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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

ज्ञानसागर

( १५ )

प्यासा पानी नदी न पावै । जहैं पानी तहैं तृपा बुझावै ॥ इक जीव ग्रेही आप उवारा । वार नदी नहि सत कडिहारा ॥ बांधे अस्त्र करे शुग्माई । तिन के त्रास सौ दुर्जन डराई ॥ काछे रहै शूर का साजा । आयो समय कादर हो भाजा ॥ यहि विश्वास रहै जो कोई । स्वारथ पिंड परै जन सोई ॥ परै पिंड तब होवै हांसी । दै विश्वास जीव जो फांसी ॥ चतुरा पहिले करै उपाई । द्रव्य न मिले अनते नहि जाई ॥ धन मिले का यही उपाई । ग्रेही भाव रचो जो भाई ॥ क्षुधावंत जाके गृह आवै । भले बुगैके असन न जावै ॥ क्षुधावंत जो करही त्रासा । सन्तुष्ट होय तुरते हो पास ॥ औ जहां देखे सत् का वाना । ता कहैं बहुत करे सन्माना ॥ करै साधु सेवा मनराता । ता कहैं मैं बणों विख्याता ॥ जस जासूस द्रव्य नहि पावै । ताके नग्र सैध दै आवै ॥ चतुरा करै तामु सन्माना । जो पुन ताको करै वखना ॥ ताके पुर का मता बतावै । विवेककी महिमा द्रसावै ॥ ताके गेह दरब न चले जबही । ताकी महिमा दूत करे तबही ॥ बहुविधि महिमा करे जमदूता । तासौ कोई न करे अजगूता ॥ भाजै कादर नगर बधाई । ताके निकट जान नहि पाई ॥ धन्य सोई जो गेही करई । भल मन्दा को उदर भरई ॥ ता कहैं होई पुन्य परमारथ । नाम गहैं जन्मैं होय स्वारथ ॥ कडिहार सोइ जो शूरा होई । भाखों ताहि आपसम सोई ॥ सारखी-कडिहारा औ गृही को, कोई न जाने अन्त ॥ बिन परचै विसमाद है, हरषत परचै सन्त ॥

चौपाई

भाषो संयम सत के राऊ । अस गेही जो करै उपाऊ ॥ प्रात नेम जो करै अस्त्राना । प्रथम प्रफुल्लित कमल बिगसाना ॥

गुरुलक्षण

( १६ )

ज्ञानसागर

मद रु मांस कहैं त्यागै दोऊ । मिथ्या जीव घात पुनि सोऊ॥ सत आमन पर निद्रा त्यागी । भली बुरी सैं रहत बिरागी ॥ जाइ जहाँ बर जहैं हितकारी । ऊचट न परई अन्तर भारी ॥ शुध्दावन्त हित कारी होई । अति प्रिय जानसमोवहि सोई॥ यहि सम दूसर व्रत नहि जाना । ते जन पूनौ आरत ठाना ॥ कहौ जान दासा तन जोई । भागी जीव पावहि निजसोई॥ शिष्य होय जो तन मन वारे । गुरु आज्ञा कबहुँ नहि टारे ॥ गुरु दे शब्द मुक्ति जे होई । तेहि समान दूसर नहि कोई ॥

साखी-तन मन गुरु को दीजिये, मुक्ति पदार्थ जान ॥

गुरु की सेवा मुक्ति फल, यह गेही सहिदान ॥

गुरु लक्षण-चोपाई

गुरु सोई जो सब ते न्यारा । सो सब मैं भाखौ उपचारा ॥ जल तैं पुरइन का है मूला । पानी पत्र न लागै फूला ॥ जातैं देह धरा कडिहारा । तातैं चाहिये सब उपचारा ॥ जैसे मूल पुरइन को पानी । ऐसेहि दुनियाँ की सहिदानी ॥ काया धरे सब न कडिहारा । पुरइन भेद तैं उतरे पारा ॥ केतो शिष्य करे सनमाना । ते पानी पुरइन सम जाना ॥ इतना सुनै रहै लपटाई । तो वह जग समान है भाई ॥ पुरइन मुक्ति लोक में बासा । गुरुबिनपरहि कालकी फांसा ॥ काल बस जीव नहि तरई । तेहि विश्वास जन्म सोइ धरई ॥ कहा सन्त सबहि में भेदा । आप स्वारथी करहि उच्छेदा ॥

साखी-नहीं सहज सत गुरु वचन, करम कुटिलता ठान ॥

चले लोक गति नरकहुँ, सरिता सिंधु समान ॥

लोक गर्व गति राखे भाऊ । ताको देख मास पुनि खाऊ ॥ बहुत यत्न मैं भाव बताया । जो नहि बूझ अन्त पछिताया ॥

परलोकका मार्ग । सत्यलोक और हंसका वर्णन

ज्ञानसागर

( १७ )

धर्मदास बचन

हे स्वामी तुम सुनो सत भाऊ । जो पूछौं सो मोहि बताऊ ॥ जब तन तजे बोलता ब्रह्मा । किहि विधि जाइ कहो सो मर्मा ॥ सो मोहि स्वामी भेद बताऊ । धर्मदास टेके गहि पाऊ ॥

साहिब कबीर-बचन

आवै अंत होय नर जबही । अंतक आनै पठवै तबही ॥ जो जीव नाम तत्त्व मन लावै । ताको अंतक दूत नहिं पावै ॥ नौ द्वारा लग छेके जाई । दशवों द्वार अब देख बताई ॥ दसों द्वारन केते न्यारा । भौर गुफा में सो है तारा ॥ गुरु प्रताप पंथ तेहि जायौं । आदि पवन तेहि होत सहायी ॥ अरध उरध में पवन का वासा । मूल पवन प्रथम जो भाषा ॥ तेहि पर हंस होय असवारा । पचासी पवन का जो सिरदारा ॥ तिहिं चढ हंसा घरको जाई । मान सरोवर जा ठहराई ॥ अंतक दूत करै पछताई । सो सब भेद कहौं समझाई ॥ भक्षै यहि कारण यम राया । तबहि जीव तोहि समझाया ॥

साखी-काल फांस जेहि बांधै, जो नहिं राधै नाम ॥

तत्त्व हीन जीव व्याकुल, अंतक राखै ग्राम ॥

चौपाई

जो कछु पहिले भेद बताया । सो नहिं करै हतै यमराया ॥ छठै मास बीरा निज होई । सो नहिं होइ करो क्या कोई ॥ किंचित् तत्त्व भाव विधि धारै । गुरु प्रताप ते लोक सिधारै ॥ लोक निकट अंतक जो जाई । होय बलहीन चक्षु ही नाई ॥ तहैंवां आहि पंथ का फेरा । एक हमारे इक यमकेरा ॥ गुरु जो प्रथमहिं भेद बतावै । निज घर बैठ हंस सो आवै ॥ आवै शीश ऊपर दै पाऊ । जाय तहां सो कहौं प्रभाऊ ॥ यहि विधि हारै यम कौ दूता । पाँजी रोक धर्म अवधूता ॥

( ९८ )

ज्ञानसागर

प्रथमहि मान सरोवर जाई । जहवाँ कामिनि राज बनाई ॥ शोभा हीन हिरंमर वारा । तातें अटकै हंस पियारा ॥ हंस द्रौप में पहुँचे जाई । शोभा हीन सो बहुत लजाई ॥

सारखी-ते पुनि करै अधोन्ता, हंस सुजन जन पास ॥

कहा अपराध गुसाई, रूप न होय प्रकाश ॥

चोपाई

जब लग मूल दरश नहि पावै । शोभा तब लग नाहीं आवै ॥ जब लग शोक भगे नहि भाई । शोभा तब लग नाहीं आई ॥ एक हंस नहि शोक भराई । जा नहि जीव इकोतर जाई ॥ पावै सार जान निज बीरा । पलकहि शोक मरे पुन धीरा ॥ प्रथमहि हेत द्रौप पर जाई । शोभा अधिक तहाँ पुन पाई ॥ शोभा तस षोडश जस भाना । रवितैक्षीन हो सलिल समाना ॥ यहवां सूरज कांति प्रकाशा । वहवां जोती स्थिर निवासा ॥ ग्रासे सूरज शशि निम्पाई । वहां न सतावै काल अन्याई ॥ जस कमोदिनि सम्पुट प्रभाऊ । तैसा वहां मैं युक्ति बनाऊ ॥

सारखी-जस रविके परभावते, कमोदिनि सम्पुट लाग ॥

ऐसे रवि है निर्मल, पावत तनही जाग ॥

रविके उदय जस मिले चकेवा । हंसा हंस मिलै जस भेवा ॥ रेन तज तब देही त्यागा । पहुँचे लोक हंस मिल जागा ॥ मिल जस चकई चकवा कम्ही । हंसा हंस भाव तस धरही ॥ रविके उदय कमल जस फूला । हंस कमल सूरज रवि तूला ॥ रविके उदय तिभिर जस भागा । हर्षहि धर्म हंस मन जागा ॥ सरल गरल तें अन्तर जानी । धर्मराय अपने मन आनी ॥ काया शोभा उडुगन बांती । अस बूझै चिकुरन की कांती ॥ सो पुनि चिकुर आहि उजियारा । अस शोभा है हंस पियारा ॥ रजनी मुदित विवस जो भएऊ । ज्योति अटल तस हंसा गएऊ ॥

ज्ञानसागर

( ११ )

साखी-नयन दोई भल छाजै, मानौ शशिकी ज्योति ॥ शशि स्वभाव सो देखिये, ऐसी शोभा होती ॥

चोपाई

वरण तासु चक्षु शोभाई । फूटी चंद दो दिशा समाई ॥ नयन दामिनी होत झलहाला । पाछे नहि अनिल उजियाला ॥ बादल घन विजुली चमकाई । शोभा मानों तेज लजाई ॥ श्रवण सोहैं मनौ रवि के चाका । शोभा अधिक सु जाऊ थाका ॥ शोभा कण्ठ जैसे गिरि देवा । नाक कीन्ह सिष्ट जनु देवा ॥ शोभित कहे मिरनाल सरोजा । मुखजो कमल मिरनार कुरोजा ॥ है मिरनाल जनु सेतहि भाऊ । वदन प्रकाश शोभा बहु पाऊ ॥ विगसत कमल उदित जिमि तरणी । हंस पदम दीपक जस वरणी ॥ काया तासू कदली नेहा । रोम रोम मुक्ता को रेहा ॥

धर्मदास बचन

हे स्वामी मैं पूछौं भाऊ । जो पूछौं सो मोहि बताऊ ॥ अन बेधा जस देखियत हीरा । रोमत होवे हंस शरीरा ॥

माहिव कवीर बचन

साखी-जँघ पिंडुरी पग अँगुष्ठा, शोभा अधिक अपार ॥ शब्द रूप कारीगर, रवि शशि अनि जन ढार ॥

चोपाई

नख शोभा किमि करौं बखाना । जातैं हंसन कौ उतपाना ॥ नख न होय जैसे नख हीरा । अंगुरी बाद बरन चँद चीरा ॥ हथली सोहैं मनु पूरण चंदा । अँगुरिन पांति शोभा अरबिदा ॥ जस क्रांती शोभा बहु भांती । छाजै तहाँ नखन की पांती ॥ एही सबै है रूप पर भाऊ । सब उजियार पुरुष से आऊ ॥ सो सब शोभा भाव बताऊ । अगम उपेक्षा सबहि बताऊ ॥ जातैं भयो मानो अधिकारा । तातैं कहाँ रूप व्यवहारा ॥ जस अकाश महाँ ऊगहि सूर। हो उजियारा सो तिनहु पूरा ॥

( १०० )

ज्ञानसागर

पाइर द्रीय होई बड़ चोखा । परमारथ सो करत बड़ तोपा ॥ रविगण पुरुष लगन जो लोका । उड़ गये हंस मिटा सब धोखा ॥ दीप सार औ करी सम्हारी । तेज वरना चन्दा अधिकारी ॥

साखी-तीनौं पुर उजियार भयो, ऊगे भातु अकाश ॥ तैसे पुर की ज्योति में, हंस जो करे प्रकाश ॥

चोपाई

एक सूर्य का किंचित भाऊ । जाग उपेक्षा भाव बताऊ ॥ हंस सुजन हंस के राजा । पल पल हंस दंडवत छाजा ॥ एतिक हेत द्रीय उजियारा । बैठे सब जहाँ हंस पियारा ॥ ते पुन हंस दंडवत करही । क्षणक्षण माथ चरन तर धरही ॥

धर्मदास वचन

हे प्रभु हेत द्रीय सुख पाया । अग्र द्रीय ताहि करी दायो ॥

साहिब कबीर वचन

हंस सुसज्जन दंडवत् काहीं । पुरुष सौं फिर विनती अनुसरहीं ॥ जोग सन्तायन हंस लै आवहु । हेत द्रीय तिन को बैठावहु ॥ देखा चाहे चरण जो द्रीय । मंजुल मंगल करी समीपा ॥ आज्ञा पाय चले हैं हंसा । चरणा द्रीय पहुँचे निःशंसा ॥ अभय पक्ष हंस तहाँ आवहि । जोग संतायन भाव बतावहि ॥ जिहितें आहि आदि परवाना । पावै हंस तब करहि पयाना ॥ हंस राज तब मौन होय जाई । आवै हंस बहुत तेहि ठाई ॥

साखी-सहस्र अठासी पालंग, और सहस्र से तीन ॥

इतने हंस तब आवैं, यह अस्थिर कई चीन्ह ॥

पहिले बन्दौं गुरु चरण, सुरति संतायन योग ॥

बन्दौं हंस सुजन जन, तिन प्रसाद यह भोग ॥

चोपाई

धन्य पुरुष जिन परिमल छाया । हंसन सुख बहुते मन भाया ॥ तब हंसा बहुते दर्पाना । प्रथम हंस सुजन जन ज्ञाना ॥

ज्ञानसागर

( १०१ )

सुरति सनेही गुरु की दाय्या । हंस सुख बहुते मन भाया ॥ पुढुप द्रौप ताको विस्तारा । चार करी केता उजियारा ॥ प्रथमहि महिमा जोत विस्तारा । बैठे जिन कहैं जोत अपारा ॥ नौसै संख औ तेरा करोरी । एतिक महिमा द्रौपहि केरी ॥ ता भीतर करी कस देखा । महिमा फल जस रवि को रेखा ॥ अस जनि जानो रवि को भाऊ । उत्तपक्षा सब भाव बताऊ ॥ अम्बू करी बहुते उजियारा । धन्य पुरुष जिन शब्द उचारा ॥

सारखी-इतना भाव सुख उपजै, अम्बुकरी महाँ जाय ॥ नाम तत्त्व जो राघे, सो अस्थिर बैठे आय ॥

चौपाई

शुभ करी किम करौ प्रवाना । जातै कूर्म काल उत्पाना ॥ पक्षि पालना द्रौप बत्तीसा । तापर रूप सूर्य पञ्चीसा ॥ इक दिन मनो सूर्य की पांती । दुविधा भाव न रूप की कांती ॥ बरणों सूरज ज्योति अपारा । सोहै अटल रूप उजियारा ॥ औ सब शुभ करी को भाऊ । सब उजियार पुरुष से आऊ ॥ सिन्धु मध्य मेघ जस भरई । पुरुष शब्द ज्योति अनुसरई ॥ जस जीव रहै विषय की आशा । शब्द पुरुष सत करे निवासा ॥ प्रथम करी का मर्म न जाना । सो पुनि कैसे जाइ ठिकाना ॥ दूसर द्रौप मम महा सुरंगा । परम हंस बैठे तिन संगा ॥ तीसर द्रौप जोगा जहाँ रहई । ताहि द्रौप का मरम ना लहई ॥ आदि द्रौप पुरुष अस्थाना । तहाँ हिरंमर सुख कर थाना ॥

सारखी-पक्षि पालना द्रौप बड़, जामें ज्योति सुरंग ॥ नाम तत्त्व जो राघे, तो मेटे दुख द्रन्द ॥

चौपाई

मूल द्रौप मूल नाम उचारा । तातें अग्र बीरा निज सारा ॥ मूल अग्र बीरा निज पावै । इकोतरसौ जीव लोक सिधौवै ॥ शोक भरे काया नहि छाजा । शोभा हीन हंस होय लाजा ॥

( १०२ )

ज्ञानसागर

ते पुन करे बहुत पछितावा । सुजन हंस सौं बिन्ती लावा ॥ हंस सुजन जन कहैं अस बानी । शब्द हमार सुनो हो ज्ञानी ॥ जाते जीव काल बस रहई । पुरुष शब्द जो नाहीं गहई ॥ एक निमिष हंसा कर होई । पुरुष सेज तेहि होवै सोई ॥ सोई हंसा तन मन धरई । परम पुरुष सों परिचय करई ॥ परम द्रौप शोभा बहु होई । सब विस्तार कहाँ अब सोई ॥ तहाँ बिराजै जस पुन कमला । उडुगन सूर सनेह जनु जवला ॥ साखी-रत्न पदारथ थाका, पदम अनूप सुरंग ॥ उदित अवास बहुरि जितै, बिगसत सूर औ चंद ॥

चौपाई

जग मग ज्योति हंस शिर सोहै । ललित मौन रतनन जनु मोहै ॥ हंस के सीस छत्र जो धारा । पुरुष बानी तैं होय उजियारा ॥ मिटै तिमिर उदय जनु भाना । हिरामर भांति सब रूप प्रवाना ॥ सबै रूप जस भये चकेवा । हंसा हंस मिलै तस भेवा ॥ प्रथम हंस बैठे तह रहई । सो पुनि भक्ति परम पद करई ॥ बहु दिन रहै नक की खानी । धन्य गुरू हंसा कियो पयानी ॥ बैठे हंस सबै इक पांती । मेटो दुख जब भये अजाती ॥ संशय सबै पिछली गएऊ । रंक महानिधि मानो लहेऊ ॥ पुहुप द्रौप महाँ बैठे जाई । अमृत फलै जहाँ मिल पाई ॥ मंगल करी देख जब जाई । देखत शोभा बहुत लुभाई ॥ मेघ महल सो है ब्रह्मंडा । तहैं तस सँग रहै अरविन्दा ॥ जहैं लग मेघ बुन्द ढरकाई । तैसे कमल तहाँ बिगसाई ॥ साखी-पुरुष आप जस स्वाती, भैरे मेघ शब्द झनकार ॥ जल सब भरो जो पोखरी, सांभा भूमि निनार ॥

चौपाई

बुन्द निरंकार बरषावै । शून्य शिखर तब शोभा पावै ॥ करो स्वाति तहैं अमृत आही । प्रथम हंस देखै पुनि ताही ॥

ज्ञानसागर

( १०३ )

तिन पुनि ध्यान पुरुषसौ धारा । बिगस्यो पुहुप बाणी उच्चार । ॥ फल अमृत तब टूटे चारी । तिहितें फल अनेक विस्तारी ॥ जेते हंस दर्शन को आये । एक एक सब हंसन पाये ॥ आज्ञा मांगि हंस सब पाया । तबते भई अमर की काया ॥ आस प्यास सब हंस अघाना । निर्वृति सुधा सो शुधा बुझाना ॥ निवृति करी किम करव बखाना । उदित भये जनु अगनित भाना ॥ पालंग कोटि तीन कौ फेरा । निवृति करी इतनौ बिस्तेरा ॥

सारखी हंस आवै बहु व्याकुल, बहुत करै पछिताव ॥

दयावंत प्रभु महिमा, मृतक दरस दिखराव ॥

चोपाई

प्रगत रूप देख्या पुन कैसा । जल विलग गगन तामुर वि जैसा ॥ हंस सबै तब दर्शन पावा । भया हरष मिटा पछितावा ॥ हंस सबै तब भये अधीना । उडुगन माही शशिकौ चीन्हा ॥ अस जिन जाने उशशिका भाऊ । उत पक्षा सबई भाव बताऊ ॥ चातक निस दिन बारि निहारै । पावै जल तब तृपा विसारै ॥ पुरुष दर्श स्वाती कौ पानी । देखि रूप सो तृषा बुझानी ॥ पदमै संपुट लागा जबहीं । हंसा परम रूप भयो तबहीं ॥ निज अस्थाने हंस न तब जाहीं । हंस द्रौप तहवां ठहराहीं ॥ एकहि जात रूप सब माहीं । दुविधा भाव सो देखत नाहीं ॥ ता भीतर पुहुपन की सेजा । पंकज बीज आहि जनु लेजा ॥ अभै दीप ज्ञानी कौ वासा । तहँवां हंस करहिं सुख रासा ॥ पालंग तीन सोहै पुन द्रौपा । तहाँ पुरुष रहै अधर समीपा ॥ पुहुप द्रौप बिगसो पुनि गुंजा । गुंज मनौ शशि भानु अलुंजा ॥ भये पग स्थिर हंस सुखारी । पुहुप द्रौप सिरजै छत्रधारी ॥ हंसा तब पग अस्थिर आये । अमर चौर शोभा बहु पाये ॥ मान सरोवर बहु नौनाई । शोभा रूप राशि बहु ताई ॥

( १०४ )

ज्ञानसागर

सुरति सागर डोर समोई । मुक्ति द्वार तहाँ सौं गोई ॥ सो द्वारा जो गुरु बतावै । मानसरोवर तैं चलि आवै ॥ तहाँ हंस शीलका थाना । माणिक मध्य दीप निर्वाना ॥ चौरासी लक्ष द्वीप को फेरा । आवै हंस तहाँ कोन्हो डेरा ॥ तहाँ है पुनि कामिनि राजा । जगमगज्योति तहाँ पुनिछाजा ॥ बरणो शीश रूप भल आही । चार भानु जानौ तिहि पाही ॥

छन्द-शीश झलक बहु बरणा पांती रूप शोभा राशि हो ।

नौ लाख उडुगन पोह राखै भानु शसिको भासि हो ॥

जग मगा चौकुर अतिहि सोहै राजै जैसे पुर सही ।

अटल जेहि रूप बरनौ शशि बरणा काया कही ॥

सोरठा-शशि औ भानु निचौर, शोभा राखी शीश पर ॥

सेत वरणा अंजोर, मान सरोवर कामिनी ॥

चौपाई

भले नेत्र दूरसन कस देखा । मानहु अर्काहि सुठार विशेष्खा ॥

शब्द कारीगर रूप चम कारा । शशि अनेक ताही जनु ढारा ॥

श्रवण गातु शोभा अधिकाई । जैसे छीर कै काठ मलाई ॥

छीर भरो जनु शशि औ भाना । माखन रूप कामिनी ठाना ॥

मौज अनेक ताके तन चीरा । लागे रवि शशि अगनित हीरा ॥

चमके रूप ज्योति बहु भाऊ । सब उजियार पुरुषसे आऊ ॥

सारखी-शोभा बहुते कामिनी, नख शिख सुन्दर रूप ॥

बैठे माना भाव धरि, चन्द्रभानु बहु यूप ॥

चौपाई

सर शब्द पावै जो ताई । ताके बल हंसा घर जाई ॥

इतना रूप कामिनी अंगा । नहि उपजै तँ भाव अंनंगा ॥

बैठे रहई हंस सुख पावई । दृष्टि भाव परम मन भावई ॥

ऐसी भक्ति नहि महि माहीं । पटतर बने देत नहि ताहीं ॥

जस पाहन मंजुमें डारा । देखौ शोभा अगम अपारा ॥

भविष्यत् कथा । चक्रवर्त्तीका वर्णन

ज्ञानसागर

( १०५ )

महल पंच भूत तहाँ नाहीं । हँसा बैठे सुख करे ताहीं ॥ अग्र रुचिर छत्र सिर छाजा । हँसा लइत बहुत सुख साजा ॥ जाय दिव्य तहाँ कर्गहि निवासा । विमल अंग शोभा बहु पासा ॥ मिटै अम तव परिचय पाई । जहाँ रहै तहवाँ ठकुराई ॥

सारखी-करहीं हंस सुख अस्थिर, अम्बू करी अस्थान ॥

देखौ द्रौप सो पावन, कमल करी निर्वाण ॥

चौपाई

धन्य जीव पुरुष शब्द उचारा । जातै शोभा अगम अपारा ॥

धर्मदास वचन

हे प्रभु सुन्यो हंस कर भेऊ । जो कछु प्रछौँ सो कहि देऊ ॥ जो कछु होय आगे व्यवहारा । आगे होय सो कहौ विचारा ॥

साहेब कबीर वचन

सुनु धर्मदास मैं कहौ बुझाई । आगे जस करि है अन्याई ॥ वंश व्यालीस अचल तुम्हारा । नाद बहुत है विंद विचारा ॥ तेही पाछे चरित अस होई । कहौँ प्रगट नहिं राखौँ गोई ॥ अग्नि कौन अचिन्तपुर गाऊँ । तहाँ कौ वरणन तुमहि सुनाऊँ ॥ अमृत नयन विकट है काया । नाम चक्ररथी काल स्वभाया ॥ मानै जीव सो कहो विचारा । जस रविकोट है मृत्यु है सारा ॥ ताहि नय की राज कुवारी । सोभा चहै सहित जनु नारी ॥ ताकौ भेद मैं कहौँ बुझाई । घर कुम्हार के जन्मे आई ॥ जनमत तात जननी कहैं खाई । दृष्टि परत हतन होइ जाई ॥ जस पावक महैं तुनै समाई । वहिनी खाय जो देखन आई ॥ अग्नि समान चक्ररथी भाई । तृण समान मलेछ अधिकाई ॥ बत्तिस अंगुल तासु शरीर। कहौ अगम अस दास कबीरा ॥ श्रवण एक नौ अंगुल ताही । डेढ नाक दो जिभ्या जाही ॥ यही स्वरूप विश्व कहैं ढावै । तेहि अन्तर रानी चलि आवै ॥ रानी दृष्टि परे तेहि पाहीं । भाजे गज केहरि की छाहीं ॥

( १०६ )

ज्ञानसागर

तैसई भाजै अंतक दूता । वंश तुम्हार थकै अजगूता ॥ मिटहि पंथ धर्मदास तुम्हारा । काल चरित्रै करै अपारा ॥

धर्मदास वचन

हे सतगुरु सो पुनि बतावहु । चक्ररथी को भाव बुझावहु ॥ जब दिखराय काल कौ भाऊ । धर्मदास मन त्रास जनाऊ ॥ साखी-बहुत त्रास जब कीन्है, भये व्याकुल मति भंग ॥ चक्ररथी को भाव बतायो, कह्यो वचन परसंग ॥

साहित कबीर वचन-चोपाई

अबही भाव दूर है ताही । जनि डरो त्रास वज्र जिव चाही ॥ हदूता जान करौ गुरुवाई । जातैं जीव लोक कहैं जाई ॥ जीवको बन्ध छुड़ावहु यम ते । हंस मुक्तावहु नाम जतन ते ॥ साखी-नाम जतन जो करै, ताकर होइ न हानि ॥

ज्ञान सागर सुख आगर, कहे कबीर बखानि ॥

सत्य विचार-चोपाई

ज्ञान सागर ग्रन्थ को भाऊ । समझि बूझि के पारख लाऊ ॥ अनन्त प्रकार के शब्द पसारा । विनु पारख नहीं होय उबारा ॥ शब्द परख की युगती आही । गुरु सुख कहा रमैनी माही ॥ रमैनी सताईस तेहिको जानू । बूझि विचारके हिरदय आनू ॥ पारख करनकी युक्ति जब जानो । सांच झूठ की परीक्षा आनो ॥ काल दयालको स्वरूप पिछनौ । काल सन्धि झाई मन जानो ॥ सार शब्द का पाओ लेखो । उभय आनंद तबहीं तुम देखो ॥ करु पारख तब बन्धन छूटै । विनु पारख जमै धरि कूटै ॥ इति श्रीज्ञानसागर समाप्त ॥

प्रारंभिक पृष्ठ (अनुराग सागर)

श्रीः

अनुरागसागर

( कबीरदर्शन ग्रन्थमालाकी द्वितीय मणिका )

कबीराश्रमाचार्य स्वामी युगलानन्द- बिहारी द्वारा संपादित

मुद्रक एवं प्रकाशकः

खेमराज श्रीकृष्णदासTM,

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, मुंबई - ४०० ००४.

संस्करण : फरवरी २०१९, संवत् २०७५

मूल्य : १३० रुपये मात्र ।

© सर्वाधिकार : प्रकाशक द्वारा सुरक्षित

मुद्रक एवं प्रकाशक:

खेमराज श्रीकृष्णदास™

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग,

मुंबई - ४०० ००४.

Printers & Publishers :

Khemraj Shrikrishnadass Prop: Shri Venkateshwar Press, Khemraj Shrikrishnadass Marg, 7th Khetwadi, Mumbai - 400 004.

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Printed by Sanjay Baje For M/s.Khemraj Shrikrishnadass Proprietors Shri Venkateshwar Press, Mumbai-400 004, at their Shri Venkateshwar Press, 68 Hadepear Industrial Estate, Pune 411 013

सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

श्रीगणेशाय नमः

श्रीगणेशाय नमः

प्रस्तावना

अनुरागसागर आजतक लखनऊ, पटना, काशी, नरसिंहपुर और बम्बई में भिन्न-भिन्न रूप से छप चुके हैं। जिनमें से अंतिम बार बम्बई में जो ग्रन्थ छपा है वह मेरे नाम से छपा गया है। क्योंकि वह ग्रन्थ मने ही 'श्रीवैकटेश्वर प्रेसाध्यक्ष' को दिया था। यद्यपि इसके मुद्रणके आरंभमें मेरे पास इस ग्रन्थकी १३ हस्तलिखित प्रतियाँ उपस्थित थीं, तथापि प्रेसवालोंकी शीघ्रताके कारण उसे पूर्णरूपसे सब प्रतियाँ द्वारा शुद्ध करनेका अवसर नहीं मिल सका, इसलिये विशेष स्थानों पर अन्य ग्रन्थों के साथ मिलकर छपनेको दे दिया था। यही कारण है कि उसकी प्रस्तावना भी लिखी न जा सकी।

किन्तु उस समय भी उपर्युक्त १३ प्रतियोंको देखनेका अवसर मिलनेसे मुझे ज्ञान हो गया कि, उन तेरहों प्रतियोंमें परस्पर बहुतही विभिन्नता है। इससे किसी शुद्ध और पुरानोसे पुरानी प्रतिको खोजमें लग गया। जिसका परिणाम यह हुआ कि, छपी और हस्तलिखित सब मिलाकर इस समय ४६ प्रतियाँ मेरे पास उपस्थित हैं, जिनका ब्योरा इस प्रकार है :—

  1. १ प्रति जो सबसे पुरानी है, प्रमोद गुरु बालापीरसाहबके समय की लिखी हुई जान पड़ती है, क्योंकि 'वंशावली लिखते हुए लिखनेवालेने वहाँ तक वंशोंका नाम लिखा है और वह समय भी उन्हींका था।
  2. २ प्रतियाँ-कमलनाम साहबके समयकी लिखी हैं, इसके अतिरिक्त ८ प्रतियाँ और भी सँ. १८६० से लेकर १९३० तककी लिखी हुई मुझे अपने पिता श्रीजी के पुस्तकालयसे प्राप्त हुई थीं।
  3. १ प्रति-अमोलनाम साहबके समय की लिखी है, जो गया जिलेके किसी सन्तकी लिखी हुई है।
  4. १ प्रति-सुरतसनेही नाम साहबके समयकी लिखी है जो खास सिध्दीयोगी बंकर लिखी गई है, जो खास मुकाम सहरांव पो. कांया जि. उन्नावके कबीरपंथी सेवक आसादीन तम्बोलसे मिली थी, जिसके वंशमें कई पीढ़ी तक महन्ती चली आयी थी।
  5. ५ प्रतियाँ-पाकनाम साहब के समयकी लिखी हुई हैं।
  6. ८ प्रतियाँ-प्रकटनाम साहबके समयकी लिखी हैं; जिसमें १ तो धीरजनाम साहबकी प्रधान धर्मन्ती श्रीरानी सूरजकुंवरासाहबके हाथकी लिखी हुई है।
  7. ९ प्रतियाँ-प्रकटनाम साहब के पश्चात्की लिखी हैं जिनमें से ४ प्रतिहोमें वंशावली धीरजनाम साहबतक और शेष ५ सँ. पं. श्रीउग्रनाम साहबतक लिखी हैं, इसीसे १ प्रति वह भी है जो कबीरधर्म नगरके कबीरधर्मप्रकाशमें छपने के लिये लिखायी गयी थी किंतु छप नहीं सकी।
  8. १ प्रति-बांधोगढ़ सितौड़ी स्थानके वंशगुरु गोसाई मधुकर नाम साहब के पुत्र श्रीगोपालदास-जोके हाथकी लिखी है, जो मुकाम कसबा जि. पूर्निया के महन्त श्रीहरिचरणदासजी साहबने छुपा करके ग्रन्थ छपते समय भेज दी थी।
  9. २ प्रतियाँ-छपरा जिलेके बांधोगढ़के अनुयायी महन्तोंकी लिखी हैं।
  10. २ प्रतियाँ-जागृतासाहबके घरानेवालोंकी लिखी हुई हैं १ और प्रति काशीके अनुयायी किसी साधुने महन्त रंगूदासजीके समय लिखी थी वह है। रोप
  11. ५ प्रतियाँ-पाँच स्थानों की छपी हुई प्रतियाँ हैं।

( ६ )

प्रस्तावना

इस प्रकार इस ग्रन्थके संशोधन समय ४६ प्रतिर्या मेरे पास उपस्थित थीं यदि इन प्रतिर्यों की परस्पर विभिन्नताके विषयमें जो कुछ मैंने नोटकर रखा है उसे यहाँ लिखने लग जाऊँ तो एक अच्छी पुस्तक तैयार हो जायगी इस लिये मैंने विचार किया है कि “अनुरागसागरकी भूमिका नामकी एक पुस्तक अलग हो लिखकर पाठकों को भेंट करूँगा।

तथापि इतना तो अवश्य कहे बिना नहीं रहा जाता कि, इन ४६ प्रतिर्यों की परस्पर विभिन्नताके कारण एक-एक विषयको जाननेके लिये कभी तो कुल ४६ प्रतिर्योंको उलटना पड़ता था, कभी एक विषयको जाननेके लिये सच्चे ग्रन्थको ही पढ़ जाना पड़ता था, और भिन्न भिन्न शाखा (पंथ) वालोंने अपनी बड़ाई जताने के लिये एक दूसरे की निन्दा और खण्डनमण्डन लिखे हुए हैं, ऐसे स्थानों-पर कई कई विनोक्त विचार करना पड़ा था। जिसका विशेष दृत्तांत जाननेके लिये उपर्युक्त भूमिकाको अवश्य देखना चाहिये, इस प्रकारसे कई महिनोंके कठिन परिश्रमसे सब ग्रन्थोंको मिलाकर मैंने यह ग्रन्थ ठीक किया है।

यद्यपि मेरे परिश्रमका फलस्वरूप यह ग्रंथ ऐसा सुन्दर और इतना बड़ा हुआ है कि, आजतक किसी भी मठ मकान और स्थानके साथ, संत, महन्त और आचार्यके पास इसके जोड़ुका ग्रन्थ मिलना असम्भव है, तथापि जिन ग्रन्थोंके द्वारा शुद्ध और मिलान करके यह ग्रन्थ छपाया गया है उन ग्रन्थों की परस्पर विरोधताको देखकर मेरा मन परस्परके ऐसे स्वार्थसाधक खण्डवाले ग्रन्थोंसे घबरा उठा है और मैं इस बातकी खोजमें हूँ कि, इन प्रतिर्योंसे भी पुरानी प्रति मिले तो उससे फिर इसे शुद्ध करूँ।

कबीरधर्मनगर दामार, खेडा,

१-४-१९१४

बंगाल ददि ८ स. १९७१ वि.

भवदीय—

कबीराश्रमाचार्य स्वामी

श्रीयुगलानन्द बिहारी.

सत्यनाम

अनुरागसागरकी विषयानुक्रमणिका

विषयाःपृष्ठांकाःविषयाःपृष्ठांकाः
सदगुहस्तुतिकामबेद लुटेरा है
सदगुहस्तुति पंचरत्नोक्तकाम लुटेरे बचने का उपाय
प्रन्यारम्भ मङ्गलाचरणअनलपक्षीका वृष्ट्यांत
गुरुदेव पूर्ण हैंसाधु अनलपक्षी सम्मान कब होता है१०
अधिकारी कौन है ?ऐसे साधुको गुरु क्या देते हैं१०
बिना अनुराग वस्तुको पा नहीं सकतेअविचलधामकी प्राप्ति किससे होती है१०
अनुरागिके लक्षण विषय प्रश्ननामध्यानभाहात्म्य१०
अनुरागिके दृष्ट्यांतनाम पानेवालेको क्या मिलता है ?१०
पतङ्गका दृष्ट्यांतसारसाब्य (नाम जपनेको बिधि)११
सतीका दृष्ट्यांतगुरुगमभेद११
तत्त्वानुरागिके लक्षणधर्मदासका आनन्दोद्गार१२
कालसे कौन छुड़ा सकता है ?धर्मदासकी अधीरता१२
सदगुरु क्या करता है ?सृष्टि उत्पत्ति विषयक प्रश्न१२
अविचल देशको कौन पहुँच सकता हैसृष्टि के आविर्भे क्या था१२
अधिकारीको बुलभंतासृष्टिकी उत्पत्ति सत्पुरुष की रचना१४
मृतक कितने कहते हैं ?सोलह मुतका प्रगट होना१४
मृतकके दृष्ट्यांतनिर्जन की तपस्या और मानसरोवर१५
सुंगीमात्रकी प्राप्ति कैसे होती हैतथा शून्यकी प्राप्ति१५
हंस कौन हैसहजका निर्जनके पास जाना१६
मृतकके और दृष्ट्यांतनिर्जनको सृष्टि रचनाका साज१७
पृथ्वीका दृष्ट्यांतमिसलका बुत्तांत१७
ऊखका दृष्ट्यांतसहजका लोकको जाना१७
मृतकभाव कौन धारण कर सकता हैपुरुष की आत्मा सहजसे१७
मतका ही साधु होता हैसहजका धर्मरायके निकट आकर१८
साधु कितने कहते हैं ?पुरुषकी आत्मा मुनना१८
वक्षुवशीकरणनिर्जनका कूम्बके पास साज लेनेके१८
श्रवणवशीकरणसिये जाना१८
नासिका वशीकरणबहुरि पुरुषका सहजकी निर्जनके१९
जिह्वावशीकरणनिकट भेजना१९
शिरनवशीकरणसहजका निर्जनके निकट पहुँचना२०
कामवशीकरणअक्षाकी उत्पत्ति२०

( ८ )

अनुरागसंगर

विषया:

पृष्ठांका:

सत्यपुरुषका अद्याको मूलबौज देना२१
पुनि सहजका निरंजनके डिग जाना२१
निरंजनका अद्याको निगल जाना
और सत्यपुरुषका उसे शाप देना२२
सत्यपुरुषोंका जोगजोतजीको निरंजनके
पास उसे मानसरोवरसे निकाल
देनेकी आज्ञा देकर भंजना२३
अद्या और निरंजनका परस्पर संयोग
करना निरंजन बचन अद्याप्रति२३
भवसागरकी रचना (प्रारम्भ)२५
तोन सुतको उत्पन्न कर निरंजनका
मुक्त हो जाना२६
सिधुमयन और चौदहस्त उत्पत्ति की
कथा (प्रारम्भ)२७
प्रथमवार सिधुमयन२८
द्वितीयवार सिधुमयन२८
तृतीयवार सिधुमयन२९
पांच खानिकी उत्पत्ति२९
ब्रह्माका वेद पढ़कर निराकारका
पता पाना२९
अद्या और ब्रह्माका वातालाप२९
ब्रह्माका हठ देखकर पितादर्शनके
लिये अद्याका उसे ऊपरकी ओर
और विष्णुको नीचेकी ओर भेजना२९
विष्णुका पिताके खोजसे लांटकर
पिताके घरगतक न पहुँचनेका
बुतांत भातासे कहना और
भाताका प्रसन्न होना३२
पिनाकी खोजमें गये ब्रह्माकी कथा३२
ब्रह्माके लिये अद्याकी चिन्ता३३
गायत्री उत्पत्ति३३
गायत्रीका ब्रह्माकी खोजमें जाना३३

विषया:

पृष्ठांका:

ब्रह्माको (ध्यानसे) जगानेके लिये | ---|--- अद्याका गायत्री को युक्ति बताना | ३४ ब्रह्माका जागकर गायत्रीपर कोध | करना | ३४ ब्रह्माका गायत्रीको झूठी साक्षी देनेके | लिये कहना और गायत्रीका | ब्रह्मासे रति करनेकी बात कहना | ३४ सावित्री उत्पत्तिकी कथा | ३५ ब्रह्माका गायत्री और सावित्रीके साथ | भाताके पास पहुँचना और सबका | शाप पाना | ३६ अद्याका ब्रह्माको शाप देना | ३७ अद्याका गायत्री को शाप देना | ३८ अद्याका सावित्रीको शाप देना | ३८ शाप देने पर अद्याका पश्चात्ताप और | निरंजनके डरसे डरना और शाप | पाना, निडर होना | ३९ विष्णुका गोरेसे श्याम होनेका कारण | ३९ अद्याका विष्णुकी ज्योतिका दर्शन | करना | ४० ज्योतिदर्शन रहस्य | ४१ मायाका विष्णुको सर्व प्रथम बनाना | ४२ अद्याका महेशको वरदान देना | ४३ शाप पानेके कारण दुःखित होकर | ब्रह्माका विष्णुके पास जाकर | अपना दुःख कहना और विष्णु | का उसे आश्वासन देना | ४३ कालप्रपंच | ४३ गायत्रीका अद्याको शाप देना | ४५ जगत्की रचनाका विरोध बुतांत | ४५ चार खानिकी गिनती | ४५ जोगसी लाख योनिकी गिनती | ४६