अपनी जातिके समान हो गया ॥ १२४ ॥ किं च,— अर्थेन तु विहीनस्य पुरुषस्याल्पमेधसः। क्रियाः सर्वा विनश्यन्ति ग्रीष्मे कुसरितो यथा ॥ १२५ ॥ और धनसे रहित बुद्धिहीन मनुष्यके तो सब काम बिगड़ जाते हैं, जैसे गरमीकी ऋतुमें छोटी छोटी नदियां (सूख जा कर बिगड़ जाती हैं) ॥ १२५ ॥ अपरं च,— यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः । यस्यार्थाः स पुमाँल्लोके यस्यार्थाः स हि पण्डितः ॥ १२६ ॥ और दुनियामें जिसके पास धन है उसीके सब मित्र और उसीके बान्धव हैं; और जिसके पास धन है वही महान् पुरुष और वही बड़ा पण्डित है ॥ १२६ ॥ अन्यच्च,— अपुत्रस्य गृहं शून्यं सन्मित्ररहितस्य च । मूर्खस्य च दिशः शून्याः सर्वशून्या दरिद्रता ॥ १२७ ॥ और सच्चे मित्रसे हीन और पुत्रहीन (पुरुष)का घर सूना है । मूर्खकी सब दिशाएँ सूनी हैं, अर्थात् मूर्खताके कारण कहीं आदर नहीं पा सकता है, और दरिद्रता तो सब सूनोंका (केन्द्र) स्थान है अर्थात् सब सुखोंसे रहित है ॥ १२७ ॥ अपि च,— दारिद्र्यान्मरणाद्वापि दारिद्र्यमवरं स्मृतम् । अल्पक्लेशेन मरणं दारिद्र्यमतिदुःसहम् ॥ १२८ ॥
-१३२ ] बुद्धिमान् पुरुषके लिये शिक्षा ५५
और भी—दरिद्रता और मरना इन दोनोंमेंसे दरिद्रता बुरी कही है, क्योंकि मरना तो थोड़े क्लेशसे होता है और दरिद्रता हमेशा दुःख देती है ॥ १२८ ॥ अपरं च,— तानीन्द्रियाण्यविकलानि तदेव नाम सा बुद्धिरप्रतिहता वचनं तदेव । अर्थोष्मणा विरहितः पुरुषः स एव अन्यः क्षणेन भवतीति विचित्रमेतत्' ॥ १२९ ॥ और दूसरे—वे ही विकारसे रहित इन्द्रियां हैं, वही नाम है, वही निर्मल बुद्धि है, वही वाणी है, परन्तु धनकी उष्णतासे रहित वो ही मनुष्य क्षणभरमें कुछका कुछ हो जाता है; ॥ १२९ ॥ एतत्सर्वमाकर्ण्य मयालोचितम्-‘ममात्रावस्थानमयुक्तमिदानीम्। यच्चान्यस्मै एतद्वृत्तान्तकथनं तदप्यनुचितम् । यह सब सुन कर मैंने सोचा—‘मेरा अब यहां रहना ठीक नहीं है । और जो दूसरेसे यह समाचार कहना भी उचित नहीं है, यतः,— अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च । वञ्चनं चापमानं च मतिमान्न प्रकाशयेत् ॥ १३० ॥ क्योंकि--बुद्धिमान् पुरुषको अपने धनका नाश, मनका संताप, घरका दुराचार, ठगा जाना, और अपमान, ये प्रकट न करने चाहिये ॥ १३० ॥ अपि च,— आयुर्वित्तं गृहच्छिद्रं मन्त्रमैथुनभेषजम् । तपो दानापमानं च नव गोप्यानि यत्नतः ॥ १३१ ॥ औरभी—आयु, धन, घरका भेद ( रहस्य ), गुप्त बात, मैथुन, औषधि, तप, दान और अपमान, इन नौ बातोंको यत्नसे गुप्त रखना चाहिये ॥ १३१ ॥ तथा चोक्तम्,— अत्यन्तविमुखे दैवे व्यर्थे यत्ने च पौरुषे । मनस्विनो दरिद्रस्य वनादन्यत्कुतः सुखम् ? ॥ १३२ ॥
भाग्यकी अत्यन्त प्रतिकूल दशामें धीरज वाले दरिद्री मनुष्यको वनको छोड़
५६ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १३३- जैसा कहा है कि—जब पुरुषार्थही में निष्फलता होने लग जाए और भाग्यकी अत्यन्त प्रतिकूल दशामें धीरज वाले दरिद्री मनुष्यको वनको छोड़ और कहां सुख धरा है ? ( याने उसको स्वस्थान छोड़ कर कहांही वनमें जाना यही उचित है ) ॥ १३२ ॥ अन्यच्च,— मनस्वी म्रियते कामं कार्पण्यं न तु गच्छति । अपि निर्वाणमायाति नानलो याति शीतताम् ॥ १३३ ॥ और दूसरे—उदार पुरुष मर जाय पर कृपणता नहीं करता है ( अपनी लाचारी नहीं बताता है ) जैसे अग्नि भले बुझ जाय, पर ठंडी नही होती है ॥ १३३ ॥ किं च,— कुसुमस्तबकस्येव द्वे वृत्ती तु मनस्विनः । सर्वेषां मूर्ध्नि वा तिष्ठेद्विशीर्येत वनेऽथवा ॥ १३४ ॥ और पुष्पके,-गुच्छेके समान उदार मनुष्यकी दो तरहकी प्रकृति होती है कि या तो सबके शिर पर रहे या वनमें कुम्हला जाय ॥ १३४ ॥ यच्चात्रैव याच्ञया जीवनं तदतीव गर्हितम् । और जो यहां याचना कर जीना है वह तो बिलकुल अच्छा नहीं है, यतः— वरं विभवहीनेन प्राणैः संतर्पितोऽनलः । नोपचारपरिभ्रष्टः कृपणः प्रार्थितो जनः ॥ १३५ ॥ क्योंकि—धनहीन मनुष्य प्राणोंको अग्निमें झोंक दे सो अच्छा, परन्तु अपने मानको छोड़ कर कृपण मनुष्यसे याचना करना अच्छा नहीं है ॥ १३५ ॥ दारिद्र्याद्ध्रियमेति ह्रीपरिगतः सत्त्वात्परिभ्रश्यते निःसत्त्वः परिभूयते परिभवान्निर्वेदमापद्यते । निर्विण्णः शुचमेति शोकनिहतो बुद्ध्या परित्यज्यते निर्बुद्धिः क्षयमेत्यहो निधनता सर्वापदामस्पदम् ॥ १३६ ॥ और निर्धनतासे मनुष्यको लज्जा होती है, लज्जासे पराक्रम नष्ट हो जाता है, पराक्रम न होनेसे अपमान होता है, अपमान होनेसे दुःख पाता है, दुःखसे शोक करता है, शोकसे बुद्धिहीन हो जाता है, और बुद्धि न होनेसे नाश हो जाता है । अहो, निर्धनता ही सब आपत्तियोंका स्थान है ॥ १३६ ॥
-१३९ ] अनुचित कार्यकी निन्दा ५७ किं च,— वरं मौनं कार्यं न च वचनमुक्तं यदनृतं वरं क्लैब्यं पुंसां न च परकलत्राभिगमनम् । वरं प्राणत्यागो न च पिशुनवाक्येष्वभिरुचि- र्वरं भिक्षाशित्वं न च परधनास्वादनसुखम् ॥ १३७ ॥ और चुप रहना अच्छा, पर मिथ्या (झूठा) वचन कहना अच्छा नहीं; मनुष्योंकी नपुंसकता अच्छी, पर पराई स्त्रीके साथ गमन अच्छा नहीं; मर जाना अच्छा, किन्तु धूर्तकी बातोंमें रुचि करना अच्छा नहीं; और भीख मांगना अच्छा, पर पराया धनसे सुस्वादु भोजनका सुख अच्छा नहीं ॥ १३७ ॥ वरं शून्या शाला न च खलु वरो दुष्टवृषभो वरं वेश्या पत्नी न पुनरविनीता कुलवधूः । वरं वासोऽरण्ये न पुनरविवेकाधिपपुरे वरं प्राणत्यागो न पुनरथमानामुपगमः ॥ १३८ ॥ सूनी गौशाला अच्छी, पर मरखना बैल अच्छा नहीं; वेश्या स्त्री अच्छी, परंतु कुलकी बहू व्यभिचारिणी अच्छी नहीं; वनमें रहना अच्छा, पर अविवेकी राजाके नगरमें रहना अच्छा नहीं; और प्राणोंको छोड़ देना अच्छा, पर दुर्जनोंका संग अच्छा नहीं ॥ १३८ ॥ अपि च,— सेवेव मानमखिलं ज्योत्स्नेव तमो जरैव लावण्यम् । हरिहरकथेव दुरितं गुणशतमप्यर्थिता हरति ॥ १३९ ॥ और भी—जैसे सेवा सब मानको, चांदनी अंधकारको, बुढ़ापा खूबसूरतीको और विष्णु तथा महादेवकी कथा पापोंको हरती है वैसेही याचना सैकड़ों गुणोंको हर लेती है ॥ १३९ ॥ इति विमृश्य 'तत्किमहं परपिण्डेनात्मानं पोषयामि ? कष्टं भोः, तदपि द्वितीयं मृत्युद्वारम् । यह विचार कर कि मैं किस प्रकार पराये भोजनसे अपनेको पालूं ? अहो, बड़े कष्टकी बात है वहभी दूसरा मृत्युका द्वार है ।
५८ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १४०- यतः,- पल्लवग्राहि पाण्डित्यं क्रयकीतं च मैथुनम् । भोजनं च पराधीनं तिस्रः पुंसां विडम्बनाः ॥ १४० ॥ क्योंकि—थोड़ा पढ़ कर पण्डिताई, धन दे कर मैथुन, और पराये आसरेका भोजन, ये तीन बातें मनुष्यकी व्यर्थ हैं ॥ १४० ॥ अपरं च,- रोगी चिरप्रवासी परान्नभोजी परावसथशायी । यज्जीवति तन्मरणं यन्मरणं सोऽस्य विश्रामः' ॥ १४१ ॥ और रोगी, बहुत कालतक विदेशमें रहने वाला, दूसरेके आसरे भोजन करने वाला तथा दूसरेके घर सोने वाला इनका जीना मरणके, और मरण विश्रामके समान है ॥ १४१ ॥ इत्यालोच्यापि लोभात्पुनरप्यर्थं ग्रहीतुं ग्रहमकरवम् । यह सोच करभी लोभसे फिर उसका धन लेनेकी हठ की । यथा चोक्तम्,- लोभेन बुद्धिश्चलति लोभो जनयते तृषाम् । तृषार्तो दुःखमाप्नोति परत्रेह च मानवः ॥ १४२ ॥ जैसा कहा है—लोभसे बुद्धि चलायमान हो जाती है, लोभही तृष्णाको बढ़ाता है, और तृष्णासे दुःखी हुआ मनुष्य इस लोक और परलोकमें कष्ट पाता है ॥ १४२ ॥ ततोऽहं मन्दं मन्दमुपसर्पंस्तेन वीणाकर्णेन जर्जरवंशखण्डेन ताडितश्चाचिन्तयम्— फिर उस वीणाकर्णने धीरे धीरे मुझ चलते हुएको एक सड़े बांसका टुकड़ा मारा, और मैं चिंता करने लगा— धनलुब्धो ह्यसंतुष्टोऽनियतात्माऽजितेन्द्रियः । सर्वा एवापदस्तस्य यस्य तुष्टं न मानसम् ॥ १४३ ॥ जिसको संतोष नहीं है उसको सब आपत्तियां ही हैं, क्योंकि वह धनका लोभी, अप्रसन्न, दुच्चित्ता और अजितेन्द्री हो जाता है ॥ १४३ ॥ तथा च,- सर्वाः संपत्तयस्तस्य संतुष्टं यस्य मानसम् । उपानद्गूढपादस्य ननु चर्मावृतेव भूः ॥ १४४ ॥
- १४९ ] प्राणियोंके लिये उचित धर्म ५९ और—जिसका मन संतुष्ट है उसको सब संपत्तियां हैं जैसे पैरमें जूता पहने हुयेको सब पृथ्वी चर्ममयी दीखती है ॥ १४४ ॥ अपरं च,— संतोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम् । कुतस्तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम् ? ॥ १४५ ॥ और दूसरे—संतोषरूपी अमृतसे अघाये हुए शांतचित्त वालोंको जो सुख है, वह सुख इधर उधर फिरने वाले धनके लोभियोंको कहां रक्खा है ? ॥ १४५ ॥ किंच,— तेनाधीतं श्रुतं तेन तेन सर्वमनुष्ठितम् । येनाशाः पृष्ठतः कृत्वा नैराश्यमवलम्बितम् ॥ १४६ ॥ और—जिसने आशाको पीछे कर निराशाका सहारा लिया है, उसीने पढ़ा, उसीने सुना और उसीने सब कुछ कर लिया ॥ १४६ ॥ अपि च,— असेवितेश्वरद्वारमदृष्टविरहव्यथाम् । अनुक्तक्लीबवचनं धन्यं कस्यापि जीवनम् ॥ १४७ ॥ औरभी—जिसने धनवान्के द्वारकी सेवा नहीं की ( याने श्रीमान्के पास कभी द्रव्ययाचना नहीं की ), विरहके दुःखको नहीं देखा, और कभी दीन वचन मुखसे नहीं कहे, ऐसे किसी भी मनुष्यका जीना धन्य है ॥ १४७ ॥ यतः,— न योजनशतं दूरं वाह्यमानस्य तृष्णया । संतुष्टस्य करप्राप्तेऽप्यर्थे भवति नादरः ॥ १४८ ॥ क्योंकि—जिसको तृष्णाने घुमा रक्खा है उसे सौ योजनभी क्या दूर हैं ? और संतोषीके हाथमें धन आ जाने पर भी आदर नहीं होता है ॥ १४८ ॥ तदत्रावस्थोचितकार्यपरिच्छेदः श्रेयान् । इसलिये यहां दशाके उचित कार्यका निश्चय करना कल्याणकारी है ॥ को धर्मो भूतदया किं सौख्यमरोगिता जगति जन्तोः । कः स्नेहः सद्भावः किं पाण्डित्यं परिच्छेदः ॥ १४९ ॥
६० हितोपदेशः [ मित्रलाभः १५०- संसारमें प्राणियोंका धर्म क्या है कि जीवों पर दया करना, और सुख क्या है कि नीरोग रहना, स्नेह क्या है कि सत्कारपूर्वक मिलना, और पंडिताई क्या है कि उच्च नीच विचार कर काम करना ॥ १४९ ॥ तथा च,— परिच्छेदो हि पाण्डित्यं यदापन्ना विपत्तयः । अपरिच्छेदकर्तॄणां विपदः स्युः पदे पदे ॥ १५० ॥ और विपत्तियोंके आजाने पर, निर्णय करके काम करनाही चतुराई है, क्योंकि बिना विचारे काम करने वालोंको पद पदमें विपत्तियां हैं ॥ १५० ॥ त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् । ग्रामं जनपदस्यार्थे स्वात्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥ १५१ ॥ कुलकी मर्यादाके लिये एकको, गांवभरके लिये कुलको, देशके लिये गांवको और अपने लिये पृथ्वीको छोड़ देना चाहिये ॥ १५१ ॥ अपरं च,— पानीयं वा निरायासं स्वाद्वन्नं वा भयोत्तरम् । विचार्य खलु पश्यामि तत्सुखं यत्र निर्वृतिः” ॥ १५२ ॥ और दूसरे—अनायास मिला हुआ जल और भयसे मिला मीठा भोजन उन दोनोंमें विचार कर देखता हूं तो जिसमें चित्त बेखटके रहे उसीमें सुख है अर्थात् पराधीन भोजनसे स्वाधीन जलका मिलना उत्तम है ॥ १५२ ॥ इत्यालोच्याहं निर्जनवनमागतः । यह विचार कर मैं निर्जन वनमें आया हूं । यतः,— वरं वनं व्याघ्रगजेन्द्रसेवितं द्रुमालयं पक्वफलाम्बुभोजनम् । तृणानि शय्या परिधानवल्कलं न बन्धुमध्ये धनहीनजीवनम् ॥ १५३ ॥ क्योंकि—सिंह और हाथियोंसे भरे हुए वनमें वृक्षके नीचे रहना, पके हुए कंद मूल फल खाकर जल पान करना तथा घासके बिछोनेपर सोना और छालके वस्त्र पहनना अच्छा है पर भाई बन्धुओंके बीचमें धनहीन जीना अच्छा नहीं है ॥ १५३ ॥
-१५७ ] संसारी पुरुषको उचित उपदेश ६१ ततोऽस्मत्पुण्योदयादनेन मित्रेणाहं स्नेहानुवृत्त्यानुगृहीतः। अधुना च पुण्यपरम्परया भवदाश्रयः स्वर्ग एव मया प्राप्तः। फिर मेरे पुण्यके उदयसे इस मित्रने परम स्नेहसे मेरा आदर किया और अब पुण्यकी रीतिसे तुम्हारा आश्रय मुझे स्वर्गके समान मिल गया. यतः,— संसारविषवृक्षस्य द्वे एव रसवत्फले । काव्यामृतरसास्वादः संगमः सुजनैः सह' ॥ १५४ ॥ क्योंकि—संसाररूपी विषवृक्षके दो ही रसीले फल हैं; अर्थात् एक तो काव्यरूपी अमृतके रसका स्वाद और दूसरा सज्जनोंका संग' ॥ १५४ ॥ मन्थर उवाच— 'अर्थाः पादरजोपमा गिरिनदीवेगोपमं यौवन- मायूष्यं जललोलबिन्दुचपलं फेनोपमं जीवितम् । धर्मं यो न करोति निन्दितमतिः स्वर्गार्गलोद्घाटनं पश्चात्तापयुतो जरापरिगतः शोकाग्निना दह्यते ॥ १५५ ॥ मंथर बोला—'धन तो चरणोंकी धूलिके समान है, यौवन पहाड़ की नदीके वेगके समान है, आयु चंचल जलकी बिन्दुके समान चपल है और जीवन फेन ( झाग ) के समान है, इसलिये जो निर्बुद्धि स्वर्गकी आगलको खोलने वाले धर्मको नहीं करता है वह पीछे बुढ़ापेमें पछता कर शोककी अग्निसे जलाया जाता है ॥ १५५ ॥ युष्माभिरतिसंचयः कृतः । तस्यायं दोषः; शृणु,— तुमने बहुतसा संचय किया था उसका यह दोष है ॥ सुनो,— उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम् । तडागोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम् ॥ १५६ ॥ गंभीर सरोवरमें भरे हुए जलके चारों ओर निकलनेके (वारंवार जल निकाल देना जैसा सरोवरकी शुद्धिका कारण है, उसीके ) समान कमाये हुए धनका सत्पात्रमें दान करना ही रक्षा है ॥ १५६ ॥ अन्यच्च,— यदधोऽधः क्षितौ वित्तं निचखान मितंपचः । तदधोनिलयं गन्तुं चक्रे पन्थानमग्रतः ॥ १५७ ॥