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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

बोधसागर

( १०१ )

चौपाई

धन्यगुरुड मृत्युलोकते आओ । बहुरिजाय मृत्युलोक चिताओ॥ अब जाई तुम विष्णु चिताओ । जो वह चेते तो नाम दृढाओ ॥ लीन गुरुड बालक अगराई । अमृत पीवत अती जुडाई ॥ बालक अमृत माहिं जुडाना । युगन युगन को क्षुधा बुझाना॥ गुरुड विदा हंसन सों लीना । मस्तक नाइ प्रदक्षिण कीना ॥

श्रवण वचन

तब हंसा पुनि कीन निहोरा । तुमतो गुरुडन कीन्ह यह जोरा॥

गुरुड वचन

तुमही छाडि शीस केहि नाऊँ । तुमरे चरणकमल चित लाऊँ॥ तुम तो अमृत दीन दिखायी । सतगुरु शब्द लीन अर्थायी ॥ शीस सोई जो साधु को नावे । पूजा सोई जो नाम लौ लावे॥ मुख सोई जो उचरे नामा । देह सोई जो प्रभुके कामा ॥ दैवत सोई जो बन्दगी ठाने । दया सोई अमि अन्तर आने॥ साधू सोई जो ममता मारे । ममता मारि आप को तारे ॥ साखी-बालक लिये अमरकरि, विष्णुहि कह्यो समुझाय । चले गुरुड मृत्युलोकको, ब्रह्मा रहे लजाय ॥

चौपाई

यहि विधि बालक लीन जियायी । सकल सभा तहाँ देखे आयी ॥ धन्य धन्य सब करहिं पुकारा । धन्य गुरुड है रहनि तुम्हारा ॥ धन्य धन्य सबही मन भावा । गुरुड बोल सब ऊपर आवा ॥ नाग लोग की कन्या रहाई । अचरज होय कछु न कहाई ॥

नागकन्या वचन

अविगत मता है गुरुड तोहारा । कोई न जाने भेद अपारा ॥ इतना कहि अनुराग सो धरिया । शीस नाइ चरणन पर परिया॥

( १०२ )

गरुडबोध

वासुकि देवकी कन्या भाई । शीस नाइ के विन्ती लाई ॥ रूप उग्र बहुते उजियारा । मानिक लव्के माहि लिलारा॥ एतिक आगरी किये सिंगारा । जगमग ज्योति बरे उजियारा॥ सो पुनि कन्या विन्ती करई । गरुडके चरण आय शिर धरई॥

वासुकि देवकी कन्याका वचन

हो साहिब तुम बन्दी छोरा । नष्ट जाय जिव तुमहिं निहोरा॥ हो साहिब विन्ती सुनि लेहू । हमरे गृहै तुम चरण धरेहू ॥ हम दीक्षा प्रभु लेव तुम्हारा । जिवका कारज करो हमारा ॥

गरुड वचन

कहे गरुड सुनु कन्या वारी । तुम सबहिनकी प्राणपियारी ॥ पूछहु वासुदेव सों जाई । आज्ञा देहिं तस करो उपाई ॥ अस तुम जाय सिखापन लेहू । पुनि फिर के हमही दल देहू ॥

कन्या वचन

ब्रजबाला कन्या अस बोले । जो हम कही कबहु नहिं डोले॥ साहिब विन्ती सुनो हमारो । सकल समाज संग पग धारो ॥ इन्द्रलोक ते इन्द्र बुलाये । सुर नर सुनि गैधर्व जो आये ॥ चले विष्णु जहँ गहरन लायी । शिव ब्रह्मा तहँ चले रिंगायी ॥ तेतिस कोटि देव तहँ आये । सिद्ध चौरासी सबै सिधाये ॥ नौ नाथ अरु सब बचे बचाये । सबही चले रहे नहिं भाये ॥ शंख वीण धुनि बाजे भाई । इन्द्र को बाजा अति घहराई॥ ताल मृदंग और शहनाई । सब ही बाजन बाजे भाई ॥ साखी-इन्द्र के बाजन बाजते, भये पताले त्रास । वासुदेव डरि कर्मपै, बैरी आयो पास ॥

१ बमके ।

बोधसागर

( २०३ )

गुरु वचन

ब्रजबाला कन्या हँकरायी । आयसु देह के आगु रिंगायी॥ वासुकिदेव सों कहु समझाई । साधु रूप सब आवैं भाई ॥ सुनते कन्या तुरत रिगायी । वासुकिदेव सों कही समझायी॥

कन्या वचन

निर्गुण भक्ति गुरुड जो ठानी । तेहि कारण हमगुरुडहि मानी॥ होहु सुचित्त सबै परिवारा । निजकै मानहु वचन हमारा ॥ सारखी-सकल साधु इहैं आवहीं, होय चौका विस्तार । चित्त में कोइ डरौ नहीं, वह हैं भक्ति अधार ॥

वासुदेव वचन-चौपाई

ब्रजबाला कन्या सुनु आनी । सबही तुरत तु आन बुलाई ॥ जाहु तुरत गुरुड के ठाऊँ । दाय़ा करहु धरत सब पाऊँ ॥

सतगुरु वचन

सुनि बाला लै गयउ विमाना । दया करत सब संत सुजाना ॥ जबहि शेष प्रतीति मन आनी । तबही गुरुड सु कीन्ह पयानी ॥ जब गुरुड जो चले रिगायी । बाजन बाजे वरनि न जायी ॥ बाजे डमरू हने निशाना । महादेव जब कीन्ह पयाना ॥ सबहि समाज पताले गयऊँ । इच्छा भोजन सबही लयऊँ ॥ एकोत्तर सै नरियर आना । बहुत भांतिकै कीन्ह मंडाना ॥ जबही गुरुड जो सुमिरन कीन्ह। तब हम उनको दर्शन दीना ॥ गुरुड आइके मस्तक नाये । शीस नवाइ चरण चितलाये ॥ सकल जमात उठी भई भाई । सबहिन उठि के मस्तक नाई॥ तब हम पुनि चौका विस्तारा । बहुत भांतिके साज सुधारा ॥ सुथरी मिठाई उत्तम पाना । ब्रजबाला सबही कहु आना ॥ जब तिन सबै साज सँवरावा । तब हम लोकते हंस हँकरावा॥ आये साधू लोक से भाई । जग मग ज्योति बरइ अधिकार्ई॥

गरुड़का अमृत लाकर बालकको जिलाना और तीनों देवका हार मानना

( १०४ )

गरुडबोध

बाजे ताल मृदंग अपारा । उठे रँगसों अनहद झंकारा ॥ तारी उठे तत तत सों सारा । हंसे सबै सब साधु विचारा ॥ निर्गुण भक्ति कीन्हा लौलायी । चहुँदिशि अगर रहा मँहँकायी ॥ देख सभा सब मोही भाई । सब मोहे कछु कही न जाई ॥ मोहि नाग नागेश्वर भारी । मोहि रही सब सभा विचारी ॥ मोहे गण गँधर्व मुनि देवा । कोई भक्त का जाने न भेवा ॥ वासुकिदेव अस्तुति अनुसारी । धन्य कबीर जो भक्ति तुम्हारी ॥ पायो दर्श धन्य भाग हमारो । धन्य कबीर यहाँ पग धारो ॥ धन्य कबीर तुम्हारी वानी । मोहि रही सब भगतिन रानी ॥ कीन्हो भक्ति पहर डुइ भाई । अति आनँद होय मंगल गार्ई ॥ पुनि उठिके हम आरति लीना । एकोतर नरियर मालुम कीना ॥ परवाना ब्रजबालहि दीनी । वह शिर नाइ बन्दगी कीनी ॥ पुनि समरथकी अस्तुति सुनायी । दीन प्रसाद सबहि बरतायी ॥ सब संतन लिन माथ चढ़ाही । आशिष दीन सकल मिलिताही ॥ दिन दशकै आदर करि लीना । सेवा भक्ति बहु विधि कीना ॥ संत साधुको बिदाई दीना । चादर धोती सबही लीना ॥ सबहि कहै मम आशिष लीजो । साधुन के चरणें चित दीजो ॥ ऐसी भाँति बिदा जो कियऊ । आपु आपु सब घरहि सिधैऊ ॥ चलत प्रेम सबहि को भाये । बहुत भाँति की अस्तुति लाये ॥

साखी-कहैं कबीर धर्मदाससे, यहि विधि भौ विस्तार । गरुड ज्ञान सबसे कियो, हारे सबे भुआर ॥ वक्ता के कण्ठ बसुँ, श्रेतहि श्रवण आहिँ । संतनके शीश वसुँ, ज्ञानिन हृदय माहिँ ॥

इति श्रीबोधसागरांतर्गत कबीरधर्मदाससम्भावे

गरुडबोधवर्णनो नाम षष्ठस्तंभः

गरुड़ बोधका संक्षेपसार

बोधसागर

( १०५ )

गरुडबोधका संक्षेप सार

प्रायः कबीरपन्थी लोग ऐसे गरुडबोधादि ग्रंथोंके भावको न समझ कर अन्य वैष्णव आदि सम्प्रदाइयोंसे इन्हीं ग्रन्थोंके प्रमाण द्वारा वाद करके परस्पर रागद्वेषमें फँसकर निन्दाके पात्र बनकर, नास्तिकादि नामों के लक्ष्य बने हैं। और जिस प्रकार से इनमें अविद्याका विशेष प्रताप फला है उसी प्रकारसे अन्य सम्प्रदाय वालोंमें भी अज्ञान देवने अपना राज्य जमा रखा है। जिस कारणसे विद्या और ज्ञानका तो उनमें प्रवेश भी होने नहीं पाता। यही कारण है कि, वे भी अपने इष्ट देवके स्वरूपको न समझकर कबीरपंथियों के तर्कको सुनकर उन्हें समझाने या उत्तर देकर उनका समाधान करनेमें असमर्थ होनेके कारण उन्हें नास्तिक और निन्दक आदि नामोंसे पुकारते और उनसे द्वेष करते हैं। किन्तु दोनों दलोंमें जो ज्ञानी और समझदार हैं, आत्मतत्त्वमें जिनका प्रवेश हुआ है जिन्होंने शास्त्र और ग्रन्थों का मनन करके उनके भेदको समझा है, वे न तो किसीके ऊपर बहिरदृष्टि और द्वेष अथवा निन्दा के भाव से तर्कही कर सकते हैं न उनके वाक्यको सुननेवाले ज्ञाता लोग उनमें नास्तिकता ही का अनुमान कर सकते हैं।

कबीर पंथमें जितने ग्रन्थ वर्तमान हैं वे सब अध्यात्म विद्या की पुस्तक हैं। जो कुछ उन ग्रन्थोंमें लिखा है सबका आध्यात्मिक अर्थही ग्रहण करने योग्य है। यदि आध्यात्मिक अर्थको छोड़कर साधारण अर्थ और शब्दार्थको ही ग्रहण किया जाय तो न जाने असम्भावता आदि कितने दोष आकर उपस्थित

( १०६ )

गुरुडबोध

हो जावेंगे । और स्वयम् कबीर साहिबमें ऐसे २ अनर्थका दोष लग सकेगा कि, जिस कलंकको मिटाना कठिन ही नहीं बरन् असम्भव है । इतना ही नहीं ग्रन्थोंमें बात बातमें आध्यात्मिक अर्थ भी बतलाया गया है और जिस ग्रंथकी जैसी प्रक्रिया चली है वैसेही उसका निर्वाह भी किया गया है जो लोग मनन और विचार किये विना केवल शब्दों और पदोंको लेकर लड़ते झगड़ते हैं उन्हें कबीर साहिबके इस मसले पर ध्यान देना चाहिये कि—“कबीरका गाया गावेगा । तीन लोकमें धक्का खावेगा ॥ कबीरका गाया बूझेगा । तीन लोक वहि सूझेगा”—जैसे इसी ग्रन्थमें यदि गुरुडका वही साधारण अर्थ लिया जावे जैसा सर्वसाधारण समझते हैं, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि विष्णु उपासकोंके समक्ष इस पुस्तकको बाँचनेवाला मार खाये विना नहीं रहेगा—किन्तु जब उसी का आध्यात्मिक अर्थ समझेगा और दूसरोंको समझावेगा कि, गुरुड नाम है जीवका, विष्णु नाम है सतोगुणका अर्थात् सतोगुणभावों करके सम्पन्न जो मुमुक्षु है उसको जब ज्ञानी गुरु मिलता है तब उसे त्रिगुण ( रजोगुण ) ( ब्रह्मा ) सतोगुण ( विष्णु ) तमोगुण ( शंकर ) के जाल से निकाल कर त्रिगुणातीत कर देता है—अर्थात् सतपुरुष रूप उसके प्रत्येक आत्माके स्वरूपका ज्ञान करा देता है । तब गुरुड रूप मुमुक्षु तीनों गुणोंको जीत कर शरीर निर्वाह अथवा प्रारब्ध बलसे यावज्जीवन सतोगुणके दिव्य गुणोंको सम्मुख रख कर आनन्दपूर्वक विचरता और दूसरोंको भी अधिकार पूर्वक उपदेश देकर सत्यपदकी पारख बतलाता है । इसी प्रकारसे कबीर पंथके सर्व ग्रन्थोंका आशय आध्यात्मिक है ।

जो इन ग्रंथोंको पढ़कर अपने आत्माके कल्याणार्थ सत्य अर्थको ग्रहण न करके केवल शारीरिक सुख और

बोवसागर

( १०७ )

मनकी तुच्छ तुच्छ वासनाओंको पूर्ण करनेके लिये अपने समझे विना दूसरे जीवों को मिथ्या भ्रम में डालते हैं वे मिथ्या भ्रम को उठाकर पाप के भागी बनते हैं । सद्गुरु की कृपा होगी तो ग्रन्थों को छपवा लेने के पश्चात् सब ग्रन्थों के सारको प्रदर्शित करानेवाला एक स्वतंत्र पुस्तक प्रकाशित करके मिथ्या प्रचलित भ्रम को दूर करनेका प्रयत्न करूँगा ।

इसके प्रथम भोपालबोध आदि ग्रन्थ जो छपे हैं उनका भी भाव आध्यात्मिक समझना चाहिये ।

इति

इति

श्रीबोधसागरान्तर्गत

ग्रन्थ गुरुडबोध

समाप्त

भारतपथिक कवीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संशोधित

श्री-हनुमानबोध

मुद्रक एवं प्रकाशकः

खेमराज श्रीकृष्णदास,

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, बम्बई-४०० ००४

पत्रिका संख्या

पत्रिका संख्या

पत्रिका संख्या

पत्रिका संख्या

पत्रिका संख्या

पत्रिका संख्या

पत्रिका संख्या

सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

श्रीराम

A faint, stylized illustration of a seated figure, likely Lord Rama, holding a bow and arrow, with a small umbrella-like structure above his head.

श्रीराम

धर्मदास साहबका प्रश्न - हनुमान शब्दका अर्थ और हनुमान बोधका भाव

श्रीमुनीन्दाय नमः

अथ श्रीबोधसागरे

सप्तमस्तरंगः

ग्रन्थ हनुमानबोध

अजर ज्ञान करणा यतन, सत्य कबीर जगत्तार । तामु चरण बन्दन किये, होवे जगत उधार ।

धर्मदास बचन—चौपाई

धरम दास विनवे करजोरी । तुम समरथ हौ बन्दी छोरी ॥ युगन युगन में तुम चलि आये । आदिअंत की खबर लगाये ॥ एक अनुराग मोरे मन आया । सो प्रभु कटु करि मो पे दाय।॥ हनुमतको कब मिल्यो गुसाई । सो प्रभु मोहि कहिये ससुझाई॥

१ ह इति प्रसिद्धे नु इति वितर्के इस व्युत्पत्तिसे जो मान्य के योग्य होवे, अथवा—“मैं माया तत्कार्य नहीं और वह मेरा नहीं किन्तु मैं तिसका ब्रह्मा हूँ” इस निरव्ययवानका नाम हनुमान है । सो मन इन्द्रियादिक जट परायोंकी अपेक्षा प्रत्येक आत्माही (बैतन्य होनेसे) मान्य करने योग्य है । इससे प्रत्येक आत्माको ही हनुमान कहते हैं, अथवा—

अनादि पक्षके वट वस्तुओंमें जीव ईश्वर दोनों भाई हैं । उनमें राम ईश्वर हैं और लक्ष्मण जीव रूप मुमुक्षु हैं । मानरूप इन्द्रदेवको जीतनेवाला गुप्त ही इन्द्रजीत है । सो गुरुरूप इन्द्रजीतके ज्ञानरूप शक्ति के भारने से मुमुक्षु रूप को मूर्च्छा हुई अर्थात्—आचरण विशिष्ट अज्ञानाशक्त नासाही मूर्च्छा है, तब विशेष विशिष्ट अज्ञानाशक्त रूपमानने शरीररूप पर्यंतसे प्रारम्भ रूप संजीवन बूटी साकर मुमुक्षुरूप लक्ष्मण की मूर्च्छा छुड़ायी अर्थात् निज स्वरूपसे भिन्न सर्व नाम रूप जगत् निष्प्राप्तका नाव निरव्ययरूप बोधिक होना अर्थात् संसारकी प्रतीतिपूर्वक जो जीव मुक्ति सोई मूर्च्छा—

( ११४ )

हनुमानबोध

हनुमत कहिये महा अभिमाना । कैसे लीन साहब सो पाना ॥ कैसे हनुमत सेवा ठानी । कैसे उन बचने सो मानी ॥ यह वृत्तांत कहो तुम ज्ञानी । रामचन्द्र के हनुमत मानी ॥ कैसे तिन हिरदय नाम समाई । सब दया करि तुम कहहु सो साई ॥

कबीर बचन

कहै कबीर सुनु धर्मनि आयी । त्रेता युग महीं हनुमत चित्ताई ॥ सेतुबन्ध रामेश्वर हम गयऊ । तहवाँ पड़ँच हम सुनीन्द्र कहयऊ ॥

साखी-सेतु बन्द में जायके, देखा हनुमत वीर ।

बहुत कला है तासुकी, सबही बजर शरीर ॥

कहत सुनीन्द्र सुनो हनुमाना । तुमको अंगम सुनाऊ ज्ञाना ॥

तुम्हरे मनमें जो अभिमाना । तजि अभिमान सुनहु तुम ज्ञाना ॥

सत्य पुरुष की कथा सुनाऊँ । अगम अपार भेद बतलाऊँ ॥

सत्यसुकृत की कथा यह भाई । जाकर तुम मर्म नहीं पाई ॥

सत्यपुरुष की कथा अपारा । ताकर तुमही करहु विचारा ॥

ताकी गति तुम जानत नाहीं । जो पुरुष पूरण सब माहीं ॥

काहि की सेवा करहु भाई । सो सब मोहि कहो समझाई ॥

रामचन्द्र कहिये औतारा । परलय जाय सो बारम्बारा ॥

साखी-सेवत है तुम कौन को, करो कौन को जाप ।

सो मोको बतलावहु, कौन तुम्हारो बाप ॥

—खुलना है । आशय है कि, हनुमान नाम अज्ञान विशिष्ट किन्तु विवेकको धारण करनेवाले जीव का है ।

अथवा इसी प्रकार से गुरुमुखद्वारा प्रयत्न आशय जाननेके प्रयत्न करनेवाले को ज्ञान पारखी गुप्त उत्तम रीतिसे समझावेगा तब इन प्रश्नों का आशय समझमें आसक्तता है नहीं तो स्वयम् अभिमानमें मरनेवालोंको सत्यका पथ कदापि नहीं मिलता ।

दोहा—बेद उदीध विन गुरु मुख लखे, सागत लीन समान ।

बाबर गुरुमुख द्वार होय, अमृत सो अधिकान ॥

त्रेतामें कबीरसाहबका हनुमानसे मिलना - हनुमानका अपनी बड़ाई करना और मुनीन्द्रजीका समझाना

बोधसागर

( ११५ )

हनुमान वचन-चौपाई

सुनो सुनीन्द्र दृढकरिके बानी । तुम जग महाँ हो बड सुझानी॥ मेरी कला न जगदि छिपानी । तुम मेरी गति नाही जानी ॥ पौरुष पराक्रम बल है मोरा । मोसम और नहीं कोइ जोरा ॥ बावन बीर वसौं जग माहीं । मो सम प्राक्रम कोइ को नाही॥ सब बीरन में मैं सरदारा । मेरी कला सब में अधिकारा ॥ सब जग जाने सब मोहि पूजे । मो सम इष्ट और नहि दूजे ॥ जो चाहो सों कारज सारों । इष्ट करे तो तुरत उबारों ॥ ऐसो प्रसिद्ध जग हम आहीं । सब कोइ जाने तुम जानत नाहीं॥ साखी-सुनो सुनीन्द्र मोरी गति, मोसम और न देव । चाहै सो कारज करूँ, दृढ कै साथै सेव ॥

सुनीन्द्र वचन

सुनु हनुमान वीर ते बंका । आपै थापै बजावै डंका ॥ आपा थापे भला न होयी । आपा थापी सब गये विलोयी ॥ समरथ की गति तुम ना पाये । आपा थापि तुम रहे झुलाये ॥ समरथ पुरुष और है कोई । ताकी गति जानै नहि लोई ॥ हनुमान तुम छोड़ों अभिमाना । तो समरथ को भाषों ज्ञाना ॥ समरथ हुकुम चले जग माहीं । तुम उनकी गति जानत नाहीं ॥ बावन वीर कहै हम जानी । कालपुरुष की सब अगुवानी ॥ सब बैरिन को काल धरि खावे । जो सत्यपुरुष को गम नहि पावे ॥ चौसठ योगिन बावन बीरा । काल पुरुष के बसे शरीरा ॥ काल पुरुष सब रचना कीना । बीरन को सरदारी दीना ॥ मारहि मार सबन को करई । यह अपराध कौन शिर परई ॥ काल पुरुष को करम अपारा । कैसे धौं करिहौ निरवारा ॥ सो अब मोहि बताओ भाई । बल पौरुष कछु काम न आई ॥

हनुमानका रामचन्द्रजीको सबके ऊपर मानना (रामनामकी बड़ाई)

( ११६ )

हनुमानबोध

तुम हनुमंत सांच हो बीरा । तुमरे इष्ट अहै रघुवीरा ॥ ताको तुम जो करो बड़ाई । तुम समरथ को गम्य नहिं पाईं ॥ राम काज तुम भले सुधारा । ताके हुकुम लंका तुम जारा ॥ वह जग में कहिये अवतारा । अगम भेद तुम नाहिं विचारा ॥ उनकी लागि रहै सब कोई । जो जस सुमिरें पावे तस सोई ॥ तुम भूले प्रभुता की माहीं । प्रभुता जग में अस्थिर नाहीं ॥ स्थिर घर कोई नहिं जाने । प्रभुता बड़ाई सब मन जाने ॥ जो तुम मानों कहा हमारा । तो तुम पाओ समरथ दर्बारा ॥ सारखी-समरथ गति अति निर्मल, प्रभुता अहै मलीन । जिनकी तुम सेवा करो, सोउ न पावैं चीन ॥

हनुमान बचन चौपाई

सुनो सुनीन्द्र बचन हमारा । रघुपति हैं सबके सरदारा ॥ इनही समान कोउ दूसर नाहीं । तीन लोक के साहिब आहीं ॥ उन प्रताप हम जग सत जाना । हमसों कहा कथौ तुम ज्ञाना ॥ रघुपति को हम जानै परचा । हमसों कहा कथौ तुम चरचा ॥ सागर ऊपर पथर तिराया । ऐसा नाम अहै रघुराया ॥ मैं पौरुष बल आपन जातूँ । कहा कोई का नाहीं मानूँ ॥ यती नाम जानै जग मोहीं । सो मैं भाव सुनाऊँ तोहीं ॥ तुम जो पूछी पिता की बात । पिता कहत हूँ औ फिर माता ॥ महादेव देवन सरदारा । जिनको पूजे सकल संसारा ॥ नाहिं बीज की काया मोरी । बजर अंग पायो सब जोरी ॥ गौतम ऋषि की पत्नी नारी । नाम अहिल्या राम उबारी ॥ नाम अंजनी पुत्री ताकी । जनम लियो कूरव में जाकी ॥ साधु रूप धरि शिव बन आये । जहाँ अंजनी को मंडप छाये ॥ प्यास प्यास कहि बोले बानी । शिवकी गति माता नहिं जानी ॥

मुनीन्द्रजीका हनुमानके वचनका खण्डन कर देना

बोधसागर

( ११७ )

कह अंजनी तुम पीयहु पानी । तब शिव बोले और हि बानी ॥ तैं निगुरी हम साधु विचारा । तेरा जल नहिं करौं अहारा ॥ कहै अंजनी गुरु कहैं पाऊँ । जँगल ते मैं उठि कहैं जाऊँ ॥ तब शिव कहै साधु हैं हमही । दीक्षा लेओ देत हम तुम्हही ॥ सिंगी नाद रहैं शिव पासा । फूकयों कान रही तब आशा ॥ छल करि बीज दीन्ह तब डारी । तासों उपजी देह हमारी ॥ कान रहा लीन्हा अवतारा । षत्रन पुत्र जाने संसारा ॥ पिता मात की सब विधि भाकी । कहौ तो और सुनाऊँ साखी ॥ सत्य बात मोरी है भाई । सेवा करौं सदा रघुराई ॥ समरथ और नहीं है कोई । रामचन्द्र बड समरथ होई ॥ समरथ समरथ कहा बखानो । मैं तो समरथ रामको जानो ॥ बहुत कहत हौं बात बनायी । राम नाम तुमहुँ नहिं पायी ॥ जाकी थाप तीन पुर माही । राम समान और को आही ॥ बुद्धि ज्ञान तबही बनि आवे । जो कोइ राम पदार्थ पावे ॥ ज्ञान भक्ति सब लगै नीका । विना राम सब जानो फीका ॥ सुनो सुनीन्दर बात हमारी । सेवो राम सदा सुख कारी ॥ राम विना नाहीं कहुँ जागा । राम नाम मेरा मन लागा ॥ दशरथ घर लीन्हा अवतारा । उनकी गति है अगम अपारा ॥ बडे बडे उन कारज कीन्हा । तुम सुनीन्द्र भेद नहिं चीन्हा ॥

साखी-सुनो सुनीन्द्र मोर गति, रामनाम है आदि । सो दशरथ घर औतरे, उनका मता अगादि ॥

सुनीन्द्र वचन-चोपाई

कहे सुनीन्द्र सुनो हनुमाना । साधु भाव गति तुमहुँ न जाना ॥ राम नाम सब जग गोहराई । काहे साधु होय नहिं भाई ॥

( ११८ )

हनुमानबोध

राम नाम हम नीके जाना । तुमका मोसों करो बखाना ॥ रमता राम बसे सब माहीं । ताहि राम तुम जानत नाही ॥ ऐसो राम आहि अवतारा । जिन लंकापति रावन मारा ॥ काल रूप सब करे सँघारा । ताको सुमिरन करै संसारा ॥ घट घट बोले कालकी छाहीं । भेद भाव तुम जानत नाही ॥ यह तो राम अहैं अवतारा । विना राम नाही निस्तारा ॥ परलय तर जिव रहै भुलायी । काल गम्य काहूँ नहि पायी ॥ सुनु हनुमत तुम मानत नाही । काल गह्यो है तुम्हरी बाहीं ॥ ताते तोहि बूझि नहि परई । यह औतार काल सब धरई ॥ बार बार धरि यह औतारा । तीनों पुर को करै सँहारा ॥ काल कला कोइ जाने नाही । सूक्ष्म व्यापि रहै सब माहीं ॥ समरथकी गति कालसों न्यारी । ताको कहा जाने संमारी ॥ जो तुम हेतु करि पूछो मोही । तौ सब भाषि सुनाओं तोही ॥ समरथकी गति अगम अपारा । तुम नहि जानो मर्म विचारा ॥ दृढ प्रतीति करौ तो कहिये । साधु होइ साधूगुण लहिये ॥ समुझा विना को करे विवेखा । विना विवेक सत्य को देखा ॥ विना सत्य उतरे नहि पारा । राम राम कहि करौ पुकारा ॥ एसे कारज होय नहि भाई । कौन भांति ते साधु कहाई ॥ यती नाम जो अहै तुम्हारा । षट सो यती बसे संसारा ॥ कार्तिकभाषम शंकर अरु गोरख । लछिमन महाबली बड पौरख ॥ छोटे तुम हनुमान कहाये । षटमिलिके जग नाम चलाये ॥ सो यती षट सब बसे संसारा । विना सतगुरु सब यमके चारा ॥ कालरूप का सकल पसारा । कैसी विधि करिहौ निरुवारा ॥

१ इन षट यतियों के नामोंमें कई प्रस्थोंमें कई प्रकारसे लिखा है जो ठीक जान पड़े रहने दिया है ।

हनुमानका निरंजन (काल) की बड़ाई करना

बोधसागर

( ११९ )

सुनो हनुमंत मेरी बात। सत्य पुरुष है समरथ दाता ॥ ताका तुमसों कहौं संदेश। सुमिरण करो तजो यम भेशा ॥ सत्य समरथ है पैले पारा। काल कला उपज्यो संसारा ॥ सोइ समरथ है सिरजन हारा। तीनों देव न पावैं पारा ॥ साखी-समरथकी गति को लखै, शिव विरंचि नहिं जान । काल अकाल तहाँ नहीं, पूरण पद निर्वान ॥

हनुमान वचन-चौपाई

कहत सुनीन्दर अकथ कहानी । काल काल की बोलो बानी ॥ काल काल कहि मोहि डराओ । तुम तो काल कर गति ना पाओ ॥ काल पुरुष आपे वह होई । और काल देखा नहिं कोई ॥ आपुहि करता आपुहि काल। चौदह भुवन आपै रखवाला ॥ कालपुरुष ते और न कोई । निश्चय कै मैं माना सोई ॥ सबका पिता काल है जोई । ताकी गती लखै ना कोई ॥ ज्योति स्वरूप जग उजियाला । ताका नाम धरा तुम काला ॥ जो तुम कहौं सबै हम जानी । सुनो सुनीन्दर मोरी बानी ॥ रचना सकल काल की ठानी । तुम अपने मन हो बड ज्ञानी ॥ काल पुरुष गति परै न जानी । सो हम जानि छानि के पानी ॥ काल पुरुष ते बडा न कोई । उनके ऊपर और न होई ॥ जाको नाम निरञ्जन राया । तीन लोकमें ताकी माया ॥ उनते और नहीं कोई दूजा । तीनलोक में उनकी पूजा ॥ तीनों देव जो उनको ध्यावैं । ते भी उनको पार न पावैं ॥ ताको तुम सूक्ष्म करि जानो । तुम्हरे मन काहे नहिं मानो ॥ इतनी भयी हनुमान मुख बानी । रचना सकल काल की खानी ॥ उनको पार बताओ मोहीं । उठि के शीश नवाऊँ तोहीं ॥ जो तुम आदि अंत सब जानो । तो तुम ज्ञान अब हमसे ठानो ॥

( १२० )

हनुमानबोध

पहिले सुनो हमारी बाता । तुम सुनीन्द्र है बडा ज्ञाता ॥ मोरे पौरुष है बड जोरा । जन्म लेत कीन्हे घनघोरा ॥ जांदिन जन्म भयो महि मोरा । उदय भानु देखि मैं दौरा ॥ सूरज बाहर आवन नहिं दीना । निकसन तुरत लीलि मैं लीन्हा ॥ एक फलांग उर्ध्वचल गयऊँ । सो पौरुष मैं तुमसे कहेऊँ ॥ माता कीन जब बोल अधीना । उनके कहे छाडि हम दीना ॥ सूरज छाडि दीना हम जबहीं । जग प्रकाश भयो पुनि तबहीं ॥ जन्मत की यह कथा सुनाई । कहो तो और सुनाऊँ भाई ॥ राम प्रताप का हम कीन्हा । सो सुनीन्द्र नाहीं तुम चीन्हा ॥ एक समें जो राम बतायी । लंका खबर लाऔ तुम जायी ॥ लंका छोडि पलंका गयऊँ । जाय नगरमें ठाढो भयऊँ ॥ तब तिन कही यह नहिं लंका । पीछे तजि आयेऊ पलंका ॥ कहाँलौ कथा कहौ जो भाई । अपने सुख कहा करौ बडाई ॥ लक्ष्मण मूर्छित गिरे भुई भाई । तब द्रोणागिरि आनि जिवाई ॥ जेहि पै वही सजीवन होती । दैत्यन छली कीन्ही बहु जोती ॥ रातहिं को द्रोणगिरि लाये । रामवीर को तुरत जगाये ॥ यही द्रोणगिरि लेके दौरा । फिरि के धरो जाइ तेहि ठौरा ॥ ऐसे कारज अनेक सर्वाँरे । उनहि प्रताप कार्य उजियारे ॥

साखी-सुनो सुनीन्द्र मोर गति, पौरुष औ बल जोर । अपना गुण मैं जानिके, कासों कहां निहोर ॥

१ जब शमदमादिका अन्त्यास करके मुमुक्षु ज्ञान प्राप्त करनेके निकट पहुंचाता है तब यदि प्रारब्ध उसी शरीर तक होती है तब तो आत्मज्ञानको प्राप्त हो जाता है और जीवनमुक्त पद को भोगता है किन्तु यदि वर्तमान शरीरका प्रारब्ध अनेक शरीरका कारण होता है तब वह ज्ञान कुछ समय के लिये छिप जाता है।

२ बीर-भाई । रामवीर अर्थात् लक्ष्मण ।