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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पञ्चमुद्रा

( २११ )

यामह सकल जीव उरझाई । अंतकाल पुन धरधर खाई ॥
स्वर्गलोकमह जो चले गयेऊ । तेतो आके देह फिर धरेऊ ॥
तेहुना यमकी छूटे त्रासा । भांत अनेक जीवनको फाँसा ॥
जबै पुर्ष अस देखेउ भावा । सत्तपुर्ष एक रुयाल बनावा ॥
सत्तपुर्ष इच्छा उपजाई । पुहुप नाम तब अंश बनाई ॥
तिन्है पुर्ष अस आहा कीन्हा । भौसागरको आयसु दीन्हा ॥

साखी-पोहोप नाम तबही चले, पुर्षहि शीस नवाय ।

भौसागरमों प्रकटभो, अबिगत रूपबनाय ॥

चौराई

अबिगतरूप छांड हम दीन्हा । संत स्वरूप भेष गहि लीन्हा ॥
शब्दस्वरूप बनाये सोई । तिनकी देहन छाया होई ॥
पाँच तत्त्व तीनोंगुन नाही । धरी देह तब बसत युगमाहीं ॥
सत्तनाम हम नाम धरावा । सब जीवनको संध लखावा ॥
या विध अजदेह धर लीन्हा । सबको आय सिखावन दीन्हा ॥
तब पुन जगमों संध लखाई । निरगुन मता सबै समुझाई ॥
जो जिव संध शब्दकी पाई । जीव असंखन लोक पठाई ॥
प्रथमहि सतयुगमैं हम आये । सत्त नाम तब नाम धराये ॥
तब हम जीव असंखन तारे । यमको मार तब जीव उबारे ॥
त्रेतामाहि बहुर हम आये । मुनिकह बोध मुनींद्र कहाये ॥
कोटिन जीवको संध लखाये । एतिक जीवको तब मुक्ताये ॥
तीजे फिर द्वापरयुग आई । मुनि करुनामे नाम धराई ॥
कोटिन जीव तबै हम तारे । महाकालते जीव उबारे ॥
फिर कलियुगको आयेउ भाई । योग जीत तब नाम धराई ॥
कालहिं जीत हंस मुक्ताये । सत्य शब्दकी संध लखाये ॥
जीव असंखन तारेउं आई । सत्तपुर्षकी दर्श कराई ॥

( २१२ )

बोधसागर

सारखी-चारो युग हम आइया, कीन्हेउ हंस उबार ॥

कलयुग नाम बखानऊँ, योग जीत उच्चार ॥

चौपाई

सुकृत सुनो भेद निर्वाना । अपनी उतपत कहा बखाना ॥
अब संतनको कहाँ संदेशा । जेहि विध लखोतासको भेसा ॥
तिनकी रहन अब देउँ बताई । जाते तुमही संत लखाई ॥
निरगुण चाल चले पुनसोई । सोई संत शिरोमणि होई ॥
तीरथव्रत औ नेम अचारा । इतने रहैं संतसो न्यारा ॥
दानपुण्य जगवतैं धर्मा । एतो जक्त जानिये कर्मा ॥
पूजा जाप ना दुतिया राखै । सत्तनाम हदे अभिलाखै ॥
तैंतीसकोट देवगण भारी । ये सब माया रूप निहारी ॥
दुतिया ध्यान अनित्य विचारै । अक्षै नाम हदेमों धारै ॥
सोई निरगुण संत कहाई । ताकी परख मैं देऊँ बताई ॥
रहे विरक्त होय जगमों सोई । विरही संत सोइ पुन होई ॥

सारखी-यह तो विस्वा धर्म है, दुतिया जप तप ध्यान ।

पतिव्रता इनमों नहीं, मगके रोरा जान ॥

अक्षय नामको गहि रहे, तजे द्वैतके आस ।

सत्तपुर्षको पावई, पूरण पर्म विलास ॥

रहो एकता चित्तमों, दुतिया उसको जान ।

गगनमगन निशिदिन रहै, निरगुणसो पहिचान ॥

चौपाई

सुकृत सुनो ज्ञान अब सोई । निरगुण संत कैसे बसहोई ॥

प्रथम संतको पावे जाही । प्रेम प्रीत तब कीजे ताही ॥

करे बंदगी शीस नवाई । निज गृह तबे ताहि लैजाई ॥

चंदन घसे धामको छावै । तापर बस्तर श्वेत बिछावै ॥

पञ्चमुद्रा

( २१३ )

चरन परवार चरनारज लीजै । बहुत भांतसो भोजन दीजै ॥
महाप्रसाद तासुको लीजै । पीछे औपुन पूजा कीजै ॥
प्रथम बंदगी कायक जाना । मायक बायक फिर पहिचाना ॥
तीनों बंदगी करे बनाई । अनेक भांतिसो ताहे रिझाई ॥
द्रव्य देनको लोभ न कीजै । चरन तरे ताहि धरदीजै ॥
अष्टधातको काया जाना । सो उद्धार कैसे पहिचाना ॥
काया भार उतारके लीजै । चउदह रतन तब गुरुको दीजै ॥
आरती करे बहुभांत बनाई । काया भार तब ताको जाई ॥
यहविध भक्त करो चितलाई । यमको डंड छूट तब जाई ॥

साखी—आरती कीजै पुष्पको, बहुत दीनता लाय ।

कागाते हँसा भयो, सत्त भक्तको पाय ॥

इतनी प्रीत संत जब जाना । तबे संतसो निज मत ठाना ॥
क्रिया करै तबहीमुख बोलै । तबे संत दिल पर्दा खोलै ॥
तबे बस्तु निज देहि लखाई । तासो हंस समाध लगाई ॥
सोई करनी कछुदिन करई । आदिब्रह्म अंतर लख परई ॥
पुर्णलोकमें रहे समाई । तबही बुंद सिंध मिलजाई ॥
इतना खोज करे पुन जबही । अजर अमर घर पावे तबही ॥
निरगुण संतको भेद बतायो । निजमत खोलमें तुम्हैं लखायो ॥
अब एक आगम तुमसों भाषों । सुकृत गोय कछू नहिं राषों ॥

साखी—निरगुणको औतार है, सो प्रकटे जग आय ।

ऋषिमुनि ताको ना लखे, गुप्तसो रहो छिपाय ॥

ताको भेद अब देहुँ बताई । संत रूपसौ जगमें आई ॥
बालक होय पुन जगमें आवै । कमलपत्र पर आसन लावै ॥
निरूनाम जुलहा कहाई । भक्तेहत ताके गृह जाई ॥
खान पान कछु करि हैं नाहीं । दिनदिन अंग बढ़त पुन जाहीं ॥

( २१४ )

बोधसागर

शब्दस्वरूप देह तिन होई । पांचपचीस तीन नहिं कोई ॥
छलदिक्ष्या रामानंदसो लैहै । तिनको फेर उलट समुझैहै ॥
पांडव यज्ञ तिन पूरन कीन्हहा । स्वपच भेष तिनही धर लीन्हहा ॥
कोटिन हंस तबै मुक्ताई । सत्तनाम कबीर कहाई ॥
अजर अमरहो तिनकी काया । जासु देख काँपे यमराया ॥
सोई नाम कबीर कहाई । हमैं उन्हे कछु अंतर नाहीं ॥
ते पुन जगमों परकट होई । ताकर अवध बताऊँ तोही ॥
सम्भवत पंद्रहसे बीस प्रमाना । तबै आय जगमों प्रकटाना ॥
निरगुण संध तब जगमों आई । सोई नाम कबीर कहाई ॥
दोई दीन को बोधे आई । मगहर अमी नदी बहाई ॥
पंडाके पग जरत बुझाई । परसो तगको भरम छोड़ाई ॥
सत्य शब्द प्रतीत दिढ़ाई । भौसागरते जीव मुक्ताई ॥
जीव असंखन तारे जबही । आवैं अंशलोकते तबही ॥
कोटज्ञान धर्मदासहि देहैं । ब्यालिस पिढ़ीथाना बैठेहैं ॥

साखी-नौतम अंश पुर्षके, सो प्रकटे संसार ।

जीव असंखन संगले, जही पुर्ष दर्बार ॥

भौसागरमें रोपेव थाना । धर्मराय शिर मरदेउ माना ॥
तिनको मता सन्त जब पावै । सोतो अजर अमर घर आवै ॥
ताको काल न पावै सोई । गुरु कबीर निज पावै जोई ॥
हमरो उनको एक शरीरा । जाको सुनियो नाम कबीरा ॥
सत्त कबीर पुर्ष निर्वाना । तिनको तुमसों कहों बखाना ॥

साखी-अजर अमर सोइ जानिये, जाको नाम कबीर ।

तासु संध जाने बिना, हंस न लागे तीर ॥

सुकित वचन--चौपाई

है समर्थ तुम आगम भाषा । आगकी अब बणों साखा ॥

पञ्चमुद्रा

( २१५ )

निरगुन अंश लीन्ह हम जानी । ध्यान मंत्र प्रभु कहो बखानी ॥
आगे बिने करों बहु बारा । ताको भेद कहो निरधारा ॥
जीव मुक्तको भेद बताई । आपन करमो कह मुक्ताई ॥
विनती करो दोग्य कर जोरी । ध्यान मंत्रकी भाषों डोरी ॥
ताको मता धरोजिन गोई । मोसो वर्ण सुनावो सोई ॥

योगजीत वचन

सुक्ति सुनो भेद निर्वाना । जीवमुक्ताको कहों प्रमाना ॥
मंत्र ध्यानको बणों अंगा । ताको भाव कहों प्रसंगा ॥
आदि मंत्र मैं देहु बताई । जाके बल हंसा घर जाई ॥
सोई जाप अंतर लो लाई । अंतकाल ताको नहिं खाई ॥
ऐसा तुम्हे कहों उपदेशा । अंतर ध्यानको कहों संदेशा ॥
प्रथमहि जो सुख आसन लावै । राजस योग तब करे बतावै ॥
काया कष्ट न व्यापै कोई । राजस योग पुन कहिये सोई ॥
पांच पचीसकी सुतं बिसारै । अस्थिर बैठ ध्यान उचारै ॥
बैठ शून्य महलमों जाई । तबे निरंतर ध्यान लगाई ॥
प्रथम विरह वैराग समावै । रचना सकल तहाँ बिसरावै ॥
एक पुर्ष एक आपको जानै । द्वैत अकार शून्य पहिचानै ॥
तबही ध्यान समाध लगाई । जाकी सुतं अन्त नहिं जाई ॥
दहिनो अंग श्वास जब आवै । तबे ध्यान महाँ सुतं लगावै ॥
पिंगला अंग पुर्षको बासा । बाँये अंग शक्त प्रकाशा ॥
शक्त अंग कह देहु बचाई । दक्ष अंग वह सुतं लगाई ॥
प्रथम रूप सोहंग उचारा । तामों लखो पवनकी धारा ॥
तामहँ अर्ध पवन जो कहिये । सोहंगनाम पुन तामों लहिये ॥
प्रथम ध्यान धर देखे सोई । अंग अंग की पचै होई ॥

( २१६ )

बोधमागर

तास अंगमें देहु बताई । यह कौआय कहाँते आई ॥
सोतो पुर्पको अंश कहाई । भीतर वाहिर सिद्ध कराई ॥
पिंड ब्रह्माण्ड रहा भरपूरी । सोई निकट सोई है दूरी ॥
तब अजपाकी तारी लावै । विन जप हंसा तहाँ समावै ॥
श्वेतरूप श्वासा को रंगा । सुतं समानी ताको संगा ॥
सप्तपताल कोट ब्रह्मण्डा । सातद्वीप पृथ्वी नौखंडा ॥
सोई सबमें रहा समाई । सो जगको करतार कहाई ॥
एक संख छैलक्ष प्रमाना । इतना योजन लोक बखाना ॥
सोहंग नामको लोक प्रमाना । आगे पुर्प कहीं निर्बाना ॥
पदाराख गुप्तकर भाखो । अक्षरकाट गुप्तही राखो ॥
जेहिते जक्त लेखे नहीं कोई । गुप्त अंक कर भाषों सोई ॥
ताके आगे नाम बखानो । सोई नाम गुरुगमते जानो ॥
प्रकट नाम कर भाषो सोई । सुनके जीव तरे सब कोई ॥
अब मैं कहीं आगेकी बानी । गुप्त अंक गुरुगमते जानी ॥
प्रथमही सोहंग नाम बखानो । तामह बोहंग ब्रह्म समानो ॥
सोहंग मध्य कोहंग दर्शाई । सोतो अंश पुर्पको भाई ॥
दोय असंख दशनील बखाना । एता योजन लोक प्रमाना ॥
श्वेत अंग तिनहुको कहिये । सोहंग पार धामसो लहिये ॥
तिनके दर्श हंस जब पाई । कर प्रनाम तहैं शीस नवाई ॥
वोहंग नाम आसिका दीन्हा । बहुत भांति तिनदाया दीन्हा ॥
तबे हंसको लीन्ह बुलाई । लोक प्रमान सब दियो बताई ॥
तब उन डोरी दीन्ह लखाई । ता चदिहंसा लोक सिधाई ॥

सारखी-वोहंगको प्रनाम कर, तब डोरी गहि लीन ।
पुर्प नाम सुमिरत भयो, परे पयाना दीन्ह ॥

पञ्चमुद्रा

( २१७ )

तब आगेको कीन्ह पयाना । कोहंग नाम जहाँ अस्थाना ॥
कोहंग नामको देखा जबही । हंस प्रणाम कीन्ह पुन तबही ॥
दोयकर जोर सब अस्तुति कीन्हा । मस्तक हाथ पुर्ष तब दीन्हा ॥
तबही हंस बहुत हरषाना । पायो पूरन पद निर्वाना ॥
तीन असंख वटनील बखाना । एता योजन लोक प्रमाना ॥
श्वेत स्वरूप पुर्ष है सोई । श्वेतही वर्ण लोक वह होई ॥
तबै हंसको लीन्ह बुलाई । पाँजी लोकको दीन्ह बताई ॥
मक्रतार तब डोर लगाई । तब आगेकी संघ बताई ॥
हंस प्रनाम पुर्षको कीन्हा । तबही डोर हंस गहि लीन्हा ॥

साखी-बहुत भांति तिन पुर्षसों, हंसा कीन्ह प्रनाम ।

तब आगे गवनत भयो, जोहंग नामको भांम ॥

तब हंसा आगे चलजाई । जोहंग नाम तहाँ पुर्ष रहाई ॥
हंसा तहाँ पयाना दीन्हा । जोहंग नाम तहाँ बैठक कीन्हा ॥
तबही पुर्ष हंसतन हेरा । हंस प्रनाम कीन्ह तेहि बेरा ॥
तब पूरष दिलदाया कीन्हा । वचन आसिका हंसहि दीन्हा ॥
तब हंसा हिरदे हरषाई । हम पुरुषके दर्शन पाई ॥
चार असंख नौ पदुम प्रमाना । जोहंग नामके लोक बखाना ॥
श्वेत स्वरूप पुर्षकी काया । श्वेत वर्णसों लोक बनाया ॥
तबही पुर्ष हंस सँग लीन्हा । लोक दिखाय ताखुको दीन्हा ॥
ताके परे विहंगम डोरी । मुक्तके मारग जाय जिवसोरी ॥
सो हंसाको दीन्ह लखाई । ताचढ़ हंसा लोक सिधाई ॥
आगे आदि पुर्ष निर्वाना । तहाँको हंसा कीन्ह पयाना ॥

साखी-भांति अनेकन पुर्षसों, अस्तुत कीन्ह प्रनाम ।

आदिपुर्ष अवस्थानमों, हंसा कीन्ह पयान ॥

( २१८ )

बोधसागर

जबही हंसलोक नजिकाई । तबही देह हिरंमर पाई ॥
षोडश भान देह उजियारी । ऐसा रूप हंस तब धारी ॥
हंसा तबै तहाँ चल जाई । जक्षत पुर्ष तहाँ आप रहाई ॥
कमल अनंत परबूरी जानो । आदिपुर्ष जहाँ आसन ठानो ॥
पोहोप दीप तेहि नाम बखाना । सत्तपुर्ष कीन्हो अस्थाना ॥
सोई नाम निर्गम्य बखानी । अनंत नाम ताते प्रमानी ॥
ताको नाम हंस जो पाई । जीवन मुक्त हंस होय जाई ॥
सोई नाम जो सुमिरण करई । धिन तप भक्ति सो प्राणी तरई ॥
योजन अनंत लोक विस्तारा । आदिपुर्ष तहाँ करहि विहारा ॥
श्वेतहि वर्ण पुर्षकी काया । संपुट कमल देखिये छाया ॥
पुष्पहि धरनी तहाँ रहाई । जहाँ हंस सब राज कराई ॥
चारकरी सिंहासन जोरा । तहवां मध्य पुर्ष अंजोरा ॥
जगमग जोत अगिन उजियारा । बर्णत बने न अपरम्पारा ॥
हंस अनंतन बैठे तहवाँ । माथे मुकुट छत्रमणि जहवाँ ॥
षोडशभान हंस उजियारा । देह हिरंमर सो विस्तारा ॥
चंद न सूर दिवस नहिं राती । वर्ग अवर्णन जात नहिं पांती ॥
माया कालकी तहाँ न छाया । अजर अमर हंसनकी काया ॥
पुरुषनाम अस्थान बतायो । आदिनामकी संध लखायो ॥
सोई नाम हंस जो पावै । योनी संकट बहुर न आवै ॥

साखी—आदि अमर अक्षत हैं, अविगत अविचल धाम ।

आदिपुरुष सो जानिये, रूप निहगम्भी नाम ॥

आदनाम मैं परकट भाषा । वणों मूल फूल फल साखा ॥
और नाम एक पुर्ष बखाना । विहंग नाम तासुको जाना ॥
सोतो रहे पुरुष दरबारा । ताको भेद मैं कहाँ विचारा ॥
अजपा सिद्धि देउँ बतलाई । ताको भेद कहाँ समझाई ॥

पञ्चमुद्रा

( २१९ )

प्रथमे सोहंग पुर्ष बखाना । तामे अलख ब्रह्म पहिचाना ॥
निः अक्षर निःतत्त्व अधारा । तामह अर्ध पवन हंकारा ॥
सोहंग कार गगन अस्थाना । तामह पूरण ब्रह्म समाना ॥
तामह नाम निगम्य है सारा । सोहै सबको सिरजन हारा ॥
तासों हंस लीन होय जाई । निःअशरमों रहे समाई ॥
सिंधुबुन्द तहाँ एके होई । दुनियाँभाव नाश होय सोई ॥
सोनिज अजपा है निर्वाना । आतम हंसा तहाँ समाना ॥
वोहंग कोहंग जोहंग नामा । सोहंग सुर्त निरन्तर धामा ॥
सोई नाम जीव रखवारा । अमी अन्न बिहंग विचारा ॥
आगे आदिनाम हम भाखा । ताकर नाम सो गुप्तहि राखा ॥
अंतर अजाप नाम सनेही । अमी सोहंग पुर्षकी देही ॥
लागी निरंजन बेहंगमतारी । अष्ट गगनकी खुर्ली किवारी ॥
दहिनो अंग पुर्ष अस्थाना । तहवाँ हंसा कीन पयाना ॥
मकतार गहि हंस उड़ाई । आगे अकह कमल दरशाई ॥
कमल अनंत पंखुरी छाजै । आदिपुर्ष जहाँ आप विराजै ॥
श्वेत सिंहासन श्वेतहि काया । श्वेतहि पुर्ष श्वेतही छाया ॥
श्वेतछत्र शिर मुकुट बिराजै । भान अनंत शोभा तहाँ लाजै ॥
श्वेत चवर शीस फहराई । भान अनंत कला वहाँ छाई ॥
ऐसे निरगुण नाम अन्नपा । महापुर्षसो आदि स्वरूपा ॥
नाम तेज बल सुमिरन पाई । महाकालते जीव छोड़ाई ॥
बहुर न होय जीवकी हानी । निश्चय सत्तपर्षको जानी ॥
यह मत निरगुण पावे कोई । जाको सतगुरु पूरा होई ॥
यह मत पाय अमर होय जाई । बहुर न जीव प्रलै तर आई ॥
सत्यनाम सतगुरु परतीती । हंसा चले तब भौजल जीती ॥
है सुकृत तुम संत सुजाना । तुमसों कहीं मैं योग ठिकाना ॥

( २२० )

बोधसागर

या विधि करनी करे बनाई । सत् सिंधमो जाय सहाई ॥
ना फिर आवे ना फिर जाई । अजर अमर घर रहै समाई ॥
जीव बुद्ध नाश तब होई । ब्रह्म समाय ब्रह्म होय सोई ॥
ताकर संघ कहो निरवारी । हंस होय सो लेय विचारी ॥
यह तो भेद ना राखौ गोई । आदि योग मैं भाखों सोई ॥
अब मैं कहौं मंत्र उपदेशा । भाखो आदनामको भेषा ॥
गुप्त अंक लिख देउं बताई । पुस्तक देख लखो नहिं जाई ॥

साखी-गुप्त भेदको मंत्र यह, वणोंअंक छपाय ।

सो अंतरमों जाप कर, ताको काल न खाय ॥

अजपाको मन ध्यान धर, सो यह मंत्र बखान ।

सो तो पुन अस्थिर भयो, बहुर न जीवकी हान ॥

मंत्र

बो सों जो को अ अ निः म वे कां ञ्र मी हं हं हं हं हं हं छे
रू है सं हं म म नो ग नि पू प त अ हं ॥

हे सुकित तुम बडे विवेकी । तुमको बुद्ध सकल हस देखी ॥

ताते तुमको मंत्र सुनावा । जीव काजको शब्द लखावा ॥

सो तुम राखो गुप्त छिपाई । यह जनि कहो खोलके भाई ॥

यह निजमन्त्र प्रकट जो होइहै । विन करनी हंसा तर जैहै ॥

गुरमत पंथ चाल मिट जाई । ताते करनी कहि ससुझाई ॥

योग ध्यान कुछ करनी कीजै । पीछे मंत्र जाप तेहि दीजै ॥

मंत्रपाय मन आपा आई । गुरुकी आसन राखे पाई ॥

तबे हंसको होय अकाजा । ताते कहो योगको साजा ॥

मंत्र जोर ते लोके जाई । शोभा हीन हंस होय भाई ॥

षोडश भान हंस उजियारा । सो नरहै गतमंद विचारा ॥

मंत्र ध्यान अजपाको साधै । या बिधसन्त ध्यान अवराधै ॥

पञ्चसुद

( २२१ )

तबही सुफल कामना होई । पहुँचे हंस लोकको सोई ॥
अजर हिरंमर देही पावे । योनी संकट बहुर न आवे ॥

साखी-जीव मुक्तको मंत्र यह, बणीं अंक छपाय ।
ताको जप मनमें करे, ताको काल न खाय ॥

सुक्ति वचन-चौपाई

हो सतगुरु तुम मंत्र सुनायो । मेरो हृदैं सांच अब आयो ॥
अब गुरु कहो लगनकी वानी । श्वासा लगन कैसे पहिचानी ॥
अलख मता है ताको साई । ताको भेद कहो समुझाई ॥
कैसो रंग लगनको होई । कारण भेद कहो प्रभु सोई ॥

साखी-जैमुन जगपत केतुकी, औ व्यालिन पहिचानी ।
गुण प्रकाश लक्षण सहित, सतगुरु कहो बखानी ॥

योगजीत वचन

सुक्ति सुनो लगन बेवहारा । तुमसों भेद सब कहों बिचारा ॥
प्रथमे श्वासा ध्यान लगावै । ताको रंग हृष्टमें आवे ॥
पीतवर्ण तहां देखे जबहीं । अति दुलास मन आवे तबहीं ॥
उपजे सुख पीत रंग जानी । जगपति लगन पुन ताहि बखानी ॥
अरु पुन श्वेतवर्ण लख आई । अस्थिर समाध रहे ठहराई ॥
उपजे सुख प्रेम भक्त अधिकारी । दया लीन तब सुतं निहारी ॥
श्वेतभाव जब मनमें आवे । सोई जैमुन लगन कहावै ॥
बहुर ध्यान धर देखे जाई । श्वासा पवन श्वेत लख जाई ॥
जल आकार पुन भासों जबहीं । उठे सुगंध श्वासमें तबहीं ॥
ध्यान बीच आकार न जाने । कैतुकी लगन ताहि पहिचाने ॥
बहुर ध्यान धर देखे जाई । अरुणश्याम तहाँ भूमि लखाई ॥
अहंकार मन शठता आवे । सुख नाश होय दुःख उपजावे ॥
इतना भावही देखे जाई । व्याल लगन कहावै भाई ॥

( २२२ )

बोधसागर

साखी-श्वासा मद्धे तत्त्व है, लगन तत्त्वके माहिं ।
योगांजन पहिचानि हैं, ज्ञानीजानत नाहिं ॥

प्रथमहि पृथीतत्त्वको पाई । तामें जगपति लगन मिलाई ॥
अष्टोदिशा गवन तब कीजै । सकलबिचार छांड़ तब दीजै ॥
अष्ट सिद्ध नव निद्धि कहाई । सो तो तहां सहजमों पाई ॥
मनमों इच्छा जाकी होई । सुफल कामना पावै सोई ॥
कोटिन कार्य सिद्धता पावै । सर्व जीत होय घर को आवै ॥
मनमों हार न आवै कबही । ऐसी लगन बिचारे जबही ॥
सुरको सगुन एक गुन जानो । यह मत विश्वावीश बखानो ॥
ताको भेद मैं दीन्ह बताई । सबे सिद्धको मूल लखाई ॥

साखी-जैतिक कारज जगतमों, चर औ अचर विचार ।
ते सब जानो सुफल है, कोट सिद्धको सार ॥

जैमुन लगन कहौं समुझाई । ताकर फल मैं देउँ बताई ॥
जलके पृथीतत्त्व दोय पावै । तामें जैमुन लगन पिलावै ॥
तबही ज्ञान करे जो कोई । सबै सिद्धता पावै सोई ॥
कब हूं न होवे तनमों पीरा । जीते युद्ध महा रणधीरा ॥
मनवांछित फल पावे सोई । जितने कार्य जगतमों होई ॥
एक सिद्धकी कौन चलावे । कोटिन सिद्ध तामें फल पावे ॥

साखी-नौ ग्रह घातिक दरसके, और योगिनी काल ।
लगन तत्त्व लखके चले, कारज होय ततकाल ॥
सुर औ तत्त्व बिचारके, तामह जैमुन होय ।
जौन वचन मुखसों कहे, सिद्ध जानिये सोय ॥

तीसर लगनको भेद बताऊँ । ताको अर्थ तब वर्ण सुनाऊँ ॥
जलके पृथी तत्त्व एक पावै । तामह लगन केतुकी आवै ॥
ताके जोर कार्यको जाई । सोतो कार्य मिले उठ धाई ॥

पञ्चमुद्रा

( २२३ )

राजाराव मिलनको जाई । देखत ताहि सभा भहराई ॥
हाथ जोर आगे चलआई । बहुत भांति तेहि सेवा लाई ॥
कार्य सिद्ध तब जगमों जानो । चर अरु अचर जेते पहिचानो ॥
योग सिद्धके साधन कीजै । यह मत सुरत देख जब लीजै ॥

साखी—सर्व अर्थ मन कामना, आनन्द सकल हुलास ।

जेते सुख है जगतमों, सो सब ताके पास ॥

चौपाई

व्याल लगन अब कहौ विचारी । सोतो युद्धकार्यको भारी ॥
दहिनों सुर पुन आवै जबही । व्याल लगन कहावै तबही ॥
सो सो जाय लाखको मारै । सो संश्राम न कबहुँ हारै ॥
यम स्वरूप जब कटक दिखाई । देय शत्रु तब तुरत पराई ॥
याको दृष्टि भरि हेरे जबही । मानों काल गिरासे तबही ॥
मानों काल लीन्ह औतारा । या विधि ताको रूप निहारा ॥

साखी—व्याल लगनको भेद यह, तुमसों कहां विचार ।

सिद्धिकार्य यामें नहीं, युद्ध जीत अहंकार ॥

जैसुन जगपत केतुकी, औ व्यालिन पहिचान ।

अर्थ सहित गुण लगनको, तुमसों कहां बखान ॥

कोटि योगको योग है; कोटि ज्ञानको ज्ञान ।

कोटिसिद्धको सिद्ध है, कोटि ध्यानको ध्यान ॥

नौ षट चार अष्टदश, तैंतिस कोटि बखान ।

ताते मत आगे कहौं, महारूप विज्ञान ॥

योग ध्यान आक्षेप मत, आदि नाम ले जोय ।

उलट समानों आपमों, जीवन मुक्ता होय ॥

चार मुक्तके बीचमें, रहे अवध परमान ।

याते रहित बखानिये फिर नहीं आवाजान ॥

( २२४ )

बोधसागर

चली पूतरी नोनकी, थाह सिन्धुको लेन ।
आपन गल पानी भई, उलट कहेको बैन ॥

चौपाई

हे सुकित तुम हो बड़ ज्ञानी । तुम सो भेद अब कहाँ बखानी ॥
यह निरगुण मत राखो गोई । जगमों प्रगट न कीजै सोई ॥
यहतो अगम निगमकी बानी । ताको भेद जक्त नहि जानी ॥
अपनो काज गुप्त कर लीजै । ताको मर्म न काहू दीजै ॥
जाकह जानहु आप समाना । ताको यह मत कहो बखाना ॥
तुम आये जीवनके काजा । बासन जान बस्तधरो साजा ॥
कलियुगआदि द्वापरको अन्ता । निजमत तुमसों भाषो सन्ता ॥
यह तो तुम्हे सिखावन दीन्हा । तुमतो रहो नाम लौ लीन्हा ॥
ध्यान समाध करो चितलाई । आप अपनमों रहो समाई ॥
पुर्ष संध हृदयमों राखो । और ज्ञान प्रगटकर भाखो ॥
अब भौसागर करो पसारा । हम अब चले पुर्ष दरबारा ॥
आपन सुतें नामसों लावो । भौसागरते जीव मुक्तावो ॥
जीवतपुर्ष सो पचै कीजै । ऐसो चित समाधमों दीजै ॥
बहुर मरे की रहे न आसा । जीवत करे लोकमों बासा ॥

साखी—जीवत समानो लोकमों, नहीं मरणकी आस ।

जीवन मुक्ता होय रहो, सत्तनाम पर्काश ॥

सिंधु समानो बुंदमों, बुन्दहि सिंधु समान ।

सिंधु बुन्द एकै भयो, बहुर न आवा जान ॥

अगम ज्ञान अक्षेत मत, आदि रूप विज्ञान ।

हेसुकृत निरगुण कथा, तुमसों कहाँ बखान ॥

इति श्रीग्रन्थ पंचमुद्रा सुकृतो योगजीत संवादः सम्पूर्णः

प्रारंभिक पृष्ठ (आत्मबोध एवं अन्य बोध)

भारतपथिक कबीरपंथी स्वामी श्रीयुगलानन्द (विहारी)
द्वारा संशोधित

खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन बम्बई

नं.९ कबीरसागर - १

संस्करण : फरवरी २०१९, संवत् २०७५

मूल्य : १६० रुपये मात्र ।

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खेमराज श्रीकृष्णदास™

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आत्मबोध ग्रन्थ

अथ आत्मबोध प्रारंभः

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भारतपथिक कवीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संशोधित

खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन,
बम्बई

अनिल प्रकाशक

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सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

1812

1812