जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
उदञ्चनि ] ६ [ जगल में हवा से बहुत सारी दुर्बल लकड़ी टूटकर गिरती है । हे नाग ! यदि तू इससे डरेगा, तो तू निश्चय से कमज़ोर हो जायगा । ] एतं दुब्बलं कट्ठ, पुरवा आदि वांतो भञ्जति, यह इस जगल मे बहुत सुलभ है, जहाँ तहाँ है, यदि तू उससे भायसि, तो ऐसा होने पर तो नित्य ही भयभीत रहने के कारण रक्त-मास क्षीण होकर विसो नून भविस्ससि; इस बन में तेरे भयभीत होने की बात है ही नही, इस लिये अब से मत डर । इस प्रकार देवता ने उसे उपदेश दिया । वह भी उस समय से लेकर निर्भीत हो गया । शास्ता ने इस धर्मोपदेश को ला, चारो आर्य-(सत्यो) को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया । सत्य प्रकाशित होने पर यह भिक्षु श्रोतापत्तिफल में प्रतिष्ठित हुआ । उस समय हाथी तो यह भिक्षु था, वृक्ष-देवता में ही था ।
१०६. उदञ्चनि जातक "सुख बत मं जीवन्त" आदि शास्ता ने जेतवन मे रहते समय 'प्रौढ कुमारी के साथ आसक्ति' के सम्बन्ध में कही । क. वर्तमान कथा मूल कथा (=वस्तु) तेरहवें परिच्छेद की चूल नारद काश्यप¹ जातक में आयेगी । उस भिक्षु से शास्ता ने पूछा—"भिक्षु ! क्या तू सचमुच आसक्त है ?"
¹ चूलनारदजातक (४४७)
कारण सुख को प्राप्त हुआ।" कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
१० [ १११२०६ "भगवान् ! सचमुच ।" "तुझे किसमें आसक्ति हुई ?" "एक प्रौढ कुमारी में।" "भिक्षु ! यह तेरे लिये अनर्थकारी है। पहले जन्म में भी तू इसी के कारण सदाचार भ्रष्ट हो कांपता हुआ भटकता था। (फिर) पंडितो के कारण सुख को प्राप्त हुआ।" कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा "पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय" आदि पूर्व समय की कथा भी चुल्ल नारद कस्सप जातक में ही आयेगी। उस समय बोधिसत्त्व ग्राम को फल फूल ले आकर पर्ण-शाला में प्रवेश करके विचरने लगे और अपने पुत्र चुल्लतापस को कहा— "तात ! और दिन तो तुम लकडी लाते थे, पेय तथा खाद्य-सामग्री लाते थे, आग जलाते थे। आज क्या कारण है कि कोई भी काम न करके बुरा मुंह बनाये चिन्तित पडे हो ?" "तात ! आप जब कल फल फूल लेने चले गये थे, तब एक स्त्री आई जो मुझे लुभाकर ले जाना चाहती थी। लेकिन मैं 'आपसे आज्ञा लेकर जाऊँगा' सोच नहीं गया। उसको अमुक स्थान में बिठाकर आया हूँ। तात ! अब मै जाता हूँ।" बोधिसत्त्व ने 'यह रोका नहीं जा सकता' सोच "तो तात ! जाओ ! यह तुम्हे ले जाकर जब मत्स्य-मांस आदि खाने की इच्छा करेगी और घी, नमक तथा तेल आदि मांगेगी और कहगी कि 'यह ला', 'यह ला', तब तू मुझे याद करना और भागकर यहाँ आ जाना" कह चलता किया। वह उसके साथ बस्ती में गया। उसे अपने वश में कर वह 'मांस ला', 'मछली ला' जो जो चाहती, मँगाती। तब उसने 'यह तो मुझे अपने गुलाम की तरह नौकर की तरह पीडा देती है' सोच भागकर पिता के पास आ, उन्हें प्रणाम कर, खडे ही खडे यह गाथा कही— सुख बत म जीवन्त पचमाना उदञ्चनी, घोरी जायप्पवादेन तेल लोणञ्च याचति ॥
उदञ्चनि ] ११ [ जल निकालने की मटकी सदृशा “भार्या” रूप में यह चोरिणी, सुख पूर्वक रहते हुए मुझे मीठे शब्दों से लुभाकर नून तेल माँग माँगकर जलाती है।] सुख घट म जीवन्त, तात ! तुम्हारे पास सुखपूर्वक रहते हुए, पचमाना, संतप्त करती हुई, पीडा देती हुई, जो जो खाना चाहती वह पकाती, उदकं (=पानी) खींचा जाता है इस से, अत उदञ्चनी । चाटी या कुएँ से पानी निकालने की घटी । उसे उदञ्चनी इसलिये कहा क्योकि वह घटी (= घटिया) के पानी निकालने की तरह जो जो चाहती सो अवश्य निकालती । चोरी जाप्यवादेन; “नाम से तो 'भार्या' लेकिन एक चौरिणी मीठे मीठे शब्दों से मुझे लुभा वहाँ ले जाकर निमक तेल तथा और भी जो जो चाहती वह सब मांगती, जैसे दास या नौकर से वैसे मँगवाती । (यह) कह उसकी निन्दा की । बोधिसत्व ने उसे आश्वासन देकर “तात ! जो हुआ सो हुआ । आ अब तू मैत्री भावना कर । करुणा भावना कर ।” कह चारो ब्रह्मविहारो को कहा । योगक्रिया कही । वह थोडे ही समय मे अभिञ्ज्ञा तथा समापत्तियो को प्राप्त कर, ब्रह्मविहारो की भावना कर, अपने पिता सहित ब्रह्मलोक मे उत्पन्न हुआ । शास्ता ने इस धर्म-देशना को ला, आर्य-सत्यो को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया । सत्यो के प्रकाशित होने पर वह भिक्षु श्रोता- पत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ । उस समय की प्रौढ कुमारी ही आजकल की प्रौढकुमारी तथा चूलतापस ही आसक्त भिक्षु था । पिता तो मै था ही ।
१०७. सालित्त जातक
१२ [ १.११.१०७ १०७. सालित्त जातक “साधु खो सिप्पक नाम” आदि शास्ता ने जेतवन में रहते समय एक हंस-मार भिक्षु के बारे में कही। क. वर्तमान कथा वह श्रावस्तीवासी कुलपुत्र सालित्तक शिल्प में पारङ्गत था। सालित्तक शिल्प कहते हैं ठीकरी चलाने के हुनर को। एक दिन उसने धर्मोपदेश सुन, बुद्ध (-शासन) म श्रद्धायुक्त हो प्रव्रजित होकर उपसम्पदा प्राप्त की। लेकिन न उसे शिक्षा की इच्छा थी न उसके अनुसार आचरण करने की। एक दिन वह एक छोटे भिक्षु को साथ ले अचिरवती (नदी) पर गया। वहाँ स्नान करके खडा था कि, उसी समय आकाश में दो सफेद हंसो को उडते देखा। उसने छोटे भिक्षु से कहा— “इनमे जो पिछला हंस है, उसकी आँख को ककर से वींधकर हंस को अपने पैरो में गिराता हूँ।” “कैसे गिरायेगा ? मार ही न सकेगा।” “इधर की आँख रहे। मै इसकी उधर की आँख में मारूँगा।” “असम्भव बात कहते हो ?” “तो देख” कह उसने एक तीखी ठीकरी ले उँगली से तान उस हंस के पीछे फेंकी। ठीकरी ने रुँ करके आवाज की। हंस “खतरा होगा” सोच, रुककर शब्द सुनने लगा। उसने उसी समय एक गोल ककर ले, रुककर देखते हुए हंस के दूसरी ओर की आँख में मारा। ककर दूसरी ओर की आँख बींधता गया ! हंस भिल्लाता हुआ पैरो में आकर गिरा। भिक्षुओं ने इधर उधर से आकर उसकी निन्दा की कि “तू ने नामुना- सिव किया' और शास्ता के पास लेजाकर कह दिया कि 'इसने यह यह किया।'
में हुशियार है, बल्कि पहले भी हुशियार ही था" कह पूर्वजन्म की कथा कही—
सालित्त ] १३ शास्ता ने उसकी निन्दा करते हुए "भिक्षुओ ! न केवल अभी यह इस हुनर में हुशियार है, बल्कि पहले भी हुशियार ही था" कह पूर्वजन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में बाराणसी में राजा ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधि- सत्त्व उसके आमात्य (होकर उत्पन्न हुए) थे। राजा का तत्कालीन पुरोहित बडा बुलक्कड था—बोलना आरम्भ करता तो किसी दूसरे को बोलने का मौका ही न मिलता। राजा सोचने लगा—'इसका मुंह बन्द करनेवाला कोई कब मिलेगा ?" और तब से ऐसे आदमी की खोज मे रहने लगा। उन दिनो वाराणसी में एक कुबडा ककर फेकने के हुनर मे पारगत था। गाँव के लडके वाले उसे ठेले (रथक) पर चढा खीच कर, वाराणसी नगर के दरवाजे पर शाखाग्रो से युक्त एक महान्न्यग्रोध (वृक्ष) के नीचे ले आते, और उसे घेर कर तथा कौडी आदि दे कहते "हाथी की शक्ल बनाओ । घोडे की शक्ल बनाओ।" वह ककर चला चलाकर न्यग्रोध के पत्तो में भिन्न भिन्न तरह की शक्लें बनाता। सभी पत्तो में छेद हो गये। वाराणसी नरेश सैर को जाते समय उस जगह आये। भगा दिये जाने के भय से लडके वाले भाग गये। कुबडा वही पड रहा। राजा ने न्यग्रोध वृक्ष के नीचे रथ पर बैठे ही बैठे, छिद्रित पत्तो के कारण धूप-छनी छाया देख, सभी पत्तो को छिद्रित पा पूछा—ऐसा किसने किया ?" "देव ! कूबडे ने।" 'यह ब्राह्मण का मुंह बन्द कर सकेगा' सोच राजा ने पूछा—"कुबडा कहाँ है ?" खोज करनेवालो ने कुबडे को वृक्ष की जड में पडे देख कहा "देव ! यहाँ है।" राजा ने उसे बुलवा, लोगों को दूर हटवा, उस से पूछा—"हमारे यहाँ एक बुलक्कड ब्राह्मण है, क्या तू उसे निश्शब्द कर सकेगा ?" "देव ! यदि नलकी भर बकरी के मेगन मिले तो कर सकूँगा।" राजा कुबडे को घर ले गया, और कनात के भीतर बैठाया। (फिर) कनात में एक छेद कर ब्राह्मण के बैठने का आसन उस छेद की ठीक सीध में
१४ [ १.११.१०७ बिछवाया । नलकी भर बकरी की सूखी मींगन कुबड़े के पास रखवा दी । जिस समय ब्राह्मण हजूरी मे आया, उसे उस आसन पर बिठाना, राजा ने बात चीत चलाई । किसी दूसरे को बोलने का अवसर न दे, ब्राह्मण ने राजा से बोलना शुरू किया । बनात के छेद मे से मक्खी डालने की तरह वह कुबड़ा एक एक मींगन ब्राह्मण के तालु के अन्दर गिराता रहा । नलिया मे तेल डालने की तरह ब्राह्मण जो जो मींगनें आती उन्हें निगल जाता । सब खतम हो गईं । उसके पेट में गई नलकी भर बकरी की मींगनें आधे आळ्हक१ भर थी । राजा ने उन्हें खतम हुआ जान कहा—"आचार्य ! अति भुलक्कड़ होने के कारण आपको नलकी भर बकरी की मीगने निगल जाने पर भी पता नहीं लगा । अब इससे अधिक हजम न कर सकोगे । जाओ कगनी या पानी पीकर इन्हें निकाल अपने को स्वस्थ करो ।" उस दिन से मानो ब्राह्मण का मुख सिल गया । बातचीत करनेवाले के साथ भी बातचीत न करता । 'इसने मुझे कर्ण-सुख दिया है' सोच राजा ने कुबड़े को चारो दिशा मे लाख की आमदनी के चार गाँव दिये । बोधिसत्व ने राजा के पास आ 'देव ! बुद्धिमान् आदमी को हुनर सीखना चाहिए । कुबड़े ने केवल कंकर फेंकने (की कला से) भी सम्पत्ति पैदा कर ली' कह, यह गाथा कही— साधु खो सिप्पकं नाम अपि यादिसकीदिसं, पस्स खज्जप्पहारेन लद्धा गामा चतुद्दिशा ॥ [जैसा कैसा भी हो, हुनर सीखना अच्छा है । देखो ! कुबड़े ने (मींगनो के) फेकने (के हुनर) से ही चारो दिशाओ में गाँव पा लिये ।] पस्स खज्जप्पहारेन, महाराज ! देखो इस कुबड़े ने बकरी की मींगन के निशाने लगाने मात्र से ही चारो दिशाओ में चार गाँव पा लिये । अन्य शिल्पो की महिमा का तो क्या ही कहना—इस प्रकार हुनर सीखने की महिमा का वर्णन किया । १ १६ पसत=एक आळ्हक ।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला, जातक का मेल बैठाया। उस समय
बाहिय ] १५ शास्ता ने यह धर्मदेशना ला, जातक का मेल बैठाया। उस समय का कुबडा यह भिक्षु है। राजा आनन्द है। और पण्डित मन्त्री तो मैं ही हूँ। १०८. बाहिय जातक “सिक्खेय्य सिक्खितब्बानि...” को शास्ता ने वैशाली के आश्रित महावन की कूटागार शाला मे रहते समय एक लिच्छवि के सम्बन्ध से कहा। क. वर्तमान कथा वह लिच्छवि राजा श्रद्धाप्रसन्न था। उसने भिक्षुसंघ सहित बुद्ध को अपने घर निमन्त्रित कर महादान दिया। उसकी भार्या मोटी, सूजी हुई सी थी और उसको सलीके से रहने का शऊर नही था। शास्ता भोजनोपरान्त दानानुमोदन कर, विहार जा भिक्षुओ को उपदेश दे, गन्धकुटी में प्रविष्ट हुए। धर्मसभा मे भिक्षुओ ने बातचीत चलाई—'आयुष्मानो ! वह लिच्छवि-नरेश तो इतना सुन्दर है, लेकिन उसकी भार्या मोटी, सूजी हुई सी है तथा उसे सलीके से रहने का शऊर नहीं। राजा उसके साथ कैसे रहता है ?” शास्ता ने आकर पूछा— "भिक्षुओ ! इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?” "यह बातचीत" कहने पर शास्ता ने "भिक्षुओ ! न केवल अभी, किन्तु पहले भी यह मोटे शरीरवाली स्त्री के साथ ही रहता था" कह, उनके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा "पूर्व समय में वाराणसी में जब ब्रह्मदत्त राज्य करता था, उस समय बोधिसत्व उसके आमात्य थे। मुफस्सल की एक स्थूल शरीर स्त्री जिसे
१६ [ १.११.१०८
सलीक़ा नही था, मजदूरी करती थी। राजाङ्गन से थोड़ी दूर पर जाते हुए उसे शौच की हाजत हुई। जो वस्त्र पहने हुए थी, उसी से शरीर को ढक कर बैठ गई और हाजत रफ़ा कर तुरन्त उठ खड़ी हुई। झरोखे से राजाङ्गण देखते हुए वाराणसी राजा की उस पर नजर पड़ी। वह सोचने लगा—"इस प्रकार के (खुले) प्राङ्गन में बिना लज्जा को छोड़े वस्त्र से ढके ही ढके, शौच फिरकर यह जल्दी से खड़ी हो गई। यह निरोग होगी। इसकी कोख अति परिशुद्ध होगी। परिशुद्ध-कोख से उत्पन्न हुआ पुत्र भी अति पवित्र तथा पुण्यवान् होगा। मुझे चाहिए कि मैं इसे अपनी पटरानी बनाऊँ।"
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय के
कुण्डकपूव ] १७ इस प्रकार बोधिसत्व ने सीखनेयोग्य शिल्पो (के सीखने) का माहात्म्य कहा। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय के पति-पत्नी ही अब के पति-पत्नी। पण्डित अमात्य तो मैं ही था। १०६. कुण्डकपूव जातक “ययन्नो पुरिसो होति” यह शास्ता ने श्रावस्ती में रहते समय, एक महा दरिद्र (मनुष्य) के सम्बन्ध से कही। क. वर्तमान कथा श्रावस्ती म कभी एक ही परिवार बुद्ध तथा उनके सघ को दान देता, कभी तीन चार परिवार एक मे मिलकर, कभी एक गण, कभी एक गली के लोग, कभी सारे नगर के लोग मिलकर। उस समय एक गली के लोग मिलकर दान दे रहे थे। मनुष्य बुद्ध तथा सघ को यवागु परोसकर कहने लगे “खाजा लाभो।” उस गली में रहनेवाले, दूसरो की मजदूरी करके जीनेवाल, एक दरिद्र मनुष्य ने सोचा—"में यवागू नही दे सकता। खाजा दूँगा।" (यह सोच) उसने चावल की बहुत बारीक कनखी ले, छाज से फटक कर पानी से भिगो, आक के पत्तो में रख, भाग मे पकाया। फिर 'यह बुद्ध को दूंगा' सोच उसे ले जाकर शास्ता के सामने खडा हुआ। (लोगो ने) 'खाजा लाभो' पहली बार कहा ही था कि उसने सबसे पहले जाकर शास्ता के सामने वह पूडा रख दिया। शास्ता ने औरो के दिये हुए खाजो को अस्वीकार कर उसी पूडे-खाजे को ग्रहण किया। उसी समय सारे नगर में एक शोर मच गया कि सम्यक् सम्बुद्ध ने उस महादरिद्र का खाना बिना घृणा के खाया। २
१८ [ १.११.१०६ राजा, राजा के महामन्त्री आदि, और तो और द्वारपाल तक आकर शास्ता को प्रणाम कर उस महादरिद्री से कहने लगे—"भो ! सौ लेकर, दो सौ लेकर या पांच सौ लेकर हमारा भी हिस्सा रक्खो ।" उसने 'शास्ता से पूछकर जाऊंगा' सोच शास्ता के पास जाकर यह बात कही । शास्ता ने उत्तर दिया "धन लेकर या बिना लिये जैसे भी हो सब प्राणियो को हिस्सेदार बनाओ । उसने धन लेना प्रारम्भ किया। मनुष्यो ने दुगुना, चौगुना, आठ गुना आदि दे देकर नौ करोड सोना दिया । शास्ता दानानुमोदन कर विहार चले गये । फिर भिक्षुओं के अपना अपना कर्त्तव्य करने पर शास्ता ने उन्हें उपदेश दे गन्धकुटी मे प्रवेश किया । शाम को राजा ने उस महादरिद्री को बुलवाया और श्रेष्ठी बना उसका सत्कार किया। धर्म-सभा मे भिक्षुओ ने बातचीत चलाई—"आयुष्मानो ! महान् दरिद्री के दिये हुए पूए, शास्ता ने बिना घृणा प्रगट किये ऐसे खाये जैसे अमृत । महान् दरिद्री भी बहुत सा धन और सेठ का पद प्राप्त कर बहुत सम्पत्तिशाली हो गया । शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ ! बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?" "अमुक बातचीत" कहने पर 'भिक्षुओ ! न केवल अभी मैने बिना घृणा दिखाये उसके पूए खाये बल्कि पहले जब मै वृक्ष-देवता था तब भी खाये थे" कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय म वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य के समय बोधिसत्व अरण्डी के एक वृक्ष पर वृक्ष-देवता होकर पैदा हुए । उस गांवडे के मनुष्य तब देवता- विश्वासी¹ थे । एक त्योहार आने पर उन्होने अपने अपने वृक्ष-देवताओ को बलि दी । एक दरिद्री मनुष्य ने लोगो को वृक्ष-देवताओ की सेवा करते देख स्वय एक अरण्ड-वृक्ष की सेवा की । मनुष्य अपने अपने देवताओ के लिये
¹देवता मङ्गलिका, जिनका विश्वास हो कि देवताओ की पूजा करने से कल्याण होगा ।
कुण्डकपूव ] १६ नाना प्रकार के माला, गन्ध, लेपन आदि और खाद्य-भोज्य लेकर गये । लेकिन यह ले गया भूरे के पूए और कड्छी में पानी। अरण्ड-वृक्ष के समीप पहुँचा तो सोचने लगा—"देवता दिव्य-भोजन करते हैं। मेरे देवता यह घूरे का पूआ नहीं खायेंगे। इसे व्यर्थ क्यों नष्ट करें ? मैं ही इसे खा लूँगा।" यह सोच वहीं से लौट पड़ा। बोधिसत्त्व ने वृक्ष की शाखा पर खड़े होकर कहा—"भो ! यदि तुम धनी होते तो मुझे मधुर खाजा देते, लेकिन तुम दरिद्र हो। मैं तुम्हारा पूआ न खाकर और क्या खाऊँगा ? मेरे हिस्से को नष्ट न करो।" इतना कह यह गाथा कही— ययन्नो पुरिसो होति तथन्ना तस्स देवता, आहरेतं फणं पूर्व मा मे भागं विनासय ॥ [ जैसा आदमी, वैसा देवता । इस घूरे के पूए को ला । मेरे हिस्से को नष्ट मत कर।] ─── ययन्नो, जैसा भोजन, तथन्ना, उस आदमी का देवता भी वैसे ही भोजन का खानेवाला होता है। आहरेत फणं पूवं—इस घूरे के पके पूए को ला । मेरे हिस्से को नष्ट न कर । उसने वापिस लौट बोधिसत्त्व को देख बलि दी। बोधिसत्त्व ने उसमें से सार ग्रहणकर पूछा—"भले आदमी ! तू किस लिये मेरी सेवा करता है ?" "स्वामी ! मैं दरिद्र हूँ। चाहता हूँ कि दरिद्रता से मुक्त हो जाऊँ । इसी लिये सेवा करता हूँ।" "भले आदमी ! चिन्ता मत कर। तूने जो सेवा की है वह कृतज्ञ की, कृत-उपकार को न भूलनेवाले की की है। इस अरण्ड के चारो ओर खजाने से भरे घडे गर्दन से गर्दन मिलाकर रक्खे हैं। तू राजाको कह, गाड़ियों में धन लदवाकर राजाङ्गण में डलवा। राजा प्रसन्न होकर तुझे श्रेष्ठी का पद दे देगा।" यह कहकर बोधिसत्त्व अन्तर्धान हो गये। उसने वैसा ही किया। राजा
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला, जातक का मेल बैठाया। उस समय जो
२० [ १.११.११० ने उसे सेठ के पद पर नियुक्त किया। इस प्रकार वह बोधिसत्त्व (की कृपा) से महासम्पत्तिशाली हो स्वकर्मानुसार परलोक गया। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला, जातक का मेल बैठाया। उस समय जो दरिद्र था, वही इस समय दरिद्र। अरण्ड-वृक्ष का देवता तो मै ही था। ११०. सब्ब संहारक पञ्हो “सब्ब संहारको नत्थि”—यह सब्बसहारकपञ्ह (जातक) सारी की सारी उम्मग्ग जातक¹ में प्रगट होगी। महाउम्मग जातक (५४६)
“हंसी त्वं मञ्जसि” यह गद्रभपञ्ह (जातक) भी उम्मग जातक¹ म
पहला परिच्छेद १२. हंसी वर्ग १११. गद्रभ पञ्हो “हंसी त्वं मञ्जसि” यह गद्रभपञ्ह (जातक) भी उम्मग जातक¹ म ही आयेगी । ११२. अमरादेवी पञ्ह “येन सत्तुकिलङ्गा च” यह अमरादेवी पञ्ह (जातक) भी वही (उम्मग जातक¹ में) आयेगी । ११३. सिगाल जातक “सद्दहासि सिगालस्स...”यह गाथा शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय देवदत्त के बारे में कही । १ उम्मग जातक (५४६)
क. वर्तमान कथा
२२ [ १.१२.११३ क. वर्तमान कथा उस समय धर्म-सभा में बैठे हुए भिक्षु बातचीत कर रहे थे—'आयुष्मानो ! देवदत्त पाँच सौ भिक्षुओं को लेकर गयाशीर्ष चला गया। वहाँ जाकर उसने उन भिक्षुओं को कहा कि श्रमण गौतम जो करता है वह धर्म नहीं है बल्कि जो मैं करता हूँ वह धर्म है। इस प्रकार उन्हें अपने मत का बना, यथास्थान झूठा आचरण कर संघ में फूट डाल एवं सीमा¹ में दो उपोसथ² (-गृह) बना दिए।" यूँ वे देवदत्त के दोष कह रहे थे। भगवान् ने आकर पूछा— "यहाँ बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?" "यह बातचीत ।" "भिक्षुओ ! देवदत्त केवल अभी झूठ बोलनेवाला नहीं। यह पूर्व- जन्म में भी झूठ बोलनेवाला ही रहा है" वह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में राजा ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधि- सत्त्व श्मशान-वन में एक वृक्ष-देवता होकर उत्पन्न हुए। उस समय वारा- णसी में नक्षत्र की घोषणा हुई। मनुष्यों ने यक्षों को बलि देने की इच्छा से चौराहों और दूसरे रास्तों पर मत्स्य-मांस आदि बखेर कर खप्परों में शराब रक्खी। एक गीदड़ आधी रात के समय चुपके से नगर में दाखिल हुआ। मत्स्य- मांस और शराब पीकर व पुन्नाग-वृक्ष के बीच जाकर सो रहा। सोते सोते सूर्य निकल आया। आँख खोलने पर प्रकाश हुआ देख उसने सोचा— "अब मैं नगर से निकल नहीं सकता।" इसलिए वह रास्ते के पास जाकर छिपकर लेट रहा। दूसरे मनुष्यों को आते-जाते देख वह कुछ नहीं बोला, लेकिन एक ब्राह्मण को मुँह धोने के लिये जाते देख उसने सोचा—"ब्राह्मण ¹ सीमित-प्रदेश। ² जहाँ भिक्षु एकत्र हो सांघिक-कृत्य करते हैं।
सिगाल ] २३ धन के लोभी होते हैं। मैं ऐसा उपाय करूँ कि यह ब्राह्मण मुझे अपनी चादर में छिपा, गोद में ले जाकर नगर से बाहर कर दे।" उसने मनुष्य-भाषा में कहा—"ब्राह्मण।" ब्राह्मण ने लौटकर पूछा—"मुझे कौन बुला रहा है ?" "ब्राह्मण ! मैं।" "किस कारण ?" "ब्राह्मण, मेरे पास दो सौ कार्षापण हैं। यदि मुझे गोद में ले चादर से ढक जिससे कोई न देखे, इस प्रकार नगर से निकाल सके, तो मैं तुझे यह कार्षा- पण दे दूंगा।" धन के लोभ से ब्राह्मण 'अच्छा' कह स्वीकार कर, उस गीदड़ को वैसे ले नगर से निकल थोड़ा आगे गया। गीदड़ ने पूछा—'ब्राह्मण यह कौन सी जगह है ?" "अमुक जगह।" "और भी थोड़ा आगे तक ले चल।" इस प्रकार बार बार कहकर उसे महाश्मशान तक ले जा, वहाँ पहुँचकर कहा—"मुझे यहाँ उतार दे।" ब्राह्मण ने उसे उतार दिया। "अच्छा तो ब्राह्मण चादर फैला।" ब्राह्मण ने धन-लोभ से चादर फैला दी। 'तो इस वृक्ष की जड़ में खोद' कह गीदड़ ब्राह्मण को जमीन खोदने में लगा, उसकी चादर पर चढ़ उसके चारों कोनों तथा बीच में—पाँच जगहों पर . पाखाना कर, उसे लबेड़ श्मशान-वन में दाखिल हो गया। बोधिसत्त्व ने वृक्ष की शाखा पर खड़े हो यह गाथा कही— सद्दहासि सिगालस्स सुरापीतस्स ब्राह्मण, सिप्पिकानं सतं नत्थि कुतो फसता दुवे॥ [ ब्राह्मण ! तू शराब पिए हुए गीदड़ का विश्वास करता है। उसके पास सौ सीपियाँ भी नहीं, दो सौ कार्षापण तो कहाँ होंगे।] सद्दहासि या सद्दहेसि। इसका मतलब है कि विश्वास करता है।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला, जातक का मेल बैठाया।
२४ [ १.१२.११४ सिप्पिकानं सतं नत्थि—इसके पास सौ सीपियां भी नही हैं। कुतो कंससता दुवे दो सौ कार्षापण तो कहाँ होगे। बोधिसत्व यह गाथा कह 'हे ब्राह्मण ! जा अपनी चादर धोकर, स्नान करके अपना काम कर' कह अन्तर्ध्यान हो गए। ब्राह्मण वैसा कर 'हाय ठगा गया' सोचता हुआ चला गया। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला, जातक का मेल बैठाया। उस समय गीदड देवदत्त था। हाँ, वृक्ष-देवता में ही था। ११४. मितचिन्ती जातक “बहुचिन्ती अप्पचिन्ती च” यह गाथा शास्ता ने जेतवन मे विहार करते समय दो वृद्ध स्थविरो के बारे मे कही। क. वर्तमान कथा उन्होने एक जनपद के जगल मे वर्षा-काल बिताकर सोचा कि अब शास्ता के दर्शन के लिए जायेगे, रास्ते के लिये आवश्यक सामग्री तैयार कर 'आज जाते हैं, कल जाते हैं' करते करते एक मास बिता दिया। फिर दुबारा सामग्री तैयार कर 'आज जाते है, कल जाते हैं' करते करते एक मास और बिता दिया। इसी प्रकार अपने आलस्य और निवास-स्थान से मोह होने के कारण तीसरा महीना भी बिता दिया। तीन महीने गुजारकर जेतवन पहुँच, अपने योग्य- स्थान पर पाँच चीवर रख बुद्ध के दर्शनो को गए। भिक्षुओ ने पूछा—“आयु- ष्मानो ! आप बुद्ध की सेवा में बहुत दिन के बाद उपस्थित हुए। इतनी देर क्यो हुई ? उन्होने कारण बताया। उनका यह आलस्य तथा सुस्ती करने
मितचिन्ती ] २५ का स्वभाव भिक्षुओ पर प्रगट हो गया। भिक्षुओ ने धर्म सभा मे उन स्थविरो के आलसी स्वभाव की चर्चा चलाई। शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बात कर रहे थे ?" "यह बातचीत" कहने पर उन स्थविरो को बुलवाकर पूछा— "भिक्षुओ, क्या तुम सचमुच आलसी हो ?" "भन्ते ! सचमुच ।" "भिक्षुओ ! न केवल अभी आलसी हो, पूर्वजन्म में भी आलसी ही थे और निवास-स्थान के प्रति मोह था" कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में राजा ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय वाराणसी नदी में तीन मच्छ थे। उनके नाम थे बहुचिन्ती, अल्प चिन्ती और मित-चिन्ती। वे जगल (की नदी) से वस्ती के पास आ गए। मितचिन्ती ने बाकी दोनो को कहा—"यह वस्ती है। यहाँ सशकित रहने की तथा भय- भीत रहने की जरूरत है। मछुवे लोग नाना प्रकार के मछली पकड़ने के जाल आदि फेंककर मछलियां पकड़ते है। हम जगल को ही चले।" बाकी दोनो जनो ने आलस्य के कारण और लोभ के कारण 'आज चले, कल चलें' कहते हुए तीन महीने गुजार दिए। मछुओ ने नदी में जाल फेंका। बहुचिन्ती और अल्प चिन्ती खाने की चीज को ग्रहण करते हुए आगे आगे जाते थे। वे अपनी मूर्खता के कारण जाल की गन्ध का ख्याल न कर जाल में ही जा फँसे। मितचिन्ती ने पीछे आते हुए जाल की गन्ध सूंघकर समझ लिया कि वे दोनो जाल में जा फँसे। उसने सोचा—इन दोनो आलसी तथा मूर्खों को जीवन-दान दूँ। यह सोच यह बाहर की तरफ से जाल मे घुस जाल फाड कर निकलते हुए की तरह पानी को आलोडते हुए जाल के आगे गिरा; फिर पिछली तरफ से फाडकर निकलते हुए की तरह पानी को आलोडते हुए पिछली तरफ गिरा। मछुओ ने यह समझकर कि मच्छ जाल फाडकर निकल गए जाल के सिरो को खोल फेंक दिया। वे दोनो मच्छ जाल से छूटकर पानी में जा पडे। इस प्रकार मितचिन्ती ने उनके प्राण बचाए। शास्ता ने यह पूर्व-जन्म की कथा कह बुद्ध होने पर यह गाथा कही—
२६ [ १.१२.११५ बहुचिन्ती अप्पचिन्ती च उभो जाले अबज्झरे, मितचिन्ती प्रमोचेसि उभो तत्थ समागता ॥ [बहुचिन्ती और अप्पचिन्ती दोनो जाल में फँस गए। मितचिन्ती ने दोनो को छुड़ा दिया। ये दोनो उसके साथ आ गए ।] बहुचिन्ती, बहुत चिन्तन करनेवाला होने से अथवा बहुत सङ्कल्प-विकल्प वाला होने से बहुचिन्ती नाम हुआ। बाकी दोनो भी इसी प्रकार हैं। उभो तत्थ समागता, मितचिन्ती के कारण प्राण बचाकर वे दोनो फिर पानी मे मितचिन्ती के साथ आ गए। इस प्रकार शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यो को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। (आर्य-) सत्यो की समाप्ति पर स्थविर भिक्षु श्रोतापन्न हुए। उस समय के बहुचिन्ती और अल्प-चिन्ती यह दोनो थे, मितचिन्ती तो मै ही था। ११५. अनुसासिक जातक “यायञ्चमनुसासति .” यह गाथा शास्ता ने जेतवन मे विहार करते समय एक उपदेश देनेवाली भिक्षुणी के बारे में कही। क. वर्तमान कथा यह श्रावस्ती-निवासिनी एक कुल में उत्पन्न हुई थी। जिस समय से प्रव्रजित होकर उपसम्पन्न हुई, उस समय से लेकर वह श्रमण-धर्म मे न लग
अनुसासिक ] २७ चीजो की लोभी होने से नगर के एक ऐसे हिस्से मे जहां दूसरी भिक्षुणियां नही जाती थी, भिक्षा मांगने जाती । मनुष्य उसे बढ़िया भोजन देते । उसने रस तृष्णा के कारण सोचा, यदि दूसरी भिक्षुणियां भी उसी ओर भिक्षा मांगने जाएंगी, तो मेरी प्राप्ति मे फरक पडेगा। इस लिए मुझे ऐसा करना चाहिए, जिसमे दूसरी भिक्षुणियां उधर भिक्षा मांगने न जाएं । वह भिक्षुणियो के निवास-स्थान पर गई और बोली—बहनो ! अमुक जगह पर चण्ड-हाथी है, चण्ड-घोडा है, चण्ड-कुत्ता है। वह खतरनाक जगह हैं। वहाँ पिण्ड-पात के लिए मत जाएं। उसकी बात सुन एक भिक्षुणी ने भी उधर गर्दन निकालकर नही देखा। उसके एक दिन उधर भिक्षा माँगने के समय, जब वह जल्दी से एक घर मे घुसने जा रही थी एक मरखने मेढे ने उसे टक्कर मारकर उसकी जांघ की हड्डी तोड दी । मनुष्यो ने दौडकर उस दो टुकडे हुए जांघ की हड्डी को एक में बाँधा और उसे चारपाई पर लिटाकर भिक्षुणी आश्रम लाए। 'यह दूसरी भिक्षु- णियो को उपदेश देती थी, स्वय उधर जाकर जांघ की हड्डी तुडाकर आई है' कह भिक्षुणियो ने हंसी उडाई। यह बात शीघ्र ही भिक्षु-सघ तक पहुँच गई। एक दिन धर्म-सभा में बैठे हुए भिक्षु उसकी निन्दा कर रहे थे—आयु- ष्मानो ! दूसरो को उपदेश देनेवाली भिक्षुणी स्वय उधर जाकर मरखने मेंढे से जांघ की हड्डी तुडा लाई है। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बात चीत कर रहे हो ?' 'यह बातचीत' कहने पर 'भिक्षुओ, केवल अब ही नही, पहले भी यह दूसरो को तो उपदेश देती रही है, लेकिन स्वय तदनुसार आचरण न करने के कारण दुख भोगती रही है' कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व समय मे वाराणसी मे राजा ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधि- सत्व जगल मे पक्षी की योनि म जन्म ग्रहण कर बडे होने पर सैकडो पक्षियो को ले हिमालय को गए। उनके वहीं रहते समय चण्ड-स्वभाव की एक चिडिया राज-मार्ग में जाकर पडी रहती, वहाँ उसे गाडियो पर से गिरे हुए धान, मूँग आदि के दाने मिलते। उन्हे पाकर वह सोचती कि अब ऐसा उपाय करूँ जिससे
दूसरे पक्षी इधर न आयें। वह पक्षियो को उपदेश देती—राज-मार्ग बड़ा खतरनाक है। हाथी, घोड़े और मरकहे वैलोवाली गाडियां आती जाती है। शीघ्रता से उड़ा भी नही जा सकता। वहाँ नहीं जाना चाहिए। पक्षियो ने उसका नाम अनुशासिका रख दिया। एक दिन वह राजपथ पर चुग रही थी। जोर से आती हुई गाड़ी के शब्द को सुन उसने पीछे मुंह कर देखा। 'अभी दूर है' सोच, चुगती ही रही। हवा के जोर से गाड़ी शीघ्र ही आ पहुँची। वह उड़ न सकी। पहिये से उसके दो टुकड़े हो गए। बोधिसत्त्व ने पक्षियो के लौटने पर उनकी गिनती करते समय उसे न देख कर कहा—अनुशासिका दिखाई नही देती, उसे खोजो। पक्षियो ने खोज करते हुए, उसे राजपथ पर दो टुकड़े हो पड़े देखा। बोधिसत्त्व से आकर निवेदन किया। 'वह दूसरो को जाने से रोकती थी लेकिन स्वयं वहाँ चुगने जाकर दो टुकड़े हुई' कह यह गाथा कही— यायञ्जमनुसासति सय लोलुप्पचारिणी, साय विपक्खिका सेति हता चक्केन साळिका ॥ [ जो दूसरो को उपदेश देती थी लेकिन स्वयं थी लोभी, वह यह चिड़िया पहिये के नीचे आकर पंख-रहित होकर मरी पड़ी है। ] यायञ्जमनुसासतीति, इसमें 'य' केवल दो पदो की सन्धि के कारण है। अर्थ है, जो दूसरो को उपदेश देती है। सय लोलुप्पचारिणी, अपने लोभी स्व- भाव वाली। साय विपक्खिका सेति, वह पंखरहित होकर राजपथ पर पड़ी है। हता चक्केन साळिका, गाड़ी के पहिये से मारी गई चिड़िया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय उप- देश देनेवाली चिड़िया यह उपदेश देनेवाली भिक्षुणी ही थी। ज्येष्ठ-पक्षी तो मैं ही था।