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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

बोधसागर

( ११ )

अब करू वेगि सम्भारी मेरी । अब जनि करहु देव तुम देरी ॥ मृत्यु हमारी तुली अब आयी । तुम अब हमको लेहु बचायी ॥ जो तुमसे नहि बाचै भाई । मिथ्या तुम का करहु बड़ाई ॥ तुम सेवक साहब का होऊ । दूसर साहब है निज कोऊ ॥

विष्णु वचन

विष्णु कहे सुनु बालक भाई । अब तोको यहाँ कौन छुड़ाई ॥ कैसे को अब राखै भाई । कैसे को तुव काल छुड़ाई ॥ कैसेको तोर काल छुड़ाओं । कैसे आवा गमन मिटाओं ॥ साखी-काल बड़ा प्रबल अहै, मो पै कछू ना होय । वासे नहिं कोइ बाचई, ब्रह्मा विष्णु विगोय ॥

चौपाई

सब मिलि रहे काल के साथ । काल फिरत है सबके माथा ॥ काल की गति हम नहिं जाने । धोखे यम के हाथ विकाने ॥ साखी-काल कि गति जाने नहीं, ब्रह्मा विष्णु महेश । ऋषी सुनी सब कम्पहीं, कम्पे शेष सुरेश ॥

चौपाई

केतिक देह हमहीं जो धरिया । फिरि फिरि कालके फन्देपरिया ॥ देह धरी धरि जगमें आये । यहि पृथ्वी में नाम धराये ॥ साखी-कालसों कोई ना बचै, सुनु बालक चित लाय । कैसे कै मैं राखिहौं, मोसों राखि न जाय ॥

चौपाई

देह धरे नहिं बचिहो भाई । सबको काल धरी धरि खाई ॥ काल बड़ो है अति बलवंता । देवी देवा खाय अनन्ता ॥ सप्त दीप जो हैं नौ खण्डा । काल बली सबहिन को डण्डा ॥ तीन लोक पै करे रजधानी । हमहूँ ताकी सेवा मानी ॥

( ९२ )

गरुडबोध

विष्णु कहे ब्रह्मा सों बाता । यह बालक कीन्ह्ना उत्पाता ॥ यह वृत्तांत तुम जानो भाई । तुम बालक को लेहु बचाई ॥ ब्रह्मा तव सुनि रहे लजाई । हमसे बालक राखि न जायी ॥

गरुड वचन

तबही गरुड जो बोलै बानी । बालक जिये तब तोहि जानी ॥ आपा रोपि रहे ठहराई । किया तुम्हार न होवे भाई ॥ जो तुम आज बालकको राखो । तौ तुव वचन सत्य कै भाखो ॥ कहै गरुड सो तरक लगायी । बालक काहे न राखु बचाई ॥ ऐसी विधि फिरि फिरि अवतरहु । पुनि अपनी बुधि भरमत रहहु ॥ सबको ब्रह्मा देउ उपदेशा । अपने गर्वका न जानहु लेशा ॥ हम जानी तुमरी मति भाई । अब तुम थापि रहहु ठहराई ॥ गरुड कहै अस ज्ञान विचारी । ऐसी भूल परी संसारी ॥

सतगुरु वचन

धर्मदास तुम सुनो विचारी । गरुड या विधि दीन्ह प्रचारी ॥ तब तीनों मन में कीन विचारा । करि विचार ज्योति कहैं उरधारा ॥ तीनों मिलिके पूछैं माता । जो वह कहै सुनौ विधाता ॥ आप आपमें तीनों ठानी । अन्त काल गमि पूछन आनी ॥

त्रिदेव वचन माता प्रति

माता ते पूछै चितलाई । सत्य वचन कहो तुम माई ॥ तुमरा चरित हमहीं नहि जाना । आप आप मिलि कीन बखाना ॥

माता वचन

तबहीं ज्योति उचारी बानी । अहै काल सब पर परधानी ॥ कौन है बालक राखन हारा । आप पुरुष जो कीन हँकारा ॥ जाइके तुरत देहु पहुँचायी । जहवाँका जीव तहँवा चलियायी ॥

तीनों देवका कालसे रक्षा करनेमें असमर्थ होना और गरुड़का बालकको जिलानेकी प्रतिज्ञा करना

बाधसागर

( १३ )

सत्गुरु वचन

तब तो ब्रह्मा ध्यान लगावा । तुरतहि गये ब्रह्मके ठावा ॥ ब्रह्मा वचन तब उठा परमाना । आदि पुरुषका मर्म न जाना ॥ तुम ब्रह्मा गर्व बहु भाखा । ताते जोति छिपाय के राखा ॥ माता ते नहिं अन्तर करते । फिरि फिरि देह सु काहे धरते ॥ ब्रह्मा तवै रहे अरथाई । सन्मुख बात कही नहीं जाई ॥

गरुड वचन

तीनों देव विवस जब भयऊ । देखि गरुड तब बोलन लयऊ ॥ अब जनि भूलो तीनों देवा । आदि पुरुषकी करो तुम सेवा ॥

सत्गुरु वचन

तीनों देव मिलि मंत्र यक कीना । बालक को विदा कै दीना ॥

तीनों देव वचन

सुनु बालक तेरी मृत्यु तुलायी । कौनी शांति कै तोहि जियायी ॥ तुमते कहैं हम वचन प्रकासा । हम जो गये ज्योतिके पास ॥ ज्योतिस्वरूप हम कहा बुझायी । अब तुम बरजहु काल बनायी ॥ तबही ज्योति वचन अस भाखी । यहि बालकको अबको राखी ॥ अवधि तोहार नियरिहोय आयी । अब कोइ राखे राखि न जायी ॥ साखी-हम तीनों को धिग है, जीवन धृग हमार । हमसे बालक ना जिये, मिथ्या कीन्ह हँकार ॥ बालक तो जीवै नहीं, मिथ्या जन्म हमार । यह चरित्र ना जानिया, केहि करें उपचार ॥

गरुड वचन-चौपाई

जो धिरकार तुम कीन पुकारा । अपने मनमें करहु विचारा ॥ गर्व अभिमान छोड़ु सब भारा । मन अपने तुम मन्मदु हारा ॥ वो तो पुरुष गर्व नहिं भाखे । तुम यम काल अपने शिरराखे ॥

( १४ )

गरुडबोध

जो तुम ब्रह्मा मुक्ति गति पायी । तो तुम राखहु काल बचायी ॥ जो ब्रह्मा इतना नहीं जानो । तौ काहे को आपा ठानो ॥ बोलहु जानि तुम गर्ब निदाना । तुम धिरकार आपको आना ॥ ब्रह्मा कस तुम आपा ठाना । ऊ गति काहू बिरले जाना ॥ जो ब्रह्मा तुम मृत्युगति जानौ । हठिकै ज्ञान तु काहि बखानौ ॥ वह तो पुरुष सबै ते न्यारा । अगम अपार पावे नहीं पारा ॥ साखी-ब्रह्मा विष्णु जाने नहीं, जाने नहीं महेश । ज्योति आप न जानई, रचे जो कालको भेश ॥

चौपाई

सुन ब्रह्मा मैं कहौं बुझाई । तुमरे किये होय का भाई ॥ गर्ब गुमान सब देहु बहायी । तबहीं तुम सतगुरु पदपायी ॥ साखी-ऐसो काल वर जोर है, आस्थो सत्तर योग । अमृत नाम सो मन दर्ई, लेहु अमर रस भोग ॥

चौपाई

जो नहीं ब्रह्मा सांच कै मानो । तौ यह बालक हमपै आनो ॥ जो प्रभु हम कहैं नाम सुनायी । ताकहैं चरित्र तुम देखहु-आयी ॥ सांच झूठका करहु निवेरा । आखिन देखि करहु बहुतेरा ॥ सत्यलोक अमरपुर डेरा । काल नहीं तब ताकहैं घेरा ॥ जो कोइ शब्द का करे निवेरा । सत्य लोक पावे सो डेरा ॥ साखी-जो संशय अब छूटे, घट सो चलै बरजोर । सुमिरन दीन दयालका, पहुँचे सो वहि ठौर ॥

चौपाई

अस कहि गरुड यकज्ञान विचारा । बालक लाईसो उत्तरो पारा ॥

ब्रह्मा वचन

अचरज बात ब्रह्मा को लागी । देखतु विष्णु गरुड तुम्ह त्यागी ॥ तुमरे सन्मुख करे यह रंगा । तुमरी भाव भक्ति करे भंगा ॥

बोधसागर

( १५ )

जो बालक जीवित लै आने । होय अचल तब जगत बखाने॥ ब्रह्मा विष्णु अस बात विचारे । गुरुड वचन परिहास निकारे ॥ उधर गुरुड कीन अस अरम्भू । जो नहीं जाने हरिहर शम्भू ॥ मानसरोवर गुरुड जब गयऊ । ताकी सुधि हंसन तब पयऊ ॥ आवहु गुरुड महा सुख ज्ञानी । मित्र सुनावहु लोक कि बानी ॥ हंस अजरमुनि द्रौप महाँ रहई । द्रौप देखिके बातें कहई ॥ मानसरोवर माँहि है भाई । उपजन विनशन तहाँ न पाई ॥ मानसरोवर ज्योति बहु कीना । कामिनि कला पुरुष रचिदीना॥ सरोवर माँहि रहे सब भाई । बिनशे देह मृत्यु जो पाई ॥

अजरमुनि वचन

कहो विहँसि मुनि कहवौंते आये । सो भेद मोहि कहु समझाये ॥

१ इस पुस्तक गुरुबोध की १० । १२ प्रति मेरे सम्मुख रखी हुई हैं । जिनमें से १ प्रति सम्बत् १७०३ विक्रमों की लिखी हुई है जो मेरे पिता शिवरहर राज्यके पूर्व अमात्य कबीरपंथके विहार प्रांतीय स्तम्भ परमज्जानी श्रीमान् यशस्वी गोपाल तालजीकी पुस्तकालयकी है । और दूसरी प्रतियोंमें से ४ प्रतियाएँ सम्बत् १८०० से १९०० सम्बत् विक्रमों के बीचकी लिखी हैं । और १ प्रति सम्बत् १९१३ विक्रमोंकी तथा ४ प्रतियाँ उसके पीछेकी लिखी हुई हैं । सम्बत् १९०० तक की जितनी प्रतियाँ लिखी हुई हैं सबमें बही ऊपर की चौपाई लिखी है और उनमें हंस अजरमुनि का ही मानसरोवरमें गुरुजीसे मिलनेका हाल लिखा है किन्तु उसके पीछेकी प्रतियोंमें कहीं तो अजरमुनि और कहीं चन्द्रमुनि लिखा है, इतनाही नहीं ग्रन्थमें ऊपर लिखा है “चन्द्रमुनि-वचन” तो नीचे लिखा है “अजरमुनि द्रौप रहाय” कहीं लिखा है हंस मुनि इस प्रकारसे भेद पड़नेके कारण पुरानी प्रतियोंके अनुसारही “अजरमुनि” रखा है । योंतो उत्तरोत्तर की लिखी हुई प्रतियोंमें लेखक महाशयोंकी कृपासे ग्रन्थोंमें कुछ कुछ भेद होता हो गया है, तथापि १९०० सम्बत् के प्रथमकी लिखी हुई पुस्तकोंमें है । इतना अन्तर नहीं है जितना १९१३ बालों प्रतिसे लेकर उसके पश्चात् की प्रतियोंमें है । इधरकी लिखी हुई प्रतियोंमें कई तो ऐसे हैं जिनमें “अ” के स्थानमें समस्त पुस्तकमें “य” काही प्रयोग किया है “अ” का गन्ध भी नहीं है ।

गरुड़का लोक लोकान्तरमें अमृतके लिये फिरना और सब लोकपालोंसे चर्चा करना

( ९६ )

गरुडबोध

गरुड वचन

सुनहु अजरमुनि कहौं बुझायी । अकथ कथा कह्यु कह्योन जायी ॥ सुनत हंस यह अकथ कहानी । तीनों देव बडे अभिमानी ॥ ब्रह्मा विष्णु लगायी बाजी । अपनी अपनी सब करहिं अवाजी ॥ तब समरथ एक कला उपायी । बालक भेद न जाने भाई ॥ तब हम एक बोल्यो बानी । बालक एककी मृत्यु तुलानी ॥ प्रथम तो बाद बहु ठाना । बालक देखत बहुत लजाना ॥ उन अपने जीव सोच बहु कीना । यहि बालकको किनहुन चीना ॥ तब उन पुरुष सांच कर माना । है कोइ पुरुष आदि निर्वाना ॥ हारि मानि के बिदा जो कीना । तुम्हरे द्वीप तानि पग दीना ॥ अब ऐसी युक्ति तुम ठानो । जाते होय सब काज प्रमानो ॥ बालक जिए सोइ अब कीजे । साचा अमृत मोकहँ दीजे ॥ तीनों जने तब जाहिं लजायी । सत्य पुरुष की सत्य कै पायी ॥ ये तीनों तो गर्व भुलाना । निर्गुण तो वे आप कर जाना ॥ महापुरुष कोइ मान न भाई । आप गर्व दुनिया भरमाई ॥ सुनहु अजरमुनि हंस सो ज्ञानी । कैसे रहो सरोवर आनी ॥ कौन यतन सरोवर में आनी । सरोवर के गुण कहो बखानी ॥ साखी-कैसा सरोवरमान है, कैसे रहे समाय ।

किहि विधि इसको नांघि के, सत्यलोकको जाय ॥

अजर मुनि वचन-चोपाई

सुनहु गरुड तुम सत्य हो साधू । तुमरी भक्तिसों अहै अबाधू ॥ तुम तो आदि अंत सब देखा । कहो तुमहि जो सकल विशेषा ॥ जो कोइ आदि अंतकै जाने । तासों कौन वृथा हठ ठाने ॥ सुनहु गरुड मैं कहौं प्रमाना । ताको कहिये कहा जो माना ॥ जो प्रभुकी अंतगति जाने कोई । तासों पुनि सत कहिये सोई ॥

बोधसागर

( ९७ )

सुनहु गुरुड साधुन के स्वामी । सबकी महिमा तुम भल नामी॥ हम तो ज्ञान सब तुमसे पावा । तुव प्रताप हम लोक सिधावा॥ साखी-समरथ नाम अमरपुर, अजर द्रौप अस्थान । उहवाँ रहत हैं हंस सब, पावहि पद निरवान ॥

चौपाई

अक्षय द्रौप पुरुष अस्थाना । तहवाँ रहैं सब हंस सुजाना ॥ सदा आनन्द होत तेहि ठाँके । नहिं तहं चले कालकर दाँके ॥ साखी-हंसा विलासहिं द्रौपमहैं, भोजन करहिं अघाय । जरा मरण व्यापै नहीं, नहिं आवैं नहिं जायैं ॥

गुरुड वचन

अमृत देहु बताइके पुरुष नाम कहि देहु । बालक लेहु जिवाइके, इतना यश तुम लेहु ॥

चौपाई

कहहु पुरुष कैसे के बोला । कहसे प्रभु सो सम्पुट खोला ॥

अजरमुनि वचन

आपुहि में वह अमृत कीन्हा । आपुहि साहब कहि जो दीन्हा॥ अमी बुन्द प्रथमहि उपजाया । अमी बुन्द ते अमृत आया ॥ साखी-ज्ञानी कहै विचारके । सुनो गुरुड चित लाय । गति को भक्ति दिढावहु, बालक लेहु जिवाय ॥ बालक लेउ अमर कै, अमी द्रौप चलि जाउ । हठ कै भक्ति हठावहु, अजर अमर होय आय ॥

गुरुड वचन-चौपाई

कहै गुरुड बालक अकुलाई । अमृत दैके लेहु जिवायी ॥

अजरमुनि वचन

सुनहु गुरुड तुम ज्ञान गँभीरा । तुम तो पुरुष पा अस्थिरा ॥

नं. ५ कबीरसागर - ५

( ९८ )

गरुडबोध

जाहु तुरत वरुण के ठाई । वरुण अहैं हमार गुरु भाई ॥ पवनै द्रौप रहे वह वैसा । तोसों कब्बो भेद है जैसा ॥ साखी-शीस श्रवण नहिं नासिका, इन्द्री साधे घाट । यहि रहनी वह रहत है, सुरति शब्द के बाट ॥

चौपाई

गरुड चले वरुण की ठाई । अमी द्रौप मोहि देहु बताई ॥ तुरतहि वरुण दीन उपदेशा । हमते पूछौ कौन सँदेशा ॥ तुम सब भेद जानत हो भाई । तुरतहि जाऊ श्रवण की ठाई ॥ वही श्रवण कहै सम भेवा । वह तो करइ समर्थ की सेवा ॥ वह लौलीन प्रभू को जाने । साधु संतको सेवा ठाने ॥ सत्य पुरुष को जाने भेवा । सकल खबर कह जाने देवा ॥ द्रौप द्रौपकी कहै जो बानी । जाहु जहाँ घर होय निर्बानी ॥ जाहु तुम उनही के पास । सत्य शब्द कहो परकासा ॥ जहाँ कहैं तहवाँ चलि जाऊ । अमृत लेके बाल पिआऊं ॥

सतगुरु वचन

तुरत गरुड गये तब तहवाँ । सत्य पुरुष को द्रौप है जहवाँ ॥

गरुड वचन

श्रवण हंस मोहि कह समुझाई । कौन ठाम अमृत देहु बताई ॥

अवन वचन

तब श्रवण यक बोलेउ बानी । पुरुषकी गति अजहूँ नहिं जानी ॥ विनु आज्ञा कैसे तुम कहऊँ । कौनी भाँति भेद मैं लहऊँ ॥ हैं अमृत नहिं राखूँ गोई । इतना पातक लागे मोई ॥ पुरुषउ थापि अमृत जो दीना । हमको कैसे नास्ती कीना ॥ सांखी-कहे श्रवण मैं भाषेउ, अमृत का सब भेव । मारग कोई जानई, ऐसो अखंड अभेव ॥

बोधसागर

( ११ )

तुरतहि जाउ निर्मल पासा । ताते पुजिहै तुम्हरी आशा ॥ ताके संग जोइ मिलि रहई । ऐसो शब्द दोऊ मिलि कहई ॥

गुरु बचन

श्रवणदास कहि बहु समझाओ । तुम्हरी दरशनको हम आओ ॥ द्वीप सकल हम देखे भाई । सोई छाप मोहि देहु देखाई ॥

गुरु बचन

निर्मल संग यक भँवर रहाई । सोई भौर ले सब भरमाई ॥ निरमल लेके लोकहिं जावे । भरमें जीव को लोक पठावे ॥ इन दोनों कर जाने भेवा । फिर भौसागर होय न खेवा ॥ साखी-अमृत पिआव विचार के, पुरुष नाम कहि देहु । बालक लेहु अमराय के, इतना साँच गहि लेहु ॥

चौपाई

पुरुष नाम तुम जानो भाई । हमते काह करहु चतुराई ॥ पुरुष नाम है तुम्हरे पास । तुम्हरे घट में सत्य निवासा ॥ जैसे रहे पुरुषमें बासा । ऐसे पुरुष तुम्हरे पास ॥ एक नाम को अनेक विचारा । जिन जाना तिन उतरे पारा ॥ प्रथम पुरुष अहै यक भावा । दुसरे पुरुष देह धरि आवा ॥ तिसरे पुरुष परफुल्लित नाऊँ । चौथे पुरुष सत्यपुर गाऊँ ॥

गुरु बचन

कहो पुरुष कौन विधि बोले । कैसे के प्रभु सम्पुट खोले ॥ कौन शब्द प्रभु बोलन लीना । कौन भाँति कूर्म सो कीना ॥ कौन यतन अमृत फल लावा । कौन यतन हंस सो पावा ॥ कौन यतन उहाँ पुनि आवा । कौन यतन उन मान धरावा ॥ बारह पालँग कूर्म जो कीन्हा । तेहि ऊपर प्रभु सेज्या दीन्हा ॥ परफुल्लित होय साहिब बोला । उचरी बानी संपुट खोला ॥

( १०० )

गरुडबोध

आपहि माहि आप प्रभु कीना । तहँते अमृत कूर्म को दीना ॥ अम्बु नाल ते अमृत आया । अम्बुज ते अमृत उपजाया ॥ सारखी-श्रवण कहे विचारिके, सुनो गरुड चित लाय । धीरज भयो तेहि हृदु भये, अमृत पिये अघाय ॥

चौपाई

सन्धि नाम प्रथम सहिदानी । ऐसे भये सब जीवन जानी ॥ भयड नाम अकह उगासा । सुकृत जोइन नाम प्रकासा ॥ अजीत है ओंकार हंकारा । निसरत है सो ओही द्वारा ॥ उत्पति ऊर्ध्व गे ऊर्ध्व विशेषा । सो हम तुमसे भाषेड लेखा ॥ भयो प्रकाश सुरति जो कीन्हा । ऊर्ध्वते ऊर्ध्व प्रभु पार जो लीना ॥ सारखी-अर्ध ऊर्ध्व दोऊ लखै, पार जो रहे ठहराय । कहे श्रवण बहु गरुडसे, सुखसागर रहे समाय ॥ लोक लोकमह प्राण है, रहे द्रौप अस्थान । उदय अस्त तहवाँ नहीं, ब्रह्म विष्णु नहिँ खान ॥

चौपाई

देह धरी सुख बोल जो आवा । तबही परम पुरुष कहलावा ॥ अजर अमर अधार है ठाऊँ । अहै अटल वा पुरुष को नाऊँ ॥ वही पुरुष का सुमिरन करई । आवा गमन भवसागर तरई ॥ वही शब्द है अमृत रूप । वही शब्द अहै अजब अनूपा ॥ सारखी-वही शब्द गडु सत्यकै, बालहि कहु समुझाय । बालक लेहु यमराजते, अमी द्रौप पहुँचाय ॥

चौपाई

विष्णुहि लोके माला देहू । शब्द हमार प्रमान के लेहू ॥ विष्णुहिमाला तिलक औ छापा । और न दिलमें आनहु आपा ॥ सारखी-श्रवण कहै गरुड से, यही तुम्हारो काम । देहु उपदेश अब जायके, बालहि दीजे नाम ॥

बोधसागर

( १०१ )

चौपाई

धन्यगुरुड मृत्युलोकते आओ । बहुरिजाय मृत्युलोक चिताओ॥ अब जाई तुम विष्णु चिताओ । जो वह चेते तो नाम दृढाओ ॥ लीन गुरुड बालक अगराई । अमृत पीवत अती जुडाई ॥ बालक अमृत माहिं जुडाना । युगन युगन को क्षुधा बुझाना॥ गुरुड विदा हंसन सों लीना । मस्तक नाइ प्रदक्षिण कीना ॥

श्रवण वचन

तब हंसा पुनि कीन निहोरा । तुमतो गुरुडन कीन्ह यह जोरा॥

गुरुड वचन

तुमही छाडि शीस केहि नाऊँ । तुमरे चरणकमल चित लाऊँ॥ तुम तो अमृत दीन दिखायी । सतगुरु शब्द लीन अर्थायी ॥ शीस सोई जो साधु को नावे । पूजा सोई जो नाम लौ लावे॥ मुख सोई जो उचरे नामा । देह सोई जो प्रभुके कामा ॥ दैवत सोई जो बन्दगी ठाने । दया सोई अमि अन्तर आने॥ साधू सोई जो ममता मारे । ममता मारि आप को तारे ॥ साखी-बालक लिये अमरकरि, विष्णुहि कह्यो समुझाय । चले गुरुड मृत्युलोकको, ब्रह्मा रहे लजाय ॥

चौपाई

यहि विधि बालक लीन जियायी । सकल सभा तहाँ देखे आयी ॥ धन्य धन्य सब करहिं पुकारा । धन्य गुरुड है रहनि तुम्हारा ॥ धन्य धन्य सबही मन भावा । गुरुड बोल सब ऊपर आवा ॥ नाग लोग की कन्या रहाई । अचरज होय कछु न कहाई ॥

नागकन्या वचन

अविगत मता है गुरुड तोहारा । कोई न जाने भेद अपारा ॥ इतना कहि अनुराग सो धरिया । शीस नाइ चरणन पर परिया॥

( १०२ )

गरुडबोध

वासुकि देवकी कन्या भाई । शीस नाइ के विन्ती लाई ॥ रूप उग्र बहुते उजियारा । मानिक लव्के माहि लिलारा॥ एतिक आगरी किये सिंगारा । जगमग ज्योति बरे उजियारा॥ सो पुनि कन्या विन्ती करई । गरुडके चरण आय शिर धरई॥

वासुकि देवकी कन्याका वचन

हो साहिब तुम बन्दी छोरा । नष्ट जाय जिव तुमहिं निहोरा॥ हो साहिब विन्ती सुनि लेहू । हमरे गृहै तुम चरण धरेहू ॥ हम दीक्षा प्रभु लेव तुम्हारा । जिवका कारज करो हमारा ॥

गरुड वचन

कहे गरुड सुनु कन्या वारी । तुम सबहिनकी प्राणपियारी ॥ पूछहु वासुदेव सों जाई । आज्ञा देहिं तस करो उपाई ॥ अस तुम जाय सिखापन लेहू । पुनि फिर के हमही दल देहू ॥

कन्या वचन

ब्रजबाला कन्या अस बोले । जो हम कही कबहु नहिं डोले॥ साहिब विन्ती सुनो हमारो । सकल समाज संग पग धारो ॥ इन्द्रलोक ते इन्द्र बुलाये । सुर नर सुनि गैधर्व जो आये ॥ चले विष्णु जहँ गहरन लायी । शिव ब्रह्मा तहँ चले रिंगायी ॥ तेतिस कोटि देव तहँ आये । सिद्ध चौरासी सबै सिधाये ॥ नौ नाथ अरु सब बचे बचाये । सबही चले रहे नहिं भाये ॥ शंख वीण धुनि बाजे भाई । इन्द्र को बाजा अति घहराई॥ ताल मृदंग और शहनाई । सब ही बाजन बाजे भाई ॥ साखी-इन्द्र के बाजन बाजते, भये पताले त्रास । वासुदेव डरि कर्मपै, बैरी आयो पास ॥

१ बमके ।

बोधसागर

( २०३ )

गुरु वचन

ब्रजबाला कन्या हँकरायी । आयसु देह के आगु रिंगायी॥ वासुकिदेव सों कहु समझाई । साधु रूप सब आवैं भाई ॥ सुनते कन्या तुरत रिगायी । वासुकिदेव सों कही समझायी॥

कन्या वचन

निर्गुण भक्ति गुरुड जो ठानी । तेहि कारण हमगुरुडहि मानी॥ होहु सुचित्त सबै परिवारा । निजकै मानहु वचन हमारा ॥ सारखी-सकल साधु इहैं आवहीं, होय चौका विस्तार । चित्त में कोइ डरौ नहीं, वह हैं भक्ति अधार ॥

वासुदेव वचन-चौपाई

ब्रजबाला कन्या सुनु आनी । सबही तुरत तु आन बुलाई ॥ जाहु तुरत गुरुड के ठाऊँ । दाय़ा करहु धरत सब पाऊँ ॥

सतगुरु वचन

सुनि बाला लै गयउ विमाना । दया करत सब संत सुजाना ॥ जबहि शेष प्रतीति मन आनी । तबही गुरुड सु कीन्ह पयानी ॥ जब गुरुड जो चले रिगायी । बाजन बाजे वरनि न जायी ॥ बाजे डमरू हने निशाना । महादेव जब कीन्ह पयाना ॥ सबहि समाज पताले गयऊँ । इच्छा भोजन सबही लयऊँ ॥ एकोत्तर सै नरियर आना । बहुत भांतिकै कीन्ह मंडाना ॥ जबही गुरुड जो सुमिरन कीन्ह। तब हम उनको दर्शन दीना ॥ गुरुड आइके मस्तक नाये । शीस नवाइ चरण चितलाये ॥ सकल जमात उठी भई भाई । सबहिन उठि के मस्तक नाई॥ तब हम पुनि चौका विस्तारा । बहुत भांतिके साज सुधारा ॥ सुथरी मिठाई उत्तम पाना । ब्रजबाला सबही कहु आना ॥ जब तिन सबै साज सँवरावा । तब हम लोकते हंस हँकरावा॥ आये साधू लोक से भाई । जग मग ज्योति बरइ अधिकार्ई॥

गरुड़का अमृत लाकर बालकको जिलाना और तीनों देवका हार मानना

( १०४ )

गरुडबोध

बाजे ताल मृदंग अपारा । उठे रँगसों अनहद झंकारा ॥ तारी उठे तत तत सों सारा । हंसे सबै सब साधु विचारा ॥ निर्गुण भक्ति कीन्हा लौलायी । चहुँदिशि अगर रहा मँहँकायी ॥ देख सभा सब मोही भाई । सब मोहे कछु कही न जाई ॥ मोहि नाग नागेश्वर भारी । मोहि रही सब सभा विचारी ॥ मोहे गण गँधर्व मुनि देवा । कोई भक्त का जाने न भेवा ॥ वासुकिदेव अस्तुति अनुसारी । धन्य कबीर जो भक्ति तुम्हारी ॥ पायो दर्श धन्य भाग हमारो । धन्य कबीर यहाँ पग धारो ॥ धन्य कबीर तुम्हारी वानी । मोहि रही सब भगतिन रानी ॥ कीन्हो भक्ति पहर डुइ भाई । अति आनँद होय मंगल गार्ई ॥ पुनि उठिके हम आरति लीना । एकोतर नरियर मालुम कीना ॥ परवाना ब्रजबालहि दीनी । वह शिर नाइ बन्दगी कीनी ॥ पुनि समरथकी अस्तुति सुनायी । दीन प्रसाद सबहि बरतायी ॥ सब संतन लिन माथ चढ़ाही । आशिष दीन सकल मिलिताही ॥ दिन दशकै आदर करि लीना । सेवा भक्ति बहु विधि कीना ॥ संत साधुको बिदाई दीना । चादर धोती सबही लीना ॥ सबहि कहै मम आशिष लीजो । साधुन के चरणें चित दीजो ॥ ऐसी भाँति बिदा जो कियऊ । आपु आपु सब घरहि सिधैऊ ॥ चलत प्रेम सबहि को भाये । बहुत भाँति की अस्तुति लाये ॥

साखी-कहैं कबीर धर्मदाससे, यहि विधि भौ विस्तार । गरुड ज्ञान सबसे कियो, हारे सबे भुआर ॥ वक्ता के कण्ठ बसुँ, श्रेतहि श्रवण आहिँ । संतनके शीश वसुँ, ज्ञानिन हृदय माहिँ ॥

इति श्रीबोधसागरांतर्गत कबीरधर्मदाससम्भावे

गरुडबोधवर्णनो नाम षष्ठस्तंभः

गरुड़ बोधका संक्षेपसार

बोधसागर

( १०५ )

गरुडबोधका संक्षेप सार

प्रायः कबीरपन्थी लोग ऐसे गरुडबोधादि ग्रंथोंके भावको न समझ कर अन्य वैष्णव आदि सम्प्रदाइयोंसे इन्हीं ग्रन्थोंके प्रमाण द्वारा वाद करके परस्पर रागद्वेषमें फँसकर निन्दाके पात्र बनकर, नास्तिकादि नामों के लक्ष्य बने हैं। और जिस प्रकार से इनमें अविद्याका विशेष प्रताप फला है उसी प्रकारसे अन्य सम्प्रदाय वालोंमें भी अज्ञान देवने अपना राज्य जमा रखा है। जिस कारणसे विद्या और ज्ञानका तो उनमें प्रवेश भी होने नहीं पाता। यही कारण है कि, वे भी अपने इष्ट देवके स्वरूपको न समझकर कबीरपंथियों के तर्कको सुनकर उन्हें समझाने या उत्तर देकर उनका समाधान करनेमें असमर्थ होनेके कारण उन्हें नास्तिक और निन्दक आदि नामोंसे पुकारते और उनसे द्वेष करते हैं। किन्तु दोनों दलोंमें जो ज्ञानी और समझदार हैं, आत्मतत्त्वमें जिनका प्रवेश हुआ है जिन्होंने शास्त्र और ग्रन्थों का मनन करके उनके भेदको समझा है, वे न तो किसीके ऊपर बहिरदृष्टि और द्वेष अथवा निन्दा के भाव से तर्कही कर सकते हैं न उनके वाक्यको सुननेवाले ज्ञाता लोग उनमें नास्तिकता ही का अनुमान कर सकते हैं।

कबीर पंथमें जितने ग्रन्थ वर्तमान हैं वे सब अध्यात्म विद्या की पुस्तक हैं। जो कुछ उन ग्रन्थोंमें लिखा है सबका आध्यात्मिक अर्थही ग्रहण करने योग्य है। यदि आध्यात्मिक अर्थको छोड़कर साधारण अर्थ और शब्दार्थको ही ग्रहण किया जाय तो न जाने असम्भावता आदि कितने दोष आकर उपस्थित

( १०६ )

गुरुडबोध

हो जावेंगे । और स्वयम् कबीर साहिबमें ऐसे २ अनर्थका दोष लग सकेगा कि, जिस कलंकको मिटाना कठिन ही नहीं बरन् असम्भव है । इतना ही नहीं ग्रन्थोंमें बात बातमें आध्यात्मिक अर्थ भी बतलाया गया है और जिस ग्रंथकी जैसी प्रक्रिया चली है वैसेही उसका निर्वाह भी किया गया है जो लोग मनन और विचार किये विना केवल शब्दों और पदोंको लेकर लड़ते झगड़ते हैं उन्हें कबीर साहिबके इस मसले पर ध्यान देना चाहिये कि—“कबीरका गाया गावेगा । तीन लोकमें धक्का खावेगा ॥ कबीरका गाया बूझेगा । तीन लोक वहि सूझेगा”—जैसे इसी ग्रन्थमें यदि गुरुडका वही साधारण अर्थ लिया जावे जैसा सर्वसाधारण समझते हैं, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि विष्णु उपासकोंके समक्ष इस पुस्तकको बाँचनेवाला मार खाये विना नहीं रहेगा—किन्तु जब उसी का आध्यात्मिक अर्थ समझेगा और दूसरोंको समझावेगा कि, गुरुड नाम है जीवका, विष्णु नाम है सतोगुणका अर्थात् सतोगुणभावों करके सम्पन्न जो मुमुक्षु है उसको जब ज्ञानी गुरु मिलता है तब उसे त्रिगुण ( रजोगुण ) ( ब्रह्मा ) सतोगुण ( विष्णु ) तमोगुण ( शंकर ) के जाल से निकाल कर त्रिगुणातीत कर देता है—अर्थात् सतपुरुष रूप उसके प्रत्येक आत्माके स्वरूपका ज्ञान करा देता है । तब गुरुड रूप मुमुक्षु तीनों गुणोंको जीत कर शरीर निर्वाह अथवा प्रारब्ध बलसे यावज्जीवन सतोगुणके दिव्य गुणोंको सम्मुख रख कर आनन्दपूर्वक विचरता और दूसरोंको भी अधिकार पूर्वक उपदेश देकर सत्यपदकी पारख बतलाता है । इसी प्रकारसे कबीर पंथके सर्व ग्रन्थोंका आशय आध्यात्मिक है ।

जो इन ग्रंथोंको पढ़कर अपने आत्माके कल्याणार्थ सत्य अर्थको ग्रहण न करके केवल शारीरिक सुख और

बोवसागर

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मनकी तुच्छ तुच्छ वासनाओंको पूर्ण करनेके लिये अपने समझे विना दूसरे जीवों को मिथ्या भ्रम में डालते हैं वे मिथ्या भ्रम को उठाकर पाप के भागी बनते हैं । सद्गुरु की कृपा होगी तो ग्रन्थों को छपवा लेने के पश्चात् सब ग्रन्थों के सारको प्रदर्शित करानेवाला एक स्वतंत्र पुस्तक प्रकाशित करके मिथ्या प्रचलित भ्रम को दूर करनेका प्रयत्न करूँगा ।

इसके प्रथम भोपालबोध आदि ग्रन्थ जो छपे हैं उनका भी भाव आध्यात्मिक समझना चाहिये ।

इति

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श्रीबोधसागरान्तर्गत

ग्रन्थ गुरुडबोध

समाप्त

भारतपथिक कवीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संशोधित

श्री-हनुमानबोध

मुद्रक एवं प्रकाशकः

खेमराज श्रीकृष्णदास,

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, बम्बई-४०० ००४

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