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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( १९० )

बोधसागर

ताको जरा मरन नहीं होई । परम तत्त्वमें रहे समोई ॥ योग जीत कहु ज्ञान अपारा । यह मार्ग है सत् विचारा ॥

सुकित वचन

सुकित कहैं सुनो गुरुज्ञानी । सुद्धा पंच तुम कही बखानी ॥ और कथा एक पूछो तोही । सो समुझाय कहु प्रभु मोही ॥ कायामाहे कमल जो होई । तेहि स्थान सुनावो सोई ॥ कौन कमलकै पखुरी जाना । कौन देव तहां कीन्हों थाना ॥ कौन कमलसों स्वासा आवै । कौन कमलमें जाय समावै ॥ कौन कमलसों होय गुंजारा । कौन कमलसों करे उचारा ॥ केतिक स्वासा आवै जाई । भिन्न भिन्न सब लेख बताई ॥

योग जीत वचन

हे सुकित मैं तुम्हैं लखाऊं । कमलनको प्रमान बताऊं ॥ प्रथमहि कमल चतुरदल कहिये । देवगणेश पुन तामों लहिये ॥ रिद्धसिद्ध जहाँ सत्क उपासा । तहाँ जा पूछै सो प्रकाशा ॥ षटदल कमल ब्रह्माको बासा । सावित्री तहाँ कीन्ह निवासा ॥ षटसहस्र तहाँ जाप बखाना । देवन सहित इन्द्र अस्थाना ॥ अष्टदलकमलहरिलक्ष्मी वासा । षटसहस्र तहाँ जाप निवासा ॥ द्वादश कमलमों शिवको जाना । षटहजार जाप बंधाना ॥ तहाँ शिव योग लगावैं तारी । पारवती संग सहित विचारी ॥ षोडश कमल जीव मन वासा । एक सहस्र जाप प्रकाशा ॥ त्रैदल कमल भारथी वासा । सोतो उज्ज्वल कमल निवासा ॥ एक सहस्र जाप तहाँ कीजै । यह संकल्प जाय तहाँ दीजै ॥ दोय दल कमल हंस अस्थाना । तामह परम हंसको जाना ॥ एक सहस्र जाप प्रकाशा । कर्म भ्रमको है तहाँ नाशा ॥ सहस्रदल कमलमों झिलमिल जाना । ज्योति सरूप तहाँ पहिचाना ॥ ताहै रंगहै अलख अपारा । अलख पुर्ष है सबते सारा ॥

पञ्चमुद्रा

( १९१ )

नवें कमल आदको जानो । जाते निरगुण पुर्ष बखानो ॥ एकइस हजार छैसे जाप कहिये । सो सब पुर्ष ध्यानमें लहिये ॥ अष्ट कमलको भेद बताई । और ज्ञान अब भाषो भाई ॥ स्वासाको प्रमाण अब भाषो । तेहि प्रभाव प्रकटकर राखों ॥ अब स्वासाको भेद बताऊँ । जाको मर्म कोई नहिं पाऊँ ॥ अभी अखण्डते वर्ये धारा । तहाँते स्वास होय गुंजारा ॥ निसवासरको जाने मूला । स्वासा सार शब्दसमूला ॥ दशयें घरते स्वासा आवै । कछु नाभी कछु अलख चढ़ावै ॥ निस दिन चले स्वासाकी धारा । सातसे आगर साठि हजार ॥ अभी कमल अमान सो नाला । अढ़ाई दल पखुरी रिसाला ॥ तहाँते चले पवनकी धारा । स्वासा माहे शब्द गुजारा ॥ उनचालिस हजार एकसे आवै । एतिक चिकुर द्वारसो धावै ॥ हृदे कमल होय स्वासा आवै । एकइस हजार और छैसे धावै ॥ एता जाप तहाँ प्रवाना । एकइस हजार और छैसे जाना ॥ एतिक स्वासा हृदे ले आवै । क्षिन् बाहिर क्षिन् भीतर धावै ॥ दुसरा कमल है झिलमिल माही । झलके जोत अथर धुन ताही ॥ सहस्र पखुरी कमल अनूपा । तहाँ बसे मन जीत सुरूपा ॥ ताहे कमल पर बाजा बाजै । सत्तर बाजा तहाँ बिराजै ॥ तहां घरनी घरियार बजावै । घरी घरी टंकोरा लावै ॥ छैसे औ पचहत्तर स्वासा । एतिक एक घरी प्रकाशा ॥ एतिक स्वासा कमत युगमाही । तब घरनी घरियार बजाही ॥ या विधि चार टंकोरा ठोकै । राहु केतु संग व्यालि न रोकै ॥ पहर एक करे धुन पूरा । ग्रहण गिरासे शशि औ सूर ॥ गहन गिरा सत निसरे स्वासा । रवि शशि राहु केतु प्रकाशा ॥ तेहि संग एक सापनी रहई । घरीघरी वह जीवको गहई ॥ श्वासा सोरह ग्रहण लगावै । छटे मास तेहि काल सतावै ॥

( १९२ )

बोधसागर

स्वासा परख घरीकी राखे । जो दम चले सो आगम भावै ॥ सत्ताइससो स्वासा चले जबही । पहर टंकारा मारे तबही ॥ एतिक स्वासा पहर प्रवानी । घरी चारमों गजर बन्धानी ॥ आठ पहर छ घरी बजावै । ठोके गजर गहर नहिं लावै ॥ चार घरी चारो युग मूला । चार पहर चारो अस्थूला ॥ चारो युग एक पहरके माही । चारो युगकी वतैं छाही ॥ प्रथम पहर सतयुग प्रवाना । ताकर प्रथम घरी बंधाना ॥ सतयुगमें युग चार अपारा । चारो युगके नाम निनारा ॥ प्रथमह सतयुग रोपो थाना । चारो युग तेहि माहि समाना ॥ सतयुग प्रथमहि घरी उतपानी । किलक नामयुग ताहि बखानी ॥ किलक जगकी स्वासा सारा । छैसे पचहत्तर स्वास सुधारा ॥ एतिकस्वासाकिलक युगमाहीं । पूछै जीव अच्छेकी छाहीं ॥ वीतत घरी गजर घहराई । काल टंकोरा मारे धाई ॥ या युग अन्तकी आवे घरी । आसे नागिन सनमुख खड़ी ॥ प्रथम किलकयुग होय संधारा । पीछे कमतयुग करे पसारा ॥ सतयुग घरी दूसरी आवै । तैतिक स्वासा कमत युग पावै ॥ जवे कमत युगकरे हंकारा । उतपत थोरी बहुत संधारा ॥ कमत युगकी स्वासा जानो । छैसे पचहत्तर स्वासा बखानो ॥ एतिक स्वासा कमत युग माही । गुण औगुण सब निखैं ताही ॥ बीते कमत कमोद युग आवै । तीसरी घरी बासना धावै ॥ आवांगवन विचारे जोई । युग कमोद सुख पावे सोई ॥ तिसरी घरी कमोदकी आवै । तब कमोद युग सुख दिखरावै ॥ युग कमोद अमल जब आवै । दुखी सुखी नर सब सुख पावै ॥ युग कमोदकी प्रलै होई । दुखी सुखी जाने सब कोई ॥ तबही होय सूर संचारा । महाविरोध उपजे संसारा ॥

पञ्चमुद्रा

( १९३ )

चन्द सनेह होय जो हीना । महासूल तन होय मलीना ॥ श्वासा घरी सातसे भारी । युगकमोदकी कथा निनारी ॥ युगकंकवत होय पैसारा । चौथी घरी कोध अधिकारा ॥ ताकी घरी निकट जब आवै । सतयुग अंत कंकवत पावै ॥ सतयुग अंत होन नहि पावै । युग कंकवत आन समावै ॥ युगकंकवत काल दुखदाई । काया कहर गिरासे आई ॥ युगकंकवत कालकी वाजी । कलह विकार सब जगमों साजी ॥ युगकंकवत महाबल योधा । अंतकाल सतयुगसों कोधा ॥ सतयुगअंत कंकवत माही । अंतकालकी व्यापे छाहीं ॥ युगकंकवत मोहकी छाहीं । काम कोध ममता लपटाहीं ॥ अंतकाल सतयुगके भयऊ । चारो युग परले तर गयऊ ॥ चारों युगका भेद बतावा । अगम निगम सब भाष सुनावा ॥

साखी—एके युगके बीतते, चारों गये बिनास ।

एक नाद चारों युग खायो, सतयुग कीन्हो ग्रास ॥

किलक कमोद चंदके नेहा । कमत कंकवत सूर सनेहा ॥ भये युग अंत एक संगचारी । चार शब्द एक नाद सँघारी ॥ एक नाद एक पहर कहावै । चार घरी एक माहि समावै ॥ चार घरी चारों युग बीतै । शब्द नाद रवि शशिघर जीतै ॥ सतयुगको तब भयो बिनाशा । त्रेतायुगको भयो प्रकाशा ॥ दूसर युग तब भौ विश्वासा । दूसर पहर तत्त्व प्रकाशा ॥ तेज लगन श्वासा अनुसारी । ताते त्रेतायुग संचारी ॥ त्रेता युगकी पखुरी चारी । चार घरी युग चार बिचारी ॥ जस युगअंत सतयुगमों देखा । सोई युग त्रेतामों लेखा ॥ जब जब अंत होय युग केरा । तब तब नादकाल घन घोरा ॥

नं. ८ कबीरसागर - ७

( १२४ )

बोधसागर

त्रेता युगमें कलह अपारा । यज्ञ दान व्रत नेम अचारा ॥ तेहि पीछे द्वापर युग आवा । काल अंत तंब आन समावा ॥ अहंकार तामें अति भाखा । अब कलयुगकी वर्णों साखा ॥ काम क्रोध और पाप अपारा । लोभ मोह यम कीन्ह पसारा ॥ एक पहर चारों युग जाना । ताको वर्ण कहों बिछलाना ॥ पांच तत्त्व तीनों गुण कहिये । ताते पिंडकी उत्पत्ति लहिये ॥ अष्टधात कहिये अस्थूला । ताते रचो गर्भको मूला ॥ शिवकी खासा वायु सरूपा । सत्ती गहे जानके रूपा ॥ शिवको रूप शक्ति गहि लेई । तब सांचा मो जावन देई ॥ जावन जगे तब सांचा माहीं । थाका होय रुधिरके ताहीं ॥ तेहि थाकाकी रचना भारी । तीन लोककी विभो सवारी ॥ महल मध्य पुनि जीव समावा । जलके भीतर महल बनावा ॥ महलके माहिं बनाये छप्पा । तामो दश कीन्हों दरवप्पा ॥ सांचा अत्र जरे नहिं कबहीं । पिंड सवारो अन्तर जबहीं ॥ सांचा माहिं दियो रंग ढारी । नख सिख शोभा बहुत सवांगी ॥ तीनों लोक रचो पलमाहीं । गढ़पति अंश तब साजा ताहीं ॥ प्रथमहि सायेर सात सँवारा । पर्वत आठ कीन्ह अधिकारा ॥ अठारह गंडा नदी बहाई । तामह गुप्त बहै ठहराई ॥ अठारह सहस्र बनाये नारा । अष्टधातुले साज सुधारा ॥ रक्त हांडको सब अस्थूला । बाढ़े लिंग सवांरे मूला ॥ आगे रचो दोह भुज दंडा । सातद्वीप पृथ्वी नौखंडा ॥ बहुर सँवारो दोय पग खंभा । मदन महाबल उपजो रंभा ॥ नासा चढाय मस्तक पर लाई । सातभैंवर नौनाट लगाई ॥ उत्तर मेर शिर जो अस्थूला । सरवर माहिं कमल बहु फूला ॥ नाभी माहिं दल चार बनाई । फूल फल बास घट छाई ॥

पञ्चमुद्रा

( १९५ )

आठो अंग रचो अस्थूला । शिव शक्ती दोनों समतूला ॥ सोई अंग शक्त सोइ ईसा । एकै रूप एक समदीसा ॥ नख सिख रचो गर्भस्थाना । सातद्वीप नौखंड बखाना ॥ प्रथमहि ब्रह्म द्वीप निरमावा । ताऊपर बहु रचना लावा ॥ एकद्वीप नौखंड बनाई । त्रिकुटी सात तहां निखाई ॥ एकद्वीपमहैं सातो नाला । सातोनाल सात हैं चाला ॥ सरवर सात कमल है साता । रंग पांच पांचौ उत्पाता ॥ त्रिकुटी मध्य एकहै कीला । तहां देखिये रंगरसीला ॥ ता कीलामह कानी लागी । पवन सनेह आत्मा जागी ॥ ता कीलामह लागी डोरी । खूटा लगा पवन झकझोरी ॥ झूले मन पवन झूलावै घेरी । एक घर शून्य एक घर फेरी ॥ खूटा होयके पवन झकोरी । इंगला पिंगला सुखमण जोरी ॥ रविशशि पवन गहे मन जोरी । खूटा लाग पवनकी डोरी ॥ मेरे डंडपर खूटा गाड़ा । नदी तीन ताऊपर बाड़ा ॥ खूटातरे नदीत्रिय बहई । तीननदी बिच खूटा रहई ॥ खूटाके दहिने दिश गंगा । अति शीतल बहै नीर तरंगा ॥ सूरसनेह नीर हिय पसैं । सुर्तसनेह धनी तहैं दसैं ॥ खूटाके है बांये अंगा । यमुना नदी बहे अतिरंगा ॥ सुखमन सरस्वती नीर तरंगा । लहर लालच तेज विष अंगा ॥ तहां बसे सरयू तेहि साथा । रावल एक बयालिस हाथा ॥ काल अनन्त रूप रस नाथा । बसे अघर दीखे नहिं माथा ॥ बाढी नदी दोइ विकरारा । शीतल तेज बहे दोउ अधारा ॥ तिसरी नदी गुप्त पर्वाहा । अविगत जल बहेअगमअथाहा ॥ खूटा तरे होय नदी सिधारा । चली सरस्वती फोरि पहारारा ॥ मध्य लहर रस विषके खानी । गंगा यमुना बीच समानी ॥

( १९६ )

बोधसागर

त्रिकुटी संगम भयो मिलाना । भवर गुफा माधो करथाना ॥ त्रिवेणी तट बसे सुठंगा । ताको मम लखा परसंगा ॥ गणगंधर्व मुनि सब कर थाना । सुर नर मुनि कर बैठे ध्याना ॥ तैतिस कोट देव मुनि भारी । यक्ष यक्षणी देव कुमारी ॥ नागसुता अपसरा मोहिनी । चढ़ बिमान सब फिरे जोहिनी ॥ असुरपिशाचऋषनागजोलाहल । त्रिवेणीतट करे कोलाहल ॥ तीनलोक जौ जीव निवासा । सो सब करो त्रिवेणी बासा ॥ त्रिवेणी तट माधौ देवा । सब मिल करे तासुकी सेवा ॥ ताहि प्राग होय चलो प्रवाहा । गंगासागर संगम जाहा ॥ देश देश गंगा फिर आई । घाट घाट बहु क्षेत्र बँधाई ॥ जहां तहां तप ध्यान लगावै । योग यज्ञ तप बहुत करावै ॥ ऋतुवसंत प्रागको धावै । मकर नहाय बजार लगावै ॥ अर्ध उर्ध बिच लागी हाटा । भीतर बाहर औघट घाटा ॥ गर्भमाहि सब युक्ति बनाई । तीन कचहरी तहां लगाई ॥ जहां नदी संगम पर्वाना । तहवां रचो एक अस्थाना ॥ संगम बीच गुफा एकधारा । ताहि गुफामों सात है द्वारा ॥ एकद्वार होय नाद सूधारै । एकद्वार होय रूप निहारै ॥ एकद्वार होय वास बसावै । एकद्वार होय अग्नि समावै ॥ एकद्वार हो स्वाद लिवावै । एकद्वार होय न्याय चुकावै ॥ एकद्वार होय नाद उचारा । योग जीव यह मता विचारा ॥ सातनाल चौदह सुरभाऊ । सातोंके हैं एक सुभाऊ ॥ सातो सात शून्य मों बासा । सातो बसे गुफाके पास ॥ अनहद भेद श्वासाकी धारा । ताको भाषतहों व्यवहारा ॥

साखी-रचना भाषेउ पिंडकी, श्वासा सहित विचार । विरलाजन कोई परखि है, अलखरूप व्यवहार ॥

पञ्चसुत्रा

( १२७ )

सुक्ति वचन-चौपाई

सुक्ति कह सुन सत्यगुरु ज्ञानी । अगम कथा कही अन्तर्यामी ॥ और कथा अब मोसों भाषों । जो पूछों सो गोय न राषों ॥ हंस अवधको भेद बतावो । तास मर्म सब मोहि सुनावो ॥ आगम वरष मासषट जानो । तो कछु अपने निजमत ठानो ॥ ताको भेद कहीं समुझाई । सो मोहि सतगुरु भेद लखाई ॥

योगजीत वचन

सुक्ति सुनो सत् मम बानी । भिन्न भिन्न मैं कहीं बखानी ॥ पांचवरी वांये सुर पाई । सोई दहिनो श्वासा चलाई ॥ दशश्वासा सुखमन जो कहिये । ताको भेद बराबर लहिये ॥ आठ पहर पिगला सुर हालै । बरष तीसरे हंसा चालै ॥ आठ दिवस दहिनो सुर बहै । हंसा अवध वर्ष दौय रहै ॥ सोरह दिन पिगला सुर बोले । वर्ष एक मो हंसा डोलै ॥ वीस रैयन दिन दहिनौ पाई । तब षट मासमें हंस चलाई ॥ एकति सरोज दक्षस्वरको जानो । तब दौय दिनमें हंस पयानो ॥ पांचवरी सुखमन जो हालै । पांचवरी मो हंसा चालै ॥ चन्द सुर सुषमन छपजाई । सुखसे तीजो पवन चलाई ॥ ऐसी विधि पवन चलाई । पहर माहिं हंसा चल जाई ॥

साखी-धूम मंडल दीखे नहीं, जोत न नेत्र लखाय ।

छठे मास हंसा चले, बचै न कोट उपाय ॥

छाया शीस दीखे नहीं, भुजा शिखर ना दिखाय ।

दीप बास आवै नहीं, छठे मास चल जाय ॥

गगन शब्द गरजे नहीं, नेत्र गुञ्ज छपजाय ।

मास एकके अवधमें, हंसा तन तज जाय ॥

भैवरगुफा तिल ना लखे, पुतरी जब चढ़जाय ।

पहर एकमें जानिये, हंसा तन तज जाय ॥

( १८८ )

बोधसागर

पृथी जीव गृहे कहौं प्रकाशा । गुदा द्वारमें कीन्हो वासा ॥ पानी हंसको गृहे बताई । ललाट अथरमें बैठक पाई ॥ तेज चेतनको धाम बताई । पीत चक्षुके द्वार रखाई ॥ निरालंभ बायेको थाना । नाभी नाशिक द्वार समाना ॥ आकाश निरंजनको प्रकाशा । श्रवण द्वार ब्रह्मांड है वासा ॥ पांचोंके गृह वर्ण सुनाई । रंग अहार कहौं समुझाई ॥ पृथ्वी पीतवर्ण उच्चार । सो तो जीवको कहौं अहारा ॥ पानी श्वेतवर्ण है भाई । सो तो अहार हंसको आई ॥ तेजको रक्तवर्ण पहिचाना । सो तो अहार चेतन को जाना ॥ बायेको सवुजवर्ण है भाई । निरालंबको भक्षण आई ॥ अकाश नीलवर्ण पहिचानी । निरंजनको अहारसो जानी ॥ रंग अहार कहेउ समुझाई । पृथ्वी पंचके नीर बुझाई ॥ पृथ्वी नीर पुत्र है भाई । हाड पृथ्वीको बिंद कहाई ॥ नीर पृथीको श्रोणित अंशा । पसीना त्वचा पृथीको वंशा ॥ रोम पृथीको वंश कहाई । पृथी नीरको भेद लखाई ॥ पृथी विमल गुण कहिये भाई । अब पृथी गन वर्ण बताई ॥ तेज तमोगुणको पहिचाना । बाये गन्धगुण लखो सुजाना ॥ अकाशअलखगुण जानहु भाई । पांचोंके गुणवर्ण सुनाई ॥ अब प्रकीत पचीस बताऊँ । पाचों तत्त्व विभाग लखाऊँ ॥ हाड चाम मास रोम लखाई । नाटिका पृथी प्रकृत बताई ॥ रक्त पित्त कफ स्वाद बखाना । स्नारप्रकृतजलतत्त्वको जाना ॥ भूखप्यास मुख प्रभा जम्हानो । आलस निद्रा तेज पहिचानो ॥ धावन कूदन बलकर भाई । परसन सकुचन पवन बताई ॥ लोभ मोह हंकार भै जाना । बिंद अकाश प्रकृत बखाना ॥ पांच पचीस अंग कहि दीन्हौं । तासु मर्म कोइ बिरले चीन्हौं ॥

पञ्चमुद्रा

( १८९ )

प्रथमहि जीवरूप पहिचानो । प्रथमै ताके चेला जानो ॥ औ पुन हंसरूप है भाई । पानी चेला तास बताई ॥ चेतनरूप गुरु है सोई । चेला तेज तासुको होई ॥ निरालंब गुरु पहिचानो । वाय तासको चेला जानो ॥ अलख निरंजन गुरु बखाना । चेला आकाश तासको जाना ॥ गुरु शिष्यको भेद बताई । अब तत्त्वनकी परष लखाई ॥

छंद-चौकोर मंद और शुद्धपुरी धरनी है सोई ।

नीचे शीतल मंद चले जलको तत होई ॥ तेज तत्त्व जो ऊंच आगमनकी आइसु होई । दहिने बांये चले बाँये तत्त्व जानो सोई ॥ सबुजके मध्य सुखमना पवन गगनको जानिये । आकाश नाम तासों कहि पांचों तत्त्व बखानिये ॥ नाभी गंध समान पवनको अंश बखानो । हृदे माही प्राण अगिनको अंश सो जानो ॥ कंठ बसे आपान अंश तेहि जलको जानो । गगन बसे उद्यान अंश आकाश बखानो ॥ सब देहीमें ब्यान है अंश पृथ्वीको जानिये । पंच प्राण ये जानिये अंशहीते पहिचानिये ॥

चौपाई

पंचप्राणकी संघ लखाई । अब उनमुनिको भेद बताई ॥ मुद्रापांच प्रकट मैं भाषा । तामहि श्रेष्ठ उनमुनि राखा ॥ चारोंके परे उनमुनि कहिये । अलखरूप पुनि तामों ल्हिये ॥ सोई ब्रह्मज्ञान कहलावै । धरे ध्यान तहां अमृत पावै ॥ पावे साध अमीरस पीवै । सो योगी जग युगयुग जीवै ॥ ना फिर आवै ना फिर जाई । अखंड मंडलमें रहे समाई ॥

( १९० )

बोधसागर

ताको जरा मरन नहिं होई । परम तत्त्वमें रहे समोई ॥ योग जीत कहु ज्ञान अपारा । यह मार्ग है सत् विचारा ॥

सुक्ति वचन

सुक्ति कहैं सुनो गुरुज्ञानी । सुद्रा पंच तुम कही बखानी ॥ और कथा एक पूछो तोही । सो समुझाय कहो प्रभु मोही ॥ कायामाहे कमल जो होई । तेहि स्थान सुनावो सोई ॥ कौन कमलकै पखुरी जाना । कौन देव तहाँ कीन्हों थाना ॥ कौन कमलसों स्वासा आवै । कौन कमलमें जाय समावै ॥ कौन कमलसों होय गुजारा । कौन कमलसों करे उचारा ॥ केतिक स्वासा आवे जाई । भिन्न भिन्न सब लेख बताई ॥

योग जीत वचन

हे सुक्ति मैं तुम्हैं लखाऊं । कमलनको प्रमान बताऊं ॥ प्रथमहि कमल चतुरदल कहिये । देवगणेश पुन तामों लहिये ॥ रिद्धसिद्ध जहाँ सत् उपासा । तहाँ जा पूछै सो प्रकाशा ॥ षटदल कमल ब्रह्माको बासा । सावित्री तहाँ कीन्ह निवासा ॥ षटसहस्र तहाँ जाप बखाना । देवन सहित इंद्र अस्थाना ॥ अष्टदलकमलहरिलक्ष्मी वासा । षटसहस्र तहाँ जाप निवासा ॥ द्वादश कमलमें शिवको जाना । षटहजार जाप बंधाना ॥ तहाँ शिव योग लगावैं तारी । पारवती संग सहित विचारी ॥ षोडश कमल जीव मन वासा । एक सहस्र जाप प्रकाशा ॥ त्रैदल कमल भारथी वासा । सोतो उज्ज्वल कमल निवासा ॥ एक सहस्र जाप तहाँ कीजे । यह संकल्प जाय तहाँ दीजे ॥ दोय दल कमल हंस अस्थाना । तामह परम हंसको जाना ॥ एक सहस्र जाप प्रकाशा । कर्म भ्रमको है तहाँ नाशा ॥ सहस्रदलकमलमें झिलमिल जाना । ज्योति सरूप तहाँ पहिचाना ॥ ताहै रंगहै अलख अपारा । अलख पुर्ण है सबते सारा ॥

पञ्चमुद्रा

( १९१ )

नवै कमल आदको जानो । जाते निरगुण पुर्ष बखानो ॥ एकइस हजार छैसे जाप कहिये । सो सब पुर्ष ध्यानमें लहिये ॥ अष्ट कमलको भेद बताई । और ज्ञान अब भाषो भाई ॥ स्वासाको प्रमाण अब भाषो । तेहि प्रभाव प्रकटकर राखों ॥ अब स्वासाको भेद बताऊँ । जाको मर्म कोई नहीं पाऊँ ॥ अमी अखण्डते वर्ष धारा । तहाँते स्वास होय गुंजारा ॥ निसवासरको जाने मूला । स्वासा सार शब्दसमूला ॥ दशयै घरते स्वासा आवै । कछु नाभी कछु अलख चढ़ावै ॥ निस दिन चले स्वासाकी धारा । सातसे आगर साठि हजारा ॥ अमी कमल अमान सो नाला । अढ़ाई दल पखुरी रिसाला ॥ तहाँते चले पवनकी धारा । स्वासा माहे शब्द गुजारा ॥ उनचालिस हजार एकसे आवै । एतिक चिकुर द्वारसो धावै ॥ ह्दे कमल होय स्वासा आवै । एकइस हजार और छैसे धावै ॥ एता जाप तहाँ प्रवाना । एकइस हजार और छैसे जाना ॥ एतिक स्वासा ह्दे ले आवै । क्षिन बाहिर क्षिन भीतर धावै ॥ दुसरा कमल है झिलमिल माही । झलके जोत अधर धुन ताही ॥ सहस्र पखुरी कमल अन्ना । तहाँ बसे मन जीत सरूपा ॥ ताहे कमल पर बाजा बाजै । सत्तर बाजा तहाँ विराजै ॥ तहाँ घरनी घरियार बजावे । घरी घरी टंकोरा लावै ॥ छैसे औ पचहत्तर स्वासा । एतिक एक घरी प्रकाशा ॥ एतिक स्वासा कमत युगमाही । तब घरनी घरियार बजाही ॥ या विधि चार टँकोरा ठोकै । राहु केतु संग ब्यालि न रोकै ॥ पहर एक करे धुन पूरा । गृहण गिरासे शशि औ सूरा ॥ गहन गिरा सत निसरे स्वासा । रवि शशि राहु केतु प्रकाशा ॥ तेहि संग एक सापनी रहई । घरीघरी वह जीवको गहई ॥ श्वासा सोरह ग्रहण लगावै । छटे मास तेहि काल सतावै ॥

( १९२ )

बोधसागर

स्वासा परख घरीकी राखे । जो दम चले सो आगम भावै॥ सत्ताइससो स्वासा चले जबही । पहर टंकारा मारे तबही ॥ एतिक स्वासा पहर प्रवानी । घरी चारमों गजर बन्धानी ॥ आठ पहर छ घरी बजावै । ठोके गजर गहर नहिं लावै ॥ चार घरी चारो युग मूला । चार पहर चारो अस्थूला ॥ चारो युग एक पहरके माही । चारो युगकी वतें छाही ॥ प्रथम पहर सतयुग प्रवाना । ताकर प्रथम घरी बंधाना ॥ सतयुगमें युग चार अपारा । चारो युगके नाम निनारा ॥ प्रथमह सतयुग रोपो थाना । चारो युग तेहि माहि समाना ॥ सतयुग प्रथमहि घरी उत्पानी । किलक नामयुग ताहि बखानी ॥ किलक जगकी स्वासा सारा । छैसे पचहत्तर स्वास सुधारा ॥ एतिकस्वासाकिलक युगमाहीं । पूछै जीव अछैकी छाहीं ॥ वीतत घरी गजर घहराई । काल टंकोरा मारे धाई ॥ या युग अन्तकी आवे घरी । ग्रासे नागिन सनमुख खड़ी ॥ प्रथम किलकयुग होय संघारा । पीछे कमतयुग करे पसारा ॥ सतयुग घरी दूसरी आवै । तैतिक स्वासा कमत युग पावै ॥ जवे कमत युगकरे हंकारा । उत्पत थोरी बहुत संघारा ॥ कमत युगकी स्वासा जानो । छैसे पचहत्तर स्वासा बखानो ॥ एतिक स्वासा कमत युग माही । गुण औगुण सब निखें ताही ॥ बीते कमत कमोद युग आवै । तीसरी घरी बासना धावै ॥ आवागवन विचारे जोई । युग कमोद सुख पावे सोई ॥ तिसरी घरी कमोदकी आवै । तब कमोद युग सुख दिखरावै ॥ युग कमोद अमल जब आवै । दुखी सुखी नर सब सुख पावै ॥ युग कमोदकी प्रलै होई । दुखी सुखी जाने सब कोई ॥ तबही होय सूर संचारा । महाविरोध उपजे संसारा ॥

पञ्चसुत्रा

( १५३ )

चन्द सनेह होय जो हीना । महासूल तन होय मलीना ॥ धासा घरी सातसे भारी । युगकमोदकी कथा निनारी ॥ युगकंकवत होय पैसारा । चौथी घरी कोध अधिकारा ॥ ताकी घरी निकट जब आवै । सतयुग अंत कंकवत पावै ॥ सतयुग अंत होन नहिं पावै । युग कंकवत आन समावै ॥ युगकंकवत काल दुखदाई । काया कहर गिरासे आई ॥ युगकंकवत कालकी बाजी । कलह विकार सब जगमों साजी ॥ युगकंकवत महाबल योधा । अंतकाल सतयुगसों क्रोधा ॥ सतयुगअंत कंकवत माहीं । अंतकालकी व्यापे छाहीं ॥ युगकंकवत मोहकी छाहीं । काम कोध ममता लपटाहीं ॥ अंतकाल सतयुगके भयऊ । चारो युग परले तर गयऊ ॥ चारों युगका भेद बतावा । अगम निगम सब भाष सुनावा ॥

साखी—एके युगके बीतते, चारों गये विनास ।

एक नाद चारों युग खायो, सतयुग कीन्हो ग्रास ॥

किलक कमोद चंदके नेहा । कमत कंकवत सूर सनेहा ॥ भये युग अंत एक संगचारी । चार शब्द एक नाद सँघारी ॥ एक नाद एक पहर कहावै । चार घरी एक माहि समावै ॥ चार घरी चारों युग बीतै । शब्द नाद रवि शशिघर जीतै ॥ सतयुगको तब भयो विनाशा । त्रेतायुगको भयो प्रकाशा ॥ दूसर युग तब भौ विश्वासा । दूसर पहर तत्त्व प्रकाशा ॥ तेज लगन श्वासा अनुसारी । ताते त्रेतायुग संचारी ॥ त्रेता युगकी पखुरी चारी । चार घरी युग चार विचारी ॥ जस युगअंत सतयुगमों देखा । सोई युग त्रेतामों लेखा ॥ जब जब अंत होय युग केरा । तब तब नादकाल घन घोरा ॥

नं. ८ कबीरसागर - ७

( १९४ )

बोधसागर

त्रेता युगमें कलह अपारा । यज्ञ दान व्रत नेम अचारा ॥ तेहि पीछे द्वापर युग आवा । काल अंत तब आन समावा ॥ अहंकार तामें अति भाखा । अब कलयुगकी वणों साखा ॥ काम क्रोध और पाप अपारा । लोभ मोह यम कीन्ह पसारा ॥ एक पहर चारों युग जाना । ताको वर्ण कहों बिछलाना ॥ पांच तत्त्व तीनों गुण कहिये । ताते पिंडकी उत्पति लहिये ॥ अष्टधात कहिये अस्थूला । ताते रचो गर्भको मूला ॥ शिवकी श्वासा वायु सरूपा । सक्ती गहे जानके रूपा ॥ शिवको रूप शक्ति गहि लेई । तब सांचा मो जावन देई ॥ जावन जगे तब सांचा माहीं । थाका होय रुधिरके ताहीं ॥ तेहि थाकाकी रचना भारी । तीन लोककी विभो सवारी ॥ महल मध्य पुनि जीव समावा । जलके भीतर महल बनावा ॥ महलके माहिं बनाये छजा । तामो दश कीन्हों दरवजा ॥ सांचा अन्न जरे नहिं कबहीं । पिंड सवारो अन्तर जबहीं ॥ सांचा माहिं दियो रंग ढारी । नख सिख शोभा बहुत सवांगी ॥ तीनों लोक रचो पलमाहीं । गढ़पति अंश तब साजा ताहीं ॥ प्रथमहि सायेर सात सँवारा । पर्वत आठ कीन्ह अधिकारा ॥ अठारह गंडा नदी बहाई । तामह गुप्त बहे ठहराई ॥ अठारह सहस्र बनाये नारा । अष्टधातुले साज सुधारा ॥ रक्त हांडको सब अस्थूला । बाढ़े लिंग सवांरे मूला ॥ आगे रचो दोह भुज देडा । सातद्वीप पृथ्वी नौखंडा ॥ बहुर सँवारो दोय पग खंभा । मदन महाबल उपजो रंभा ॥ नासा चढाय मस्तक पर लाई । सातभैंवर नौनाट लगाई ॥ उत्तर मेर शिर जो अस्थूला । सरवर माहिं कमल बहु फूला ॥ नाभी माहिं दल चार बनाई । फूल फल बास घट छाई ॥

पञ्चमुद्रा

( १९५ )

आठो अंग रचो अस्थूला । शिव शक्ती दोनों समतूला ॥ सोई अंग शक्त सोह ईसा । एकै रूप एक समदीसा ॥ नख सिरख रचो गर्भस्थाना । सातद्वीप नौखंड बखाना ॥ प्रथमहि ब्रह्म द्वीप निरमावा । ताऊपर बहु रचना लावा ॥ एकद्वीप नौखंड बनाई । त्रिकुटी सात तहां निखाई ॥ एकद्वीपमहैं सातो नाला । सातोनाल सात हैं चाला ॥ सरवर सात कमल है साता । रंग पांच पांचौ उत्पाता ॥ त्रिकुटी मध्य एकहै कीला । तहां देखिये रंगरसीला ॥ ता कीलामह कानी लागी । पवन सनेह आत्मा जागी ॥ ता कीलामह लागी डोरी । खूटा लगा पवन झकझोरी ॥ झूले मन पवन झूलावै घेरी । एक घर झून्य एक घर फेरी ॥ खूटा होयके पवन झकोरी । इंगला पिंगला सुखमण जोरी ॥ रविशशि पवन गहे मन जोरी । खूटा लाग पवनकी डोरी ॥ मेरे डंडपर खूटा गाड़ा । नदी तीन ताऊपर बाड़ा ॥ खूटातरे नदीत्रिय बहई । तीननदी बिच खूटा रहई ॥ खूटाके दहिने दिश गंगा । अति शीतल बहे नीर तरंगा ॥ सूरसनेह नीर हिय पसैं । सुरतसनेह धनी तहैं दसैं ॥ खूटाके है बांये अंगा । यमुना नदी बहे अतिरंगा ॥ सुखमन सरस्वती नीर तरंगा । लहर लालच तेज विष अंगा ॥ तहां बसे सरयू तेहि साथ । रावल एक बयालिस हाथा ॥ काल अनन्त रूप रस नाथा । बसे अथर दीखे नहिं माथा ॥ बाढी नदी दोह विकरारा । शीतल तेज बहे दोउ अधारा ॥ तिसरी नदी गुप्त पर्वाहा । अविगत जल बहेअगमअथाहा ॥ खूटा तरे होय नदी सिधारा । चली सरस्वती फोरि पहारा ॥ मध्य लहर रस विषके खानी । गंगा यमुना बीच समानी ॥

( १९६ )

त्रिधसागर

त्रिकुटी संगम भयो मिलाना । भवर गुफा माधो करथाना ॥ त्रिवेणी तट बसे सुदंगा । ताको मम लखा परसंगा ॥ गणगंधर्व मुनि सब कर थाना । सुर नर मुनि कर बैठे ध्याना ॥ तैतिस कोट देव मुनि भारी । यक्ष यक्षणी देव कुमारी ॥ नागसुता अपसरा मोहिनी । चढ़ विमान सब फिरे जोहिनी ॥ असुरपिशाचऋषनागजोलाहल । त्रिवेणीतट करे कोलाहल ॥ तीनलोक जौ जीव निवासा । सो सब करो त्रिवेणी बासा ॥ त्रिवेणी तट माधौ देवा । सब मिल करे तासुकी सेवा ॥ ताहि प्राग होय चलो प्रवाहा । गंगासागर संगम जाहा ॥ देश देश गंगा फिर आई । घाट घाट बहु क्षेत्र बँधई ॥ जहां तहां तप ध्यान लगावै । योग यज्ञ तप बहुत करावै ॥ ऋतुबसंत प्रागको धावै । मकर नहाय बजार लगावै ॥ अर्ध उर्ध बिच लागी हाटा । भीतर बाहर औघट घाटा ॥ गर्भमाहि सब युक्ति बनाई । तीन कचहरी तहां लगाई ॥ जहां नदी संगम पर्वाना । तहवां रचो एक अस्थाना ॥ संगम बीच गुफा एकधारा । ताहि गुफामों सात है द्वारा ॥ एकद्वार होय नाद सूधारे । एकद्वार होय रूप निहारे ॥ एकद्वार होय वास बसावै । एकद्वार होय अग्नि समावै ॥ एकद्वार हो स्वाद लिवाने । एकद्वार होय न्याय चुकावै ॥ एकद्वार होय नाद उचारा । योग जीव यह मता विचारा ॥ सातनाल चौदह सुरभाऊ । सातोंके हैं एक सुभाऊ ॥ सातो सात शून्य में बासा । सातो बसे गुफाके पास ॥ अनहद भेद श्वासाकी धारा । ताको भाषतहों व्यवहारा ॥

साखी-रचना भाषेउ पिंडकी, श्वासा सहित विचार । बिरलाजन कोई परखि है, अलखरूप व्यवहार ॥

पञ्चसुदृढा

( १९७ )

सुक्ति वचन-चौपाई

सुक्ति कह सुन सत्यगुरु ज्ञानी । अगम कथा कहीं अन्तरयार्मी ॥ और कथा अब मोसों भाषों । जो पूछों सो गीय न राषों ॥ हंस अवधको भेद बतावो । तास मर्म सब मोहि सुनावो ॥ आगम वरष मासषट जानो । तो कछु अपने निजमत ठानो ॥ ताको भेद कहों समुझाई । सो मोहि सतगुरु भेद लखाई ॥

योगजीत वचन

सुक्ति सुनो सत् मम वानी । भिन्न भिन्न मैं कहों बखानी ॥ पाचघरी बांये सुर पाई । सोई दहिनो श्वासा चलाई ॥ दशश्वासा सुखमन जो कहिये । ताको भेद बराबर लहिये ॥ आठ पहर पिंगला सुर हालै । बरष तीसरे हंसा चालै ॥ आठ दिवस दहिनो सुर बहै । हंसा अवध वर्ष दोय रहै ॥ सोरह दिन पिंगला सुर बोले । वर्ष एक मो हंसा डोलै ॥ वीस रैयन दिन दहिनो पाई । तब षट मासमें हंस चलाई ॥ एकति सरोज दक्षस्वरको जानो । तब दोय दिनमें हंस पयानो ॥ पांचघरी सुखमन जो हालै । पांचघरी मो हंसा चालै ॥ चन्द सूर सुषमन छपजाई । सुखसे तीजो पवन चलाई ॥ ऐसी विधि पवन चलाई । पहर माहिं हंसा चल जाई ॥

साखी-धूम मंडल दीखे नहीं, जोत न नेत्र लखाय । छठे मास हंसा चले, बचै न कोट उपाय ॥ छाया शीस दीखे नहीं, भुजा शिखर ना दिखाय । दीप बास आवै नहीं, छठे मास चल जाय ॥ गगन शब्द गरजे नहीं, नेत्र गुञ्ज छपजाय । मास एकके अवधमें, हंसा तन तज जाय ॥ भैवरगुफा तिल ना लखे, पुतरी जब चढ़जाय । पहर एकमें जानिये, हंसा तन तज जाय ॥

( १९८ )

बोधसागर

सुक्रित वचन चौपाई

सुक्रित कहे सुनो गुरु ज्ञानी । आगम पचै सब हम जानी ॥ और एक पूछौं गुरु तोही । भिन्न भिन्नके भाखौ मोही ॥ जीव ब्रह्म कैसे प्रगटाई । सबके उत्पत्त देहु बताई ॥ ताकर भेद गोंय जिन राखो । सत्य सत्य सब मोसो भाखो ॥

कौतुक

कौन सो मन है कौन पवन है कौन शब्द है भाई । कौन प्रान है कौन हंस है कौन ब्रह्म ठहराई ॥ कौन काल है कौन जीव है कौन शून्य पहिचानी । कौन शिव है कौन निरंजन कहो सकल उत्पानी ॥

योगजीत वचन

चंचल मन है श्वास पवन है शब्द शून्य पहिचानी । प्राण निरंतर अखल ब्रह्म है सोहंग हंस बखानी ॥ कारण काल शून्य अविनाशी जीव कर्म पहिचानी । जीव शक्ति करतार निरंजन ऐसा भेद बखानी ॥

सुक्रित वचन

मन कहाँ रहे पवन कहाँ वासा शब्द वास कहैं कीन्ह । कहाँ प्रान कहैं ब्रह्म वास है हंस कहाँ है लीन्ह ॥ कारण काल केहि ठोर बसत है कहाँ शून्य ठहराई । जीव शीव निरंजन वासा सो मोहि देहु बताई ॥

योगजीत वचन

हृदे मन है नाभि पवन है अनहद शब्द को वासा । निरन्तर प्राण ब्रह्म ब्रह्मण्डे गगन हंस पर्काशा ॥ सकलमें काल शीव चंदामें शून्य निरूपम माही । सुखमन मध्य निरंजन वासा योगी देखे ताही ॥

पञ्चमुद्रा

( १९९ )

सुक्ति वचन

इन्द्री नाभी तब नाहीं स्वामी पवन कहा तब बासा । जादिन अनहद रूप नहीं तब शब्द कहाँ पकीशा ॥ ब्रह्मांड ना तो तब ब्रह्म कहाँ तो गगन नहीं कहाँ हंसा । निरूपम विना शून्य कहाँ कहिये भेद कहौं प्रकाशा ॥ आकार नहीं तब जीव कहाँ तो चन्द नहीं तब शीऊ । सुखमन नहीं तब कहाँ निरंजन ससुझाय कहो सब भेऊ ॥

योगजीत वचन

इंद्री विन मन हतो निरूपम निराकारमें प्रवना । अलख रूपमें शब्द बासतो अविगतिमें तब प्राना ॥ अविनाशीमें हंसबास तो शून्य कालमें बासा । ऊँकारमें काल बास तो ऐसा भेद प्रकाशा ॥ जीव शीवमें प्रथमो बासा शीव निरंजन माहीं । सबको बास प्रकट कर भाखों भेद कहैं तुम पाहीं ॥

सुक्ति वचन

कहाँते उत्पत भयो निरंजन कहाँ शीव उत्पानी । काल जीव कहाँते प्रकटो शून्य भयो केहि खानी ॥ कहाँते उत्पत भये अविनाशी कहाँते उत्पन हंसा । कहाँते उत्पन ब्रह्मभयो है प्राण भयो कह अंशा ॥ शब्द पवन मन कहाँते उत्पन कहाँते प्रकटो जीऊ । सबके उत्पन मोसों भाखों केहिबिधि प्रकटो शीऊ ॥

योगजीत वचन

आदि ब्रह्मते भयो निरंजन तहाँते प्रकटो शीऊ । तौन भेद तुमसों कहो सुक्ति शिवते उपजो जीऊ ॥ जीवते उत्पत काल भयो है कालते भयो ओँकारा । ओँकारते शून्य भयो है शून्यते जोत प्रकारा ॥