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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

२२७. गूथपाणक जातक

गूथपाणक ] ३६१ २२७. गूथपाणक जातक “सूरो सूरेण सङ्गम्म....” यह शास्ता ने जेतवन मे रहते समय एक भिक्षु के बारे मे कही। क. वर्तमान कथा उस समय जेतवन से गव्यूति¹, आधे योजन की दूरी पर एक निगम-ग्राम था। यहाँ से बहुत शलाका-भोजन² मिलता था। वहाँ एक प्रश्न पूछने वाला ठिंगना व्यक्ति रहता था। वह शलाका-भोजन तथा पाक्षिकभोजन लेने के लिए गए तरुण भिक्षु तथा सामणेरो से 'कौन खाते हैं ? कौन पीते हैं ? कौन भोजन करते हैं ?' आदि प्रश्न पूछता। उत्तर न दे सकने पर उन्हे लज्जित करता। वे उसके भय से शलाका भोजन तथा पाक्षिक-भोजन लेने उस गाँव न जाते। एक दिन एक भिक्षु शलाका बाँटने के स्थान पर जाकर बोला—भन्ते ! क्या अमुक गाँव में शलाका-भोजन या पाक्षिक-भोजन है ? “आयुष्मान् ! है, किन्तु वहाँ एक ठिंगना व्यक्ति है जो प्रश्न पूछता है। उत्तर न दे सकने पर गाली देता है, अपशब्द कहता है। उसके भय से कोई नही जा सकते हैं।” “भन्ते ! वहाँ के भोजन मेरे जिम्मे कर। मै उस का दमन कर, उसे निर्विष करके ऐसा बना दूँगा कि आगे से तुम्हे देख कर भागे।” भिक्षुओ ने 'अच्छा' कह वहाँ का भोजन उसके जिम्मे कर दिया। ¹गव्यूति=१/४ योजन। ²शलाक भत्त—गृहस्थों के घर से शलाका से प्राप्त होने वाला भोजन।

गूथपाणक ] ३६३ ने उसे देख सोचा—यह मेरे भय से ही भागा जा रहा है। मेरा इसका युद्ध होना चाहिए। उसने उसे ललकारते हुए पहली गाथा कही— सूरो सूरेन सङ्कम्म विक्कन्तेन पहारिना, एहि नाग निवत्तस्सु किम्मु भीतो पलायसि; पस्सन्तु अङ्गमगधा मम तुम्हञ्च विक्कमं ॥ [ तू शूर है। लडने मे, प्रहार करने मे समर्थ शूर के सम्मुख होने पर हे नाग ! रुक, डर कर भाग क्यो रहा है। जरा अङ्गमगध के लोग मेरा और तेरा पराक्रम देखे । ] तू सूरो मुझ सूरेन साथ आकर वीर्य्य-विक्रम से विक्कन्तेन प्रहार करने की सामर्थ्य होने से पहारिना किस कारण से बिना लडे ही जाता है। एक प्रहार तो देने दे। इसलिए एहि नाग निवत्तस्सु इतने से ही मरने से भयभीत हो किम्मु भीतो पलायसि । यह इस सीमा मे रहने वाले पस्सन्तु अङ्गमगधा मम तुम्हञ्च विक्कम हम दोनो का पराक्रम देखे। उस हाथी ने ध्यान देकर उसकी बात सुन, रुक कर उसने पास जा उसे अप्रसन्न करते हुए दूसरी गाथा कही— न त पादा वधिस्सामि न दन्तेहि न सोण्डिया, मिळ्हेन त वधिस्सामि पूति हञ्जतु पूतिना ॥ [ न तुझे पांव से मारूँगा, न दांतो से, न सूण्ड से । तुझे गूह से मारूँगा । गन्दगी गन्दगी से ही मरे । ] तुझे पांव आदि से नही मारूँगा। तेरे योग्य गूह से ही तुझे मारूँगा। ऐसा कह 'गन्दगी मे रहने वाला कीडा गन्दगी से ही मरे' (करके) उसके सिर पर बडा सा लेण्डा गिरा कर जल छोड उसे वही मार क्रौञ्चनाद करता हुआ आरण्य मे गया।

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय गूह

३६४ [ २८ २२८

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय गूह का कीडा ठिगना था। हाथी वह भिक्षु था। उस बात को प्रत्यक्ष देखने वाला, उस वन-खण्ड मे रहने वाला देवता मै ही था।

२२८. कामनीत जातक

“तयो गिरि... "यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय कामनीत ब्राह्मण के बारे मे कही। वर्तमान कथा तथा अतीत-कथा बारहवें परिच्छेद की कामजातक' में आएगी। उन दोनो राजपुत्रो में ज्येष्ठ भाई वाराणसी का राजा हुआ। छोटा भाई उपराजा। राजा की कामभोगो से तृप्ति न होती थी। वह धन का लालची था। तब बोधिसत्त्व शक्र देवेन्द्र राजा था। उसने जम्बूद्वीप पर नजर डालते हुए उस राजा को दोनो प्रकार के भोगा मे अतृप्त जान उसका निग्रह कर उसे लज्जित करने के उद्देश्य से ब्राह्मण-ब्रह्मचारी का रूप बना आकर राजा को देखा। राजा ने पूछा- “ब्रह्मचारी ! किस मतलब से आये ?" "महाराज ! मुझे तीन नगर ऐसे दिखाई देते है जो शान्त हैं, धनधान्य से पूर्ण है, जहाँ हाथी, घोडे, रथ और पैदल बहुत है, तथा जो हिरण्य, स्वर्ण के अलङ्कारो से भरे हैं। उन नगरा को थोडी ही सेना से जीता जा सकता है। मैं तुम्हें वे नगर जीत कर देने के लिए आया हूँ।" “ब्रह्मचारी ! कब चलेंगे।"

'कामजातक (४६७)

कामनीत ] ३६५ "महाराज ! कल ।" "तो जा, प्रातःकाल ही आना ।" "अच्छा महाराज ! जल्दी से सेना तैयार कराएं" यह शक्र अपने स्थान को चला गया । अगले दिन राजा ने मुनादी करवा सेना तैयार करवाई और आमात्यो को बुलाकर कहा—"कल एक ब्राह्मण-तरुण ने उत्तर-पाञ्चाल, इन्द्रप्रस्थ तथा केकय इन तीन नगरो के राज्य को जीत कर देने के लिए कहा है । उस तरुण को लेकर तीनो नगरो का राज्य जीतेंगे । उसे जल्दी से बुलाओ।" "देव ! उसे निवासस्थान कहाँ दिलवाया है ?" "मैने उसे निवास-गृह नही दिलवाया ।" "उसे भोजन-खर्च दिया ?" "वह भी नही दिया ।" "उसे कहाँ ढूँढ ?" "नगर की गलियो में ढूँढो ।" उन्होने ढूँढा । न मिलने पर कहा— "महाराज ! दिखाई नही देता ।" माणवक को न देखने से राजा को महान शोक हुआ—अरे ! इतना बडा ऐश्वर्य जाता रहा । हृदय गर्म हो गया । रक्त प्रकुप्त हो गया । रक्तातिसार हो गया । वैद्य चिकित्सा न कर सके । तब तीन चार दिन गुजरने पर शक्र ने ध्यान देकर उसके रोग को जान उसकी चिकित्सा करूँगा सोच ब्राह्मण रूप धारण कर दरवाजे पर खडे हो कहलाया—वैद्य-ब्राह्मण तुम्हारी चिकित्सा के लिए आया है । राजा ने उसे सुन कहा—बडे वडे ˚द्य भी मेरा इलाज नही कर सके । इसे खर्चा देकर विदा करो । शक्र बोला—मुझे न भोजन की आवश्यकता है, न खर्चे की । वैद्य की फीस भी नही लूंगा । उसकी चिकित्सा करूँगा । राजा मुझे मिले । राजा ने यह सुनकर कहा—तो आ जाए । शक्र प्रविष्ट हो जय बुलाकर एक ओर खडा हुआ । राजा ने पूछा— "तू मेरी चिकित्सा करेगा ?" "देव, हाँ !"

३६६ [ २.८.२२८ “तो चिकित्सा कर।” “अच्छा महाराज ! मुझे रोग का लक्षण बताएँ। किस कारण से रोग पैदा हुआ ? कुछ खाने पीने के कारण हुआ वा कुछ देखने सुनने के ?” “तात ! मेरा रोग सुनने से पैदा हुआ।” “तूने क्या सुना ?” “तात ! एक तरुण ने आकर कहा कि मैं तीन नगरो या राज्य जीत कर दूंगा। मैने उसे निवासस्थान वा भोजन-खर्च नही दिलवाया। वह मुझसे क्रुद्ध होकर दूसरे राजा के पास चला गया होगा। इस प्रकार 'मेरा इतना बड़ा ऐश्वर्य्य जाता रहा' सोचते रहने के कारण यह रोग पैदा हो गया है। यदि कर सकते हो तो कामना से उत्पन्न रोग की चिकित्सा करो।” इस अर्थ को प्रकट करते हुए पहली गाथा कही— तयो गिरिं अन्तर कामयामि पञ्चाला कुरयो केकये च; ततुत्तरिं ब्राह्मण कामयामि तिकिच्छ मं ब्राह्मण कामनीत ॥ [तीनो नगर और वे जिनकी राजधानी है उन पाञ्चाल, कुरु तथा केकय देश की इच्छा करता हूँ। उससे अधिक भी इच्छा करता हूँ। हे ब्राह्मण ! मुझ कामना-ग्रस्त की चिकित्सा कर।] तयोगिरिं का मतलब है तीन गिरि। अथवा तयोगिरी को ही पाठ समझें। जैसे 'यह सुदर्शनगिरि के द्वार को प्रकाशित करता है' यहाँ सुदर्शन देवनगर को युद्ध करके ग्रहण करना कठिन होने से, अस्थिर करना कठिन होने से सुदर्शन- गिरि कहा गया। इसी प्रकार यहाँ भी तीनो नगरो से मतलब है तीनों गिरि। इसीलिए यही अर्थ है कि तीनो नगर और उनके अन्दर तीनो प्रकार के राष्ट्र की इच्छा करता हूँ। पञ्चाला, कुरयो केकये च यह उन राष्ट्रो के नाम हैं। उनमें पञ्चाला से मतलब है उत्तर पञ्चाल, जहां कम्पिल्ल नगर है। —————— 'निमि जातक (५४१); गाथा १५१

कामनीत ] ३६७ कुरयो का मतलब है कुरु राष्ट्र, उसमें इन्दपत्त नाम का नगर है। केकये प्रथमा विभक्ति के अर्थ में द्वितीया है। इससे केकय राष्ट्र का मतलब है। वहाँ केक्य राजधानी ही नगर है। ततुत्तरिं मैने यहाँ वाराणसी राज्य तो प्राप्त किया है और तीन राज्य कामयामि। तिकिच्छ मं ब्राह्मण काम- नीत, इन वस्तु-कामनाओं तथा भोग-कामनाओं से ले जाए गए, मारे गए मुझको, हे ब्राह्मण ! यदि सामर्थ्य है तो अच्छा कर। शक्र ने 'महाराज ! जड़फूल की ओषधियों से तेरी चिकित्सा नही हो सकती, ज्ञानौषध से ही तेरी चिकित्सा हो सकती है' कह दूसरी गाथा कही— कण्हाहिदिट्ठस्स करोन्ति हेके अमनुस्सावद्वस्स¹ करोन्ति पण्डिता; न कामनीतस्स करोति कोचि ओक्कन्तसुक्कस्स ही का तिकिच्छा ॥ [ कोई कोई काले साँप से डसे की चिकित्सा करते हैं, कोई कोई पण्डित भूत प्रेतादि अमनुष्यों से अभिभूतो की चिकित्सा करते हैं, लेकिन कामनाओं के जो वशीभूत हुआ है उसकी कोई चिकित्सा नही करता। जो शुक्लधर्म की मर्यादा को लाँघ गया, उसकी क्या चिकित्सा ? ] कण्हाहिदिट्ठस्स करोन्ति हेके कुछ चिकित्सक घोर विषैले सर्प, काले सर्प से डसे हुए की मन्त्रो से तथा औषधिया से चिकित्सा करते हैं। अमनुस्सवद्वस्स करोन्ति पण्डिता, दूसरे पण्डित भूतवैद्य, भूतयक्षादि अमनुष्यों द्वारा मारे गए, अभिभूत, ग्रहण किए गए, लोगो की बलिकर्म, परित्तकर्म, औषध तथा भावना आदि से चिकित्सा करते है। न कामनीतस्स करोति कोचि कामनाओ के वशीभूत आदमी की पण्डितों को छोड़ दूसरा कोई चिकित्सा नही करता। यदि करे भी, तो कर नही सकता। किस कारण से ? ओक्कन्तसुक्कस्स ही का तिकिच्छा, जिन्होने कुशल धर्म को पार कर लिया, जिन्होने कुशलधर्म की ¹'अमनुस्सयिद्वस्स' पाठ अच्छा है।

३६८ [ २८.२२८ मर्यादा लांघ दी, जो अकुशल धर्म में प्रतिष्ठित हो गए, ऐसे आदमियो कं मन्त्र वा औषध से क्या चिकित्सा होगी ? ऐसे मूर्ख को दवाइयो से अच्छ नही किया जा सकता । इस प्रकार वोधिसत्त्व ने राजा को यह बात समझाते हुए आगे यूं कहा— “महाराज ! यदि तू इन तीनो राज्यो को प्राप्त करेगा, तो इन चारो नगरं पर राज्य करता हुआ क्या तू एक ही साथ चार चार वस्त्र पहनेगा ? अथवा चार चार सोने की थालियो मे भोजन करेगा ? अथवा चार चार पलंगो पर सोएगा ? महाराज ! तृष्णा के वशीभूत न होना चाहिए । यह विपत्ति क मूल है। यह बढने पर अपने को बढाने वाले आदमी को आठ महा निरयं में, सोलह उस्सद निरयो मे तथा शेष नाना प्रकार के अपायो मे जा गिराती है।' इस प्रकार राजा को निरय आदि के भय से धमका कर वोधिसत्त्व ने धर्मोपदेश दिया । राजा भी धर्म सुनकर शोकरहित हुआ । उसी समय उसक रोग जाता रहा । शक्र भी इसे उपदेश दे, शीलो मे प्रतिष्ठित कर देवलोक कं ही चला गया । वह भी उस समय से लेकर दानादिपुण्यकर्म करके यथाकर्म (परलोक) गया शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय राज कामनीत ब्राह्मण था । शक्र तो मै ही था ।

२२६. पलासी जातक¹

“गज्जग्गमेघेहि ” यह शास्ता ने जेतवन मे रहते समय पलासी परि- व्राजक के बारे मे कही—

¹पलासि जातक

क. वर्तमान कथा

पलासी ] ३६६ क. वर्तमान कथा वह शास्त्रार्थ करने के उद्देश्य से सारे जम्बूद्वीप मे घूमा। कोई शास्त्रार्थ करने वाला न मिला। घूमता घूमता वह श्रावस्ती पहुँचा। यहाँ जाकर लोगो से पूछा कि मेरे साथ कोई शास्त्रार्थ कर सकता है? मनुष्यो ने इस प्रकार बुद्ध गुणों की प्रशसा की—तेरे जैसे हजार हो तो उनके साथ भी शास्त्रार्थ कर सकने वाले, सर्वज्ञ, मनुष्यो म श्रेष्ठ, धर्मेश्वर, दूसरे वादो को जीतने वाले महान् गौतम हैं। सारे जम्बूद्वीप मे भी उत्पन्न हुआ विरोधी मत उन भगवान् को नही छूरा सकता। सभी मत उनके चरणो मे आने पर इस प्रकार चूर्ण विचूर्ण हो जाते है जैसे लहरे किनारे पर पहुँच कर।” परिव्राजक ने पूछा—इस समय वह कहाँ है? उत्तर मिला—जेतवन म। उसने सोचा—अब उसके साथ शास्त्रार्थ करूँगा। बहुत से आदमियो के साथ उसने जेतवन जाते समय, नो करोड खर्चे से जेत राजकुमार द्वारा बनाया हुआ जेतवन-द्वार देखा। उसने पूछा—यही श्रमण गौतम के रहने के प्रासाद हैं ? "यह तो ड्योढी है।" "यदि ड्योढी ऐसी है तो निवासस्थान कैसा होगा ?" "गन्धकुटी तो असीम है।" उसने सोचा ऐसे श्रमण से कौन शास्त्रार्थ करेगा! यह वही से भाग गया। शोर मचाते हुए कुछ मनष्यो ने जेतवन मे प्रवेश किया। शास्ता ने पूछा— क्यो असमय आए ? उन्होने वह समाचार कहा। शास्ता ने कहा—उपासको। केवल अभी नही, यह पहले भी मेरे निवासस्थान की ड्योढी को ही देख कर भाग गया था। उनके प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व जन्म की बात कही— ख. अतीत कथा पूर्व काल म गन्धार राष्ट्र म तक्षशिला में बोधिसत्त्व राज्य करते थे। वाराणसी म था ब्रह्मदत्त। उसने तक्षशिला पर अधिकार करने की इच्छा से बडी सेना के साथ जाकर, नगर के समीप पहुँच, सेना को यह आज्ञा देते हुए

कि 'इस तरह से हाथियों को भेजो, इस तरह से घोड़े, इस तरह से रथ, इस तरह से पैदल, इस तरह दौड़ कर शस्त्रो से प्रहार करो तथा इस प्रकार बादलो की घनी वर्षा की तरह बाणो की वर्षा बरसाओ' ये दो गाथाएँ कही— गजगमेघेहि हयग्गमालिहि रयूमिलातेहि सराभिवस्सहि; थरुग्गहावट्टदळ्हप्पहारिहि परिवारिता तक्कसिला समन्ततो ॥ अभिधावया च पतया च विविधविनदिता च दन्तिहि; वत्ततज्ज तुमुलो घोसो यथा विज्जुता जलधरस्स गज्जतो ॥ [ श्रेष्ठ हाथियो रूप बादलो से, उत्तम घोड़ो की पक्तियो से, रथो की लहरो से, शरो की वर्षा से, तलवार धारी चारो ओर प्रहार करने वालो से तक्षशिला को चारो ओर से घेर लो । दौडो, उदलो तथा नाना प्रकार के नाद करने वाले हाथियो द्वारा आज तुमुल घोष करो, जैसे बिजली गर्जना करने वाले मेघो के साथ उछलती कदती है।] गजगमेघेहि श्रेष्ठ हाथियो रूप मेघो के द्वारा । क्रौञ्चनाद गर्जना करने वाले, मस्त हाथियो रूप बादलो द्वारा, यही अर्थ है। हयग्गमालिहि श्रेष्ठ घोडो की पंक्ति द्वारा। श्रेष्ठ घोडो की पंक्ति के समूह के द्वारा, अश्वो की सेना के द्वारा, यही अर्थ है। रयूमिलातेहि लहरो के वेग वाले, सागर के जल की तरह रथो की लहरो वाले—रथसेना यही मतलब है। सराभिवस्सहि उन रथ-सेनाओ से मूसलधार बरसने वाले मेघ की तरह तीरो की वर्षा बर- साते हुए। थरुग्गहावट्टदळ्हप्पहारिहि इधर उधर से घूम कर दृढ प्रहार करने वालो से, तलवार के दस्ते पकड़े हुए, पैदल योद्धाओ से । परिवारिता तक्कसिला समन्ततो, जिस प्रकार यह तक्षशिला चारों ओर से घिर जाए, वैसा करो ।

दुतियपलासी ] ४०१

अभिधावथा च पतथा च जल्दी से दौड़ो तथा कूदो। विविध विनन्दिता च दन्तिहि धेष्ठ हाथियो के साथ नाना प्रकार से शोर मचाने वाले होओ। सीटी बजाने, गरजने, बाजे बजाने आदि के नाना प्रकार के शब्द करो। धत्तत्तज्ज तुमलो घोसो आज़ बिजली के सदृश महान् घोष हो। यथा विज्जुता जलधरस्स गज्जतो जैसे गरजते हुए बादल के मुंह से निकली हुई बिजलियाँ विचरण करती हैं, उसी प्रकार विचरते हुए, नगर को चारो ओर से घेर कर, राज्य छीन लो,' यही अभिप्राय है।

वह राजा गरज कर सेना को आज्ञा दे नगर-द्वार के समीप गया। वहाँ ड्योढी को देख कर उसने पूछा कि क्या यह राजा के रहने का स्थान है ? यह 'ड्योढी है' सुन उसने सोचा—जब ड्योढी ऐसी है तो राजा का निवास- स्थान कैसा होगा ? उत्तर मिला—वैजयन्त-प्रासाद जैसा। इस प्रकार के ऐश्वर्यशाली राजा के साथ युद्ध न कर सकूँगा, सोच ड्योढी देख कर ही रुक, भाग कर वाराणसी चला आया। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय वारा- णसी राजा पलासी परिव्राजक था। तक्षशिला-राजा तो मैं ही था।

२३०. दुतियपलासी जातक

"धजमपरिमितं ...." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय, एक पलासी परिव्राजक के ही बारे मे कही।

क. वर्तमान कथा

इस कथा में वह परिव्राजक जेतवन में दाखिल हुआ। उस समय जन- समूह से घिरे हुए, अलंकृत धर्मासन पर बैठे हुए, शास्ता मनोशिलातल पर २६

भी भागा है। इतना कह, पूर्व-जन्म की कथा कही—।

४०२ [ २८-१३०

सिंहनाद करते हुए, सिंह-पञ्जरे के समान धर्म्म-देशना कर रहे थे। परिव्राजक दशबलधारी के ब्रह्म-शरीर जैसे रूप, पूर्ण चन्द्र जैसी शोभा वाले मुंह तथा स्वर्णपट जैसे ललाट को देख कर, 'इस प्रकार के उत्तम पुरुष को कौन जीत सकेगा ?' सोच रुका और दूसरी मण्डली में घुसकर भाग गया। जनता ने उसका पीछा कर, पकड़, शास्ता से यह वृत्तान्त कहा। शास्ता बोले—"न केवल अभी यह परिव्राजक मेरे स्वर्ण-वर्ण मुख को देख कर भाग गया है, यह पहले भी भागा है। इतना कह, पूर्व-जन्म की कथा कही—।

ख. अतीत कथा

पूर्व समय में बोधिसत्त्व वाराणशी में राज्य करते थे। तक्षशिला में एक गन्धार राजा था। उसने वाराणशी जीतने की इच्छा से चतुरङ्गिनी सेना के साथ आकर, नगर घेर लिया। फिर नगर-द्वार पर खड़े हो अपनी सेना को देखते हुए, 'इतनी सेना को कौन जीत सकेगा' सोच अपनी सेना की प्रशंसा करते हुए पहली गाथा कही—

धजमपरिमित अनन्तपारं दुप्पसह धङ्केहि सागरमिव; गिरिमिव अनिलेन दुप्पसहो दुप्पसहो अह्मज्ज तादिसेन ॥

[ मेरी असीम ध्वजाएँ हैं, अनन्त सेना है। जिस प्रकार कौवों के द्वारा सागर दुर्लङ्घ्य होता है (अथवा) हवा के द्वारा पर्वत दुर्जेय होता है, उसी प्रकार मैं आज वैसे शत्रु द्वारा दुर्जेय हूँ।]

धजमपरिमित यह मेरे रथ में मोरपङ्खों में लगाकर ऊंची की हुई ध्वजाएँ अपरिमित हैं, बहुत हैं, सैकड़ो हैं। अनन्तपारं मेरी सेना भी, इतने हाथी हैं तथा इतने घोडे हैं इस प्रकार गिनी नहीं जा सकती। दुप्पसह शत्रुओ द्वारा जीती नहीं जा सकती। जैसे क्या ? धङ्केहि सागरमिव जैसे सागर बहुत कौवा द्वारा भी अतिक्रमण नही किया जा सकता, उसी प्रकार दुर्धर्ष। गिरिमिव अनिलेन दुप्पसहो यह मेरी सेना, दूसरी सेना

दुतियपलासी ] ४०३ के सामने उसी तरह स्थिर रहती है जैसे हवा के सामने पर्वत। दुप्पसहो अह्ममज्ज तादिसेन इस सेना के साथ में आज वैसे (शत्रु) से दुर्जेय हूँ। महल पर खडे योधिसत्त्व के बारे मे कहता है। उसने उसे अपना पूर्ण चन्द्र की सी शोभा वाला मुख दिखला कर धम- काया—मूर्ख, बकवास मत कर, जिस प्रकार मस्त हाथी सरकण्डे के वन को नष्ट कर देता है उसी प्रकार अभी तेरी सेना को विध्वंस करूँगा। और दूसरी गाथा कही— मा बालियं विप्पल्लपि न हिस्स तादिसं विळम्हसे नहि लभसे निसेधकं; आसज्जसि गजमिव एकचारिनं यो तं पदा नळमिव पोथयिस्सति ॥ [ मूर्खता की बात मत बक । ऐसा नही हो सकता; 'मुझे रोकने वाला नही मिलेगा' सोच उछलता है। तू एकचारी हाथी के सामने आया है जो तुझे वैसे ही पांव से कुचल देगा जैसे सरकण्डे को ।] मा बालियं विप्पलपि अपनी मूर्खता मत बक। न हिस्स तादिसं अथवा न हिस्स तादिसो पाठ है। मेरी सेना अनन्त है, इस प्रकार विचार कर राज्य जीत सकने वाला तेरे जैसा न होवे या नही होता है। विळम्हसे तू केवल राग, द्वेष, मोह तथा मान से जलकर उबल रहा है। नहिलभसे निसेधक मेरे जैसे को जीत कर फिर और रुकावट डालने वाला तुझे न मिलेगा। जिस रास्ते से तू आया है उसीसे भगाऊँगा। आसज्जसि प्राप्त हुआ है। गजमिव एकचारिनं एकचारी मस्त हाथी की तरह। यो तं पदा नळमिव पोथयिस्सति जो तुझे उसी तरह कुचल देगा जिस तरह मस्त हाथी पाँवो से सरकण्डे को कुचलता है, अच्छी तरह पीस डालता है। तू उसे प्राप्त हुआ, यह अपने बारे मे कहा।

शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय गन्धार

४०४ [ २८२३० इस प्रकार घबराते हुए का कहना सुन, गन्धार राजा उसके सर्वाङ्ग सङ्गुष्ट महा ललाट को देख, भयभीत हो, डर, भागकर अपने नगर ही चला गया। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय गन्धार राजा पलासी परिव्राजक था। वाराणसी राजा तो मैं ही था।

२३१. उपाहन जातक

दूसरा परिच्छेद ६. उपाहन वर्ग २३१. उपाहन जातक "यथापि फीता " यह शास्ता ने वेळुवन म रहने समय, देवदत्त के बारे में कही। क. वर्तमान कथा धर्मसभा में भिक्षुओ ने बातचीत चलाई—आयुष्मान् ! देवदत्त आचार्य्य को छोड़, तथागत का विरोधी शत्रु बन विनाश को प्राप्त हुआ। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, यहाँ बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' । शास्ता न, 'भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त आचार्य्य को त्याग, मेरा विरोधी बन महाविनाश को प्राप्त हुआ, वह पहले भी हुआ है' कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व हथवानों के कुल में पैदा हो, बड़े होने पर हस्ति शिल्प में पारङ्गत हो गए। काशी के एक गामडे के माणवक ने आकर उनसे विद्या सीखी। बोधिसत्व शिल्प सिखाते हुए आचार्य्य-मुट्ठी¹ नहीं रखते। जो जो जानते हैं, वह सब सिखा देते हैं। उस माणवक ने बोधिसत्व की सारी विद्या सीख चुकने पर

¹विद्या को छिपा कर रखना।

४०६ [ २.६.२३१ कहा- आचार्य ! अब में राजाओ की सेवा में रहूँगा। बोधिसत्व ने 'तात' अच्छा' यह महाराजा से कहा- "महाराज ! मेरा शिष्य आपकी सेवा में रहना चाहता है।" 'अच्छा ! रहे।' 'तो उसका वेतन कह दे।' 'आपका शिष्य आपके बराबर नहीं पा सकता। आपको सौ मिलने पर उसे पचास मिलेंगे, दो (सौ) मिलने पर एक (सौ) ।" उसने घर जाकर शिष्य से कहा। शिष्य बोला- "आचार्य ! मैं आपके बराबर शिल्प जानता हूँ। यदि जितना आप पाते हैं उतना ही वेतन मिलेगा तो राजा की सेवा में रहूँगा, नहीं तो नहीं रहूँगा।" बोधिसत्त्व ने यह वृत्तान्त राजा से कहा। राजा बोला- यदि वह तुम्हारे जितना शिल्प जानता है तो तुम्हारे बराबर शिल्प दिखा सकने पर उसे तुम्हारे बराबर मिलेगा। बोधिसत्व ने अपने शिष्य से यह बात कही। उसने कहा 'अच्छा, मैं दिखाऊँगा।' बोधिसत्त्व ने राजा से कहा। राजा बोला, तो कल शिल्प दिखा। शिष्य ने कहा- दिखाऊँगा, नगर में मुनादी करा दे। राजा ने मुनादी करा दी कि कल आचार्य और उनका शिष्य हस्ति- शिल्प दिखाएँगे। जो देखना चाहे वे राजाङ्गण में इकट्ठे होकर देख। आचार्य ने यह सोच कि मेरा शिष्य उपाय-कुशल नहीं है एक हाथी ले उसे एक ही रात में 'उलटी बात' सिखाई- चल कहने पर पीछे हटना, पीछे हटो कहने पर चलना, खड़ा हो कहने पर लेटना, लेट कहने पर खड़ा होना, पकड़ कहने पर रखना तथा रख कहने पर पकड़ना। इस प्रकार सिखा, अगले दिन वह उस हाथी पर चढ राजदरबार मे पहुँचा। शिष्य भी एक सुन्दर हाथी पर चढ़ा। जनता इकट्ठी हुई। दोनो ने बराबर शिल्प दिखाया। बोधिसत्त्व ने अपने हाथी से (हाथी) बदल लिया। वह चल कहने पर पीछे हटा। पीछे हट कहने पर आगे दौड़ा। खड़ा हो कहने पर लेट गया। लेट कहने पर खड़ा हुआ। (उसने) पकड़ कहने पर रख दिया। रख कहने पर पकड़ा। जनता बोली- अरे दुष्ट शिष्य ! तू आचार्य के साथ झगड़ा करता है। अपनी सामर्थ्य नहीं जानता। समझता है कि मैं आचार्य के बराबर जानता हूँ। फिर जनता ने उसे ढेले और डण्डो की मार से वहीं मार डाला।

उपाहन ] ४०७ बोधिसत्त्व ने हाथी से उतर राजा के पास जाकर कहा—महाराज ! विद्या अपने को गुणी बनाने के लिए सीखी जाती है। लेकिन किसी किसी के लिए शिल्प विनाश का कारण होता है जैसे ठीक से न बनाया हुआ जूता । इतना कह यह दो गाथाएँ कहीं— यथापि कीता पुरिसस्सुपाहना सुखस्स अत्थाय दुखं उदव्वहे; घम्माभितत्ता तलसा पपीळिता तस्सेव पादे पुरिसस्स खादरे ॥ एवमेव यो दुक्कुलीनो अनरियो तम्हारविज्जञ्च सुतञ्च मादिय; तमेव सो तस्स सुतेन खादति अनरियो वुच्चति पानदूपमो ॥ [ जिस प्रकार सुख के लिए खरीदे गए जूते गर्मी से तप्त होकर तथा पाद- तल से पीडित होकर उसी आदमी के पैर को काट खाते हैं, उसी प्रकार जो नीचकुल या अनार्य्य होता है वह जिस (आचार्य्य) से विद्या तथा श्रुत ग्रहण करता है उसी को वह अपने ज्ञान (श्रुत) से खाता है। अनार्य्य आदमी खराब जूते के समान समझा जाता है।] उदव्वहे, कष्ट दे। घम्माभितत्ता तलसा पपीळिता घाम से अभितप्त और पैर के तलुवे से पीडित । तस्सेव जिसने वह खराब जूते सुख की आशा से खरीद कर पाँव में डाले उसीके । खादरे जखम करते हैं या पाँव खाते हैं। दुक्कुलीनो खराब जाति का, कुलहीन पुत्र । अनरियो लज्जा-भय रहित असत्पुरुष। तम्हाफविज्जञ्च सुतञ्च मादिय उस उसको सिखाता है इसलिए तमावो की जगह तम्हावो। मतलब है उस उसको हुनर का अभ्यास कराता है, उसमें लगाता है । आचार्य्य ही इसका अर्थ है, इसलिए तम्हारा। गाथा-बन्धन को सरल करने के लिए ह्रस्व किया गया है। विज्जं, अठारह विद्याओ म से कोई । सुतं जो कुछ श्रुतशास्त्र । आदिय, लेकर। तमेव सो

अट्टकथा¹ मे तेनेव सो तस्स सुतेन खादति भी पाठ है। उसका भी 'वह वहाँ

४०८ [ २.६-२३२ तस्स सुतेन खादति अपने ही आपको वह अर्थात् जो दुष्टकुल का अनार्य्य आचार्य्य से विद्या और ज्ञान ग्रहण करता है वह वहाँ ज्ञान से खाता है अर्थात् उसके पास से श्रुतज्ञान से वह अपने को ही नष्ट करता है। अट्टकथा¹ मे तेनेव सो तस्स सुतेन खादति भी पाठ है। उसका भी 'वह वहाँ ज्ञान से अपने को खाता है' ही अर्थ है। अनरियो वुच्चति पानदूपमो अनार्य्य (आदमी) खराब जूते जैसा कहा जाता है। जिस प्रकार खराब जूते आदमी को खाते है, उसी प्रकार यह ज्ञान से खाता है तो अपने आप अपने को ही खाता है। अथवा जूते से जख्मी पानदू । जूते से पीड़ित, जूते से खाए गए पैर से मतलब है। इसलिए अपने आपको जो ज्ञान से हानि पहुँचाता है, वह उस ज्ञान से खाया जाने के कारण अनार्य्य कहलाता है। पानदूपमो का यही अर्थ है कि जूते से पीड़ित पाँव की तरह। राजा ने सन्तुष्ट हो बोधिसत्त्व को महान् सम्पत्ति दी। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय शिष्य देवदत्त था। आचार्य्य तो मै ही था। २३२. वीणथूण जातक एकचिन्तितोय अयमत्यो . .यह शास्ता ने जेतवन में विचरते समय एक कुमारी के बारे में कही। ¹ पुरानी सिंहल अट्ठकथा।

क. वर्तमान कथा

थीणपूण ] ४०६ क. वर्तमान कथा वह श्रावस्ती के एक सेठ की लड़की थी। उसने अपने घर में वृषभराज का सत्कार होते देख दाई से पूछा- माँ, यह कौन है जिसका इस प्रकार सत्कार होता है ? "बेटी, यह वृषभराज है।" एक दिन उस लड़की ने प्रासाद पर खड़े होकर गली में एक कुबड़े को देखा। उसने सोचा-बैलों में जो ज्येष्ठ होता है उसकी पीठ पर एक ककुध होता है, मनुष्यों में जो बड़ा हो उसकी पीठ पर भी होना चाहिए। यह मनुष्यों में वृषभ-राज होगा। मुझे इसकी चरणसेविका बनना चाहिए। उसने दासी को भेजकर उसे कहलवाया कि सेठ की लड़की तेरे साथ जाना चाहती है। तू अमुक स्थान पर जाकर ठहर। वह कीमती चीजें ले, भेष बदल, महल से उतर उसके साथ भाग गई। आगे चलकर यह बात नगर में और भिक्षुसङ्घ में प्रकट हो गई। धर्मसभा में भिक्षुओं ने बात चलाई-आयुष्मानो ! अमुक सेठ-लड़की कुबड़े के साथ भाग गई। शास्ता ने आकर पूछा- भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? 'अमुक बातचीत' कहने पर शास्ता ने कहा- भिक्षुओ, न केवल अभी यह कुबड़े को चाहती है, इसने पहले भी कुबड़े की ही इच्छा की है। इतना कह पूर्व जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में राजा ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्त्व ने एक निगम-ग्राम में सेठ के कुल में पैदा हो, गृहस्थी बसाते हुए, पुत्र-पुत्री के साथ बढ़ते हुए अपने पुत्र के लिए वाराणसी-सेठ की लड़की पक्की कर दिन का निश्चय किया। सेठ की लड़की ने अपने घर पर वृषभ का सत्कार-सम्मान होते देख दाई से पूछा- यह कौन है ? उसने कहा- यह वृषभ है। तब सेठ की लड़की ने गली में जाते हुए एक कुबड़े को देखकर समझा कि यह पुरुषों में वृषभ होगा। उसने कीमती सामान लिया और उसके साथ भाग गई।

४१० [ २६.२३२

बोधिसत्त्व भी सेठ की लडकी को घर लाने की इच्छा से बडी बारात के साथ बाराणसी जाते हुए उसी रास्ते पर हो लिए। वे दोनो सारी रात रास्ता चलते रहे। रात भर सर्दी खाने के कारण अरुणोदय होने पर कुबडे के शरीर का वायु कुपित हो गया। बडी पीडा होने लगी। वह रास्ते से हट, पीडा से बेहोश होने के कारण वीणा के दण्डे की तरह मुडकर पड रहा। सेठ की लडकी भी उसके चरणो म बैठ रही। बोधिसत्त्व ने सेठ की लडकी को कुबडे के चरणो में बैठे देख, पहचान कर, पास आ, सेठ की लडकी से वार्तालाप करते हुए पहली गाथा कही—

एकचिन्तितोय अयमत्थो बालो अपरिनायको, नहि खुज्जेन वामेन भोति सङ्गन्तुमरहसि ॥

[ यह (कुबडे के साथ भागने की बात) एक देशी चिन्ता है। (कुबडा) मूर्ख है, जाने में असमर्थ है। कुबडे बौने के साथ आपका जाना उचित नही।]

एकचिन्तितोव अयमत्थो, अम्म ! यह जो तू सोचकर इस कुबडे के साथ निकल भागी यह बात तेरी अकेली को ही सोची होगी। बालो अपरिनायको यह कुबडा मूर्ख है, दुर्बुद्धि होने से बढा होने पर भी बाल ही है। दूसरा पकड कर ले जाने वाला न होने पर जाने मे असमर्थ होने से अपरिनायक। नहि खुज्जेन वामेन भोति सङ्गन्तुमरहसि, इस कुबडे के साथ, वामनरूप होने से बौने के साथ, तुम्हें जो महान् कुल मे उत्पन्न हुई हो, सुन्दर हो, दर्शनीय हो जाना योग्य नहीं।

उसकी इस बात को सुनकर सेठ की लडकी ने दूसरी गाथा कही—

पुरिसूत्तम मञ्ञमाना अह खुज्जमकामयि, सोय सकुदितो सेति छिन्नतन्ति यथा घुणा ॥

[ मैने कुबडे को पुरुषो म वृषभ समझ कर उसकी इच्छा की। यह तार टूटी वीणा की तरह सुकदा हुआ पडा है।]

[विकण्णक ] ४११ आर्ये ! मैने एक साड को देखकर सोचा कि बैलों म जो ज्येष्ठ होता हैं उसकी पीठ पर एक ककुध होता है। इसकी पीठ पर भी यह है। इसलिए यह पुरुष म वृषभ होगा। इस प्रकार मैने इस कुबडे को पुरुष-वृषभ मान कर इसकी इच्छा की। यह तो जैसे, तार टूटा तूमडी सहित वीणा-दण्ड हो वैसे मुडा हुआ पडा है। बोधिसत्त्व यह जान कि यह अज्ञान के ही कारण घर से निकल पडी, उसे नहला, अलङ्कृत कर, रथ पर चढ़ा कर ल गय। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय यही सेठ की लडकी थी। बाराणसी-सेठ तो मैं ही था। २३३. विकण्णक जातक "कामं मंहि इच्छसि तेन गच्छ " यह शास्ता ने जेतवन म विहार करते समय एक उत्कण्ठित भिक्षु के बारे मे कही। क. वर्तमान कथा वह धर्मसभा म लाया गया। शास्ता ने पूछा—भिक्षु, क्या तू सचमुच उत्कण्ठित है ? 'सचमुच' कहने पर पूछा—किस कारण से उत्कण्ठित है ? बोला—कामुकता के कारण। शास्ता ने उसे कहा—भिक्षु, कामुकता तीखे शल्य की तरह है। एक बार हृदय में प्रविष्ट होने पर तीर लगे मगरमच्छ की तरह मार ही डालती है। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—