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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

श्वासयुञ्जार

( ५५ )

कीलक युगकी श्वास सारा । छहसै सत्रे पाँच सुधारा ॥
एति श्वासा कीलक युग माहीं । परसे जीव अघरकी छाहीं ॥
बीतत घरी गरज चहराई । काल टकोरा मारे धाई ॥
इह युग अन्त कहावे घरी । नागिनि आसे सन्मुख खरी ॥
प्रथम कीलक होय संधारा । पाछे युगका मत रित्तारा ॥
सतयुग धरि दूसर जब आवै । तेहि श्वास कमत युग पावै ॥
कमत युग होइ कोधवरियारा । उत्पति थोर बहुत संधारा ॥
कमत युगकी श्वासा जाने । छः सै सत्रह पाँच बखानै ॥
एतिक श्वासा कामत युगमाहीं । गुण अवगुण दोछ निरखेहु ताहीं ॥
बीतत कामतक मोद युग आवै । तिसरी घरी वासना धावै ॥
आवा गौन विचारि कोई । युग कमोद सुख पावै सोई ॥
तिसरी घरी सतयुगके आई । तब कमोद युग होय सहाई ॥
युग कमोद सतयुग मई आवै । दुखी सुखी नर सब सुख पावै ॥
युग कमोदकी परलै होई । दुखी सुखी जाने सब कोई ॥
तब जो होई सूर्य संचारा । महाविरोध उपजे अधिकारा ॥
चन्द सनेह होय जो हीना । महासुफल तन होय मलीना ॥
श्वासा चलै सातसै भारी । युग कमोदकी कथनी हैन्यारी ॥
युग कंकवत कि होय प्रकाशा । अतिही दुर्ज विषयकी त्रासा ॥
चौथी घरी कोध बेकारा । महा कठिन होई ताकी धारा ॥
चौथी घरी निकट जब आवै । सतयुग अंत कंकवत पावै ॥
सतयुग अंत होय नहीं पावै । युग कंकवत आय शिरनावे ॥
युत कंकवतकाल बरिआरा । कायाके बहु करै विकारा ॥
काया कहर गरासै आई । तब न भेद मैं कहौ बुझाई ॥
काया कहर हो परचण्डा । नख शिख व्यापि रहै नौखण्डा ॥

( ५६ )

बोधसागर

युग कंकवत कालकी बानी । कालकला मति सब दिन जानी ॥
युग कंकवत महाबल योधा । अन्तकाल सतयुग पथ सोधा ॥
सतयुग अन्त कंकवत मांही । अन्त कालकी व्यापै छांही ॥
युग कंकवत मोह की खानी । काम क्रोध ममता लपटानी ॥
अन्तकाल सतयुगकर भयञ्ज । चारिञ् जुग परलैतर गयञ्ज ॥

समय-एकहि युगके बीते, चारों युग भये नाश ।

एकनद चारिञ् युगखाण, सतयुग कीन्ह गरास ॥

चौपाई

कीलक कमोद चंद सनेहा । कमत कंकवत सूर्य सनेहा ॥
भाजुग अन्त एक संग चारी । चारि घरी शब्द एक नाद संघारी ॥
एक नाद एक पहर कहावा । चारि घरी तेहि मांहि समावा ॥
चारि घरी चारिञ् युग बीते । शब्दनाद रवि शशि धर जीते ॥
सतयुग अन्त बाजु घरियारा । त्रेतायुग कर भया विस्तारा ॥
दुसरे युग भयो विश्वासा । दूसरे पहर तेज प्रकासा ॥
तेज लगन श्वासा रही बासा । ताते दूसर युग परकासा ॥
त्रेता युगकर भा अनुसारा । त्रेता युगहि ते व्यवहारा ॥
त्रेता युगकी पंखुरी चारी । चारि घरी युग चारि बिचारी ॥
जैसा युग सतयुग महाँ देखा । सोई गति त्रेता महाँ लेखा ॥
जब जब अन्त होय युग केरा । तब तब नाद काल घन घेरा ॥
त्रेता युग महाँ कला अपारा । योग व्रत तीरथ आचारा ॥
प्रथम घरी होय क्रोध अपारा । अहंकार अभिमान पहारा ॥
ताकर नाम चिंता युग राखा । चित चञ्चल चकित अभिलाषा ॥
चकितयुग अलोप जब भयञ्ज । ठोकि टकोर नाद तब कियञ्ज ॥
होत नाद मृतु अंधा धावै । लागत पलकमल नहिं लावै ॥
चकित युग बीती जब गयञ्ज । तेहि पाछै बुद्धि युग भयञ्ज ॥

श्वसगुआर

( ५७ )

बुद्धी युगकी बुद्धी अपारा । तायुग महाकाल बरियारा ॥
ज्ञान गयँद होइ असवारा । बुद्धि युगमान फोरे महिभारा ॥
बुधिकबधिक बाँधिकरे कमाई । विषे चतुराई कुमति समाई ॥
एही विधि बुधि युगचलि जाई । तेहि पीछे मन बरतैं आई ॥
मन मतंग महामद माता । तेज तपस्या व्यापै गाता ॥
मनयुग ऊंच नीच सतलीला । बरपै झारी विषैको शीला ॥
मन युगकी श्वासा बहुरंगी । ज्यों जलमध्ये उठै तरंगी ॥
मन युगराज बीतिगा जबही । अहंकार युग उपजा तबही ॥
अहंकार युग अनंत समाना । मरै पतंग हार नहीं माना ॥
हारे नहीं आपु अहंकारा । गरजै छुन्छ हारे सुख भारा ॥
अहंकार युग श्वासा ऊनी । गरचि घुमडिबरपै फिरि सूनी ॥
अहंकार ऊद्रेग अपारा । श्वासा हीन तत्व छिनधारा ॥
अहंकार युग बीते जबही । त्रेताकी परलै भइ तबही ॥
त्रेता अन्तकाल जब कीन्हों । आधी निशा टंकोरजोदीन्हों ॥
आधी रात नाद घन बाजा । महानिशान मेघ जनु गाजा ॥
त्रेता आदि अन्त व्यवहारा । उपजा द्रवा परकला अपारा ॥
द्वापर युगकी कला अनन्ता । सुखदुखमध्य आदिदुखअन्ता ॥
प्रथम घरी द्वापरकी आई । अर्थनाम युग महा समाई ॥
अर्थनाम युग द्वापर माहां । अर्थ अहर्निश व्यापै ताहां ॥
अर्थनाम युग घरी समाना । घरिकै बीते युग क्षय माना ॥
एक युग बीते दूसर आवा । धर्मनाम युग तहीं धरावा ॥
धर्मयुग धरनी धरु साँचा । श्वासा छहसै सतरी पाँचा ॥
धर्मधार औ धीर तुरझा । धर्मयुग रोग वियोग सुरझा ॥
धर्मनाम युग बीते जबही । गहर काल युग बरतैं तबही ॥
गहरकाल युग कहर कमाई । रविरथ बीच ध्वजा फहराई ॥

( ५८ )

बोधसागर

गहर टंकोर जब धरनी मारा । गहर कहर रस ज्ञान अपारा ॥
गहर यम युग बीता जबही । मोक्ष महाबल उपजे तबही ॥
मोक्ष नाम जग सत्य सुरंगा । निमिषि लक्ष दलसात तुरंग ॥
मोक्ष नाग युग बीति जब जाई । द्वापर युगकी परलै आई ॥
जब परलै द्वापरकी होई । आदिअन्त सबजाय बिगोई ॥
द्वापर अन्त बिगुरचन भारी । दुःख प्रचंड सुखसबै खुवारी ॥
बीता द्वापर कलियुग आवा । कलियुग कालकलाके भावा ॥
कलियुग महाँ युगचार समाना । चारिउ युगको करै बखाना ॥
चारिउ युगकी अर्थ कहानी । बिन परिचै सबयमकी खानी ॥
सतगुरु बिना न होय मिटाऊ । चारिउ घरी कालकी दाऊ ॥
चारि घरी युगचारि बँधाना । कहाँ भेद सुनु संत सुजाना ॥
प्रथमहि युगकर चेतन नाऊ । चेतनि चित करै सब ठाऊँ ॥
चेतनियुगमहाँ चिताको धामा । विस्मय हर्ष दुनौ विश्रामा ॥
चेतनि चिता करै सब ठाऊँ । महा बली है श्वास सुभाऊँ ॥
तीनहिं ताप तपै ब्रह्मण्डा । भरमि भूत व्यापै नौ खण्डा ॥
भर्मित पौन भर्मकी खानी । भर्म हाथ सब दुनी बिकानी ॥
कैतौ पढै गुनै संसारा । बिनसतगुरुनहिं चितसुधारा ॥
सतगुरु मिलै होय सत चूला । तेहि पाछै उत्पतिकर मूला ॥
दोरस युग बुद्धी बलनामा । श्रुची अश्रुची करै जो कामा ॥
ताकी संख्या बहुत विचारा । छःसै सत्तरि दण्ड पसारा ॥
पांच दण्ड वाकी रहि वासा । ताका भेद काल परकासा ॥
बुद्धी कुबुद्धी दोउ कर भाऊ । एकहि युग दोउ रहनि बताऊ ॥
बुद्धि हीन मैं मत पसारा । बिनु आँकुश नहिं होत सुधारा ॥
अंकुश देई मिलै गुरु पूरा । मोह महामद विषहोय दूरा ॥
बुद्धि नाम युगकी सहिदानी । सुमति सनेह सुरति लपटानी ॥

श्वसगुञ्जार

( ५९ )

बुद्धि नाम युग पारस सनेही । चित अभिमान रहे नहिं देही ॥
बुद्धि नाम युग बीते जबही । इच्छा राशि गरासे तबही ॥
इच्छा युगकी अकथ कहानी । सुनहु सन्देश कहो सहिदानी ॥
इच्छा आदि पुरुषकी काया । तासु नेह सब लोग बनाया ॥
सो इच्छा है जीवन नेहा । रही समाय जहां लौ देहा ॥
ता युगमाही विषय विकारा । ज्ञान न उपजै भर्म पसारा ॥
ता युग माहि धैर नहिं धीरा । लालच लोभहि व्यापै पीरा ॥
इच्छा युगकी अटपट डोरी । शहर सँधार होय निश चोरी ॥
जब जब इच्छा युग विस्तारी । काया कष्ट होय दुख भारी ॥
ता युगकी बाकी भुगतावै । दृष्टि नाहिं अदृष्टि दिखावै ॥
अन्न अहार करै जब कोई । इच्छा युग तब पूरण होई ॥
तासे युगकी दूसरी धारा । सतगुरु मिलै तो होय उवारा ॥
सतगुरु शरण अमर पद पावै । इच्छा समय दूरी बिसरावै ॥
इच्छा युगकर तार पसारा । लाज महा बल तजै विकारा ॥
सातों दण्ड इच्छा कर भावा । दण्ड पांच सातहि बिसरावा ॥
पांच शून्य इच्छा कर साथी । मद माते जस मङ्गल हाथी ॥
तासु नेह संयम जब पावै । इच्छा मेटि गरव बिसरावै ॥
इच्छा युगकी एतिक बानी । सतगुरु मिलै होय छुटानी ॥
जाहि देह सतसुत्ती बीरा । ताकह काल देह नहिं पीरा ॥
समय-कालत्रासव्यापै नहीं, इच्छा युगके माहिं ।
सतगुरुसो परचय करै, परसै निरगुण नाहिं ॥

चौपाई

चौथे युगको करौ बखाना । धर्म महाबल माह समाना ॥
अभय तरंग ताहि युग नामा । संशय रहित सदा बिसरामा ॥
तेहि युग माहि सरव सुख होई । अहंकार व्यापै नहिं कोई ॥

( ६० )

बोधसागर

तेहिधुग माहि सुधाकी खानी । बोले धीर मधुर धुनि बानी ॥
झीनी रङ्ग तरंग विराजै । नाना नाद अर्ध धुनि गाजै ॥
सातों द्वीप होइ उजियारा । दामिनि दमकै शहर मझारा ॥
वन औ वृक्ष सघन सब होई । सदा बसन्त खेले सब कोई ॥
षट ऋतु महा एक सम तूला । एकै बानी एक अस्थूला ॥
साहब सेवक एकै होई । सदा बसन्त खेले सब कोई ॥
साहब सन्त लख सब कोई । साहब सेवक लखै न कोई ॥
( एकै बास बसै सब कोई । )

साहब सेवककी एकै शोभा । चीन्हि न परै अङ्गकी ओभा ॥
साहब सेवक बरन दुहेला । एकै बरण गुरु औ चेला ॥
जैसे फूल बास कह तोरी । पाछे फूल बास गहि जोरी ॥
पाछे फूल शोभासों देही । तिलतजितेल बास गहि लेही ॥
विना भेद जीव होइ अन्धेरा । पाछे परै कालकी घेरा ॥
सीख बिना गुरु छुटे नाहीं । बिरि फिरि परिहै भौचक माहीं ॥
गुरु सुवास है फूल सनेही । सीख स्वरूप आसिका देही ॥
गुरु बिन कौन उतारै पारा । कठिन काल है भौजल धारा ॥

समय-विनसतगुरु नहि बाचै, फिरि बुडे तेहि माहिं ।

भवसागरके त्रासते, गुरु पकरी बांहि ॥

चौपाई

युगत रंगकी कला अपारा । बिना भेदको करै बिचारा ॥
जस तरंग जलमाह विराजै । ऐसे शब्द शीश पर छाजै ॥
मन मकरन्दीके गुण ऐसा । कोटके बासै विषधर जैसा ॥
अग्नि बीच काया कह डाढै । सागर मांझ दून होइ चाढै ॥
पर्वत मारि उडावे छारा । पुढुमी मेटि करै मसि आरा ॥
सूर्य मेटि सब किरन वनावै । पवन बांधि काया दिखरावै ॥

श्वासयुञ्जार

( ६१ )

पानी बांधि अग्रिको ढाहे । पाला मेटि गरमि नहिं चाहे ॥
तीन लोककी जेतिक खानी । करै बास सबकी सहिदानी ॥
विष दारुण विषयाबसि होई । मारे मरे जियावै सोई ॥
जो चाहे सो सबै बनावै । मनकी कला हाथ जो आवै ॥
मन भूखाँ औ मनै अधाना । मनै पियासाकर जल पाना ॥
मन सूरा मन कायर हीजा । मनै विरह विरहिनसङ्ग भीजा ॥
मन दारुण मन कही सियारा । मने तास औ मनै पियारा ॥
मन राई मन राव कहावै । मनै बिना मन हाथ न आवै ॥
मन बाहर मन सबके माहीं । मनते भिन्न कोऊ जग नाही ॥
मन सर्वज्ञ चराचर माहीं । मनते करता दूसर नाही ॥
मनही देह मनहि पुनि लेई । मनबसि काम लहरिवस सोई ॥
मन लोभी मन कृपणी होई । मन उदार मन दाता सोई ॥
मन पापी मन अघ ढोई । मनै भक्ति लरि तारै सोई ॥
मनै लेख मन करै अलेखा । मनही स्वर्ग नर्कको लेखा ॥
मनहि मरै मन मन नरकें जाई । मन बसि जीव सदा पछिताई ॥
करता जीव रंग मन आहीं । शोभा सकल रंगके माहीं ॥
रंगदेखि सब जगहि भुलाना । रंगरूपको एक ठिकाना ॥
बिन रंगरूप होई फीका । रंगरूप मिलि देखिय नीका ॥
नीक देखि सब शीश नवावै । निरखि देखिकै शीश डुलावै ॥
नीकै लागि रहा सब कोई । अनइस नीक मनैते होई ॥
ताते इह मन कर्ता भाखा । तिरगुण डोरी बांधिजगराखा ॥
मन हर्षित होय गावै गीता । मन उत्कण्ठमन कहै पुनीता ॥
मन खोजी वादी होई । मनै गुरु समुझावै सोई ॥
मन बारै मन आनि जुड़ावै । मनमलीन दशहु दिशि धावै ॥
मन अज्ञान मनै सज्ञाना । मन कविता मन चतुर प्रमाना ॥

नं. १० बोधसागर - ५

( ६२ )

बोधसागर

मनछन्द धरि भाषा बोलै । मन अस्थिर मन चञ्चल डोलै॥
मनै ध्यान धरि वेद बखानै । मनै नबोडा कर न बैधानै ॥
मन षट्चक्र मन विप्र बैधाना । मनके सकल रूप हैं ठाना ॥
मन नट नाटक महा समाना । मन नट सर्व कथै अभिमाना ॥
मनहि अठारह पदै पुराना । मन मन कहि समुझावै ज्ञाना ॥
मन चउदय विद्या अधिकारी । मन त्रिकुटी महै लावै तारी ॥
मनकी ज्योति सकल उजियारी । मनकी छाया मन अधिकारी ॥
मनहीसों सब सरही काजा । मन है सात द्रौपको राजा ॥
मन बिनु सरे न एको काजा । मनके ऊपर मनहि विराजा ॥
( मननवखण्डदशहूँदिशगाजा । )

सतगुरु सीख मनहिको कीन्हा । मनते भक्ति मनते पथचीन्हा ॥
मन मानै तो सबै बनावै । मन बिनु पन्थसो कौन चलावै ॥
मन चीन्है तो मनकहँ पावै । बिनु मन सत्यशब्द नहि आवै ॥
मन चीन्है तो सब बश होई । बिनु चीन्है सब जात बिगोई ॥
तीन लोक जो बाहर भाखा । सो सब आनि देहमें राखा ॥
मन चीन्है तो हाथहि आवै । तीनहि लोक देहमें पावै ॥
जो बाहर सो भीतर पावै । तीन लोक पल माँह दिखावै ॥
तीन लोकते बाहर बासा । मन चीन्है तो होइ प्रकाशा ॥
जब लगि मनको अन्त न पावै । तौ लगि इह मन हाथ न आवै ॥
समय-तीनलोक हैं देहमहैं, रोमरोम मन ध्यान ।

बिन सतगुरु नहि पाइये, सत्यशरण निजनाम ॥

चौपार्ह

सात द्रौप काया अस्थाना । सातों द्रौप कमल बंधाना ॥
नाल साति रचना गति देहा । सातों सुरकर एक सनेहा ॥
तहाँको भेद हँस जो पावै । दुबिधा दूर मति सबै गवाँवै ॥

श्वासयुञ्ज्जार

( ६३ )

पावै भेद करै विश्रामा । पल पल परशै निर्गुण नामा ॥
आवत जात बार नहिं लावै । परसै नाम अमर पद पावै ॥
नाल सात सुर एक ठिकाना । ताके निकट रुसके थाना ॥
नदी तीन बाढी गम्भीरा । साम तहां गोफाके तीरा ॥
तहां बैठि अजपा लौ लावै । रोम रोम की सब सुधि पावै ॥
रस औ बिरस तहांकर मेला । होत बसन्त गुरु तहां चेला ॥
गुरु समाधि मैंह अटल प्रमाना । चेला अग्रवास मह साना ॥
चेला बास गुफा मैंह करई । पल पल सुरति शब्दपर धरई ॥
त्रिगुण तेजकी दीखै काया । दामिनि दमकि झकोरें बाया ॥
जो गुरु मिलै तो पांजी पावै । बिनु पांजी बिचही भटकावै ॥
पांजी पावै सुरति सनेही । पूर्ण तत्व चले जब देही ॥
करै चन्द्र तापर असवारी । प्रीति पूर्ण जागै खुमारी ॥
प्रेम पियाला तहवां पीवहि । निश्वासरचित आनंद दीवहि ॥
चेतनि चेत होय बल जोरा । जागत साह न मूसत चोरा ॥
श्वासा चारि लगनकर भावा । जब उपजै तब संगहि आवा ॥
चारि लगन दुइ भाव अपारा । उपजै विनशै क्रम व्यवहारा ॥
एक लगन संग उपजै काया । एक लगन बहु सुख समाया ॥
एक लगन दुख दारुण होई । शब्द गहे नहिं दुर्मति खोई ॥
एक लगन संग उपजै काया । एक लगन बहुसुख समाया ॥
एक लगन दुख दारुण होई । शब्द गहे नहिं दुर्मति खोई ॥
एक लगन संग उपजै काया । मोह महामद विषकी छाया ॥
विलसत उपजत सब जीव जाई । ना गुरु मिलैना अर्थहि पाई ॥
चारि लगनकर नाम निराला । दुइ सुक्ती दुइ काल कराला ॥
उत्पति संग सुधाकी छाया । दुखदारुण होइ तजे काया ॥

( ६४ )

बोधसागर

जे मुनि लगत सँवारे बीरा । उत्पति के सँग तजै शरीरा ॥
बाकी जवनिकाल लखि राखा । मेटै अंक कालकी शाखा ॥
उत्पति होत लिखे यमराया । सो सब दीसे नरकी काया ॥
सातों द्वीप लखे सहिदानी । वासिल बाकी कर्म निसानी ॥
जेतिक श्वास चलै नर देहा । ताकर जाने सबै सनेहा ॥
दम विस्तार लिखे सब दाऊ । पाछे करै करे जे घाऊ ॥
द्वीप द्वीपकर अंग जलावै । करपग परलो प्रकट दिखावै ॥
चौरासी लक्ष योनिनकी धारा । नरकी देह ते कर्म अपारा ॥
चौरासीकर पातक भारी । नरकी देह सब लिखे विचारी ॥
करपाछै वासिल लिखि राखै । बाकी अंक मध्यमें भाखै ॥
जमा शीसपर लिखे विचारी । नित उठीके न्यावे निर्बारी ॥
सातों द्वीप सुधारै रेखा । ऐसा यमकर वरवस देखा ॥
करमज चारि अंक लिखि देई । पाछे सबसों निरगै लेई ॥
रेखा इलालि लिखे विष पूजा । लहसन मसा लिखे तिलगूजा ॥
चक्र लिखै औ आपहि बासै । सन्धि लिखै जीवन कहैं फासै ॥
नखशिख लिखै कर्मकी खानी । गुण औगुण नहिं मेटे जानी ॥
जाहि द्वीप जस अंक लिखावै । तहाँ तहाँ तस चाल चलावै ॥
रवि शशि अंक दोउ लिखि लेई । पाछे दोष जीव कहैं देई ॥
श्वासा स्नेह लिखै सहि दानी । पाप पुण्य भुगतावे जानी ॥
जेमुनि लगन होय उत्पानी । लगन केतुकी सबही हानी ॥
दोऊ लगत साथै शशि सुरा । पावै सत गुरु हाल हजुरा ॥
जो गुरु मिलै तो मेटे रारी । बिन सतगुरु सब यमकी बारी ॥
सतगुरु बिना न होय उबारा । केतो ज्ञान कथै संसारा ॥
जप तप योग यज्ञ व्रत पूजा । काल सनेह और नहिं दूजा ॥

श्वसगुञ्ज्जार

( ६५ )

तप साधै रहसे मन माहीं । काल करमकी लखै न छाहीं ॥
विद्या वेदकी करै उचारा । कर्मवश जीव भये यमचारा ॥
जब लगि हृदय शुद्ध नहिं होई । तब लगि पार न पावै कोई ॥
जाही लगन तन जग लेही । ताही लगन तजै जो देही ॥
सो जीव उतरि जाय भौ पारा । नहिं तौ अटकि रहै संसारा ॥
कालहि बस जो तजै शरीरा । ताकह काल देह बड़ पीरा ॥
लगन केतुकी होय न न्यारा । पाछै लेई गरभ औतारा ॥
नर्क खानि भुगतै चौरासी । धरि काया बांधे विसवासी ॥
सतगुरु बिना लगन नहिं पावै । अन्तकाल यम धोखा लगावै ॥
जीवत कथै बड़ ज्ञान अपारा । काल चतुराई छन्द पसारा ॥
कर्मकी वंशी सब जीव फाँसै । हरी न मानै आनै हासै ॥
तादिन भूलि है सब चतुराई । जादिन काल धरै तन आई ॥
श्रृंख चतुराई सहज बैलाना । छोटे बड़े मर्म नहिं जाना ॥
ताते सत गुरु खोजहु भाई । जाते कर्म भर्म मिटि जाई ॥
लगन केतुकी देह बहाई । बाकी सबै कालकी जाई ॥
जे मुनि जन तजै शरीरा । गहै न काल विषयके तीरा ॥
कागद करि जाय भव पारा । मेटे यमकर सकल पसारा ॥
सतगुरुसेती चाल गहि लेई । ताकह काल दगा नहिं देई ॥

समय-काल दगा सब मेटिकै, उतरहु भवजल पार ।

यमकी चाल बिचारिकै, बहुरि न हो औतार ॥

चौपाई

धर्मदास औरो सुनि लेहु । जीवन बाह जानिके देहु ॥
जाको होइ सत्यको रेखा । नख शिख देखहु अङ्गविशेषा ॥
चतुर शील दोउ निरखेउ जानी । करपर देखहु भक्ति निशानी ॥
शंख चककर देखेहु थाना । लक्षण जानि सुधारेहु पाना ॥

( ६६ )

बोधसागर

बोले मधुर शीलकी बानी । तेहि तन होय ज्ञानकी खानी ॥
पहिने ग्रीव समा जौ होई । शब्द विवेकी जाने सोई ॥
खंभज होय जाहि कर माहा । यश विस्तार ज्ञान अवगाहा ॥
पलक पसार छत्र जो होई । लोक निशानि अंश जनु खोई ॥
नासिका नेह होय जो मासा । कुटिल कठोर रोग तन वासा ॥
बौरनीपर जो गुजौ गुजा । तामस तेज विषयको पूजा ॥
कोतह गरदनी एचातानी । कुबजा गाडर विषकी खानी ॥
सुख चतुराई हृदय कठोरा । बोले झीन कोध कर जोरा ॥
इन जीवन जनि बोधहु जानी । अन्तकाल पुनि होवै हानी ॥
नारी नेह विचारहु जानी । देखहु देह द्वीप सहि दानी ॥
राज गुञ्ज निरखेहु अनुहारी । कर पगशीस लक्षहि विचारी ॥
चंचल चाल पोल होय पाऊ । तेहि जनि कबहु चरण छुआऊ ॥
गुञ्ज होय जेहि मास लिलारा । तेहि बोधते होई कर्म अपारा ॥
वोठ भुजंग औ जीव भुजंगी । विष बरजोर बसै तेहि संगी ॥
नेत्र गुञ्ज ए ऊंच लिलारा । कामलहरि बहु जहर पसारा ॥
हंसत वदन चालै चतुरंगा । बोधत ताहि होत सुख भंगा ॥
नैन शेष निरखे जेहि ओरा । ताकह कष्ट देह तन चोरा ॥
शुभ रंगुत्र होई विषखानी । क्षीरे छिर विष बालककी हानी ॥
सो गुण छांडे तासु शरीरा । द्वादश कँवल बसै बलवीरा ॥
नाभिकमल होइ रेखा तीनी । वाएँ अङ्ग होए शशि हीनी ॥
कच्छदीप होइ गुञ्ज चितेरा । परसत ताहि कालको चेरा ॥
जङ्घदीप होइ गुञ्ज गहीला । लहसन मासा होइ जो ईला ॥
तेहि परसै औ बेघे जानी । गुरु शिष्य दोनोंकी हानी ॥
मीनहि द्वीप विकट होइ रेखा । ताके अङ्ग कालकी रेखा ॥
बाँझ मुआ बछ गूगी होई । कलपत जाय कालपुर रोई ॥

शवासुखज्जार

( ६७ )

कूर्म स्नेह लक्ष कर जोरा । चतुर सनेह ज्ञानबल जोरा ॥
पग छतनार होइ जेह जानी । पुस्तपांव पर काल कुबानी ॥

समय-चरण पलौ सम होय कर, घटिका पलो प्रमान ।

ज्ञान सनेही दूत है, रोम रोम भगवान ॥

चौपाई

दूनों अंग विचारेहु जानी । एकरज भक्ति एक विष खानी ॥
दोऊ अंग लक्षण गहो शरीरा । पाछे देहु मुक्ति बरबीरा ॥
परिचय भेद विचारहु जानी । पान लेत जिव होय न हानी ॥
लक्षण लक्ष्य होय सम तूला । पावै सतगुरु मुक्तिके मूला ॥

समय-आदि निशानी देखिकै, बांए दहिने बाम ।

शब्द सनेह नेह करि, तब दीनों निजनाम ॥

चौपाई

बांए अङ्ग मसा जो होई । तीरथ अङ्ग रेखा हो दोई ॥
बांए अंग विषयकी बासा । माया सघन वंश कुल ग्रासा ॥
दहिने अंग विषय जो होई । शीस संपति सुख गासै सोई ॥
विकटदंत होय जेहि बारी । शीलवंत सुख प्रेम सुधारी ॥
बिरर चिकुर सुख बुम्ब सनेही । विहसत वदन सदा सुखनेही ॥
उज्ज्वल नेह सदा सुखदाई । शील सनेह भक्ति बहुताई ॥
हंस गमन सतगुरु सों नेहा । मधुरी बोले प्रेम सनेहा ॥
कर पद कोमल शरद शरीरा । सुत संपति जैसे दारुण धीरा ॥
मधुर बात औ चमकै देहा । सबते बोले सुरति सनेहा ॥
सुरतिवंत प्रीतमकी प्यारी । पछो लांव जेठ पुर भारी ॥
श्यामगात लहसन तन माहा । माया संच न औ ग्रासै नाहा ॥
राजवरण प्रिय श्याम शरीरा । पियाहि आहिपरीमल गंभीरा ॥
बगलधि सुख आमिष जो होई । तन प्रसेव सुत सुताहि विगोई ॥

( ६८ )

बोधसागर

लभे गात मोट तन भारी । विरह विकार कोधअधिकारी॥
छोट शरीर पातरी वामा । आपु तजै अन्त विश्रामा ॥
निहली चितवनि ऐंचा तानी । बहुते पुरुष एक पटरानी ॥
विहसत बोले कुटिल निहारै । आपु जरे औरन कहँ जारै ॥
आगे चलै पाछे तन देखै । गुण औगुण एकौ नहिं लेखै ॥
ऊपर हँसै मनही पछताई । देह थोरहिं बहुत पुआई ॥
एक थन छोट कठोर कुबानी । एक थनझालरि विषकी खानी॥
नाभी पर तीनि होइ रेखा । सुखसम्पति सपनेहुनहींदेखा ॥
इन्द्री मांझ गुञ्ज होइ भारी । जो परसै तेहि करै खुआरी ॥
मोट पतंग चाकरी चाला । तेहि देखत मिय होइ बेहाला ॥
पग पातर पलो छत नारा । परसन बास परै यम धारा ॥
कनअंगरी अघर तिन लागै । आपु नाह तजि परघर बागै ॥
अस लक्षण होइ जाके गाता । प्रान लेइ करै यम घाता ॥
कुम्भ लिलार खम्भ जो होई । जो परशै सो जाय बिगोई ॥
कर पग पलौ गुञ्ज सनेही । परसत होइ भालुकी देही ॥
जोरे पुअर करमह होई । नाहरि नाहक आसै सोई ॥
अहहि होय लक्ष तिरझूला । काल स्वरूप होइ अस्थूला ॥
मुक्तिपन्थ कबहुं नहिं चाहै । सदा विकार विरह रस लाहै ॥
चञ्चल चित् थिर नहिं होई । भजन भंग रस भक्ति बिगोई ॥
वरुणी बसे बिसंभर जोरी । नेत्र बिलोन रंग होइ गोरी ॥
झंखत फिरै प्रकट नहिं होई । अन्तर भक्ति ऊपर होइ छोई ॥
प्रेमवन्ती होइ सुरति निहारै । आप तरे औरन कहँ तारै ॥
करे दंडवत निर्भय नारी । भक्तिवन्त बहु लीला धारी ॥
बिगसित बदन शीलकी आखी । कुल परिवार भक्तिगणसाखी ॥
सतगुरु नाम सुनै सजुपावै । मण्डल चारि शब्द फैलावै ॥

श्वसगुञ्जार

( ६९ )

हर्षित होइ सतगुरु गुण गावै । भक्ति कि बात सदा मन भावै ॥
गुरु सनमुख होइ सेवा लावै । सदाकाल तेहि मस्तक लावै ॥
संपुट वदन क्षीणता होई । सतगुरु शब्दहि एक विलोई ॥
सतगुरु देखि न परदा आनै । शब्दकी चाल सदा पहिचानै ॥
सदा अधीन रहै तनमाही । भागे काल देखिके ताही ॥
कर जोरै सनमुख शिर नावै । लाज कानकी दशा मिटावै ॥
ऐसी लक्ष गहै तन पास। पावन पान लोक होइ वासा ॥
ऐसी लक्ष विचारेउ हंसा । दीन्हेउ ताहि शब्दकर अंशा ॥
लाज काज कह देहु बहाई । भेद सुधारत काल पराई ॥
माता बेटी भई नेवारी । लजा तजिके काल बिडारी ॥
लोक लाजकी दशा मिटावै । तौ रिपुकाल निकट नहि आवै ॥
रामचन्द्र त्रिभुवन के राजा । लोक लाजबहि कपिदलसाजा ॥
जानि परी नहि यमकी वानी । ताते काल कीन्ह तन हानी ॥
लाज लिये तन करै उदासा । तेहि मन भरम भूतकरबासा ॥
गुरुसों करै कपट चतुराई । चाल बिहुन कालपुर जाई ॥
भक्त कहावै लजा नहि तोरै । निश्चल काल नर्क महाँ बोरै ॥
भक्त करै कुल दशा मिटावै । परदा ठानि कालपुर जावै ॥
सो सतगुरु जो होय सयाना । चाल चलावै शब्द प्रमाना ॥
आगत परदा मेटि बहावै । पाछे भक्ति पन्थ महाँ आवै ॥
कपट छाड़िकै शीस उतारै । हंस दशा धरी मुक्ति सुधारै ॥
शीस उतारि हाथ पर लेई । पाछे पाँव ताहिपर देई ॥
भक्तिका चित हर्षित होई । ममता मोह लहर तज दोई ॥
कामिनि कनककालकरफन्दा । भयउ काल कपटि मन मन्दा ॥
दुवो शीस अर्पना लाई । मुक्ति पंथ पावै तब भाई ॥
पावै भेद शब्द सहि दानी । काल कल्पना मेटै जानी ॥

( ७० )

बोधसागर

समय-निडुरीनिडुरै नाचै, चारिउ अंचल छोरी ।
धनी पियारी होइ रहै, यमसो तितुका तोरी ॥

चौपाई

इहि विधि मुक्ति गहे जो कोई । ताकौ आवागौन न होई ॥
आवागौन विचारै जानी । काया कष्ट होइ नहि हानी ॥
सतगुरु शब्द जो लागा रहै । निकसि चरण सतगुरुको गहे ॥
तीन लोक नाद जय जाई । सतगुरुको पग रहै समाई ॥
तिसरी श्वासा साधै जानी । कुल अभिमानमिटै सबखानी ॥
नरको लक्ष पारख करि लेहूँ । पाछै वाह ताही कइ देहूँ ॥
चंचल चपल कुटिल तन होई । पान पावै तन जाय बिगोई ॥
ताको लक्षण नर्ककी खानी । बोधत दुई दुवोंकी हानी ॥
राजा वरण तन बन्सी लावै । आप नष्ट होइ और नशावै ॥
जो वाकी संगति बैठे जाई । अपनी दशा ताहि पहराई ॥
सो सतगुरु जो होय सियाना । लक्षण देखि देइ तब पाना ॥
आगत पान धरै चितलाई । पाछे निर्णय शब्द बुझाई ॥
पानलेत चित हर्षित होई । चालु चले नहि दुर्मति खोई ॥
ताहि देहूँ गुरु पिपीलका । लक्षण हीन रेष होइ जिसका ॥
तापर अंक लिखे सहिदानी । काल कलाधरि देइ निशानी ॥
जैसा लक्ष जाहिपह होई । पान देहु तेहि तहाँ बिलोई ॥
भामत पौन लिखै तेहि माहाँ । दिटै इलाका गुरुको ताहाँ ॥
जाके होई सुमतीकी खानी । ताही देहु गुरुनाम निशानी ॥
राज वरण मुख शीतल बानी । ताघट होई ज्ञानकी खानी ॥
पूरी तत्त्व पान जो पावै । यमकी नाक छेदि घर आवै ॥
राजवर्ण होय क्षीण शरीरा । ता घट काल करे नहि पीरा ॥
राजबरण मुख गुंज चतेरा । सो जिव होय कालको चेरा ॥

श्वासगुञ्जार

( ७१ )

तापर काल लिखै सहिदानी । बोलत धीर हृदय कुबानी ॥
लक्षण भेद कहो सहिदानी । कालसभा भयभीत निशानी ॥
कालकला निरखेहु बहु भांती । करहु विचार दिवस औ राती ॥
कृपण होय माया नहिं छाडै । जोरी जोरी बरनि महेँ गाडै ॥
आशा रहे तहां लपटाई । मुक्ति होय नहिं यमघर जाई ॥
देह ताहि विष गंजित पाना । करम रेख सब देह पयाना ॥
नेत्र बिलोन मसा मुख होई । करत कल्पना जाय विगोई ॥
लवा शीश होय मुख छाही । हृदय कठोर दया नहिं ताही ॥
मध्य कपोल होइ तिल खानी । बांये तत्व लै बोले बानी ॥
बांये विभौ मासा जो होई । दहिने दारुण तेज समोई ॥
बांये विभौ ताहिके होई । अंत चले जिव सर्वस खोई ॥
गहरी चितवनि मुख चतुराई । लंपट चोर होइ दुखदाई ॥
छोटी गर्दन राजस भारी । मिथ्या बोले होय खुआरी ॥
ता घट जीव दया नहिं होई । बोधत ताहि काल पुर रोई ॥
जान ऊपजै कुमती शरीरा । तेहि जनि देहु मुक्ति बलवीरा ॥
एक समय पान जो पावै । आपु जाइ संगति बगरावै ॥
विषयहि लम्पट होय जुआरी । इनते होइ है पन्थ खुआरी ॥
शब्द पेलीजानि पांव छुआवहु । महाविकार तन कछहि पावहु ॥
ताते आगम कहौ पुकारी । कुमति छुडाय पान निरुआरी ॥
हर्षित वदन रहे दिनराती । गुरुसों प्रीति करै जेव स्वाती ॥
सोंपैही सदा स्वाती आसा । उपजै मुक्ती ज्योति प्रकासा ॥
रहनि गहनि बूझे करजोरी । दीन्हेहु ताहि शब्दकी डोरी ॥
गुरु सन्मुख होइ सेवा लावै । काम कोध ममता बिसरावै ॥
सदा अधीन रहे गुरुआगे । पावै शब्द सहज अनुरागे ॥

( ७२ )

बोधसागर

गुरुपद छांड़ि अनत नहिं जाई । खुशै अमी रस पीवै अघाई ॥
समता धीर होइ जेहि गाता । तेहि यमकबहि करै नहिं घाता ॥
गुरुगम भेद बूझि सब पावै । ममता मोह सबै विसरावै ॥
समय-गुरुकी आज्ञा आवै, गुरुकी आज्ञा जाय ।

कहै कबीर सो हंस भए, बहुबिधि अमृत खाय ॥

चौपाई

क्षीण अधर औ नेत्र विसाला । गुरुगमी बोले शब्द रिसाला ॥
जो कोई तपत ताहि पहुँ आवै । अमृत सींचिके ताहि जुडावै ॥
पावै अमृत हर्षित होई । मोह महाबल जाइ बिगाई ॥
शब्दकी परच बोले बानी । तन अभिमान विसारे खानी ॥
तत्त्व तमाशा निश दिन देखै । भाव अभाव एक करि लेखै ॥
आसन मारि समाधि लगावै । एक पग संपुट पाछे लावै ॥
उलटी बाँह शीशपर राखै । पूर्णतत्व अमीरस चाखै ॥
पलकन मारै राखै साधी । तिरवेणी तट राखि समाधी ॥
अमर महातम तत्वहि राता । दशै सूख सागरके दाता ॥
ज्ञान महातम तबही पावै । अमर समाधि एकपल लावै ॥
तबही मिटै काल करदाऊ । दुविधा दूसर सब विसराऊ ॥
अमर समाधि महा फल पावै । जमदारुन तेहि शीश नवावै ॥
करपग कोमल रोग न व्यापै । काल कला तेहि देखिके काँपै ॥
अखंड मंडल गुफाके तीरा । दरशै ज्योति अखंडित धीरा ॥
जो देखै तो प्रकटै चोरा । देखे बिना ज्ञान होय भोरा ॥
तत्व समाधि लगावै जानी । उपजै ज्ञान अमी रस खानी ॥
सत्य सुकृत पग परसै जाई । रोग न व्यापै काल न खाई ॥
तत्व तमासा गुरुमुख देखे । तत्व छाड़ि निहतत्व बिबेखे ॥
तत्व समाधि करै नित पूजा । सत्य सुकृत तजि और न दूजा ॥

शवासुखार

( ७३ )

पाँवके ऊपर पाँव चढावै । हाथ फेरिके संपुट लावै ॥
संपुट शीश छुआवै जानी । निरखै अरध उरधकी वानी ॥
कसनी कसै बहत्तर डोरी । सुरति शब्दसों राखै जोरी ॥
अधर अवाज लखै निरबाना । राग छतीसों सुने वँधाना ॥
सुरली टेर अर्ध धुनि होई । ज्ञानगुफा चढ़ि निरखेहु सोई ॥
सुनत अर्ध धुनि उन मुनिराता । बूझै आदि अन्तकी बाता ॥
मन मकरंदी के गुण पावै । मगन होइ चंचल नहिं धावै ॥
मन सर होई सरे सब काजा । छोंडे कपट शीश विचुराजा ॥
नख शिश मनै बियापै सोई । मन चीन्हे मन आपै होई ॥
यह मन शक्ती यह मन सीवा । यह मन पांच तत्त्वको जीवा ॥
इह मन लेकै उन मुनिरहै । तीन लोककी बातें कहै ॥
ऊन मुनीमें रहै रहावै । ताकर हंस काल नहिं पावै ॥
ऊनमुनी महीं लावै तारी । अङ्गमें महलमहँसुरतिबैठारी ॥
उनमुन महीं जो वासाकरै । अगम महलमें सुरति लै धरै ॥

समय-उन चढी आकाशको, गई गगनपर छूटि ।

हंस चले जो जात हैं, रहे शिर कूटि ॥

उन मुनीमें धर्मदासबसै, बंक नाल गहिजोर ।

शिर ऊपर सतशुक्ति तहै, तहां शीत शब्दकी डोर ॥

चौपाई

उनमुनी सांची सुरति है बासा । धर्मदास गहि राखहु पासा ॥
सोहं सार मूल धुनि राता । तासु नेह मिले दाता ॥

समय-हंसा सोहंग मान करै, निकसि खेल मैदान ।

तहां सुरति बैठारिकै, नित प्रति लावै ध्यान ॥

चौपाई

अमर आसन करौ बिचारी । धर्मदास यह कथा निनारी ॥

( ७४ )

बोधसागर

जो कोइ मूल ठीक धरि आवै । सोई अमर समाधि लगावै ॥
सार समान रहै दिन राती । पावै आदि अन्त उत्पत्ती ॥
अमर महात्म पावै नीका । अमर समाधि को गहै धरि ठीका ॥
पांच पचीस सकल सब जानै । आवत जात श्वास पहिचानै ॥
श्वास सार शब्द निरुआरै । अमर समाधि को भेद विचारै ॥
निशि वासर है शब्द समाना । जागत सोवत एक ठिकाना ॥
अमर मूल धुनि शब्द समाई । बोलै ज्ञान गर्मी अधिकाई ॥
लावै अमर मूल महतारी । अटल रहै मति टरति न हारी ॥
अमर सुहावन आसन मूला । नख शिख भेद गहै अस्थूला ॥
तनकी लक्ष्य लखै विस्तारा । लक्ष्य अलक्ष श्वास गुंजारा ॥
लक्ष्य लखै सो साधु कहावै । बिना लक्ष्य सतगुरु नहि पावै ॥
सतगुरु चीन्है के सहिदानी । काल ब्याल भयभीत निशानी ॥
काल काल बन रेख बनावा । नख शिव जानै तासु सुभावा ॥
पतरी ग्रीव नासिका भारी । भृकुटी देह नेह होइ कारी ॥
दहिने ग्रीव मासा को बासा । गुण गंभीर ज्ञान परकासा ॥
नेत्र रसाल बदन मनहारि । शब्द सनेही सदा पियारा ॥
सदा हृदय सतगुरुकी आसा । बोलै ज्ञान गर्मी परकासा ॥
पूरण लक्ष पक्ष दोइ होई । शब्द गहै बहु भेद बिलोई ॥
ललाट पाट रेखा होई चारी । सुरति सनेही सुरति सुधारी ॥
तेहि जानेहु पीछल सहिदानी । पाछिल बोध भये सब हानी ॥
सुनत शब्द मिलै सो आनी । शब्द सनेह गहै चित्त जानी ॥
पलक छत्र औ झीने बोलै । पावत पान कपट सब खोलै ॥
ताकह जानहु हंस सुहेली । आनि मिले यम परदा खोली ॥
भीतर वचन कहे हित जानी । पाछिल सुरति भई जत हानी ॥
चरण टेकि चित्त बोधहु जानी । जाते आगे होइ न हानी ॥
रोष करहु तो मोर दोहार्इ । गुरुको रोष लोक नहि जाई ॥