कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
कवीरकृष्णगीता ।
६७
दोहा-ठांव २ सब सैना कहु, कुँअर सोइ अलसाय ।
पहिला भिन्न सार अगम पंथ, कुँअर धरे उठपांय ॥
निकसा कुँअर सत्तगुरु भापी । गुरु कर फिर आयो अस भापी ॥ निसरा कुँअर दिसंतर भारी । कुँअर जाग एक सर सेज पारी ॥ उठि अकुलाय अंगना भइ ठाई ॥ पियकी प्रीति अंतर्गत बाडी ॥ माय बाप कैंहें डांक जगावा । मम अभाग पिय तरिथ सिधावा ॥ रोर करे दुलहिन पिय लागी । पियके बोल हिये उठ वृह आगी सये विकल होय रोवन लागे । कहैं नृपत कस रोवहु अभागे ॥ पठवहु मानुष पर आती । कुँअर होय पितु बंधु जमाती ॥ धाय बहुत खोज नहि पाये । नृपत समोव कुँअर समुझाये ॥ पतिवरताके स्वामी पूरा । सर्वस माग चेताय तेहि सुरा ॥ बेविचारी कर स्वामी कांचा । चीन्ह कछू नहि बोलिस वांचा ॥ वहां दिसंतर गयो कौने काजा । बेविचारी लिहे गौ दुतिय राजा ॥ बारह वर्ष बीत जब पूरा । आन कुँअर आवत वाजे तूरा ॥ कियो नृपत सन्मान बहूता । कस तन ठहरे ताके पूता ॥ पहिले पहर तेहि कुँअर बुलावा । पतिव्रता पट अंतर दियावा ॥
दोहा-पतिवरतासुं दुहि कहा, पूछ कुँअरकी बात ।
कौन वस्तु तुम खावो, पतिव्रता संग रात ॥
भगली कुँअर कहे भष भाता । बराबरी झकभास सुहाता ॥ कहे पतिव्रता यह नहि मम स्वामी । विदाई नहि कहैं लसकर जाही ॥ यही भांति भूप बहु भगली । पतिवरतहि ठग सके न नकली ॥
६८
कबीररुग्णगीता ।
भूप अनेक कांक्ष बहु आये । हांथ न लगी जाहि पछताये ॥ नृपत पद पतिव्रता राती । पिय आज्ञा किया चहे पिय माती गुरु करेको अंकुर कीन्हा । पुन पिये प्रति अबोझा दीन्हा ॥ जब पिय आवैं देखों आंखी । तब गुरु करौं कबीर सत भाषी ॥ गुरु प्रतीत तुरंत मिल स्वामी । धन्य सहृदु गुरु अंतर्थाभी ॥ बाजत गाजत आव बराता । सुनके कोथ भयउं तब ताता ॥ तब पुत्री कहैं गारी दीन्हा । धन सर्वस नाहक खर्च कीन्हा ॥ सुना कुंभरि पिय करे अवाई । अधिक गीत कब पिय पद पाई ॥ पिता पहाँ दुलहिन चलि गयऊ । पूछ पिता पुत्री कस आयऊ ॥ कहे पतिव्रता संभाषण करहू । नहिं तो द्रव्य मम गहना धरहू ॥ सुन पितइ पठय नौवारी । किहुं सनमाने जेता धारी ॥ बहुरि दीप बार कुंभरि बुलाये । माला तिलक झलक झलकाये ॥ सतकबीर करुणा वै बोले । तब पतिव्रतते श्रवण खोले ॥ पूछे सुंदरी कहु नृपवारा । कोहवर जैवे कौन प्रकारा ॥ परदा सात चदर देहु अंतर । निज पिया नाम जपहिं उरमंदर ॥ कहैं कुंभर जानहिं अरधंगा । दुइ बरा पायऊं एके संग ॥ यह सुन पतिव्रता पगु लागी । परदा सात भरसपट त्यागी ॥ परे चरण पिय छुये न ताहीं । पूछे विष्णव भये कि नाहीं ॥ कहे पतिव्रता यह मन आज । जिहि पियसों पग हो तेहि पाऊ ॥ कहे कुंभर साकट जेहि नारी । तेहि संग बूडे पुरुष अनारी ॥ यह कहि कुंभर चला अपना दल । साकट हांथ न उचित लेन जल ॥
कबीरकृष्णगीता ।
६९
पीछे लाग चली पतिव्रता । बहुर उचर दीन्हा तेहि भरता ॥ हम अब जात आह बरिआता । गुरु करव तो होन तुव साथा ॥ कहे कन्या गुरुदेव बोलाई । हमहू शरण सत्यनाभके जाई ॥ कहे कुंभर गुरुबंधु संग मोरे । तुरत पान लेहु तिनका तोरे ॥ भये जो मंगल अधिक उछाहा । तन गउवा मन जीवके व्याहा ॥ पतिव्रता कहे पियपद लागी । चल मंदिर मोहि करहु सुभागी ॥ तबलग मोर छुवा जिन खाहू । जो लगि मोहि गुरु शरण दिवाहू ॥ सुनत वचन पतिव्रता केरी । पाऊं परे कुँअर पगु वारी ॥ पतिव्रता गृह चल भौ स्वाभी । हर्ष चले पाछे पिय बानी ॥ मंदिर जाय पलंग सुभ डासा । फूल विछौना अधिक सुवासा ॥ पलंग बैठ पिय वचन उचारा । परआत्म कह दीन्ह अहारा ॥
दोहा—राजा कीन्ह सन्मान सब पुन, कीन्ह आरती साज । आरती होत सो मंगल, अनवन बाजन बाज ॥
सिंहासन बैठे कडिहारा । नरिअर मोर हंस निस्तारा ॥ तिनका जमते वेग तोडावा । दे प्रवाना जीव सुकावा ॥ पुन दे तिलक चरणोदक दीन्हा । कागते हंस रूप कर लीन्हा ॥ चरण टेके कीन दंडवत साता । सट्टुर दियो सीस तब हांथा ॥ दीन्ह प्रसाद नारियर गरी । बहुर प्रसाद नवहु देहु फेरी ॥ पुन सट्टुर तेहि सिखापन दीन्हा । सदा रहहु पिय चरण अधीना ॥ पतिव्रता सुन शब्द सिखापन । गुत प्रगट एक ब्रह्म पुरातन ॥ सत्यनामप्रति पिय गुण जानी । पतिव्रता पिय पद लपटानी ॥
कथाका सार दृष्टान्तका आध्यात्मिक अर्थ व निर्गुण भक्ति
७०
कबीरकृष्णगीता ।
चरण टेक पियसो कह बाला । हमहु देहु पिय तुलसीमाला ॥ दीनदयाल दिय भेष गुरुसेती । कहा करहु प्रसाद सुनेती ॥ पतिव्रता प्रसाद बनावा । सतसुछत कहैं भोग लगावा ॥ सद्गुरु कहैं पकवान पवाई । राजा निज कर बाव ढोलाई ॥ पतिव्रता पुनि स्वामि जिमावा । नाना व्यंजन थार भरावा ॥ हर्ष चूप प्रसाद पुन कीन्हा । सत्यनाम सुखसागर चीन्हा ॥ अचवन कर कुंअर असनादा । गुरुमुख किनका लेहु प्रसादा ॥ सद्गुरु कहैं सुनो पतिवरता । गुरु नारायण सम पिय भरता ॥ पतिव्रता पिय जूठ अहारा । औ चरणोदक सम वसु धारा ॥
दोहा—सब सुख पुर रहा तेहि, जेह घर पिय तन कंथ । वेनिचारी नष्ट गई, तेहिना मिले अध अंत ॥ बालापन पिय व्याहको, पिय जो गये विदेश । पतिव्रता पिय पाइया, विश्वा नरक प्रवेश ॥
कबीरखचन ।
कहैं कबीर यह जीवके लेखा । ज्ञानी होय सो करे विवेका ॥ तैसे जीव कंहैं जार झुलावा । काल निरंजन जार लखावा ॥ सत्यनाम सब जीवके पीऊ । निज पिय ताहि न चीन्हे जीऊ ॥
कृष्णव्यासवचन ।
विष्णु व्यास विनैवे कर जोरी । सत्यकबीर अगम मत तोरी ॥ सबके मूल तुमहि सतनामा । सब जीवनके तुम सुखधामा ॥ कहैं कृष्ण मैं कबीर बल गाजौ । सद्गुरु चरण प्रताप विराजौ ॥
अर्जुन और कबीर संवाद
कवीरकृष्णगीता
( ७१ )
अब ऐसी दाय। प्रभु करहू । सब दिन तुम मम हृदय संचरहू ॥ जो तुम मम हिय करहु प्रकाशा। तब छूटे मम यमके त्रासा ॥ तुम विन को जिव राखन हारा । निरंजन जीवाहिं करे अहारा ॥ कहा करौ यमके डर दरपो। काल निरंजनके डर कपो ॥ अब मोहिं देहु सुकके पाना । यम त्रण ताडे करहु निरवाना ॥ हम सब तुम्हरे जाप पोषे । तुम जागे औ सब जग सोषे ॥
कवीरवचन ।
कहे कबीर सुन कृष्ण सुरारी । निर्गुण भक्त करे तेहि तारी ॥ निर्गुण आद अजर सतनामा । सद्गुरु सत्यनाम सुखधामा ॥
अर्जुनवचन ।
कहे अर्जुन सुन श्रीभगवाना । सत्यकबीर कर्ता निरवाना ॥ जीव कबीर साहेबके ठाहर । तेहि यम खाय जो कबीरसे ठाहर कृष्ण वचन ।
कहे कृष्ण अर्जुन सुन वाणी । सतपद गहो कबहुं नहिं हानी ॥ सबसों कहौ कबीर है पहली । कबीरसो लगु सो रंग गहिली ॥
अर्जुनवचन ।
कहे अर्जुन हम हैं अज्ञानी । जेहि अब कर्म सोई अज्ञानी ॥ सोइ अज्ञानी शुभ पंथ न आनी। भ्रमत फिरे सदा अज्ञानी ॥ श्रीयदुपति मोहि दीन्ह चिन्हाई । तब हम कबीर पुरुष लख पाई ॥ दोहा--अर्जुन भीमाहि औ गले, भये युधिष्ठिर ठाठ। सबदेवन कुल औ कृष्ण मिल, विनती कराहिं आति गाठ ॥
७२
कबीरकृष्णगीता ।
युधिष्ठिरकृष्णवचन ।
कहैं युधिष्ठिर कृष्ण समेता । सत्यकबीर तुम कृपा निकेता ॥ अब मोहिं सब कहैं तारहु स्वामी । सत्यपुरुष तुम अंतर्धामी ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुन सांचा सोई । मोहिं विन जीव तरे नहिं कोई ॥ जाकर अंस ताहि दुख व्यापे । आनके अंस आन पहुँचौपे ॥ कहैं कबीर जीव अंसहि मोरा । छलके जार निरंजन चारा ॥ जो सुनरे सत्यनाम गोसाईं । ताके निकट काल नहिं जाई ॥
युधिष्ठिरवचन ।
कहैं युधिष्ठिर दोह कर जोरी । सुक्त पान दये जिव बंदीछोरी ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर निज अंस प्रगट कर । सोईं अंस विष्णु अंसमे लपथर ॥ आद अंत औ निर्गुण सरगुण । पांच पचीस औ चौदह त्रिगुण ॥ अजर अमर सो सबके मूला । जासु अंस सोहंग अंकूला ॥ केदल ब्रह्म सोहंगम जीऊ । रमिता सोहंग पै तन धीऊ ॥ क्षीर मथे सो करे सुवास । सो सुवास पर आत्म पास ॥ परआत्म आत्मके करता । सो सब मूल सकलके भरता ॥ सो सत्यनाम अमरपुर माहीं । सब जिव सत्यनामके आहीं ॥
युधिष्ठिरवचन
कहैं युधिष्ठिर तुम सत्यनामा । सत्यकबीर संतन सुखधामा ॥ देहु परवाना अधम उधारो । पांचों पंडव कहैं तुम तारो ॥
युधिष्ठिरका आरती चौका करना
कवीरकृष्णगीता ।
७३
कवीरवचन ।
दोहा-कहैं कबीर सुन धर्मसुत, आनहु आरती साज ।
देव प्रवाना सुत्तको, वेग करो जिवकाज ॥
जाहु कुबेर पहैं तुम राजा । आनहु साज करो तुम काजा ॥
जाय कहा नृपपांह कुबेर । आरती साज कबीरहि हेर ॥
छाय कुबेर सकल विध नामा । नृप साजले आय तुलाना ॥
आये समर्थ चरण मनावा । साहेव कीन्ह सर्वाहि सत भावा ॥
कृष्ण कुबेर सो चौका सँवारा । जोत प्रकाश सिंहासन सारा ॥
शब्द उचार अवाहद गाजा । ताल मृदंग झालरी बाजा ॥
सत्यकबीर तब नरिअर मोरा । पांचो पंडवके बंद छोरा ॥
मगन भये प्रवाना पाये । आद सुरत सतलोक पठाये ॥
क्रीतम सुरत संसारे राखा । पुष्ट पुन घर गवन सो भाषा ॥
कहैं कबीर प्रसाद वतावहु । समहछि पतिव्रतक मनावहु ॥
रजगुण तमगुण भोजन तजहूँ । सद्गुरु भोग नाम सत भजहूँ ॥
सतकबीर सिखवन दे सवहूँ । सुमत विना कोई तरे न कबहूँ ॥
प्रेतभक्ष तज देव भक्ष लीजे । सद्गुरुके चरण चित दीजे ॥
सद्गुरु भक्त साधुकी सेवा । सकल आस तज देवी देवा ॥
जाहि भजा चाहे जो कोई । तेहि पंथ गुरु हर लखे सोई ॥
भगवानोवचन ।
कहैं युधिष्ठिर सो भगवाना । तुम्हरी घरी शुभ आय तुलाना ॥
सोई संत जो सद्गुरु सेवा । सद्गुरु सब देवनके देवा ॥
एकादश कोट देव विष्णु अंगी । हरसमेत भये सद्गुरु संगी ॥
कबीर साहबका युधिष्ठिरको परवाना देकर लोकको जाना
७४
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा-आगे पिछे सब मिल, लियो मुक्तको पान ।
ठीका पुरे सुखघर गये, सत्यकबीर व्रत ठान ॥
सत्यकबीरके सेवक पतिव्रता । सतकबीर सब अघके हर्ता ॥ कोटि २ जिन किये अपराधा । गौ द्विज हत्या अगम अगाधा ॥ केहु प्रकारकी हत्या होई । कोट तीर्थ किये छूटे न सोई ॥ जो जिव सद्गुरु शरण सभावे । सतकबीर सुमरे सच पावे ॥ जन्म २ अघजार नसावे । यम त्रिण तोड प्रवाना पावे ॥ धन्य सराहिये ताकर भागा । जो सतनामके शरणहि लागा ॥ कहे कृष्ण सतनाम कबीरा । भेटे जीवको भौ दुख पीरा ॥
कबीरवचन ।
कहे कबीर हम लोकहिं जाहीं । जो सुमरे मोहिं हम तेहि पाहीं ॥ यह कह सद्गुरु गुप्तमें तहां । विष्णु व्याप्त सब स्तुति माहा ॥ सत्यनाम कहि सीस नवाई । सत्यनाम सुमरे सच पाई ॥ सत्य गहे बांचे सब कोई । सत्यनाम जप सब सुख होई ॥ सत्यनाम स्मरण सुखमूला । सत्यनाम प्रति उझे न तूला ॥ प्रतिस्वासा सुमरे सतनामा । विष्णु व्याप्त सतनाम विश्रामा ॥ महाविष्णु सतनाम अधारा । सत्यनाम ते आय निराकारा ॥ सत्यनाम सो सतपुरवासी । सतपुर अमरलोक सुखरासी ॥ विद्यावेद पढ़हिं नर लोई । सत्य अमर कहैं लखे न सोई ॥ सत्य मुक्त जाके घट पूरा । सत्यनाम तेहि रहत हजुरा ॥ सबके घट महैं अमर स्वासा । सो सतनामको अंस सुवासा ॥
निरंजन और त्रिदेवका सम्वाद - शिवादिदेवका कोप करना
कबीरकृष्णगीता ।
७५
जीव सोहंग रमता थिर करता। भंरा खाली कर खाली भरता ॥ सत्यनाम सब मँहैं सोइ न्यारा । सोइ परम गुरु भो कंडहारा ॥ सत्यनाम सड़ुरु कहाये । पुन गुरु तात मात बंधु भाये ॥
दोहा--सकल समाये रहै सो, प्रगट होइहिं जहैं सांच ॥
विष्णु व्यास सुखदेव कहैं, सांच बिना जिव कांच ॥ सांच सोई जो विनशे नाही । जठर योनि नहिं आवे जाई ॥ जब यम जीव कहैं सांसत कीन्हा । जीव पुकारे सड़ुर लीन्हा ॥ कस जिव अघ पतसे बहु जाभी । अमरलोक अम्बरपति स्वामी ॥ कहि जो कियऊं ताहुपर जाऐ । सत्यनाम सो जरत उबारे ॥ तत्क्षण प्रगट भये सतनामा । कालहिं मार बिंधसेउ धामा ॥ स्वास निकसतन सुन्य कहाया। काल भेट सुन्यकार बसाया ॥ दाना भीर राखेउ यहि लागी । बिना पयोद दाम न पागी ॥ सत्यनाम सोइ सत्यकबीर । जोगजीत है काल बधीर ॥
दोहा--बंदीछोर कबीर प्रभु, राम अछाह कबीर ।
प्रथम विष्णु मिल धायके, कबीर राज दिये थीर ॥ ब्रह्मा पत्री कर ढुम साली । सत्यकबीर कुल विष्णु अमाली ॥ शब्दवेदके मते जो चलि है । ताके त्रास काल महि खिलि है ॥ वेद पुराण कुराणकी बात । विरला सैल निरख मग जाता ॥ गुरु साधु सो होय अधीना । सेवा सबके स्वामी चित दीन्हा ॥ सबन मथनके देख परेखा । स्वामी सत्यकबीर अलेखा ॥ विष्णु व्यास अज कृष्णउचारा । सत्यकबीर जिव तारन हारा ॥
७६
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा—सबके मटुक कबीर गुरु, बिन कबीरकुछ नाहिं ।
सुरत स्वास सुख संतत, सो कबीरके छाहिं ॥
अविचल स्वाधी परख कबीरा । महाकालको मस्तक चीरा ॥ कहैं कृष्ण कबीरसे वैना । निस दिन दरश देहु भर नैना ॥ गुप्त प्रगट हरदम देहु दर्शन । सवहि पदरस प्राप्त गुरु प्रशन ॥ दरश परस मम हिय रहु भिनी । कृष्ण कबीर कहैं बिनती कीन्ही ॥ आये कबीर कृष्णके सीसा । ताप गई शीतल हर दीसा ॥ जबलग रहे कबीर डर माथा । तबलग कृष्ण सो रहे सनाथा ॥ जबहिं कबीर गुप्त होय जाहीं । तब गोपाल पथ पितु जे माहीं ॥ पितु जननी धर्मराय भवानी । ताके छाया अनित चलानी ॥ चलहिं अपंथ जो विष्णु सयाना । तब पितु काल बांध सिरहाना ॥ वार अनेक विष्णुहिं यासे काला । तबहिं विष्णु औ सब बेहाला ॥ तब कबीरके शरण समाये । कबीर शरण जग त्रास नसाये ॥ नगद पंथ निरगुण कबीरा । सरगुण जानहु भर्म खोगीरा ॥ सरगुण तीरथ व्रत भ्रम पूजा । पुन सरगुण काया यह दूजा ॥ निर्गुण एक कबीर अधिनाशी । ब्रह्म बोलता सब घट वासी ॥ बहु निर्गुण वरणो अब नीरा । दुस्वित निरवान सकल शरीरा ॥ नीर कबीरको अंस बखाना । शीतल नीरसो साधस ज्ञाना ॥ नीर बिना नहिं जीवे प्राणी । नीर सकल शरीर निसानी ॥ अन्ननेत औ तरवर चीना । कंद मूल फल दल बिनहीना ॥ दल पानी करुनाम बखाना । दल देव भाषा जल नर जाना ॥
कवीरकृष्णगीता ।
७७
पानी नीर उदक अंभु वारी । जल कह जले नीर संसारी ॥
दोहा-नीर कवीरहिं मिल गया, अंतर रहा न रेख ।
तीनों मिल एके भया, नीर कवीर अलेख ॥
जाके होय सत्तके जोरा । सो गुरु करे कवीर वंदीछोरा ॥
जो पुन दया सत्तके हीना । तिन भज त्रिगुण देवी पंथ लीन्हा
त्रिगुण मता देवी सरगुण संसारी ॥ निर्गुण सत्यकवीर जिवतारी ॥
नीर बिना नहिं पण पछली । महि बिना कोइ बैठे न चली ॥
सो महि मीन रूप स्थापा । मीन भषहिं बड लागहि पापा ॥
मीन एक गौ द्विज शत कोटी । तिल भर मीन नरकके कोटी ॥
महादेववचन ।
कोध महादेव वचन उचारा । विनामीन नहिं मातु अहारा ॥
अष्टंगविवचन ।
उठ अष्टंगी सबहिं बुझावा । कक्षप सूकर महादेव खावा ॥
मैं तो आद निरंजन बामी । हमरी प्रत को श्रवण प्राणी ॥
एक दिन जो कोइ तिलभर खाई । पुरुषा सहित सो नरक सिधाई ॥
हम तो विष्णु ब्रह्मा शिव माता । एक दिन मम कामन राता ॥
ब्रह्माहु मम वचन नसाये । तुमहु शिव नीके बरताये ॥
विष्णु भागि गो साधुन संग । खाहिं मीन हम तेहि नहिं संग ॥
हमहू मीन खाय अघ बूढे । मांस खाय अघ सुडे बूढे ॥
जल शिव सभा माहिं हम हारा । तुरत भरम होहु आप हमारा ॥
भयउ भरम शिव बहुरि जियाय ॥ सर्व जीवके तेहि मीन खवाया ॥
७८
कबीरकृष्णगीता ।
मीन खवाय ज्ञान हर लीन्हा । प्रेतक ईस महादेव कीन्हा ॥ ब्रह्मा कहा जननी परखावा । औरहिं ब्रह्म ज्ञान बतलावा ॥ ब्रह्माहि बधुपुन तुरत जिआवा । मीन मांस भर सुरा खवावा ॥ ब्रह्मा कहैं तब कीन्हेट प्रेता । द्विज तन जगत भेष धर केता ॥ प्रेत अंस औ नौ गृह अंसा । भाषि हैं सखा तुव मांस परसंसा ॥ विष्णु जननी कहैं सीस नवावा । मैं बालक माते बरतावा ॥ भई विष्णु पर मात दयाला । कबीरके हांथ देवाइव माला ॥ कहे अघा कबीरसे रोई । विष्णुहिं चांप सके नहिं कोई ॥
दोहा—ब्रह्मा शिव एक मत भये, विष्णुहिं करिहैं उदास ।
तोहि शरण कबीर हरि, राखि लेहु यहि पास ॥
तुमका अघा सौपहु आज्ञ । हरिकर कीन्ह प्रथम हम काज् ॥
विष्णु साधुकी संगत कीन्हा । ताते हम विष्णुहिं चित दीन्हा ॥
साधु सनेह औ गुरुके सनेही । कबहुँ दोष नहिं आवे तेही ॥
तुमहू अघा सेवहु साधू । गुरुकर मिटे काल उपाधू ॥
सहस्रसुखी सिखवन मान हमारी । हमरी सुरत ध्यान चित धारी ॥
एक काल निरंजन राई । बांचहि हमरे हुकुम चलाई ॥
अष्टंगीवचन ।
कहे अष्टंगी हम तुव चरी । तुम्हरे शरण जीव सब करी ॥
दोहा—सुरतके चौका सर्वारके, दीन्ह अष्टंगी पान ।
आद कला सो लोक गई, कीतम अंस सब जान ॥
सत्यकबीर प्रमारथ बोले । कबीर प्रताप सबे पक्ष खोले ॥
कृष्णको निरंजन शिवके कोपसे बचानेके लिये कबीरका प्रकट होना
कबीरकृष्णगीता ।
७९
जापर दया करहिं सतनामा । सत्यनाम सो कबीर सुखधामा ॥ सत्यकबीरकी जापर दया । सत संतोष दया तहैं छाया ॥ कबीर सुवास फूल तिल संसीरा ॥ सत्यकबीर घृत जग तम हीरा ॥ कबीर अभी विष राय निरंजन । तारहिं कबीर काल शिरभंजन ॥
दोहा—कैसो अधीन अगाध होय, जो गुरु करी कबीर ।
विष्णु व्यास सत कहतहैं, तेहि छूटे भोजलपीर ॥ कबीरके सुमरे पाप नसाई । कबीरके भजे यम निकट न जाई ॥
अजहरवचन ।
अजहर विनवे दोइ कर जोरी । श्रीकृष्ण सुन विनती मोरी ॥ कहु सोहंग कर मूल बखानी । कासो भये सोहंग उत्पानी ॥ निराकार अद्या पितु माता । तिनतो कीन्हा सोहंग घाता । मात पिता घाती नहिं होई । गुरु साध घाती नहिं कोई ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण सुन रुद्र वियोगी । तुव समान नहिं जगमा जोगी ॥ सो तुम आद सोहंग न चीन्हा । हम तो आद सतनाम गहि लीन्हा ॥ सत्यनाम जग प्रगट कबीर । स्वासा सोहंग अंस सत धीर ॥ अमर कबीर अमर सतलोक । अंस सोहंगम कबीर निहसोका ॥
शिववचन ।
कहैं शिव जो कबीर करतारा । मम बल जीतहिं तो हम हारा ॥ दोहा—वाठे शिव आकाश लहि, कीन्ह कृष्ण पर धाव । विष्णु कबीर पुकारहौं, कबीर प्रगटे तेहि ठांव ॥
८०
कबीरकृष्णगीता ।
भयउ सुगंध महा घन घोरा । भयउ अंजोर भाग चल चोरा ॥ लिंग समेट गदहा होइ भागा । तबहिं विष्णु शिव गोहने लागा ॥ फिर शिव देख कहा बल भयऊ । कबीरके त्रास गदहा होयगयऊ ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर हरि आव सिंहसन । विष्णो झोह हीन भक्ष डासन ॥ प्रेत पिशाच भूत रखवारे । तासो बंजनी कहा हमारे ॥ हमरे साथ भजन सतनामा । भूत पिशाच घोर अघकामा ॥ साधनका जो दुखावे आई । आपन बल करे नाम सुहाई ॥ हमरे नाम सुरत चित गहहू । सकल समयस्तो निर्भय रहहू ॥ प्रथमहिं सिंध मथन तिहुं लरऊ । कबीर प्रताप तहाँ निश्तरऊ ॥ ब्रह्मा शिव देवी कर दूता । कहैं विष्णु भोहि दुखावे बहुता ॥ सत्यकबीर एक तुव प्रतापा । कालहिं जीत भक्त स्थापा ॥
दोहा—कहैं कबीर कृष्ण सुन, हम तोहि सदा सहाय ।
सुमरे नाम जो मेरो, और सतपंथ चलाय ॥
त्रिगुणके पिता निरंजन ऐठा । पुनहिं पाप करावे वैठा ॥ पुण्य पाप नहिं नाम समाना । साधुसेवा गुरु भक्त प्रणामा ॥
दोहा—कहैं कबीर कृष्ण सुन, साधु सरूप है राम ।
विष्णु साधु सरूप गुरु, गुरु सरूप सतनाम ॥
बहुरि शंभु सनकादिक आये । ब्रह्मा अवागन ससुझाये ॥
यहां कबीर कृष्ण सतरूपा । अंतर दीन्ह दर्श नहिं भूपा ॥
एक वार शिव बरस अंगारा । सब अंगारपर रुद्र कपारा ॥
सनकादिका शिवका जिलानेके लिये प्रार्थना करना
कवीरकृष्णगीता ।
८१
जरा जरे बांच लट तीनी । बहुर कवीर भस्म तेहि कोन्ही ॥ तब अज सनकादिक चल भागी । तबहींके तन लूक सो लागी ॥ तब सनकादिक विष्णु पुकारा । विष्णु कहा सुमरहु करतारा ॥ कवीर बस्ते तो बांचहु झारा । सबके मूल कवीर करतारा ॥ सनकादिकमचन ।
कहैं सनकादिक राख कवीरा । ज्वाला छुटा भौ निर्धल शरीरा ॥ तब सनकादिक स्तुति कीन्हा । सत्यकवीर कहा सब चीन्हा ॥ सनकादिक तन तपके पूजा । हीरा विष्णु रुद्र अज गुंजा ॥
दोहा—सत्यकबीरके पगु परे, सनकादिक बिलखाय । अब तो बरुसहु चक्र प्रभु, रुद्रहि देहु जिआय ॥ सरजिव कीन्ह कवीर दयाला । चक्षुहीन जपु सुंडके माला ॥ रुद्र आंखके भा रुद्राक्षा । आपन चक्षु आप शिववाक्षा ॥ बहुर चक्षु कवीर कर दीन्हा । आद सिरसापन दैवे लीन्हा ॥ तुम तीनों भई हर सरदारा । रहियो विष्णुके आज्ञाकारा ॥ तबते रुद्र कवीरहिं चीन्हा । रहियो सेवा विष्णु अधीना ॥ छांठ धुरत मत जोग अराधा । भांग धतूरा माहुर साधा ॥ गगन ध्यान मन जोत प्रकाशा । परम जोत दिन मुक निरासा ॥ परमजोत सत्यनाम कवीरा । जोत निरंजन काल अहीरा ॥ सत्यकबीर गुप्त होय गयऊ । सनकादिक हर पूछे लियऊ ॥ कहिये विष्णु कबीरके माहिभा । हम बहु माना कबीरके सीमा ॥ कहैं हरि तुव मानिक होई । सत्यकबीरके यम डर रोई ॥ सुनहु आदके बात गोसाई । जबते हम कवीर लाखि पाई ॥
सनकादि और विष्णुका सम्वाद - वेदादिकी उत्पत्ति
८२
कबीरकृष्णगीता ।
प्रथमहि सतयुग यम मोहि जारो । निराकार यम पिता हमारो ॥ तीनों देव औ कोट तैतीसा । सबकहैं जार भ्रम कर पीसा ॥ जीवहिं कब दीन्ह बहु काला । तहाँ भगट सतपुरुष दयाला ॥ जिन सब जीव सोंप धर्मराई । सो सत्यनाम कबीर सुखदाई ॥ महाभयंकर काल निरंजन । धर्म अजाजिल वंस अंजन ॥ अजाजील धर्मराय लखाये । आप काल करता कहलाये ॥ कहइ रक्षाके भक्षक ताहीं । ध्रुव प्रह्लाद अजहु पछताहीं ॥ भक्ष करे जिव चांपे काला । जार बार करे निपट बेहाला ॥ राम कहे सत कहे नरेशा । सत्यनाम विन कागके भेषा ॥ दोहा-धुनकट कौसे अंस भरी, सप्रथ सत्यकबीर । पतिव्रता गंगा गती, वण्ड्य व्यास रघुवीर ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण प्रगटे सतनामा । सत्यकबीर जोगजीत सुखके धामा ॥ हने सीस मम पितुके अनंता । जार भ्रम किय यमहिं तुरंता ॥ सत्यकबीर आजा मैं नाती । कबीर दुलहा हम सबहि बराती ॥ कालहिं जार भ्रम यम साखा । दान कदसा अंस भर राखा ॥ दोहा-धुनकट केंस अंस भरि, बहरे काल बरिआन ॥ जाय स्वर्ग गे लागा, देवतन देख रिसान ॥ सकल देव तेहि यासन धावा । भाग सबे कबीर पहुँ आवा ॥ तत्क्षण सत्यकबीर जोगजीता । कालीहिं भ्रम कीन्ह भये रीता ॥ लक्ष बार तेहि जार निकंदा । पुनि सजीव कीन्ह कहैं मैं बंदा ॥
कवीरकृष्णगीता
८३
कवीरवचन ।
कहे कवीर वंदा तैं काकर । जाकर दास नाम ले ताकर ॥
निरजनवचन ।
कहे काल कवीरको दास । जिन मोहि छिनया सिरज विनासा ॥
कहे कवीर तैं कासो डरसी । काकर भक्त विहुन भक्ष करसी ॥
कहे काल मैं पुरुषके अंसा । पुरुष कवीर एक परसंसा ॥
सत्यकवीर सो हमरे श्रेष्ठा । और न करे छिनक महे नष्टा ॥
बहुर सहस्र बेर तेहि जारा । सिरजेउं बहुरि काल तव हारा ॥
पृच्छिहि जोगजीत सुन काला । कासो डरस कहु यम ब्याला ॥
बोले काल रोप सिर धुनिया । तुम्हरो दास तुव मेरे सिर मणिया ॥
तुव सत्यपुरुष हम तुम्हरे चेरा । तुम्हरे दास मकुट सिर मेरा ॥
जो लेहि सत्यनाम परवाना । तोहे सम ताहि गिनो निरवाणा ॥
दोहा—सत्यकवीरके दास, जो मैं पुन ताके दास ।
जो जिव विलग कवीरसे, यम तेहि घाले फांस ।
धन्य सत्यनाम कवीर अटोटा । जिन महाकाल बांध यम कोटा ॥
यमके कोट कर्म भ्रम धोखा । सत्यकवीर विन पावे नहि मोषा ॥
कवीरवचन ।
कहे कवीर सुन काल निरंजन । अजाजील तुम साकटभंजन ॥
हमहिं गौय कस पाया चोरा । आपहि पुरुष थाप कस भोरा ॥
कालवचन ।
कहे काल मोहि व्यापेउ ऐसा । पुरुषहिं मेट राज करें वैसा ॥
जब मन महे अस चितवन कीन्हा । दस बीस सीस दूट परभीना ॥
८४
कबीरकृष्णगीता ।
बहुर कीन्ह मैं सुमरण साईं । सीस मोर धड लागे आई ॥ तब मैं जाना पुरुष दयाला । सेवक चूक न मन महीं चाला ॥ निशि दिन धरों मैं पितु पगु ध्याना । पै कछु मन महीं भौ अभिमाना तब तुम योहिं भ्रम कर डारा । कबीरते आद अंत यम हारा ॥ जो सतनाम राखे तो रहऊं । डाहे तो बिन अगिन डहाऊं ॥
दोहा—सत्यकबीर जो सुमरहीं, तोहि मैं निकट न जाऊं । कबीरके भक्त विद्वान जो, कहे काल तेहि खाऊं ॥
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण सनकादिक सुनहूँ । आद पुरुष कबीर चित गुनहूँ ॥
सनकादिकवचन
कहे सनकादिक अब हम चीन्हा । सब मूल कबीर गम कीन्हा ॥ अब हम सत्यकबीरके शिष्या । कबीरके सुरत हृदयमो लिखा ॥ बला सुत हम सहस्र अठासीं । कबीर बिना सब परे यमफांसी ॥ अब जिव सत्य कबीरहिं दीन्हा । कबीरके अगुवा विष्णुहिं चीन्हा ॥
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण जब लेहो परवाना । यम त्रिण तोर संहाय सतनामा ॥ यह सुन सनकादिक धर ध्याना । कृष्णके स्तुति आप बखाना ॥ सत्यलोकके हंस संग आये । झलकत झलझल सुवास बसाये ॥ कोटिन रावे शशि एक न तुलहीं । एक हंस ससि अर्बन तुलहीं ॥ शोभासिंधु राससुख मूछं । ताहि सुख जेहि कबीरसम तुछं ॥ सत्यकबीर जग दास कहाये । साधरूप धर भक्त हठाये ॥ इह हम कहैं यमसुखते बचावा । जगमहैं हमरे नाम खिडावा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
८५
कहै कृष्ण पग समर्थ नाई । कहैं लग कहों मैं समर्थ बढाई ॥ सतकबीर मेटो यम दुःखा । सनकादिक सुन प्राण पिशुषा ॥ यम त्रिण तोड कालसुख थूका । आरती यंगल यम धर लूका ॥
दोहा—दियो पान सनकादिको, मग्न भये सब साथ ।
कहे सनकादिक सुख भये, मिटा काल आध ॥ कहैं सनकादिक धन्य सतनामा । क्षण यहैं हम सबको भो कामा ॥ जै जै सत्यकबीर दयाला । सनकादिक जप कबीरको माला ॥ मग्न भये सब तन मन शोधा । पांच पचीस मन सहज सभोधा ॥ चैदह यम त्रिगुण जेहिथाकी । अरिहित सम लघु दृग एक ताकी धन्य सो सतकबीर सत्यनामा । मैं लघु सेवक कबीर सुखधामा ॥ सयकादिक बहु स्तुति कबीरा । सुरति निरति गहि तन मन थीरा व्याघ्र भ्यानहर अज बिग कागा । चारों झोहर करने लागा ॥ सब हरे सनकादिक क्रांति । मिल सनकादिक साधुके पांती ॥ एक बारके हुकार सब गजी । आप आप कह अज हरी तजी ॥ तब कबीर सनकादिक आगे । सतकबीर आवत यम भागे ॥ कछु पग जाय भये चक्षुहीना । बहुर कुष्ट होय चुये अभीना ॥ पगुके हीन भये सिर कूटा । जरि भो चिता केर जस खूंट ॥
दोहा—चारों मूठ नर पूछे, कहे आप महशोय ।
जो कबीर ना आवते, तो सब खात बिगोय ॥ ऐसे भौ पुन चारों वेदा । स्तुति करहि कबीरको भेदा ॥ कहा कबीर वेद समुझाई। धर तन शक्त करहु मनलाई ॥
८६
कबीरकृष्णगीता ।
चारों वेदके तारन हारा । पंचयें सुसम वेद सोहंगम तारा ॥ सतकबीरको अंस सोहंगा । स्तुति वेद कबीर प्रसंगा ॥ आज्ञा मान भक्त चित दीन्हा । चार वर्ण भये भक्त अधीना ॥ ब्राह्मण क्षत्री वैश्य औ शूद्रा । कोई करे भक्त कोई तपमुद्रा ॥ भक्त विना धन वित सब छारा । सतकबीर विनती यम धारा ॥ सत्यकबीर सत्य सो राजी । काम क्रोध मिथ्या यम बाजी ॥ सोहंसा सारपद चाही । अजर अमर जिव अमर व्याही ॥ भजहिं कबीर सो जाहिं अमरपुर । सब सुख विलसहिं कर्म कालदुर भजे सो सत्यकबीर पतिव्रत छवा । तिभिर थिठै जब उदे ज्ञानवा ॥ तिभिर त्रिगुण मन मत सब चारा । सोतहवां अंजोर कबीर मत सार ॥ विष्णु अवरण तुलसी भूषण । मृतुका तिलक काहु नहिंदूषण ॥ अंकुर कंद मूल गुर घीऊ । पान फूलपट सेत सोइ लेऊं ॥
दोहा—मीन मांस जो भखे, तासु अन्न जल नाहिं । साकटको घर भात ताजि, छूट साधको खाइ ॥ एक दिन महाकाल रिसियाना । तीन. लोकमो परा भगाना ॥ सहस्रमुखी तक्षक होइ उठा । जाय इंद्रासन इस इंद्र सुडा ॥ भागे देवता अखिल पताला । वहां सहस्रमुखी जहैं जवाला ॥ दौरे काल कैलासहि आवा । शिव कहैं डंक कीन्ह बहु भावा ॥ बहुर काल धाये वैकुंठा । जै औ विजय सांस धर उठा ॥ खैच उरधके डसेउ बनाई । विष्णुके ढिग दीन्ह गिराई ॥ मृतुक साथ तक्षक गिर तहां । विष्णु व्यास सुखदेव सब जहां ॥