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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( १९२ )

बोधसागर

स्वासा परख घरीकी राखे । जो दम चले सो आगम भावै ॥
सत्ताइससो स्वासा चले जबही । पहर टंकारा मारे तबही ॥
एतिक स्वासा पहर प्रवानी । घरी चारमों गजर बन्धानी ॥
आठ पहर छ घरी बजावै । ठोके गजर गहर नहिं लावै ॥
चार घरी चारो युग मूला । चार पहर चारो अस्थूला ॥
चारो युग एक पहरके माही । चारो युगकी वतैं छाही ॥
प्रथम पहर सतयुग प्रवाना । ताकर प्रथम घरी बंधाना ॥
सतयुगमें युग चार अपारा । चारो युगके नाम निनारा ॥
प्रथमह सतयुग रोपो थाना । चारो युग तेहि माहि समाना ॥
सतयुग प्रथमहि घरी उतपानी । किलक नामयुग ताहि बखानी ॥
किलक जगकी स्वासा सारा । छैसे पचहत्तर स्वास सुधारा ॥
एतिकस्वासाकिलक युगमाहीं । पूछै जीव अच्छेकी छाहीं ॥
वीतत घरी गजर घहराई । काल टंकोरा मारे धाई ॥
या युग अन्तकी आवे घरी । आसे नागिन सनमुख खड़ी ॥
प्रथम किलकयुग होय संधारा । पीछे कमतयुग करे पसारा ॥
सतयुग घरी दूसरी आवै । तैतिक स्वासा कमत युग पावै ॥
जवे कमत युगकरे हंकारा । उतपत थोरी बहुत संधारा ॥
कमत युगकी स्वासा जानो । छैसे पचहत्तर स्वासा बखानो ॥
एतिक स्वासा कमत युग माही । गुण औगुण सब निखैं ताही ॥
बीते कमत कमोद युग आवै । तीसरी घरी बासना धावै ॥
आवांगवन विचारे जोई । युग कमोद सुख पावे सोई ॥
तिसरी घरी कमोदकी आवै । तब कमोद युग सुख दिखरावै ॥
युग कमोद अमल जब आवै । दुखी सुखी नर सब सुख पावै ॥
युग कमोदकी प्रलै होई । दुखी सुखी जाने सब कोई ॥
तबही होय सूर संचारा । महाविरोध उपजे संसारा ॥

पञ्चमुद्रा

( १९३ )

चन्द सनेह होय जो हीना । महासूल तन होय मलीना ॥
श्वासा घरी सातसे भारी । युगकमोदकी कथा निनारी ॥
युगकंकवत होय पैसारा । चौथी घरी कोध अधिकारा ॥
ताकी घरी निकट जब आवै । सतयुग अंत कंकवत पावै ॥
सतयुग अंत होन नहि पावै । युग कंकवत आन समावै ॥
युगकंकवत काल दुखदाई । काया कहर गिरासे आई ॥
युगकंकवत कालकी वाजी । कलह विकार सब जगमों साजी ॥
युगकंकवत महाबल योधा । अंतकाल सतयुगसों कोधा ॥
सतयुगअंत कंकवत माही । अंतकालकी व्यापे छाहीं ॥
युगकंकवत मोहकी छाहीं । काम कोध ममता लपटाहीं ॥
अंतकाल सतयुगके भयऊ । चारो युग परले तर गयऊ ॥
चारों युगका भेद बतावा । अगम निगम सब भाष सुनावा ॥

साखी—एके युगके बीतते, चारों गये बिनास ।

एक नाद चारों युग खायो, सतयुग कीन्हो ग्रास ॥

किलक कमोद चंदके नेहा । कमत कंकवत सूर सनेहा ॥
भये युग अंत एक संगचारी । चार शब्द एक नाद सँघारी ॥
एक नाद एक पहर कहावै । चार घरी एक माहि समावै ॥
चार घरी चारों युग बीतै । शब्द नाद रवि शशिघर जीतै ॥
सतयुगको तब भयो बिनाशा । त्रेतायुगको भयो प्रकाशा ॥
दूसर युग तब भौ विश्वासा । दूसर पहर तत्त्व प्रकाशा ॥
तेज लगन श्वासा अनुसारी । ताते त्रेतायुग संचारी ॥
त्रेता युगकी पखुरी चारी । चार घरी युग चार बिचारी ॥
जस युगअंत सतयुगमों देखा । सोई युग त्रेतामों लेखा ॥
जब जब अंत होय युग केरा । तब तब नादकाल घन घोरा ॥

नं. ८ कबीरसागर - ७

( १२४ )

बोधसागर

त्रेता युगमें कलह अपारा । यज्ञ दान व्रत नेम अचारा ॥
तेहि पीछे द्वापर युग आवा । काल अंत तंब आन समावा ॥
अहंकार तामें अति भाखा । अब कलयुगकी वर्णों साखा ॥
काम क्रोध और पाप अपारा । लोभ मोह यम कीन्ह पसारा ॥
एक पहर चारों युग जाना । ताको वर्ण कहों बिछलाना ॥
पांच तत्त्व तीनों गुण कहिये । ताते पिंडकी उत्पत्ति लहिये ॥
अष्टधात कहिये अस्थूला । ताते रचो गर्भको मूला ॥
शिवकी खासा वायु सरूपा । सत्ती गहे जानके रूपा ॥
शिवको रूप शक्ति गहि लेई । तब सांचा मो जावन देई ॥
जावन जगे तब सांचा माहीं । थाका होय रुधिरके ताहीं ॥
तेहि थाकाकी रचना भारी । तीन लोककी विभो सवारी ॥
महल मध्य पुनि जीव समावा । जलके भीतर महल बनावा ॥
महलके माहिं बनाये छप्पा । तामो दश कीन्हों दरवप्पा ॥
सांचा अत्र जरे नहिं कबहीं । पिंड सवारो अन्तर जबहीं ॥
सांचा माहिं दियो रंग ढारी । नख सिख शोभा बहुत सवांगी ॥
तीनों लोक रचो पलमाहीं । गढ़पति अंश तब साजा ताहीं ॥
प्रथमहि सायेर सात सँवारा । पर्वत आठ कीन्ह अधिकारा ॥
अठारह गंडा नदी बहाई । तामह गुप्त बहै ठहराई ॥
अठारह सहस्र बनाये नारा । अष्टधातुले साज सुधारा ॥
रक्त हांडको सब अस्थूला । बाढ़े लिंग सवांरे मूला ॥
आगे रचो दोह भुज दंडा । सातद्वीप पृथ्वी नौखंडा ॥
बहुर सँवारो दोय पग खंभा । मदन महाबल उपजो रंभा ॥
नासा चढाय मस्तक पर लाई । सातभैंवर नौनाट लगाई ॥
उत्तर मेर शिर जो अस्थूला । सरवर माहिं कमल बहु फूला ॥
नाभी माहिं दल चार बनाई । फूल फल बास घट छाई ॥

पञ्चमुद्रा

( १९५ )

आठो अंग रचो अस्थूला । शिव शक्ती दोनों समतूला ॥
सोई अंग शक्त सोइ ईसा । एकै रूप एक समदीसा ॥
नख सिख रचो गर्भस्थाना । सातद्वीप नौखंड बखाना ॥
प्रथमहि ब्रह्म द्वीप निरमावा । ताऊपर बहु रचना लावा ॥
एकद्वीप नौखंड बनाई । त्रिकुटी सात तहां निखाई ॥
एकद्वीपमहैं सातो नाला । सातोनाल सात हैं चाला ॥
सरवर सात कमल है साता । रंग पांच पांचौ उत्पाता ॥
त्रिकुटी मध्य एकहै कीला । तहां देखिये रंगरसीला ॥
ता कीलामह कानी लागी । पवन सनेह आत्मा जागी ॥
ता कीलामह लागी डोरी । खूटा लगा पवन झकझोरी ॥
झूले मन पवन झूलावै घेरी । एक घर शून्य एक घर फेरी ॥
खूटा होयके पवन झकोरी । इंगला पिंगला सुखमण जोरी ॥
रविशशि पवन गहे मन जोरी । खूटा लाग पवनकी डोरी ॥
मेरे डंडपर खूटा गाड़ा । नदी तीन ताऊपर बाड़ा ॥
खूटातरे नदीत्रिय बहई । तीननदी बिच खूटा रहई ॥
खूटाके दहिने दिश गंगा । अति शीतल बहै नीर तरंगा ॥
सूरसनेह नीर हिय पसैं । सुर्तसनेह धनी तहैं दसैं ॥
खूटाके है बांये अंगा । यमुना नदी बहे अतिरंगा ॥
सुखमन सरस्वती नीर तरंगा । लहर लालच तेज विष अंगा ॥
तहां बसे सरयू तेहि साथा । रावल एक बयालिस हाथा ॥
काल अनन्त रूप रस नाथा । बसे अघर दीखे नहिं माथा ॥
बाढी नदी दोइ विकरारा । शीतल तेज बहे दोउ अधारा ॥
तिसरी नदी गुप्त पर्वाहा । अविगत जल बहेअगमअथाहा ॥
खूटा तरे होय नदी सिधारा । चली सरस्वती फोरि पहारारा ॥
मध्य लहर रस विषके खानी । गंगा यमुना बीच समानी ॥

( १९६ )

बोधसागर

त्रिकुटी संगम भयो मिलाना । भवर गुफा माधो करथाना ॥
त्रिवेणी तट बसे सुठंगा । ताको मम लखा परसंगा ॥
गणगंधर्व मुनि सब कर थाना । सुर नर मुनि कर बैठे ध्याना ॥
तैतिस कोट देव मुनि भारी । यक्ष यक्षणी देव कुमारी ॥
नागसुता अपसरा मोहिनी । चढ़ बिमान सब फिरे जोहिनी ॥
असुरपिशाचऋषनागजोलाहल । त्रिवेणीतट करे कोलाहल ॥
तीनलोक जौ जीव निवासा । सो सब करो त्रिवेणी बासा ॥
त्रिवेणी तट माधौ देवा । सब मिल करे तासुकी सेवा ॥
ताहि प्राग होय चलो प्रवाहा । गंगासागर संगम जाहा ॥
देश देश गंगा फिर आई । घाट घाट बहु क्षेत्र बँधाई ॥
जहां तहां तप ध्यान लगावै । योग यज्ञ तप बहुत करावै ॥
ऋतुवसंत प्रागको धावै । मकर नहाय बजार लगावै ॥
अर्ध उर्ध बिच लागी हाटा । भीतर बाहर औघट घाटा ॥
गर्भमाहि सब युक्ति बनाई । तीन कचहरी तहां लगाई ॥
जहां नदी संगम पर्वाना । तहवां रचो एक अस्थाना ॥
संगम बीच गुफा एकधारा । ताहि गुफामों सात है द्वारा ॥
एकद्वार होय नाद सूधारै । एकद्वार होय रूप निहारै ॥
एकद्वार होय वास बसावै । एकद्वार होय अग्नि समावै ॥
एकद्वार हो स्वाद लिवावै । एकद्वार होय न्याय चुकावै ॥
एकद्वार होय नाद उचारा । योग जीव यह मता विचारा ॥
सातनाल चौदह सुरभाऊ । सातोंके हैं एक सुभाऊ ॥
सातो सात शून्य मों बासा । सातो बसे गुफाके पास ॥
अनहद भेद श्वासाकी धारा । ताको भाषतहों व्यवहारा ॥

साखी-रचना भाषेउ पिंडकी, श्वासा सहित विचार ।
विरलाजन कोई परखि है, अलखरूप व्यवहार ॥

पञ्चसुत्रा

( १२७ )

सुक्ति वचन-चौपाई

सुक्ति कह सुन सत्यगुरु ज्ञानी । अगम कथा कही अन्तर्यामी ॥
और कथा अब मोसों भाषों । जो पूछों सो गोय न राषों ॥
हंस अवधको भेद बतावो । तास मर्म सब मोहि सुनावो ॥
आगम वरष मासषट जानो । तो कछु अपने निजमत ठानो ॥
ताको भेद कहीं समुझाई । सो मोहि सतगुरु भेद लखाई ॥

योगजीत वचन

सुक्ति सुनो सत् मम बानी । भिन्न भिन्न मैं कहीं बखानी ॥
पांचवरी वांये सुर पाई । सोई दहिनो श्वासा चलाई ॥
दशश्वासा सुखमन जो कहिये । ताको भेद बराबर लहिये ॥
आठ पहर पिगला सुर हालै । बरष तीसरे हंसा चालै ॥
आठ दिवस दहिनो सुर बहै । हंसा अवध वर्ष दौय रहै ॥
सोरह दिन पिगला सुर बोले । वर्ष एक मो हंसा डोलै ॥
वीस रैयन दिन दहिनौ पाई । तब षट मासमें हंस चलाई ॥
एकति सरोज दक्षस्वरको जानो । तब दौय दिनमें हंस पयानो ॥
पांचवरी सुखमन जो हालै । पांचवरी मो हंसा चालै ॥
चन्द सुर सुषमन छपजाई । सुखसे तीजो पवन चलाई ॥
ऐसी विधि पवन चलाई । पहर माहिं हंसा चल जाई ॥

साखी-धूम मंडल दीखे नहीं, जोत न नेत्र लखाय ।

छठे मास हंसा चले, बचै न कोट उपाय ॥

छाया शीस दीखे नहीं, भुजा शिखर ना दिखाय ।

दीप बास आवै नहीं, छठे मास चल जाय ॥

गगन शब्द गरजे नहीं, नेत्र गुञ्ज छपजाय ।

मास एकके अवधमें, हंसा तन तज जाय ॥

भैवरगुफा तिल ना लखे, पुतरी जब चढ़जाय ।

पहर एकमें जानिये, हंसा तन तज जाय ॥

( १८८ )

बोधसागर

पृथी जीव गृहे कहौं प्रकाशा । गुदा द्वारमें कीन्हो वासा ॥
पानी हंसको गृहे बताई । ललाट अथरमें बैठक पाई ॥
तेज चेतनको धाम बताई । पीत चक्षुके द्वार रखाई ॥
निरालंभ बायेको थाना । नाभी नाशिक द्वार समाना ॥
आकाश निरंजनको प्रकाशा । श्रवण द्वार ब्रह्मांड है वासा ॥
पांचोंके गृह वर्ण सुनाई । रंग अहार कहौं समुझाई ॥
पृथ्वी पीतवर्ण उच्चार । सो तो जीवको कहौं अहारा ॥
पानी श्वेतवर्ण है भाई । सो तो अहार हंसको आई ॥
तेजको रक्तवर्ण पहिचाना । सो तो अहार चेतन को जाना ॥
बायेको सवुजवर्ण है भाई । निरालंबको भक्षण आई ॥
अकाश नीलवर्ण पहिचानी । निरंजनको अहारसो जानी ॥
रंग अहार कहेउ समुझाई । पृथ्वी पंचके नीर बुझाई ॥
पृथ्वी नीर पुत्र है भाई । हाड पृथ्वीको बिंद कहाई ॥
नीर पृथीको श्रोणित अंशा । पसीना त्वचा पृथीको वंशा ॥
रोम पृथीको वंश कहाई । पृथी नीरको भेद लखाई ॥
पृथी विमल गुण कहिये भाई । अब पृथी गन वर्ण बताई ॥
तेज तमोगुणको पहिचाना । बाये गन्धगुण लखो सुजाना ॥
अकाशअलखगुण जानहु भाई । पांचोंके गुणवर्ण सुनाई ॥
अब प्रकीत पचीस बताऊँ । पाचों तत्त्व विभाग लखाऊँ ॥
हाड चाम मास रोम लखाई । नाटिका पृथी प्रकृत बताई ॥
रक्त पित्त कफ स्वाद बखाना । स्नारप्रकृतजलतत्त्वको जाना ॥
भूखप्यास मुख प्रभा जम्हानो । आलस निद्रा तेज पहिचानो ॥
धावन कूदन बलकर भाई । परसन सकुचन पवन बताई ॥
लोभ मोह हंकार भै जाना । बिंद अकाश प्रकृत बखाना ॥
पांच पचीस अंग कहि दीन्हौं । तासु मर्म कोइ बिरले चीन्हौं ॥

पञ्चमुद्रा

( १८९ )

प्रथमहि जीवरूप पहिचानो । प्रथमै ताके चेला जानो ॥
औ पुन हंसरूप है भाई । पानी चेला तास बताई ॥
चेतनरूप गुरु है सोई । चेला तेज तासुको होई ॥
निरालंब गुरु पहिचानो । वाय तासको चेला जानो ॥
अलख निरंजन गुरु बखाना । चेला आकाश तासको जाना ॥
गुरु शिष्यको भेद बताई । अब तत्त्वनकी परष लखाई ॥

छंद-चौकोर मंद और शुद्धपुरी धरनी है सोई ।

नीचे शीतल मंद चले जलको तत होई ॥
तेज तत्त्व जो ऊंच आगमनकी आइसु होई ।
दहिने बांये चले बाँये तत्त्व जानो सोई ॥
सबुजके मध्य सुखमना पवन गगनको जानिये ।
आकाश नाम तासों कहि पांचों तत्त्व बखानिये ॥
नाभी गंध समान पवनको अंश बखानो ।
हृदे माही प्राण अगिनको अंश सो जानो ॥
कंठ बसे आपान अंश तेहि जलको जानो ।
गगन बसे उद्यान अंश आकाश बखानो ॥
सब देहीमें ब्यान है अंश पृथ्वीको जानिये ।
पंच प्राण ये जानिये अंशहीते पहिचानिये ॥

चौपाई

पंचप्राणकी संघ लखाई । अब उनमुनिको भेद बताई ॥
मुद्रापांच प्रकट मैं भाषा । तामहि श्रेष्ठ उनमुनि राखा ॥
चारोंके परे उनमुनि कहिये । अलखरूप पुनि तामों ल्हिये ॥
सोई ब्रह्मज्ञान कहलावै । धरे ध्यान तहां अमृत पावै ॥
पावे साध अमीरस पीवै । सो योगी जग युगयुग जीवै ॥
ना फिर आवै ना फिर जाई । अखंड मंडलमें रहे समाई ॥

( १९० )

बोधसागर

ताको जरा मरन नहिं होई । परम तत्त्वमें रहे समोई ॥
योग जीत कहु ज्ञान अपारा । यह मार्ग है सत् विचारा ॥

सुक्ति वचन

सुक्ति कहैं सुनो गुरुज्ञानी । सुद्रा पंच तुम कही बखानी ॥
और कथा एक पूछो तोही । सो समुझाय कहो प्रभु मोही ॥
कायामाहे कमल जो होई । तेहि स्थान सुनावो सोई ॥
कौन कमलकै पखुरी जाना । कौन देव तहाँ कीन्हों थाना ॥
कौन कमलसों स्वासा आवै । कौन कमलमें जाय समावै ॥
कौन कमलसों होय गुजारा । कौन कमलसों करे उचारा ॥
केतिक स्वासा आवे जाई । भिन्न भिन्न सब लेख बताई ॥

योग जीत वचन

हे सुक्ति मैं तुम्हैं लखाऊं । कमलनको प्रमान बताऊं ॥
प्रथमहि कमल चतुरदल कहिये । देवगणेश पुन तामों लहिये ॥
रिद्धसिद्ध जहाँ सत् उपासा । तहाँ जा पूछै सो प्रकाशा ॥
षटदल कमल ब्रह्माको बासा । सावित्री तहाँ कीन्ह निवासा ॥
षटसहस्र तहाँ जाप बखाना । देवन सहित इंद्र अस्थाना ॥
अष्टदलकमलहरिलक्ष्मी वासा । षटसहस्र तहाँ जाप निवासा ॥
द्वादश कमलमें शिवको जाना । षटहजार जाप बंधाना ॥
तहाँ शिव योग लगावैं तारी । पारवती संग सहित विचारी ॥
षोडश कमल जीव मन वासा । एक सहस्र जाप प्रकाशा ॥
त्रैदल कमल भारथी वासा । सोतो उज्ज्वल कमल निवासा ॥
एक सहस्र जाप तहाँ कीजे । यह संकल्प जाय तहाँ दीजे ॥
दोय दल कमल हंस अस्थाना । तामह परम हंसको जाना ॥
एक सहस्र जाप प्रकाशा । कर्म भ्रमको है तहाँ नाशा ॥
सहस्रदलकमलमें झिलमिल जाना । ज्योति सरूप तहाँ पहिचाना ॥
ताहै रंगहै अलख अपारा । अलख पुर्ण है सबते सारा ॥

पञ्चमुद्रा

( १९१ )

नवै कमल आदको जानो । जाते निरगुण पुर्ष बखानो ॥
एकइस हजार छैसे जाप कहिये । सो सब पुर्ष ध्यानमें लहिये ॥
अष्ट कमलको भेद बताई । और ज्ञान अब भाषो भाई ॥
स्वासाको प्रमाण अब भाषो । तेहि प्रभाव प्रकटकर राखों ॥
अब स्वासाको भेद बताऊँ । जाको मर्म कोई नहीं पाऊँ ॥
अमी अखण्डते वर्ष धारा । तहाँते स्वास होय गुंजारा ॥
निसवासरको जाने मूला । स्वासा सार शब्दसमूला ॥
दशयै घरते स्वासा आवै । कछु नाभी कछु अलख चढ़ावै ॥
निस दिन चले स्वासाकी धारा । सातसे आगर साठि हजारा ॥
अमी कमल अमान सो नाला । अढ़ाई दल पखुरी रिसाला ॥
तहाँते चले पवनकी धारा । स्वासा माहे शब्द गुजारा ॥
उनचालिस हजार एकसे आवै । एतिक चिकुर द्वारसो धावै ॥
ह्दे कमल होय स्वासा आवै । एकइस हजार और छैसे धावै ॥
एता जाप तहाँ प्रवाना । एकइस हजार और छैसे जाना ॥
एतिक स्वासा ह्दे ले आवै । क्षिन बाहिर क्षिन भीतर धावै ॥
दुसरा कमल है झिलमिल माही । झलके जोत अधर धुन ताही ॥
सहस्र पखुरी कमल अन्ना । तहाँ बसे मन जीत सरूपा ॥
ताहे कमल पर बाजा बाजै । सत्तर बाजा तहाँ विराजै ॥
तहाँ घरनी घरियार बजावे । घरी घरी टंकोरा लावै ॥
छैसे औ पचहत्तर स्वासा । एतिक एक घरी प्रकाशा ॥
एतिक स्वासा कमत युगमाही । तब घरनी घरियार बजाही ॥
या विधि चार टँकोरा ठोकै । राहु केतु संग ब्यालि न रोकै ॥
पहर एक करे धुन पूरा । गृहण गिरासे शशि औ सूरा ॥
गहन गिरा सत निसरे स्वासा । रवि शशि राहु केतु प्रकाशा ॥
तेहि संग एक सापनी रहई । घरीघरी वह जीवको गहई ॥
श्वासा सोरह ग्रहण लगावै । छटे मास तेहि काल सतावै ॥

( १९२ )

बोधसागर

स्वासा परख घरीकी राखे । जो दम चले सो आगम भावै॥
सत्ताइससो स्वासा चले जबही । पहर टंकारा मारे तबही ॥
एतिक स्वासा पहर प्रवानी । घरी चारमों गजर बन्धानी ॥
आठ पहर छ घरी बजावै । ठोके गजर गहर नहिं लावै ॥
चार घरी चारो युग मूला । चार पहर चारो अस्थूला ॥
चारो युग एक पहरके माही । चारो युगकी वतें छाही ॥
प्रथम पहर सतयुग प्रवाना । ताकर प्रथम घरी बंधाना ॥
सतयुगमें युग चार अपारा । चारो युगके नाम निनारा ॥
प्रथमह सतयुग रोपो थाना । चारो युग तेहि माहि समाना ॥
सतयुग प्रथमहि घरी उत्पानी । किलक नामयुग ताहि बखानी ॥
किलक जगकी स्वासा सारा । छैसे पचहत्तर स्वास सुधारा ॥
एतिकस्वासाकिलक युगमाहीं । पूछै जीव अछैकी छाहीं ॥
वीतत घरी गजर घहराई । काल टंकोरा मारे धाई ॥
या युग अन्तकी आवे घरी । ग्रासे नागिन सनमुख खड़ी ॥
प्रथम किलकयुग होय संघारा । पीछे कमतयुग करे पसारा ॥
सतयुग घरी दूसरी आवै । तैतिक स्वासा कमत युग पावै ॥
जवे कमत युगकरे हंकारा । उत्पत थोरी बहुत संघारा ॥
कमत युगकी स्वासा जानो । छैसे पचहत्तर स्वासा बखानो ॥
एतिक स्वासा कमत युग माही । गुण औगुण सब निखें ताही ॥
बीते कमत कमोद युग आवै । तीसरी घरी बासना धावै ॥
आवागवन विचारे जोई । युग कमोद सुख पावे सोई ॥
तिसरी घरी कमोदकी आवै । तब कमोद युग सुख दिखरावै ॥
युग कमोद अमल जब आवै । दुखी सुखी नर सब सुख पावै ॥
युग कमोदकी प्रलै होई । दुखी सुखी जाने सब कोई ॥
तबही होय सूर संचारा । महाविरोध उपजे संसारा ॥

पञ्चसुत्रा

( १५३ )

चन्द सनेह होय जो हीना । महासूल तन होय मलीना ॥
धासा घरी सातसे भारी । युगकमोदकी कथा निनारी ॥
युगकंकवत होय पैसारा । चौथी घरी कोध अधिकारा ॥
ताकी घरी निकट जब आवै । सतयुग अंत कंकवत पावै ॥
सतयुग अंत होन नहिं पावै । युग कंकवत आन समावै ॥
युगकंकवत काल दुखदाई । काया कहर गिरासे आई ॥
युगकंकवत कालकी बाजी । कलह विकार सब जगमों साजी ॥
युगकंकवत महाबल योधा । अंतकाल सतयुगसों क्रोधा ॥
सतयुगअंत कंकवत माहीं । अंतकालकी व्यापे छाहीं ॥
युगकंकवत मोहकी छाहीं । काम कोध ममता लपटाहीं ॥
अंतकाल सतयुगके भयऊ । चारो युग परले तर गयऊ ॥
चारों युगका भेद बतावा । अगम निगम सब भाष सुनावा ॥

साखी—एके युगके बीतते, चारों गये विनास ।

एक नाद चारों युग खायो, सतयुग कीन्हो ग्रास ॥

किलक कमोद चंदके नेहा । कमत कंकवत सूर सनेहा ॥
भये युग अंत एक संगचारी । चार शब्द एक नाद सँघारी ॥
एक नाद एक पहर कहावै । चार घरी एक माहि समावै ॥
चार घरी चारों युग बीतै । शब्द नाद रवि शशिघर जीतै ॥
सतयुगको तब भयो विनाशा । त्रेतायुगको भयो प्रकाशा ॥
दूसर युग तब भौ विश्वासा । दूसर पहर तत्त्व प्रकाशा ॥
तेज लगन श्वासा अनुसारी । ताते त्रेतायुग संचारी ॥
त्रेता युगकी पखुरी चारी । चार घरी युग चार विचारी ॥
जस युगअंत सतयुगमों देखा । सोई युग त्रेतामों लेखा ॥
जब जब अंत होय युग केरा । तब तब नादकाल घन घोरा ॥

नं. ८ कबीरसागर - ७

( १९४ )

बोधसागर

त्रेता युगमें कलह अपारा । यज्ञ दान व्रत नेम अचारा ॥
तेहि पीछे द्वापर युग आवा । काल अंत तब आन समावा ॥
अहंकार तामें अति भाखा । अब कलयुगकी वणों साखा ॥
काम क्रोध और पाप अपारा । लोभ मोह यम कीन्ह पसारा ॥
एक पहर चारों युग जाना । ताको वर्ण कहों बिछलाना ॥
पांच तत्त्व तीनों गुण कहिये । ताते पिंडकी उत्पति लहिये ॥
अष्टधात कहिये अस्थूला । ताते रचो गर्भको मूला ॥
शिवकी श्वासा वायु सरूपा । सक्ती गहे जानके रूपा ॥
शिवको रूप शक्ति गहि लेई । तब सांचा मो जावन देई ॥
जावन जगे तब सांचा माहीं । थाका होय रुधिरके ताहीं ॥
तेहि थाकाकी रचना भारी । तीन लोककी विभो सवारी ॥
महल मध्य पुनि जीव समावा । जलके भीतर महल बनावा ॥
महलके माहिं बनाये छजा । तामो दश कीन्हों दरवजा ॥
सांचा अन्न जरे नहिं कबहीं । पिंड सवारो अन्तर जबहीं ॥
सांचा माहिं दियो रंग ढारी । नख सिख शोभा बहुत सवांगी ॥
तीनों लोक रचो पलमाहीं । गढ़पति अंश तब साजा ताहीं ॥
प्रथमहि सायेर सात सँवारा । पर्वत आठ कीन्ह अधिकारा ॥
अठारह गंडा नदी बहाई । तामह गुप्त बहे ठहराई ॥
अठारह सहस्र बनाये नारा । अष्टधातुले साज सुधारा ॥
रक्त हांडको सब अस्थूला । बाढ़े लिंग सवांरे मूला ॥
आगे रचो दोह भुज देडा । सातद्वीप पृथ्वी नौखंडा ॥
बहुर सँवारो दोय पग खंभा । मदन महाबल उपजो रंभा ॥
नासा चढाय मस्तक पर लाई । सातभैंवर नौनाट लगाई ॥
उत्तर मेर शिर जो अस्थूला । सरवर माहिं कमल बहु फूला ॥
नाभी माहिं दल चार बनाई । फूल फल बास घट छाई ॥

पञ्चमुद्रा

( १९५ )

आठो अंग रचो अस्थूला । शिव शक्ती दोनों समतूला ॥
सोई अंग शक्त सोह ईसा । एकै रूप एक समदीसा ॥
नख सिरख रचो गर्भस्थाना । सातद्वीप नौखंड बखाना ॥
प्रथमहि ब्रह्म द्वीप निरमावा । ताऊपर बहु रचना लावा ॥
एकद्वीप नौखंड बनाई । त्रिकुटी सात तहां निखाई ॥
एकद्वीपमहैं सातो नाला । सातोनाल सात हैं चाला ॥
सरवर सात कमल है साता । रंग पांच पांचौ उत्पाता ॥
त्रिकुटी मध्य एकहै कीला । तहां देखिये रंगरसीला ॥
ता कीलामह कानी लागी । पवन सनेह आत्मा जागी ॥
ता कीलामह लागी डोरी । खूटा लगा पवन झकझोरी ॥
झूले मन पवन झूलावै घेरी । एक घर झून्य एक घर फेरी ॥
खूटा होयके पवन झकोरी । इंगला पिंगला सुखमण जोरी ॥
रविशशि पवन गहे मन जोरी । खूटा लाग पवनकी डोरी ॥
मेरे डंडपर खूटा गाड़ा । नदी तीन ताऊपर बाड़ा ॥
खूटातरे नदीत्रिय बहई । तीननदी बिच खूटा रहई ॥
खूटाके दहिने दिश गंगा । अति शीतल बहे नीर तरंगा ॥
सूरसनेह नीर हिय पसैं । सुरतसनेह धनी तहैं दसैं ॥
खूटाके है बांये अंगा । यमुना नदी बहे अतिरंगा ॥
सुखमन सरस्वती नीर तरंगा । लहर लालच तेज विष अंगा ॥
तहां बसे सरयू तेहि साथ । रावल एक बयालिस हाथा ॥
काल अनन्त रूप रस नाथा । बसे अथर दीखे नहिं माथा ॥
बाढी नदी दोह विकरारा । शीतल तेज बहे दोउ अधारा ॥
तिसरी नदी गुप्त पर्वाहा । अविगत जल बहेअगमअथाहा ॥
खूटा तरे होय नदी सिधारा । चली सरस्वती फोरि पहारा ॥
मध्य लहर रस विषके खानी । गंगा यमुना बीच समानी ॥

( १९६ )

त्रिधसागर

त्रिकुटी संगम भयो मिलाना । भवर गुफा माधो करथाना ॥
त्रिवेणी तट बसे सुदंगा । ताको मम लखा परसंगा ॥
गणगंधर्व मुनि सब कर थाना । सुर नर मुनि कर बैठे ध्याना ॥
तैतिस कोट देव मुनि भारी । यक्ष यक्षणी देव कुमारी ॥
नागसुता अपसरा मोहिनी । चढ़ विमान सब फिरे जोहिनी ॥
असुरपिशाचऋषनागजोलाहल । त्रिवेणीतट करे कोलाहल ॥
तीनलोक जौ जीव निवासा । सो सब करो त्रिवेणी बासा ॥
त्रिवेणी तट माधौ देवा । सब मिल करे तासुकी सेवा ॥
ताहि प्राग होय चलो प्रवाहा । गंगासागर संगम जाहा ॥
देश देश गंगा फिर आई । घाट घाट बहु क्षेत्र बँधई ॥
जहां तहां तप ध्यान लगावै । योग यज्ञ तप बहुत करावै ॥
ऋतुबसंत प्रागको धावै । मकर नहाय बजार लगावै ॥
अर्ध उर्ध बिच लागी हाटा । भीतर बाहर औघट घाटा ॥
गर्भमाहि सब युक्ति बनाई । तीन कचहरी तहां लगाई ॥
जहां नदी संगम पर्वाना । तहवां रचो एक अस्थाना ॥
संगम बीच गुफा एकधारा । ताहि गुफामों सात है द्वारा ॥
एकद्वार होय नाद सूधारे । एकद्वार होय रूप निहारे ॥
एकद्वार होय वास बसावै । एकद्वार होय अग्नि समावै ॥
एकद्वार हो स्वाद लिवाने । एकद्वार होय न्याय चुकावै ॥
एकद्वार होय नाद उचारा । योग जीव यह मता विचारा ॥
सातनाल चौदह सुरभाऊ । सातोंके हैं एक सुभाऊ ॥
सातो सात शून्य में बासा । सातो बसे गुफाके पास ॥
अनहद भेद श्वासाकी धारा । ताको भाषतहों व्यवहारा ॥

साखी-रचना भाषेउ पिंडकी, श्वासा सहित विचार ।
बिरलाजन कोई परखि है, अलखरूप व्यवहार ॥

पञ्चसुदृढा

( १९७ )

सुक्ति वचन-चौपाई

सुक्ति कह सुन सत्यगुरु ज्ञानी । अगम कथा कहीं अन्तरयार्मी ॥
और कथा अब मोसों भाषों । जो पूछों सो गीय न राषों ॥
हंस अवधको भेद बतावो । तास मर्म सब मोहि सुनावो ॥
आगम वरष मासषट जानो । तो कछु अपने निजमत ठानो ॥
ताको भेद कहों समुझाई । सो मोहि सतगुरु भेद लखाई ॥

योगजीत वचन

सुक्ति सुनो सत् मम वानी । भिन्न भिन्न मैं कहों बखानी ॥
पाचघरी बांये सुर पाई । सोई दहिनो श्वासा चलाई ॥
दशश्वासा सुखमन जो कहिये । ताको भेद बराबर लहिये ॥
आठ पहर पिंगला सुर हालै । बरष तीसरे हंसा चालै ॥
आठ दिवस दहिनो सुर बहै । हंसा अवध वर्ष दोय रहै ॥
सोरह दिन पिंगला सुर बोले । वर्ष एक मो हंसा डोलै ॥
वीस रैयन दिन दहिनो पाई । तब षट मासमें हंस चलाई ॥
एकति सरोज दक्षस्वरको जानो । तब दोय दिनमें हंस पयानो ॥
पांचघरी सुखमन जो हालै । पांचघरी मो हंसा चालै ॥
चन्द सूर सुषमन छपजाई । सुखसे तीजो पवन चलाई ॥
ऐसी विधि पवन चलाई । पहर माहिं हंसा चल जाई ॥

साखी-धूम मंडल दीखे नहीं, जोत न नेत्र लखाय ।
छठे मास हंसा चले, बचै न कोट उपाय ॥
छाया शीस दीखे नहीं, भुजा शिखर ना दिखाय ।
दीप बास आवै नहीं, छठे मास चल जाय ॥
गगन शब्द गरजे नहीं, नेत्र गुञ्ज छपजाय ।
मास एकके अवधमें, हंसा तन तज जाय ॥
भैवरगुफा तिल ना लखे, पुतरी जब चढ़जाय ।
पहर एकमें जानिये, हंसा तन तज जाय ॥

( १९८ )

बोधसागर

सुक्रित वचन चौपाई

सुक्रित कहे सुनो गुरु ज्ञानी । आगम पचै सब हम जानी ॥
और एक पूछौं गुरु तोही । भिन्न भिन्नके भाखौ मोही ॥
जीव ब्रह्म कैसे प्रगटाई । सबके उत्पत्त देहु बताई ॥
ताकर भेद गोंय जिन राखो । सत्य सत्य सब मोसो भाखो ॥

कौतुक

कौन सो मन है कौन पवन है कौन शब्द है भाई ।
कौन प्रान है कौन हंस है कौन ब्रह्म ठहराई ॥
कौन काल है कौन जीव है कौन शून्य पहिचानी ।
कौन शिव है कौन निरंजन कहो सकल उत्पानी ॥

योगजीत वचन

चंचल मन है श्वास पवन है शब्द शून्य पहिचानी ।
प्राण निरंतर अखल ब्रह्म है सोहंग हंस बखानी ॥
कारण काल शून्य अविनाशी जीव कर्म पहिचानी ।
जीव शक्ति करतार निरंजन ऐसा भेद बखानी ॥

सुक्रित वचन

मन कहाँ रहे पवन कहाँ वासा शब्द वास कहैं कीन्ह ।
कहाँ प्रान कहैं ब्रह्म वास है हंस कहाँ है लीन्ह ॥
कारण काल केहि ठोर बसत है कहाँ शून्य ठहराई ।
जीव शीव निरंजन वासा सो मोहि देहु बताई ॥

योगजीत वचन

हृदे मन है नाभि पवन है अनहद शब्द को वासा ।
निरन्तर प्राण ब्रह्म ब्रह्मण्डे गगन हंस पर्काशा ॥
सकलमें काल शीव चंदामें शून्य निरूपम माही ।
सुखमन मध्य निरंजन वासा योगी देखे ताही ॥

पञ्चमुद्रा

( १९९ )

सुक्ति वचन

इन्द्री नाभी तब नाहीं स्वामी पवन कहा तब बासा ।
जादिन अनहद रूप नहीं तब शब्द कहाँ पकीशा ॥
ब्रह्मांड ना तो तब ब्रह्म कहाँ तो गगन नहीं कहाँ हंसा ।
निरूपम विना शून्य कहाँ कहिये भेद कहौं प्रकाशा ॥
आकार नहीं तब जीव कहाँ तो चन्द नहीं तब शीऊ ।
सुखमन नहीं तब कहाँ निरंजन ससुझाय कहो सब भेऊ ॥

योगजीत वचन

इंद्री विन मन हतो निरूपम निराकारमें प्रवना ।
अलख रूपमें शब्द बासतो अविगतिमें तब प्राना ॥
अविनाशीमें हंसबास तो शून्य कालमें बासा ।
ऊँकारमें काल बास तो ऐसा भेद प्रकाशा ॥
जीव शीवमें प्रथमो बासा शीव निरंजन माहीं ।
सबको बास प्रकट कर भाखों भेद कहैं तुम पाहीं ॥

सुक्ति वचन

कहाँते उत्पत भयो निरंजन कहाँ शीव उत्पानी ।
काल जीव कहाँते प्रकटो शून्य भयो केहि खानी ॥
कहाँते उत्पत भये अविनाशी कहाँते उत्पन हंसा ।
कहाँते उत्पन ब्रह्मभयो है प्राण भयो कह अंशा ॥
शब्द पवन मन कहाँते उत्पन कहाँते प्रकटो जीऊ ।
सबके उत्पन मोसों भाखों केहिबिधि प्रकटो शीऊ ॥

योगजीत वचन

आदि ब्रह्मते भयो निरंजन तहाँते प्रकटो शीऊ ।
तौन भेद तुमसों कहो सुक्ति शिवते उपजो जीऊ ॥
जीवते उत्पत काल भयो है कालते भयो ओँकारा ।
ओँकारते शून्य भयो है शून्यते जोत प्रकारा ॥

( २०० )

बोधसागर

जोत ब्रह्मते सब प्रकारा अगम भेदको कहो विचारा ।
अखंड रूपते भयो अविनाशी अविनाशी ते हंसा ॥
शब्दते उत्पत्त पवनकी है पवनते स्वांसा अंशा ॥

सुक्ति वचन--चौपाई

अन्तकाल जब आवे भाई । तन छूटे मन कहाँ समाई ॥
पवन शब्द हंसा कहाँ सिधाई । अन्तकाल कहवां ठहराई ॥
कालशून्य तब कहा समैहै । जीव शीव कहवां चल जैहै ॥
अन्त निरंजन कहो समाई । ताको भेद कहौ समुझाई ॥

योगजीत वचन

तन छूटे मन जोत समाई । पवन श्वांसमें तब खप जाई ॥
प्राण समय शब्दके माहीं । हंस ब्रह्ममें तब खपजाहीं ॥
अविनाशी शिवमाहे समाई । ब्रह्म अलखमें तब खप जाई ॥
अलख अनुपमों जाय समाना । अन्त प्रलैको भेद बखाना ॥
उत्पत्त सकल भाष हम दीना । ताको भेद लखो पवीना ॥
सत्य सत्य यह बानी जानो । आदि वचन यह तुम निर्वानो ॥

सुक्ति वचन--चौपाई

हे समर्थ मैं तुम बलिहारी । खोल भेद अब कहौं बिसारी ॥
केता प्रवान लोक अस्थाना । ताको भेद कहौं निर्वाना ॥
संख्या योजन ताकी भाखो । ताकर भेद गोय जनि राखो ॥
कहाँ कौन सो पुरी रहाई । कौन अंश तहाँ आसन लाई ॥

साखी-सब उत्पत्त तुम भाषिया, भेद कहेउ समुझाय ।
अब मन मो निश्चय भई, आगम भेद लखाय ॥

योगजीत वचन

साखी-योजनकी मरजाद बहु, आगे जो पवीन ।
अंशसहित अब भाखेल, तिनको नाम बखान ॥

पञ्चमुद्रा

( २०१ )

चौपाई

अब मैं कहौ लोककी बानी । निरगुण भेद कहौ बिलछानी ॥
प्रथमहि कुम्भ रूप औतारा । पीछे सकल सृष्टि विस्तारा ॥
योजनकोट एक सुख कहिये । कोट पचास पीठ तेहि लहिये ॥
एक कोटको मस्तक जाना । कोटकोटके अन्त बखाना ॥
एक कोटपर नेत्र बताई । सोरा माथ चौसठ हाथ पाई ॥
पृथी ते दून कुम्भ है भाई । पूरबदिशि सुख बरन भुनाई ॥
उंचास कोट पृथ्वी पर्वाणा । ताके तरे कुम्भ अस्थाना ॥
बहुर अष्ट दिगपाल बखाना । कुम्भ पीठपर है अस्थाना ॥
चौसठ पुंडरीक तहां कहिये । बावन लक्षको मस्तक लहिये ॥
छयकोट ऊचे प्रमाना । कुम्भ पीठपर कीन्हों थाना ॥
ऊपर कुम्भ शेषको जाना । पंद्रह कोट ताहि प्रवाना ॥
तहां वासुककी बैठक कहिये । और वराहु तासुपर लहिये ॥
ताकी डाढ़ पृथी ठहराई । राई प्रवानसो दीखे भाई ॥
पर्वत अष्टपृथी पर जाना । मध्यपृथी सुमेर बखाना ॥
सोरह सहस्र नीचे बधाना । एता योजन तरे समाना ॥
बीस सहस्र योजन चौरासी । चार दिशा तेहि फेर रहासी ॥
चौरासी सहस्र योजन प्रवाना । इतना ऊँच सुमेर बखाना ॥
तापर चारपुरी हैं भाई । अमरपुरी पुन तहां बनाई ॥
तहां इंद्र सुखराज कराई । तीन देव अस्थान बताई ॥
तैत्तिस कोट देवता जाना । अठासी सहस्र ऋषि प्रवाना ॥
तहां कुबेर भंडारी कहिये । अलकापुरी नामसो लहिये ॥
नौ पदुम नील अठतालिस । चौत्तिस पर्व अर्ब उनतालिस ॥
सतावन कोट कहौ प्रवाना । पैंसठ लाख कहो बंधाना ॥
पञ्चानवे सहस्र और तहां कहिये । पचास एकसो योजन लहिये ॥