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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

३० [ १.१२ ११६ आचार्य उस समय बिलकुल मदहोश था। इसलिए उसने कहा—तू मेरी सामर्थ्य को नही जानता। इस प्रकार बोधिसत्व के उपदेश का अनादर कर, चार शक्तियो को लांघ पांचवी को लांघते समय डण्ठल से महुए के फूल के गिरने की तरह, चीखता हुआ गिरा; उसे देख बोधिसत्व ने कहा—यह पण्डितो का कहना न कर इस आपत्ति में पडा। इसके बाद यह गाथा कही— अतिकरमकराचरिय ! मय्हम्पेतं न रुच्चति, चतुत्थे लंघयित्वान पञ्चमियास्मि¹ आवुतो ॥ [ आचार्य, आज तुमने अति कर दी। मुझ तक को यह अच्छा नही लगा। चारो लांघकर पांचवी में गिर पडे । ] ———— अतिकरमकराचरिय, आचार्य, आज तुमने अति कर दी। अर्थात् अपनी शक्ति से बाहर काम किया। मय्हम्पेतं न रुच्चति, मुझ आपके शिष्य तक को यह अच्छा नही लगा। इसीलिए मैने पहले कह दिया था। चतुत्थे लंघयि- त्वान, चौथे शक्ति-फलक पर बिना गिरे लांघकर, पञ्चमियास्मि आवुतो, पण्डितो की बात न मानकर पांचवी शक्ति पर गिर पडे । ———— इतना कह आचार्य को शक्ति पर से उठा, जो करना उचित था, किया। शास्ता ने इस पूर्व-जन्म की कथा को ला जातक का मेल बैठाया—उस समय का आचार्य, यह बात न माननेवाला भिक्षु था, शिष्य तो मैं ही था। ———— ¹ 'पञ्चमायसिं' भी पाठ है।

११७. तित्तिर जातक (२)

तित्तिर ] ३१ ११७. तित्तिर जातक (२) "अच्चुग्गता अतिबलता "यह (गाथा) शास्ता ने जेतवन मे विहार करते समय कोकालिक¹ के बारे मे कही थी। क. वर्तमान कथा उसकी वर्तमान कथा तेरहवे निपात की तक्कारिय जातक² म प्रगट होगी। शास्ता ने कहा—भिक्षुओ, न केवल अभी कोकालिक अपनी वाणी के कारण नष्ट हुआ है, पहले भी नष्ट हुआ है। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व ने उदीच्य ब्राह्मण कुल म जन्म ग्रहण कर बड़े होने पर तक्षशिला जा सब विद्याएँ सीखीं। फिर काम-भोग के जीवन को छोड़ ऋषि प्रव्रज्या के अनुसार प्रव्रजित हो पाँच अभिज्ञा तथा आठ समापत्तियो को प्राप्त किया । हिमवन्त प्रदेश के सभी ऋषियो ने उन्ह अपना उपदेशक आचार्य बनाया और उनके आस-पास रहने लगे। वे भी पाँच सौ ऋषियो के उपदेशक-आचार्य बन ध्यान मग्न हो हिमवन्त मे रहते थे । उस समय पाण्डु रोग से पीडित एक तपस्वी कुल्हाडी लेकर लकडियाँ फाड रहा था। उसके पास बैठे एक वाचाल तपस्वी ने 'यहाँ पर मारें, यहाँ पर मारें' बार बार कहकर उस तपस्वी को क्रोधित कर दिया। उसने क्रोध ¹ कोकालिक देवदत्त के पक्ष का एक सघ-भेदक था। ² तक्कारिय जातक (४८१)

३२ [ १.१२.११७ में आकर कहा, 'तू मुझे अब लकडी चीरना सिखाना चाहता है', और अपनी तेज कुल्हाड़ी उठा उसे एक ही प्रहार से मार डाला। बोधिसत्व ने उसका शरीर-कृत्य किया। उसी समय आश्रम से कुछ ही दूर वल्मीक पर एक तित्तिर रहता था। यह सुबह शाम वल्मी के ऊपर खड़ा हो बडे जोर से आवाज लगाता। उसे सुन एक शिकारी ने सोचा कि तित्तिर होगा और शब्द के पीछे पीछे जा, उसे मार घर ले गया। बोधिसत्व ने उसकी आवाज न सुनाई देती देख तपस्वियों से पूछा- उस जगह एक तित्तिर रहता था। उसकी आवाज नहीं सुनाई देती ? उन्होंने बोधिसत्त्व को सब हाल कहा। बोधिसत्त्व ने ऊपर की दोनों बातों को मिला ऋषियों के सामने यह गाथा कही— अच्चुग्गता अतिबलता अतिवेलं पभासिता, वाचा हनति दुम्मेधं तित्तिरं वातिवस्सितं ॥ [ अति-ऊँची, अति जोर से अत्यधिक देर तक बोली गई वाणी मूर्ख आदमी को वैसे ही मार डालती है जैसे जोर से चिल्लाने से तित्तिर मारा गया।] अच्चुग्गता, अति उद्गता। अतिबलता, बार बार बोलने से बहुत बलशाली हो गई। अतिवेलं पभासिता उचित से बहुत ज्यादा देर तक भाषित। तित्तिरं वातिवस्सितं, जैसे बहुत बोलने से तित्तिर मारा गया, वैसे ही इस प्रकार की वाणी मूर्ख आदमी को मार गिराती है। इस प्रकार बोधिसत्त्व ऋषियों को उपदेश दे चारो ब्रह्म-विहारों की भावना कर ब्रह्म-लोक गामी हुए। शास्ता ने 'भिक्षुओ, न केवल अभी कोकालिक अपनी वाणी के कारण विनष्ट हुआ, किन्तु पहले भी नष्ट हुआ' कहा, और यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय दुर्वचन बोलनेवाला तपस्वी कोकालिक हुआ। ऋषिगण बुद्ध-परिषद। और ऋषिगण का शास्ता तो मैं था ही।

११८. वट्टक जातक (२)

वट्टक ] ३३ ११८. वट्टक जातक (२) “नाचिन्तयन्तो पुरिसो....” यह गाथा शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय उत्तर नाम के श्रेष्ठि के पुत्र के बारे में कही। क. वर्तमान कथा श्रावस्ती में उत्तर श्रेष्ठि महाधनवान था। उसकी भार्या की कोख में एक बालक पैदा हुआ। वह पुण्यवान् था, ब्रह्मलोक से च्युत होकर यहाँ जन्म ग्रहण किया था। बडा होने पर वह ब्रह्मा की तरह सुन्दर वर्ण का हुआ। एक दिन श्रावस्ती में कार्तिक महोत्सव की घोषणा होने पर सभी लोग उत्सव मनाने मे मस्त थे। उस तरुण के मित्रो—सभी दूसरे श्रेष्ठि-पुत्रो की पत्नियां थी। उत्तर श्रेष्ठि पुत्र बहुत समय तक ब्रह्मलोक में रहा था, इसलिए उसकी कामभोग में आसक्ति न थी। उसके मित्रो ने सोचा कि उत्तर श्रेष्ठि पुत्र के लिए भी एक स्त्री लाकर उत्सव मनाएगे। वे उसके पास जाकर बोले “सौम्य ! इस नगर में कार्तिक रात्रि का उत्सव घोषित हुआ है। तुम्हारे लिए भी एक स्त्री लाकर उत्सव मनाएं ?” 'मुझे स्त्री की आवश्यकता नही हैं' कहने पर भी बार बार आग्रह करके स्वीकार करवा लिया। तब एक वेश्या को सब अलकारो से सजा, उसके घर ले जाकर उसे श्रेष्ठिपुत्र का सोने का कमरा दिखाकर कहा कि तू श्रेष्ठिपुत्र के पास जा। उसे कमरा दिखा वे स्वय चले गए। उसके शयनागार मे प्रविष्ट होने पर भी श्रेष्ठिपुत्र ने न उसकी ओर देखा, न बातचीत की। उसने सोचा यह मेरे जैसी सुन्दर उत्तम विलास-युक्त स्त्री की ओर न देखता है, न बातचीत करता है। इसे अब स्त्री-लीला से देखने पर मजबूर करूँगी। तब वह स्त्री-लीला दिखाते हुए प्रसन्न-मुख की भाँति ३

५४ [ १।२।१८

आगे के दांत निकालकर मुस्कराई। श्रेष्ठिपुत्र ने देखा, तो दांतो की हड्डियां उसके लिए ध्यान का विषय हो गईं। उसमें अस्थि-सञ्ज्ञा पैदा हुई। उसे वह सारा शरीर हड्डियों के पञ्जर की तरह मालूम देने लगा। उसकी मजदूरी दे, उसने कहा 'जाओ'। उसने घर से निकलने पर बीच-बाजार में खड़ा देख एक ऐश्वर्यशाली आदमी उसे खर्चा दे अपने घर ले गया। सप्ताह बीतने पर उत्सव समाप्त हुआ। वेश्या की माता ने जब देखा कि लडकी नहीं आई तो वह श्रेष्ठिपुत्रों के पास गई और पूछा कि वह कहाँ है? उन्होने उत्तर श्रेष्ठिपुत्र के यहाँ जाकर पूछा कि वह कहाँ है। उसने कहा "उसी समय खर्चा देकर विदा कर दिया।" उसकी माँ रोने लगी। 'मैं अपनी लडकी को नहीं देखती। मेरी लडकी लाओ' कहते हुए वह उत्तर-श्रेष्ठि-पुत्र को ले राजा के पास गई। राजा ने मुकद्दमे का फैसला करते हुए पूछा- "इन श्रेष्ठिपुत्रों ने तुम्हे वेश्या लाकर दी ?" "देव ! हाँ।" "अब वह कहाँ है ?" "नहीं जानता हूँ। उसी समय उसे विदा कर दिया था।" "अब उसे लिया आ सकता है ?" "देव ! नहीं सकता हूँ।" "यदि नहीं ला सकता है, तो इसे राज-दण्ड दो।" उसके हाथ पीछे की तरफ बाँध राज-दण्ड देने के लिए उसे पकडकर ले गए। वेश्या को न ला सकने के कारण राजा श्रेष्ठिपुत्र को राज-दण्ड दे रहा है, सुन सारे नगर मे हल्ला मच गया। लोग छाती पर हाथ रखकर 'स्वामी ! यह क्या आपके योग्य है ?' कहते हुए रोने लगे। सेठ भी रोता पीटता पुत्र के पीछे पीछे जा रहा था। श्रेष्ठिपुत्र सोचने लगा, 'यह जो मुझे इस प्रकार का दुख हुआ, यह घर में रहन के ही कारण हुआ, यदि मैं इससे मुक्त हुआ तो गोतम सम्यक सम्बुद्ध के पास प्रब्रजित होऊँगा।' वेश्या ने हल्ला सुना तो पूछा यह क्या हल्ला है? समाचार मालूम होने पर वह जल्दी से उतर "स्वामी ! हटो हटो" मुझे राज पुरुषो को देखने दें कहती हुई राज-पुरुषो के पास पहुँची। राज-पुरुषो ने उसे देख माता को सौंपा

वट्टक ] ३५ और श्रेष्ठिपुत्र को मुक्त कर चले गए। श्रेष्ठिपुत्र मित्रो रोहिणी नदी पर गया। यहाँ सिर से स्नान कर, घर जा, प्रातराश कर, माता पिता को प्रव्रज्या की बात जना, चीवर-वस्त्र ले बड़ी भारी मण्डली के साथ बुद्ध के पास जा प्रणाम कर प्रव्रज्या की याचना की। प्राज्या तथा उपसम्पदा प्राप्त कर वह योगाभ्यास में लग विपश्यना की वृद्धि कर थोड़ी ही देर में अर्हत्व मे प्रतिष्ठित हुआ। एक दिन धर्म-सभा मे इकट्ठे हुए भिक्षु श्रेष्ठिपुत्र की प्रशंसा कर रहे थे— “आयुष्मानो ! श्रेष्ठिपुत्र अपने पर आई आपत्ति देख बुद्ध-शासन की महिमा जान 'इस दुःख से मुक्त होने पर प्रव्रजित होऊँगा' सोच, उस सुचिन्तन के फलस्वरूप मुक्त हो, प्रव्रजित हो अर्हत्व में प्रतिष्ठित हुआ। शास्ता ने आकर पूछा—'भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?' "अमुक बातचीत ।" "भिक्षुओ ! केवल श्रेष्ठिपुत्र ही अपने पर आपत्ति पड़ने पर इस उपाय से इस दुःख से मुक्त होऊँगा" सोच मृत्यु भय से मुक्त नहीं हुआ, पूर्व समय में बुद्धिमान लोग भी अपने पर आपत्ति पड़ने पर 'इस उपाय से इस दुःख से मुक्त होग' सोच मृत्यु-भय के दुःख से मुक्त हुए। (यह कह) पूर्व-जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय जन्म मरण के चक्कर में पड़े हुए बोधिसत्त्व एक बार बटेरे के जन्म में पैदा हुए। उस समय बटेरो का एक शिकारी जगल से बहुत से बटेर पकड़ ले जाकर, घर में रख उन्हें दाना खिला, खरीदारो से मूल्य ले उनके हाथ बेच अपनी जीविका चलाता था। वह एक दिन बहुत से बटेरो के साथ बोधिसत्त्व को भी पकड़ लाया। बोधिसत्व ने सोचा—यदि में इसका दिया हुआ चोगा खाऊँगा पीऊँगा तो यह मुझे आये हुए मनुष्यो के हाथ बेच देगा। यदि नही खाऊँगा तो मै कुम्हला जाऊँगा। मुझे कुम्हलाया हुआ देख कर मनुष्य नही खरीदेगे; इस प्रकार मेरा कल्याण होगा। में यही उपाय करूँगा। उसने वैसा ही किया, जिससे वह सूखकर केवल हड्डी और चमड़ी मात्र

३६ [ १-१२-११८ रह गया। मनुष्य उसे देखकर नहीं खरीदते थे। बोधिसत्त्व को छोड़ शेष बटेरों के समाप्त हो जाने पर, चिड़ीमार पिंजरे को ला दरवाजे पर रख (उसमें से) बोधिसत्त्व को हाथ पर ले देखने लगा कि इस बटेर को क्या हुआ ? उसे असावधान देख बोधिसत्त्व ने पर फैलाए और उड़कर जंगल जा पहुँचा। बटेरों ने बोधिसत्त्व को देखकर पूछा—"पता नहीं रहा कि कहाँ गए थे ?" "मुझे चिड़ीमार ने पकड़ लिया था।" "कैसे मुक्त हुए ?" पूछने पर बोधिसत्त्व ने कहा मैंने उसका दिया हुआ दाना-पानी नहीं ग्रहण किया, और मुक्त होने का तरीका सोचकर छूट गया। (इतना कह) यह गाथा कही— नाचिन्तयन्तो पुरिसो विसेसमधिगच्छति, चिन्तितस्स फलं पस्स मुत्तोस्मि वधबन्धना ॥ [जो आदमी विचार नहीं करता, वह विशेष (=मोक्ष) को प्राप्त नहीं होता। विचार करने के फल को देखो मैं मरण-बन्धन से मुक्त हो गया ।] सारांश यह है। पुरिसो, दुःख में पड़कर मैं इस उपाय से मुक्त होऊँगा, इस प्रकार न विचार करनेवाला अपने दुःख से मुक्ति स्वरूप विसेस नाधि गच्छति । अब मैंने जो विचार से काम लिया, उसके फल को देखो। उसी उपाय से मैं मुत्तोस्मि वधबन्धना, मैं मरण से तथा बन्धन से मुक्त हुआ। इस प्रकार बोधिसत्त्व ने अपनी कृति का वखान किया। शास्ता ने इस धर्मदेशना को ला जातक का मेल बैठाया। उस समय मरने से मुक्त हुआ बटेर मैं ही था।

११९. अकालरावी जातक

अकालरावी ] ३७ ११९. अकालरावी जातक “अमातापितरि संवड्ढो” . यह धर्मदेशना शास्ता ने जेतवन मे रहते समय एक असमय शोर करनेवाले भिक्षु के बारे में कही। क. वर्तमान कथा उस श्रावस्ती-निवासी तरुण ने (बुद्ध-) शासन में प्रव्रजित हो न कर्तव्य सीखे न शिक्षा ग्रहण की। वह नहीं जानता था कि इस समय मुझे (झाडू लगाना आदि) काम करने चाहिए, इस समय मुझे सेवा के काम करने चाहिएः इस समय पाठ करना चाहिए। पहले याम में भी, बीच के याम, मे भी और पिछले याम में भी जब जब आंख खुलती, यह शोर करता था। भिक्षुओं को नींद न आती। धर्मसभा मे एकत्र हुए भिक्षु उसकी निन्दा करते— “आयुष्मानो ! यह भिक्षु इस प्रकार के रतन¹ शासन मे प्रव्रजित हो कर भी, न कर्तव्य जानता है, न शिक्षा जानता है, न समय जानता है और न असमय जानता है।” शास्ता ने आकर पूछा “भिक्षुओ ! इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?” “अमुक बातचीत” कहने पर कहा— “भिक्षुओ ! यह केवल अभी असमय शोर मचाने वाला नहीं है, पहले भी असमय हल्ला करनेवाला ही रहा है। समय असमय न जानने के कारण ही इसकी गर्दन मरोडी जाकर यह मृत्यु को प्राप्त हुआ।” इतना कह पूर्व जन्म की बात कही— ¹ बुद्ध, धर्म तथा संघ तीन रतन हैं।

ख. अतीत कथा

३८ [ १.१२.११६ ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व उदीच्य ब्राह्मण-कुल में जन्म ग्रहण कर सयाने होने पर, सब शिल्पो में पारङ्गत हो, चारो दिशाओ में प्रसिद्ध आचार्य बन पांच सौ शिष्यो को शिल्प बेंचवाते (सिखाते) थे। उन शिष्यो के पास समय पर बोलनेवाला एक मुर्गा था। वे उसके बांग देने पर उठकर शिल्प सीखते थे। वह मर गया। तब वह कोई दूसरा मुर्गा ढूंढ़ते फिरते थे। एक शिष्य ने श्मशान वन में लकड़ी इकट्ठी करते समय एक मुर्गे को देख, उसे लाकर पिंजरे में बन्द कर, पाला। वह श्मशान में बडा हुआ होने से यह न जानता था कि किस समय बोलना चाहिए। कभी आधी रात को बोलता कभी अरुण उदय होने पर। शिष्य उसके बहुत रात रहते बोलने पर उसी समय शिल्प सीखना आरम्भ करने के कारण अरुणोदय तक न सीख सकते थे। नींद के मारे सीखा हुआ भी भूल जाते। बहुत प्रभात होने पर बोलने के समय पाठ करने का अवकाश ही न रहता। शिष्यो ने सोचा, यह या तो बहुत रात रहने पर बोलता है, या बहुत दिन चढ़ने पर। इस (की मदद) से हमारा शिल्प (सीखना) समाप्त न होगा। यह सोच उसकी गर्दन मरोड उसे मार डाला। फिर आचार्य के पास जाकर कहा कि हमने असमय शोर मचानेवाले मुर्गे को मार डाला। आचार्य ने कहा कि वह प्रशिक्षित ही वृद्धि को प्राप्त हुआ था। इसी से मरा। इतना कह यह गाथा कही— अमातापितरि संवड्ढो अनाचरियकुले वस, नायं काल अकाल वा अभिजानाति कुक्कुटो ॥ [ न माता-पिता से शिक्षा ग्रहण करते हुए बडा, न आचार्य्य-कुल मे ही रहा। यह मुर्गा न समय जानता था, न असमय।] अमातापितरि संवड्ढो, माता पिता के पास उनका उपदेश न ग्रहण करता हुआ बढा। अनाचरिय कुले यस, आचार्य कुल मे भी न रह कर आचार-शिक्षा न ग्रहण करने के कारण असंयमी। पायं अकाल वा इस समय बोलना चाहिए,

यह कथा सुना बोधिसत्त्व यावत आयु जीवित रहकर कर्मानुसार परलोक

बन्धन ] ३६ इस समय नही बोलना चाहिए, इस प्रकार यह मुर्गा समय असमय नहीं जानने के कारण ही मृत्यु को प्राप्त हुआ । यह कथा सुना बोधिसत्त्व यावत आयु जीवित रहकर कर्मानुसार परलोक सिधारे। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय असमय शोर मचानेवाला मुर्गा यह भिक्षु ही था। शिष्य बुद्ध-परिषद हुए। आचार्य्य तो मै था ही । १२०. बन्धनमोक्ख जातक "अबद्धा तत्थ बज्झन्ति" यह (धर्मोपदेश) शास्ता ने जेतवन में रहते समय चिञ्चमाणविका के बारे में कहा। उसकी कथा बारहवें निपात में महापदुम जातक¹ में आएगी। उस समय शास्ता ने 'भिक्षुओ ! चिञ्च माण- विकाने न केवल अभी मुझ पर झूठा इल्जाम लगाया है, पहले भी लगाया है' कह पूर्व-जन्म की बात कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व पुरोहित के घर में जन्म ग्रहण कर सयाना होने पर पिता के मरने के बाद उसी राजा का पुरोहित हो गया। ¹ महापदुम जातक (४७२) ।

४० [ १.१२ १२० उस राजा ने अपनी पटरानी को वर दिया था कि जो इच्छा हो मांग ले । उसने कहा, मुझे और वर दुर्लभ नहीं हैं, मैं यही चाहती हूँ कि अब इसके बाद आप किसी दूसरी स्त्री को कामुक-दृष्टि से न देखें । राजा ने अस्वीकार कर, लेकिन फिर फिर जोर देने से उसके वचन को अस्वीकृत न कर सकने के कारण स्वीकार कर लिया । उसके बाद राजा ने सोलह हजार नर्तकियों में से किसी एक स्त्री की ओर भी कामुक-दृष्टि से नहीं देखा । उस समय राजा के इलाके में बगावत फैली । इलाके के योद्धाओं ने विद्रोहियो (चोरो) के साथ दो तीन लडाइयाँ लड (राजा के पास) पत्र भेजा कि इसके आगे हम न लड सकेंगे । राजा ने वहाँ जाने की इच्छा से सेना एकत्र कर देवी को बुलवाकर कहा—"भद्रे ! में इलाके में जाता हूँ । वहाँ नाना प्रकार के युद्ध होते हैं। जय-पराजय भी अनिश्चित रहती है। वैसी जगहों में स्त्रियो को साथ ले चल सकना कठिन है। तू यही रह।" उसने कहा "देव ! में यहाँ नही रह सकती ।" राजा के बार बार मना करने पर बोली "अच्छा ! तो एक एक योजन पर पहुँचकर मेरा कुशल-समाचार जानने के लिए एक एक आदमी भेजना होगा।" राजा ने "अच्छा" कह स्वीकार किया । बोधिसत्व को नगर म छोड़, बडी भारी सेना के साथ नगर से निकल राजा जाते हुए एक एक योजन पर एक एक आदमी को भेजता कि जाओ हमारा कुशल समाचार कह रानी के दुख-सुख की खबर लाओ। वह हर आनेवाले आदमी से पूछती 'राजा ने तुम्हे किस लिए भेजा है ?' 'तुम्हारा कुशल- समाचार जानने के लिए' कहने पर 'तो आओ' कह उससे सहवास करती । राजा ने बत्तीस योजन मार्ग जाते हुए बत्तीस जनो को भेजा । उसने उन सभी के साथ वैसे ही किया । राजा न इलाके को दबा, लोगो को निश्चिन्त कर लौटते समय भी उसी तरह बत्तीस आदमी भेज । उसन उन बत्तीसो के साथ भी वैसे ही दुष्कर्म किया । राजा ने (राजधानी म) पहुँच विजय-पडाव१ पर रुक बोधिसत्व को १ इलाके को जीतकर आने पर नगर से बाहर जो पडाव डाला जाता था, उसे 'जय खन्धावार' कहते थे ।

सूचना भेजी 'नगर को (स्वागत के लिए) तैयार करे।' बोधिसत्त्व सारे नगर के साथ राज-महल को भी तैयार कराते हुए रानी के निवास-स्थान पर गया। उसने बोधिसत्त्व का सुन्दर शरीर देख सयम न कर सकने के कारण कहा— "ब्राह्मण ! शय्या पर आ।" बोधिसत्त्व ने उत्तर दिया—"ऐसा मत कह। मेरे मन में राजा का गौरव भी है और मै पाप-कर्म से डरता भी हूँ। मै ऐसा नही कर सकता।" "उन चौसठ सदेश-वाहको को तो न राजा का गौरव था, न वह पाप से डरते थे, तुझे ही राजा का गौरव है और तू ही (एक) पाप से डरनेवाला है ?" "हाँ, यदि उनको भी ऐसा होता, तो वह भी ऐसा न करते। मै तो जान बूझकर ऐसा दुस्साहस नही करूँगा।" "बहुत क्यो बकवाद करता है, यदि मेरा कहना नही करेगा तो तेरा सिर कटवा दूँगी।" "एक जन्म के सिर की बात क्या, यदि हजार जन्मो में हर बार भी सिर कटे तो भी मै ऐसा नही कर सकता।" "अच्छा देखूँगी" कह बोधिसत्त्व को डरा रानी अपने कमरे मे गई। वहाँ अपने शरीर पर नाखून की खसोट के निशान बना, बदन पर तेल मल, मैले कुचैले कपडे पहन बीमारी का बाहना बना कर लेट रही और दासियो को आज्ञा दी कि जब राजा पूछे 'देवी कहाँ है ?' तो उत्तर देना 'बीमार है।' बोधिसत्त्व राजा की अगवानी के लिए गए। राजा ने नगर की प्रदक्षिणा कर प्रासाद पर चढ रानी को न देख पूछा—"देवी कहाँ है ?" "देव ! बीमार है।" राजा ने रानी के कमरे में प्रवेश कर उसकी पीठ मलते हुए पूछा "भद्रे ! तुझे क्या कष्ट है ?" रानी चुप रही। तीसरी बार (पूछने पर) राजा की ओर देखते हुए बोली—"राजन् ! तुम भी जीते हो ? मेरे जैसी स्त्री को भी स्वामी-वाली कहा जा सकता है ?" "भद्रे ! बात क्या है ?" "तुमने जिस पुरोहित को नगर की रक्षा का भार सौंपा, वह राजमहल में तैयारी के काम से यहाँ आया और अपना कहना न करने वाली मुझे मारकर अपने मन की करके गया।"

४२ [ १-१२-१२०

जिस प्रकार आग म नमक तथा शक्कर डालने पर चट चट शब्द होता है, उसी प्रकार राजा क्रोध से चटचटाता हुआ रानी के कमरे से निकला और द्वारपालो तथा परिचारको को बुलवाकर आज्ञा दी—"अरे ! जामो, पुरो- हित की बाहे पिछली तरफ बाँधकर, उसे वध करने योग्य मनुष्य की तरह नगर से बाहर वध करने के स्थान पर ले जा कर उसका सिर काट दो।" उन्होंने जल्दी से जाकर उसकी बाँहें पिछली तरफ करके बाँध, वध-भेरी बजवा दी। बोधिसत्त्व ने सोचा "उस दुष्ट देवी ने राजा को पहले से ही फोड लिया। अब मै आज अपने बल से ही अपने को मुक्त करूँगा।" उसने उन लोगो से कहा— "भो ! तुम मुझे मारते हो, तो एक बार राजा के पास ले चलकर मारना।" "किस लिए?" "मै राज कर्मचारी हूँ। मैने बहुत कार्य्य किए हैं। मैं अनेर गडे हुए खजानो को जानता हूँ। मै ही राज्य-सम्पत्ति की देखरेख करता रहा हूँ। यदि मुझे राजा को न दिखाओगे, तो बहुत धन का नाश हो जाएगा। मुझे राजा को उसके धन की सूचना दे लेने पर, फिर जो करना हो करो।" वे उसे राजा के पास ले गए। राजा ने उसे देखते ही कहा—"अरे ब्राह्मण ! तूने मेरी भी शरम नही रक्खी ? तूने क्यो ऐसा पापकर्म किया?" "महाराज ! मैं श्रोत्रिय कुल में पैदा हुआ हूँ। मैने कभी च्यूंटी तक की भी जान नही ली। मैने कभी तिनके की भी चोरी नही की। मैने कभी कामुक दृष्टि से किसी की स्त्री की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखा। मैंने कभी हँसी में भी झूठ नही बोला। मैने कभी कुशाग्र से भी मद्य नही पिया। मैने तुम्हारा कुछ अपराध नही किया। उस मूर्खा ने मुझे हाथ से पकड़ा। मेरे इनकार करने पर वह अपना दिया घाव प्रकट कर, मुझे यह कमरे में घसी गई। मैं निरपराधी हूँ। हाँ, पत्र लेकर आनेवाले चौसठ आदमी अपराधी हैं। देव ! उन्हें बुलवा कर पूछें कि उन्होंने उसका कहना किया अथवा नहीं किया?" राजा ने उन चौसठ जनो को बँधवाकर देवी को बुलवाकर पूछा— "तूने इनके साथ पाप किया या नहीं किया?"

बन्धन ] ४३ ‘देव ! किया” रहने पर उसे पीछे हाथ करके बँधवा आज्ञा दी “इन चौंसठ जनो के सीस काट डालो।” बोधिसत्व ने कहा—‘‘महाराज ! इनका दोष नही। रानी ने अपनी मरजी करवाई। यह निरपराध हैं। इसलिए इन्हें क्षमा करें। उसका भी दोष नही। स्त्रियों की मैथुन से सन्तुष्टि नही होती। यह इनका जातीय स्व- भाव है। जो होता है, वही होता है। इसलिए इसे भी क्षमा करें।” यूं राजा को समझाकर, उन चौंसठ जनो तथा उस मूर्ख को छुड़वाकर, उनको उन उन का पद दिलवा दिया। इस प्रकार उन सबको मुक्त करवा, (उनको) अपनी अपनी जगह पर प्रतिष्ठित करवा बोधिसत्त्व ने राजा से कहा—‘‘महाराज ! अन्धे मूर्खों के झूठ कहने के कारण न बाँधने योग्य पण्डितजन पीछे हाथ करके बाँधे गए; और पण्डितो के सहेतुक कथन से पिछली तरफ हाथ बँधे मनुष्य भी मुक्त हुए। इस प्रकार मूर्ख जो बाँधने के योग्य नही हैं, उन्हें भी बँधवा देते हैं और पण्डित बँधे हुओ को भी मुक्त करा देते हैं।” (इतना कह) यह गाथा कही— अबद्धा तत्थ बज्झन्ति यत्थ बाला पभासरे, बद्धापि तत्थ मुच्चन्ति यत्थ धीरा पभासरे॥ [ जहाँ मूर्ख आदमी बोलते हैं, वहाँ मुक्त भी बँध जाते हैं, और जहाँ पण्डित-जन बोलते हैं, वहाँ बँधे हुए भी मुक्त हो जाते हैं। ] अबद्धा, जो बँधे हुए नही हैं। पभासरे, भाषण करते है, बोलते है, कहते हैं। इस प्रकार बोधिसत्त्व ने इस गाथा द्वारा राजा को धर्मोपदेश दे राजा से कहा—‘‘मैने जो यह दुःख भोगा, वह गृहस्थ जीवन में रहते भोगा। अब मुझे गृहस्थ रहने की जरूरत नही है। देव ! मुझे प्रव्रजित होने की आज्ञा दें।” राजा से प्रव्रजित होने की आज्ञा ले रोते हुए रिश्तेदारो, तथा बहुत सी सम्पत्ति को छोड़ ऋपियों के क्रम से प्रव्रज्या ग्रहण कर बोधिसत्त्व हिमालय में रहते हुए अभिञ्जा और समापत्तियाँ प्राप्त कर ब्रह्मलोक-गामी हुए। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय दुष्टदेवी चिञ्चमाणविका थी। राजा आनन्द था। परोहित तो मैं ही था।

१२१. कुसनाळि जातक

पहला परिच्छेद १३. कुसनाळि वर्ग १२१. कुसनाळि जातक “करे सरिक्खो” यह धर्मोपदेश शास्ता ने जेतवन मे रहते समय अनाथ पिण्डिक के स्थिर-मित्र के बारे में दिया। क. वर्तमान कथा अनाथ पिण्डिक के मित्र, सुहृद, रिश्तेदार और बन्धु इकट्ठे होकर उसे बार बार मना करते थे—“महासेठ ! यह न जाति मे, न गोत्र में, न धन- धान्य में ही तेरे समान है, और न तुझ से बढकर ही है। तू इसके साथ क्यो मित्रता करता है ? इसके साथ मित्रता मत कर ?” अनाथ पिण्डिक का ख्याल था कि दोस्ती अपने से छोटे से, बराबरवाले से और श्रेष्ठतर से—सभी से करनी चाहिए, इसलिए उसने उनका कहना नही माना। अपनी जमींदारी के गाँव¹ पर जाते समय वह उसे अपनी सम्पत्ति की देखभाल करने के लिए नियुक्त कर गया। आगे की कथा कालकण्णिकथा² के अनुसार ही समझनी चाहिए। लेकिन इस कथा मे अनाथ पिण्डिक के अपने घर का समाचार कहने पर शास्ता ने कहा—“हे गृहपति ! मित्र कभी तुच्छ नही होता। मित्र-धर्म की रक्षा कर सकने का सामर्थ्य ही असल में होना चाहिए। मित्रता अपने से छोटे से भी करनी चाहिए, बराबरवाले से भी और श्रेष्ठ से भी। ¹ भोग गाँव; जिस गांव से गांव का स्वामी पैदावार के रूप में अथवा अन्य किसी रूप में वसूली करता था। ² कालकण्णि जातक (८३)

ख. अतीत कथा

कुसनाळि ] ४५ सभी अपने सिर पर आ पडे भार का वहन करते हैं। अब तो तू अपने स्थिर- मित्र के कारण धन का स्वामी हुआ। पुराने समय में पक्के-दोस्त के कारण विमान के स्वामी हुए।" इतना कह, पूछने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की बात कही— ख. अतीत कथा पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व राजा के उद्यान में एक कुशा-घास के झुंड में के देवता हुए। उसी बाग में मगल-शिला के सहारे सीधे तनेवाला और चारो तरफ शाखाओ तथा पत्तो से घिरा हुआ, राजा द्वारा आदृत राजा का प्रिय-वृक्ष १ था। उसे मुक्खक भी कहते थे। उसमे एक वडा प्रतापी देवराज पैदा हुआ। बोधिसत्त्व से उसकी दोस्ती हो गई। उस समय राजा एक खम्भे वाले प्रासाद में रहता था। खम्भा फटने लगा। राजा को इसकी सूचना दी गई। राजा ने बढइयो को बुलवाकर कहा "तात ! मेरे एक खम्भे वाले मगल प्रासाद का खम्भा जा रहा है। एक सारवान् खम्भा ला कर उस खम्भे को स्थिर करे।" उन्होने 'देव ! अच्छा' कह राजा के वचन को स्वीकार कर उसके अनुरूप वृक्ष ढूँढना आरम्भ किया। वृक्ष न पा, राजा के उद्यान में जा उस मुक्खक वृक्ष को देख राजा के पास गए। राजा ने पूछा— "तात ! क्यो उसके अनुरूप वृक्ष देखा ?" 'देव ! देखा, लेकिन उसे काट नही सकते ? "क्यो ?" "और कही वृक्ष न दिखाई देने पर हम उद्यान में गए। वहाँ मगल-वृक्ष को छोड और कोई वृक्ष नही दिखाई दिया। उसे मगल-वृक्ष होने के कारण नही काट सकते।" "जाओ, उसे काट कर प्रासाद को मजबूत करो। हम दूसरा मगल- वृक्ष कर लेगे।" १ 'रुचरुक्खो' कुछ अस्पष्ट है।

४६ [ १.१३.१२१ वे 'अच्छा' कह 'बलि' ले उद्यान गए और वहाँ अगले दिन काटने के लिए 'बलि' चढ़ाई। वृक्ष-देवता को जब यह पता लगा कि कल मेरा निवास- स्थान¹ नष्ट कर देंगे, तो वह सोचने लगी कि बच्चों को लेकर कहाँ जाऊँगी ? जब कोई जाने की जगह न दिखाई दी, तो पुत्रों को गले से लगाकर रोने लगी। उसके देखे-सुने परिचित वृक्ष-देवता और वन-देवताओ ने आकर पूछा— “क्या हुआ ?” समाचार जान स्वयं भी कोई ऐसा उपाय न कर सकने के कारण जिससे बढ़ई वृक्ष को न काटे, उन्होंने गले मिलकर रोना प्रारम्भ किया। उसी समय बोधिसत्त्व वृक्ष-देवता से मिलने आए। वह समाचार सुन बोधिसत्त्व ने कहा— “होने दो। चिन्ता न करो। मैं बढ़इयों को वृक्ष काटने न दूंगा। कल बढ़इयों के आने के समय मेरा करतब देखना।” उस देवता को आश्वासन दे अगले दिन बोधिसत्त्व बढ़इयों के आने के समय गिरगिट का रूप बना बढ़इयों के आगे से गुजर मङ्गल-वृक्ष की जड़ में प्रवेश कर, उसमें खोखले वृक्ष की तरह ऊपर चढ़, स्कन्ध के बीच में से सिर निकाल उसे कँपाते हुए पड़ रहे। प्रधान बढ़ई ने उस गिरगिट को देख वृक्ष को हाथ से ठोक कर कहा— “यह खोखला है। निस्सार है। कल बिना विचार किए ही 'बलि' चढ़ाई।” इस प्रकार वे उस ठोस महावृक्ष की निन्दा करते हुए चले गए। बोधिसत्त्व की सहायता से वृक्ष-देवता विमान की स्वामिनी हुई। उसके देखे-सुने परिचित बहुत से देवता उसे मुबारकबाद देने के लिए इकट्ठे हुए। वृक्ष-देवता ने 'मुझे विमान मिल गया' सोच प्रसन्न हो उन देवताओ के सम्मुख बोधिसत्त्व की प्रशंसा करनी शुरू की—“हे देवताओ ! हम ऊँचे कुल वाले होकर भी बुद्धि की कमी के कारण इस उपाय को न जानते थे। कुशा घास के देवता ने अपने बुद्धिबल से हमें विमान का स्वामी बनाया। मित्रता अपने जैसे से भी, छोटे से भी, श्रेष्ठ से भी करनी ही चाहिए। सभी अपनी अपनी सामर्थ्य के अनुसार मित्रो पर आई आपत्ति दूर कर उन्हें सुखी बनाते हैं।” इस प्रकार मित्र-धर्म की प्रशंसा करते हुए यह गाथा कही—


¹ विमान ।

कुरानाळ्ळि ] ४७ करे सरिक्खो अथवापि सेट्ठो निहीनको चापि करेय्य एको, करेय्यु ते व्यसने उत्तमत्थं यथा अहं कुसनाळी रुचायं ॥ [ अपने समान, अपने से श्रेष्ठ अथवा अपने से कम (दर्जे वाले) से साथ भी मित्रता करे। जैसे कुशा-घास (वाले) ने मुझ रुख-वृक्ष (के देवता) का (उपकार किया), उसी प्रकार ये भी विपत्ति आ पड़ने पर उपकार करते हैं।] —— करे सरिक्खो—जाति आदि में जो अपने बराबर हो, उससे से भी मित्रता करे। अथवापि सेट्ठो, जाति आदि म जो श्रेष्ठ हो, अधिक हो उससे भी (मित्रता) करे। निहीनको चापि करेय्य एको, जाति आदि से नीच से भी मित्र धर्म करे। इस प्रकार इन सभी को मित्र बनाना चाहिए, यह स्पष्ट करता है। क्यों ? करेय्यु ते व्यसने उत्तमत्थं, यह सभी मित्र पर दुःख आ पड़ने पर अपने अपने कर्तव्य भार को वहन करते हुए उपकारी होते हैं, अर्थात् उस मित्र को शारीरिक तथा मानसिक दुःख से मुक्त करते हैं। इसलिए अपने से छोटे से भी मित्रता करनी चाहिए, दूसरों की तो बात ही क्या ? यहाँ यह उपमा है। यथा अह कुसनाळी रुचायं, जैसे मै रुख में पैदा हुआ देवता और यह कुशा- घास का देवता, हममें भी मित्रता थी। उसमें में ऊँचे कुल वाला होकर भी अपने पर आई विपत्ति को मूर्खता के कारण उपाय न जानने के कारण दूर नहीं कर सका, इस छोटे दर्जे वाले पण्डित-देवता की सहायता से दुःख से मुक्त हुआ। इसलिए और भी जो दुःख से मुक्त होना चाहे उन्हें भी चाहिए कि बराबरी अथवा श्रेष्ठता का ख्याल न कर कम दर्जे वाले से भी मित्रता करें। रुखदेवता देवता-समूह को इस गाथा द्वारा धर्मोपदेश कर आयुपर्यन्त, जीवित रह कुशानाळी देवता के साथ कर्मानुसार परलोक सिधारा। शास्ता ने यह धर्मदेशना सा जातक का सारांश निकाला। उस समय रुख-देवता आनन्द था। कुसाळी-देवता तो मैं था ही।

⸱ १२२. दुम्मेध जातक

४८ [ १.१३.१२२ ⸱ १२२. दुम्मेध जातक "यसं लद्धान दुम्मेधो" यह (धर्म-देशना) बुद्ध ने वेळुवन में रहते समय देवदत्त के बारे में की। क. वर्तमान कथा धर्म-सभा में बैठे भिक्षु देवदत्त को दोष दे रहे थे— "आयुष्मानो ! तथा- गत का पूर्ण-चन्द्र सदृश शोभा वाला मुख है। वे अस्सी अनु-व्यञ्जनों तथा बत्तिस महापुरुष लक्षणो से युक्त हैं। उनके चारो ओर व्याम-भर प्रभा है। उनके शरीर से घूम घूमकर दो दो करके घनी बुद्ध-रश्मियां निकलती हैं। उनका शरीर अत्यन्त शोभा सम्पन्न है। ऐसे सुन्दर रूप को देखकर, देव- दत्त चित्त को प्रसन्न नहीं कर सकता, ईर्ष्या ही करता है। 'बुद्ध का ऐसा शील है, ऐसी समाधि है, ऐसी प्रज्ञा है, ऐसी विमुक्ति है, ऐसा विमोक्ष-ज्ञान-दर्शन है' इस प्रकार प्रशंसा करने पर देवदत्त उनकी प्रशंसा नहीं सह सकता, ईर्ष्या ही करता है।" शास्ता ने आकर पूछा— "भिक्षुओ ! यहाँ बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?" अमुक बातचीत कहने पर "भिक्षुओ ! न केवल अभी मेरी प्रशंसा होने पर देवदत्त ईर्ष्या करता है, वह पहले भी करता रहा है" कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में मगध देश के राजगृह नगर में एक मगध-नरेश के राज्य करते समय बोधिसत्त्व हाथी की योनि में पैदा हुए। उनका सारा शरीर एक दम श्वेत था और उनकी शोभा ऊपर वर्णन की गई शोभा की ही तरह थी। 'यह लक्षणो से युक्त है' देख उस राजा ने बोधिसत्त्व को मंगल हाथी बनाया।

दुम्मेध ] ४६ एक दिन किसी उत्सव के अवसर पर राजा सारे नगर को देवनगर की तरह अलंकृत करा, सब अलंकारों से सजे हुए मंगल हाथी पर चढ़, बड़ी राजकीय शान के साथ नगर मे घूमने के लिए निकला । लोग जहाँ तहाँ खड़े होकर मंगल हाथी के अति सुन्दर शरीर को देख मंगल हाथी की ही प्रशंसा करने लगे—“ओह् ! क्या रूप है ! ओह ! क्या चाल है ! ओह ! कैसा ढंग है ! ओह ! कैसे लक्षण हैं ! इस प्रकार का सर्वश्रेष्ठ हाथी चक्रवर्ती राजा के योग्य है ।” राजा ने मंगल हाथी की प्रशंसा सुन उसे न सह सकने के कारण, ईर्ष्या के वशीभूत हो सोचा, “आज ही इसे पर्वत-प्रपात से गिरवा कर मरवा डालूँगा ।” फिर हथवान को बुलवाकर पूछा— “तूने इस हाथी को क्या (खाक) सिखाया है ?” ‘देव ! अच्छी तरह से सिखाया है ।” “नही, अच्छी तरह से नही सिखाया, खराब सिखाया है ।” ‘देव ! अच्छी तरह से सिखाया है ।” “यदि अच्छी तरह से सीखा, तो क्या तू इसे वेपुल्ल पर्वत के ऊपर चढ़ा ले जा सकता है ?” “देव ! हाँ ।” “अच्छा, तो आ” कह अपने उतर हथवान् को हाथी पर चढ़ा पर्वत के पास जा, हथवान् के हाथी की पीठ पर बैठे ही हाथी को पर्वत के ऊपर चढ़ा ले जाने पर, आमात्यो के साथ स्वयं भी पर्वत के शिखर पर चढ़, हाथी का मुंह प्रपात की ओर करवा कहा—“तू कहता है कि मैंने इसे अच्छी तरह सिखाया है । इसे तीन ही पैरों से खड़ा कर ।” हथवान् ने पीठ पर बैठे ही बैठे हाथी को अंकुश द्वारा इशारा किया, ‘भो ! तीन पैरो से खड़े हो जाओ ।” वह तीन पैरों से खड़ा हो गया । तब राजा बोला—“आगे के दो पैरों के भार खड़ा करा ।” बोधिसत्व पिछले दोनों पैर उठाकर अगले पैरों पर खड़े हुए । ‘पिछले ही पैरो पर’ कहने पर आगे के दोनों पैर उठाकर पिछले ही पैरों पर खड़े हो गए । ‘एक ही पैर से’ भी कहने पर तीनों पैर उठा एक ही पैर से खड़े हो गए । उसे न गिरता देख राजा ने कहा—‘यदि कर सको, तो इसे आकाश में खड़ा करो ।’ ४