कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
(२)
ज्ञानसागर
तहँवा रोग सोग नहिं होई । क्रीडा विनोद करे सब कोई ॥ चंद्र न सूर दिवस नहिं राती । वरण भेद नहिं जाति अजाती ॥ तहँवा जरा मरन नहिं होई । बहु आनंद करै सब कोई ॥ पुष्प विमान सदा उजियारा । अमृत भोजन करत अहारा ॥ काया सुन्दर ताहि प्रमाना । उदित भये जनु षोडस भाना ॥ इतनौ एक हंस उजियारा । शोभित चिकुर तहां जनु तारा ॥ विमल बास तहँवां बिगसाई । योजन चार लौं बास उड़ाई ॥ सदा मनोहर क्षत्र सिर छाजा । बूझ न परै रंक औ राजा ॥ नहिं तहां काल वचनकी खानी । अमृत वचन बोल भल वानी ॥ आलस निद्रा नहीं मकासा । बहुत प्रेम सुख करै विलासा ॥
साखी-अस सुख है हमरे घरे, कहै कवीर समुझाय ।
सत्त शब्दको जानिके, असथिर बैठे जाय ॥
चौपाई
सुन धर्मनि मैं कहौं समुझाई । एक नाम खोजो चित लाई ॥ जिहिं सुमिरत जीव होय उबारा । जाते उत्तरी भन जल पारा ॥ काल वीर बांका बड़ होई । बिना नाम बानै नहिं कोई ॥ काल गरल है तिमिर अपारा । सुमिरत नाम होय उजियारा ॥ काल फांस डारे गल माहीं । नाम खड़ काटत पल माहीं ॥ काल जँजाल है गरल स्वभाऊ । नाम सुधारस विषथ बुझाऊ ॥ विषकी लहर मतो संसारा । नहिं कछु सुझे वार न पारा ॥ सुर नर माते नाम विहूना । औट मुये ज्यों जल बिन मीना ॥ भूल परै पाखँड व्यवहारा । तीरथ वृत्त औ नेम अचारा ॥ सगुण जोग जुगति जो गावै । बिना नाम मुक्ती नहिं पावै ॥
साखी-गुण तीनोंकी भक्तिमें, भूल परचो संसार ।
कहै कवीर निज नाम विन, कैसे उत्तरे पार ॥
सत्य पुरुष का वर्णन
ज्ञानसागर
( ३ )
धर्मदास वचन-चौपाई
विनकैं स्वामी दोह कर जोरी । कहौ गुसाईं नामकी डोरी ॥ निरंकार निरंजन नाऊं । जोत स्वरूप सुमरत सब ठाऊं ॥ गावहि विद्या वेद अनूपा । जगरचना कियो ज्योति सरूपा ॥ भक्त वत्सल निजनाम कहाई । जिन यह रचि सृष्टि दुनियाई ॥ सोई पुरुष कि आहि निनारा । सो मोहि स्वामी कहौ व्यवहारा ॥ जिह्ति होय जीवको काजा । सो मैं करहुँ छोड़ कुल लाजा ॥ होहु दयाल दयानिधि स्वामी । बोलहु वचन सुधा रस वानी ॥ नाम प्रभाव निज मोहि बताओ । होहु दयाल मम तृषा बुझाओ ॥
साखी-जो कुछ मुझे सन्देश है, सो मोहि कहो समुझाय । निश्चय कर गुरु मानिहौँ, औ बंदो तुम पायँ ॥
साहिब कबीर वचन-चौपाई
तुमसों कहौँ जो नाम विचारी । ज्योति नहीं वह पुरुष न नारी ॥ तीन लोक ते भिन्न पसारा । जगमग जोत जहाँ उजियारा ॥ सदा वसंत होत तिहि ठाऊं । संशय रहित अमरपुर गाऊं ॥ तहँवा जाय अटल सो होई । धरमराय आवत फिरि रोई ॥ वरनों लोक सुनो सत भाऊ । जाहि लोकतें हम चलि आऊ ॥ जगमग जोती बहुत सुहावन । दीप अनेक गिने को पावन ॥ जगमग ज्योति सदा उजियारा । करी अनेक गिने को पारा ॥
छंद
जहँ ज्योति जगमग अति सुहावन तत्त्व वारिध अति चलै । कहत दोई कुल तिमिर मनो पन्न झलहल हलै ॥ फेन उडगन बहन लागे शसि मनोहर हेरि को । किमि देउँ पटतर बूझ देखो भाव नहिँ वहाँ जोर को ॥ सोरठा-शोभा अगम अपार, वर्णत बनेँ न एक मुख । कही न जात विसतार, जो मुख होवै पदम सत ॥
सृष्टि उत्पत्ति वर्णन प्रारंभ
( ४ )
ज्ञानसागर
धर्मदास वचन-चौपाई
हे स्वामी मोहि आदि सुनाओ । कैसे पुरुष वह लोक बनाओ ॥ कैसे द्रौप करी निर्मावा । होहु दयाल सो मोहि बतावा ॥
साहव कबीर वचन
सुन हंसा तोहे कहब विचारी । लोकद्रौप जिमि करी सम्हारी ॥ इते अदेह दुतिया नहि काळ । सुरति सनेही जान कछु भाळ ॥ नहि तहाँ पांच तत्त्व परकाशा । गुण तीनों न छिनहीं अकाशा ॥ नहि तहाँ ज्योति निरंजन राया । नहि तहाँ दशौ जनम निर्माया ॥ नहि तहाँ ब्रह्मा विष्णु मद्देशा । आदि भवानी गवरि गनेशा ॥ नहि तहाँ जीव सीव कर मूला । नहि अनंग जिह्विते सब फूला ॥ नहि तहाँ ऋषी सहस्र अठासी । षट् दर्शन न सिद्ध चौरासी ॥ सात वार पन्द्रह तिथि नाहीं । आदि अंत नहि कालकी छाहीं ॥
छंद
नहि कूर्म चक्रिय वारि पर्वत अग्नि वसुधा नाहि हो । शून्य विशून्य न तहां होई अगाध महिमा सो कहो ॥ जिमि पुढुप तिमि छाया राखो बास भरो ता संग मई । स्वरूप बूझो अगम आदि महिमा अक्षर अंग मई ॥ सोरठा-प्रकट कहो जिमि रूप, देखो हृदय विचारिके । आदिहि रूप स्वरूप, जिहि ते सकल प्रकाश भयो ॥
चौपाई
तिनहि भयो पुन गुप्त निवासा । स्वासा सार ते पुहुमि प्रकाशा ॥ सोई पुढुप विना नर नाला । ज्योति अनेकहोत झल हाला ॥ पुढुप मनोहर सेतई भाळ । पुढुप द्रौप सबही निर्माळ ॥ अजे सरोवर कीन्हो सारा । अष्ट कमल ते आठौं वारा ॥ पोडश मुत तबही निर्मावा । कछु प्रगट कछु गुप्त प्रभावा ॥
द्वीप वर्णन
ज्ञानसागर
( ५ )
पुढूप द्वीप किमि करव बखाना । आदि ब्रह्म तहँवा अस्थाना ॥ सत्रह संख पंखुरी राजै । नौ सौ संख द्वीप तहाँ छाजै ॥ तेरह संख सुरंग अपारा । तिहिन्हिं जान काल बरियारा ॥
धर्मदास वचन
धर्मदास कहैं सुनो गुसाई । द्वीप अनेक पुरुष के ठाई ॥ सो स्वामी मोहि भेद बताओ । दया करो जनि मोहि डुराओ ॥ तुमसों वरनि कहौं सत भाऊँ । मैं मनो आज महा निधि पाऊँ ॥ सुनत वचन गदगद सिर मोरा । थकित भये जनु चंद्र चकोरा ॥ मैं भुजंग तुम मलय्या गीरा । करहु दया मम दुखित शरीरा ॥
साहिब कबीर वचन
धर्मदास पूछो जो मोहीं । सो मैं भेद कहौं सब तोहीं ॥ कमल असंख भेद कहँ जाना । तहँवा पुरुष रहे निर्वाना ॥ मोही सतगुरु दियो बताई । सो सब भेद कहौं तुम पाई ॥ सत पंखुरी कमल निवासा । तहँवा कीन्ह आप रहि वासा ॥
साखी-शीश दरस अति निर्मल, काया न दीसत कोश । पदम संपुट लग रहै, बानी विगसन होय ॥
चौपाई
प्रगट द्वार जब देखौं शीशा । धर्मनि हिये देखौं अहै ईशा ॥ पाइर द्वीप जहँ निर्मल ठौरा । सो सब भेद कहौं कछु औरा ॥ अंबू द्वीप हंस को थाना । पाइर द्वीप पुढूप निर्वाना ॥ नौ सौ करी ताहि के हीठा । गुरु प्रसाद सबै हम दीठा ॥ तहाँ आइ पुन पाइर द्वीपा । मंजुल मंगल करी समीपा ॥ तहँवा जाइ अटल सो होई । धर्मराज आवै फिर रोई ॥ द्वीप अनेक औ करी अनेका । पाइर द्वीप हंस के थेका ॥ चार करी हैं सब से सारा । बहु शोभा तहँ रूप अपारा ॥
धर्मरायके द्वीप नहीं पानेका वर्णन
( ६ )
ज्ञानसागर
साखी-करी भेद सुन हंसा, आई देखु सत लोक । गुरु जो बतावहीं, मिट जाई सब धोख ॥
धर्मदास बचन-चौपाई
हे स्वामी मैं विनऊं तोही । कछु संशय जिव उपज्यो मोही ॥ धर्मराय नहीं पायब दीपा । और सबै सुत द्रौप समीपा ॥ कारण कौन दरस नहीं होई । कहौ अगम जानि राखो गोई ॥
साहिब कवीर बचन
जो तुम पूछो अगम सन्देसा । सो सब तोहि कहौ उपदेसा ॥ आदि पुरुष अस कीन्हो साजा । पाँच बुन्द हुलास उपराजा ॥ बुन्दहि बुन्द अंड परकाशा । धर्म धीर जेहि अंड निवासा ॥ अटल जोत सुरंग उजियारा । तहँवा अंड रहै मनियारा ॥ धर्म धीर जबही उत्पाना । आदि ब्रह्म तबही सकुचाना ॥ एकहि मूल सबै उपजाई । मेटचो तेज अंड कुन्याई ॥
साखी-तेज रह्यो जिहि अंड मो, तेहि नहीं दीन्हौ ठौर । तेहिते उपज्यो धर्म अब, वंश अगिन के जोर ॥
चौपाई
बावन लक्ष बेर अनुमाना । मेटो न मिटत शब्द परवाना ॥ एकहि मूल सबै उपजाई । मिटै न अंड तेज अन्याई ॥ धर्मराय है काल अँकुरा । उपजो तहाँ काल कौ मुरा ॥ तबहि पुरुष अज जुगत विचारा । रहै धर्म द्रौप सो न्यारा ॥ जोपै रहै सदा सिव काई । तौ एक द्रौप तुमहि निर्माई ॥ पुरुष शब्द ते सबै उपराजा । सेवा करें सुत अति अनुरागा ॥ जानै भेद न दूसर कोई । उत्पनि सबकी बाहिर होई ॥ अभिअन्तर जो उत्पति होई । काया दरश पाय सब कोई ॥ काया दरश सुरति इक पावे । संगहि द्रौप सबै निर्मावे ॥
धर्मरायका सत्य पुरुषकी सेवा करके द्वीप पानेका वर्णन । सहज की विन्ती
ज्ञानसागर
( ७ )
धर्म धीर नहि पावे द्वीपा । और सबै सुत द्वीप सर्मीपा ॥ धर्मराय अस कीन्ह बनाई । कर सेवा तेहि जागहि आई ॥ सेवा बहुत भांति सो किएऊ । आदि पुरुष तब हर्षित भयेऊ ॥ साखी-सेवा कीन्ही धर्म बड़, दियो ठौर अब सोय । जाय रहो वहि द्वीप में, सेवा निर्फ़ल न होय ॥
चौपाई
सात द्वीप कौ पायो राजू । भयो आनन्द धर्म मन गाजू ॥ सेवा करि पुन कीन्ह निहोरा । सुनो सहज तुम आता मोरा ॥ सेवा बसहि द्वीप मैं पाएऊँ । कैसोरचो मोहि गम्यन आएऊँ ॥ पुरुष सों विनती करु यह भारी । हे आता मैं तुम बलिहारी ॥ करिहौं सोई जो आज्ञा पाऊँ । कैसे मैं नव खंड बनाऊँ ॥ चले सहज जहँ द्वीप अमाना । कीन्ह जाय दण्डवत प्रणामा ॥ बहुविधि विनती सहज कियो जबही । बेग पुहुप बानी भई त ही ॥ पुरुष वाणी ते भया उजियारा । सुनहु सहज तुम वचन हमारा ॥ पक्षि पालना पाय है अंडा । सो लै धर्म रचै नव खंडा ॥ चले सहज तब बार न लावा । धर्म धीरसौं मता सुनावा ॥ साखी-सुनत संदेशो पुरुष को, धर्म शीस तब नाव । पायो आज्ञा पुरुष की, अब फाबी मो दांव ॥
चौपाई
सुनत संदेश भयो हरषंता । आन अंड जो चले तुरंता ॥ देखो धर्म जब कूर्म शरीरा । बारह पालंग है बल वीरा ॥ नव पालंग धर्म परमाना । बने न घात तब करे तिवाँना ॥ धावहि दशहू दिशा रिसाई । कैसे अंड लेऊँ मैं जाई ॥ तबहि उक्ति अस कीन्ह बनाई । तोरि शीस अस करचो उपाई ॥ शीस कीन्ह तब नख सौं छीना । अमी अंक तोरि कियो मीना ॥
धर्मरायका अधिकस्थान मांगना और मान-सरोवरका पाना
( ८ )
ज्ञानसागर
शीस तोरि लियो द्वीप अपारा । तबहि धर्म भयो बरियारा ॥ पांचौ तत्त्व अंडसौं लीन्हा । गुन तीनों सुशीस कर कीन्हा ॥ पांचौ तत्त्व तीन गुन सारा । यही धर्म सब कीन्ह पसारा ॥ तब कियो नीर निरंजन राया । मीन रूप तबही उपजाया ॥ करि चरित्र धर्म तब आया । आज सहजसों विनती लाया ॥ साखी-जाय कहौ तुम पुरुष सों, बहु सेवा मैं कीन्ह । सब सुत रहिहैं लोकमहैं, नव खँड हम कहैं दीन्ह ॥
चोपाई
इतने में नहि मोर रहाऊँ । जहँवा रहव देव मोहि ठाऊँ ॥ चले सहज पुरुष पर जबहीं । विनती धर्म कीन्ह पुनि तबहीं ॥ मांग्यो बीज कीन्ह बड़ लोभा । जातैं द्वीप पावों मैं शोभा ॥ सहज विनय पुरुष सों कीन्हा । हे स्वामि तुव सुन बल हीना ॥ मांगै और ठौर पुनि सोई । धर्म धीर जो तुव सुत बल होई ॥ अति अधीन मांगै जौ बीजे । सोहे द्वीप पुहुप वहि दीजे ॥ तबहि पुरुष सेवा वश भयऊ । अष्टांगी कामिनि सो दयऊ ॥ मान सरोवर ताकर नाऊँ । सोऊ दियो धर्म कहैं ठाऊँ ॥ अष्टांगी कन्या उत्पानी । जासौं कहिये आदि भवानी ॥ रूप अनूप शोभा अधिकार्ई । कन्या मान सरोवर आई ॥ साखी-चौरासी लक्ष जीव सब, मूल बीजके संग । ये सब मान सरोवरा, रच्यो धर्म बड रंग ॥
चोपाई
सहज संदेशो ल्याये जहँवा । धर्म धीर ठाढे हैं तहँवा ॥ कह्यो संदेश धर्म मन गाजा । मान सरोवर जाइ विराजा ॥ साखी-देखि रूप कामिनि कौ, पल भर रह्यो न जाइ । आगे पीछे ना सोचिया, ताकौ लीन्हेसि खाइ ॥
पुरुषका निरञ्जनको शाप देना
ज्ञानसागर
( ९ )
चौपाई
कन्या सों अस कीन्ह अन्याई । सहजसों लियो जो तुरत बुझाई ॥ यहै चरित पुरुष जब देखा । दीन्हें शाप सो कहों विशेखा ॥ सवा लक्ष जीव करौ आहारा । तऊ न ऊदर भैर तुम्हारा ॥ सुमिरन कूर्म पुरुष को कीन्हा । अहहो पुरुष धरम सिरछीन्हा ॥ तुव आज्ञा मैं अंड जो दीन्हा । धर्मराज काहे सिर लीन्हा ॥ सुनत वचन प्रभु बहुत रिसाने । जोगजीत तबही उतपाने ॥ आज्ञा भई तुम वेग सिधारी । धर्मराज कहैं मार निकारी ॥ आज्ञा मांग चले तब ज्ञानी । धर्मराय सो बातैं ठानी ॥ अरे पापी तू पुरुष को चोरा । भागहु वेग कहा सुन मोरा ॥ सुनतहि कोध भये धर्म धीरा । जोग जीतके सन्मुख भीरा ॥ जोग जीत तबहीं फटकारा । जाय रहौ तब लोक ते न्यारा ॥ जोग संतायन चल भये जबही । धर्म धीर आयौ पुनि तबही ॥ बार अनेक युद्ध जिहि कीन्हा । मारे न मरत बहुत बल कीन्हा ॥
धर्मराज वचन
तब मैं हतौ पुरुष के ठाऊँ । तब नहिं सुन्यो तुम्हारौ नाऊँ ॥ को तुम हौ सो मोहि बताऊ । सहज भाव तुम फेर बनाऊ ॥
ज्ञानी वचन
धर्म धीर सों कहा बखानी । मर्दन धर्म नाम मम ज्ञानी ॥ जब तुम कीन्ह चार का काजा । तातैं पुरुष मोहि उपराजा ॥ मारहुँ तोहि कहौ सतभाऊ । अष्टांगी तैं कामिन खाऊ ॥ सुनतहि कोध धरम पर जरेऊ । जरत हुताश मनहु घृत परेऊ ॥
साखी-करहि युद्ध बहु भांति सों, कैसेहु क्षमा न होय । क्षण एक लरचौ सहज तुम, करु उपाय अब सोय ॥
( १० )
ज्ञानसागर
चौपाई
पुरुष आज्ञा अस भयउ अपारा । मारहु धर्म के मांझ कपारा ॥ आज्ञा पुरुष ज्ञानीदियो जबही । मारौ शीश परो खस तबही ॥ संशय भयो तासु की देहा । ताकहैं भयो जी महाँ संदेहा ॥ धर्म धीर कौ रुधिरसे जबही । विषम सरोवर उपजौ तबही ॥ कन्या निकस जो बाहिर आई । संशय काल तिहि घटहि समाई ॥ शीश दियो लै कुर्म के पास । पुरुष आज्ञा सौ कीन्ह निवासा ॥ आज्ञा कीन्हही बेग निकारहु । कहै जोइ अब धर्म सिधारहु ॥ छाड़हु अंश खंड का गाऊ । विषम सरोवर माहि सा जाऊ ॥ देखो बहुत रूप उजियारा । अस कामिनि तैं कीन्ह अहारा ॥ फिर मैं गयो पुरुष के पास । धर्म धीर अस करहि तमाशा ॥ कह कामिनि सुन पुरुष पुराना । मैं अपना कछु मरम न जाना ॥ कौन पुरुष मोही उपजाई । सो मोहि गम्य कहौ समुझाई ॥
धर्मराय वचन
कन्या मैं उपजायो तोही । रहौ अलख नहि भेंटसि मोही ॥ कन्या कह सुन पिता हमारा । खोजो वर होय व्याह हमारा ॥ वर खोजौ जो दुतिया होई । कन्या मैं अब व्याहौ तोही ॥ पुत्री पिता न होवत व्याहा । पितहि पाय बहुतै औगाहा ॥ साखी-धर्म कहै सुन कन्या, भर्म भयो मति तोहि ॥ पाप पुण्य हमरे घरे, क्या डहकस तैं मोहि ॥
चौपाई
आदि भवानी और धर्मराऊ । इन सब कीन्ह सृष्टि निर्माऊ ॥ पांच तत्त्व तीन गुण रहेऊ । बीज सहित अष्टांगी दण्ड ॥ चौरासीलक्ष जीवदियो सम्हारी । रचहु सृष्टि अब आदि कुवारी ॥ सेवा करहु सृष्टिकी ओरा । अलख निरंजन नाम है मोरा ॥
कन्याका धर्मरायके पेटसे निकलना और धर्मरायका उसे ठगना तथा दोनोंका मिल-कर सृष्टिकी रचना करनेका विचार करना और रचना
ज्ञानसागर
( ११ )
छन्द
कहै भवानी सुनहु निरंजन यह मन्त्र निज सोई भले । अस करहु कुलफ कपाट दै सब जीव जाहितै ना चले ॥ दस चार सुत दीजे भयंकर जिहि तैं होय त्रास हो । तिहु लोक होत झटा पटा अब चार जुगन निवास हो ॥ सोरठा-चौदह वीर अपार, चित्रगुप्त दुर्गदानी सम । आन देई अहार, सवा लक्ष जिव रात दिन ॥
चौपाई
जस कछु मत कियौ आदि भवानी। धरमराय ऐसी मति ठानी ॥ जाइ रहौ जहाँ पांजी वाँका । धरती शीस सरग का नाका ॥ दशों दिशा हूँधे सब ठाऊँ । है द्वार मैं कहि ससुझाऊँ ॥ गुरु जो कहै औ पन्थ बतावे । ओहि पन्थ हंस घर आवे ॥ धर्मराय मूदो वह द्वारा । तबहि भवानी युक्ति विचारा ॥ तीनों गुण तिय अण्ड सम्हारा । पुनि भाखौ आगिल व्यनहारा ॥ नाम कहौ कह राखौ गोई । रजगुन तमगुन सतगुन होई ॥ अष्टांगी अण्डन मन दीन्हौ । धरमराय कछु उद्यम कीन्हौ ॥ मीन रूप जो प्रथम सुभाऊ । ता पीछे कूर्महि निर्माऊ ॥ ता पीछे बाराह को थाना । ता पर उग्र कीन्ह उत्पाना ॥
छन्द
अस कीन्ह सबहि निरंजना तब दीन्ह मही को थेग हो ॥ महीतल दीन्हौ मीन कच्छप सूकर दीन्हौ शेष हो ॥ सुम्मेर पर्वत अति धुरंधर दीन्ह मही जो नाचलै ॥ दशों दिशा दिगज चार दीन्हैं जिहितै मही ना डग मगे ॥ सोरठा-दीन्हौ महि कौ भार, वारी जगत लगायकै । जाकौ तमहि अपार, चतुर विधाता ठग भये ॥
चौदह यमका नाम और कर्म
( १२ )
ज्ञानसागर
धर्मदास वचन—चौपाई
धर्मदास टेके गहि पाऊ । नाम जमन कौ मोहि सुनाऊ ॥ चौदह यम मोहिवरनी सुनाओ । दया करहु जिन मोहि दुरावो ॥
साहेब कवीर दास
दुर्ग द्वांनी चित्रगुप्त वरियारा । एता जमन के हैं सरदारा ॥ मनसा मल्ल अपरबल मोहा । काल सैन मकरंदी मोहा ॥ चित्त चञ्चल औ अन्ध अचेता । मृत्यू अन्ध जतन जो खेता ॥ सूरा संख और कर्म रेखा । भावी तेज तालुका पेखा ॥ अग्नि औ क्रोधित कहिये अन्धा । जामें जीव जन्तु सब बन्धा ॥ परमेश्वर अपर्वल धर्मराया । पाप पुण्य सबसों बिलछाया ॥ ये सब जम जो निरंजन कीन्हा । लिखना कागज रचके दीन्हा ॥
छन्द
चित्रगुप्त लेखौ लगवौ बंधु दोह चतुर भल । लख चौरासी रसन जाकै लखि लावत कै छलै ॥ लेखा लगावत जीव को जब अवधि पूजै आइ हो । सवा लक्ष प्रमाण बांध्यो ठग निरंजन राइ हो ॥ सोरठा—ऐसा कीन्ह विचार, वारी जगत लगाय कै । भूल परो संसार, एक नाम जाने विना ॥
चौपाई
देख भयंकर जम की काया । चौरासी लक्ष जिव डरपाया ॥ विकट रूप देखत जम पासा । सब जीवन भये जो बहु त्रासा ॥ सब मिलि कै तब स्तुति ठाना । सुमरण एकहि आद प्रवाना ॥ यहि विधि विनती हसन ठानी । तबहि भई घर अघर तैं वानी ॥ वानी विगसत भये उजियारा । जोग संतायन तब पगुधारा ॥ आज्ञा कहा पुरुष मोहे कीजे । करब सोई जो आयसु दीजे ॥
कालका जीवोंको दुःखित करना और सत्य पुरुषकी आज्ञासे ज्ञानीजीका पृथ्वी-पर आना
ज्ञानसागर
( १३ )
पुरुष वचन
हंस दुखित भये काल के पास। जाइ छुड़ावहु कालकी फाँसा ॥ कहा करो जो हारो बोला। बरवस करब तौ सुकृत डोला ॥ जोग जीत तुम वेग सिधारो। भव सागर ते हंस उवारो ॥
ज्ञानीवचन
चले ज्ञानी तब मस्तक नाई। पहुँचे तहैं जहैं धरम रहाई ॥ धर्मराय ज्ञानी कहैं देखा। क्रोध भयो जनु पावक रेखा ॥ यहूँवा आये किहिं व्यवहारा। लोकहि से मोहि मारि निकारा ॥ मानेव आज्ञा छाड़िब लोका। यही जान परे तुम धोखा ॥ करो संहार सहित तोहे ज्ञानी। मरम हमार तुम कछून जानी ॥
साखी--संहार करौ पल भीतर, कहौ वचन परचार ॥
पेलौ मान सरोवरै, विध्वंसौ द्वीप सब झार ॥
चौपाई
ज्ञानी कहैं सुन धर्मनि आगर। तो कह ठौर दीन्ह भवसागर ॥ तीनौ पुर दीन्हौ तोहि राऊ। पुरुष आज्ञा आयो धरि पांडु ॥ चौरासी लक्ष जीव तोहि दीन्हा। तैं जीवन बड़ सासत कीन्हा ॥ आज्ञा पुरुष करौ परवाना। जीव लोक सब करौ पयाना ॥ पुरुष वचन मेटे फल पावहु। कियो अवज्ञा लोकसे आवहु ॥ सोह करहु रहन जो पावहु। की यहवाँ तैं वेग सिधवहु ॥ कै जीवन कहैं दीजे बांटा। बोलहु वचन धर्म तुम छांटा ॥
साखी--धरम कहैं सुन ज्ञानी, आज्ञा पुरुष की सार ॥
सेवा करत रैन दिन, पल पल सहित विचार ॥
चौपाई
आज्ञा मान लीन्ह मैं तोरा। अब सुनिये कछु विनती मोरा ॥ सो ना करब जो मोर विगारा। मांगौ वचन करौ प्रतिपारा ॥ पुरुष दीन्ह मोहे राज बुलाई। तुमहीं देव जो संशय जाई ॥
( १४ )
ज्ञानसागर
लीजे हंस जो भक्त परमाना । तीनों जुग हैं मेरे थाना ॥ चौथा जुग तबही उत्पानी । तबहि सम्हार सुनौ हो ज्ञानी॥ कैसे सम्हारो मोही समझावहु । की भक्ति जो मोहि सुनावहु॥ कहैं धर्म सुन जोग संतायन । ऐसे हंस न होय मुक्तायन ॥ हरि मन्दर मैं रचौ बनाई । तहँवा हंस करत मम नाई ॥ जो कोई गम्य न करै विचारा । सात जन्म लौं चोर हमारा ॥ सुन ज्ञानी विहँसित मन कीन्हा । कैसा हरि मंदिर का चीन्हा ॥
धर्मरायवचन
जब मम कन्या भयो प्रसंगा । मनमथ उपज्यौ भयो उमंगा ॥ चलयौ रुधिर कामिन केजबही । नख रेखा भग उपजी तबही ॥ चलयौ रुधिर ताको रज भएऊ । गर्भ प्रसंग अंड तिय ठएऊ ॥ तेहि प्रसंग तिय गुण उपराजा । तबतै अधर निरञ्जन राजा ॥ सारखी-ज्ञानी कहैं धर्म सो, छल मतौ तुम्हारै ॥ जाको मैं चेतावहुं, सो तुमहीं सो न्यार ॥
चौपाई
विनती तोर करों प्रतिपाला । जुग तीनों जीवन वर साला ॥ चौथा जुग अंश मम आवहि । नाम प्रताप हंस मुक्तावहि ॥
धर्मरायवचन
हे स्वामी वर आयसु होई । कछु मांगों अब दीजे सोई ॥ सो न करब जो सब जिव जाई । भवसागर खाली परजाई ॥ ऐसा मत ज्ञानी तुम ठाँनहु । आज्ञा पुरुष की तुमहु मानहु ॥ पुरुष बोल हारा मोहि पाहीं । सोनकरब जो सब जिय जाहीं ॥ कह ज्ञानी सब मैं मानी । कह्यौ वचन सो करब प्रमानी ॥ सतजुग त्रेता द्वापर जाई । कलियुग कौ प्रभाव जब आई ॥ चार अंश मैं कीन्हौ थाना । खुंट गहौ तो नहीं प्रमाना ॥
ज्ञानसागर
( १५ )
धर्मरायवचन
साखी--बाँवन नरसिंह अंश मम, परसराम बलवीर ॥ रामचन्द्र आगे करौ, तब पुनि कृष्ण शरीर ॥
चोपाई
कृष्ण देह छाँडव मैं जहियाँ । कलियुगचौथायुग होय तहियाँ ॥ तब हम करिहैं बौद्ध शरीरा । जगन्नाथ सरोवर के तीरा ॥ राजा इंद्र दवन परवाँना । मंडप काम लगावैं तवाँना ॥ मंडप तास उठन नहिं पाई । सायर उमंग खसावन आई ॥ तब ज्ञानी पूछैं यह बात । तोहि ते उपजै सायर साता ॥ जगन्नाथ तैं कष्ट बनाई । सायर कवनहुं भाँति खसाई ॥ हँस्यो धर्म कहि सतौ अपाना । कहौ करतूत सुनौ परिवाना ॥ दैत्य अनेक जीव जो मारौ । अंश मोर तेहि जाय सँहारौ ॥ राम रूप जब होय हमारा । तिनसौ होइ है द्रोह अपकार ॥ दैत्य अनेक जीव को फेरा । वालि वधे औ सायर तेरा ॥ वालि बैर मैं तुरत दिवायव । व्यादि फाँसी सो कृष्ण मरायव ॥
साखी--सायर बैर ना पावई, करि है वाऊ सौ घात ॥ मंडप उठन न पाइ है, जातैं कहो अस बात ॥
चोपाई
हे ज्ञानी अस मतौ विचारहु । प्रथमहि सागर तीर सुधारहु ॥ मोहिं थापहु मैं करहुं निहोरा । तातैं भाव जूरे नहिं मोरा ॥ मण्डप उठे अटल हो राजू । पुरुष वचन कहैं तुम कहैं लाजू ॥ पहिले थापहु मो कहैं ज्ञानी । सागर तीर बैठहु अन्तर्यामी ॥ कहे जोग जीत सुनो धर्मराई । पुरुष बोल मेटा नहिं जाई ॥ सतजुग त्रेता द्वापर माहीं । तीनों जुग अंश मोर जहैं जाहीं ॥ कोई कुल हंस शब्द जो पावई । तीनों जुग जीव थोरा आवई ॥ कलियुग मोर मनुष्य शरीरा । जा कहैं सुनियों नाम कबीरा ॥
सृष्टि उत्पत्तिकी कथा वर्णन
( १६ )
ज्ञानसागर
जो जिव नाम शरण गति आवै । होय निशंक लोक कहैं जावै ॥ और इकोतर नामहि पावै । तुम कह जीत हंस घर आवै ॥ माँग्यो वचन करौं प्रतिपाला । जुग तीनों जीवन वरशाला ॥ जातै पुरुष वचन अब हारा । करौं सो वचनन कौ प्रतिपारा ॥
साखी--जगन्नाथ मैं थाँपब, जायब सागर तीर ॥ हंस लोक लै आएब, देह जब धरब कबीर ॥
चौपाई
यहि प्रकार आयो ज्ञानी जबहीं । मारचो तुरत बांधके तबहीं ॥ कियो अवज्ञा गरस्यो नारी । मान सरोवरतै मार निकारी ॥
धर्मराय वचन
हे स्वामी मैं कहौं विचारी । रोकौं न हंस जो शरण तुम्हारी ॥ जो कोई जीव जो होय तुम्हारा । अपने काँध उतारौं पारा ॥ साखी--यह चरित्र सब ज्ञानी, कीन्ह धरम के पास ॥
जाय कह्यो तब पुरुष सौं, सुख साखर कीन्ह निवास ॥
चौपाई
अभैपक्ष ज्ञानकी कौ द्वीपा । तहाँ सत्ताईस द्वीप समीपा ॥ तहँकी काल खबर नहिं पाई । तहँ न सतादे काल अन्याई ॥
धर्मदास वचन
धरमदास तब कीन्ह प्रमाना । अगम अपार सुनै यह ज्ञाना ॥ हे स्वामी यह कहौं बुझाई । कौन मते अब सृष्टि बनाई ॥ सो विरंतत कहौं समुझाई । जिहिं ते मन की संशय जाई ॥ तुम्हरे वचन मोहि सार गुसाई । सुन हर्षब धन रंक की नाई ॥
साहेब कबीर वचन
कहै कबीर सुनौ धर्मदासा । जब कन्या कह्यु कीन्ह तमासा ॥ तीनों अण्ड भये तिय वारा । ताके रूप भये अधिकारा ॥
तीन देवका प्रगट होना और आदि मायाका तीनोंका काम बताना
ज्ञानसागर
( १७ )
रजगुन भाव ब्रह्मा उत्पानी । सतगुन भाव विष्णु कोजानी ॥ तमगुन भाव रुद्र का लेखा । तीनों गुन तिय अंड विशेषा ॥ जब देवी तिन सुत उत्पाने । धरमराय निद्रा अलसाने ॥ सोवत चार युग गय बीती । इक युग प्रथम अंड सौ प्रीती ॥ उठि जागै कोइ जान न भेदा । ताकी स्वांस तैं चारौं वेदा ॥ स्तुति वेद कियो पुनि तहैंवा । चतुर रूप विधाता जहैंवा ॥ मीन रूप जो कीन्ह बनाई । तीन छोड़ि रह चौथे ठाई ॥ जो तुम संशय करहु धर्मदासा । वेद चरित्र अब कहौं प्रकाशां ॥ कूर्म चाव कियोकालअन्याई । बुंद प्रसेद तहाँ पुनि पाई ॥ एक बुंद धरती परगासा । दूसरा बुन्द घट माहीं नितासा ॥ बुंद प्रभाव वेद भये ताही । ऐसे बुन्द की उत्पति आही ॥ और चरित्र जस कीन्ह भवानी । सो अब तुमसौ कहा बखानी ॥
सारखी-तीन देव जब ऊपजे, ब्रह्मा विष्णु महेश ॥ कर जोरे स्तुति करें, तैं अब कहौं संदेश ॥ आज्ञा कह मोहि माता, सोइ कहौं समुझाइ ॥ सोई करब हम निहचै, बोले तीनौ राइ ॥
ब्रह्मा करहु तुम सृष्टि उरेहा । जात जीव धरैं सब देहा ॥ कैसे करहि सो युक्ति बतावहु । क्रिया करहु जनिमोहि दुरावहु ॥ सतगुन पहिले भयो उत्पानी । तैंतिस कोटी देव बखानी ॥ रजगुन तमगुन अंड जो भयऊ । दैत्य अनेक तबहि निरमयऊ ॥ दैत्य देव सों होय संग्रामा । जो मैं कहौं करब सो कामा ॥ जाय खनावहु सागर साता । जातैं दैत्य न करें उत्पाता ॥ सागर नीर करौ उत्पानी । जाते दैत्य गति रहै भुलानी ॥ रचौ सिन्धु जल होय अपारा । तब कहि हौं आगिल व्यौहारा ॥
ब्रह्माका समुद्र खुदवाना
( १८ )
ज्ञानसागर
चल्यो ब्रह्मा मातहिं सिरनाई । सोच रह्यो कस करब उपाई ॥ बहुतक जने परिश्रम कीन्हा । चलो प्रस्वेद सोइ पगु चीन्हा ॥ साठ सहस्र बुन्द अनुसारी । बुन्द प्रभाव सबै नख धारी ॥ नख धारिन स्तुति अनुसारा । कहा कैर सुन पिता हमारा ॥
ब्रह्मा वचन
साखी--खनहु सिन्धु मम वचन इम, मन्त्र कहौं समुझाय ॥ माटी उठे जु खनत महैं, ता कह घालिब खाय ॥
चौपाई
चतुर रूप कीन्हा तिन चारी । कहौं नार सबते अधिकारी ॥ रचा सिन्धु कछु लागिनबारा । सागर सात रच्यो विस्तारा ॥ सागर नीर जब भयो प्रकाशा । नख धारिन तब काल गरासा ॥ सागर रचि ब्रह्मा अनुरागा । अडसठ तीरथरचन तबलागा ॥
साखी-गङ्गा यमुना सरस्वती, गोदावरी समान ॥ रची नदी तब गंडकी, जहैं तहैं शिल उत पान ॥
चौपाई
सालिग्राम गंडक अंकूला । पांहन पूजत पंडित भूला ॥ और नर्मदा नदी गोदावरी । सोनभद्र पुनि करमनासावरी ॥ और अनेक रच्यो विस्तारा । जाते भूल पर्यो संसारा ॥ सिन्धु सम्हार गये देवी ठाऊं । चतुर मुख आन गहे तब पाऊं ॥ हे माता आज्ञा तुम मानी । रच्यो सिंधु तुव वचन प्रवानी ॥
भावानी वचन
मथौ सिन्धु सुत कहा हमारा । वहि में पैहौ कामिनि वारा ॥ तीनों जनै चले सिर नाई । मथन सिन्धु कस करब उपाई ॥ पर्वत आनि मथनियां कीन्हा । फनपति लेह फाहरी दोन्हा ॥ मथतहि सिन्धु मतो अस कान्हा । आपन अँश उतपानहि लीन्हा ॥
भवानीकी आज्ञासे तीनों देवका छारे समुद्रको मंथन करना और उससे वेद आदिक प्रकट होना
ज्ञानसागर
( १९ )
अंश बारि महाँ पाये जबहीं । कन्या तीन उत्पन्न भई तबहीं॥ पाय कन्या तब भये आनन्दा । देवी पास चले तिय संगा ॥ ले कन्या तब आगे कीन्हा । कर जोरें प्रणाम मन दीन्हा ॥ सारखी-हे माता यह कन्या, पायो सिन्धु मझार ॥ जस कछु आज्ञा कीजिये, तस कछु करब विचार ॥
भवानी वचन चौपाई
कहे भवानि सुन ब्रह्म कुवॉरा । कामिन के तुम सदा भरतारा ॥ सावित्री ब्रह्मा कहैं दीन्हा । लक्ष्मी कृपा विष्णु पर कीन्हा ॥ पारवती रहि संकर पाँहीं । अटल अहिवात करचो भवमाहीं॥ पायो कामिनि भयो हुलासा । बहुरि विनय कियो देवी पास ॥ हे माता तुव आज्ञा सारा । जो कछु कहाँ सो करो विचारा ॥ कहे भवानी सुन ब्रह्म कुवॉरा । जाइ मथो अब सागर खारा ॥ पढ़ौ वस्तु सो आनहु जानी । अस कछु बोली आदि भवानी ॥ चले देव त्रिय लाग न वारा । मथयो सिन्धु करि हर्ष अपारा ॥ पाये वेद ब्रह्मा सो लीन्हा । विष्णु भाव सो हमहू चीन्हा ॥
सारखी-चार वेद ब्रह्मा लिया, अमृत विष्णु सम्हार ॥
मथे अनिल जो विष भया, सो लीन्हा त्रिपुरार ॥
चौपाई
यह चरित्र त्रय देव बनाया । यहि सुधि दैत्य सुने जब पाया ॥ आइ कीन्ह सब बाद विवादा । पायहु वस्तु देहु मोहिं आधा ॥ वेद अनिल विष सब तुम लेहू । सुधा आहि सो हम कहैं देहु ॥ कहैं विष्णु सुन दैत्य अधीरा । सदा खाइकर विपति शरीरा ॥ दोनो मिल अस कीन्ह विचारा । सब मिल खईये अमृत सारा ॥ दोई पांति बैठे भल जोरी । दैत्य देव तैंतीस करोरी ॥ विष्णु चरित काहू नहिं जाना । बाँटत अमृत छल जो ठाना ॥
चार खानिकी उत्पत्ति
( २० )
ज्ञानसागर
साखी-देवन अमृत पानयो, काहु न कीन्ह प्रसाद ॥ बांटत राहु तब ग्रस्यो, चन्द्र भानु कियो वाद ॥
चौपाई
जब सब मिलिकै आयसु पाई । सभा बैठ कैसे कै खाई ॥ सुनकै विष्णु क्रोध तब कीन्हा । चक्र मार राहु सिर छीना ॥ अमृत परचो ताहि के पेटा । शीश के राहु देह सो केता ॥ भयो युद्ध दोनों दल भारी । बहुत दिन लरे जो बैर सम्हारी ॥ चन्द्र भानु जो राहु सुरावा । आसै जान बैर को भावा ॥ यह चरित भयो सागर तीरा । देवी पास चले त्रय वीरा ॥ तब देवी अस मतौ विचारा । रचहुँ सृष्टिजग होइ उजियारा ॥ अंडज माता किया उत्पानी । पिंडज भाव ब्रह्मा को जानी ॥ उष्मज विष्णु कीन्ह व्यवहारा । शिव कीन्हौ रोम अठासी धारा ॥ लख चौरासी योनिन कीन्हा । आधा जल आधा थल दीन्हा ॥
साखी-जलके जीव पताल सब, औ पृथ्वी परचंड ॥ रचो अहार शंभू सबै, वनस्पती को अंग ॥
चौपाई
स्थावर मदेश जो कीन्हा । उष्मज दोइ तत्त्व कर चीन्हा ॥ तीन तत्त्व अंडज मैं दीन्हा । चार तत्त्व पिंडज को कीन्हा ॥ मुक्ति क्षेत्र नर कौ अवतारा । ता महँ पांच तत्त्व हैं सारा ॥ और जो इन में बरतै भाऊ । मनुष्य जन्म में प्रगट स्वभाऊ ॥ मनुष्य जन्म उत्तम सो होई । विना नाम पुनि जाइ बिगोई ॥ स्वासा सार तै वेद जो भएऊ । सो पुनि मीन पास ले धरेऊ ॥ एकहि सुरति तब ब्रह्मा पावा । तेहि पढिबे का मन चितलावा ॥ वेद पढ़त बूझ अस परेऊ । पृथ्वी आकाश जोत अनुसरेऊ ॥
साखी-निराकार निरंजन, सृष्टि कीन्ह उत्पान ॥ मैं जानौ भल मरेंम अब, नहि कीन्हौ आदि भवान ॥
ब्रह्माको वेद पढ़कर संदेह होना और माताकी आज्ञासे पिताकी खोजमें जाना
ज्ञानसागर
( २१ )
चौपाई
चले ब्रह्मा माता पर आये । दोई कर जोरिकै विनती लाये ॥ हे माता मैं पूछौं तोहीँ । जो पूछौं सो कहिये मोहीँ ॥ कौन पुरुष मुदि कीन्ह प्रकाशा । सो सब मातु कहौमोदि पास ॥ कहे भवनि सुतु ब्रह्म कुवौरा । पृथ्वी अकाश मैं अनुसारा ॥ मैं कीन्हा दुतिया नहिं कोऊ । तुम कस भूले सो कहु भेऊ ॥ हे माता मैं वेद विचारा । है कोई शून्यमें सिरजन हारा ॥ निरंकार निरञ्जन राया । ज्योतिअपार श्रुति गुणगाया ॥ साधु साधु कहि आदि भवानी । आदि पुरुष जेहि तैं उत्पानी ॥ कहाँ अहै सो मोहि बताओ । कृपा करो जिन मोहि डुराओ ॥
साखी—चरण सप्त पाताल हैं, सात स्वर्ग हैं माथ ॥
पुढूप लैकर परसौ, जामे होहु सनाथ ॥
चौपाई
चले ब्रह्मा मातहि शिर नाई । उत्तर पन्थ सुमेरुहि जाई ॥ जाइ ठाढ भये तिहिं अस्थाना । शून्य आद जहाँ शशि नहिं भाना ॥ बहु विधि स्तुति ब्रह्मा करई । ज्योति प्रभाव ध्यान अस धरई ॥ दुखित सुर्त जो भई तुम्हारी । स्तुति करत भये जुग चारी ॥ यहु विधि बहुत दिवस चलि गएऊ । आदि भवानी मन चित ठएऊ ॥ जेठा पुत्र जो ब्रह्म कुवौरा । कहाँ गयो वह पुत्र हमारा ॥
साखी—अब मैं करब उपाय सो, जिहि तैं ब्रह्मा आय ॥
गायत्री उत्पानऊ, ताहि कही ससुझाय ॥
चौपाई
ब्रह्मा गये पिता के ठाईँ । पिता दृश अजहूँ नहिं पाई ॥ बहुत दिवस भये बेग ले आवहु । बहुत भांति कर तिहि ससुझावहु ॥ चली गायत्री ब्रह्मा पास । तिनसौ जाइकर वचन प्रकाशा ॥