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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ५६ )

बोधसागर

युग कंकवत कालकी बानी । कालकला मति सब दिन जानी ॥ युग कंकवत महाबल योधा । अन्तकाल सतयुग पथ सोधा ॥ सतयुग अन्त कंकवत मांही । अन्त कालकी व्यापै छांही ॥ युग कंकवत मोह की खानी । काम क्रोध ममता लपटानी ॥ अन्तकाल सतयुगकर भयञ्ज । चारिञ् जुग परलैतर गयञ्ज ॥

समय-एकहि युगके बीते, चारों युग भये नाश ।

एकनद चारिञ् युगखाण, सतयुग कीन्ह गरास ॥

चौपाई

कीलक कमोद चंद सनेहा । कमत कंकवत सूर्य सनेहा ॥ भाजुग अन्त एक संग चारी । चारि घरी शब्द एक नाद संघारी ॥ एक नाद एक पहर कहावा । चारि घरी तेहि मांहि समावा ॥ चारि घरी चारिञ् युग बीते । शब्दनाद रवि शशि धर जीते ॥ सतयुग अन्त बाजु घरियारा । त्रेतायुग कर भया विस्तारा ॥ दुसरे युग भयो विश्वासा । दूसरे पहर तेज प्रकासा ॥ तेज लगन श्वासा रही बासा । ताते दूसर युग परकासा ॥ त्रेता युगकर भा अनुसारा । त्रेता युगहि ते व्यवहारा ॥ त्रेता युगकी पंखुरी चारी । चारि घरी युग चारि बिचारी ॥ जैसा युग सतयुग महाँ देखा । सोई गति त्रेता महाँ लेखा ॥ जब जब अन्त होय युग केरा । तब तब नाद काल घन घेरा ॥ त्रेता युग महाँ कला अपारा । योग व्रत तीरथ आचारा ॥ प्रथम घरी होय क्रोध अपारा । अहंकार अभिमान पहारा ॥ ताकर नाम चिंता युग राखा । चित चञ्चल चकित अभिलाषा ॥ चकितयुग अलोप जब भयञ्ज । ठोकि टकोर नाद तब कियञ्ज ॥ होत नाद मृतु अंधा धावै । लागत पलकमल नहिं लावै ॥ चकित युग बीती जब गयञ्ज । तेहि पाछै बुद्धि युग भयञ्ज ॥

श्वसगुआर

( ५७ )

बुद्धी युगकी बुद्धी अपारा । तायुग महाकाल बरियारा ॥ ज्ञान गयँद होइ असवारा । बुद्धि युगमान फोरे महिभारा ॥ बुधिकबधिक बाँधिकरे कमाई । विषे चतुराई कुमति समाई ॥ एही विधि बुधि युगचलि जाई । तेहि पीछे मन बरतैं आई ॥ मन मतंग महामद माता । तेज तपस्या व्यापै गाता ॥ मनयुग ऊंच नीच सतलीला । बरपै झारी विषैको शीला ॥ मन युगकी श्वासा बहुरंगी । ज्यों जलमध्ये उठै तरंगी ॥ मन युगराज बीतिगा जबही । अहंकार युग उपजा तबही ॥ अहंकार युग अनंत समाना । मरै पतंग हार नहीं माना ॥ हारे नहीं आपु अहंकारा । गरजै छुन्छ हारे सुख भारा ॥ अहंकार युग श्वासा ऊनी । गरचि घुमडिबरपै फिरि सूनी ॥ अहंकार ऊद्रेग अपारा । श्वासा हीन तत्व छिनधारा ॥ अहंकार युग बीते जबही । त्रेताकी परलै भइ तबही ॥ त्रेता अन्तकाल जब कीन्हों । आधी निशा टंकोरजोदीन्हों ॥ आधी रात नाद घन बाजा । महानिशान मेघ जनु गाजा ॥ त्रेता आदि अन्त व्यवहारा । उपजा द्रवा परकला अपारा ॥ द्वापर युगकी कला अनन्ता । सुखदुखमध्य आदिदुखअन्ता ॥ प्रथम घरी द्वापरकी आई । अर्थनाम युग महा समाई ॥ अर्थनाम युग द्वापर माहां । अर्थ अहर्निश व्यापै ताहां ॥ अर्थनाम युग घरी समाना । घरिकै बीते युग क्षय माना ॥ एक युग बीते दूसर आवा । धर्मनाम युग तहीं धरावा ॥ धर्मयुग धरनी धरु साँचा । श्वासा छहसै सतरी पाँचा ॥ धर्मधार औ धीर तुरझा । धर्मयुग रोग वियोग सुरझा ॥ धर्मनाम युग बीते जबही । गहर काल युग बरतैं तबही ॥ गहरकाल युग कहर कमाई । रविरथ बीच ध्वजा फहराई ॥

( ५८ )

बोधसागर

गहर टंकोर जब धरनी मारा । गहर कहर रस ज्ञान अपारा ॥ गहर यम युग बीता जबही । मोक्ष महाबल उपजे तबही ॥ मोक्ष नाम जग सत्य सुरंगा । निमिषि लक्ष दलसात तुरंग ॥ मोक्ष नाग युग बीति जब जाई । द्वापर युगकी परलै आई ॥ जब परलै द्वापरकी होई । आदिअन्त सबजाय बिगोई ॥ द्वापर अन्त बिगुरचन भारी । दुःख प्रचंड सुखसबै खुवारी ॥ बीता द्वापर कलियुग आवा । कलियुग कालकलाके भावा ॥ कलियुग महाँ युगचार समाना । चारिउ युगको करै बखाना ॥ चारिउ युगकी अर्थ कहानी । बिन परिचै सबयमकी खानी ॥ सतगुरु बिना न होय मिटाऊ । चारिउ घरी कालकी दाऊ ॥ चारि घरी युगचारि बँधाना । कहाँ भेद सुनु संत सुजाना ॥ प्रथमहि युगकर चेतन नाऊ । चेतनि चित करै सब ठाऊँ ॥ चेतनियुगमहाँ चिताको धामा । विस्मय हर्ष दुनौ विश्रामा ॥ चेतनि चिता करै सब ठाऊँ । महा बली है श्वास सुभाऊँ ॥ तीनहिं ताप तपै ब्रह्मण्डा । भरमि भूत व्यापै नौ खण्डा ॥ भर्मित पौन भर्मकी खानी । भर्म हाथ सब दुनी बिकानी ॥ कैतौ पढै गुनै संसारा । बिनसतगुरुनहिं चितसुधारा ॥ सतगुरु मिलै होय सत चूला । तेहि पाछै उत्पतिकर मूला ॥ दोरस युग बुद्धी बलनामा । श्रुची अश्रुची करै जो कामा ॥ ताकी संख्या बहुत विचारा । छःसै सत्तरि दण्ड पसारा ॥ पांच दण्ड वाकी रहि वासा । ताका भेद काल परकासा ॥ बुद्धी कुबुद्धी दोउ कर भाऊ । एकहि युग दोउ रहनि बताऊ ॥ बुद्धि हीन मैं मत पसारा । बिनु आँकुश नहिं होत सुधारा ॥ अंकुश देई मिलै गुरु पूरा । मोह महामद विषहोय दूरा ॥ बुद्धि नाम युगकी सहिदानी । सुमति सनेह सुरति लपटानी ॥

श्वसगुञ्जार

( ५९ )

बुद्धि नाम युग पारस सनेही । चित अभिमान रहे नहिं देही ॥ बुद्धि नाम युग बीते जबही । इच्छा राशि गरासे तबही ॥ इच्छा युगकी अकथ कहानी । सुनहु सन्देश कहो सहिदानी ॥ इच्छा आदि पुरुषकी काया । तासु नेह सब लोग बनाया ॥ सो इच्छा है जीवन नेहा । रही समाय जहां लौ देहा ॥ ता युगमाही विषय विकारा । ज्ञान न उपजै भर्म पसारा ॥ ता युग माहि धैर नहिं धीरा । लालच लोभहि व्यापै पीरा ॥ इच्छा युगकी अटपट डोरी । शहर सँधार होय निश चोरी ॥ जब जब इच्छा युग विस्तारी । काया कष्ट होय दुख भारी ॥ ता युगकी बाकी भुगतावै । दृष्टि नाहिं अदृष्टि दिखावै ॥ अन्न अहार करै जब कोई । इच्छा युग तब पूरण होई ॥ तासे युगकी दूसरी धारा । सतगुरु मिलै तो होय उवारा ॥ सतगुरु शरण अमर पद पावै । इच्छा समय दूरी बिसरावै ॥ इच्छा युगकर तार पसारा । लाज महा बल तजै विकारा ॥ सातों दण्ड इच्छा कर भावा । दण्ड पांच सातहि बिसरावा ॥ पांच शून्य इच्छा कर साथी । मद माते जस मङ्गल हाथी ॥ तासु नेह संयम जब पावै । इच्छा मेटि गरव बिसरावै ॥ इच्छा युगकी एतिक बानी । सतगुरु मिलै होय छुटानी ॥ जाहि देह सतसुत्ती बीरा । ताकह काल देह नहिं पीरा ॥ समय-कालत्रासव्यापै नहीं, इच्छा युगके माहिं । सतगुरुसो परचय करै, परसै निरगुण नाहिं ॥

चौपाई

चौथे युगको करौ बखाना । धर्म महाबल माह समाना ॥ अभय तरंग ताहि युग नामा । संशय रहित सदा बिसरामा ॥ तेहि युग माहि सरव सुख होई । अहंकार व्यापै नहिं कोई ॥

( ६० )

बोधसागर

तेहिधुग माहि सुधाकी खानी । बोले धीर मधुर धुनि बानी ॥ झीनी रङ्ग तरंग विराजै । नाना नाद अर्ध धुनि गाजै ॥ सातों द्वीप होइ उजियारा । दामिनि दमकै शहर मझारा ॥ वन औ वृक्ष सघन सब होई । सदा बसन्त खेले सब कोई ॥ षट ऋतु महा एक सम तूला । एकै बानी एक अस्थूला ॥ साहब सेवक एकै होई । सदा बसन्त खेले सब कोई ॥ साहब सन्त लख सब कोई । साहब सेवक लखै न कोई ॥ ( एकै बास बसै सब कोई । )

साहब सेवककी एकै शोभा । चीन्हि न परै अङ्गकी ओभा ॥ साहब सेवक बरन दुहेला । एकै बरण गुरु औ चेला ॥ जैसे फूल बास कह तोरी । पाछे फूल बास गहि जोरी ॥ पाछे फूल शोभासों देही । तिलतजितेल बास गहि लेही ॥ विना भेद जीव होइ अन्धेरा । पाछे परै कालकी घेरा ॥ सीख बिना गुरु छुटे नाहीं । बिरि फिरि परिहै भौचक माहीं ॥ गुरु सुवास है फूल सनेही । सीख स्वरूप आसिका देही ॥ गुरु बिन कौन उतारै पारा । कठिन काल है भौजल धारा ॥

समय-विनसतगुरु नहि बाचै, फिरि बुडे तेहि माहिं ।

भवसागरके त्रासते, गुरु पकरी बांहि ॥

चौपाई

युगत रंगकी कला अपारा । बिना भेदको करै बिचारा ॥ जस तरंग जलमाह विराजै । ऐसे शब्द शीश पर छाजै ॥ मन मकरन्दीके गुण ऐसा । कोटके बासै विषधर जैसा ॥ अग्नि बीच काया कह डाढै । सागर मांझ दून होइ चाढै ॥ पर्वत मारि उडावे छारा । पुढुमी मेटि करै मसि आरा ॥ सूर्य मेटि सब किरन वनावै । पवन बांधि काया दिखरावै ॥

श्वासयुञ्जार

( ६१ )

पानी बांधि अग्रिको ढाहे । पाला मेटि गरमि नहिं चाहे ॥ तीन लोककी जेतिक खानी । करै बास सबकी सहिदानी ॥ विष दारुण विषयाबसि होई । मारे मरे जियावै सोई ॥ जो चाहे सो सबै बनावै । मनकी कला हाथ जो आवै ॥ मन भूखाँ औ मनै अधाना । मनै पियासाकर जल पाना ॥ मन सूरा मन कायर हीजा । मनै विरह विरहिनसङ्ग भीजा ॥ मन दारुण मन कही सियारा । मने तास औ मनै पियारा ॥ मन राई मन राव कहावै । मनै बिना मन हाथ न आवै ॥ मन बाहर मन सबके माहीं । मनते भिन्न कोऊ जग नाही ॥ मन सर्वज्ञ चराचर माहीं । मनते करता दूसर नाही ॥ मनही देह मनहि पुनि लेई । मनबसि काम लहरिवस सोई ॥ मन लोभी मन कृपणी होई । मन उदार मन दाता सोई ॥ मन पापी मन अघ ढोई । मनै भक्ति लरि तारै सोई ॥ मनै लेख मन करै अलेखा । मनही स्वर्ग नर्कको लेखा ॥ मनहि मरै मन मन नरकें जाई । मन बसि जीव सदा पछिताई ॥ करता जीव रंग मन आहीं । शोभा सकल रंगके माहीं ॥ रंगदेखि सब जगहि भुलाना । रंगरूपको एक ठिकाना ॥ बिन रंगरूप होई फीका । रंगरूप मिलि देखिय नीका ॥ नीक देखि सब शीश नवावै । निरखि देखिकै शीश डुलावै ॥ नीकै लागि रहा सब कोई । अनइस नीक मनैते होई ॥ ताते इह मन कर्ता भाखा । तिरगुण डोरी बांधिजगराखा ॥ मन हर्षित होय गावै गीता । मन उत्कण्ठमन कहै पुनीता ॥ मन खोजी वादी होई । मनै गुरु समुझावै सोई ॥ मन बारै मन आनि जुड़ावै । मनमलीन दशहु दिशि धावै ॥ मन अज्ञान मनै सज्ञाना । मन कविता मन चतुर प्रमाना ॥

नं. १० बोधसागर - ५

( ६२ )

बोधसागर

मनछन्द धरि भाषा बोलै । मन अस्थिर मन चञ्चल डोलै॥ मनै ध्यान धरि वेद बखानै । मनै नबोडा कर न बैधानै ॥ मन षट्चक्र मन विप्र बैधाना । मनके सकल रूप हैं ठाना ॥ मन नट नाटक महा समाना । मन नट सर्व कथै अभिमाना ॥ मनहि अठारह पदै पुराना । मन मन कहि समुझावै ज्ञाना ॥ मन चउदय विद्या अधिकारी । मन त्रिकुटी महै लावै तारी ॥ मनकी ज्योति सकल उजियारी । मनकी छाया मन अधिकारी ॥ मनहीसों सब सरही काजा । मन है सात द्रौपको राजा ॥ मन बिनु सरे न एको काजा । मनके ऊपर मनहि विराजा ॥ ( मननवखण्डदशहूँदिशगाजा । )

सतगुरु सीख मनहिको कीन्हा । मनते भक्ति मनते पथचीन्हा ॥ मन मानै तो सबै बनावै । मन बिनु पन्थसो कौन चलावै ॥ मन चीन्है तो मनकहँ पावै । बिनु मन सत्यशब्द नहि आवै ॥ मन चीन्है तो सब बश होई । बिनु चीन्है सब जात बिगोई ॥ तीन लोक जो बाहर भाखा । सो सब आनि देहमें राखा ॥ मन चीन्है तो हाथहि आवै । तीनहि लोक देहमें पावै ॥ जो बाहर सो भीतर पावै । तीन लोक पल माँह दिखावै ॥ तीन लोकते बाहर बासा । मन चीन्है तो होइ प्रकाशा ॥ जब लगि मनको अन्त न पावै । तौ लगि इह मन हाथ न आवै ॥ समय-तीनलोक हैं देहमहैं, रोमरोम मन ध्यान ।

बिन सतगुरु नहि पाइये, सत्यशरण निजनाम ॥

चौपार्ह

सात द्रौप काया अस्थाना । सातों द्रौप कमल बंधाना ॥ नाल साति रचना गति देहा । सातों सुरकर एक सनेहा ॥ तहाँको भेद हँस जो पावै । दुबिधा दूर मति सबै गवाँवै ॥

श्वासयुञ्ज्जार

( ६३ )

पावै भेद करै विश्रामा । पल पल परशै निर्गुण नामा ॥ आवत जात बार नहिं लावै । परसै नाम अमर पद पावै ॥ नाल सात सुर एक ठिकाना । ताके निकट रुसके थाना ॥ नदी तीन बाढी गम्भीरा । साम तहां गोफाके तीरा ॥ तहां बैठि अजपा लौ लावै । रोम रोम की सब सुधि पावै ॥ रस औ बिरस तहांकर मेला । होत बसन्त गुरु तहां चेला ॥ गुरु समाधि मैंह अटल प्रमाना । चेला अग्रवास मह साना ॥ चेला बास गुफा मैंह करई । पल पल सुरति शब्दपर धरई ॥ त्रिगुण तेजकी दीखै काया । दामिनि दमकि झकोरें बाया ॥ जो गुरु मिलै तो पांजी पावै । बिनु पांजी बिचही भटकावै ॥ पांजी पावै सुरति सनेही । पूर्ण तत्व चले जब देही ॥ करै चन्द्र तापर असवारी । प्रीति पूर्ण जागै खुमारी ॥ प्रेम पियाला तहवां पीवहि । निश्वासरचित आनंद दीवहि ॥ चेतनि चेत होय बल जोरा । जागत साह न मूसत चोरा ॥ श्वासा चारि लगनकर भावा । जब उपजै तब संगहि आवा ॥ चारि लगन दुइ भाव अपारा । उपजै विनशै क्रम व्यवहारा ॥ एक लगन संग उपजै काया । एक लगन बहु सुख समाया ॥ एक लगन दुख दारुण होई । शब्द गहे नहिं दुर्मति खोई ॥ एक लगन संग उपजै काया । एक लगन बहुसुख समाया ॥ एक लगन दुख दारुण होई । शब्द गहे नहिं दुर्मति खोई ॥ एक लगन संग उपजै काया । मोह महामद विषकी छाया ॥ विलसत उपजत सब जीव जाई । ना गुरु मिलैना अर्थहि पाई ॥ चारि लगनकर नाम निराला । दुइ सुक्ती दुइ काल कराला ॥ उत्पति संग सुधाकी छाया । दुखदारुण होइ तजे काया ॥

( ६४ )

बोधसागर

जे मुनि लगत सँवारे बीरा । उत्पति के सँग तजै शरीरा ॥ बाकी जवनिकाल लखि राखा । मेटै अंक कालकी शाखा ॥ उत्पति होत लिखे यमराया । सो सब दीसे नरकी काया ॥ सातों द्वीप लखे सहिदानी । वासिल बाकी कर्म निसानी ॥ जेतिक श्वास चलै नर देहा । ताकर जाने सबै सनेहा ॥ दम विस्तार लिखे सब दाऊ । पाछे करै करे जे घाऊ ॥ द्वीप द्वीपकर अंग जलावै । करपग परलो प्रकट दिखावै ॥ चौरासी लक्ष योनिनकी धारा । नरकी देह ते कर्म अपारा ॥ चौरासीकर पातक भारी । नरकी देह सब लिखे विचारी ॥ करपाछै वासिल लिखि राखै । बाकी अंक मध्यमें भाखै ॥ जमा शीसपर लिखे विचारी । नित उठीके न्यावे निर्बारी ॥ सातों द्वीप सुधारै रेखा । ऐसा यमकर वरवस देखा ॥ करमज चारि अंक लिखि देई । पाछे सबसों निरगै लेई ॥ रेखा इलालि लिखे विष पूजा । लहसन मसा लिखे तिलगूजा ॥ चक्र लिखै औ आपहि बासै । सन्धि लिखै जीवन कहैं फासै ॥ नखशिख लिखै कर्मकी खानी । गुण औगुण नहिं मेटे जानी ॥ जाहि द्वीप जस अंक लिखावै । तहाँ तहाँ तस चाल चलावै ॥ रवि शशि अंक दोउ लिखि लेई । पाछे दोष जीव कहैं देई ॥ श्वासा स्नेह लिखै सहि दानी । पाप पुण्य भुगतावे जानी ॥ जेमुनि लगन होय उत्पानी । लगन केतुकी सबही हानी ॥ दोऊ लगत साथै शशि सुरा । पावै सत गुरु हाल हजुरा ॥ जो गुरु मिलै तो मेटे रारी । बिन सतगुरु सब यमकी बारी ॥ सतगुरु बिना न होय उबारा । केतो ज्ञान कथै संसारा ॥ जप तप योग यज्ञ व्रत पूजा । काल सनेह और नहिं दूजा ॥

श्वसगुञ्ज्जार

( ६५ )

तप साधै रहसे मन माहीं । काल करमकी लखै न छाहीं ॥ विद्या वेदकी करै उचारा । कर्मवश जीव भये यमचारा ॥ जब लगि हृदय शुद्ध नहिं होई । तब लगि पार न पावै कोई ॥ जाही लगन तन जग लेही । ताही लगन तजै जो देही ॥ सो जीव उतरि जाय भौ पारा । नहिं तौ अटकि रहै संसारा ॥ कालहि बस जो तजै शरीरा । ताकह काल देह बड़ पीरा ॥ लगन केतुकी होय न न्यारा । पाछै लेई गरभ औतारा ॥ नर्क खानि भुगतै चौरासी । धरि काया बांधे विसवासी ॥ सतगुरु बिना लगन नहिं पावै । अन्तकाल यम धोखा लगावै ॥ जीवत कथै बड़ ज्ञान अपारा । काल चतुराई छन्द पसारा ॥ कर्मकी वंशी सब जीव फाँसै । हरी न मानै आनै हासै ॥ तादिन भूलि है सब चतुराई । जादिन काल धरै तन आई ॥ श्रृंख चतुराई सहज बैलाना । छोटे बड़े मर्म नहिं जाना ॥ ताते सत गुरु खोजहु भाई । जाते कर्म भर्म मिटि जाई ॥ लगन केतुकी देह बहाई । बाकी सबै कालकी जाई ॥ जे मुनि जन तजै शरीरा । गहै न काल विषयके तीरा ॥ कागद करि जाय भव पारा । मेटे यमकर सकल पसारा ॥ सतगुरुसेती चाल गहि लेई । ताकह काल दगा नहिं देई ॥

समय-काल दगा सब मेटिकै, उतरहु भवजल पार ।

यमकी चाल बिचारिकै, बहुरि न हो औतार ॥

चौपाई

धर्मदास औरो सुनि लेहु । जीवन बाह जानिके देहु ॥ जाको होइ सत्यको रेखा । नख शिख देखहु अङ्गविशेषा ॥ चतुर शील दोउ निरखेउ जानी । करपर देखहु भक्ति निशानी ॥ शंख चककर देखेहु थाना । लक्षण जानि सुधारेहु पाना ॥

( ६६ )

बोधसागर

बोले मधुर शीलकी बानी । तेहि तन होय ज्ञानकी खानी ॥ पहिने ग्रीव समा जौ होई । शब्द विवेकी जाने सोई ॥ खंभज होय जाहि कर माहा । यश विस्तार ज्ञान अवगाहा ॥ पलक पसार छत्र जो होई । लोक निशानि अंश जनु खोई ॥ नासिका नेह होय जो मासा । कुटिल कठोर रोग तन वासा ॥ बौरनीपर जो गुजौ गुजा । तामस तेज विषयको पूजा ॥ कोतह गरदनी एचातानी । कुबजा गाडर विषकी खानी ॥ सुख चतुराई हृदय कठोरा । बोले झीन कोध कर जोरा ॥ इन जीवन जनि बोधहु जानी । अन्तकाल पुनि होवै हानी ॥ नारी नेह विचारहु जानी । देखहु देह द्वीप सहि दानी ॥ राज गुञ्ज निरखेहु अनुहारी । कर पगशीस लक्षहि विचारी ॥ चंचल चाल पोल होय पाऊ । तेहि जनि कबहु चरण छुआऊ ॥ गुञ्ज होय जेहि मास लिलारा । तेहि बोधते होई कर्म अपारा ॥ वोठ भुजंग औ जीव भुजंगी । विष बरजोर बसै तेहि संगी ॥ नेत्र गुञ्ज ए ऊंच लिलारा । कामलहरि बहु जहर पसारा ॥ हंसत वदन चालै चतुरंगा । बोधत ताहि होत सुख भंगा ॥ नैन शेष निरखे जेहि ओरा । ताकह कष्ट देह तन चोरा ॥ शुभ रंगुत्र होई विषखानी । क्षीरे छिर विष बालककी हानी ॥ सो गुण छांडे तासु शरीरा । द्वादश कँवल बसै बलवीरा ॥ नाभिकमल होइ रेखा तीनी । वाएँ अङ्ग होए शशि हीनी ॥ कच्छदीप होइ गुञ्ज चितेरा । परसत ताहि कालको चेरा ॥ जङ्घदीप होइ गुञ्ज गहीला । लहसन मासा होइ जो ईला ॥ तेहि परसै औ बेघे जानी । गुरु शिष्य दोनोंकी हानी ॥ मीनहि द्वीप विकट होइ रेखा । ताके अङ्ग कालकी रेखा ॥ बाँझ मुआ बछ गूगी होई । कलपत जाय कालपुर रोई ॥

शवासुखज्जार

( ६७ )

कूर्म स्नेह लक्ष कर जोरा । चतुर सनेह ज्ञानबल जोरा ॥ पग छतनार होइ जेह जानी । पुस्तपांव पर काल कुबानी ॥

समय-चरण पलौ सम होय कर, घटिका पलो प्रमान ।

ज्ञान सनेही दूत है, रोम रोम भगवान ॥

चौपाई

दूनों अंग विचारेहु जानी । एकरज भक्ति एक विष खानी ॥ दोऊ अंग लक्षण गहो शरीरा । पाछे देहु मुक्ति बरबीरा ॥ परिचय भेद विचारहु जानी । पान लेत जिव होय न हानी ॥ लक्षण लक्ष्य होय सम तूला । पावै सतगुरु मुक्तिके मूला ॥

समय-आदि निशानी देखिकै, बांए दहिने बाम ।

शब्द सनेह नेह करि, तब दीनों निजनाम ॥

चौपाई

बांए अङ्ग मसा जो होई । तीरथ अङ्ग रेखा हो दोई ॥ बांए अंग विषयकी बासा । माया सघन वंश कुल ग्रासा ॥ दहिने अंग विषय जो होई । शीस संपति सुख गासै सोई ॥ विकटदंत होय जेहि बारी । शीलवंत सुख प्रेम सुधारी ॥ बिरर चिकुर सुख बुम्ब सनेही । विहसत वदन सदा सुखनेही ॥ उज्ज्वल नेह सदा सुखदाई । शील सनेह भक्ति बहुताई ॥ हंस गमन सतगुरु सों नेहा । मधुरी बोले प्रेम सनेहा ॥ कर पद कोमल शरद शरीरा । सुत संपति जैसे दारुण धीरा ॥ मधुर बात औ चमकै देहा । सबते बोले सुरति सनेहा ॥ सुरतिवंत प्रीतमकी प्यारी । पछो लांव जेठ पुर भारी ॥ श्यामगात लहसन तन माहा । माया संच न औ ग्रासै नाहा ॥ राजवरण प्रिय श्याम शरीरा । पियाहि आहिपरीमल गंभीरा ॥ बगलधि सुख आमिष जो होई । तन प्रसेव सुत सुताहि विगोई ॥

( ६८ )

बोधसागर

लभे गात मोट तन भारी । विरह विकार कोधअधिकारी॥ छोट शरीर पातरी वामा । आपु तजै अन्त विश्रामा ॥ निहली चितवनि ऐंचा तानी । बहुते पुरुष एक पटरानी ॥ विहसत बोले कुटिल निहारै । आपु जरे औरन कहँ जारै ॥ आगे चलै पाछे तन देखै । गुण औगुण एकौ नहिं लेखै ॥ ऊपर हँसै मनही पछताई । देह थोरहिं बहुत पुआई ॥ एक थन छोट कठोर कुबानी । एक थनझालरि विषकी खानी॥ नाभी पर तीनि होइ रेखा । सुखसम्पति सपनेहुनहींदेखा ॥ इन्द्री मांझ गुञ्ज होइ भारी । जो परसै तेहि करै खुआरी ॥ मोट पतंग चाकरी चाला । तेहि देखत मिय होइ बेहाला ॥ पग पातर पलो छत नारा । परसन बास परै यम धारा ॥ कनअंगरी अघर तिन लागै । आपु नाह तजि परघर बागै ॥ अस लक्षण होइ जाके गाता । प्रान लेइ करै यम घाता ॥ कुम्भ लिलार खम्भ जो होई । जो परशै सो जाय बिगोई ॥ कर पग पलौ गुञ्ज सनेही । परसत होइ भालुकी देही ॥ जोरे पुअर करमह होई । नाहरि नाहक आसै सोई ॥ अहहि होय लक्ष तिरझूला । काल स्वरूप होइ अस्थूला ॥ मुक्तिपन्थ कबहुं नहिं चाहै । सदा विकार विरह रस लाहै ॥ चञ्चल चित् थिर नहिं होई । भजन भंग रस भक्ति बिगोई ॥ वरुणी बसे बिसंभर जोरी । नेत्र बिलोन रंग होइ गोरी ॥ झंखत फिरै प्रकट नहिं होई । अन्तर भक्ति ऊपर होइ छोई ॥ प्रेमवन्ती होइ सुरति निहारै । आप तरे औरन कहँ तारै ॥ करे दंडवत निर्भय नारी । भक्तिवन्त बहु लीला धारी ॥ बिगसित बदन शीलकी आखी । कुल परिवार भक्तिगणसाखी ॥ सतगुरु नाम सुनै सजुपावै । मण्डल चारि शब्द फैलावै ॥

श्वसगुञ्जार

( ६९ )

हर्षित होइ सतगुरु गुण गावै । भक्ति कि बात सदा मन भावै ॥ गुरु सनमुख होइ सेवा लावै । सदाकाल तेहि मस्तक लावै ॥ संपुट वदन क्षीणता होई । सतगुरु शब्दहि एक विलोई ॥ सतगुरु देखि न परदा आनै । शब्दकी चाल सदा पहिचानै ॥ सदा अधीन रहै तनमाही । भागे काल देखिके ताही ॥ कर जोरै सनमुख शिर नावै । लाज कानकी दशा मिटावै ॥ ऐसी लक्ष गहै तन पास। पावन पान लोक होइ वासा ॥ ऐसी लक्ष विचारेउ हंसा । दीन्हेउ ताहि शब्दकर अंशा ॥ लाज काज कह देहु बहाई । भेद सुधारत काल पराई ॥ माता बेटी भई नेवारी । लजा तजिके काल बिडारी ॥ लोक लाजकी दशा मिटावै । तौ रिपुकाल निकट नहि आवै ॥ रामचन्द्र त्रिभुवन के राजा । लोक लाजबहि कपिदलसाजा ॥ जानि परी नहि यमकी वानी । ताते काल कीन्ह तन हानी ॥ लाज लिये तन करै उदासा । तेहि मन भरम भूतकरबासा ॥ गुरुसों करै कपट चतुराई । चाल बिहुन कालपुर जाई ॥ भक्त कहावै लजा नहि तोरै । निश्चल काल नर्क महाँ बोरै ॥ भक्त करै कुल दशा मिटावै । परदा ठानि कालपुर जावै ॥ सो सतगुरु जो होय सयाना । चाल चलावै शब्द प्रमाना ॥ आगत परदा मेटि बहावै । पाछे भक्ति पन्थ महाँ आवै ॥ कपट छाड़िकै शीस उतारै । हंस दशा धरी मुक्ति सुधारै ॥ शीस उतारि हाथ पर लेई । पाछे पाँव ताहिपर देई ॥ भक्तिका चित हर्षित होई । ममता मोह लहर तज दोई ॥ कामिनि कनककालकरफन्दा । भयउ काल कपटि मन मन्दा ॥ दुवो शीस अर्पना लाई । मुक्ति पंथ पावै तब भाई ॥ पावै भेद शब्द सहि दानी । काल कल्पना मेटै जानी ॥

( ७० )

बोधसागर

समय-निडुरीनिडुरै नाचै, चारिउ अंचल छोरी । धनी पियारी होइ रहै, यमसो तितुका तोरी ॥

चौपाई

इहि विधि मुक्ति गहे जो कोई । ताकौ आवागौन न होई ॥ आवागौन विचारै जानी । काया कष्ट होइ नहि हानी ॥ सतगुरु शब्द जो लागा रहै । निकसि चरण सतगुरुको गहे ॥ तीन लोक नाद जय जाई । सतगुरुको पग रहै समाई ॥ तिसरी श्वासा साधै जानी । कुल अभिमानमिटै सबखानी ॥ नरको लक्ष पारख करि लेहूँ । पाछै वाह ताही कइ देहूँ ॥ चंचल चपल कुटिल तन होई । पान पावै तन जाय बिगोई ॥ ताको लक्षण नर्ककी खानी । बोधत दुई दुवोंकी हानी ॥ राजा वरण तन बन्सी लावै । आप नष्ट होइ और नशावै ॥ जो वाकी संगति बैठे जाई । अपनी दशा ताहि पहराई ॥ सो सतगुरु जो होय सियाना । लक्षण देखि देइ तब पाना ॥ आगत पान धरै चितलाई । पाछे निर्णय शब्द बुझाई ॥ पानलेत चित हर्षित होई । चालु चले नहि दुर्मति खोई ॥ ताहि देहूँ गुरु पिपीलका । लक्षण हीन रेष होइ जिसका ॥ तापर अंक लिखे सहिदानी । काल कलाधरि देइ निशानी ॥ जैसा लक्ष जाहिपह होई । पान देहु तेहि तहाँ बिलोई ॥ भामत पौन लिखै तेहि माहाँ । दिटै इलाका गुरुको ताहाँ ॥ जाके होई सुमतीकी खानी । ताही देहु गुरुनाम निशानी ॥ राज वरण मुख शीतल बानी । ताघट होई ज्ञानकी खानी ॥ पूरी तत्त्व पान जो पावै । यमकी नाक छेदि घर आवै ॥ राजवर्ण होय क्षीण शरीरा । ता घट काल करे नहि पीरा ॥ राजबरण मुख गुंज चतेरा । सो जिव होय कालको चेरा ॥

श्वासगुञ्जार

( ७१ )

तापर काल लिखै सहिदानी । बोलत धीर हृदय कुबानी ॥ लक्षण भेद कहो सहिदानी । कालसभा भयभीत निशानी ॥ कालकला निरखेहु बहु भांती । करहु विचार दिवस औ राती ॥ कृपण होय माया नहिं छाडै । जोरी जोरी बरनि महेँ गाडै ॥ आशा रहे तहां लपटाई । मुक्ति होय नहिं यमघर जाई ॥ देह ताहि विष गंजित पाना । करम रेख सब देह पयाना ॥ नेत्र बिलोन मसा मुख होई । करत कल्पना जाय विगोई ॥ लवा शीश होय मुख छाही । हृदय कठोर दया नहिं ताही ॥ मध्य कपोल होइ तिल खानी । बांये तत्व लै बोले बानी ॥ बांये विभौ मासा जो होई । दहिने दारुण तेज समोई ॥ बांये विभौ ताहिके होई । अंत चले जिव सर्वस खोई ॥ गहरी चितवनि मुख चतुराई । लंपट चोर होइ दुखदाई ॥ छोटी गर्दन राजस भारी । मिथ्या बोले होय खुआरी ॥ ता घट जीव दया नहिं होई । बोधत ताहि काल पुर रोई ॥ जान ऊपजै कुमती शरीरा । तेहि जनि देहु मुक्ति बलवीरा ॥ एक समय पान जो पावै । आपु जाइ संगति बगरावै ॥ विषयहि लम्पट होय जुआरी । इनते होइ है पन्थ खुआरी ॥ शब्द पेलीजानि पांव छुआवहु । महाविकार तन कछहि पावहु ॥ ताते आगम कहौ पुकारी । कुमति छुडाय पान निरुआरी ॥ हर्षित वदन रहे दिनराती । गुरुसों प्रीति करै जेव स्वाती ॥ सोंपैही सदा स्वाती आसा । उपजै मुक्ती ज्योति प्रकासा ॥ रहनि गहनि बूझे करजोरी । दीन्हेहु ताहि शब्दकी डोरी ॥ गुरु सन्मुख होइ सेवा लावै । काम कोध ममता बिसरावै ॥ सदा अधीन रहे गुरुआगे । पावै शब्द सहज अनुरागे ॥

( ७२ )

बोधसागर

गुरुपद छांड़ि अनत नहिं जाई । खुशै अमी रस पीवै अघाई ॥ समता धीर होइ जेहि गाता । तेहि यमकबहि करै नहिं घाता ॥ गुरुगम भेद बूझि सब पावै । ममता मोह सबै विसरावै ॥ समय-गुरुकी आज्ञा आवै, गुरुकी आज्ञा जाय ।

कहै कबीर सो हंस भए, बहुबिधि अमृत खाय ॥

चौपाई

क्षीण अधर औ नेत्र विसाला । गुरुगमी बोले शब्द रिसाला ॥ जो कोई तपत ताहि पहुँ आवै । अमृत सींचिके ताहि जुडावै ॥ पावै अमृत हर्षित होई । मोह महाबल जाइ बिगाई ॥ शब्दकी परच बोले बानी । तन अभिमान विसारे खानी ॥ तत्त्व तमाशा निश दिन देखै । भाव अभाव एक करि लेखै ॥ आसन मारि समाधि लगावै । एक पग संपुट पाछे लावै ॥ उलटी बाँह शीशपर राखै । पूर्णतत्व अमीरस चाखै ॥ पलकन मारै राखै साधी । तिरवेणी तट राखि समाधी ॥ अमर महातम तत्वहि राता । दशै सूख सागरके दाता ॥ ज्ञान महातम तबही पावै । अमर समाधि एकपल लावै ॥ तबही मिटै काल करदाऊ । दुविधा दूसर सब विसराऊ ॥ अमर समाधि महा फल पावै । जमदारुन तेहि शीश नवावै ॥ करपग कोमल रोग न व्यापै । काल कला तेहि देखिके काँपै ॥ अखंड मंडल गुफाके तीरा । दरशै ज्योति अखंडित धीरा ॥ जो देखै तो प्रकटै चोरा । देखे बिना ज्ञान होय भोरा ॥ तत्व समाधि लगावै जानी । उपजै ज्ञान अमी रस खानी ॥ सत्य सुकृत पग परसै जाई । रोग न व्यापै काल न खाई ॥ तत्व तमासा गुरुमुख देखे । तत्व छाड़ि निहतत्व बिबेखे ॥ तत्व समाधि करै नित पूजा । सत्य सुकृत तजि और न दूजा ॥

शवासुखार

( ७३ )

पाँवके ऊपर पाँव चढावै । हाथ फेरिके संपुट लावै ॥ संपुट शीश छुआवै जानी । निरखै अरध उरधकी वानी ॥ कसनी कसै बहत्तर डोरी । सुरति शब्दसों राखै जोरी ॥ अधर अवाज लखै निरबाना । राग छतीसों सुने वँधाना ॥ सुरली टेर अर्ध धुनि होई । ज्ञानगुफा चढ़ि निरखेहु सोई ॥ सुनत अर्ध धुनि उन मुनिराता । बूझै आदि अन्तकी बाता ॥ मन मकरंदी के गुण पावै । मगन होइ चंचल नहिं धावै ॥ मन सर होई सरे सब काजा । छोंडे कपट शीश विचुराजा ॥ नख शिश मनै बियापै सोई । मन चीन्हे मन आपै होई ॥ यह मन शक्ती यह मन सीवा । यह मन पांच तत्त्वको जीवा ॥ इह मन लेकै उन मुनिरहै । तीन लोककी बातें कहै ॥ ऊन मुनीमें रहै रहावै । ताकर हंस काल नहिं पावै ॥ ऊनमुनी महीं लावै तारी । अङ्गमें महलमहँसुरतिबैठारी ॥ उनमुन महीं जो वासाकरै । अगम महलमें सुरति लै धरै ॥

समय-उन चढी आकाशको, गई गगनपर छूटि ।

हंस चले जो जात हैं, रहे शिर कूटि ॥

उन मुनीमें धर्मदासबसै, बंक नाल गहिजोर ।

शिर ऊपर सतशुक्ति तहै, तहां शीत शब्दकी डोर ॥

चौपाई

उनमुनी सांची सुरति है बासा । धर्मदास गहि राखहु पासा ॥ सोहं सार मूल धुनि राता । तासु नेह मिले दाता ॥

समय-हंसा सोहंग मान करै, निकसि खेल मैदान ।

तहां सुरति बैठारिकै, नित प्रति लावै ध्यान ॥

चौपाई

अमर आसन करौ बिचारी । धर्मदास यह कथा निनारी ॥

( ७४ )

बोधसागर

जो कोइ मूल ठीक धरि आवै । सोई अमर समाधि लगावै ॥ सार समान रहै दिन राती । पावै आदि अन्त उत्पत्ती ॥ अमर महात्म पावै नीका । अमर समाधि को गहै धरि ठीका ॥ पांच पचीस सकल सब जानै । आवत जात श्वास पहिचानै ॥ श्वास सार शब्द निरुआरै । अमर समाधि को भेद विचारै ॥ निशि वासर है शब्द समाना । जागत सोवत एक ठिकाना ॥ अमर मूल धुनि शब्द समाई । बोलै ज्ञान गर्मी अधिकाई ॥ लावै अमर मूल महतारी । अटल रहै मति टरति न हारी ॥ अमर सुहावन आसन मूला । नख शिख भेद गहै अस्थूला ॥ तनकी लक्ष्य लखै विस्तारा । लक्ष्य अलक्ष श्वास गुंजारा ॥ लक्ष्य लखै सो साधु कहावै । बिना लक्ष्य सतगुरु नहि पावै ॥ सतगुरु चीन्है के सहिदानी । काल ब्याल भयभीत निशानी ॥ काल काल बन रेख बनावा । नख शिव जानै तासु सुभावा ॥ पतरी ग्रीव नासिका भारी । भृकुटी देह नेह होइ कारी ॥ दहिने ग्रीव मासा को बासा । गुण गंभीर ज्ञान परकासा ॥ नेत्र रसाल बदन मनहारि । शब्द सनेही सदा पियारा ॥ सदा हृदय सतगुरुकी आसा । बोलै ज्ञान गर्मी परकासा ॥ पूरण लक्ष पक्ष दोइ होई । शब्द गहै बहु भेद बिलोई ॥ ललाट पाट रेखा होई चारी । सुरति सनेही सुरति सुधारी ॥ तेहि जानेहु पीछल सहिदानी । पाछिल बोध भये सब हानी ॥ सुनत शब्द मिलै सो आनी । शब्द सनेह गहै चित्त जानी ॥ पलक छत्र औ झीने बोलै । पावत पान कपट सब खोलै ॥ ताकह जानहु हंस सुहेली । आनि मिले यम परदा खोली ॥ भीतर वचन कहे हित जानी । पाछिल सुरति भई जत हानी ॥ चरण टेकि चित्त बोधहु जानी । जाते आगे होइ न हानी ॥ रोष करहु तो मोर दोहार्इ । गुरुको रोष लोक नहि जाई ॥

शवासगुञ्जार

( ७५ )

समय-गुरुते माथेते उत्तरे, शब्द वेहुना होय । ताको काल घसीट है, राखि सकै न कोय ॥

चौपाई

गुरु भृङ्गी कर एक सुभाऊ । मेटे करम करे सुकताऊ ॥ शीख जोमन बसिदुबिधा करई । गुरु पुरा होई चित ना घरई ॥ चित तो धरे शीख विगारे । आपु सहित भवसागर डारे ॥ दीन दयाल गुरुनकी रीति । जैसे चन्द चकोरहि प्रीति ॥ सीखे सिखापन बहुविधि देही । भरम मेटि निर्मल करि लेई ॥ शीख भेद जो पूछे आई । क्रूर होइ तो उठै रिसाई ॥ पूर होइ तो शीखहि बोधे । कलह कलपना तजिकै सोधे ॥ शीश अज्ञान पार नहि पाई । ताते करै कपट चतुराई ॥ करै कुटिलता बोलै जोरा । गुरु पूरा होइ करै निहोरा ॥ समय जानि बचन मुख बोलै । कहूँ शीतल कहूँ तेजस डोलै ॥ समय जानि बचन मुख बोलै । कहूँ तेजस कहूँ शीतल डोलै ॥ जब जब शिष्य करै अज्ञानी । हृदय शुद्ध मुख कहै कुबानी ॥ भाव विचारि शिष्य सों कहहीं । शिष्य की दशा जोनीके लहहीं ॥ जोर कहनको शिष्य डराई । गुरुशब्द महँ लेइ मेराई ॥ गुरु पूरा होय ताहि सुधारे । करम काटि भव सागर तारे ॥ गुरु सुवास सबके सुखदाई । गुरु राखै तो काल न खाई ॥ जानेहु ताहि काल अभिमानी । काल अङ्ग धरि प्रकटे आनी ॥ गुरु नाता धरि शिष्य नशाई । रहनि गहनि नहि एक लखाई ॥ अज्ञान दिसासे शिष्य कहावै । गुरु होय गुरुगम समुझावै ॥ शिष्य करै बहु चञ्चलताई । गुरु पुरा होय लेइ बचाई ॥ गुरुकी दशा ज्ञानकी भाऊ । अज्ञान दशाते शिष्य कहाऊ ॥ रण ज्ञान गमी जेहि होई । हंस उवारन सत गुरु सोई ॥