कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पञ्चमुद्रा
( २१५ )
निरगुन अंश लीन्ह हम जानी । ध्यान मंत्र प्रभु कहो बखानी ॥ आगे बिने करों बहु बारा । ताको भेद कहो निरधारा ॥ जीव मुक्तको भेद बताई । आपन करमो कह मुक्ताई ॥ विनती करो दोग्य कर जोरी । ध्यान मंत्रकी भाषों डोरी ॥ ताको मता धरोजिन गोई । मोसो वर्ण सुनावो सोई ॥
योगजीत वचन
सुक्ति सुनो भेद निर्वाना । जीवमुक्ताको कहों प्रमाना ॥ मंत्र ध्यानको बणों अंगा । ताको भाव कहों प्रसंगा ॥ आदि मंत्र मैं देहु बताई । जाके बल हंसा घर जाई ॥ सोई जाप अंतर लो लाई । अंतकाल ताको नहिं खाई ॥ ऐसा तुम्हे कहों उपदेशा । अंतर ध्यानको कहों संदेशा ॥ प्रथमहि जो सुख आसन लावै । राजस योग तब करे बतावै ॥ काया कष्ट न व्यापै कोई । राजस योग पुन कहिये सोई ॥ पांच पचीसकी सुतं बिसारै । अस्थिर बैठ ध्यान उचारै ॥ बैठ शून्य महलमों जाई । तबे निरंतर ध्यान लगाई ॥ प्रथम विरह वैराग समावै । रचना सकल तहाँ बिसरावै ॥ एक पुर्ष एक आपको जानै । द्वैत अकार शून्य पहिचानै ॥ तबही ध्यान समाध लगाई । जाकी सुतं अन्त नहिं जाई ॥ दहिनो अंग श्वास जब आवै । तबे ध्यान महाँ सुतं लगावै ॥ पिंगला अंग पुर्षको बासा । बाँये अंग शक्त प्रकाशा ॥ शक्त अंग कह देहु बचाई । दक्ष अंग वह सुतं लगाई ॥ प्रथम रूप सोहंग उचारा । तामों लखो पवनकी धारा ॥ तामहँ अर्ध पवन जो कहिये । सोहंगनाम पुन तामों लहिये ॥ प्रथम ध्यान धर देखे सोई । अंग अंग की पचै होई ॥
( २१६ )
बोधमागर
तास अंगमें देहु बताई । यह कौआय कहाँते आई ॥ सोतो पुर्पको अंश कहाई । भीतर वाहिर सिद्ध कराई ॥ पिंड ब्रह्माण्ड रहा भरपूरी । सोई निकट सोई है दूरी ॥ तब अजपाकी तारी लावै । विन जप हंसा तहाँ समावै ॥ श्वेतरूप श्वासा को रंगा । सुतं समानी ताको संगा ॥ सप्तपताल कोट ब्रह्मण्डा । सातद्वीप पृथ्वी नौखंडा ॥ सोई सबमें रहा समाई । सो जगको करतार कहाई ॥ एक संख छैलक्ष प्रमाना । इतना योजन लोक बखाना ॥ सोहंग नामको लोक प्रमाना । आगे पुर्प कहीं निर्बाना ॥ पदाराख गुप्तकर भाखो । अक्षरकाट गुप्तही राखो ॥ जेहिते जक्त लेखे नहीं कोई । गुप्त अंक कर भाषों सोई ॥ ताके आगे नाम बखानो । सोई नाम गुरुगमते जानो ॥ प्रकट नाम कर भाषो सोई । सुनके जीव तरे सब कोई ॥ अब मैं कहीं आगेकी बानी । गुप्त अंक गुरुगमते जानी ॥ प्रथमही सोहंग नाम बखानो । तामह बोहंग ब्रह्म समानो ॥ सोहंग मध्य कोहंग दर्शाई । सोतो अंश पुर्पको भाई ॥ दोय असंख दशनील बखाना । एता योजन लोक प्रमाना ॥ श्वेत अंग तिनहुको कहिये । सोहंग पार धामसो लहिये ॥ तिनके दर्श हंस जब पाई । कर प्रनाम तहैं शीस नवाई ॥ वोहंग नाम आसिका दीन्हा । बहुत भांति तिनदाया दीन्हा ॥ तबे हंसको लीन्ह बुलाई । लोक प्रमान सब दियो बताई ॥ तब उन डोरी दीन्ह लखाई । ता चदिहंसा लोक सिधाई ॥
सारखी-वोहंगको प्रनाम कर, तब डोरी गहि लीन । पुर्प नाम सुमिरत भयो, परे पयाना दीन्ह ॥
पञ्चमुद्रा
( २१७ )
तब आगेको कीन्ह पयाना । कोहंग नाम जहाँ अस्थाना ॥ कोहंग नामको देखा जबही । हंस प्रणाम कीन्ह पुन तबही ॥ दोयकर जोर सब अस्तुति कीन्हा । मस्तक हाथ पुर्ष तब दीन्हा ॥ तबही हंस बहुत हरषाना । पायो पूरन पद निर्वाना ॥ तीन असंख वटनील बखाना । एता योजन लोक प्रमाना ॥ श्वेत स्वरूप पुर्ष है सोई । श्वेतही वर्ण लोक वह होई ॥ तबै हंसको लीन्ह बुलाई । पाँजी लोकको दीन्ह बताई ॥ मक्रतार तब डोर लगाई । तब आगेकी संघ बताई ॥ हंस प्रनाम पुर्षको कीन्हा । तबही डोर हंस गहि लीन्हा ॥
साखी-बहुत भांति तिन पुर्षसों, हंसा कीन्ह प्रनाम ।
तब आगे गवनत भयो, जोहंग नामको भांम ॥
तब हंसा आगे चलजाई । जोहंग नाम तहाँ पुर्ष रहाई ॥ हंसा तहाँ पयाना दीन्हा । जोहंग नाम तहाँ बैठक कीन्हा ॥ तबही पुर्ष हंसतन हेरा । हंस प्रनाम कीन्ह तेहि बेरा ॥ तब पूरष दिलदाया कीन्हा । वचन आसिका हंसहि दीन्हा ॥ तब हंसा हिरदे हरषाई । हम पुरुषके दर्शन पाई ॥ चार असंख नौ पदुम प्रमाना । जोहंग नामके लोक बखाना ॥ श्वेत स्वरूप पुर्षकी काया । श्वेत वर्णसों लोक बनाया ॥ तबही पुर्ष हंस सँग लीन्हा । लोक दिखाय ताखुको दीन्हा ॥ ताके परे विहंगम डोरी । मुक्तके मारग जाय जिवसोरी ॥ सो हंसाको दीन्ह लखाई । ताचढ़ हंसा लोक सिधाई ॥ आगे आदि पुर्ष निर्वाना । तहाँको हंसा कीन्ह पयाना ॥
साखी-भांति अनेकन पुर्षसों, अस्तुत कीन्ह प्रनाम ।
आदिपुर्ष अवस्थानमों, हंसा कीन्ह पयान ॥
( २१८ )
बोधसागर
जबही हंसलोक नजिकाई । तबही देह हिरंमर पाई ॥ षोडश भान देह उजियारी । ऐसा रूप हंस तब धारी ॥ हंसा तबै तहाँ चल जाई । जक्षत पुर्ष तहाँ आप रहाई ॥ कमल अनंत परबूरी जानो । आदिपुर्ष जहाँ आसन ठानो ॥ पोहोप दीप तेहि नाम बखाना । सत्तपुर्ष कीन्हो अस्थाना ॥ सोई नाम निर्गम्य बखानी । अनंत नाम ताते प्रमानी ॥ ताको नाम हंस जो पाई । जीवन मुक्त हंस होय जाई ॥ सोई नाम जो सुमिरण करई । धिन तप भक्ति सो प्राणी तरई ॥ योजन अनंत लोक विस्तारा । आदिपुर्ष तहाँ करहि विहारा ॥ श्वेतहि वर्ण पुर्षकी काया । संपुट कमल देखिये छाया ॥ पुष्पहि धरनी तहाँ रहाई । जहाँ हंस सब राज कराई ॥ चारकरी सिंहासन जोरा । तहवां मध्य पुर्ष अंजोरा ॥ जगमग जोत अगिन उजियारा । बर्णत बने न अपरम्पारा ॥ हंस अनंतन बैठे तहवाँ । माथे मुकुट छत्रमणि जहवाँ ॥ षोडशभान हंस उजियारा । देह हिरंमर सो विस्तारा ॥ चंद न सूर दिवस नहिं राती । वर्ग अवर्णन जात नहिं पांती ॥ माया कालकी तहाँ न छाया । अजर अमर हंसनकी काया ॥ पुरुषनाम अस्थान बतायो । आदिनामकी संध लखायो ॥ सोई नाम हंस जो पावै । योनी संकट बहुर न आवै ॥
साखी—आदि अमर अक्षत हैं, अविगत अविचल धाम ।
आदिपुरुष सो जानिये, रूप निहगम्भी नाम ॥
आदनाम मैं परकट भाषा । वणों मूल फूल फल साखा ॥ और नाम एक पुर्ष बखाना । विहंग नाम तासुको जाना ॥ सोतो रहे पुरुष दरबारा । ताको भेद मैं कहाँ विचारा ॥ अजपा सिद्धि देउँ बतलाई । ताको भेद कहाँ समझाई ॥
पञ्चमुद्रा
( २१९ )
प्रथमे सोहंग पुर्ष बखाना । तामे अलख ब्रह्म पहिचाना ॥ निः अक्षर निःतत्त्व अधारा । तामह अर्ध पवन हंकारा ॥ सोहंग कार गगन अस्थाना । तामह पूरण ब्रह्म समाना ॥ तामह नाम निगम्य है सारा । सोहै सबको सिरजन हारा ॥ तासों हंस लीन होय जाई । निःअशरमों रहे समाई ॥ सिंधुबुन्द तहाँ एके होई । दुनियाँभाव नाश होय सोई ॥ सोनिज अजपा है निर्वाना । आतम हंसा तहाँ समाना ॥ वोहंग कोहंग जोहंग नामा । सोहंग सुर्त निरन्तर धामा ॥ सोई नाम जीव रखवारा । अमी अन्न बिहंग विचारा ॥ आगे आदिनाम हम भाखा । ताकर नाम सो गुप्तहि राखा ॥ अंतर अजाप नाम सनेही । अमी सोहंग पुर्षकी देही ॥ लागी निरंजन बेहंगमतारी । अष्ट गगनकी खुर्ली किवारी ॥ दहिनो अंग पुर्ष अस्थाना । तहवाँ हंसा कीन पयाना ॥ मकतार गहि हंस उड़ाई । आगे अकह कमल दरशाई ॥ कमल अनंत पंखुरी छाजै । आदिपुर्ष जहाँ आप विराजै ॥ श्वेत सिंहासन श्वेतहि काया । श्वेतहि पुर्ष श्वेतही छाया ॥ श्वेतछत्र शिर मुकुट बिराजै । भान अनंत शोभा तहाँ लाजै ॥ श्वेत चवर शीस फहराई । भान अनंत कला वहाँ छाई ॥ ऐसे निरगुण नाम अन्नपा । महापुर्षसो आदि स्वरूपा ॥ नाम तेज बल सुमिरन पाई । महाकालते जीव छोड़ाई ॥ बहुर न होय जीवकी हानी । निश्चय सत्तपर्षको जानी ॥ यह मत निरगुण पावे कोई । जाको सतगुरु पूरा होई ॥ यह मत पाय अमर होय जाई । बहुर न जीव प्रलै तर आई ॥ सत्यनाम सतगुरु परतीती । हंसा चले तब भौजल जीती ॥ है सुकृत तुम संत सुजाना । तुमसों कहीं मैं योग ठिकाना ॥
( २२० )
बोधसागर
या विधि करनी करे बनाई । सत् सिंधमो जाय सहाई ॥ ना फिर आवे ना फिर जाई । अजर अमर घर रहै समाई ॥ जीव बुद्ध नाश तब होई । ब्रह्म समाय ब्रह्म होय सोई ॥ ताकर संघ कहो निरवारी । हंस होय सो लेय विचारी ॥ यह तो भेद ना राखौ गोई । आदि योग मैं भाखों सोई ॥ अब मैं कहौं मंत्र उपदेशा । भाखो आदनामको भेषा ॥ गुप्त अंक लिख देउं बताई । पुस्तक देख लखो नहिं जाई ॥
साखी-गुप्त भेदको मंत्र यह, वणोंअंक छपाय ।
सो अंतरमों जाप कर, ताको काल न खाय ॥
अजपाको मन ध्यान धर, सो यह मंत्र बखान ।
सो तो पुन अस्थिर भयो, बहुर न जीवकी हान ॥
मंत्र
बो सों जो को अ अ निः म वे कां ञ्र मी हं हं हं हं हं हं छे रू है सं हं म म नो ग नि पू प त अ हं ॥
हे सुकित तुम बडे विवेकी । तुमको बुद्ध सकल हस देखी ॥
ताते तुमको मंत्र सुनावा । जीव काजको शब्द लखावा ॥
सो तुम राखो गुप्त छिपाई । यह जनि कहो खोलके भाई ॥
यह निजमन्त्र प्रकट जो होइहै । विन करनी हंसा तर जैहै ॥
गुरमत पंथ चाल मिट जाई । ताते करनी कहि ससुझाई ॥
योग ध्यान कुछ करनी कीजै । पीछे मंत्र जाप तेहि दीजै ॥
मंत्रपाय मन आपा आई । गुरुकी आसन राखे पाई ॥
तबे हंसको होय अकाजा । ताते कहो योगको साजा ॥
मंत्र जोर ते लोके जाई । शोभा हीन हंस होय भाई ॥
षोडश भान हंस उजियारा । सो नरहै गतमंद विचारा ॥
मंत्र ध्यान अजपाको साधै । या बिधसन्त ध्यान अवराधै ॥
पञ्चसुद
( २२१ )
तबही सुफल कामना होई । पहुँचे हंस लोकको सोई ॥ अजर हिरंमर देही पावे । योनी संकट बहुर न आवे ॥
साखी-जीव मुक्तको मंत्र यह, बणीं अंक छपाय । ताको जप मनमें करे, ताको काल न खाय ॥
सुक्ति वचन-चौपाई
हो सतगुरु तुम मंत्र सुनायो । मेरो हृदैं सांच अब आयो ॥ अब गुरु कहो लगनकी वानी । श्वासा लगन कैसे पहिचानी ॥ अलख मता है ताको साई । ताको भेद कहो समुझाई ॥ कैसो रंग लगनको होई । कारण भेद कहो प्रभु सोई ॥
साखी-जैमुन जगपत केतुकी, औ व्यालिन पहिचानी । गुण प्रकाश लक्षण सहित, सतगुरु कहो बखानी ॥
योगजीत वचन
सुक्ति सुनो लगन बेवहारा । तुमसों भेद सब कहों बिचारा ॥ प्रथमे श्वासा ध्यान लगावै । ताको रंग हृष्टमें आवे ॥ पीतवर्ण तहां देखे जबहीं । अति दुलास मन आवे तबहीं ॥ उपजे सुख पीत रंग जानी । जगपति लगन पुन ताहि बखानी ॥ अरु पुन श्वेतवर्ण लख आई । अस्थिर समाध रहे ठहराई ॥ उपजे सुख प्रेम भक्त अधिकारी । दया लीन तब सुतं निहारी ॥ श्वेतभाव जब मनमें आवे । सोई जैमुन लगन कहावै ॥ बहुर ध्यान धर देखे जाई । श्वासा पवन श्वेत लख जाई ॥ जल आकार पुन भासों जबहीं । उठे सुगंध श्वासमें तबहीं ॥ ध्यान बीच आकार न जाने । कैतुकी लगन ताहि पहिचाने ॥ बहुर ध्यान धर देखे जाई । अरुणश्याम तहाँ भूमि लखाई ॥ अहंकार मन शठता आवे । सुख नाश होय दुःख उपजावे ॥ इतना भावही देखे जाई । व्याल लगन कहावै भाई ॥
( २२२ )
बोधसागर
साखी-श्वासा मद्धे तत्त्व है, लगन तत्त्वके माहिं । योगांजन पहिचानि हैं, ज्ञानीजानत नाहिं ॥
प्रथमहि पृथीतत्त्वको पाई । तामें जगपति लगन मिलाई ॥ अष्टोदिशा गवन तब कीजै । सकलबिचार छांड़ तब दीजै ॥ अष्ट सिद्ध नव निद्धि कहाई । सो तो तहां सहजमों पाई ॥ मनमों इच्छा जाकी होई । सुफल कामना पावै सोई ॥ कोटिन कार्य सिद्धता पावै । सर्व जीत होय घर को आवै ॥ मनमों हार न आवै कबही । ऐसी लगन बिचारे जबही ॥ सुरको सगुन एक गुन जानो । यह मत विश्वावीश बखानो ॥ ताको भेद मैं दीन्ह बताई । सबे सिद्धको मूल लखाई ॥
साखी-जैतिक कारज जगतमों, चर औ अचर विचार । ते सब जानो सुफल है, कोट सिद्धको सार ॥
जैमुन लगन कहौं समुझाई । ताकर फल मैं देउँ बताई ॥ जलके पृथीतत्त्व दोय पावै । तामें जैमुन लगन पिलावै ॥ तबही ज्ञान करे जो कोई । सबै सिद्धता पावै सोई ॥ कब हूं न होवे तनमों पीरा । जीते युद्ध महा रणधीरा ॥ मनवांछित फल पावे सोई । जितने कार्य जगतमों होई ॥ एक सिद्धकी कौन चलावे । कोटिन सिद्ध तामें फल पावे ॥
साखी-नौ ग्रह घातिक दरसके, और योगिनी काल । लगन तत्त्व लखके चले, कारज होय ततकाल ॥ सुर औ तत्त्व बिचारके, तामह जैमुन होय । जौन वचन मुखसों कहे, सिद्ध जानिये सोय ॥
तीसर लगनको भेद बताऊँ । ताको अर्थ तब वर्ण सुनाऊँ ॥ जलके पृथी तत्त्व एक पावै । तामह लगन केतुकी आवै ॥ ताके जोर कार्यको जाई । सोतो कार्य मिले उठ धाई ॥
पञ्चमुद्रा
( २२३ )
राजाराव मिलनको जाई । देखत ताहि सभा भहराई ॥ हाथ जोर आगे चलआई । बहुत भांति तेहि सेवा लाई ॥ कार्य सिद्ध तब जगमों जानो । चर अरु अचर जेते पहिचानो ॥ योग सिद्धके साधन कीजै । यह मत सुरत देख जब लीजै ॥
साखी—सर्व अर्थ मन कामना, आनन्द सकल हुलास ।
जेते सुख है जगतमों, सो सब ताके पास ॥
चौपाई
व्याल लगन अब कहौ विचारी । सोतो युद्धकार्यको भारी ॥ दहिनों सुर पुन आवै जबही । व्याल लगन कहावै तबही ॥ सो सो जाय लाखको मारै । सो संश्राम न कबहुँ हारै ॥ यम स्वरूप जब कटक दिखाई । देय शत्रु तब तुरत पराई ॥ याको दृष्टि भरि हेरे जबही । मानों काल गिरासे तबही ॥ मानों काल लीन्ह औतारा । या विधि ताको रूप निहारा ॥
साखी—व्याल लगनको भेद यह, तुमसों कहां विचार ।
सिद्धिकार्य यामें नहीं, युद्ध जीत अहंकार ॥
जैसुन जगपत केतुकी, औ व्यालिन पहिचान ।
अर्थ सहित गुण लगनको, तुमसों कहां बखान ॥
कोटि योगको योग है; कोटि ज्ञानको ज्ञान ।
कोटिसिद्धको सिद्ध है, कोटि ध्यानको ध्यान ॥
नौ षट चार अष्टदश, तैंतिस कोटि बखान ।
ताते मत आगे कहौं, महारूप विज्ञान ॥
योग ध्यान आक्षेप मत, आदि नाम ले जोय ।
उलट समानों आपमों, जीवन मुक्ता होय ॥
चार मुक्तके बीचमें, रहे अवध परमान ।
याते रहित बखानिये फिर नहीं आवाजान ॥
( २२४ )
बोधसागर
चली पूतरी नोनकी, थाह सिन्धुको लेन । आपन गल पानी भई, उलट कहेको बैन ॥
चौपाई
हे सुकित तुम हो बड़ ज्ञानी । तुम सो भेद अब कहाँ बखानी ॥ यह निरगुण मत राखो गोई । जगमों प्रगट न कीजै सोई ॥ यहतो अगम निगमकी बानी । ताको भेद जक्त नहि जानी ॥ अपनो काज गुप्त कर लीजै । ताको मर्म न काहू दीजै ॥ जाकह जानहु आप समाना । ताको यह मत कहो बखाना ॥ तुम आये जीवनके काजा । बासन जान बस्तधरो साजा ॥ कलियुगआदि द्वापरको अन्ता । निजमत तुमसों भाषो सन्ता ॥ यह तो तुम्हे सिखावन दीन्हा । तुमतो रहो नाम लौ लीन्हा ॥ ध्यान समाध करो चितलाई । आप अपनमों रहो समाई ॥ पुर्ष संध हृदयमों राखो । और ज्ञान प्रगटकर भाखो ॥ अब भौसागर करो पसारा । हम अब चले पुर्ष दरबारा ॥ आपन सुतें नामसों लावो । भौसागरते जीव मुक्तावो ॥ जीवतपुर्ष सो पचै कीजै । ऐसो चित समाधमों दीजै ॥ बहुर मरे की रहे न आसा । जीवत करे लोकमों बासा ॥
साखी—जीवत समानो लोकमों, नहीं मरणकी आस ।
जीवन मुक्ता होय रहो, सत्तनाम पर्काश ॥
सिंधु समानो बुंदमों, बुन्दहि सिंधु समान ।
सिंधु बुन्द एकै भयो, बहुर न आवा जान ॥
अगम ज्ञान अक्षेत मत, आदि रूप विज्ञान ।
हेसुकृत निरगुण कथा, तुमसों कहाँ बखान ॥
इति श्रीग्रन्थ पंचमुद्रा सुकृतो योगजीत संवादः सम्पूर्णः
प्रारंभिक पृष्ठ (आत्मबोध एवं अन्य बोध)
भारतपथिक कबीरपंथी स्वामी श्रीयुगलानन्द (विहारी) द्वारा संशोधित
खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन बम्बई
नं.९ कबीरसागर - १
संस्करण : फरवरी २०१९, संवत् २०७५
मूल्य : १६० रुपये मात्र ।
© सर्वाधिकार : प्रकाशक द्वारा सुरक्षित
मुद्रक एवं प्रकाशक:
खेमराज श्रीकृष्णदास™
अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,
खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग,
मुंबई - ४०८ ००४.
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आत्मबोध ग्रन्थ
अथ आत्मबोध प्रारंभः
★
भारतपथिक कवीरपंथी-
स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संशोधित
खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई
अनिल प्रकाशक
पुस्तक प्रकाशक
पुस्तक प्रकाशक प्रकाशक
पुस्तक प्रकाशक प्रकाशक
सत्यनाम
श्री कबीर साहिब
1812
1812
सत्यसुकृत, आदिअदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग, संतायन, धनी धर्मदास, च्छ्रामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुवालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दया नामकी दया वंश- व्यालीसकी दया
अथ श्रीबोधसागरे
सप्तविंशतिस्तरंगः
आत्मबोध प्रारम्भः
★
रेखता
भक्ति भगवानकी बहुत बारीक है, शीस सौंपे बिना भक्ति नाहीं। होय अवधूत सब आश तनकी तजै, जीवता मरै सो भक्ति पाहीं ॥ नाचना कूदना तालको पीटना, राँड़िया खेलकी भक्ति नाहीं । रैनदिन तार निर्धार सो लागीरहै, कहैं कबीर तब भक्ति पाहीं ॥
( ६ )
बोधसागर
भजनके वासते सन्तजन कहत है, राम रमतीति एक नामतेरा । नामएकठामकुलगाम नहिं देखिये, अगम औनिगम दोउथकत चेरा ॥ इन्द्रियादि मन वाक्य पहुँचे नहीं, सकल प्रकाश करि रहे न्यारा । रूप अरु रेख वपुषेष नहिं पाइये, कहैं कबीर सो पीव प्यारा ॥ आप दरि आवहैं त्रंग पुनी आवही, आपही बुद बुदा फेन होई । आपही घट है मठ पुनि आपही, आपही अम्बर अकाश सोई ॥ आप प्रकट है आप माही रमे, आपही करत किलोल भाई । कहैं कबीर आपही रमिरहा, आप विनु दूसरा कहाँ समाई ॥ आपही मृत्तिका आपही कुलाल है, आप ही फेरता चक्र काला । आपही सूत है आप मणिया बना, आपही फेरता चक्र माला ॥ आपही सतगुरु शिष्य पुनि आपही, आपही करत उषदेश भाई । कहैं कबीर तहाँ आपही बनि रहा, आपही आपको दे लखाई ॥ ऊँच अरु नीच कछु भेद आने नहीं, राव अरु रंक सब एक देखै । एकही तत अरु एकही ठाठ है, एक बिन दूसरा नाहिं पेशै ॥ काममें क्रोध अरु रागमें द्वेष है, राम भजि राम भजि दूर घेरै । कहैं कबीर मन पवनको फेरिके, पिसन पांच प्रबलको पडि जेरै ॥ एकबिन दूसरा दृष्टि आवे नहीं, एकबिन कहो तुम कौन दूजा । एकबिन दूसरी सेव कहो कौनकी, एक बिन दूसरी कौन पूजा ॥ पांच पचीसका एक मंडान है, एक प्रकाश ब्रह्मांड कीया । कहैं कबीर अब द्वैत दीखे नहीं, एक अद्वैत गुरुदेव दीया ॥ अडिगग अडोल अबीरुसप्रथ धनी, नाम निर्वाण तिस थाह नाहीं । शेष शिव विरंचि तिस थाह पावैं नहीं, उदय अरु अस्त नहीं धूपछाँही ॥ रूप अरु रेष नहीं वर्ण आश्रम कहूँ, आप अलेख सब ठौर पूरा । कहैं कबीर कहूँ लिस होवे नहीं, सैन लखे कोई सन्त सूरा ॥ जल जहाँ थल करै थलतहाँ वहन करै, वहन करि फिरि थल करत साई ।
आत्मबोध
( ७ )
राव सो रंक करि रंक राजा करै,अविगतिकी गति कहो कौनपाई॥ पलएकमें भाजिकरि फिर रचनकरै,समरत्थकीबाजिया कौनजाने। कहैं कबीर यह खेल समरत्थका,होय साक्षी तिहिको सुख माने ॥ रजाय तुम्हारी साईयां करोसो होगया,आपकीरजाकहो कौनमेटै । पल एकके बीचमें दरिआवदहपेलता,फिरि पलएकमहँलेस मेटै ॥ उलटका पुलट अरु पुलटका उलट है,आपका खेल कहो कौनपावै । पल एकमें भाजि करिफिरि रचनाकरै, कहैं कबीर नहीं हारिआवै॥ दृष्टि औ सुष्टि नहिं ज्ञान गुष्टि तहाँ,सकलप्रकाश करिरहै न्यारा । सकलके माँहिअरुसकलकी जानहै,आदिअरुअन्तनहिं मध्यपारा॥ परम प्रकाश आकाशवत जानिये, बाहिरा भीतरा एक साई । कहैं कबीर यह खेल भरपूर है, आवना जावना फेरि नाई ॥ खेल अवधूतका महा अद्वैत है, द्वैत प्रपंचका लेश नाही । गुणमयीकृत सब कालकी डाटमें,शेषशिवविरंचि अरु विष्णु ताही॥ रहै निर्धारि आकार थिर ना रहै, विश्व संसार सब अघर माही । कहैं कबीर यह खेल निश्चे किया,जन्म अरु मरण तिस भर्म नाही॥ देख अवधूतके ज्ञानका घेसला, कालके जालको दूरि तोडै । गुणमई कृतको काटि पयमाल करि,पांच पचीसको पलटि मोडै॥ राग अरु द्वेषकी भीतिको ढाय करि, भर्मके कोटको फोर फोडै । कहैं कबीर यों प्रेम प्रकाश करि,सुरति अरु निरतिका तार जोडै॥ सैलियां बाकियां देख अवधूतकी, जीवता मरै सो भक्ति पाही । तीर खुरसानका बहत तीखा बहै,लगे उर माँहि गद टिकैनाही॥ राजसा माहि गद बहु ऊपजे, तामसा माँहि अहंकार भाई । कहैं कबीर तहाँ शांति कहैं पाइये, जीवकी वृत्तिको ठीक ठाई ॥ दृष्टि अवधूतका दुष्ट नहिं सहि सके,दुष्टको द्वैतकी दृष्टि भासै । परम प्रकाशका भेद पावे नहीं, इन्द्रियां द्वारके रहे आसै ॥
( ८ )
बोधसागर
कहै सब साधु अगाध मैं क्या कहूँ, बिना निर्वेद नहिँ दृष्टि आवे। कहैं कबीर यह खेल बारीक है, बिना गुरु देव कहो कौन पावै ॥ देव निर्वाण तहाँ बाण लागे नहीं, सकल कला सिरें काल देवा । शेष शिव बिरंचि तिस पार पावे नहीं, चन्द अरु सूर फिर करै सेवा ॥ तेज क्षिति पवन जल रहत आज्ञा सही, निगमहू कहत नहिँ पार आवै। कहत अगाध २ सब संत जन, दास कबीर तहँ शीस नावै ॥ सांचा साइयां एकतू और दूजा नहीं, दृष्टि दीखे तेती सकल माया। गुणमयी कृत प्रपंच सब बिनसिहें, थिर नहीं दीखता रहन पाया ॥ घट अरु मठ महदादि थिर ना रहै, रहैगा आदि सोइ अंत नाई । कहैं कबीर मैं तासुकी बन्दगी, एक भरपूर सर्वज्ञ साई ॥ देवरे देवरे देव निर्वाण है, कालका बाण तहाँ नाहिँ लागै । चन्द औ सूर प्रकाश करि सकै, करत परपंच कै रहै आगै ॥ विश्व आधार अरु आप निर्धार है, लहै कोइ संत गुरु ज्ञान जागै। कहैं कबीर विष धार सो ना बहै, जन्म अरु मरणका भर्म भागै ॥ खिरे सो थिर नहीं थिर नहीं खिरत है, आनंद अमरानंद अलख योगी। सकल के माहिँ अरु रहत अतीत होय, तीन गुन पांचरस सकल भोगी ॥ खेल अगाध कछु कहत आवे नहीं, खेल को देखि करि मगन हुआ । कहैं कबीर यह सैन गुंगातणी, जानिहै संत सो नाहिँ जूआ ॥ जागता २ जागकर देखिया सोवता सोवता सुख सोया । खोवता खोवता खोय सारा दिया, रहासो कहन मैं नाहिँ आया ॥ अर्थ अगाध कोई साध भल पाइहै, जासुके खेल प्रकट होई । कहैं कबीर यह खेल प्रतीतका, बिना प्रतीत क्या कहै कोई ॥ रैन दिन संत यूँ सोवता देखिये, संसारकी तरफसूँ पीठ दीया । मन अरु पवन फिर फूट चालै नहीं, चन्द अरु सूर कूँ समकीया ॥ टकटकी चन्द चकोरकी रहत है, सुरति अरु निरतिका तार बाजे ।