जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर जातक
३०० [ २.५.१६६ इस प्रकार बोधिसत्त्व ब्राह्मण को धर्मोपदेश दे 'मैं भी यहाँ नहीं रह सकता' कह जंगल को गया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यों (का प्रकाशन) समाप्त होने पर उत्कण्ठित भिक्षु स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ। उस समय पोट्ठपाद आनन्द था। राध तो मैं ही था। १६६. गहपति जातक "उभयम्मे न खमति...." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय उत्कण्ठित-चित्त के ही बारे में कही। क. वर्तमान कथा यह कथा कहते हुए शास्ता ने 'स्त्री जाति की हिफाजत नहीं की जा सकती। पाप करके जिस किसी उपाय से स्वामी को ठगती ही हैं' कह पूर्व-जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व ने काशी-राष्ट्र के गृहपति-कुल में जन्म ग्रहण कर बड़े होने पर विवाह किया। उसकी भार्या दुराचारिणी थी; गाँव के मुखिया के साथ दुराचार करती। बोधिसत्त्व जानकर परीक्षा करते हुए रहने लगे। उस समय वर्षा काल में बीजों के बह जाने से अकाल हो गया था। खेती
गहपति ] ३०१ मे दाना पडा। सारे ग्रामवासियो ने मिलकर निश्चय किया कि अब से दो महीने बाद खेत काटकर धान दे देंगे, और गाँव के मुखिया से एक बूढ़ा बैल ले उसका मास खा गए। एक दिन गाँव का मुखिया मौका देख, जिस समय बोधिसत्व बाहर गया था घर में घुसा। उनके सुख से लेटने के समय ही बोधिसत्व ग्राम-द्वार से प्रविष्ट हो घर की ओर हो लिया। ग्राम-द्वार की ओर देखते हुए उस स्त्री ने सोचा, 'यह कौन है ?' फिर देहली पर खडे होकर देखने से जब उसे निश्चय हुआ कि यह वही है, तो उसने मुखिया से कहा। गाँव का मुखिया डर के मारे काँपने लगा। उसने कहा—डर मत। एक उपाय है। हमने तेरा दिया गोमास खाया है। तू मांस का मूल्य उगाहने वाले की तरह हो। मैं कोठे पर चढ काठ के द्वार पर खडी हो कहती हूँ कि धान नहीं है। तू घर के बीच म खडा होकर बार बार उलाहना दे—'हमारे घर मे बच्चे भूखे हैं। मेरे मांस का मूल्य दो।' इतना कह वह कोठे पर चढ कोठे के दरवाजे पर बैठी। मुखिया घर में खडा हो कहने लगा—मांस की कीमत दो। वह कोठे के दरवाजे पर बैठ कहती— धान नहीं है। खेत कटने पर देंगे। जा। बोधिसत्व ने घर में प्रवेश कर उनकी करतूत देख समझ लिया कि इस पापिन ने यह ढग बनाया होगा। उसने गाँव के मुखिया को बुलाकर कहा— "हे ग्राम-भोजक ! हमने तेरे बूढे बैल का मास खाते समय, 'अब से दो महीने बाद धान देंगे' कहकर मास खाया था। अभी आधा महीना भी नहीं गुजरा। तू अभी से क्यो धान लेना चाहता है ? लेकिन तू इस उद्देश्य से नही आया, दूसरे ही उद्देश्य से आया होगा ? मुझे तेरी करतूत अच्छी नही लगती। यह भी दुराचारिणी पापिन जानती है कि कोठे में धान नहीं है। वह अब कोठे पर चढ कहती है—धान नही है। तू भी कहता है—दे। मुझे दोनो की बात अच्छी नही लगती।" इस भाव को प्रकट करते हुए बोधिसत्त्व ने यह गाथाएँ कही— उभयम्मे न खमति उभयम्मे न रुच्चति, या चाय कोट्ठमोतिण्णा न दस्स इति भासति ॥
३०२ [ २.५.१६६ तं तं गामपति ब्रूमि कदरै अप्पस्मि जीविते, द्वे मासे कारुं कत्वान मंसं जरगवं किसं; अप्पत्तकाले चोदेसि तम्पि मय्हं न रुचति ॥ [दोनो मुझे पसन्द नही; दोनो मुझे अच्छे नही लगते। यह जो कोठे पर चढ़ कहती है—(धान) नही दिखाई देते। हे ग्रामपति ! मै यह कहता हूँ कि जीवन इतना कठिन होने पर भी तू बूढे कृष बैल के मास (के मूल्य) का दो महीने का करार करके समय के पूर्व ही उलाहना देता है। यह भी मुझे अच्छा नही लगा ।] तं तं गामपति ब्रूमि भो । ग्राम के मुखिया इस कारण से यह कहता हूँ। कदरे अप्पस्मि जीविते, हमारा जीवन दुःखी है, जड है, रूक्षा है, न्यून है, अल्प है, मन्द है, परिमित है। इस प्रकार के जीवन के होने पर द्वे मासे कारं कत्वान मंसं जरग्गवं किसं हमारे मास लेते समय बूढा, कृष, दुर्बल बैल देते हुए तूने दो महीने की अवधि बांधी थी कि दो महीने मे मूल्य देना। इस प्रकार करार करके, अवधि बांध कर अप्पत्तकाले चोदेसि, उस समय के आने से पूर्व ही दोष लगाता है। तम्पि मय्हं न रुचति यह जो पापिन दुराचारिणी, कोठे में धान नही है जानती हुई अनजान की तरह कोट्ठमोतिण्णा कोठे के द्वार पर खड़ी हो न दस्सं इति भासति। यह भी और यह जो तू असमय माँगता है तम्पि यह दोनो न मुझे पसन्द है, न अच्छा लगता है। इस प्रकार कहते कहते बोधिसत्व ने गाँव के मुखिया को केशो से पकड़, खींच कर घर के बीच में गिराया। "'मैं गाँव का मुखिया हूँ' समझ दूसरो की रखी, हिफाजत की हुई चीज के प्रति अपराध करता है ?" आदि बातो से धपदाब्द कह, पीट कर, दुर्बल कर, गरदन से पकड़ घर से निकाल दिया। उस दुष्ट स्त्री को भी बेणी से पकड़ कोठे से उतार, पीटते हुए डांटा—"यदि फिर ऐसा करेगी, तो जानेगी ?" उसके बाद से गाँव का मुखिया उस घर की ओर नजर भी नही उठा सका। वह पापिन भी फिर मन से भी दुराचार नही कर सकी।
२००. साधुसील जातक
साधुसील ] ३०३ शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों को प्रकाशित किया। सत्यों के अन्त में उत्कण्ठित चित्त भिक्षु सोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ। उस समय ग्राम के मुखिया को ठीक करने वाला गृहपति में ही था।
२००. साधुसील जातक
“सरीरदप्प ” यह शास्ता ने जेतवन म विहार करते समय एक ब्राह्मण के बारे में कही।
क वर्तमान कथा
उस ब्राह्मण की चार लड़कियाँ थीं। व चार प्रकार के आदमियों को चाहती थीं। उनमें से एक सुन्दर शरीर वाले को, एक आयु में बड़े को, एक (ऊँची) जाति वाले को और एक सदाचारी को। ब्राह्मण सोचने लगा ' लड़कियों को (पराए) घर भेजते हुए, उनका विवाह करते हुए उन्हें किसे देना चाहिए ? क्या रूपवान् को ? क्या आयु म बड़े को ? क्या जाति में बड़े को अथवा सदाचारी को ? ' जब सोचने पर भी वह कुछ निश्चय न कर सका तो उसने विचार किया कि इस बात को सम्यक् सम्बुद्ध जानेंगे। उन्हें पूछ कर, इन चारों में जिसे देना उचित होगा उसे दूंगा। वह गन्धमाला आदि लिवा कर विहार गया, शास्ता को प्रणाम कर एक ओर बैठा। उसने आरम्भ से सब बात सुना कर पूछा— “भन्ते ! इन चार जनों में से किसे देना उचित है ?” शास्ता ने कहा— “पहले भी पण्डितों ने तेरे इस प्रश्न का उत्तर दिया था। लेकिन वह पूर्व-जन्म की बात होने से तू उसे नहीं जान सकता।” ऐसा कह उसके प्रार्थना करने पर पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
३०४ [ २.५.२०० ख. अतीत कथा पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व ब्राह्मण-कुल में जन्म ग्रहण कर बड़े हो तक्षशिला गए। वहाँ शिल्प सीख लौट कर वाराणसी में प्रसिद्ध आचार्य्य हुए। एक ब्राह्मण की चार लड़कियाँ थीं। वह इसी प्रकार चार जनो को चाहती थीं। ब्राह्मण ने यह न जानते हुए कि किसे दें सोचा कि आचार्य्य को पूछ कर जिसे देना योग्य होगा, उसीको दूँगा। उसने आचार्य्य के पास जा यह प्रश्न पूछते हुए पहली गाथा कही— सरीरदव्वं वड्ढव्वं सोजच्चं साधु सीलियं ब्राह्मणन्त्वेव पुच्छाम कम्नु तेसं वणिम्हसे ॥ [ शरीर के सौंदर्य्य वाले को, आयु बडी वाले को, जाति बडी वाले को वा सदाचारी को ? हे ब्राह्मण ! तुम्हें पूछते है कि उन्हे किसे दें ? ] सरीरद्वयं आदि से उन चारो में विद्यमान् गुणो का प्रकाशन किया गया है। अभिप्राय यह है—मेरी लडकियाँ चार प्रकार के आदमियो को चाहती हैं। उनमें से एक के पास सरीरदव्वं है, शरीर सम्पत्ति है, सौन्दर्य्य है। एक के पास वढद्वयं वृद्धभाव, ज्येष्ठपन है। एक के पास सोजच्चं अच्छी जाति वाला होना, जाति सम्पत्ति है। सुजच्चं भी पाठ है। एक के पास साधुसीलियं सुन्दर चरित्र वाला होना, सदाचार सम्पत्ति है। ब्राह्मणन्त्वेव पुच्छाम; उनमें से यह अमुक को देनी चाहिए, हम इसका निश्चय न कर सकने के कारण आप ब्राह्मण को ही पूछते हैं। कम्नु तेसं वणिम्हसे उन चार जनो में से किसका वरण करें ? किसकी इच्छा करें ? पूछता हूँ कि वे कुमारियाँ किसे दें ? इसे सुन आचार्य्य ने कहा—"रूप सम्पत्ति आदि विद्यमान रहने,पर भी दु शील निन्दित है। इसलिए वह ठीक नहीं। हमें शीलवान् ही अच्छा लगता है।" इस विचार को प्रकट करने के लिए दूसरी गाथा कही—
साधुसील ] ३०५ अत्यो अत्यि सरीरम्हि वढव्यस्स नमोकरे, अत्यो अत्यि सुजातम्हि सीलं अस्माकरुच्चति ॥ [ शरीर की भी अपनी विशेषता है, ज्येष्ठ को नमस्कार होता है। सुजात की भी विशेषता है; लेकिन हमें तो शीलवान् अच्छा लगता है।] अत्यो अत्यि सरीरम्हि, रूपवान् शरीर में भी अर्थ, विशेषता, उन्नति होती है। नही होती है, नही कहते। वढव्यस्स नमो करे, ज्येष्ठ को हम नमस्कार ही करते हैं। ज्येष्ठ की ही वन्दना होती है। अत्यो अत्यि सुजातम्हि, सुजात पुरुष की भी उन्नति होती है। जाति-सम्पत्ति भी इच्छा करने ही की चीज़ है। सीलं अस्माकरुच्चति, हमें शील ही अच्छा लगता है। शीलवान्, सदाचारी शरीर-सौन्दर्य से रहित भी पूज्य प्रशंसनीय होता है। ब्राह्मण ने उसकी बात सुन सदाचारी को ही लडकियाँ दीं। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यों के अन्त में ब्राह्मण स्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हुआ। उस समय ब्राह्मण यही था; प्रसिद्ध आचार्य्य तो मैं ही था।
२०१. बन्धनागार जातक
\दूसरा परिच्छेद ६. नतंदळ्ह वर्ग २०१. बन्धनागार जातक “न तं दळ्हं बन्धनमाहु धीरा....” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय बन्धनागार के बारे में कही। क. वर्तमान कथा उस समय बहुत से सेंद लगाने वाले, बटमार तथा मनुष्यघातक चोरो को लाकर राजा के सामने पेश किया गया। राजा ने उन्हें बेड़ी से, रस्सी से तथा जंजीर से बँधवा दिया। देहात के तीस भिक्षु शास्ता का दर्शन करने की इच्छा से आए। दर्शन तथा प्रणाम कर चुकने के अगले दिन भिक्षाटन करते हुए वह बन्धनागार पहुँचे। वहाँ चोरों को देख, भिक्षाटन से लौट सन्ध्या के समय शास्ता के पास जा निवे- दन किया—भन्ते ! आज हमने भिक्षाटन करते समय बहुत से चोरो को बेड़ी आदि से बँधे हुए महान् दुःख अनुभव करते देखा। वे उन बन्धनों को काटकर भाग नही सकते। क्या उन बन्धनो से बढकर भी कोई बन्धन है ? शास्ता ने कहा—भिक्षुओ, यह क्या बन्धन है ? यह जो धन-धान्य-पुत्र तथा दारा आदि के प्रति तृष्णा रूपी बन्धन हैं, यह इन बन्धनों से सौ गुणा, हजार गुणा कड़ा बन्धन है। इस प्रकार के अत्यन्त कठिनाई से टूटने वाले महान् बन्धन को भी, पुराने पण्डितो ने तोड कर हिमालय में प्रवेश कर प्रव्रज्या ग्रहण की। इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
=] बन्धनागार ] ख. अतीत कथा पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व एक दरिद्र गृहस्थ के घर में पैदा हुआ। उसके बड़े होने पर पिता मर गया। वह नौकरी करके माता को पालने लगे। उसके अनिच्छा प्रकट करने पर भी उसकी माँ ने उसे एक लड़की ला दी और स्वयं मर गई। उसकी भार्या की कोख में गर्भ रह गया। उसे न मालूम था कि भार्या की कोख में गर्भ है। उसने कहा—'भद्रे ! तू नोक- चाकरी करके अपना पालन पोषण कर, मैं प्रव्रजित होऊँगा। उसने उत्तर दिया—मेरी कोख में गर्भ है। बच्चों को देख कर प्रव्रजि- होना । बोधिसत्त्व ने 'अच्छा' कह स्वीकार किया और उसके बच्चे को जन्म देने पर पूछा—भद्रे ! तूने कुशलपूर्वक बच्चे को जन्म दिया। अब मैं प्रव्रजित होऊँ ? उसने कहा कि जब तक बच्चा स्तन का दूध पीता है, तब तक प्रतीक्ष- करें। इस बीच में वह फिर गर्भवती हो गई। उसने सोचा इसकी रजामन्द- से जाना न हो सकेगा, इसे बिना कहे ही भाग कर प्रव्रजित होऊँगा। वह बिना कहे ही रात को उठकर भाग गया। उसे नगर रक्षको ने पकड़ा। बोधि- सत्त्व ने कहा—'स्वामी ! मैं 'माँ का पोषण करन वाला' हूँ। मुझे छोड़ दें उनसे अपने आपको छुड़ा एक स्थान पर ठहर, मुख्य द्वार से ही निकल बोधिसत्त्व ने हिमालय में प्रवेश किया। वहाँ ऋषियों के प्रव्रज्या क्रम के अनुसार प्रव्रजित हो अभिज्ञा तथा समापत्तियाँ प्राप्त कर ध्यान क्रीडा में रत हो रहने लगा। वहाँ रहते हुए 'ऐसे दुष्करता से तोडे जा सकने वाले पुत्र-दारा के प्रति आसक्ति के बन्धन को भी तोड़ते हैं' उल्लास-वाक्य कहते हुए उसने यह गाथा कही— न तं दळ्हं बन्धनमाहु धीरा, यदायसं दारुज बब्बजञ्च, सारत्तरत्ता मणिकुण्डलेसु, पुत्तेसु दारेसु च या अपेक्खा ॥
३०८ [ २.६ २७ एत दळ्ह बन्धनमाहु धीरा, ओहारिनं सिथिलं दुप्पमुञ्चं, एतम्पि छेत्वान वजन्ति धीरा, अनपेक्खिनो कामसुखं पहाय ॥ [ लोहे के, लकड़ी के या बब्बड़ (की रस्सी) के जो बन्धन हैं, धीर-जन उन्हें (असली) बन्धन नहीं मानते। यह जो मणि में, कुण्डलों में आसक्ति है, यह जो पुत्र-दारा की अपेक्षा है, धीर-जन इन्हें दृढ बन्धन मानते हैं। यह नीचे गिराने वाले हैं, शिथिल हैं और कठिनाई से दूर होते हैं। धीर-जन इन्हें भी छेद कर, काम-भोगों के सुख को छोड़, अपेक्षा रहित हो चल देते हैं । ] धृत्तिमान् को ही धीर । धिक्कार किया पापों को इसलिए धीर । या धी का मतलब है प्रज्ञा, उस प्रज्ञा से युक्त धीर बुद्ध, प्रत्येक-बुद्ध, बुद्ध-श्रावक और बोधिसत्त्व—यह ही धीर हैं। यदायस आदि में य ज़जीर आदि लोहे से बना हुआ आयस, अन्धुबन्धन । बब्बजञ्च, जो बब्बड़-तृण या अन्य वल्कल आदि की रस्सी से बना हुआ रस्सी-बन्धन । तं धीरा दळ्ह, मजबूत नहीं कहते । सारत्तरत्ता, अधिक अनुरक्त होकर आसक्त, बहुत राग से अनुरक्त मणि- कुण्डलेसु, मणि में और कुण्डलों में अथवा मणियुक्त कुण्डलों में । एतं दळ्ह, जो मणिकुण्डलों में अत्यन्त अनुरक्त है, उन्हीं का जो राग है, या उनकी पुत्र-दारा में अपेक्षा है, तृष्णा है, इस बन्धन को ही धीर-जन दृढ़ बन्धन कहते हैं। ओहारिन, निकाल कर चार नरकों में गिराते हैं, उतारते हैं, नीचे ले जाते हैं, इसलिए ओहारिन । सिथिल जहाँ बन्धन पड़ा होता है उस जगह की चमड़ी या मास नहीं छिलता, खून भी नहीं निकलता, 'बन्धन पड़ा हूँ' यह भी पता नहीं लगने देते इसलिए सिथिल। दुप्पमुञ्च, तृष्णा-लोभ रूप से एक बार भी पैदा हुआ बन्धन उसी तरह कठिनाई से पीछा छोड़ता है जैसे एक बार किसीको पकड़ लेने पर कछुवा । एतम्पि छेत्वान, ऐसा दृढ़ बन्धन भी ज्ञानरूपी तलवार से काट कर धीर-जन लोहे की ज़जीर तोड़ने वाले मस्त हाथी की तरह, पिंजरे को तोड़ने वाले सिंह-बच्चे की तरह, वस्तु-कामना तथा वासना को कूड़ा फेंकने के स्थान को घृणा करने की तरह अनपेक्खिनो
केळिसील ] ३०१ होकर कामगुणं पहाय यजन्ति, धन देते हैं। धन देकर, हिमवन्त में प्रविष्ट हो ऋषियों के प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रजित हो ध्यान-सुख में रत रही हूँ।
इस प्रकार बोधिसत्त्व यह उल्लास-वाक्य कह ध्यान-युक्त हो ब्रह्मलोक- गामी हुए। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों का प्रकाशन किया। सत्यों के अन्त में कोई सोतापन्न, कोई सकृदागामी, कोई अनागामी तथा कोई अर्हत् हुए। उस समय माता महामाया थी। पिता शुद्धोदन महाराजा। भार्या राहुलमाता। पुत्र राहुल। पुत्र-दारा को छोड़ निरत कर प्रव्रजित होने वाला पुरुष मैं ही था।
२०२. केळिसील जातक
"हंसा कोञ्चा मञ्जुरा च . ." यह शास्ता ने जेतवन में विहरते समय आयुष्मान् लकुण्टक भद्दिय के सम्बन्ध में कही।
क. वर्तमान कथा
वह आयुष्मान् बुद्ध-शासन में प्रसिद्ध थे, सर्व-विदित थे, मधुर स्वर वाले थे, मधुर धर्मोपदेशक थे, पटिसम्भिदा-ज्ञान प्राप्त थे, महा क्षीणास्रव थे, लेकिन साथ ही वे अस्सी स्थविरों में कद के ठिंगने, श्रामणेर की तरह बौने, खेलने के लिए बनाए खिलौने की तरह छोटे। एक दिन जब वह तथागत को प्रणाम कर जेतवन के कोठे में गए थे, देहात के तीस भिक्षु बुद्ध को प्रणाम करने की इच्छा से जेतवन आए। उन्होंने विहार के दरवाजे पर स्थविर को देख 'कोई श्रामणेर हैं' समझ स्थविर को
३१० [ २.६.२०२ चीवर के सिरे से पकड, हाथो से पकड, सिर से पकड, नाक को रगढ, कान पकड घसीटते हुए, हाथ से गुदगुदी उठाते हुए पात्रचीवर सौंप शास्ता के पास गए। वहाँ शास्ता को प्रणाम कर बैठे। शास्ता ने मधुर-वाणी से कुशल क्षेम पूछा। तब वे बोले— भन्ते ! लकुण्टक भद्दिय नाम के आपके एक शिष्य स्थविर मधुर भाषी धर्मोपदेशक है। वह इस समय कहाँ है ? "भिक्षुओ, क्या उसे देखना चाहते हो ?" "भन्ते ! हाँ।" "भिक्षुओ, जिसे तुम द्वार-कोठे पर देख, चीवर के कोने आदि से पकड हाथ से छेडते हुए आए, वही यह है।" "भन्ते ! इस तरह का प्रार्थी,१ इस तरह का उच्चाभिलाषी२ किस कारण से इतने छोटे आकार का पैदा हुआ ?" "अपने पूर्व-कृत पापकर्म के कारण।" उनके प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्वकाल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व देवेन्द्र शक्र हुए। उस समय ब्रह्मदत्त जीर्ण जरा-प्राप्त हाथी, घोडे वा बैल को नही देख सकता था; देखते ही क्रीडा करने की इच्छा से उसका पीछा करता था। पुरानी गाडी देख कर तुडवा देता, वृद्ध स्त्रियो को देख, उन्हें बुलवा, उनके पेट पर प्रहार दिलवा, उन्हें गिरवा, फिर उठवा डरवाता। वृद्ध आदमियो को देख बाजीगर की तरह कलाबाजियाँ खिलवाता। न दिखाई देने की अवस्था में यदि यह सुन भी लेता कि अमुक घर में वृद्ध मनुष्य है, तो उसे बुलवा कर खेलता। मनुष्य लज्जित होकर अपने अपने माता पिता को विदेशो में भेजने लगे। माता की सेवा, पिता की सेवा का कर्तव्य छूटने लगा। राजसेवक भी क्रीडा- १ जिसने पूर्व-बुद्धों के पास प्रार्थना की। २ जिसने पूर्व-जन्म में ऊँची अभिलाषा से सत्कर्म किए।
[केळिसील ] ३११
प्रिय हो गए। मर मरकर चारो नरक भरने लगे। देव परिषद घटने लगी। शक्र ने नए देवपुत्रो को न देख सोचा कि क्या कारण है ? जब उसे पता लगा तो शक्र ने निश्चय किया कि उसका दमन करूंगा। वह बूढे आदमी की शक्ल बना पुरानी गाडियो पर मट्ठे की दो चाटियां रख दो बूढे बैल जोत एक उत्सव के दिन जब ब्रह्मदत्त अलङ्कृत हाथी पर चढ अलङ्कृत नगर में घूम रहा था, स्वयं चीथडे पहने हुए उस गाडी को हांक कर राजा के सामने पहुँचा। राजा ने पुरानी गाडी को देख कहा—इसे हटाओ। मनुष्यो ने पूछा—देव, गाडी कहां है। दिखाई नही देती। शक्र के प्रताप से गाडी केवल राजा को ही दिखाई देती थी। शक्र ने राजा के पास बार बार आ उसके ऊपर की ओर रथ हांकते हुए राजा के सिर पर एक चाटी फोड दी। राजा भीग गया। उसने दूसरी फोड दी। उसके सिर से इधर उधर से मठा चूने लगा। राजा घबराया, हैरान हुआ, घृणा करने लगा। जब शक्र ने देखा कि राजा घबरा रहा है तो अपने रथ को अन्तर्धान कर शक्र का असली रूप बना वज्र हाथ में ले आकाश में खडे हो कहा—अरे पापी अधार्मिक राजा ! क्या तू बूढा न होगा ? तेरे शरीर पर बुढापा आक्रमण न करेगा ? क्रीडा प्रिय होकर वृद्धो को कष्ट देता है। तेरे एक के कारण यह करतूत करके मरने वाले नरक भर रहे हैं। आदमियो को माता पिता की सेवा करनी नही मिलती। यदि इस कर्म से बाज नही आएगा तो वज्र से तेरा सिर फोड दूंगा। इसके बाद से ऐसा कर्म मत करना। इस प्रकार डराकर, माता पिता के गुण कह, बडो की सेवा का महात्म प्रकाशित कर, उपदेश दे शक्र अपने निवास-स्थान को चला गया। राजा ने उसके बाद वैसा करने का विचार भी नही किया। शास्ता ने यह पूर्व-जन्म की कथा कह अभिसम्बुद्ध हुए रहने पर यह गाथाएं कहीं— हंसा कोञ्चा मयूरा च हत्थियो पसदा मिगा, सब्बे सीहस्स भायन्ति नत्थि कायस्मि तुल्यता ॥ एवमेवं मनुस्सेसु दहरो चेपि पञ्ञवा, सोहि तत्थ महा होति नेव बालो सरीरवा ॥
३१० [ २.६.२०२ चीवर के सिरे से पकड़, हाथो से पकड़, सिर से पकड़, नाक को रगड़, कान पकड़ घसीटते हुए, हाथ से गुदगुदी उठाते हुए पात्रचीवर सौंप शास्ता के पास गए। वहाँ शास्ता को प्रणाम कर बैठे। शास्ता ने मधुर-वाणी से कुशल क्षेम पूछा। तब वे बोले—'भन्ते ! लकण्टक भद्दिय नाम के आपके एक शिष्य स्थविर मधुर भाषी धर्मोपदेशक हैं। वह इस समय कहाँ हैं ? 'भिक्षुओ, क्या उसे देखना चाहते हो ?' "भन्ते ! हाँ।" 'भिक्षुओ, जिसे तुम द्वार-कोठे पर देख, चीवर के कोने आदि से पकड़ हाय से छेड़ते हुए आए, वही यह है।' "भन्ते ! इस तरह का प्रार्थी,१ इस तरह का उच्चाभिलाषी२ किस कारण से इतने छोटे आकार का पैदा हुआ ?" 'अपने पूर्व-कृत पापकर्म के कारण।' उनके प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्वकाल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व देवेन्द्र शक्र हुए। उस समय ब्रह्मदत्त जीर्ण जरा प्राप्त हाथी, घोड़े या बैल को नही देख सकता था, देखते ही क्रीडा करने की इच्छा से उसका पीछा करता था। पुरानी गाड़ी देख कर तुड़वा देता, वृद्ध स्त्रियो को देख, उन्हें बुलवा, उनके पेट पर प्रहार दिलवा, उन्हें गिरवा, फिर उठवा डरवाता। वृद्ध आदमियो को देख बाजीगर की तरह कुलावाजियाँ खिलवाता। न दिखाई देने की अवस्था में यदि यह सुन भी लेता कि अमुक घर म वृद्ध मनुष्य है, तो उसे बुलवा कर खेलता। मनुष्य लज्जित होकर अपने अपने माता पिता को विदेशो में भेजने लगे। माता की सेवा, पिता की सेवा का कर्तव्य टूटने लगा। राजसेवक भी क्रीडा- १ जिसने पूर्व-बुद्धों के पास प्रार्थना की। २ जिसने पूर्व-जन्म में ऊँची अभिलाषा से सत्कर्म किए।
प्रिय हो गए। भर मरकर चारो नरक भरने लगे। देव परिषद घटने लगी। शक्र ने नए देवपुत्रो को न देख सोचा कि क्या कारण है? जब उसे पता लगा तो शक्र ने निश्चय किया कि उसका दमन करूँगा। वह बूढे आदमी की शकल बना पुरानी गाडियो पर मट्ठे की दो चाटियाँ रख दो बूढे बैल जोत एक उत्सव के दिन जब ब्रह्मदत्त अलङ्कृत हाथी पर चढ़ अलङ्कृत नगर में घूम रहा था, स्वय चीथडे पहने हुए उस गाडी को हाँक कर राजा के सामने पहुँचा। राजा ने पुरानी गाडी को देख कहा—इसे हटाओ। मनुष्यो ने पूछा—देव, गाडी कहाँ है। दिखाई नहीं देती। शक्र के प्रताप से गाडी केवल राजा को ही दिखाई देती थी। शक्र ने राजा के पास बार बार आ उसके ऊपर की ओर रथ हाँकते हुए राजा के सिर पर एक चाटी फोड दी। राजा भीग गया। उसने दूसरी फोड़ दी। उसके सिर से इधर उधर से मठा चूने लगा। राजा घबराया, हैरान हुआ, घृणा करने लगा।
३१२ [ २.६.२०३
[ हंस, क्रोञ्च, मोर, हाथी तथा चितकबरा मृग सभी सिंह से डरते हैं। शरीर से बड़ा-छोटा नही होता। इसी प्रकार मनुष्यो में चाहे आयु का छोटा हो लेकिन यदि यह बुद्धिमान् हैं तो वह ही बडा है। बडे शरीर वाला मूर्ख बडा नही होता।]
पसदामिगा, पसद नामक मृग, पसद मृग तथा शेष मृग भी अर्थ है। पसद- मिगा भी पाठ है। पसद मृग अर्थ है। नत्थि कायस्मि तुल्यता, शरीर से बडा छोटा नही है, यदि हो तो बडे शरीर वाले पसद मृग और हाथी सिंह को मार डालें। सिंह हंसादि क्षुद्र शरीर वालो को ही मारे। छोटे ही सिंह से डरें, बडे नही, ऐसा नही है। इसलिए सभी सिंह से डरते है। सरीरवा मूर्ख वडे शरीर वाला होने पर भी बडा नही होता। इसलिए लकुण्टक भद्दिय यद्यपि शरीर से छोटा है, इससे यह न समझो कि वह ज्ञान में भी छोटा हैं।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यो को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यो के अन्त में उन भिक्षुओ में से कोई स्रोतापन्न, कोई सकृदागामी, कोई अनागामी तथा कोई अर्हत हो गए।
उस समय राजा लकुण्टक भद्दिय था। उसके क्रीडा-प्रिय होने से दूसरे क्रीडा-प्रिय हो गए। शक्र मै ही था।
* २०३. खन्धवत्त जातक
“विरूपक्खेहि मे मेत्तं .” इसे शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय एक भिक्षु के बारे में कहा।
क. वर्तमान कथा
स्कन्धवत्त ] ३१३ क. वर्तमान कथा जिस समय वह अग्नि-गृह¹ के द्वार पर लकड़ियां चीर रहा था, पुराने वृक्ष में से एक सांप ने निकल कर उसे पाँव की अँगुलियों में डसा। वह वहीं मर गया। उसके मरने की खबर सारे विहार में फैल गई। धर्मसभा में भिक्षुओं ने बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! अमुक भिक्षु अग्नि-गृह के दरवाजे पर लकड़ियाँ फाड़ता हुआ सर्प से डसा जाकर वहीं मर गया। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ? "अमुक बातचीत।" "भिक्षुओ, यदि वह भिक्षु चारो सर्पराज-कुलो के प्रति मैत्री भावना करता, उसे सर्प न डसता। पुराने तपस्वी भी, जिस समय बुद्ध उत्पन्न नहीं हुए थे उस समय चारो सर्पराज-कुलो के प्रति मैत्री भावना कर, उन सर्पराज-कुलो से जो भय था उससे मुक्त हुए।" इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व काशी राष्ट्र में ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर गृहस्थी छोड़ ऋषियो के प्रब्रज्या क्रम से प्रब्रजित हो, अभिज्ञा तथा समापत्तियाँ प्राप्त कर, हिमवन्त प्रदेश में एक जगह जहाँ गङ्गा का मोड़ था आश्रम बना कर, ध्यान क्रीड़ा में रत हो ऋषिगणो के साथ रहने लग। उस समय नाना प्रकार के सर्प ऋषियों को बाधक होते थे। अधिकांश ऋषि मर जाते। तपस्वियों ने बोधिसत्त्व से यह बात कही। बोधिसत्त्व ने सभी तपस्वियों को इकट्ठा कर कहा—"यदि तुम चारो सर्पराज-कुलो के ¹ जन्ताघर, जिसमें आग जलाकर स्वेद-स्नान लेते थे।
३१४ [ २.६.२०३ प्रति मैत्री भावना करो, तो तुम्हें सर्प नहीं डसेंगे। अब से चारो सर्पराज-कुलों के बारे में इस प्रकार मैत्री भावना करो।" इतना कह यह गाथा कही— विरूपक्खेहि मे मेत्तं मेत्तं एरापथेहि मे, छब्यापुत्तेहि मे मेत्तं मेत्तं कण्हागोतमकेहि च ॥ [ विरूपक्खो के प्रति मे मैत्री-भाव रखता हूँ; एरापथों के प्रति भी मेरी मैत्री है। छब्यापुत्रो के प्रति मेरी मैत्री है और मैत्री है कण्हागोतमो के प्रति ] . विरूपक्खेहि मे मेत्तं, विरूपक्ख नागराज-कुल के प्रति मेरा मैत्री-भाव है। एरापथ आदि में भी इसी प्रकार। यह एरापथ नागराज-कुल, छब्यापुत्त नागराजकुल और कण्हागोतम नगराज-कुल भी नागराज-कुल ही हैं। इस प्रकार चार नागराज-कुल दिखाकर कहा कि यदि तुम इनके प्रति मैत्री-भावना कर सको तो तुम्हें सर्प नहीं डसेंगे, कष्ट नहीं देंगे।, इतना कह दूसरी गाथा कही— अपादकेहि मे मेत्तं मेत्तं दिपादकेहि मे, चतुप्पदेहि मे मेत्तं मेत्तं बहुप्पदेहि मे ॥ [ जिनके पैर नहीं हैं उनसे मेरी मैत्री है, जिनके दो पैर हैं उनसे मेरी मैत्री है, जिनके चार पैर हैं उनसे मेरी मैत्री है और जिनके अनेक पैर है उनसे मेरी मैत्री है।] पहले पद से विशेष रूप से सभी पैर-रहित सर्पों तथा मछलियो के प्रति मैत्री-भावना कही गई। दूसरे पद से मनुष्यो तथा पक्षियो के प्रति। तीसरे से हाथी घोड़े आदि सभी चतुष्पदों के प्रति। चौथे पद से बिच्छु, गूजर, कीडे मकोड़े, मकडी आदि के प्रति।
४ खन्धवत्त ] ३१५ इस प्रकार मैत्री-भावना का क्रम बता अब प्रार्थना-क्रम कहते हुए यह गाथा कही— मा मं अपादको हिंसि मा मं हिंसि दिपादको, मा मं चतुप्पदो हिंसि मा म हिंसि बहुप्पदो ॥ [ जो पैर-रहित है वे मेरी हिंसा न करे, जो द्विपद हैं वे मेरी हिंसा न करें, जो चतुष्पद हैं वे मेरी हिंसा न करें और जो अनेक पैर वाले हैं वे भी मेरी हिंसा न करें । ] मा मं इस प्रकार 'उन पैर-रहित आदि में कोई एक भी मेरी हिंसा न करे मुझे कष्ट न दे' प्रार्थना करते हुए मैत्री-भावना करो—यही अर्थ है। अब सामान्य रूप से भावना-क्रम प्रकट करते हुए यह गाथा कही— सब्बे सत्ता सब्बे पाणा सब्बे भूता च केवला, सब्बे भद्रानि पस्सन्तु मा कञ्चि पापमागमा ॥ [ सभी सत्त्व, सभी प्राणी, सारे के सारे जीव; सभी का कल्याण हो। किसी को दुख न हो।] तृष्णा-दृष्टि के कारण ससार में, पाँच स्कन्धो में आसक्त, विशेष आसक्त होने से सत्ता (सक्ता) । स्वास प्रश्वास कहलाने वाले प्राण के कारण प्राणी । भूत(=जीवित) भावित (जीने वालो) का जन्म होने से भूता। इस प्रकार जानना चाहिए कि वचन-मात्र की ही विशेषता है। सामान्य तौर पर इन सभी पदो का अर्थ सभी प्राणी ही है। केवला सकल, यह सर्व शब्द का ही पर्याय- वाची है। भद्रानि पस्सन्तु, यह सभी प्राणी कल्याण को ही प्राप्त हो । मा कञ्चि पापमागमा, इनमें से किसी एक भी प्राणी को दुख न हो। सभी वैर-रहित ओघ-रहित, सुखी तथा दुख-रहित हो । इस प्रकार सामान्य रूप से सभी प्राणियो के प्रति मैत्री-भावना की बात कह तीनो रत्नो के गुणो की याद दिलाने के लिए कहा—
, ३१६ [ २.६.२०३ अप्पमाणो बुद्धो अप्पमाणो धम्मो अप्पमाणो सङ्घो। सीमित (प्रमाण-सहित) विकारो का अभाव होने से और गुण असीम (अप्रमाण) होने से बुद्ध रत्न असीम (अप्रमाण) है, धर्म, नौ प्रकार¹ का लोकोत्तर धर्म; उसकी भी सीमा नहीं की जा सकती इसलिए असीम (अप्रमाण)। उस असीम (अप्रमाण) धर्म से युक्त होने के कारण सङ्घ भी असीम (अप्रमाण)। इस प्रकार बोधिसत्त्व उन तीनो रत्नो के गुणो को स्मरण करने के लिए कह तथा उन तीन रत्नो के गुणो का असीम होना दिखा सीमित प्राणियो के बारे में बोले— पमाणवन्तानि सिरिसपानि अहिविच्छिका, सतपदी उण्णनाभि सरबूमूसिका । [ रेंगने वाले, सर्प, विच्छू, गूजर, मकड़ी तथा छिपकली—यह सब सीमा वाले हैं।] सिरिसपा, सब दीर्घाकार प्राणियो का यह नाम है। वे सरक कर चलते हैं, वा सिर से चलते हैं, इसीलिए सिरिसपा। अहि आदि उनके स्वरूप का वर्णन किया गया है। तत्थ उण्णनाभि मकड़ी, उसकी नाभि से ऊन सदृश सूत निकलता है, इसलिए उण्णनाभि कहलाती है। सरबू, छिपकली। इस प्रकार बोधिसत्त्व ने 'क्योकि इनके अन्दर जो रागादि है वह सीमा वाले धर्म हैं, इसलिए ये सिरिसप आदि सीमा वाले हैं दिखा तीनो असीम रत्नो के प्रताप से यह सीमा वाले रात दिन रक्षा करे' कह तीनो रत्नो के गुणो का अनुस्मरण करने को कहा। उसके आगे जो कर्तव्य है वह बताने के लिए यह गाथा कही— ¹ चार मार्ग, चार फल तथा निर्वाण।
खन्धवत्त ] ३१७. कता मे रक्खा कता मे परित्ता, पटिक्कमन्तु भूतानि सोहं नमो भगवतो; नमो सत्तन्न सम्मासम्बुद्धानं ॥ [ मैने अपनी हिफाजत कर ली; मैने अपना परित्राण कर लिया। (हानि- कर) जीव दूर हों। मै भगवान् (बुद्ध) को और सात सम्यक् सम्बुद्धो१ को प्रणाम करता हूँ । ] कता मे रक्खा, रत्नत्रय का गुणानुस्मरण कर मैने अपनी रक्षा, हिफा- जत कर ली। कता मे परित्ता मैने अपना परित्राण भी कर लिया। पटिक्कमन्तु भूतानि, मेरा अहित चिन्तन करने वाले प्राणी चले जाएँ, दूर हों। सोहं नमो भगवतो, सो मै इस प्रकार अपनी रक्षा कर पूर्व के परिनिर्वाण को प्राप्त हुए बुद्ध भगवान् को नमस्कार करता हूँ। नमो सत्तन्न सम्मासम्बुद्धानं, विशेष रूप से अतीत के क्रम से परिनिर्वाण को प्राप्त हुए सात बुद्धो को नमस्कार करता हूँ । इस प्रकार नमस्कार करते हुए भी सात बुद्धो का अनुस्मरण करो, (करके) बोधिसत्त्व ने ऋषिगण को यह परित्राण-धर्मदेशना रच कर दी। आरम्भ में दो गाथाओ द्वारा चारो सर्पराज कुलो में मैत्री-भावना प्रकट की होने से, विशेष रूप से तथा सामान्य रूप से दोनो मैत्री-भावनाएँ प्रकट की होने से, यह परित्राण धर्मदेशना यहाँ दी गई है। और कारण खोजना चाहिए। उस समय से ऋषियो का समूह बोधिसत्त्व के उपदेशानुसार चल मैत्री- भावना करने लगा। बुद्ध के गुणो का स्मरण करने लगा। इस प्रकार उनके बुद्ध-गुणो का स्मरण करने ही पर सब सांप चले गए। बोधिसत्त्व भी ब्रह्म- विहारो की भावना कर ब्रह्मलोकगामी हुए। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल वैठाया। उस समय ऋषि-गण बुद्ध परिषद थी। गण का शास्ता तो मै ही था। १ देखो महापदान सूत्र (दीर्घनिकाय) ।