कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
सत्य पुरुष का वर्णन
ज्ञानसागर
( ३ )
धर्मदास वचन-चौपाई
विनकैं स्वामी दोह कर जोरी । कहौ गुसाईं नामकी डोरी ॥
निरंकार निरंजन नाऊं । जोत स्वरूप सुमरत सब ठाऊं ॥
गावहि विद्या वेद अनूपा । जगरचना कियो ज्योति सरूपा ॥
भक्त वत्सल निजनाम कहाई । जिन यह रचि सृष्टि दुनियाई ॥
सोई पुरुष कि आहि निनारा । सो मोहि स्वामी कहौ व्यवहारा ॥
जिह्ति होय जीवको काजा । सो मैं करहुँ छोड़ कुल लाजा ॥
होहु दयाल दयानिधि स्वामी । बोलहु वचन सुधा रस वानी ॥
नाम प्रभाव निज मोहि बताओ । होहु दयाल मम तृषा बुझाओ ॥
साखी-जो कुछ मुझे सन्देश है, सो मोहि कहो समुझाय ।
निश्चय कर गुरु मानिहौँ, औ बंदो तुम पायँ ॥
साहिब कबीर वचन-चौपाई
तुमसों कहौँ जो नाम विचारी । ज्योति नहीं वह पुरुष न नारी ॥
तीन लोक ते भिन्न पसारा । जगमग जोत जहाँ उजियारा ॥
सदा वसंत होत तिहि ठाऊं । संशय रहित अमरपुर गाऊं ॥
तहँवा जाय अटल सो होई । धरमराय आवत फिरि रोई ॥
वरनों लोक सुनो सत भाऊ । जाहि लोकतें हम चलि आऊ ॥
जगमग जोती बहुत सुहावन । दीप अनेक गिने को पावन ॥
जगमग ज्योति सदा उजियारा । करी अनेक गिने को पारा ॥
छंद
जहँ ज्योति जगमग अति सुहावन तत्त्व वारिध अति चलै ।
कहत दोई कुल तिमिर मनो पन्न झलहल हलै ॥
फेन उडगन बहन लागे शसि मनोहर हेरि को ।
किमि देउँ पटतर बूझ देखो भाव नहिँ वहाँ जोर को ॥
सोरठा-शोभा अगम अपार, वर्णत बनेँ न एक मुख ।
कही न जात विसतार, जो मुख होवै पदम सत ॥
सृष्टि उत्पत्ति वर्णन प्रारंभ
( ४ )
ज्ञानसागर
धर्मदास वचन-चौपाई
हे स्वामी मोहि आदि सुनाओ । कैसे पुरुष वह लोक बनाओ ॥
कैसे द्रौप करी निर्मावा । होहु दयाल सो मोहि बतावा ॥
साहव कबीर वचन
सुन हंसा तोहे कहब विचारी । लोकद्रौप जिमि करी सम्हारी ॥
इते अदेह दुतिया नहि काळ । सुरति सनेही जान कछु भाळ ॥
नहि तहाँ पांच तत्त्व परकाशा । गुण तीनों न छिनहीं अकाशा ॥
नहि तहाँ ज्योति निरंजन राया । नहि तहाँ दशौ जनम निर्माया ॥
नहि तहाँ ब्रह्मा विष्णु मद्देशा । आदि भवानी गवरि गनेशा ॥
नहि तहाँ जीव सीव कर मूला । नहि अनंग जिह्विते सब फूला ॥
नहि तहाँ ऋषी सहस्र अठासी । षट् दर्शन न सिद्ध चौरासी ॥
सात वार पन्द्रह तिथि नाहीं । आदि अंत नहि कालकी छाहीं ॥
छंद
नहि कूर्म चक्रिय वारि पर्वत अग्नि वसुधा नाहि हो ।
शून्य विशून्य न तहां होई अगाध महिमा सो कहो ॥
जिमि पुढुप तिमि छाया राखो बास भरो ता संग मई ।
स्वरूप बूझो अगम आदि महिमा अक्षर अंग मई ॥
सोरठा-प्रकट कहो जिमि रूप, देखो हृदय विचारिके ।
आदिहि रूप स्वरूप, जिहि ते सकल प्रकाश भयो ॥
चौपाई
तिनहि भयो पुन गुप्त निवासा । स्वासा सार ते पुहुमि प्रकाशा ॥
सोई पुढुप विना नर नाला । ज्योति अनेकहोत झल हाला ॥
पुढुप मनोहर सेतई भाळ । पुढुप द्रौप सबही निर्माळ ॥
अजे सरोवर कीन्हो सारा । अष्ट कमल ते आठौं वारा ॥
पोडश मुत तबही निर्मावा । कछु प्रगट कछु गुप्त प्रभावा ॥
द्वीप वर्णन
ज्ञानसागर
( ५ )
पुढूप द्वीप किमि करव बखाना । आदि ब्रह्म तहँवा अस्थाना ॥
सत्रह संख पंखुरी राजै । नौ सौ संख द्वीप तहाँ छाजै ॥
तेरह संख सुरंग अपारा । तिहिन्हिं जान काल बरियारा ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास कहैं सुनो गुसाई । द्वीप अनेक पुरुष के ठाई ॥
सो स्वामी मोहि भेद बताओ । दया करो जनि मोहि डुराओ ॥
तुमसों वरनि कहौं सत भाऊँ । मैं मनो आज महा निधि पाऊँ ॥
सुनत वचन गदगद सिर मोरा । थकित भये जनु चंद्र चकोरा ॥
मैं भुजंग तुम मलय्या गीरा । करहु दया मम दुखित शरीरा ॥
साहिब कबीर वचन
धर्मदास पूछो जो मोहीं । सो मैं भेद कहौं सब तोहीं ॥
कमल असंख भेद कहँ जाना । तहँवा पुरुष रहे निर्वाना ॥
मोही सतगुरु दियो बताई । सो सब भेद कहौं तुम पाई ॥
सत पंखुरी कमल निवासा । तहँवा कीन्ह आप रहि वासा ॥
साखी-शीश दरस अति निर्मल, काया न दीसत कोश ।
पदम संपुट लग रहै, बानी विगसन होय ॥
चौपाई
प्रगट द्वार जब देखौं शीशा । धर्मनि हिये देखौं अहै ईशा ॥
पाइर द्वीप जहँ निर्मल ठौरा । सो सब भेद कहौं कछु औरा ॥
अंबू द्वीप हंस को थाना । पाइर द्वीप पुढूप निर्वाना ॥
नौ सौ करी ताहि के हीठा । गुरु प्रसाद सबै हम दीठा ॥
तहाँ आइ पुन पाइर द्वीपा । मंजुल मंगल करी समीपा ॥
तहँवा जाइ अटल सो होई । धर्मराज आवै फिर रोई ॥
द्वीप अनेक औ करी अनेका । पाइर द्वीप हंस के थेका ॥
चार करी हैं सब से सारा । बहु शोभा तहँ रूप अपारा ॥
धर्मरायके द्वीप नहीं पानेका वर्णन
( ६ )
ज्ञानसागर
साखी-करी भेद सुन हंसा, आई देखु सत लोक ।
गुरु जो बतावहीं, मिट जाई सब धोख ॥
धर्मदास बचन-चौपाई
हे स्वामी मैं विनऊं तोही । कछु संशय जिव उपज्यो मोही ॥
धर्मराय नहीं पायब दीपा । और सबै सुत द्रौप समीपा ॥
कारण कौन दरस नहीं होई । कहौ अगम जानि राखो गोई ॥
साहिब कवीर बचन
जो तुम पूछो अगम सन्देसा । सो सब तोहि कहौ उपदेसा ॥
आदि पुरुष अस कीन्हो साजा । पाँच बुन्द हुलास उपराजा ॥
बुन्दहि बुन्द अंड परकाशा । धर्म धीर जेहि अंड निवासा ॥
अटल जोत सुरंग उजियारा । तहँवा अंड रहै मनियारा ॥
धर्म धीर जबही उत्पाना । आदि ब्रह्म तबही सकुचाना ॥
एकहि मूल सबै उपजाई । मेटचो तेज अंड कुन्याई ॥
साखी-तेज रह्यो जिहि अंड मो, तेहि नहीं दीन्हौ ठौर ।
तेहिते उपज्यो धर्म अब, वंश अगिन के जोर ॥
चौपाई
बावन लक्ष बेर अनुमाना । मेटो न मिटत शब्द परवाना ॥
एकहि मूल सबै उपजाई । मिटै न अंड तेज अन्याई ॥
धर्मराय है काल अँकुरा । उपजो तहाँ काल कौ मुरा ॥
तबहि पुरुष अज जुगत विचारा । रहै धर्म द्रौप सो न्यारा ॥
जोपै रहै सदा सिव काई । तौ एक द्रौप तुमहि निर्माई ॥
पुरुष शब्द ते सबै उपराजा । सेवा करें सुत अति अनुरागा ॥
जानै भेद न दूसर कोई । उत्पनि सबकी बाहिर होई ॥
अभिअन्तर जो उत्पति होई । काया दरश पाय सब कोई ॥
काया दरश सुरति इक पावे । संगहि द्रौप सबै निर्मावे ॥
धर्मरायका सत्य पुरुषकी सेवा करके द्वीप पानेका वर्णन । सहज की विन्ती
ज्ञानसागर
( ७ )
धर्म धीर नहि पावे द्वीपा । और सबै सुत द्वीप सर्मीपा ॥
धर्मराय अस कीन्ह बनाई । कर सेवा तेहि जागहि आई ॥
सेवा बहुत भांति सो किएऊ । आदि पुरुष तब हर्षित भयेऊ ॥
साखी-सेवा कीन्ही धर्म बड़, दियो ठौर अब सोय ।
जाय रहो वहि द्वीप में, सेवा निर्फ़ल न होय ॥
चौपाई
सात द्वीप कौ पायो राजू । भयो आनन्द धर्म मन गाजू ॥
सेवा करि पुन कीन्ह निहोरा । सुनो सहज तुम आता मोरा ॥
सेवा बसहि द्वीप मैं पाएऊँ । कैसोरचो मोहि गम्यन आएऊँ ॥
पुरुष सों विनती करु यह भारी । हे आता मैं तुम बलिहारी ॥
करिहौं सोई जो आज्ञा पाऊँ । कैसे मैं नव खंड बनाऊँ ॥
चले सहज जहँ द्वीप अमाना । कीन्ह जाय दण्डवत प्रणामा ॥
बहुविधि विनती सहज कियो जबही । बेग पुहुप बानी भई त ही ॥
पुरुष वाणी ते भया उजियारा । सुनहु सहज तुम वचन हमारा ॥
पक्षि पालना पाय है अंडा । सो लै धर्म रचै नव खंडा ॥
चले सहज तब बार न लावा । धर्म धीरसौं मता सुनावा ॥
साखी-सुनत संदेशो पुरुष को, धर्म शीस तब नाव ।
पायो आज्ञा पुरुष की, अब फाबी मो दांव ॥
चौपाई
सुनत संदेश भयो हरषंता । आन अंड जो चले तुरंता ॥
देखो धर्म जब कूर्म शरीरा । बारह पालंग है बल वीरा ॥
नव पालंग धर्म परमाना । बने न घात तब करे तिवाँना ॥
धावहि दशहू दिशा रिसाई । कैसे अंड लेऊँ मैं जाई ॥
तबहि उक्ति अस कीन्ह बनाई । तोरि शीस अस करचो उपाई ॥
शीस कीन्ह तब नख सौं छीना । अमी अंक तोरि कियो मीना ॥
धर्मरायका अधिकस्थान मांगना और मान-सरोवरका पाना
( ८ )
ज्ञानसागर
शीस तोरि लियो द्वीप अपारा । तबहि धर्म भयो बरियारा ॥
पांचौ तत्त्व अंडसौं लीन्हा । गुन तीनों सुशीस कर कीन्हा ॥
पांचौ तत्त्व तीन गुन सारा । यही धर्म सब कीन्ह पसारा ॥
तब कियो नीर निरंजन राया । मीन रूप तबही उपजाया ॥
करि चरित्र धर्म तब आया । आज सहजसों विनती लाया ॥
साखी-जाय कहौ तुम पुरुष सों, बहु सेवा मैं कीन्ह ।
सब सुत रहिहैं लोकमहैं, नव खँड हम कहैं दीन्ह ॥
चोपाई
इतने में नहि मोर रहाऊँ । जहँवा रहव देव मोहि ठाऊँ ॥
चले सहज पुरुष पर जबहीं । विनती धर्म कीन्ह पुनि तबहीं ॥
मांग्यो बीज कीन्ह बड़ लोभा । जातैं द्वीप पावों मैं शोभा ॥
सहज विनय पुरुष सों कीन्हा । हे स्वामि तुव सुन बल हीना ॥
मांगै और ठौर पुनि सोई । धर्म धीर जो तुव सुत बल होई ॥
अति अधीन मांगै जौ बीजे । सोहे द्वीप पुहुप वहि दीजे ॥
तबहि पुरुष सेवा वश भयऊ । अष्टांगी कामिनि सो दयऊ ॥
मान सरोवर ताकर नाऊँ । सोऊ दियो धर्म कहैं ठाऊँ ॥
अष्टांगी कन्या उत्पानी । जासौं कहिये आदि भवानी ॥
रूप अनूप शोभा अधिकार्ई । कन्या मान सरोवर आई ॥
साखी-चौरासी लक्ष जीव सब, मूल बीजके संग ।
ये सब मान सरोवरा, रच्यो धर्म बड रंग ॥
चोपाई
सहज संदेशो ल्याये जहँवा । धर्म धीर ठाढे हैं तहँवा ॥
कह्यो संदेश धर्म मन गाजा । मान सरोवर जाइ विराजा ॥
साखी-देखि रूप कामिनि कौ, पल भर रह्यो न जाइ ।
आगे पीछे ना सोचिया, ताकौ लीन्हेसि खाइ ॥
पुरुषका निरञ्जनको शाप देना
ज्ञानसागर
( ९ )
चौपाई
कन्या सों अस कीन्ह अन्याई । सहजसों लियो जो तुरत बुझाई ॥
यहै चरित पुरुष जब देखा । दीन्हें शाप सो कहों विशेखा ॥
सवा लक्ष जीव करौ आहारा । तऊ न ऊदर भैर तुम्हारा ॥
सुमिरन कूर्म पुरुष को कीन्हा । अहहो पुरुष धरम सिरछीन्हा ॥
तुव आज्ञा मैं अंड जो दीन्हा । धर्मराज काहे सिर लीन्हा ॥
सुनत वचन प्रभु बहुत रिसाने । जोगजीत तबही उतपाने ॥
आज्ञा भई तुम वेग सिधारी । धर्मराज कहैं मार निकारी ॥
आज्ञा मांग चले तब ज्ञानी । धर्मराय सो बातैं ठानी ॥
अरे पापी तू पुरुष को चोरा । भागहु वेग कहा सुन मोरा ॥
सुनतहि कोध भये धर्म धीरा । जोग जीतके सन्मुख भीरा ॥
जोग जीत तबहीं फटकारा । जाय रहौ तब लोक ते न्यारा ॥
जोग संतायन चल भये जबही । धर्म धीर आयौ पुनि तबही ॥
बार अनेक युद्ध जिहि कीन्हा । मारे न मरत बहुत बल कीन्हा ॥
धर्मराज वचन
तब मैं हतौ पुरुष के ठाऊँ । तब नहिं सुन्यो तुम्हारौ नाऊँ ॥
को तुम हौ सो मोहि बताऊ । सहज भाव तुम फेर बनाऊ ॥
ज्ञानी वचन
धर्म धीर सों कहा बखानी । मर्दन धर्म नाम मम ज्ञानी ॥
जब तुम कीन्ह चार का काजा । तातैं पुरुष मोहि उपराजा ॥
मारहुँ तोहि कहौ सतभाऊ । अष्टांगी तैं कामिन खाऊ ॥
सुनतहि कोध धरम पर जरेऊ । जरत हुताश मनहु घृत परेऊ ॥
साखी-करहि युद्ध बहु भांति सों, कैसेहु क्षमा न होय ।
क्षण एक लरचौ सहज तुम, करु उपाय अब सोय ॥
( १० )
ज्ञानसागर
चौपाई
पुरुष आज्ञा अस भयउ अपारा । मारहु धर्म के मांझ कपारा ॥
आज्ञा पुरुष ज्ञानीदियो जबही । मारौ शीश परो खस तबही ॥
संशय भयो तासु की देहा । ताकहैं भयो जी महाँ संदेहा ॥
धर्म धीर कौ रुधिरसे जबही । विषम सरोवर उपजौ तबही ॥
कन्या निकस जो बाहिर आई । संशय काल तिहि घटहि समाई ॥
शीश दियो लै कुर्म के पास । पुरुष आज्ञा सौ कीन्ह निवासा ॥
आज्ञा कीन्हही बेग निकारहु । कहै जोइ अब धर्म सिधारहु ॥
छाड़हु अंश खंड का गाऊ । विषम सरोवर माहि सा जाऊ ॥
देखो बहुत रूप उजियारा । अस कामिनि तैं कीन्ह अहारा ॥
फिर मैं गयो पुरुष के पास । धर्म धीर अस करहि तमाशा ॥
कह कामिनि सुन पुरुष पुराना । मैं अपना कछु मरम न जाना ॥
कौन पुरुष मोही उपजाई । सो मोहि गम्य कहौ समुझाई ॥
धर्मराय वचन
कन्या मैं उपजायो तोही । रहौ अलख नहि भेंटसि मोही ॥
कन्या कह सुन पिता हमारा । खोजो वर होय व्याह हमारा ॥
वर खोजौ जो दुतिया होई । कन्या मैं अब व्याहौ तोही ॥
पुत्री पिता न होवत व्याहा । पितहि पाय बहुतै औगाहा ॥
साखी-धर्म कहै सुन कन्या, भर्म भयो मति तोहि ॥
पाप पुण्य हमरे घरे, क्या डहकस तैं मोहि ॥
चौपाई
आदि भवानी और धर्मराऊ । इन सब कीन्ह सृष्टि निर्माऊ ॥
पांच तत्त्व तीन गुण रहेऊ । बीज सहित अष्टांगी दण्ड ॥
चौरासीलक्ष जीवदियो सम्हारी । रचहु सृष्टि अब आदि कुवारी ॥
सेवा करहु सृष्टिकी ओरा । अलख निरंजन नाम है मोरा ॥
कन्याका धर्मरायके पेटसे निकलना और धर्मरायका उसे ठगना तथा दोनोंका मिल-कर सृष्टिकी रचना करनेका विचार करना और रचना
ज्ञानसागर
( ११ )
छन्द
कहै भवानी सुनहु निरंजन यह मन्त्र निज सोई भले ।
अस करहु कुलफ कपाट दै सब जीव जाहितै ना चले ॥
दस चार सुत दीजे भयंकर जिहि तैं होय त्रास हो ।
तिहु लोक होत झटा पटा अब चार जुगन निवास हो ॥
सोरठा-चौदह वीर अपार, चित्रगुप्त दुर्गदानी सम ।
आन देई अहार, सवा लक्ष जिव रात दिन ॥
चौपाई
जस कछु मत कियौ आदि भवानी। धरमराय ऐसी मति ठानी ॥
जाइ रहौ जहाँ पांजी वाँका । धरती शीस सरग का नाका ॥
दशों दिशा हूँधे सब ठाऊँ । है द्वार मैं कहि ससुझाऊँ ॥
गुरु जो कहै औ पन्थ बतावे । ओहि पन्थ हंस घर आवे ॥
धर्मराय मूदो वह द्वारा । तबहि भवानी युक्ति विचारा ॥
तीनों गुण तिय अण्ड सम्हारा । पुनि भाखौ आगिल व्यनहारा ॥
नाम कहौ कह राखौ गोई । रजगुन तमगुन सतगुन होई ॥
अष्टांगी अण्डन मन दीन्हौ । धरमराय कछु उद्यम कीन्हौ ॥
मीन रूप जो प्रथम सुभाऊ । ता पीछे कूर्महि निर्माऊ ॥
ता पीछे बाराह को थाना । ता पर उग्र कीन्ह उत्पाना ॥
छन्द
अस कीन्ह सबहि निरंजना तब दीन्ह मही को थेग हो ॥
महीतल दीन्हौ मीन कच्छप सूकर दीन्हौ शेष हो ॥
सुम्मेर पर्वत अति धुरंधर दीन्ह मही जो नाचलै ॥
दशों दिशा दिगज चार दीन्हैं जिहितै मही ना डग मगे ॥
सोरठा-दीन्हौ महि कौ भार, वारी जगत लगायकै ।
जाकौ तमहि अपार, चतुर विधाता ठग भये ॥
चौदह यमका नाम और कर्म
( १२ )
ज्ञानसागर
धर्मदास वचन—चौपाई
धर्मदास टेके गहि पाऊ । नाम जमन कौ मोहि सुनाऊ ॥
चौदह यम मोहिवरनी सुनाओ । दया करहु जिन मोहि दुरावो ॥
साहेब कवीर दास
दुर्ग द्वांनी चित्रगुप्त वरियारा । एता जमन के हैं सरदारा ॥
मनसा मल्ल अपरबल मोहा । काल सैन मकरंदी मोहा ॥
चित्त चञ्चल औ अन्ध अचेता । मृत्यू अन्ध जतन जो खेता ॥
सूरा संख और कर्म रेखा । भावी तेज तालुका पेखा ॥
अग्नि औ क्रोधित कहिये अन्धा । जामें जीव जन्तु सब बन्धा ॥
परमेश्वर अपर्वल धर्मराया । पाप पुण्य सबसों बिलछाया ॥
ये सब जम जो निरंजन कीन्हा । लिखना कागज रचके दीन्हा ॥
छन्द
चित्रगुप्त लेखौ लगवौ बंधु दोह चतुर भल ।
लख चौरासी रसन जाकै लखि लावत कै छलै ॥
लेखा लगावत जीव को जब अवधि पूजै आइ हो ।
सवा लक्ष प्रमाण बांध्यो ठग निरंजन राइ हो ॥
सोरठा—ऐसा कीन्ह विचार, वारी जगत लगाय कै ।
भूल परो संसार, एक नाम जाने विना ॥
चौपाई
देख भयंकर जम की काया । चौरासी लक्ष जिव डरपाया ॥
विकट रूप देखत जम पासा । सब जीवन भये जो बहु त्रासा ॥
सब मिलि कै तब स्तुति ठाना । सुमरण एकहि आद प्रवाना ॥
यहि विधि विनती हसन ठानी । तबहि भई घर अघर तैं वानी ॥
वानी विगसत भये उजियारा । जोग संतायन तब पगुधारा ॥
आज्ञा कहा पुरुष मोहे कीजे । करब सोई जो आयसु दीजे ॥
कालका जीवोंको दुःखित करना और सत्य पुरुषकी आज्ञासे ज्ञानीजीका पृथ्वी-पर आना
ज्ञानसागर
( १३ )
पुरुष वचन
हंस दुखित भये काल के पास। जाइ छुड़ावहु कालकी फाँसा ॥
कहा करो जो हारो बोला। बरवस करब तौ सुकृत डोला ॥
जोग जीत तुम वेग सिधारो। भव सागर ते हंस उवारो ॥
ज्ञानीवचन
चले ज्ञानी तब मस्तक नाई। पहुँचे तहैं जहैं धरम रहाई ॥
धर्मराय ज्ञानी कहैं देखा। क्रोध भयो जनु पावक रेखा ॥
यहूँवा आये किहिं व्यवहारा। लोकहि से मोहि मारि निकारा ॥
मानेव आज्ञा छाड़िब लोका। यही जान परे तुम धोखा ॥
करो संहार सहित तोहे ज्ञानी। मरम हमार तुम कछून जानी ॥
साखी--संहार करौ पल भीतर, कहौ वचन परचार ॥
पेलौ मान सरोवरै, विध्वंसौ द्वीप सब झार ॥
चौपाई
ज्ञानी कहैं सुन धर्मनि आगर। तो कह ठौर दीन्ह भवसागर ॥
तीनौ पुर दीन्हौ तोहि राऊ। पुरुष आज्ञा आयो धरि पांडु ॥
चौरासी लक्ष जीव तोहि दीन्हा। तैं जीवन बड़ सासत कीन्हा ॥
आज्ञा पुरुष करौ परवाना। जीव लोक सब करौ पयाना ॥
पुरुष वचन मेटे फल पावहु। कियो अवज्ञा लोकसे आवहु ॥
सोह करहु रहन जो पावहु। की यहवाँ तैं वेग सिधवहु ॥
कै जीवन कहैं दीजे बांटा। बोलहु वचन धर्म तुम छांटा ॥
साखी--धरम कहैं सुन ज्ञानी, आज्ञा पुरुष की सार ॥
सेवा करत रैन दिन, पल पल सहित विचार ॥
चौपाई
आज्ञा मान लीन्ह मैं तोरा। अब सुनिये कछु विनती मोरा ॥
सो ना करब जो मोर विगारा। मांगौ वचन करौ प्रतिपारा ॥
पुरुष दीन्ह मोहे राज बुलाई। तुमहीं देव जो संशय जाई ॥
( १४ )
ज्ञानसागर
लीजे हंस जो भक्त परमाना । तीनों जुग हैं मेरे थाना ॥
चौथा जुग तबही उत्पानी । तबहि सम्हार सुनौ हो ज्ञानी॥
कैसे सम्हारो मोही समझावहु । की भक्ति जो मोहि सुनावहु॥
कहैं धर्म सुन जोग संतायन । ऐसे हंस न होय मुक्तायन ॥
हरि मन्दर मैं रचौ बनाई । तहँवा हंस करत मम नाई ॥
जो कोई गम्य न करै विचारा । सात जन्म लौं चोर हमारा ॥
सुन ज्ञानी विहँसित मन कीन्हा । कैसा हरि मंदिर का चीन्हा ॥
धर्मरायवचन
जब मम कन्या भयो प्रसंगा । मनमथ उपज्यौ भयो उमंगा ॥
चलयौ रुधिर कामिन केजबही । नख रेखा भग उपजी तबही ॥
चलयौ रुधिर ताको रज भएऊ । गर्भ प्रसंग अंड तिय ठएऊ ॥
तेहि प्रसंग तिय गुण उपराजा । तबतै अधर निरञ्जन राजा ॥
सारखी-ज्ञानी कहैं धर्म सो, छल मतौ तुम्हारै ॥
जाको मैं चेतावहुं, सो तुमहीं सो न्यार ॥
चौपाई
विनती तोर करों प्रतिपाला । जुग तीनों जीवन वर साला ॥
चौथा जुग अंश मम आवहि । नाम प्रताप हंस मुक्तावहि ॥
धर्मरायवचन
हे स्वामी वर आयसु होई । कछु मांगों अब दीजे सोई ॥
सो न करब जो सब जिव जाई । भवसागर खाली परजाई ॥
ऐसा मत ज्ञानी तुम ठाँनहु । आज्ञा पुरुष की तुमहु मानहु ॥
पुरुष बोल हारा मोहि पाहीं । सोनकरब जो सब जिय जाहीं ॥
कह ज्ञानी सब मैं मानी । कह्यौ वचन सो करब प्रमानी ॥
सतजुग त्रेता द्वापर जाई । कलियुग कौ प्रभाव जब आई ॥
चार अंश मैं कीन्हौ थाना । खुंट गहौ तो नहीं प्रमाना ॥
ज्ञानसागर
( १५ )
धर्मरायवचन
साखी--बाँवन नरसिंह अंश मम, परसराम बलवीर ॥
रामचन्द्र आगे करौ, तब पुनि कृष्ण शरीर ॥
चोपाई
कृष्ण देह छाँडव मैं जहियाँ । कलियुगचौथायुग होय तहियाँ ॥
तब हम करिहैं बौद्ध शरीरा । जगन्नाथ सरोवर के तीरा ॥
राजा इंद्र दवन परवाँना । मंडप काम लगावैं तवाँना ॥
मंडप तास उठन नहिं पाई । सायर उमंग खसावन आई ॥
तब ज्ञानी पूछैं यह बात । तोहि ते उपजै सायर साता ॥
जगन्नाथ तैं कष्ट बनाई । सायर कवनहुं भाँति खसाई ॥
हँस्यो धर्म कहि सतौ अपाना । कहौ करतूत सुनौ परिवाना ॥
दैत्य अनेक जीव जो मारौ । अंश मोर तेहि जाय सँहारौ ॥
राम रूप जब होय हमारा । तिनसौ होइ है द्रोह अपकार ॥
दैत्य अनेक जीव को फेरा । वालि वधे औ सायर तेरा ॥
वालि बैर मैं तुरत दिवायव । व्यादि फाँसी सो कृष्ण मरायव ॥
साखी--सायर बैर ना पावई, करि है वाऊ सौ घात ॥
मंडप उठन न पाइ है, जातैं कहो अस बात ॥
चोपाई
हे ज्ञानी अस मतौ विचारहु । प्रथमहि सागर तीर सुधारहु ॥
मोहिं थापहु मैं करहुं निहोरा । तातैं भाव जूरे नहिं मोरा ॥
मण्डप उठे अटल हो राजू । पुरुष वचन कहैं तुम कहैं लाजू ॥
पहिले थापहु मो कहैं ज्ञानी । सागर तीर बैठहु अन्तर्यामी ॥
कहे जोग जीत सुनो धर्मराई । पुरुष बोल मेटा नहिं जाई ॥
सतजुग त्रेता द्वापर माहीं । तीनों जुग अंश मोर जहैं जाहीं ॥
कोई कुल हंस शब्द जो पावई । तीनों जुग जीव थोरा आवई ॥
कलियुग मोर मनुष्य शरीरा । जा कहैं सुनियों नाम कबीरा ॥
सृष्टि उत्पत्तिकी कथा वर्णन
( १६ )
ज्ञानसागर
जो जिव नाम शरण गति आवै । होय निशंक लोक कहैं जावै ॥
और इकोतर नामहि पावै । तुम कह जीत हंस घर आवै ॥
माँग्यो वचन करौं प्रतिपाला । जुग तीनों जीवन वरशाला ॥
जातै पुरुष वचन अब हारा । करौं सो वचनन कौ प्रतिपारा ॥
साखी--जगन्नाथ मैं थाँपब, जायब सागर तीर ॥
हंस लोक लै आएब, देह जब धरब कबीर ॥
चौपाई
यहि प्रकार आयो ज्ञानी जबहीं । मारचो तुरत बांधके तबहीं ॥
कियो अवज्ञा गरस्यो नारी । मान सरोवरतै मार निकारी ॥
धर्मराय वचन
हे स्वामी मैं कहौं विचारी । रोकौं न हंस जो शरण तुम्हारी ॥
जो कोई जीव जो होय तुम्हारा । अपने काँध उतारौं पारा ॥
साखी--यह चरित्र सब ज्ञानी, कीन्ह धरम के पास ॥
जाय कह्यो तब पुरुष सौं, सुख साखर कीन्ह निवास ॥
चौपाई
अभैपक्ष ज्ञानकी कौ द्वीपा । तहाँ सत्ताईस द्वीप समीपा ॥
तहँकी काल खबर नहिं पाई । तहँ न सतादे काल अन्याई ॥
धर्मदास वचन
धरमदास तब कीन्ह प्रमाना । अगम अपार सुनै यह ज्ञाना ॥
हे स्वामी यह कहौं बुझाई । कौन मते अब सृष्टि बनाई ॥
सो विरंतत कहौं समुझाई । जिहिं ते मन की संशय जाई ॥
तुम्हरे वचन मोहि सार गुसाई । सुन हर्षब धन रंक की नाई ॥
साहेब कबीर वचन
कहै कबीर सुनौ धर्मदासा । जब कन्या कह्यु कीन्ह तमासा ॥
तीनों अण्ड भये तिय वारा । ताके रूप भये अधिकारा ॥
तीन देवका प्रगट होना और आदि मायाका तीनोंका काम बताना
ज्ञानसागर
( १७ )
रजगुन भाव ब्रह्मा उत्पानी । सतगुन भाव विष्णु कोजानी ॥
तमगुन भाव रुद्र का लेखा । तीनों गुन तिय अंड विशेषा ॥
जब देवी तिन सुत उत्पाने । धरमराय निद्रा अलसाने ॥
सोवत चार युग गय बीती । इक युग प्रथम अंड सौ प्रीती ॥
उठि जागै कोइ जान न भेदा । ताकी स्वांस तैं चारौं वेदा ॥
स्तुति वेद कियो पुनि तहैंवा । चतुर रूप विधाता जहैंवा ॥
मीन रूप जो कीन्ह बनाई । तीन छोड़ि रह चौथे ठाई ॥
जो तुम संशय करहु धर्मदासा । वेद चरित्र अब कहौं प्रकाशां ॥
कूर्म चाव कियोकालअन्याई । बुंद प्रसेद तहाँ पुनि पाई ॥
एक बुंद धरती परगासा । दूसरा बुन्द घट माहीं नितासा ॥
बुंद प्रभाव वेद भये ताही । ऐसे बुन्द की उत्पति आही ॥
और चरित्र जस कीन्ह भवानी । सो अब तुमसौ कहा बखानी ॥
सारखी-तीन देव जब ऊपजे, ब्रह्मा विष्णु महेश ॥
कर जोरे स्तुति करें, तैं अब कहौं संदेश ॥
आज्ञा कह मोहि माता, सोइ कहौं समुझाइ ॥
सोई करब हम निहचै, बोले तीनौ राइ ॥
ब्रह्मा करहु तुम सृष्टि उरेहा । जात जीव धरैं सब देहा ॥
कैसे करहि सो युक्ति बतावहु । क्रिया करहु जनिमोहि दुरावहु ॥
सतगुन पहिले भयो उत्पानी । तैंतिस कोटी देव बखानी ॥
रजगुन तमगुन अंड जो भयऊ । दैत्य अनेक तबहि निरमयऊ ॥
दैत्य देव सों होय संग्रामा । जो मैं कहौं करब सो कामा ॥
जाय खनावहु सागर साता । जातैं दैत्य न करें उत्पाता ॥
सागर नीर करौ उत्पानी । जाते दैत्य गति रहै भुलानी ॥
रचौ सिन्धु जल होय अपारा । तब कहि हौं आगिल व्यौहारा ॥
ब्रह्माका समुद्र खुदवाना
( १८ )
ज्ञानसागर
चल्यो ब्रह्मा मातहिं सिरनाई । सोच रह्यो कस करब उपाई ॥
बहुतक जने परिश्रम कीन्हा । चलो प्रस्वेद सोइ पगु चीन्हा ॥
साठ सहस्र बुन्द अनुसारी । बुन्द प्रभाव सबै नख धारी ॥
नख धारिन स्तुति अनुसारा । कहा कैर सुन पिता हमारा ॥
ब्रह्मा वचन
साखी--खनहु सिन्धु मम वचन इम, मन्त्र कहौं समुझाय ॥
माटी उठे जु खनत महैं, ता कह घालिब खाय ॥
चौपाई
चतुर रूप कीन्हा तिन चारी । कहौं नार सबते अधिकारी ॥
रचा सिन्धु कछु लागिनबारा । सागर सात रच्यो विस्तारा ॥
सागर नीर जब भयो प्रकाशा । नख धारिन तब काल गरासा ॥
सागर रचि ब्रह्मा अनुरागा । अडसठ तीरथरचन तबलागा ॥
साखी-गङ्गा यमुना सरस्वती, गोदावरी समान ॥
रची नदी तब गंडकी, जहैं तहैं शिल उत पान ॥
चौपाई
सालिग्राम गंडक अंकूला । पांहन पूजत पंडित भूला ॥
और नर्मदा नदी गोदावरी । सोनभद्र पुनि करमनासावरी ॥
और अनेक रच्यो विस्तारा । जाते भूल पर्यो संसारा ॥
सिन्धु सम्हार गये देवी ठाऊं । चतुर मुख आन गहे तब पाऊं ॥
हे माता आज्ञा तुम मानी । रच्यो सिंधु तुव वचन प्रवानी ॥
भावानी वचन
मथौ सिन्धु सुत कहा हमारा । वहि में पैहौ कामिनि वारा ॥
तीनों जनै चले सिर नाई । मथन सिन्धु कस करब उपाई ॥
पर्वत आनि मथनियां कीन्हा । फनपति लेह फाहरी दोन्हा ॥
मथतहि सिन्धु मतो अस कान्हा । आपन अँश उतपानहि लीन्हा ॥
भवानीकी आज्ञासे तीनों देवका छारे समुद्रको मंथन करना और उससे वेद आदिक प्रकट होना
ज्ञानसागर
( १९ )
अंश बारि महाँ पाये जबहीं । कन्या तीन उत्पन्न भई तबहीं॥
पाय कन्या तब भये आनन्दा । देवी पास चले तिय संगा ॥
ले कन्या तब आगे कीन्हा । कर जोरें प्रणाम मन दीन्हा ॥
सारखी-हे माता यह कन्या, पायो सिन्धु मझार ॥
जस कछु आज्ञा कीजिये, तस कछु करब विचार ॥
भवानी वचन चौपाई
कहे भवानि सुन ब्रह्म कुवॉरा । कामिन के तुम सदा भरतारा ॥
सावित्री ब्रह्मा कहैं दीन्हा । लक्ष्मी कृपा विष्णु पर कीन्हा ॥
पारवती रहि संकर पाँहीं । अटल अहिवात करचो भवमाहीं॥
पायो कामिनि भयो हुलासा । बहुरि विनय कियो देवी पास ॥
हे माता तुव आज्ञा सारा । जो कछु कहाँ सो करो विचारा ॥
कहे भवानी सुन ब्रह्म कुवॉरा । जाइ मथो अब सागर खारा ॥
पढ़ौ वस्तु सो आनहु जानी । अस कछु बोली आदि भवानी ॥
चले देव त्रिय लाग न वारा । मथयो सिन्धु करि हर्ष अपारा ॥
पाये वेद ब्रह्मा सो लीन्हा । विष्णु भाव सो हमहू चीन्हा ॥
सारखी-चार वेद ब्रह्मा लिया, अमृत विष्णु सम्हार ॥
मथे अनिल जो विष भया, सो लीन्हा त्रिपुरार ॥
चौपाई
यह चरित्र त्रय देव बनाया । यहि सुधि दैत्य सुने जब पाया ॥
आइ कीन्ह सब बाद विवादा । पायहु वस्तु देहु मोहिं आधा ॥
वेद अनिल विष सब तुम लेहू । सुधा आहि सो हम कहैं देहु ॥
कहैं विष्णु सुन दैत्य अधीरा । सदा खाइकर विपति शरीरा ॥
दोनो मिल अस कीन्ह विचारा । सब मिल खईये अमृत सारा ॥
दोई पांति बैठे भल जोरी । दैत्य देव तैंतीस करोरी ॥
विष्णु चरित काहू नहिं जाना । बाँटत अमृत छल जो ठाना ॥
चार खानिकी उत्पत्ति
( २० )
ज्ञानसागर
साखी-देवन अमृत पानयो, काहु न कीन्ह प्रसाद ॥
बांटत राहु तब ग्रस्यो, चन्द्र भानु कियो वाद ॥
चौपाई
जब सब मिलिकै आयसु पाई । सभा बैठ कैसे कै खाई ॥
सुनकै विष्णु क्रोध तब कीन्हा । चक्र मार राहु सिर छीना ॥
अमृत परचो ताहि के पेटा । शीश के राहु देह सो केता ॥
भयो युद्ध दोनों दल भारी । बहुत दिन लरे जो बैर सम्हारी ॥
चन्द्र भानु जो राहु सुरावा । आसै जान बैर को भावा ॥
यह चरित भयो सागर तीरा । देवी पास चले त्रय वीरा ॥
तब देवी अस मतौ विचारा । रचहुँ सृष्टिजग होइ उजियारा ॥
अंडज माता किया उत्पानी । पिंडज भाव ब्रह्मा को जानी ॥
उष्मज विष्णु कीन्ह व्यवहारा । शिव कीन्हौ रोम अठासी धारा ॥
लख चौरासी योनिन कीन्हा । आधा जल आधा थल दीन्हा ॥
साखी-जलके जीव पताल सब, औ पृथ्वी परचंड ॥
रचो अहार शंभू सबै, वनस्पती को अंग ॥
चौपाई
स्थावर मदेश जो कीन्हा । उष्मज दोइ तत्त्व कर चीन्हा ॥
तीन तत्त्व अंडज मैं दीन्हा । चार तत्त्व पिंडज को कीन्हा ॥
मुक्ति क्षेत्र नर कौ अवतारा । ता महँ पांच तत्त्व हैं सारा ॥
और जो इन में बरतै भाऊ । मनुष्य जन्म में प्रगट स्वभाऊ ॥
मनुष्य जन्म उत्तम सो होई । विना नाम पुनि जाइ बिगोई ॥
स्वासा सार तै वेद जो भएऊ । सो पुनि मीन पास ले धरेऊ ॥
एकहि सुरति तब ब्रह्मा पावा । तेहि पढिबे का मन चितलावा ॥
वेद पढ़त बूझ अस परेऊ । पृथ्वी आकाश जोत अनुसरेऊ ॥
साखी-निराकार निरंजन, सृष्टि कीन्ह उत्पान ॥
मैं जानौ भल मरेंम अब, नहि कीन्हौ आदि भवान ॥
ब्रह्माको वेद पढ़कर संदेह होना और माताकी आज्ञासे पिताकी खोजमें जाना
ज्ञानसागर
( २१ )
चौपाई
चले ब्रह्मा माता पर आये । दोई कर जोरिकै विनती लाये ॥
हे माता मैं पूछौं तोहीँ । जो पूछौं सो कहिये मोहीँ ॥
कौन पुरुष मुदि कीन्ह प्रकाशा । सो सब मातु कहौमोदि पास ॥
कहे भवनि सुतु ब्रह्म कुवौरा । पृथ्वी अकाश मैं अनुसारा ॥
मैं कीन्हा दुतिया नहिं कोऊ । तुम कस भूले सो कहु भेऊ ॥
हे माता मैं वेद विचारा । है कोई शून्यमें सिरजन हारा ॥
निरंकार निरञ्जन राया । ज्योतिअपार श्रुति गुणगाया ॥
साधु साधु कहि आदि भवानी । आदि पुरुष जेहि तैं उत्पानी ॥
कहाँ अहै सो मोहि बताओ । कृपा करो जिन मोहि डुराओ ॥
साखी—चरण सप्त पाताल हैं, सात स्वर्ग हैं माथ ॥
पुढूप लैकर परसौ, जामे होहु सनाथ ॥
चौपाई
चले ब्रह्मा मातहि शिर नाई । उत्तर पन्थ सुमेरुहि जाई ॥
जाइ ठाढ भये तिहिं अस्थाना । शून्य आद जहाँ शशि नहिं भाना ॥
बहु विधि स्तुति ब्रह्मा करई । ज्योति प्रभाव ध्यान अस धरई ॥
दुखित सुर्त जो भई तुम्हारी । स्तुति करत भये जुग चारी ॥
यहु विधि बहुत दिवस चलि गएऊ । आदि भवानी मन चित ठएऊ ॥
जेठा पुत्र जो ब्रह्म कुवौरा । कहाँ गयो वह पुत्र हमारा ॥
साखी—अब मैं करब उपाय सो, जिहि तैं ब्रह्मा आय ॥
गायत्री उत्पानऊ, ताहि कही ससुझाय ॥
चौपाई
ब्रह्मा गये पिता के ठाईँ । पिता दृश अजहूँ नहिं पाई ॥
बहुत दिवस भये बेग ले आवहु । बहुत भांति कर तिहि ससुझावहु ॥
चली गायत्री ब्रह्मा पास । तिनसौ जाइकर वचन प्रकाशा ॥
मायाका गायत्रीको उत्पन्न करके ब्रह्माको बुलानेके लिये भेजना और मायाका ब्रह्माको झूठ बोलनेके कारण शाप देकर निरंजन से आप शाप पाना
( २२ )
ज्ञानसागर
पुहुप लैकर दरशन आएहु । पिता दरश अजहूं नहिं पाएहु ॥
ब्रह्मा कहै कवन तैं आही । मोर मरम पाये किहिं पाही ॥
दर्शन
आदि भवानी मोहि उपजाई । तुमहि लैन को यहां पठाई ॥
चलहु बेगि जिन लावहु बारा । तुम विन सृष्टि न हो अनुसारा ॥
कहे ब्रह्मा कैसे मैं जाऊँ । पिता दरश अजहूं नहिं पाऊँ ॥
एक उपाय चलो सुनु बाता । तौ कहैं बात पूछिहै माता ॥
मोरे हित कह झूठ स्वभाऊ । तौ तुव संग अब धारौं पाऊ ॥
गायत्री कहैं आयसु होई । पुन परमारथ है बड सोई ॥
चौपाई
साखी-चलु ब्रह्मा माता पर, होवै सृष्टि उपाय ॥
झूठ वचन मैं भाषिकै, जाय सुनाइब माय ॥
चलि गायत्री ब्रह्मा साथी । माता प्रेम सौ चूम्यौ माथा ॥
कुशल प्रभाव सौ चूम्यौ शीसा । और मातु दियो बहुत अशीशा ॥
कैसो भयो तहां तोहि भाऊ । सो सब ब्रह्मा मोहि सुनाऊ ॥
ब्रह्मा कहै सुनौ हो माता । यह पूछौं गायत्री बाता ॥
गायत्रिहि आज्ञा भई जवही । अचरज बात कही कलु तबही ॥
परस पुहुप ले पितु ही माथा । देखो सबै रही मैं साथी ॥
आदि भवानी बहुत बिहैंसानी । दोई झूठ कही सहिदानी ॥
ज्येष्ठ पुत्र मम ब्रह्म कुंवारा । बहुत झूठ तिन वचन उचारा ॥
ब्रह्महि शाप दियो तब जानी । होहु अपूज्य कहिआदि भवानी ॥
ओ कमल केतकी अस अविश्वासा । निरघिन ठौर तोर होइ बासा ॥
गायत्री होई वृद्ध भरताग । पांच सात औ बहुत पसारा ॥
साखी-शाप्यो ब्रह्मा गायत्री, फिर पाछे पछताय ॥
क्रोध क्षमा नहिं कोन्हेऊ अबकस करे निरञ्जन राय ॥