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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

१४२. सिगाल जातक .. .. ..

[ ११ ] विषय पृष्ठ १४२. सिगाल जातक .. .. .. .. १०८ [ गीदड़ों को मारने की इच्छा से एक धूर्त आदमी ने मुर्दे का स्वांग किया । ] १४३. विरोचन जातक .. .. .. .. ११० [ गीदड़ ने शेर की नकल करके पराक्रम दिखाना चाहा । हाथी ने उसे पाँव से रौंद दिया, उस पर लीद कर दी । ] १४४. नङ्गुट्ठ जातक .. .. .. .. ११४ [ ब्राह्मण अग्नि-भगवान को गो-मांस चढ़ाना चाहता था । चोर ही उस बैल को मार कर खा गए । ब्राह्मण बोला—हे अग्नि भगवान् ! आप अपने बैल की रक्षा भी नही कर सके । अब यह पूँछ ही ग्रहण करे । ] १४५. राध जातक .. .. .. .. .. ११६ [ पोट्ठपाद और राध नाम के दो तोते ब्राह्मणी का अनाचार प्रकट करने के बाद उस घर में नही रहे । ] १४६. काक जातक .. .. .. .. .. ११८ [ कौवी को समुद्र बहा ले गया । कौवों ने क्रोधित हो उलीच-उलीच कर समुद्र खाली करना चाहा । ] १४७. पुप्फरत्त जातक .. .. .. .. १२१ [ स्त्री ने केसर के रंग का वस्त्र पहन उत्सव मनाने की जिद की । स्वामी को चोरी करनी पड़ी । राजाज्ञा से उसका वध हुआ । ] १४८. सिगाल जातक .. .. .. .. १२४ [ मास-लोभी सियार हाथी के गुदा मार्ग से उसके पेट में प्रविष्ट हो वहां कैद हो गया । ] १४९. एकपण्ण जातक .. .. .. .. १२८ [ बोधिसत्त्व ने नीम के पौधे के दो पत्तों की कड़वाहट चखा कर राजकुमार का दुष्ट स्वभाव दूर किया । ]

१५०. सञ्जीव जातक .. .. ..

[ १२ ] विषय पृष्ठ १५०. सञ्जीव जातक .. .. .. .. १३४ [ विद्यार्थी ने मुर्दे को जिलाने का मन्त्र तो सीखा किन्तु उसे फिर मुर्दा बनाने का नही । एक व्याघ्र ने उसकी हत्या की । ] दूसरा परिच्छेद १३६ १. दळ्ह वर्ग १३६ १५१. राजोवाद जातक .. .. .. .. १३६ [ मल्लिक राजा 'जैसे को तैसा' था, किन्तु काशी नरेश बुराई को भलाई से जीतता था । वही बडा सिद्ध हुआ । ] १५२. सिगाल जातक .. .. .. .. १४४ [ सियार ने सिंह-बच्ची से प्रेम-निवेदन किया । उसने अपने भाइयो से शिकायत की । सियार को मार डालने के प्रयत्न मे सातो शेर मर गए । ] १५३. सूकर जातक .. . . १४८ [ सुअर ने शेर को युद्ध के लिए ललकारा । शेर लडने आया; किन्तु उसके बदन की गन्दगी के कारण बिना लडे ही सुअर को विजयी मान चला गया । ] १५४. उरग जातक .. .. .. .. १५२ [ बोधिसत्त्व ने गरुड़ से नाग की रक्षा की । ] १५५. गग्ग जातक .. .. .. . १५५ [ छींक आने पर 'जीवें' और 'जीवो' कहने की प्रथा कैसे चली ? ]

१५६ अलीनचित्त जातक १५६

[ १३ ] विषय पृष्ठ १५६ अलीनचित्त जातक १५६ [ बढइयो ने हाथी के पाँव का कांटा निकाला। कृतज्ञ हाथी पहले स्वय उनकी सेवा करता रहा। बाद म अपना लडका दे दिया। उस हाथी-बच्चे ने बहुतो को उपकृत किया। ] १५७ गुण जातक १६५ [ दलदल में फंसे सिंह को सियार ने बाहर निकाला। सिंह अन्त तक कृतज्ञ रहा। ] १५८ सुहनु जातक १७२ [ लोभी राजा चाहता था कि व्यापारियो क घोड उसे कम मूल्य में मिल जाएँ। बोधिसत्त्व ने उसकी योजना विफल कर दी। ] १५९ मोर जातक १७६ [ रानी ने सुनहर रग के मोर के लिए जान दे दी। राजा ने सोने के पट्टे पर लिखवाया—जो सुनहरे मोर का मास खाते हैं, वे अजर अमर हो जाते हैं। मोर ने पूछा—मैं तो मरूँगा, मेरा मास खानेवाले क्यो नही ? ] १६० विनीलक जातक १८२ [ हस ने कौवी के साथ सहवास किया। विनीलक पैदा हुआ। हस उसे अपने बच्चो के समान रखना चाहता था किन्तु वह अयोग्य सिद्ध हुआ। ] २. सन्थव वर्ग १८४ १६१. इन्दसमानगोत्त जातक १८५ [ मैत्री बराबर वाले के साथ करनी चाहिए। इन्द- समानगोत्त ने बच्चे-हाथी का अनुचित विश्वास किया। उसने बडे होने पर अपने को पोसनेवाले को ही मार डाला। ]

१६२. सन्थव जातक .. .. ..

[ १४ ] विषय पृष्ठ १६२. सन्थव जातक .. .. .. .. १८८ [ ब्राह्मण ने घी मिश्रित खीर अग्नि भगवान को पिलाई । अग्नि भगवान ने उसकी पर्णकुटी जला डाली । ] १६३. सुसीम जातक .. .. .. .. १९० [ सुसीम राजा ने समझा कि उसके पुरोहित का लड़का न तीनो वेद जानता है न हस्ति-सूत्र । किन्तु यह सोलह वर्ष का बालक एक ही रात में तक्षशिला से तीनो वेद और हस्ति-सूत्र सीख आया । ] १६४. गिज्झ जातक .. .. .. . १९६ [ गृद्धो ने अपनी कृतज्ञता प्रगट करने के लिए लोगो के वस्त्राभरण उठा उठा कर सेठ को लाकर दिए । ] १६५. नकुल जातक .. .. .. .. १९९ [ बोधिसत्त्व ने नेवले और सांप की दोस्ती करा दी । ] १६६. उपसाळ्हक जातक .. .. . .. २०१ [ उपसाळ्हक ब्राह्मण मरने पर ऐसी जगह जलाया जाना चाहता था जहां पहले कोई न जलाया गया हो । लेकिन ऐसी जगह कहां ? ] १६७. समिद्धि जातक .. .. .. .. २०४ [ देवकन्या ने भिक्षु के सुन्दर शरीर पर आसक्त हो उसे काम-भोगों का निमन्त्रण दिया । भिक्षु ने बिना काम- भोगों को भोगे भिक्षु बनने का कारण बताया । ] १६८. शकुणग्घि जातक .. .. .. .. २०७ [ बटेर ने अपने गोचर स्थान पर रह कर बाज की भी जान ले ली । ] १६९. अरक जातक .. .. .. .. २१० [ मैत्री भावना का माहात्म्य । ]

१७०. ककण्टक जातक . . .. ..

[ १५ ] विषय पृष्ठ १७०. ककण्टक जातक . . .. .. .. २१३ [ यह कथा महाउम्मग जातक (५४६) में है। ] ३. कल्याणधम्म वर्ग २१४ १७१. कल्याणधम्म जातक .. .. .. .. २१४ [ प्रव्रजित न होने पर भी घर के मालिक को प्रव्रजित हुआ समझ सभी रोने पीटने लगे। घर के मालिक को पता लगा तो वह सचमुच प्रव्रजित हो गया। ] १७२. दद्दर जातक .. .. .. .. २१७ [ नीच सियार का चिल्लाना सुन लज्जावश सिंह चुप हो गए । ] १७३. मक्कट जातक .. .. .. .. २२० [ बन्दर तपस्वी का भेष बनाकर आया था। बोधिसत्त्व ने उसे भगा दिया। ] १७४. दुब्भियमक्कट जातक .. .. .. .. २२३ [ तपस्वी ने बन्दर को पानी पिलाया। बन्दर अपने उपकारी पर पाखाना करके गया। ] १७५. आदिच्चुपट्ठान जातक .. .. .. .. २२५ [ बन्दर ने सूर्य्य की पूजा करने का ढोंग बनाया। ] १७६. कलायमुट्ठि जातक .. .. .. .. २२७ [ बन्दर का हाथ और मुंह मटर से भरा था, किन्तु वह उन सब को गंवा कर केवल एक मटर को खोजने लगा ।) १७७. तिन्दुक जातक .. .. .. .. २३० [ फल खाने जाकर सभी बन्दर फँस गए थे। गांव वाले उन्हे मार डालते। बोधिसत्त्व के सेनक नामक भानजे ने अपनी बुद्धि से सबको बचाया। ] १७८. कच्छप जातक .. .. .. .. २३३ [ जन्मभूमि के मोह के कारण कछुवे की जान गई। ]

१७६ सतधम्म जातक २३७

[ १६ ] विषय पृष्ठ १७६ सतधम्म जातक २३७ [ ब्राह्मण ने पहल अपन ऊंच कुल के अभिमान के कारण चाण्डाल का दिया भात खाने से इनकार किया। पीछे जोर की भूख लगने पर चाण्डाल से छीन कर उसका जूठा भात खाया । ] १८० दुद्दद जातक २४० [ कठिनाई से दिया जा सकने वाला दान देने की महिमा । ] ४. असदिस वर्ग २४४ १८१ असदिस जातक २४४ [ असदिस राजकुमार का विलक्षण धनुविद्या । ] १८२ सङ्गामावचर जातक २४६ [ हाथी शिक्षक ने मङ्गल-हाथी को बढ़ाया व संग्राम जीता । ] १८३ वालोदक जातक २५४ [ सिन्धुकुल में पैदा हुए घोडे अंगूर का रस पीकर शान्त रहे। जब गधेने रस में पानी मिलाकर बचा सो पिलाया गया। वह उछलने-कूदने लगा । ] १८४ गिरिदत्त जातक २५७ [ गिरिदत्त के लँगड़ा होने से घोड़ा लंगड़ाकर चलने लग गया । ] १८५ अनभिरति जातक २५६ [ चित्त की अनियतावस्था ही विस्मृति का कारण हुई।] १८६ दधिवाहन जातक २६२ [दधिवाहन राजा ने मणिकुण्ड छुरी कुल्हाड़ी बान तथा दरी व घडे की मदद से वाराणसी के राज्य पर अधिकार किया । ]

१८७ चतुमट्ठ जातक २६७

[ १७ ] विषय पृष्ठ १८७ चतुमट्ठ जातक २६७ [ हंस बच्चे वृक्ष पर बैठ बातचीत करते थे। सियार बोला—नीचे उतरकर बातचीत करो, जिसे मृगराज भी सुने। ] १८८ सीहपोत्युक जातक २६६ [ गीदड़ी से सिंहपुत्र पैदा हुआ। उसकी शक्ल सूरत थी सिंह जैसी किंतु स्वर शृगाल का सा। ] १८६. सीहचम्म जातक २७१ [ सिंह की खाल पहन कर गधा खेत चरता रहा , किंतु बोलने पर मारा गया। ] १६० सीलानिसंस जातक २७३ [ शील के प्रताप से एक आर्य्य-श्रावक ने अपने साथ एक नाई को भी नौका पर समुद्र पार लँघाया। ] • रूहक वर्ग २७६ १६१ रूहक जातक २७६ [ ब्राह्मणी ने ब्राह्मण के साथ मजाक किया। उसने गुस्से हो उसे तलाक दे दिया। ] १६२ सिरिकालकण्णि जातक २७८ [ यह जातक महाउम्मग्ग जातक (५४६) में आएगी। ] १६३ चुल्लपदुम जातक २७६ [ सात भाई छ भाइयो की स्त्री को मार कर खा गए। बोधिसत्त्व अपनी स्त्री को लेकर भाग निकल। उस स्त्री ने कृतघ्नता की हद कर दी। ] १६४ मणिचोर जातक २८५ [ राजा ने स्त्री पर मुग्ध हो उसके पति पर मणि चुराने का झूठा अपराध लगाकर उसे मरवाना चाहा। वह स्वयं मारा गया। ] २

१९५ पब्बत्तूपत्थर जातक २८६

[ १८ ] विषय पृष्ठ १९५ पब्बत्तूपत्थर जातक २८६ [ राजा की रानी को उसके आमात्य ने दूषित कर दिया। राजा ने विचार कर दोनो को क्षमा कर दिया। ] १९६ वालाहस्स जातक २९१ [ यक्षिणियां व्यापारियो को फँसाकर यक्ष नगर ले जाती। पाँच सौ व्यापारी उनके चगुल म फँस गए। ज्येष्ठ व्यापारी को पता लगा कि यह यक्षिणियाँ हैं। उसने सब को भाग चलने को कहा। ढाई सौ व्यापारी ज्येष्ठ व्यापारी का कहना मान बच निकले। कहना न मानने वाले दो ढाई सौ व्यापारी यक्षिणियो के आहार बने । ] १९७ मित्तामित्त जातक २९५ [ मित्र या अमित्र कैसे पहचाना जा सकता है ? ] १९८ राध जातक २९७ [ पोट्ठपाद ने ब्राह्मणी को दुराचार से विरत रहने का उपदेश दिया। उसने विचारे तोते की गरदन मरोड उसे चूल्हे में फेंक दिया। ] १९९ गहपति जातक ३०० [ ब्राह्मणी और गाँव का मुखिया मिलकर ब्राह्मण को धोखा देना चाहते थे। वे अपने दुराचार को न छिपा सके। ] २०० साधुसील जातक ३०३ [ एक ब्राह्मण की चार लडकियां थी। उसने आचार्य से पूछा—लड़कियाँ किसे देना योग्य है ? ] ६. नतंदळ्ह वर्ग ३०६ २०१ बन्धनागार जातक ३०६ [ पुत्र दारा का बन्धन सब से बडा बन्धन है । ]

२०२ केळिसील जातक ३०६

[ १६ ] विषय पृष्ठ २०२ केळिसील जातक ३०६ [ शक्र ने जरा जीर्ण हाथी घोडे, बैल तथा आदमियो को तग करने वाले ब्रह्मदत्त का दमन किया । ] २०३ खन्धवत्त जातक ३१२ [ सर्पों के प्रति मैत्री भावना का माहात्म्य । ] २०४ वीरक जातक ३१८ [ सविट्ठक ने वीरक की नकल की । वह काई म फँसकर मर गया । ] २०५ गङ्गेय्य जातक ३२० [ गङ्गेय्य सुन्दर है अथवा यामुनेय्य ? दोनो मछलियो मे कौन अधिक सुन्दर है ? ] २०६ कुरुङ्गमृग जातक ३२३ [ कुरुङ्ग मृग ने कठफोडे तथा कछुए की सहायता से अपने को शिकारी से बचाया और उनके प्राणो की भी रक्षा की । ] २०७ अस्सक जातक ३२६ [ अस्सक राजा अपनी मृत रानी के शोक से पागल हो रहा था । वह रानी गोबर के कीडे की योनि म पैदा हो कर एक कीडे को अस्सक राजा का अच्छा अच्छा समझती थी । ] २०८ सुसुमार जातक ३३० [ मगरमच्छ की भार्या बन्दर का कलेजा खाना चाहती थी । कपिराज ने उसके पति का बुरी तरह चकमा दिया । ] २०६ कककर जातक ३३२ [ पुराना हुशियार बगला शिकारी के फन्दे म नही आता था । ]

२१० कन्दगलक जातक ३३४

[ २० ] विषय पृष्ठ २१० कन्दगलक जातक ३३४ [ कन्दगलक ने खदिरवन में रहनेवाले कठफोरनी पक्षी की नकल कर अपनी जान गँवाई । ] ७. धीरत्थम्भक वर्ग ३३७ २११ सोमदत्त जातक ३३७ [ पुत्र पिता को सिखा पढ़ाकर राजा से दो बैल माँगने लगाया। पिता ने राजा से बैल माँगने के बदले कहा— बैल लें । ] २१२ उच्छिद्वभत्त जातक ३४० [ ब्राह्मणी ने अपने पति को अपने जार का जूठा भात खिलाया । ] २१३ भरु जातक ३४३ [ भरू राजा ने रिश्वत से बट वृक्ष के लिए झगड़ने वाले तपस्वियो का झगड़ा बढ़ाया । ] २१४ पुण्णनदी जातक ३४७ [ राजा ने क्रोधित हो अपने बुद्धिमान पुरोहित को निकाल दिया था। पीछे उसके गुणो को याद कर कौवे का मास भेज कर बुलाया । ] २१५ कच्छप जातक ३४६ [ हंस-बच्च अपनी चोंच म एक लकडी पर कछुए को लिए जा रह थे । उसने चुप न रह सकने के कारण आकाश से गिरकर जान गँवाई । ] २१६ मच्छ जातक ३५२ [ कामी मच्छ ने मच्छिया से प्राण की भिक्षा मांगी । ] २१७ सेग्गु जातक ३५४ [ पिता न पुत्री के ग्वारपन की परीक्षा की । ]

२१८. कूटवाणिज जातक . . . . ३५७

[ २१ ] विषय पृष्ठ २१८. कूटवाणिज जातक . . . . ३५७ [ एक बनिए ने दूसरे की लोहे की फालों को 'चूहे खा गए' कहा तो उसने उसके पुत्र को 'चिडिया ले गई' कहा । ] २१९. गरहित जातक . . . . ३६१ [ बन्दर ने कुछ दिन मनुष्यों में रह कर लौटकर अपने साथियों में मनुष्यों के जीवन की बड़ी निन्दा की । ] २२०. धम्मद्ध जातक . . . . ३६४ [ राजा ने काळक के स्थान में बोधिसत्त्व को न्यायाधीश बना दिया । काळक का रिश्वत का लाभ जाता रहा । उसने बोधिसत्त्व को मरवाने के अनेक उपाय किए । शक्र बोधिसत्त्व के सहायक थे । काळक की एक न चली । ] ८. कासाव वर्ग ३७५ २२१. कासाव जातक . . . . ३७५ [ एक आदमी काषाय वस्त्र पहन हाथियों को धोखा दे उनकी सूण्ड काट काट लाकर बेचता था । ] २२२. चुल्लनन्दिय जातक . . . . ३७८ [ शिकारी ने मातृ-भक्त बन्दरों तथा उनकी बूढ़ी माता को मार डाला । उसके घर पर बिजली गिर पड़ी । ] २२३. पुटभत्त जातक . . . . ३८१ [ राजा को भात की पोटली मिली । वह उसमें से बिना रानी को कुछ दिए अकेला ही खा गया । ] २२४. कुम्भील जातक . . . . ३८५ [ वानरिंद जातक (५७) के समान कथा है । ] २२५. खन्तियवण्णन जातक . . . . ३८६ [ आमात्य ने राजा के रनिवास को दूषित किया और आमात्य के सेवक ने उसके घर में दूषितकर्म किया । ]

२२६ कोसिय जातक ३८८

[ २२ ] विषय पृष्ठ २२६ कोसिय जातक ३८८ [ समय पर घर से बाहर निकलना अच्छा है, असमय पर नहीं । ] २२७ गूहपाणक जातक ३६१ [ गूँह का कीड़ा गीले गूँह पर चढ़ा । वह उसके चढ़ने से थोड़ा नीचे को दबा । गूँह का कीड़ा चिल्लाया— पृथ्वी मेरा बोझ नहीं उठा सकती है । ] २२८ कामनीत जातक ३६४ [ काम जातक (४६७) म । ब्रह्मचारी न राजा को तीन राज्य जिला देन की बात कही । फिर वह चला गया । राजा को लगा कि उसके हाथ में आए हुए तीन राज्य चले गए । ] २२६ पलासी जातक ३६८ [ वाराणसी नरेश ने तक्षशिला पर आक्रमण की तैयारी की । किन्तु वह तक्षशिला नरेश की ड्योढ़ी देखकर ही हिम्मत हार गया । ] २३० द्वितिय पलासी जातक ४०१ [ तक्षशिला नरेश न वाराणसी नरेश पर आक्रमण की तैयारी की । किन्तु वह वाराणसी नरेश के स्वर्णपट सदृश महाललाट को देख कर हिम्मत हार गया । ] ६. उपाहन वर्ग ४०५ २३१ उपाहन जातक ४०५ [ शिष्य ने आचार्य से हस्ति शिल्प सीख उसी से मुकाबला करना चाहा । ] २३२ वीणथूण जातक ४०८ [ सेठ की लडकी न कुबडे की पीठ पर कूब देख कर समझा यह पुरुषों म वृषभ होगा । ]

२३३. थिकण्टक जातक . . . . . . . . . ४११

[ २३ ] विषय पृष्ठ २३३. थिकण्टक जातक . . . . . . . . . ४११ [ स्वादिष्ट भोजन के वशीभूत मच्छ तीर से बींधा गया । ] २३४. असिताभू जातक . . . . . . . . ४१४ [ राजकुमार अपनी देवी की ओर से उदासीन हो किन्नरी की ओर आकृष्ट हुआ । देवी ने सन्मार्ग ग्रहण किया । ] २३५. वच्छनख जातक . . . . . . . . ४१७ [ गृहस्थी ने परिव्राजक को गृहस्थ जीवन की ओर आकृष्ट करना चाहा । परिव्राजक ने गृहस्थ जीवन के दोष कहे । ] २३६. बक जातक . . . . . . . . . . ४२० [ ढोंगी बगुला मछलियो को खाना चाहता था । ] २३७. साकेत जातक . . . . . . . . ४२१ [ तथागत ने स्नेह की उत्पत्ति का कारण बताया । ] २३८. एकपद जातक . . . . . . . . ४२३ [ अनेक अर्थपदो से युक्त एकपद । ] २३९. हरितमात जातक . . . . . . . . ४२५ [ सर्प ने नीले मेण्डक से पूछा—तुझे मछलियो की यह करतूत अच्छी लगती है ? ] २४०. महापिङ्गल जातक . . . . . . . . ४२८ [ राजा मर गया था। तब भी द्वारपाल को भय था कि अत्याचारी राजा यमराज के पास से कही लौट न आवे । ] १०. सिगाल वर्ग ४३२ २४१. सब्बदाठ वर्ग . . . . . . . . ४३२ [ सब्बदाठ नामक शृगाल ने पृथ्वीजय मन्त्र सीख लिया था। उसने सब पशुओ की सेना बना वाराणसी नरेश पर आक्रमण किया । ब्राह्मण ने उपाय से उसे हराया । ]

२४२. सुनख जातक . . . ४३५

[ २४ ]

विषय पृष्ठ २४२. सुनख जातक . . . ४३५ [ कुत्ते को चमडे की रस्सी मे बाँधकर ले जाया जा रहा था । जब सब लोग सो रहे थे कुत्ते ने चमडे की रस्सी काट डाली और भाग आया । ] २४३. गुत्तिल जातक ४३८ [ उज्जैन का मूषिल गन्धर्व काशी के गुत्तिल गन्धर्व के पास आया । उसने गुत्तिल से वीणावादन सीख गुत्तिल से ही मुकाबला करने की धृष्टता की । ] २४४. थोतिच्छ जातक . ४४७ [ परिव्राजक ने बोधिसत्त्व से शास्त्रार्थ किया—कौन सी गङ्गा ? ] २४५. मूलपरियाय जातक . ४४६ [ आचार्य ने अभिमानी शिष्यो को प्रश्न पूछ कर निरुत्तर किया । ] २४६. तेलोवाद जातक ४५२ [ बुद्धिमान मास खाने वाले को पाप नहीं लगता । ] २४७. पादञ्जली जातक . ४५४ [ पादञ्जली कुमार को केवल होंठ चबाना आता है । ] २४८. किंसुकोपम जातक ४५६ [ राजकुमारो ने किंसुक को भिन्न भिन्न समयो म देखा था । इसीलिए उनमें से एक ने किंसुक को एक आकार का समझा, दूसरे ने दूसरे का । ] २४६. सालक जातक . . . . ४५८ [ सपेरे ने बन्दर को बाँस से मारा । बंदर ने फिर सपेरे का विश्वास ही नही किया । ] २५०. कपि जातक . . . ४६१ [ ढोंगी बन्दर आग तापने के लिए कुटी के द्वार पर बैठा था । तपस्वी ने भगा दिया । ]

जा त क [द्वितीय खण्ड]

१०१. परोसत जातक

पहला परिच्छेद ११. परोसत वर्ग १०१. परोसत जातक परोसतञ्चेपि समागतान झापेयुं ते वस्ससत अपञ्‍ञा, एकोव सेय्यो पुरिसो सपञ्‍ञो यो भासितस्स विजानाति अत्थ ॥ [प्रज्ञाहीन शताधिक आये-हुए मनुष्य यदि सौ वर्ष तक भी ध्यान लगाते रह तो उनकी अपेक्षा एक प्रज्ञावान् मनुष्य जो कही हुई बात के (गम्भीर) अर्थ को जान लेता है, अच्छा है।] कथा की दृष्टि से, व्याख्या ( व्याकरण ) की दृष्टि से, सारांश की दृष्टि से यह जातक ( कथा ) परोसहस्स जातक¹ के समान ही है। इसमें केवल 'ध्यान कर' पद की विशेषता है। जिसका अर्थ है कि प्रज्ञा- रहित मनुष्य सौ वर्ष भी ध्यान करते रह, देखते रह, धारण करते रहें, इस प्रकार देखते हुये भी वह गूढ (अर्थ) को अथवा (असली) बात को नहीं देख पाते। इसलिए जो मनुष्य कही बात के अर्थ को जानता है वह प्रज्ञावान् अकेला ही अच्छा है।


¹परोसहस्स जातक (६६)

१०२. पण्णिक जातक

२ [ १.११.१०२ १०२. पण्णिक जातक “यो दुक्खफुट्ठाय भयेय्य ताण .” आदि (की कथा) शास्ता ने जेत- वन में रहते समय एक दुकानदार उपासक के सम्बन्ध में कही। क. वर्तमान कथा वह श्रावस्ती निवासी उपासक नाना प्रकार की जड़ी-बूटी तथा लौकी- कद्दू आदि बेच कर गुजारा करता था। उसकी एक लडकी थी। रूपवान, सुन्दर, सदाचारिणी तथा लज्जा-भय से युक्त, (लेकिन साथ ही) सदा हँसती रहती थी। बराबरी के कुलवालो ने लडकी को ब्याहने आने (की इच्छा करने ) पर, वह सोचने लगा— “इसकी शादी होगी। यह सदैव हँसती रहती है। क्वारपन को नष्ट करके यदि कुमारी दूसरे कुल में जाती है, तो माता पिता के लिये निन्दा का कारण होती है। मैं इसकी परीक्षा करूँगा कि इसका क्वारपन स्वरक्षित है कि नहीं ?” एक दिन उसने लडकी से टोकरी उठवा, पत्तो के लिये जगल में जाकर, उसकी परीक्षा करने की इच्छा से, कामासक्त की भाँति हो, गुप्त बात कह उस हाथ से धर लिया। जैसे ही उसे पकडा उसने रोते चिल्लाते हुए कहा— “तात ! यह नामुनासिब है, यह पानी से आग निकलने के सदृश है। ऐसा न करें।” “धम्म ! मैने केवल परीक्षा करने के लिए ही तुझे हाथ से धरा था। अब, बता कि तेरा क्वारपन (सुरक्षित) है या नहीं ?” “हाँ तात ! है। मैने राग के वशीभूत हो किसी भी पुरुष की ओर नही देखा।” उसने लडकी को आश्वासन दे घर ले जा, विवाह करके पराये कुल भेजा। (फिर) शास्ता की वन्दना करने की इच्छा से, गन्ध-माला आदि हाथ में ले,

न केवल अभी किन्तु, पहले भी उसकी परीक्षा की है' कह पूर्वजन्म की कथा

पण्णिक ] ३ जेतवन पहुँच, शास्ता की वन्दना तथा पूजा करके एक ओर बैठा । "चिर- काल के बाद आये ?" पूछे जाने पर उसने भगवान को वह सब हाल कहा । शास्ता ने 'उपासक ! तुम्हारी तो चिरकाल से सदाचारिणी है, लेकिन तूने न केवल अभी किन्तु, पहले भी उसकी परीक्षा की है' कह पूर्वजन्म की कथा कही- ख. अतीत कथा पूर्वकाल मे वाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय, बोधिसत्त्व जगल मे वृक्ष-देवता होकर उत्पन्न हुए। उस समय वाराणसी मे एक दुकान- दार उपासक था इत्यादि कथा वर्तमान कथा के सदृश ही है। हाँ, परीक्षा करने के लिए उसने जब लडकी को हाथो से धरा, तो लडकी ने रोते रोते यह गाथा कही- यो दुक्खफुट्ठाय भवेय्य ताण सो मे पिता दूभि वने करोति, सा कस्स कन्दामि वनस्स मज्झे यो तायिता सो सहसा करोति ॥ [ कष्ट मे पडने पर, जिसे त्राता होना चाहिये, वही मेरा पिता जगल म विश्वास-घात कर रहा है। सो मे जगल मे किसे (सहायता के लिये) बुलाऊँ ? जो त्राता है, वही दुस्साहस कर रहा है।] यो दुक्खफुट्ठाय भवेय्य ताण का अर्थ है कि जो शारीरिक अथवा मान- सिक दुख से पीडित का त्राण करता है, परित्राण करता है, तथा प्रतिष्ठा का कारण होता है। सो मे पिता दूभि वने करोति का अर्थ है कि वह दुख से परित्राण करनेवाला मेरा पिता ही यहाँ इस प्रकार का मित्र-द्रोही कर्म करता है, अपनी निज की पुत्री (के शील) को ही लांघना चाहता है। सा कस्स कन्दामि का मतलब है कि किसके पास रोऊँ ? कौन मुझे बचायेगा ? यो तायिता सो सहसा करोति, का अर्थ हुआ कि जो पिता मेरा त्राता है, रक्षक है, आश्रय दाता होने योग्य, वह पिता ही दुस्साहस कर रहा है।

शास्ता ने यह धर्म-देशना सुना, (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर, जातक

४ [ १११.१०३ तब पिता ने उसे आश्वासन देकर पूछा—"अम्मे ! तूने अपने आप को सुरक्षित तो रखा है ?" "हाँ, तात ! मैने अपने आपको (सँभाल कर) रक्खा है।" उसने उसे घर ले जा विवाह कर, पराये कुल भेज दिया । शास्ता ने यह धर्म-देशना सुना, (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर, जातक का मेल बैठाया । सत्यों (के प्रकाशन) के अन्त में उपासक स्रोतापत्तिफल में प्रतिष्ठित हुआ । उस समय का पिता ही इस समय का पिता; लड़की ही इस समय की लड़की है। लेकिन उस बात को प्रत्यक्ष देखनेवाला वृक्ष- देवता तो मै ही था । १०३. वेरी जातक "यत्थ वेरी निजसति ." आदि गाथा शास्ता ने जेतवन में रहते समय अनाथ पिण्डिक के सम्बन्ध से कही । क. वर्तमान कथा अनाथ पिण्डिक ने अपने भोग-ग्राम¹ से लौटते हुए रास्ते में चोरो को देख- कर सोचा—"रास्ते मे रहना ठीक नही। श्रावस्ती ही जाकर रहूँगा ।" यह सोच जल्दी जल्दी बैलो को हांक, श्रावस्ती पहुँच, अगले दिन जब विहार गया, तो शास्ता को यह बात कही। शास्ता ने "गृहपति ! पूर्व समय में भी पण्डित-जन रास्ते में चोरो को देखकर रास्ते म न ठहर, अपने रहने के स्थान पर ही चले गये ' कह उसके पूछने पर पूर्व-जन्म की कथा कही— ¹ भोगग्राम=जमींदारी का ग्राम ।

ख. अतीत कथा

बेरी ] ५ ख. अतीत कथा पूर्व समय में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व महासम्पत्ति- शाली सेठ होकर पैदा हुआ। एक गांव में निमन्त्रण खाकर लौटने समय रास्ते में चोरो को देख वहीं नहीं ठहरा। जल्दी जल्दी बैलो को हाँक, अपने घर ही आकर नाना प्रकार के श्रेष्ठरसो से युक्त भोजन करके महाशय्या पर (लेटा। उस समय 'चोरो के हाथ से निकलकर भयरहित स्थान अपने घरपर आ गया हूँ' सोच, उल्लासपूर्वक यह गाथा कही— यत्थ वेरी निवसति न वसे तत्थ पण्डितो, एकरत्तं द्विरत्तं वा दुक्खं वसति वेरिसु ॥ [जहाँ पर वैरी का निवास हो, पण्डित आदमी को चाहिये कि वहाँ निवास न करे। क्योकि वैरी के साथ एक या दो रात्रि रहनेवाला भी दुःख ही भोगता है।] ────── वेरी, वैर-भाव से युक्त आदमी। निवसति, प्रतिष्ठित रहता है। न वसे तत्थ पण्डितो, जहाँ वह वैरी आदमी प्रतिष्ठित होकर रहता है, पाण्डित्य से युक्त पण्डित-जन को चाहिये कि वहाँ न रहे। किस कारण से ? एकरत्तं द्विरत्त वा दुक्ख वसति वेरिसु, वैरियों के बीच में (केवल) एक या दो दिन रहता हुआ भी दुःख ही भोगता है। ────── बोधिसत्त्व इस प्रकार हर्ष ध्वनि करके दान-यादि पुण्य-धर्म कर यथाकर्म (परलोक) सिधारे। शास्ता ने इस धर्म-देशना को ला, जातक का मेल बैठाया कि उस समय मैं ही वाराणसी का सेठ था।