जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
कूटवाणिज ] ३५१
बोधिसत्त्व ने दूसरे से पूछा— “क्या यह सच है ?” "स्वामी ! मैं उसे लेकर गया। चिड़िया के उसे ले जाने की बात सच ही है।” “क्या इस दुनिया में चिड़ियाँ बच्चो को ले जाती हैं ?” “स्वामी ! मैं भी आपसे पूछना चाहता हूँ कि चिड़ियाँ तो बच्चों को लेकर आकाश में नहीं उड़ सकती, तो क्या चूहे लोहे के फाल खा सकते हैं ?” “इसका क्या मतलब है ?” “स्वामी ! मैंने इसके घर में पाँच सौ फाल रक्खे। यह कहता है कि तेरे फालो को चूहे खा गए और ‘यह तेरे फालो को खाने वाले चूहों की मेंगनी है’ वह मेंगनी दिखाता है। स्वामी ! यदि चूहे फालें खाते हैं, तो चिड़ियाँ भी बच्चे ले जाती हैं। यदि नहीं खाते हैं, तो बाज तब भी नहीं ले जा सकते हैं। यह कहता है कि तेरे फाला को चूहं खा गए। उन्होंने खाए, या नहीं खाए— इसकी परीक्षा करें। मेरे मुकदमे का फैसला करें।” बोधिसत्त्व ने सोचा—इसने शठ के प्रति शठता का व्यवहार करके जीतने की बात सोची होगी। उसने कहा—तूने ठीक सोचा है। और यह गाथा कही— सठस्स साठेय्यमिदं सुचिन्तित, पच्चोड्डितं पतिकूटस्स कूट । फालञ्चे खादेय्यु मूसिका, कस्मा कुमारं कुलला नो हरेय्यु ॥ कूटस्स हि सन्ति कूटकूटा, भवति चापि निकतिनो निकत्या । देहि पुत्तकट्ठ फालनट्ठस्स फाल, मा ते पुत्तमहासि फालनट्ठो ॥ [ शठ के प्रति शठता, यह अच्छा सोचा है। कुटिल के प्रति कुटिलता का जाल फैलाया है। यदि चूहे फाल खा जाएँगे, तो चिड़ियाँ बच्चे को क्यों नहीं ले जाएँगी।
कुटिल के प्रति कुटिलता का व्यवहार करने वाले हैं। ठग को भी ठगने वाले होते हैं। हे पुत्र-नष्ट ! जिसकी फाल खोई गई है उसकी फाल दे। तेरे पुत्र को जिसकी फाल नष्ट हुई है, वह न ले जाए।] सठस्स, शठता से, धोखे से कोई ढंग निकाल कर दूसरे का माल खाना चाहिए, ऐसा समझने वाले शठ के प्रति। साठेय्यमिवं सुचिन्तितं, जो यह शठता का व्यवहार सोचा है, सो तूने ठीक सोचा है। पच्चोड्डितं पतिकूटस्स कूट, कुटिल आदमी के प्रति तूने कुटिलता का जाल ठीक फैलाया, उसकी चाल का जवाब दे जाल फैलाने सा ही किया—यही अर्थ है। फालञ्चे अदेय्युं मूसिका, यदि चूहे फाल खाएं। कस्मा कुमारं कुळला नो हरेय्युं, जब चूहे फाल खा जाते हैं तो चिड़ियां क्यो बच्चो को नही ले जाएँगी ? कूटस्स हि सन्ति कूटकूटा, तू समझता है कि मै ही चूहो को फाल खिला देने वाला कुटिल पुरुष हूँ; तेरे जैसे कुटिल पुरुष के साथ कुटिलता करने वाले इस लोक मे बहुत कुटिल है। कुटिल के (भी) कुटिल यह कुटिल के प्रति कुटिलता करने वालो का नाम है। यही कहा गया है कि कुटिल के प्रति कुटि- लता करने वाले है। भवन्ति चापि निकतिनो निकत्या, ठगने वाले को ठगने वाला भी दूसरा आदमी होता है। देहि पुत्तनट्ठ फालनट्ठस्स फालं, भो पुत्र नष्ट-पुरुष ! जिसकी फाल नष्ट हुई है उसकी फाल दे। मा ते पुत्तमहासि फालनट्ठो, यदि इसकी फाल नही देगा, तो यह तेरे पुत्र को ले जाएगा। जिससे यह न ले जाए, इसलिए इसकी फाल दे। “स्वामी ! मैं इसकी फाल देता हूँ। यदि यह मेरा पुत्र दे।" “स्वामी ! मैं देता हूँ यदि यह मेरे फाल दे।” इस प्रकार जिसका पुत्र खोया गया था उसने पुत्र पाया। जिसकी फाल खोई गई थी उसने फाल पाई। दोनो कर्मानुसार गए। शास्ता ने यह धर्मदेशना सुना जातक का मेल बैठाया। उस समय का कुटिल व्यापारी ही कुटिल व्यापारी था। पण्डित व्यापारी ही पण्डित व्यापारी था। मुकद्दमा फैसला करने वाला अमात्य मैं ही था।
२१६. गरहित जातक
गरहित ] ३६१ २१६. गरहित जातक “हिरञ्ञम्मे सुवण्णम्मे...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय एक भिक्षु के बारे में कही, जिसका मन बुद्ध-शासन में नहीं था, जो उत्कण्ठित था। क. वर्तमान कथा इस (भिक्षु) का ध्यान किसी भी बात मे एकाग्र नही होता था। इस अन्यमनस्क हो जीवन बिताते हुए को शास्ता के पास लाए। शास्ता ने पूछा— क्या तू सचमुच उत्कण्ठित है ? “हाँ, सचमुच ।” “किस कारण से ।” “कामासक्ति के कारण ।” “भिक्षु, कामासक्ति की पूर्व समय में पशुओ ने भी निन्दा की है। तू इस प्रकार के शासन में प्रव्रजित हो, जिन कामभोगो की पशुओ तक ने निन्दा की है, उनके कारण क्यो उत्कण्ठित हुआ है ?” इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही— ख. अतीत कथा पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व हिमालय में बानर की योनि में पैदा हुए। एक बनचर ने उसे पकड लाकर राजा को दिया। वह चिरकाल तक राजभवन में रहने के कारण सभ्यता सीख गया। राजा ने उसके सभ्य-व्यवहार से प्रसन्न हो बनचर को बुलाकर आज्ञा दी—इस बानर को जहाँ से पकड़ा है, वही छोड़ आओ। उसने वैसा ही किया।
३६२ [ २.७.२१६ बानरो ने जब सुना कि बोधिसत्त्व आया है, तो उसे देखने के लिए महान् शिला-तल पर इकट्ठे हुए। उन्होने बोधिसत्त्व से कुशल-समाचार की बात कर पूछा—"मित्र, इतने दिन तक कहाँ रहे ?" "वाराणसी मे, राजभवन में।" "कैसे छूटे ?" "राजा ने मुझे खेल करने वाला बन्दर बना, मेरे करतबो से प्रसन्न हो मुझे छोड दिया।" "आप मनुष्य लोको का बरताव जानते हैं। हमें भी कहें। हम सुनना चाहते हैं।" "मनुष्यो की करनी मुझसे मत पूछो।" "कहें। हम सुनना चाहते हैं।" बोधिसत्व ने, "मनुष्य चाहे क्षत्रिय हो, चाहे ब्राह्मण हो, सभी मेरा मेरा करते हैं। वस्तुएँ अस्तित्व में आकर विनष्ट हो जाती हैं, इस अनित्यता को वे नही जानते। अब उन अन्धे मूर्खों की बात सुनो" कह यह गाथाएँ कही— हिरञ्जम्मे सुवण्णम्मे ऐसा रत्तिन्दिवा कथा, दुम्मेधानं मनुस्सानं अरियधम्मं अपस्सतं ॥ द्वे द्वे गहपतयो गेहे एको तत्थ अमस्सुको, लम्बत्थनो वेणिकतो अथो अङ्कितकण्णको; कीतो धनेन बहुना सो तं वितुदते जनं ॥ [ प्रार्यधर्म को न जानने वाले मूर्ख मनुष्य दिन रात यही बातचीत करते रहते हैं—मेरा हिरण्य, मेरा सोना। घर में दो दो जने रहते हैं। एक को मूंछ नही होती। उसके लम्बे स्तन होते हैं, वेणि होती है और कानो में छेद होते हैं। उसे बहुत धन से खरीदा होता है। वह सब जनो को कष्ट देता है।] हिरञ्जम्मे सुवण्णम्मे, यह दीपकमात्र है। इन दो पदो से दसो तरह के रत्न, अगली-पिछली फसल, सब द्विपद तथा चतुष्पदो का ग्रहण कर 'यह मेरा यह मेरा' कहा गया है। ऐसा रत्तिन्दिवा कथा, मनुष्य-लोग रात दिन यही
गरहित ] ३६३ बातचीत करते रहते हैं। ये पञ्च स्कन्ध अनित्य हैं, उत्पन्न होकर विनष्ट हो जाते हैं आदि नहीं जानते हैं। इस प्रकार राने हुए भटकते हैं। दुम्मेधानं अज्ञानियों की अरियधम्म अपस्सतं, बुद्धादि आर्य्यों के धर्म को न देखते हुए लोगो की अथवा नौ प्रकार के निर्दोष लोकोत्तर आर्य धर्म¹ को न देखते हुए लोगों की यही बातचीत होती है, अन्य अनित्यता या दुख की बातचीत उनकी नहीं होती। गहपतयो घर के मालिक। एको तत्थ उन दो घर के मालिकों में से एक अर्थात् स्त्री। वेणिकतो कृतवेणि, नाना प्रकार से जिसने अपने बालों को क्रम से गठिया रक्खा है। अथो भञ्जितकण्णको, वह ही बिंधे हुए कानो वाला, या छिदे हुए कानो वाला। लम्बे कानो के बारे में कहा। कीतो धनेन बहुना, यह मूछ विरहित, लम्बे स्तन वाला, वेणियारी, छिदे कान वाला माना पिता को बहुत धन देकर खरीदा गया, सजा कर, गहने पहना कर, गाडी में बिठा बडी शान-शौकत से घर में लाया गया। सो तं वितुदते जन, यह गृहस्वामी (स्वामिनी) जिस समय रो आता है उस समय से दासो, मजदूरा आदि को 'अरे दुष्ट दास यह नहीं करता है, अरी दुष्ट दासी यह नहीं करती हैं' आदि वचन-रूपी मुखशक्ति से बीधता है। स्वामी की तरह से व्यवहार करता है। इस प्रकार मनुष्यलोक में बहुत अनुचित है—मनुष्यलोक की निन्दा की। यह सुन सभी बन्दरो ने दोनो हाथो से अपने कान जोर से बन्द कर लिए— मत कहें। मत कहे। न सुनने योग्य बात हमने सुनी। इस स्थान पर हमने अनुचित बात सुनी। इसलिए उस स्थान की भी निन्दा कर अन्यत्र चले गए। उस पाषाण-शिला का नाम निन्दित-पाषाण शिला हो गया। शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल बैठाया। सत्यों के प्रकाशन के अन्त में वह भिक्षु सोतापत्तिफल में प्रतिष्ठित हुआ। उस समय के बानर-गण बुद्ध परिषद थी। बानरेन्द्र तो मैं ही था। ¹ चार लोकोत्तर मार्ग + चार लोकोत्तर फल + निर्वाण ।
१२०. धम्मद्ध जातक
३६४ [ २७.२२० १२०. धम्मद्ध जातक “सुख जीवितरुप्पोसि,....” यह शास्ता ने वेणुवन में विहार करते समय बध का प्रयत्न करने के बारे में कही। क. वर्तमान कथा शास्ता ने ‘भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त ने मेरे बध के लिए प्रयत्न किया है, पहले भी किया है, लेकिन त्रासमात्र भी पैदा नहीं कर सका’ कह पूर्व-जन्म की कथा कही। ख. अतीत कथा पूर्व काल में बाराणसी में पायासिपाणी नामका राजा राज्य करता था। काळक नाम का उसका सेनापति था। उस समय बोधिसत्त्व उसीके पुरोहित थे। नाम था धम्मध्वज। राजा के सिर को अलङ्कृत करने वाले नाई का नाम था छत्तपाणी। राजा धर्म-पूर्वक राज्य करता था, लेकिन उसका सेनापति मुकद्दमा का फैसला करता हुआ रिश्वत खाता था। चुगल-खोर रिश्वत लेकर स्वामी को अस्वामी कर देता था। एक दिन मुकद्दमे में हारे हुए आदमी ने बाहें पकड कर रोते हुए, अदालत से निकल राज-सेवा में जात हुए बोधिसत्त्व को देखा। उसने उसके पाँव में गिरकर कहा—‘स्वामी ! तुम्हारे सदृश राजा के अर्थधर्मानुशासक के होते हुए काळक सेनापति रिश्वत लेकर अस्वामी को स्वामी बना देता है, और अपने मुकद्दमे हारने की बात कही।
धम्मट्ठ ] ३६५ बोधिसत्त्व ने मन में करुणा का भाव ला कर कहा—अरे, आ तेरे मुकद्दमे का फैसला करूँगा। यह उसे लेकर मुकद्दमे की जगह गए। जन-समूह इकट्ठा हो गया। बोधिसत्त्व ने उस मुकद्दमे के फैसले को उलटते हुए फिर स्वामी को ही स्वामी बना दिया। जन-समूह ने 'वाह वाह' की। बडा शोर हुआ। राजा ने सुनकर पूछा—यह क्या आवाज है ? 'देव ! धर्मध्वज पण्डित ने एक ऐसे मुकद्दमे का जिसका ठीक फैसला नहीं हुआ था, ठीक फैसला किया है। उसीमें यह 'वाह वाह' हो रही है।" राजा ने सन्तुष्ट हो बोधिसत्त्व को बुलाकर पूछा—'आचार्य ! तुमने मुकद्दमे का फैसला किया ? 'हाँ महाराज ! काळक ने जिस मुकद्दमे का ठीक फैसला नहीं किया, उसका फैसला किया।" "अब से तुम ही मुकद्दमे का फैसला किया करो। मेरे कानो को सुख मिलेगा। जनता की उन्नति होगी।" उसके इच्छा न करने पर भी राजा ने 'प्राणियो पर दया करने के लिए न्याय की गद्दी पर बैठें' प्रार्थना कर राजी किया। तब से बोधिसत्त्व न्याय की गद्दी पर बैठने लगे। स्वामी को ही स्वामी बनाते। उसके बाद से जब काळक को रिशवत न मिलने के कारण लाभ की हानि हुई तो उसने "महाराज ! धर्मध्वज पण्डित आपका राज्य चाहता है" कह राजा और बोधिसत्त्व में भेद पैदा करने की कोशिश की। राजा ने अविश्वास करते हुए मना किया—ऐसा मत कहो। वह बोला— यदि मेरा विश्वास नहीं करते तो उसके आने के समय झरोखे से देखें। तब देखेंगे कि इसने सारे नगर को अपने हाथ में कर लिया है। राजा ने उसके पास मुकद्दमे के लिए आए लोगो को उसीके आदमी समझ विश्वास कर पूछा— सेनापति ! क्या करें। "देव ! इसे मार डालना चाहिए।" "कोई बडा दोष दिखाई न देने पर कैसे मारें ?" "एक उपाय है।" "कौन सा उपाय ?"
३६६ [ २.७.२२० "इसे कोई असम्भव कार्य्य करने के लिए कह कर उसके न कर सकने पर, उस दोष पर दोषी बता मारेंगे।" "कौन सा असम्भव कार्य्य ।" "महाराज, खरगेज भूमि में लगाने पर, देख भाल करने पर उद्यान तो चार साल में फल देता है। आप उसे बुलाकर कहें कि कल हम उद्यान में खेलेंगे। हमारे लिए उद्यान बनाओ। यह न बना सकेगा। तब उसे इस अपराध के कारण मार देंगे।" राजा ने बोधिसत्त्व को बुलाकर कहा—'पण्डित ! पुराने उद्यान में हम बहुत खेले। अब नए उद्यान में क्रीडा करने की इच्छा है। कल क्रीडा करेंगे। हमारे लिए उद्यान बनाएं। यदि न बना सकोगे, तो तुम्हारी जान नही बचेगी।" बोधिसत्त्व समझ गए कि कालक को रिश्वत न मिलने से उसने राजा को फोड़ लिया होगा। वह "महाराज ! कर सका तो दूंगा" कह कर जा प्रणीताहार ग्रहण कर चारपाई पर लेट सोचने लगे। शक्रभवन गर्म हो गया। शक्र ने ध्यान लगाकर देखा। बोधिसत्त्व की पीडा को जान उसने जल्दी से आ, सोने के कमरे में प्रवेश कर आकाश में खड़े हो पूछा—पण्डित क्या चिन्ता कर रहे हो ? "तू कौन है ?" "मैं शक्र हूँ।" "राजा ने मुझे उद्यान बनाने को कहा है। उसकी चिन्ता कर रहा हूँ।" 'पण्डित, चिन्ता न कर। मैं तेरे लिए नन्दनवन चित्रलतावन सदृश उद्यान बना दूंगा। किस जगह पर बनाऊँ ?" "अमुक स्थान पर बना।" शक्र बनाकर देवपुर चला गया। अगले दिन बोधिसत्त्व ने उद्यान को प्रत्यक्ष देख जाकर राजा को कहा— महाराज, मैने उद्यान समाप्त कर दिया है। खेले। राजा ने जाकर देखा अठारह हाथ की, मनोशिलावर्ण की दीवार से घिरा, द्वार-अट्टालिका सहित, फूल फल के भार से लदा हुआ, नाना प्रकार के वृक्षो से सजा हुआ उद्यान है। उसने कालक से पूछा—पण्डित ने हमारा कहना किया। अब क्या करें ?
धम्मद्ध ] ३६७ “महाराज, जो एक रात मँ उद्यान बना सकता है। वह राज्य ले सकता है वा नही ?” “अब क्या करे ?” “उससे दूसरा असम्भव कार्य्य कराएँ।” “ कौनसा काम ?” “सात रत्नो वाली पुष्करिणी बनवाएँ ।” राजा ने 'अच्छा' कह बोधिसत्व को बुलाकर कहा— “आचार्य्य ! तुमने उद्यान तो बना दिया। अब इसके योग्य सात रत्नो वाली पुष्करिणी बनाएँ। यदि नही बना सकोगे तो तुम्हारी जान जाएगी।” बोधिसत्व ने कहा—महाराज, अच्छा। बना सकेगे तो बनाएँगे। शक्र ने सुन्दर, सौ तीर्थों वाली, हज़ार जगह से मुड़ी, पाँच प्रकार के कमलो से ढकी नन्दन पुष्करिणी¹ सदृश पुष्करिणी बना दी ! बोधिसत्त्व ने उसे भी प्रत्यक्ष देख राजा से जाकर कहा—देव, पुष्करिणी बना दी। राजा ने उसे देख काळक से पूछा—अब क्या करे ? 'देव, उद्यान के योग्य घर बनाने को कहे।' राजा ने बोधिसत्व को बुलवाकर कहा—आचार्य्य, इस उद्यान और पुष्करिणी के अनुकूल एक ऐसा घर बनाएँ जो सारा का सारा हाथी दाँत का हो। यदि नही बनाएँगे तो तुम्हारी जान न रहेगी। शक्र ने उसका घर भी बना दिया। अगले दिन बोधिसत्व ने उसे भी प्रत्यक्ष देख राजा को कहा। राजा ने उसे भी देख काळक से पूछा—अब क्या करें ? 'महाराज, घर के योग्य मणि बनाने को कहें।' राजा ने बोधिसत्त्व को बुलाकर कहा—पण्डित, इस हाथीदांत के घर के अनुकूल मणि बनाओ। मणि के प्रकाश में घूमेंगे। यदि नही बना सकोगे, तो तुम्हारी जान जाएगी। शक्र ने उसकी मणि भी बना दी। अगले दिन बोधिसत्त्व ने उसे भी प्रत्यक्ष देख राजा को कहा। राजा ने देखकर पूछा—अब क्या करें ? "महाराज ! मालूम होता है कि ऐसा देवता है जो धम्मध्वज ब्राह्मण को जो जो वह चाहता है, देता है। अब जिसे देवता भी न बना सके, ऐसी आज्ञा दें। चारो अङ्गों² ──────── ¹ सिहल में 'नन्दा पोक्खरणि' पाठ है। ² चार गुणो ।
३६६ [ २.७.२२० "इसे कोई असम्भव कार्य्य करने के लिए कह कर उसके न कर सकने पर, उस दोष का दोषी बना मारेंगे।" "कौन सा असम्भव कार्य्य।" "महाराज, जरखेज भूमि में लगाने पर, देख भाल करने पर उद्यान दो चार साल में फल देता है। आप उसे बुलाकर कहें कि कल हम उद्यान में खेलेंगे। हमारे लिए उद्यान बनाओ। वह न बना सकेगा। तब उसे इस अपराध के कारण मार देंगे।" राजा ने बोधिसत्त्व को बुलाकर कहा—पण्डित ! पुराने उद्यान में हम बहुत खेले। अब नए उद्यान में क्रीडा करने की इच्छा है। कल क्रीडा करेंगे। हमारे लिए उद्यान बनाएँ। यदि न बना सकोगे, तो तुम्हारी जान नही बचेगी।" बोधिसत्त्व समझ गए कि काळक को रिश्वत न मिलने से उसने राजा को फोड़ लिया होगा। वह "महाराज ! कर सका तो देखूँगा" कह घर जा प्रणीताहार ग्रहण कर चारपाई पर लेट सोचने लगे। शक्रभवन गर्म हो गया। शक्र ने ध्यान लगाकर देखा। बोधिसत्त्व की पीडा को जान उसने जल्दी से आ, सोने के कमरे में प्रवेश कर आकाश मे खडे हो पूछा—पण्डित क्या चिन्ता कर रहे हो ? "तू कौन है ?" "मैं शक्र हूँ।" "राजा ने मुझे उद्यान बनाने को कहा है। उसकी चिन्ता कर रहा हूँ।" "पण्डित, चिन्ता न कर। मै तेरे लिए नन्दनवन चित्रलतावन सदृश उद्यान बना दूँगा। किस जगह पर बनाऊँ ?" "अमुक स्थान पर बना।" शक्र बनाकर देवपुर चला गया। अगले दिन बोधिसत्त्व ने उद्यान को प्रत्यक्ष देख जाकर राजा को कहा— महाराज, मैने उद्यान समाप्त कर दिया है। खेलें। राजा ने जाकर देखा अठारह हाथ की, मनःशिलावर्ण की दीवार से घिरा, द्वार-अट्टालिका सहित, फूल फल के भार से लदा हुआ, नाना प्रकार के वृक्षो से सजा हुआ उद्यान है। उसने काळक से पूछा—पण्डित ने हमारा कहना किया। अब क्या करें ?
धम्मद्ध ] ३६७ “महाराज, जो एक रात म उद्यान बना सकता है। वह राज्य ले सकता है या नही ?” “अब क्या करें ?” “उससे दूसरा असम्भव कार्य्य कराएँ।” “कौनसा काम ?” “सात रत्नो वाली पुष्करिणी बनवाएँ।” राजा ने 'अच्छा' कह बोधिसत्त्व को बुलाकर कहा— “आचार्य्य ! तुमने उद्यान तो बना दिया। अब इसके योग्य सात रत्नो वाली पुष्करिणी बनाएँ। यदि नही बना सकोगे तो तुम्हारी जान जाएगी।” बोधिसत्त्व ने कहा—महाराज, अच्छा। बना सकेंगे तो बनाएँगे। शक्र ने सुन्दर, सौ तीर्थों वाली, हज़ार जगह से मुड़ी, पाँच प्रकार के कमलो से ढकी नन्दन पुष्करिणी¹ सदृश पुष्करिणी बना दी। बोधिसत्त्व ने उसे भी प्रत्यक्ष देख राजा से जाकर कहा—देव, पुष्करिणी बना दी। राजा ने उसे देख काळक से पूछा—अब क्या करे ? 'देव, उद्यान के योग्य घर बनाने को कहें।' राजा ने बोधिसत्व को बुलवाकर कहा—आचार्य्य, इस उद्यान और पुष्करिणी के अनुकूल एक ऐसा घर बनाएँ जो सारा का सारा हाथी दांत का हो। यदि नही बनाएँगे तो तुम्हारी जान न रहेगी। शक्र ने उसका घर भी बना दिया। अगले दिन बोधिसत्त्व ने उसे भी प्रत्यक्ष देख राजा को कहा। राजा ने उसे भी देख काळक से पूछा—अब क्या करें ? 'महाराज, घर के योग्य मणि बनाने को कहें।' राजा ने बोधिसत्त्व को बुलाकर कहा—पण्डित, इस हाथीदांत के घर के अनुकूल मणि बनाओ। मणि के प्रकाश में घूमेंगे। यदि नही बना सकोगे, तो तुम्हारी जान जाएगी। शक्र ने उसकी मणि भी बना दी। अगले दिन बोधिसत्त्व ने उसे भी प्रत्यक्ष देख राजा को कहा। राजा ने देखकर पूछा—अब क्या करें ? “महाराज! मालूम होता है कि ऐसा देवता है जो धम्मध्वज ब्राह्मण को जो जो वह चाहता है, देता है। अब जिसे देवता भी न बना सके, ऐसी आज्ञा दें। चारो अङ्गो² ; ¹ सिहल में 'नन्दा पोक्खरणि' पाठ है। ² चार गुणों।
३६८ [ २७.२२० से युक्त मनुष्य को देवता भी नही बना सकता। इसलिए उसे कहें कि मुझे चारो अङ्गो से युक्त उद्यानपाल बनाकर दे। राजा ने बोधिसत्व को बुलाकर कहा—आचार्य्य, तूने हमारे लिए उद्यान, पुष्करिणी, हाथी-दांत का प्रासाद, उसमें प्रकाश करने के लिए मणि-रत्न बनाया। अब मेरे उद्यान की रक्षा करने वाला चारो अङ्गो से युक्त उद्यानपाल बनाएं। यदि नही बनाएंगे, तो तुम्हारी जान न रहेगी। बोधिसत्त्व 'होवे, मिलने पर दूंगा' कह, घर जा प्रणीत भोजन खा, सोकर जब प्रात काल उठा तो शय्या पर बैठ कर सोचने लगा—देवराज शक्र ने जो स्वय बना सकता था, बनाया। वह चारो अङ्गो से युक्त उद्यानपाल नही बना सकता। ऐसा होने पर दूसरो के हाथ से मरने की अपेक्षा जगल में अनाथ की तरह मरना ही अच्छा है। वह बिना किसीसे कहे, प्रासाद से उतर, मुख्यद्वार से ही नगर से निकल, जगल में प्रवेश कर एक वृक्ष के नीचे बैठ सत्पुरुषो के धर्म का ध्यान करने लगा। शक्र को जब यह पता लगा तो उसने एक वनचर की शक्ल बना बोधिसत्त्व के पास जा पूछा—'ब्राह्मण ! तू सुकुमार है। तूने पहले दुख नही देखा सा है। तू इस अरण्य में दाखिल हो बैठा क्या कर रहा है?' यह पूछते हुए पहली गाथा कही— सुखं जीवितरूपोसि रट्ठा विवनमागतो, सो एकको अरण्यस्मिं रुक्खमूले कृपणो विय झायसि ॥ [तू सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने वाले सा है। जनाकीर्ण स्थान से निर्जन स्थान में आया है। त जगल में वृक्ष के नीचे अकेला बैठ कृपण की तरह (क्या) सोचता है ?] सुखं जीवितरूपोसि, तू सुख से जीने वाले, सुख से रहने वाले, सुख से पालन हुए की तरह है। रट्ठा जनाकीर्ण स्थान से। विवनमागतो जलरहित स्थान जगल में दाखिल हुआ। रुक्खमूले, वृक्ष के पास। कृपणो विय झायसि, कृपण की तरह अकेला बैठा हुआ ध्यान करता है, विषण्ण ध्यान करता है। तू यह क्या सोच रहा है ?—यही पृच्छा।
धम्मट्ठ ] . ३६६
इसे सुन बोधिसत्त्व ने दूसरी गाथा कही— सुखं जीवितरूपोस्मि रट्ठा विब्भनमागतो, सो एकको अरञ्ञस्मि रुक्खमूले; कपणो विय झायामि सतं धम्मं अनुस्सरं ॥ [ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने वाला हूँ। जनाकीर्ण स्थान से निर्जन स्थान मे आया हूँ। अरण्य में, वृक्ष के नीचे अकेला ही कृपण की तरह श्रेष्ठ पुरुषो के धर्म को स्मरण करता हुआ ध्यान लगा रहा हूँ । ] सतं धम्म अनुस्सरं, मित्र, यह सत्य ही है कि मै सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करने वाला जनाकीर्ण स्थान से निर्जन स्थान मे आया हूँ। मै इस जगल मे .वृक्ष के नीचे अकेला ही बैठकर कृपण की तरह ध्यान करता हूँ। जो तू पूछता है कि क्या सोच रहा हूँ, वह कहता हूँ। मैं श्रेष्ठ (पुरुषो के) धर्म को स्मरण करता हुआ यहाँ बैठा हूँ। सतं धम्मं बुद्ध, पच्चेक बुद्ध, श्रावको का, श्रेष्ठ सत्पुरुषो का, पण्डितो का धर्म—लाभ, हानि, अपकीर्ति, कीर्ति, निन्दा, प्रशंसा, सुख, दुख, यह आठ प्रकार का लोक-धर्म है। इनसे आघात पाने पर सत्पुरुष कांपते नही हैं, चंचल नही होते हैं। यह न कांपना सत्पुरुषो का धर्म है। इस सत्पुरुषो के धर्म को स्मरण करता हुआ बैठा हूँ—यही प्रकट करता है। शक्र ने पूछा—ब्राह्मण ! ऐसा है तो इस जगह क्यो बैठा है ? “राजा चारो अङ्गो से युक्त उद्यानपाल मंगवाता है। वैसा नही मिल सकता है। सो मैं यह सोचकर कि किसीके हाथ से मरने से क्या लाभ, जगल में. प्रविष्ट हो अनाथ की तरह मरूँगा, (इसलिए) यहाँ आकर बैठा हूँ।” “ब्राह्मण ! मैं देवराज शक्र हूँ। मैने तेरे लिए उद्यान आदि बनाए। चारो अङ्गो से युक्त उद्यानपाल नही बना सकता। तुम्हारे राजा के वालो को सजानेवाला छत्तपाणी नाम का नाई है। चारो अङ्गो से युक्त उद्यानपाल की आवश्यकता होने पर, उसे उद्यानपाल बनाने के लिए कहना।”
- शक्र बोधिसत्त्व को यह उपदेश दे, 'डर मत' कह आश्वासन दे, अपने देवनगर को गया। ऽ४
३७० [ २.७ २२०
बोधिसत्व प्रात काल का भोजन कर राजद्वार गया। वही छत्तपाणी को देख हाथ से पकड पूछा-मित्र, क्या तू चारो अङ्गो से युक्त है ? "तुझे किसने कहा है कि मै चारो अङ्गो से युक्त हूँ ?" "देवराज शक्र ने।" "किस कारण से कहा ?" "इस कारण से ' कह सब कहा। वह बोला-हाँ, मैं चारो अङ्गो से युक्त हूँ। बोधिसत्व उसे हाथ से पकडे ही पकडे राजा के पास ले जाकर बोला- महाराज, यह छत्तपाणी चारो अङ्गो से युक्त है। उद्यानपाल की आवश्यकता होने पर इसे उद्यानपाल बनावें। राजा ने उसे पूछा-क्या तू चारो अङ्गो से युक्त है ? हां महाराज। 'किन चारो अङ्गो से ?" उत्तर दिया- "अनुसुय्यको अह देव अमज्जपायको अहं, निस्नेहको अह देव अक्कोधन अधिद्वितो ॥ महाराज ! मुझ म ईर्ष्या नही है। मैने कभी शराब नही पी है। देव ! मुझ में दूसरो के प्रति न स्नेह है, न कोष है। मैं इन चारो अङ्गो से युक्त हूँ। राजा ने पूछा-छत्तपाणी ! तू अपने आपको ईर्ष्या रहित कहता है ? '-हाँ देव ! मै ईर्ष्या रहित हूँ। 'किस बात को देखकर ईर्ष्या रहित हुआ ?" 'देव ! सुने' कह अपने ईर्ष्या रहित होने का कारण बताते हुए यह गाथा कही- इत्थिया कारणा राज बन्धापेसि पुरोहित, सो म अत्ये निवेसेसि तस्माह अनुसुय्यको ॥ [ राजन ! स्त्री के कारण मैने पुरोहित को बँधवाया। उसने मुझे सदर्थ में लगाया। इसलिए मै ईर्ष्या रहित हूँ।]
इसका अर्थ है कि देव ! मैं पहले इसी वाराणसी नगर में तुम्हारे जैसा ही राजा था। मैने स्त्री के लिए पुरोहित को बँधवाया।
इस जातक¹ में आए अनुसार ही एक समय इसे जब यह छत्तपाणी
धम्मट्ठ ] ` ३७१ "अब्भदा तत्थ बज्झन्ति यत्थ बाला पभासरे, बद्धापि तत्थ मुच्चन्ति यत्थ धीरा पभासरे ॥" इस जातक¹ में आए अनुसार ही एक समय इसे जब यह छत्तपाणी राजा था, चौंसठ नौकरों के साथ अनाचार कर बोधिसत्त्व के द्वारा अपनी इच्छा-पूर्ति न होने के कारण बोधिसत्त्व को नष्ट करने की इच्छा से देवी ने इसे फोड़ा। इसने बोधिसत्त्व को बँधवा दिया। तब बाँधकर लाए गए बोधिसत्त्व ने देवी का यथार्थ दोष कह स्वयं मुक्त हो, राजा के बँधवाए हुए सभी नौकरो को मुक्त करवा राजा को उपदेश दिया कि इनका और देवी का अपराध क्षमा करे। सब पूर्वोक्त प्रकार से विस्तार से कहनी चाहिए। इसीके बारे में कहा है— इत्थिया कारणा राज बन्धापेसि पुरोहितं, सो मं अस्ये निवेसेसि तस्माहं अनुसुय्यको ॥ तब मैं सोचने लगा—मै सोलह हजार स्त्रियां छोड़ इस अकेली से कामा- सक्त हो, इसे भी सन्तुष्ट न कर सका। इस प्रकार बड़ी कठिनाई से सन्तुष्ट की जा सकने वाली स्त्रियों का क्रोध करना वैसा ही होता है जैसे कोई कपड़ो के पहनने पर उनके मैले होने से क्रोध करे कि यह मैले क्यो होते हैं, अथवा जैसे कोई खाए भोजन के गूह बनने पर क्रोध करे कि यह ऐसा क्यो होता है ? तब मैने दृढ सकल्प किया कि अब से जब तक अर्हत्व प्राप्त न हो जाए तब तक कामभोग के प्रति मेरी ईर्ष्या न हो। उस समय से मै ईर्ष्या-रहित हो गया। इस सम्बंध से ही तस्माहं अनुसुय्यको कहा। तब राजा ने पूछा—मित्र छत्तपाणि ! किस बात को देखकर तू श्रमणक हो गया ? उसने वह बात कहते हुए यह गाथा कही— मत्तो अहं महाराज पुत्तमंसानि खादियं, तस्स सोकेनहं फुट्ठो मज्जपानं विवज्जंयि ॥ [ महाराज ! मैने मद्य पी बेहोश हो अपने पुत्र के मास को खाया। उस शोक से शोकाभिभूत हो मैने मद्यपान छोड दिया।] बन्धनमोक्ख जातक (१२०)
१७२ ८ [ २.७.२२७ महाराज ! पूर्वकाल में मैं तुम्हारी ही तरह वाराणसी का राजा था। शराब के बिना न रह सकता था। बिना मांस का भोजन न खा सकता था। नगर में उपोसथ के दिनों में पशु-हत्या बन्द रहती। रसोइये ने पक्ष की त्रयो- दशी को ही मांस लेकर रख दिया। संभाल कर रखा न होने से उसे कुत्ते खा गए। रसोइये ने उपोसथ के दिन मांस न पा, राजा के लिए नाना प्रकार के स्वादिष्ट भोजन बना प्रासाद पर चढ राजा के पास भोजन न ले जा सकने के कारण देवी के पास जाकर पूछा-देवी ! आज मुझे मांस नहीं मिला। बिना मांस का भोजन राजा के पास नहीं ले जा सकता। क्या करूँ ? "तात ! मेरा पुत्र राजा को अत्यन्त प्रिय है। पुत्र को देख कर राजा उसे चूमता हुआ, लाड-प्यार करता हुआ अपना क्षुन्निद्र भी भूल जाता है। मैं पुत्र को सजाकर राजा की गोदी में बिठा दूंगी। उसके पुत्र के साथ खेलते समय तू भोजन लाना।" ऐसा कह उसने अपने पुत्र सुन्दर बालक को सजाकर राजा की गोद में बैठाया। राजा के पुत्र के साथ खेलने समय रसोइया भोजन लाया। शराब के नशे में बेहोश राजा ने पका हुआ मांस न पा पूछा-मांस कहाँ है ? 'देव ! आज दिन पशु-हत्या बन्द रहने से मांस नहीं मिला।' राजा ने 'मुझे मांस नहीं मिलेगा' कह गोद में बैठे प्रिय पुत्र की गर्दन मरोड, जान से मार रसोइये के सामने फेंका और आज्ञा दी-जल्दी से पका कर ला। रसोइये ने वैसा किया। राजा ने पुत्र-मांस के साथ भोजन किया। राजा के भय से न कोई रो पीट सका न कुछ कह ही सका। राजा ने भोजन खा, शय्या पर सो, प्रातःकाल उठ नशे के उतरने पर कहा-मेरे पुत्र को लाओ। उस समय देवी रोती हुई चरणों पर गिर पडी। राजा ने पूछा-'भद्रे ! क्या हुआ ?' बोली-'देव ! कल आपने पुत्र को मारकर पुत्र-मांस के साथ भोजन खाया।' राजा ने पुत्रशोक से अभिभूत हो रो पीट कर 'मुझे यह दुख सुरापान के कारण हुआ' समझ सुरापान में दोष देख बालू से मुँह पोछते हुए प्रतिज्ञा की- "अद्य से मैं अर्हत्व प्राप्त होने तक ऐसी विनाशकारिणी सुरा को कभी नहीं पीऊँगा।" तब से मद्य नहीं पी, इसीलिए मत्तो अह महाराज, यह गाथा कही। तब राजा ने पूछा- मित्र ! क्या देखकर तू स्नेह-हीन हो गया ? उस
धम्मट्ठ ] ३७३
बात को कहते हुए यह गाथा कही—
कित्तावासो नामह राजा पुत्तो पच्चेकबोधिस,
पत्तं भिन्दित्वा थवितो निस्नेहो तस्स कारणा ॥
[ मैं कित्तबास नाम का राजा था। मेरा पुत्र पच्चेकबुद्ध के पात्र को फोड
कर मर गया। उस कारण से मैं स्नेह रहित हो गया।]
महाराज ! पहले मैं वाराणसी में कित्तवास नाम का राजा था। मुझे
पुत्र हुआ। लक्षण जानने वालो ने उसे देखकर कहा कि इसकी मृत्यु पानी न
मिलने से होगी। उसका नाम दुष्टकुमार रखा गया। बालिग होने पर वह
उपराजा बना।
राजा दुष्टकुमार को सदैव अपने आगे पीछे रखता। पानी न पाकर मरन
के भय से, उसके लिए चारो दरवाजो पर और नगर के भीतर जहाँ तहाँ पुष्क-
रिणियाँ बनवा दीं। चौरस्तो आदि पर मण्डप बनवा पानी की चाटियाँ
रखवाईं।
उसने एक दिन सजधज कर अकेले ही उद्यान जाते हुए रास्ते में प्रत्येकबुद्ध
को देखा। जनता भी प्रत्येकबुद्ध को देखकर उन्ही को प्रणाम करती, प्रशंसा
करती। उन्ही को हाथ जोडती। राजकुमार सोचने लगा—मेरे जैसे के
साथ चलते हुए लोग इस सिर-मुण्डे को प्रणाम करते हैं, प्रशंसा करते हैं, हायें
जोडते हैं। उसने क्रोधित हो, हाथी से उतर प्रत्येकबुद्ध के पास जाकर पूछा—
"श्रमण ! तुझे भोजन मिला?"
"राजकुमार ! हाँ मिला।"
उसने प्रत्येकबुद्ध के हाथ से पात्र ले, उसे जमीन पर पटक, भोजन सहित
पाँव से मर्दन कर, पाँव की ठोकर से चूर चूर कर दिया। प्रत्येकबुद्ध उसके
मुँह की ओर देखने लगे—अब यह प्राणी नष्ट हुआ। कुमार बोला—श्रमण !
मैं कित्तवास राजा का पुत्र हूँ। मेरा नाम है दुष्टकुमार। तू मुझ पर क्रोधित
हो आँखें फाड फाड कर देखने से मेरा क्या करेगा? प्रत्येक-बुद्ध का भोजन
नष्ट हो गया। वे आकाश में उडकर उत्तर हिमालय में नन्दमूल पब्भार पर
ही चले गए। राजकुमार के पापकर्म ने भी उसी क्षण फल दिया। उसके
शरीर में दाह पैदा हुआ। वह जल रहा हूँ कहता हुआ वही गिर पडा।
३७४ [ २.७.२२० उतना पानी भी सब समाप्त हो गया। सारी घाटियाँ सूख गईं। वहीं उसका प्राणान्त होकर वह अवीची नरक में पैदा हुआ। राजा ने वह समाचार सुन पुत्रशोक से अभिभूत हो सोचा—मेरा यह शोक प्रिय वस्तु से उत्पन्न हुआ। यदि मैं स्नेह न करता, तो शोक न होता। उसने निश्चय किया कि अब से किसी भी चीज में—चाहे वह जानदार हो चाहे बेजान हो—स्नेह पैदा न हो। उस समय से लेकर उसे स्नेह नहीं है। उसी सम्बन्ध से कित्तवासो नामह गाथा कही। पुत्तो पच्चेकबोधिमे पत्त भिन्दित्वा चवितो का अर्थ है कि मेरा पुत्र पच्चेकबुद्ध का पात्र तोडकर मर गया। निस्नेहो तस्स कारणा, उस समय उत्पन्न स्नेह के कारण स्नेह-रहित हो गया। तब राजा ने उसे पूछा—'मित्र ! किस बात को देखकर तू क्रोध-रहित हो गया ?' उसने वह बात बताते हुए यह गाथा कही— अरको हुत्वा मेत्तचित्तं सत्त वस्सानि भावयिं, सत्त कप्पे ब्रह्मलोके तस्मा अवकोधनो अह ॥ महाराज ! मैने अरक नामक तपस्वी हो, सात वर्ष तक मैत्री चित्त की भावना कर सात सवर्त्त विवर्त्त कल्पों तक ब्रह्मलोक में रहा। इसलिए मे दीर्घ काल तक मैत्रीभावना का अभ्यास करने से क्रोधि-रहित हो गया। इस प्रकार छत्तपाणि के अपने चारो अङ्ग कहने पर राजा ने परिषद को इशारा किया। उसी क्षण अमात्यो तथा ब्राह्मण गृहपति आदि ने उठकर 'अरे ! रिश्वतखोर ! दुष्ट चोर ! तू रिश्वत न पाकर पण्डित की निन्दा कर उसे मारना चाहता था' कह काळक के हाथ पाँव पकड, राजमहल से उतार जो जो हाथ मे आया पत्थर, मुद्गर आदि से सिर फोड मार डाला। फिर पाँव से घसीट कर कूडे की जगह पर फेक दिया। उसके बाद से राजा धर्मपूर्वक राज्य करता हुआ कर्मानुसार (परलोक) गया। शास्ता न यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय काळक सेनापति देवदत्त था। छत्तपाणि नाई सारिपुत्र। धर्मध्वज तो में ही था।
२२१. कासाव जातक
दूसरा परिच्छेद ८. कासाव वर्ग २२१. कासाव जातक “अणिक्कसावो कासावं...” यह धर्मदेशना शास्ता ने जेतवन में रहते समय देवदत्त के बारे में कही। घटना राजगृह में घटी। क. वर्तमान कथा एक समय धर्मसेनापति (सारिपुत्र) पांच सौ भिक्षुओं के साथ वेळुवन में रहते थे। देवदत्त भी अपने जैसी दुराचारी परिषद से घिरा हुआ गयाशीर्ष पर रहता था । उस समय राजगृह निवासी चन्दा इकट्ठा करके दान की तैयारी करते थे। व्यापार के लिए आए एक बनिए ने एक मूल्यवान् सुगन्धित काषाय वस्त्र दे कर कहा कि इस वस्त्र का दान कर मुझ भी (दान मे) हिस्सेदार बनावें। नागरिको ने महादान दिया। सब चन्दा करके इकट्ठे किए गए कार्षापणो से ही पूरा हो गया। वह वस्त्र बच गया। लोग इकट्ठे होकर सोचने लगे कि यह वस्त्र किसे दे ? क्या सारिपुत्र स्थविर को ? अथवा देवदत्त को ? कुछ ने कहा सारिपुत्र स्थविर को। दूसरो ने कहा—सारिपुत्र स्थविर कुछ दिन रह कर यथारुचि चल देगा। देवदत्त स्थविर सदैव हमारे नगर ही के पास रहता है। मङ्गल-अमङ्गल में यही हमारा सहायक होता है। देवदत्त को दे। राय लेने पर 'देवदत्त को दे' कहने वालो की संख्या अधिक निकली। उन्होने देवदत्त को दे दिया। देवदत्त ने उसकी डसे कटवा, ओवट्टक वस्त्र सिलवा, रँगवा कर सुनहरी रेशम सदृश बना पहना। उस समय तीस भिक्षुओ ने राजगृह से श्रावस्ती पहुँच, शास्ता को प्रणाम
चीवर को धारण किया, पहले भी धारण किया है' यह पूर्व-जन्म की कथा कही।
३७६ [ २.८ २२१
पर कुशल समाचार पूछे जाने पर, यह समाचार वह निवेदन किया कि भन्ते ! इस प्रकार देवदत्त ने अपने अयोग्य चीवर (=अर्हत्-ध्वजा) को धारण किया। शास्ता ने 'भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त ने अपने अयोग्य चीवर को धारण किया, पहले भी धारण किया है' यह पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्वकाल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व हिमालय प्रदेश में हाथी के कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर वह अस्सी हजार मस्त हाथियों के नायक बन जंगल में रहने लगे। एक गरीब आदमी ने वाराणसी में दन्तकार गली में हाथी-दाँत का काम करने वालों को चूड़ी आदि बनाते देख कर पूछा—हाथी-दाँत मिलें तो लोगे ? उन्होंने कहा—लेंगे। यह शस्त्र ले, काषाय वस्त्र पहन, प्रत्येक-सम्बुद्ध का वेष बना, टोपा पहन, हाथियों की गली में जा, आयुध से हाथियों को मार, दाँत ला, वाराणसी में बेच, जीविका चलाता था। आगे चलकर उसने बोधिसत्त्व के दल के सबसे अन्तिम हाथी को मारना आरम्भ किया। रोज़ रोज़ हाथियों को कम होते देख हाथियों ने बोधिसत्त्व से कहा—किस कारण से हाथी कम हो रहे हैं ? बोधिसत्त्व ने देखभाल करते हुए सोचा—एक आदमी प्रत्येक-बुद्ध का वेष पहनकर हाथियों की कतार के सिरे पर रहता है। कहीं वही तो नहीं मारता है ? उसका पता लगाऊँगा। एक दिन हाथियों को आगेकर स्वयं पीछे पीछे चला। वह आदमी बोधिसत्त्व को देखते ही शस्त्र लेकर कूदा। बोधिसत्त्व ने रुक कर खड़े हो, उसे ज़मीन पर गिरा कुचल कर मार डालने के लिए सूण्ड उठाई। (लेकिन) उसके पहने काषाय वस्त्रों को देख सोचा— इस अर्हत्-ध्वजा का मुझे आदर करना चाहिए। उसने सूण्ड लपेट कर 'भो पुरुष ! यह अर्हत् ध्वजा तेरे योग्य नहीं है। तू इसे क्यों धारण करता है ?' कहते हुए यह गाथाएँ कही—
अनिक्कसावो कासावं यो वत्थं परिदहेस्सति, अपेतो दमसच्चेन न सो कासावमरहति ॥