कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
त्रेतायुगका वर्णन
सर्वज्ञसागर
(१३१)
चित्ररेखा रानी कर नाऊ । तिन सुनिशब्द श्रवण चितलाऊ ॥ तिन युगबन्ध चौका कीन्हा । युग बन्धी परवाना लीन्हा ॥ राजा रानी पूछत मोही । सो हकीकत कहौ मैं तोही ॥ अष्टचौकाको शब्द सुनावा । राजा रानी लोक पठावा ॥ दुसरे राय वटक्षेत्रके आवा । सतसुकृति तहँ नाभ धरावा ॥ तिन राजा पूछा चित लायी । तब तेहि भेद कह्यो समझायी ॥ पान परवाना राजहिं दीन्हा । राजा वास लोकमें कीन्हा ॥ तिसरे राय हरचन्द कहँ आये । बन्ध काटिके लोक पठाये ॥ चौथे पुरी मथुरामें आयी । विकसी ग्वालिनके समझायी ॥ चारिहंस सतयुग समझाये । ते चारों गुरुवंश कहाये ॥ चारिहंस नौ लाख बचाये । शब्द भरोसे घरहि पठाये ॥
त्रेता युगका वर्णन
पुनि त्रेता युग कहौ विचारी । सात हंस त्रेतायुग तारी ॥ प्रथम ऋषी शृंगी समझाये । दुसरे अयोध्या मधुकर आये ॥ तिनसे शब्द कह्यो टकसारा । चौथे बोधे लछन कुमार ॥ पचवें चलि रावण लगि गयऊ । तहाँ भेंट मन्दोदरिसे भयऊ ॥ गर्वी रावण शब्द न माना । मन्दोदरी शब्द पहचाना ॥ छठै चलि वसिष्ठ लगि आये । ब्रह्म निरूपन उर्नहि सुनाये ॥ सतये जंगलमें कियो वासा । जहाँ मिले ऋषी दुर्वासा ॥ सात हंस सातौ गुरु कीन्हा । परमतत्त्व उन्ही भल चीन्हा ॥ सातौ गुरु त्रेतामें भयऊ । देह उपदेश सो हंस पठयऊ ॥
द्रापरयुग वर्णन
त्रेता गत द्रापर युग आया । सत्रह जीव परवाना पाया ॥ प्रथमें रायचन्द विजय कहँ गयऊ । ताकी रानी इन्दुमति रहेऊ ॥
कलियुगका वर्णन
(१३२)
सर्वज्ञसागर
दुसरे राय युधिष्ठिर कहैं आये । द्रौपदी सहित परवाना पाये ॥ तिसरे पाराशर पहाँ आये । निर्णय ज्ञान ताहि समझाये ॥ चौथे राय धुधुल लहि भेदा । बहुत ज्ञानको कीन्ह निखेदा ॥ पचये पारसदास समझावा । स्त्री सहित परवाना पावा ॥ छठये गरुडबोध हम कीन्हा । विहँग शब्द गरुडको दीन्हा ॥ सातें हरिदास सुपच समझावा । नीमषार महाँ उसको पावा ॥ अठयें शुक्रदेव पहाँ ज्ञान पसारा । सकल सरब भेद निरवारा ॥ नवमें राजा विदुर समझाया । भक्तिरूप उन दर्शन पाया ॥ दशमें राजा भोज बुझाया । सत्य शब्द पुनि उसे चिह्नाया ॥ ग्यारहें राजा मुचकुन्दहि तारे । बारहें राजा चन्द्रहास उबारे ॥ तेरहे चलि वृन्दावन आये । चारि ग्वाल गोपी समझाये ॥ गुरु रूप पुनि पन्थ चलाये । भौसे हंसा आनि छुडाये ॥ बावन लाख जो जीव उवारा । कलियुग चौथे यहाँ पर धारा ॥
कलियुग वर्णन
प्रथमें गोरखदत्त समझाये । तारक भेद हम तुमहिं बताये ॥ दुसरे शाह बलखको बोधा । षट् आरबी बहुविधि सोधा ॥ तिसरे रामानन्द पहाँ आये । गुप्त भेद हम उन्हें सुनाये ॥ चौथे पीरकी परचे दीन्हा । पचये शरण सिकन्दर लीन्हा ॥ छठे वीरसिंह राजा भयऊ । ताको हम शब्द सुनयऊ ॥ सतयें कनकसिंध समझाये । सोलह रानी लोक पठाये ॥ अठहँ राव भूपाले आये । ग्यारह रानी लोक पठाये ॥ नौमें रतना बनिन समझाई । जाति अग्रवालिन करत मिठाई ॥ दशहँ अलिदास धोबी गयऊ । सात जीव परवाना पयऊ ॥ ग्यारहें राजा भोज समझायी । तिन बहु भक्ति करी चितलायी ॥ बारहें सुहम्मदसोकहचोकुराना । हद हुकुम जीव कर माना ॥
धर्मदासजीका भयमान होना
सर्वज्ञसागर
(१३३)
तेरहैं नानकसे कह्यो उपदेशा । गुप्त भेदका कहा संदेशा ॥ चौदहैं साहु दमोदर समझावा । करामात दै जीव मुक्तावा ॥ चौदह हंस कलियुगमें कीन्हा । गुरु स्वरूप परवाना दीन्हा ॥ पांचलाख हम पहिले तारे । पीछे धर्मनि तुम पगुधारे ॥ वंशन थाप्यों कियो कडिहारा । लाख ब्यालिस जीव उबारा ॥
साखी- तुम जानो हमही मिलै, फिर पूछो मोहि ॥
नाम भरोसे पहुँचि हैं, ज्ञान करे का होहि ॥
धर्मदास बचन-चौपाई
धर्मदास जिव संशय मानी । जब बोले सतगुरु अस वानी ॥ दोह करजोरि चरण चित धरई । फिर फिर गुरुसों विनतीकरई ॥ बड़ी भूल हमरे जिय आयी । समरस करिके ज्ञान फैलायी ॥ मेटचो धोखा साहिब मोरा । दयासिन्धु जिव बन्दी छोरा ॥ धर्मदास जिय भये मलीना । जैसेकमलजिव सम्पुटदीन्हा ॥ अजान जीव हम तुम्हैं न चीन्हा । भाग बड़े मोहि दर्शन दीन्हा ॥ जो कुछ कहब सोई हम मानब । वचन तुम्हार हृदयमें आनब ॥
साखी-धर्मदास जिव डरपे, गुरुकी मानी त्रास ॥
अब नहिं पूछौं ज्ञान मैं, मोहिं दरशकी आस ॥
सतगुरुबचन-चौपाई
सुनु धर्मदास कहौं मैं तोसो । जो कछु भेद पूछिहौ मोसो ॥ प्रथमहिं समरथ आप अकेला । उनके संग दोसर नहिं चेला ॥ तब निश्चल शब्द उच्चारण भयऊ । तेहि शब्द एक कमल निर्मयऊ ॥ तेहि कमलमें आसन दियऊ । तहाँ शब्द एक कमल निर्मयऊ ॥ तेहि कायाको रूप अपारा । असंख पाखरीको विस्तारा ॥
(१३४)
सर्वज्ञसागर
तहाँ बैठि सब रचना कीन्ह। सोई शब्द अधार जो लीन्ह। ॥ सुख हिरदय ते कीन्ह प्रकाशा। तहाँ रूप अति भयी उजासा ॥ काया ते काया निरमाये। सुख कमल हो बाहर आये ॥ रूप सुरतिका रूप अपारा। भुंगि शब्द पारस अनुसारा ॥ भुंगिशब्द पुनि पारस दीन्ह। निःकलंकपुरुषप्रकटकरलीन्ह। ॥ रूप सुरति ते निकलंकी भयऊ। तिनको आज्ञा उत्पति दियऊ ॥ निकलंक विनती तब कीन्ह। कौन सन्धि साहब मोहि दीन्ह। ॥ कहौ भेद जेहि उत्पन होई। सोई शब्द गुरु भाषो सोई ॥ तब समरथ अस वचन उचारा। निष्कलंक सुन मता हमारा ॥ शब्द हमार दृढ हिरदय धरहू। निज सुमिरण तुम हमरा करहू ॥ जो चित सुरति तुम्हारे होई। तौन वस्तु सिसै सब कोई ॥ साखी-जो कुछ रचना चाहो करन, सुरति करत सो होई ॥ रचहु लोक तुम वेगि पुनि, दीन्ह वचन मैं सोई ॥
चौपाई
सुरति करत सबही बनि आई। इच्छा करत सन्धि होय भाई ॥ निश्चल लोक हमारो बासा। अविगति कमल कीन्ह प्रकासा ॥
साखी-जीव सृष्टि रचना करो, सकल जीव उत्पान ॥ शब्द भरोसे तुम रहो, लेउ वचन सिर मान ॥
चौपाई
तुम धर्मदास सुनो चित लाई। तब निष्कलंक सृष्टि निरमायी ॥ निःकलंक सुरति स्वास ठहरायी। सहज सुरतिको टेक बनायी ॥ दहिने अंक सो शब्द निर्मायी। सहज शब्द सुरति अंकुर उपायी ॥ सात करी विस्तार बनायी। यहि विधि रचना निरमायी ॥
सर्वज्ञसागर
( १३५ )
सात करी अंकुर ते भयऊ । भिन्न भिन्न प्रसंग सो लयऊ ॥ सीप सरूपी करी जो कीन्हा । स्वास स्वरूपी इच्छा दीन्हा ॥ सात इच्छा सात करिनमें भयऊ । स्वाति सरूप बून्दतेहि दयऊ ॥ सातो करि भयी प्रकासा । नहिं तब धरती नहीं अकाशा ॥ अर्द्ध अंकुर रहा ठहरायी । तब मुख शब्द स्थिर कहैं आयी ॥ सोरह अंस जो जन विस्तारा । इतनी दृष्टि अंकुरज पसारा ॥ तेहिमें सास करी उपजायी । ताकर मर्म काहु नहिं पायी ॥ तेहि करिन ते अण्डा भयऊ । द्योयकरी विन अण्डा रहेऊ ॥ नहिं तब धरती नहीं अकाशा । अधरहिं अघर अण्ड प्रकासा ॥ मध्य में अण्ड करे चौ चण्डा । एक अण्ड उपज्यो प्रचण्डा ॥ भिन्न भिन्न गति न्यारी कीन्हा । शिवशक्ति अण्डमहँ धरि दीन्हा ॥ नौसे निमिष अन्तर होय छूटा । तबहीं अण्ड उठचो पुनि फूटा ॥ प्रथमहिं तेज अण्ड विगस्यो भाई । तामें पांच तत्त्व निर्माई ॥ बाहर पालँग तेज अण्ड विस्तारा । तामें पांच तत्त्व भौ सारा ॥ तत्त्व स्नेह अण्ड सो कीन्हा । अस्थिर शब्द काल भल दीन्हा ॥ तबहीं श्रवण साजी वानी । तेहिंते मूल सुरति उत्पानी ॥ अबोलपरस सुरति कहि दीन्हा । सात संधि प्रकट कर लीन्हा ॥ सात सन्धि तब गुप्तहिं पेखा । पीछे सोहँ शब्द विवेखा ॥ सोहँ शब्द सत्य अनुसारा । सोहँ सुरति अजावन पसारा ॥ जावन ते पुरुष अचित निर्मायी । तेहि पुरुष अपने निकट बुलायी ॥ तेहि सो पुरुष ऐसी कही । सकल सृष्टि रचो तुम सही ॥ पुरुषको विनय कीन्ह करजोरी । हो सतगुरु विनती यक मोरी ॥ केहि विधि रचौं सो देहु बतायी । तीन भेद गुरु देउ पढायी ॥ नीकलंकी पुरुष वाच उच्चार । शब्द प्रतापकर अगम विचारा ॥ शब्द प्रताप लेओ शिर नायी । सुमिरण करौ हमहिं लौलाई ॥
सात सन्धि विषयक प्रश्न
( १३६ )
सर्वज्ञसागर
पांच अण्ड हम पहिले कीन्हा । तेहिमें सर्व तत्त्व गुण दीन्हा ॥ जो कछु इच्छा करौ दिलमाहीं । सो सब कछु पैहौ तहाँहीं ॥ शब्द प्रताप अर्चित जब लीन्हा । सकल सृष्टिसो उत्पन्न कीन्हा ॥
साखी-पुरुष अण्ड लैगये, देखा सकल पसार ॥ सद्गुरु रहे निहार तब, समरथ वचन अधार ॥
धर्मदासवचन-चौपाई
धर्मदास चरण गहे धाये । हे सतगुरु तुम अगम बताये ॥ पुरुष अर्चितके सृष्टि फरमायी । तात सन्धि कहैं राखे छिपाई ॥ कौन लोक कहैं लीन्हे वासा । सोई भेद गहौ परकासा ॥
सतगुरु वचन
जब अर्चितको सृष्टि फरमायी । तेहि पाछे यक सुरति उठायी ॥ सोरह असंख अंकुर पसारा । तेहि में पांच अण्ड विस्तारा ॥ मिहरसुरति अजर लोक बनायी । तेहि महाँसातौ सन्धि छिपायी ॥ सातौ सन्धि उहाँ लै राखा । समरथ भेद गोइ कछु भाखा ॥ सातौ सन्धि सो गुप्त छिपावा । ताकोअन्त काहु नहि पावा ॥ मिहर लोक सन्धिन कहैं दीन्हा । आपन वास निरन्तर लीन्हा ॥ निरंतर गुप्त ठिका निर्मायी । तामे सतगुरु रहे छिपायी ॥
साखी-गुप्त भेद किया इतनौ, काहु न पायो पार ॥ पुरुष अर्चितकी सृष्टिको, धर्मनि सुनो विचार ॥
चौपाई
पुरुष जब घटमें कीन्ह विचारा । प्रेम सुरति तबहीं उचारा ॥ प्रेम अनन्द उपज्यो रे भाई । तेहिते प्रेम सुरति उपजाई ॥ प्रेम सुरति भै रूप अपारा । प्रेमानन्द घट शब्द उचारा ॥ नेत्र हेर बुन्द सो ढारी । सोइ सुरति दिल माँहिनिहारी ॥
सर्वज्ञसागर
(१३७)
सुरति बुन्द तब तासों लीन्हा । सोई बुन्द अथर महँ दीन्हा ॥ ताहि बुन्दके अक्षर भयऊ । स्वर स्वासा हो बाहर गयऊ ॥ पुरुष अचिन्त आज्ञा सब दीन्हा । तेज अण्ड जो बैठक लीन्हा ॥ बारह पालंग अण्ड है सोई । तेहि में सृष्टि तुम्हारी होई ॥ अच्छर आनन्द ताहि समाया । तामें परकृति सुरति उपजाया ॥ प्रकृति तें चारि अंश निर्मायी । देखि अंश आनन्द समायी ॥ तेहि अनन्द सो निद्रा आयी । सत्तर निमिष जब गयो सिरायी ॥ चारों जने समाधि लगायी । ताको मरम कहौ समझायी ॥ तब सतगुरु एक अवगति कीन्हा । जल तत्त्व ते अण्ड तब दीन्हा ॥ जब अण्डा जलमें उतराना । तब अन्तर निद्रा विलगाना ॥ अक्षर मनमें कीन्ह विचारा । विकल भये तबहीं पगु धारा ॥ चले चले अण्डा लगि आवा । देखत अण्ड कोष उपजावा ॥ सोई कोष अण्डमें आवा । तेज शक्ति ताकर प्रभावा ॥ तेहि कारण मो फूटचो भाई । तेहिते निरंजन उपजाई ॥ कालरूप सो प्रकट प्रचण्डा । महा भयानक रूप अखण्डा ॥ अक्षर मनमें शंका आई । तब चारों सुतन कहँ लीन्ह बुलाई ॥ उनको बहुत भांति समुझाई । पृथ्वी बीज धरौ तुम जाई ॥ जग उत्पति तापै होय भाई । कूर्म शेष पृथ्वी थाह्यो जाई ॥ जाते पृथ्वी डगे नहिं भाई । साइ उपाय करौ तुम जाई ॥ धर्मराय तुम लेखा लेहू । सकल सृष्टि को लेखा देहू ॥ चारों अंश को सिखाप दीन्हा । आप वास मुक्ति दीपमें लीन्हा ॥
साखी—यह रचना अचिन्तक, अक्षर को विस्तार ॥
निरंजन बैठे शुभ शिखर, मान सरोवर द्वार ॥
चौपाई
पुरुष अचिन्त अस चित्त विचारा । सन्धि सुरति घट में उबारा ॥
सात सन्धिका वर्णन
(१३८)
सबन्धसागर
तेहिंते चौदह मुनि उपजाये । जल अण्डते अंश बनावे ॥ चौदह मुनि चौदह दीप बैठारा । पांजी पताल उनको विस्तारा ॥ संधि छाप सौंप सब दीन्हा । अच्छर लोकमें चौका कीन्हा ॥ यहि पुरुष चौदह अंश बनावा । यहि अक्षरमें मोह समावा ॥ तब अक्षरको संशय आई । तेहि ते स्वासा छोड़े भाई ॥ स्वासा संगम उठी तब बानी । माया सुरति तब भयी उत्पानी ॥ माया सुरति अच्छर उपजायी । अष्टंगी सो कैसो शक्ती आयी ॥ अच्छर अष्टंगी सो कहई । जाब जहाँ निरंजन रहई ॥ अष्टंगी तब कहे समझाई । हम कैसे निरंजन पहुँ जाई ॥ तब अक्षर अस कहे भेऊ । निरंजने जाइ सिखापन देहू ॥ कन्या चलि निरंजन लगी आयी । आदि निरंजन मिले तब धायी ॥ देखि कला तब गये भुलाई । हे कन्या तोहिं को निर्माई ॥ काम ज्योति प्रकटी प्रचण्डा । तब चित विकल भयो नरमण्डा ॥ सकल रूप गयउ भुलाई । कामकि लहरि दोउको आई ॥ तब संयोग भयो त्रय बारा । जेठे ब्रह्मा लघु विष्णु कुमार ॥ तीजे शम्भू सबसे छोटा । ये निज भये ताहिंके ढोटा ॥ साखी-जैसे रूप निरंजन, तैसे तीनों बार ॥ प्रलय काल पैदा भये, प्रलय करत संसार ॥
धर्मदासवचन-चोपाई
धर्मदास जिव भये अनन्दा । मैं पाया पूर्ण गुरु चन्दा ॥ धन्य भाग मोहि मिलै गुसाई । आपन करि मोहि लियो सुत्ताई ॥ और एक पूछनकी आशा । चौरासी लक्ष कैसे प्रकाशा ॥ तीन प्रकार सृष्टि किन पाऊ । चौथेका मोहि भेद बताऊ ॥ साखी-धर्मदास सुख पायो, घट मो भयो अनन्द ॥ संशय मिटे प्रफुल्लित भये, ज्यों पूनोको चन्द ॥
चौरासी लक्षका प्राकट्य
सर्वज्ञसागर
( १३९ )
सतगुरु वचन—चौपाई
सुनु धर्मनि मैं कहूँ समझायी । लक्ष चौरासी योनि बनायी ॥ माया चरित्र अब तोहिँ सुनाओ । एक एक कै सब भेद बताओ ॥ चारि कला स्वरूप धरि चारी । एक एक गति कहौँ विचारी ॥ एक स्वरूप सुरति लगि रही । तीन स्वरूप भिन्न घर सही ॥ एक कला गायत्री भयञ्ज । जब पिताखोजको ब्रह्म गयञ्ज ॥ सो गायत्री ब्रह्माको दीन्हा । दूसरी कला लक्ष्मी कीन्हा ॥ मध्यो समुद्र रतन कटि आया । लक्ष्मी तबही विष्णुने पाया ॥ तिसरी कला पार्वती कीन्हा । सोइ कला शम्भु कहँ दीन्हा ॥ यह चरित्र मायाको भाई । जाकी गति मति लखी न जाई ॥ तीन शक्तिको खेल अपारा । इनही रचयो सकल संसारा ॥
सारखी-माया परबल सबनमें, जो चाहे सो होय ॥
लख चौरासी इन रची, मरम न जाने कोय ॥
माया सृष्टि माया रची, जीव अनेक बनाइ ॥
उनते सब कहु होत है, कहै कबीर समझाइ ॥
इति श्रीसर्वज्ञसागरे सृष्टिखण्डवर्णनोनाम प्रथमस्तरंगः ।
अथ द्वितीयस्तरंगः
ज्ञानखण्ड वर्णन
धर्मदास वचन—चौपाई
धरमदास पूछे चितलायी । उत्पति भेद सकल हम पायी ॥ अब जिव कारज कहौ विचारा । जेहि करनीसो हंस उबारा ॥ सो विधि ज्ञान कहो समझायी । जाहि ज्ञान से लोकहि पायी ॥ जीव उबारन ज्ञान सुनाओ । हे सादेब ! मोहि नाहि दुराओ ॥
(१४०)
सवज्ञसागर
साखी-सत्यसार बतावहु जाते कारज होय ॥ चौदह कोटि ज्ञान जो, सो हम देखि विलोय ॥
सतगुरुवचन-चौपाई
सुनु सुकृत मोर प्राण अधारा । तुमसे कहौँ अब सकल पसारा ॥ ऋग्वेद भेद मूलको पाया । चारि सुखको मर्म लखाया ॥ प्रथमहिं चारि वेद है सारा । चारि धाम पर मुक्ति पसारा ॥ सेवक शब्द सुमिरन चित लावे । सब सुख पृथ्वी पर भुक्तावे ॥ कोइ सिद्ध कोइ पण्डित होई । कोइ रूप पावै पुनि सोई ॥ जौँ लगि दान पुण्यकी आशा । तब लगि है वैकुण्ठ निवासा ॥ कोइ विद्या कोइ वेदको पावै । फिरिकै देह संसार धरावै ॥ अब सुनु साम वेद विचारा । विष्णु ध्यान वैकुण्ठ सिधारा ॥
साखी-बीते पुण्य भोग सो कीन्हे, आइ धरे जग देह ॥
जब लग दान पुण्य का आशा, तब लग सुरपुर नेह ॥
चौपाई
तिखरी मुक्तिको सुनो विचारा । सब मुनि योगी शून्य सिधारा ॥ सायुज्य मुक्ति चौथी है भाई । अक्षर ध्यान मानिकपुर जाई ॥ पचई जीवन मुक्ति है भाई । जहाँ देह धरे विन रहै समाई ॥ कहि निज उत्तम पुरुष बतावा । परम धाम सब संतन गावा ॥ पुरुष भक्ति जाके घट आई । एक ब्रह्म राखे ठहराई ॥ परम धाम सोइ पहुँचे जायी । जिन परमात्मा चीन्हो भाई ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास पूछे कर जोरी । एक भेद प्रभु कहौँ बहोरी ॥
सर्वज्ञसागर
(१४१)
काहे पर वह कहिये भामा । जहां जीव पावे विश्रामा ॥ करनी लोक मुक्तिको भेदा । तुमसे कहौ मैं सुन्यो निखेदा ॥ सो सब भेद अहौ मोहि साई । संशय सब विधि देहु मिटाई ॥
साखी-काहे पर सुमेरु है, काहेपर कैलास ॥
काहे ऊपर शून्य है, कहैं अक्षरको वास ॥
सतगुरु बचन-चौपाई
सुनुधर्मदासतोहिकहौंविचारा । यह भेद अगमगति भारा ॥ सोरह नाल पुरुष निरमायी । लोकनको थम्भन नाल रहायी॥ कदली नाल लोकते आई । सात शाख भइ ताकी भाई ॥ सुवरण रंग नाल है सोई । एकहि वर्ण नाल सब होई ॥ प्रथमहि गुप्त नाल है भाई । तहां परवत पुनि नाम धराई ॥ तापर परम धाम बनाया । तेहि में पुरुष तत्त्व रहाया ॥ दुसरी मंजुम नाल जो आवा । मानिक पर्वत नाम धरावा ॥ तेहि पर मानिक दीप बसाया । अक्षर पुरुष दीप सो पावा ॥ तिसरी सुरंग नाल है भाई । तापर झझरी दोष रहाई ॥ तहैंवा रहै निरंजन राई । तीन देव तिनही निर्माई ॥ चौथी नाल क्रांति रह सोई । ता ऊपर वैकुण्ठ जो होई ॥ पंच शिखर सुमेरु सँवारी । एकपै इन्द्र एक कुबेर भंडारी॥ यकपै ध्रुव एक पैयम विस्तारी । मध्यमें विष्णु सकल व्रतधारा॥ पांच ये नाल जो रचि राखा । ताकर नाम कैलास असभाखा॥ तहवों शंकरको है बासा । याग समाधिकी लावे आसा ॥ छठयें नाल उमंग ठहरायी । अघाचलही नाम सो पायी ॥ सतय त्रिकुटी ब्रह्म अस्थाना । तरंग नाल पारस है ठाना ॥ कलकी नालकी सातों साखा । सातों दस यहां लों राखा ॥
(१४२)
सर्वज्ञसागर
यही बनाव धरती में होई । अधर वस्तुको जाने सोई ॥ अधरही चौका चारि प्रकासा । चन्द्र सूरजको तहां निवासा ॥ प्रथम अधर अंकुरहि निशानी । पांच अण्ड कीन्हे उत्पानी ॥ दूसर अधर निकलंकी जाना । तिसरे रूप सुरति परवाना ॥ चौथे अविगति नाम धराया । पांचे सरवल्ली पुरुष कहाया ॥ चारी अंश अधर विस्तारा । धर अधर दोनोंसे न्यारा ॥
साखी-पांच तत्त्व तब ना हते, हते न हाट रु बाट ॥ लोक द्वीप तब ना हते, ना हते औघट घाट ॥
चौपाई
सुनो धर्मदास कहौ मैं तोही । जो कछु भेद पुछिहौ मोही ॥ सब अंशनके लोक बतावा । अंश वंश सब तोहि लखावा ॥ करनी करै सो लोकहि जायी । विनु करनी फिरिफिरि पछितायी ॥
साखी-सर्वज्ञसागर खोजहि, सब ग्रन्थनको सार ॥ कहैं कबीर निज मूलको, सत्य शब्द आधार ॥
इति श्रीसर्वज्ञसागरे ज्ञानखण्डवर्णनो नाम द्वितीयस्तरंगः ।
समाप्तोयं ग्रन्थः
उपसंहार-चौपाई
जेहि मानुष बुद्धि सब विधि आवै । अपनो कारज सोइ बनावै ॥ कपट कुटिलता काल नशायी । सत्य विचार रहै लौलाई ॥ जवनी भांति जिव कारज होई । लाज मिटाय करै दृढ सोई ॥ लोककाज कुलकानके मारे । भँवरि भँवरि भव रहैं विचारे ॥ जेहि यम फन्द छूटे सो करना । नाहकमें काहे पचि २ मरना ॥
सर्वज्ञसागर
( १४३ )
भली भांति सो लेहु विचारी । सकल अंचारज मतहिं सुधारी ॥ खरा खोट जो परखा नाही । अन्धा धोखे मूल नशाही ॥ प्रथम विचारहु औषध रोगा । केहिविधि शब्द हरे सब सोगा ॥ देखो शब्द प्रकाश विचारी । जाते सकल होय उजियारी ॥ गुरु एक सो कौन कहावे । जासो आवागमन नशावे ॥ सेवा अनेक करिय केहि केरा । विन जाने सब धुन्ध अन्धेरा ॥ गुरु मत मनमत करे विचारा । सो जिव निज करे निरुआरा ॥
सारखी-विन देखे नहिं देशकी, बातें कहै सो क्रूर ॥ आपै खारी खात है, बेचत फिरे कपूर ॥
चौपाई
औषध पांच राह सब करई । औषध विना न कोई सहई ॥ शब्द स्पर्श रूप रस गन्धा । द्वारा पंच औषधिकी सन्धा ॥ सबहीं द्वार बूझ रहायी । बिन बूझे नहिं कोइ ठहरायी ॥ कोइ झीना कोइ मोटा द्वारा । तैसहिं तासु भिन्न व्यवहारा ॥ झीना शब्द है पवन स्वरूपा । तासो मोटा अनलको रूपा ॥ अनलहु ते जल मोटा होई । जलते मोटी पृथ्वी है सोई ॥ पुनि प्रकाश एकते एका । थिर होइ देखे करे विवेका ॥ पृथ्वी मोटी आँख प्रकाशी । तासे मध्यम दृष्टि प्रवेशी ॥ दृष्टीसे जल झीना होई । भीतर जो है दीसे सोई ॥ जलसो झीन तेज प्रकाशा । जामे परशे धरति अकाशा ॥ रूपसो अधिक शब्द उजियारा । दृष्टिमें आवे सब संसारा ॥ भूत भविष्य जो हो वर्तमाना । शब्द भीतरे सबै समाना ॥ बूझ शब्द में पेठे जायी । शब्दके भीतर अनल रहायी ॥ अनल मध्य होयके जल देखा । जलके भीतर पृथ्वी पेखा ॥
१ आचार्य, धर्मप्रवर्तक ।
( १४४ )
सर्वज्ञसागर
साखी-रैन समानी भानुमें, भानु अकाशे माहिं ॥ अकाश समाना शब्दमें, शब्द रहा कछु नाहिं ॥
चौपाई
पांचो औषध करै विचारा । मोटा झीना जो व्यवहारा ॥ औषध अन्न जल पेट समाही । जाते क्षुधा औ प्यास नसाही ॥ बहुत प्रकार लादके रोगू । सो सब जाय भोजन संयोगू ॥ गन्ध कपाले पहुँचे जायी । गुण औगुण सब अंग समायी ॥ लेपै गुण सब ले पहुँचावै । गुण औगुण सबमाहिं समावै ॥ आंखिकी राह रूप गहि लेई । शीत उष्ण सब अंगमें देई ॥ शब्द औषधी कानके द्वारा । बूझ समय करे निरुआरा ॥ हर्ष विषाद यंत्र औ मन्त्रा । व्यापै सबै कोइ कोइ स्वतन्त्रा ॥ मर्म सबै द्वाराको बूझे । विना शब्द निर्णय नहिं सूझे ॥ स्पर्श रूप इत्यादिक चारी । सो सब मोट स्थूल अधिकारी ॥ पुनि अस्थूल सो थिर न रहारी । तैसहिं औषध ताहि समायी ॥ अंग अंगको देश है जैसा । अल्पे गहिये औषध जैसा ॥ शब्द अति झीना बूझविचारा । जाते होय सकल निरुआरा ॥ शब्द विना कोइ पार न पावै । विन गुरु कौन जो दाव लखावै ॥ सर्व देश सर्वज्ञ है सोई । तेहि विनु कारज सघे न काई ॥
साखी-शब्द विना श्रुति आंधरी, कहो कहाँको जाय ॥ द्वार न पावे शब्दका, फिरि फिरि भटका खाय ॥ गुरु गुरुमें भेद है, गुरु गुरुमें भाव ॥ गुरु सदा सो वंदिये, शब्द बनावे दाव ॥ फेर परा नहिं अंगमें, नहिं इंद्रिनकी माहिं ॥ फेरा परा कछु बूझमें, सो निरबारचो नाहिं ॥
सर्वज्ञसागर
(१४५)
चौपाई
यहि संसार बहु वैद्य विराजे । नाना भाँति औषधी साजे ॥ साच एक झूठा बहुतेरा । विना साँच नहिं होय निवेरा ॥ एक असल पर नकल अनेका । अनेक नकल नहिं पावे एका ॥ बहुविधि ठग सब करे ठगाई । यमके फन्दा रहे अरुझाई ॥ बूझि समझिके औषध कीजै । मिथ्यामें जिव काहेको दीजै ॥
मसला
गुरु कीजिये जानिके, पानी पीजै छानिके ॥
चौपाई
वेद पुराण किताब कुराना । दोहा साखी शब्द परमाना ॥ अनन्त भाँतिका शब्द पसारा । विनु जाने नहिं होय सुधारा ॥ सो सब औषध बहु विधि जाचे । यम फन्दासे तबही बांचे ॥ पक्ष वाणीको मन मत कहिये । जाते द्रन्द सबै घर लहिये ॥ निर्णय वाणी गुरु मत होई । पक्षा पक्ष जाते सब खोई ॥ जब निर्णयकी वाणी आवै । झूठा खोटा आपु लजावै ॥ निर्णय सो सबके हितकारी । जेहि परसे जिव होय सुखारी ॥ सार शब्द निर्णयको नामा । जाते होय जीवको कामा ॥ गुरु एक जो निर्णय करई । झगरा कबहुँ परे न परई ॥ जो कोइ निर्णय आश्रित भयऊ । सेवा करि निज कारज कियऊ ॥ सो सब सेवा शिष्य कहावै । मन मत सो जो और बतावै ॥ जग बुद्धि कहे मम गुरु एका । जेहि तेहि सेवा करे अनेका ॥ पुनि जाको इन गुरु ठहराई । ताको दूसर गुरु सहाई ॥ तेहिकी सेवा करे लौ लाई । सो सेवा पद कैसे कहाई ॥
( १४६ )
सर्वज्ञसागर
टहल करे टहलू कहलावे । तासो पद सेवा बनि आवै ॥ सोइ सेवक जो सेवा करई । विना विचार बूझ न परई ॥ अपने अपने गुरुमत माने । और सब मन मत अनुमाने ॥ विलु निर्णय सो द्रन्द न जाई । पचि पचि मरहिं करहिं लडाई ॥ जहैं झगडा तहैं गुरुमत नाही । जहैं गुरुमत तहैं द्रन्द नसाहीं ॥
सार्वी-पक्षा पक्षके कारणे, सब जग रहा भुलान ॥ निपक्ष होइके हरि भजे, सोई संत सुजान ॥
शब्द शब्द बहु अंतरा, सार शब्द मथि लीजे ॥ कहैं कबीर जहैं सार शब्द नहीं, धृग जीवन सो जीजे ॥
चौपाई
खरा खोट परखहु बहु भांती । तबहीं होय जीव कुशलाती ॥ जेहि गुरु ज्ञान न छूटत केरा । बहुत अनुमान सो भ्रम बौढेरा ॥ भवसागर दुस्तर कठिनाई । नौका नाम तहैं सत्य दिढाई ॥ बूढ़े भवकी धार न सूझे । सुए सुक्ति ऐसी दृढ़ बूझे ॥ जहैंसे उपजे तहां समाना । कसर विकार मूल नहि जाना ॥ भरमैं आप जीव भरमावे । नाटक चाटक सुयश बढावे ॥ करामात करतूत बखाने । नास्तिक ज्ञान सोइ सत्यकै माने ॥ ऋद्धि सिद्धि सब जात नसाई । नास्ति ज्ञान नाही कुशलाई ॥ त्यर्थ ऐश्वर्य नास्तिन माहीं । जाके पीछे जिव बौराहीं ॥ आपु गये यजमानहु खोये । भांति भांति फन्दा अरुझोये ॥ रोगी वैद्य दोनों एक ठाऊँ । औषध कही कल्पनाके गाऊँ ॥ जेहि कारण नर साई जो देई । सो सौदा जँचि काहे न लेई ॥ ठग भरमावे बहु विधि लूटे । यम धन्धासे कबहुँ न छूटे ॥ मोटि अविद्या छुड़ावन लागे । झीनी महा अविद्या पागे ॥ झनी माटे दोउ कष्ट से रूपा । कारण नास्ति परे त्यहि कृपा ॥
सर्वज्ञसागर
(१४७)
पूरा धनी पूरा सो सौदा । परखत मेंटे कालको फन्द । ॥ संधि लखावहि कारण रोग । मेंटहिंसब विधि संधिकसोग । ॥ नहि सन्देह न यमके त्रासा । सदा मुखारी परख विलासा ॥ धन्य सोबूझि समुझि पग धरई । अँधरन भटक भटक भवपरई ॥
साखी-बलिहारी तेहि पुरुषकी, पर चित परखनहार ॥ सार्ई दीन्हों खांडको, खारी बूझ गवॉर ॥ करु बन्दगी विवेक की, भेष धरे सब कोय ॥ सो बन्दगी वहि जानदे, जहँ शब्द विवेक न होय ॥ मानुष देही पाइके, चूके अबकी घात ॥ जाइ परे भवचक्रमें, सहे घनेरी लात ॥
इति । मानुष विचारसे.
इति तृतीयखण्ड समाप्त
A black and white botanical illustration of a flowering plant, possibly a daisy or sunflower, with a central flower head, a bud, and several leaves, centered within a decorative border.
भारतपथिक कबीरपंथी स्वामी श्रीयुगलानन्द (विहारी) द्वारा संशोधित
लेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई
संस्करण : अप्रैल २०१९, संवत् २०७६
मूल्य : १०० रुपये मात्र ।
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