कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
(४४)
कबीरपंथी—
॥ जय २ ॥ परम मनोहर रूपम्, प्रमुदित सुखरासी । अति अभिनव अविनाशी, काशी पुर वासी ॥ जय २ ॥ हंस उबारन कारन, प्रगटे तन धारी । पारखरूपविहारी, अविचल अधिकारी ॥ जय २ ॥ साहब कबीर की आरति, अगनित अघहारी । धर्मदास बलिहारी, सुद मंगल कारी ॥ जय २ ॥
आरति ॥ २ ॥
जय जय श्रीगुरुदेव ।
पारख रूप कृपालम्, सुदमय त्रैकालम् । मानस साधु मरा- लम्, नाशक भव जालम् ॥ जय २ ॥ कुन्द इन्दु वर सुन्दर, सन्तन हितकारी । शान्ताकार शरीरम्, श्वेताम्बर धारी ॥ जय २ ॥ शुभ्र सुकुट चर्कांकित, मस्तक पर सोहै । विमल तिलक युत भृकुटी, लखि सुनिमन मोहै ॥ जय २ ॥ हीरा मणि सुक्तादिक, भूषित उर देशम् । पद्मासन सिंहासन, स्थित मंगल वेषम् ॥ जय २ ॥ तरुण अरुण कञ्जांघ्रि, त्रिभुवन वश कारी । तम अज्ञान प्रहारी, नख छुति अति भारी ॥ जय २ ॥ सत्य कबीर की आरति, जो कोइ गावै । सुक्ति पदारथ पावै, भवमै नहिं आवै ॥ जय २ ॥
आरती ॥ ३ ॥
संज्ञा आरतीनाम तुम्हारे । अनहद ध्वनि गुरुज्ञान विचारे ॥ ततकर तेल दयाकर दीपा । ब्रह्मअग्नि मन पवन समीपा ॥ पांचो बाती निरमल बारो । सुरति चैँवर ले सनमुख ठारो ॥ प्रेमकर पुहुप धूप धर ध्याना । चित चंदन घसि आगे आना ॥ अविगतरूप अघर परकासा । आरति गावे कविर धर्मदासा ॥
आरती ॥ ४ ॥
संज्ञा आरति करे गुरुसेवा । संपुट खोल मिले गुरुदेवा ॥ तेजपुंजकी ज्योति उजियारा । घंटा झाँझ बजे अधिकारा ॥
शब्दावली
(४५)
अनहद शब्द अखंडित होई । अगवासमें रहे समोई ॥ सुकृत अंश पुरुष को ध्यावे । सतगुरुचीन्ह चरण चितलावे ॥ मनबच कर्म जो आरतिगावे । कहे कबीर सतलोक सिधावे ॥
आरती ॥ ५ ॥
संज्ञाआरति सुकृत कीन्हा । हंस उबरि अपन करलीन्हा ॥ गगनमंडलबिच फुल्य कफुला । तर भी डार उपर भी मूला ॥ गगनमंडलबिच आरति साजे । सोहैं हंसा आन विराजे ॥ तत निहतत मैं जाय समाना । देखहु दीप अघर अस्थाना ॥ कहैं कबीर सुनु साधो भाई । अजर अमर घर रहो समाई ॥
आरती ॥ ६ ॥
संज्ञा आरति करो विचारी । कालहृत जम रहे झखमारी ॥ खुलगइ सुषमन कूंचीतारा । अनहदशब्द उठे झनकारा ॥ सुरत निरत दोय उलटिसमावै । मकरतार जिहिं डोर लगावै ॥ उनसुन शब्द अगम घर होई । अचाह कँवलमें रहे समोई ॥ विगसित कमल होय परगासा । आरतिगावै कविर धर्मदासा ॥
आरती ॥ ७ ॥
संज्ञाआरति सुकृति सँजोई । चरणकमल चित राखु समोई ॥ तिरगुन तेल तत्वकी बाती । ज्योति प्रकाश भरे दिनराती ॥ शून्य शिखर पर झाझर बाजे । महापुरुष घर राज विराजे ॥ शब्दसरूपी आप विराजे । दर्शन होत सकल भ्रम भाजे ॥ प्रेमप्रीति कै सेवा लावै । गुरुगम हो परम पद पावै ॥ सुख अनंद है आरति गावै । कहैं कबीर सतलोक सिधावै ॥
संज्ञासाखी
‘कबीर’ संज्ञासुभिरन आरती, भजन भरोसे दास । मनसा बाचा कर्मना, जबलग घटमें श्वास ॥ १ ॥ श्वास श्वास में नाम ले, बूथा श्वास जनि खोय । ना जानो यहि श्वास को, आवन होय न होय ॥ २ ॥
(४६)
कबीरपंथी—
श्वासा की कर सुमिरनी, कर अजपा को जाप । परम तत्त्व को ध्यान धर, सोऽहं आपै आप ॥ ३ ॥ सोऽहं पोषा पवन में, बांधा मेरु सुमेर । ब्रह्मगांठ हिरदय धरो, यहि विधि माला फेर ॥ ४ ॥ माला है निज श्वास का, फेरेंगे कोइ दास । चौरासी भरमें नहीं, कटे करमकी फांस ॥ ५ ॥ सदगुरु मोहिं निवाजिये, दीजे अम्मर बोल । शीतल शब्द कबीर का, हंसा करें कलोल ॥ ६ ॥ 'हंसा' मत डरपो काल से कर मेरी परतीत । अमरलोक पहुँचाइहौं, चलो सो भौजल जीत ॥ ७ ॥ भौजल में बहु काग हैं, कोइ कोइ हंस हमार । कहे कबीर धर्मदास सो, खेड़ उतारो पार ॥ ८ ॥ अविनासी की आरती, गावैं सत्य कबीर । कहैं कबीर सुर नर सुनी, कोइ न लागे तीर ॥ ९ ॥ सांझ भये दिन आथवे, चकई दीन्हौं रोय । चल चकवा तहैं जाइये, रैन दिवस ना होय ॥ १० ॥ रैन की बिछुरी चाकई, आन मिली परभात । जो जन बिछुरे नाम से, दिवस मिले नहिं रात ॥ ११ ॥ हौं कबीर विचलों नहीं, शब्द मोर समरत्थ । ताहि लोक पहुँचाइहौं, चढ़ै शब्द के रत्थ ॥ १२ ॥ तर ऊपर धर्मदास है, जती सती को रेख । रहता पुरुष कबीर है, चलता है सब भेष ॥ १३ ॥ भेष बरोबर भेष है, भेद बरोबर नाहिं । तौल बरोबर घूँघची, मोल बरोबर नाहिं ॥ १४ ॥
शब्दावली
(४७)
निर्विकार निर्भय तुही, और सकल भय माहिं । सबपर तेरी साहिबी, तुझ पर साहेब नाहिं ॥ १५ ॥ भय भञ्जन दुख परिहरन, अम्बर करन शरीर । आदि युगादि आप हौ, अदली अदल कबीर ॥ १६ ॥ विनवतहों कर जोरि के सुनु गुरु कृपानिधान । संतन का सुख दीजिये, दया गरीबी जान ॥ १७ ॥ दया गरीबी वन्दगी, समिता शील सुभाव । इतने लक्षण साधुके, कहैं कबीर विभाव ॥ १८ ॥ बहुत दिननसे जोहता, बाट तुम्हारी राम । जिव तरसे तुव मिलनको, मन नाहीं विश्राम ॥ १९ ॥ सो दिन कैसा होगा, गुरु गद्दोगे बांह । अपना कर बैठावगे, चरण कमल की छांह ॥ २० ॥ क्या मुखले विन्ती कहुँ, लाज आवत है मोहि । हमतो औगुन बहु किये, कैसे भावो तोहि ॥ २१ ॥ सुरति करु मोरि साइयाँ, हम हैं भव जल माहिं । आपेही बहिजायँगे जो नहिं पकडो बांहि ॥ २२ ॥ मैं अपराधी जनम का, नख सिख भरा विकार । तुम दाता दुख भंजना, मेरी करो उबार ॥ २३ ॥ औगुन मेरे बापजी, बखशो गरीब निवाज । जो हौं पूत कपूत हौं, तोहु पिताको लाज ॥ २४ ॥ साहब तुम जनि वीसरो, लाख लोग लगि जाहिं । हम सन तुम्हरे बहुत हैं, तुम सन हमरे नाहिं ॥ २५ ॥ कर जोरे विन्ती कहुँ, भवसागर आपार । बन्दा ऊपर मिहर करी, आवागमन निवार ॥ २६ ॥
(४८)
कबीरपंथी-
अन्तरजामी एक तू, आतम के आधार । जो तू छाडे साथको, कौन उतारे पार ॥ २७ ॥ अबकी जो साई मिले, सब दुख आँखों रोय । चरणों ऊपर शिर धरूँ, कहूँ जो कहना होय ॥ २८ ॥ साहब तुमहिं दयाल हो, तुम लग मेरी दौर । जैसे काग जहाज को, सुझे और न ठौर ॥ २९ ॥ मुझमें अवगुन तुझहि गुन, तुझगुन अवगुन मुझ । जो मैं विसरूँ तुझको, तू नहिं विसरे मुझ ॥ ३० ॥ तेरे विसरे क्यों बने, मैं किस शरने जाँव । शिवविरंचि मुनि नारदा, तिन हृदय नसमाव ॥ ३१ ॥ मैं तो भूल बिगारिया, जनिकर मैला चित्त । साहब गुरुवा चाहिये, नफर विगारे नित्त ॥ ३२ ॥ औगुन किया तो बहु किया, करत न मानी हार । भावे बन्दा बखशिये, भावे गर्दन मार ॥ ३३ ॥ साई केरा बहुत गुन, औगुन एको नाहिं । जो दिल खोजा आपना, सब अवगुनमुझ माहिं ॥ ३४ ॥ मुझमें गुन एको नहीं, जान राय शिर मौर । तेरे नाम प्रतापसे, पाऊँ आदर ठौर ॥ ३५ ॥ मैं खोटा साई खरा, मैं गादा मैं गारि ॥ मैं अपराधी आत्मा, साई सरन उबारि ॥ ३६ ॥ और पतित तो कूप हैं मैं हूँ समुद्र समान । मोहि टेक तोहि नामकी, सुनियो कृपानिधान ॥ ३७ ॥ अवसर बीता अलप तन, पीव रहा परदेश । कलंक उतारो रामजी, भानो भरम संदेश ॥ ३८ ॥
शब्दावली
(४९)
साई मोर सावध अहै, मैही भया अचेत । मन बच कर्म न हरि भजा, ताते निरफल खेत ॥ ३९ ॥ मन परतीत न प्रेमरस, ना कोइ तनमें ढंग । ना जानो वा पीवसो, कयोंकर रहसी रंग ॥ ४० ॥ साई तो जब मिलेंगे, पूछेंगे कुशलात । आदि अन्तकी सब कहूँ, उरअन्तरकी बात ॥ ४१ ॥ अब सागर तो भारी भया, गहरा अगम अथाह । तुम दयाल दयाकरो, तब पाऊँ कछुथाह ॥ ४२ ॥ सतगुरु बडे दयाल हैं, संतनके आधार । भव सागर अथाहसो, खेइ उतारें पार ॥ ४३ ॥
विज्ञानतोत्र
सत्य सत्यके नामसों सत्य सागर भरा, सत्यके नाम तिहुँ लोक छाजा ॥ सन्तजन आरति करें प्रेमतारी भरेँ, ढोलनिश्शान मिरदंग बाजा ॥ भक्ति सांची किया नाम निश्चैलिया, शून्यकी शिखर ब्रह्माण्ड गाजा ॥ सत्य कवीर सर्वज्ञ साहब मिले; भजो सत्यनामका रंक राजा ॥ कबीर, हम दीन दुनी दरवेशा । हम किया सकल परवेशा ॥ हम दुवा सलामत लेखा । हम शब्द सरूपी पेखा ॥ हम रुंध मुंड में फीरा । हम फाका फकर फकीरा ॥ हम रमे कौन की नाल । हम चलैं कौन की चाल ॥ हम सरबझी सहजे रमे, हमरी वार न पार ॥ वार भी हमही पार भी हमही, नाना दरिया तीर ॥ सकल निरंतर हम रमे, हम गहिरे गहर गंभीर ॥ खाली खलक खलक के माँही, यों गुरु कहैं कबीर ॥ सत्यनाम की आरती, निरमल भया शरीर ॥ सत सुकृत लौलीन है, ज्ञान ध्यान लो थीर । “धर्मदास लोके गये गुरु बहिंयां मिले कबीर” धर्मदास लोके गये, छाड़ि सकल
(५०)
कबीरपंथी—
संसार ॥ हंसन पार उतारहीं, गुरु धर्मदास परिवार ॥ अजावन से जावन भया, जावन से भयै मूल ॥ चहुँ दिशि फूटी बासना रही कली में फूल ॥ जब फूले तब गिरि पडे, चरन कमल की धूर ॥ कली फावरी हो रही साहब हाल हजूर ॥ कबीर मिले धर्मदासको, लिख परवाना दीन्ह ॥ आदि अन्त की बीनती, यही लोक को चीन्ह ॥
“ बिना देह साहब निरालम्ब जानी ”
अति लौलीन चीन्हन्त ज्ञानी । शब्देसरूपी सुनाकाशवानी ॥ जानेजनावैकहावैन देवा । ऐसातत्वपुजेपुजावैलगावै न सेवा ॥ सदाध्यानधारी अखंडेनिगसा । सदासिंधुपीवै न जावेपियासा ॥ प्रेमधामधीरा उदासी अकेला । लौलीन योगी गुरु ज्ञान मेला ॥ मिलन्ताचलन्तारहन्ता अपारी । ऐसीदृष्टिदेखोअनंतोविचारी ॥ सदा चेत चेतंत चितवंत सूर। ऐसा रूयाल खेलंत बूझंत पूरा न ज्ञानो न ध्यानो न मान मानों । नहीं चंद्र तारा ऊगे न भानो ॥ आगे न पीछे न मध्ये न कोई । ज्यों काजला ब्रह्म त्यों तत सोई ॥ डारो न मूलो न वृक्षो न छाया । जीवो न शीवो न कालो न काया ॥ दृष्टी न मुष्टी न देवी न देवा । जापो न थापो न पूजा न सेवा ॥ नहीं पौन पानी न चंदे न सूर। अखंडित ब्रह्म सोई सिद्धपूरा । हमनाहीं तुमनाहीं बंधू न भाई । निराधार आधार रंको न राई ॥ गावै न ध्यावै न हेली न हेला । नारी न पुरुषो न खेली न खेला ॥ नहीं पेट पुष्टि न पावों न माथा । न जीवो न शीवो न नाथो अनाथा ॥ शेषो महेशो गनेशो न ग्वालं । गोपी न ग्वाले न कंसे न कालं ॥ आसे न पासे न दासे न देवा । आवै न जावे लगावै न सेवा ॥ नहीं वार पारे न नियरे हजुर। ज्योंका त्यों तत्त गहिरे गंभीरा ॥ यंत्रे न मंत्रे न दरदे
शब्दावली
(५१)
न थोका । नरके न सरगे न संसे शोका ॥ सेते न पीते न सञ्जे न लालं । गोरै न सँवरे न बृद्धे न बालं ॥ भेदा अभेदा न खेदा न कोई । सदा सुरति सोहँग एकै न दोई ॥ जाने जनावे जनावे न झूरा । वारे न पारे न नियरे हजूर ॥ नादे न विंदे न जिदे न जीवा । निरंतर ब्रह्म एकै शक्ती न शीवा ॥ नहींयोगयोगी न भोगी न भुक्ता । सच्चिदानंदसाहब बंधो न मुक्ता ॥ खेले खेलावै खेलावे औ खेले । चेत चेतावे चेतावे औ चेत ॥
“एके अनेके अनेके सो एकै”
चितगुण चित विलास दास सो अंतर नाही । आदि अंत में मध्य गोसाई अगह गहन में नाही ॥ गहनीगहिए सो कैसा, सोहं शब्दसमानआदिब्रह्मजैसेका तैसा ॥ “कहैं कबीर हम खेलैं सहज सुभावा” अकह अडोल अबोल सोहं समिता । तामो आन बसा एकरमिता ॥ वा रमता को लखे जो कोई । ता को आवा- गमन न होई ॥ “ओऽहं सोऽहं सोहं सोई ।”
ओहम्म कीलक सोहम्मवाला । ओऽहं सोऽहम्म बोले रिसाला ॥ किलक कमत कंमोद कंकवत, ये चारों गुरु पीर ॥ धर्मदास को शब्द सुनायो, सतगुरु सत्य कबीर ॥ बाजा नाद भया पर तीत । सतगुरु आये भौजल जीत ॥ बाजबाज साहब का राज मारा कूटा दगाबाज ॥ हाजिरको हजूर गाफिलको दूर हिंदूका गुरुमुसलमानका पीर “सात द्वीत नौखंड में, सोहं सत्यकबीर”
इति श्रीविज्ञानस्तोत्र समाप्तः ।
दयासागरस्तुति ।
गुरु दयासागर ज्ञान आगर, शब्दरूपी सतगुर । तामु चरण मरोज बंदों, सुखदायक सुखसागर ॥ योगजीत अजीत अम्मर,
(५२)
कबीरपंथी—
भाषते सत सुकृतं । दयापाल दयाल स्वामी, ज्ञानदाता इस्थितं । क्षमाशील संतोष समिता, आनंदरूपी हिरदयं । सहजभाव विवेक इस्थिर, निरमाया निहसंशयं ॥ निरमोही निरवैर निरभै, अकथ कथिता अविगतं ॥ उपकार औ उपदेशदाता, मुक्तिमार्ग सत- गुरं ॥ दास भाव की प्रीति बिनती, भक्ति करन करावनं । चौरासी बन्धन कर्म खण्डन, बन्दीछोर कहावनं ॥ त्रिगुणरहिता सत्य बकता, सत्लोक निवासितं । सतपुरुष जहाँ सत्साहब, तहाँ आप विराजितं ॥ युगन युगन सतपुरुष आज्ञा, जीवन कारण पगुधरं । दीन लीन अचान ह्वैके, जगतमें डोलत फिरं ॥ करुणामय कवीर केवल, सुखदायक सर्व लायकं । जम भयंकर मान मरदन, दुखित जीव सहायकं ॥
जीवके उद्धारका मार्ग
धर्मदास करजोर बिनवे, दया करो मन बसकरं । कहूँसेवा गुरुभक्ति अविचल, निसदिनअराधोसुमिरणं ॥ सदगुरु की अधिक महिमा, ज्ञान कुण्ड नहाइये । भ्रमति मन तब होय स्थिर, बहुरि न भौजल आइये ॥ साधुसन्त की अधिक महिमा, रहनि कुण्ड नहाइये ॥ काम कोष विकार परिहरि बहुरि न भौजल आइये । दासतनकी अधिक महिमा, सेवाकुण्ड नहाइये ॥ प्रेमभक्ति पति व्रत हटकरि, बहुरि न भौजल आइये । योगीजन की अधिक महिमा, मुक्तिकुण्ड नहाइये । चन्दसूर मन गगन थिरकरि, बहुरि न भौजल आइये ॥ श्रोता बक्ता की अधिक महिमा, विचारकुण्ड नहाइये । सारशब्दनिवेरि लीजे, बहुरि न भौजल आइये । गुरु साधुसन्त समाज मध्ये, भक्ति मुक्ति हटाइये । सुरतिकर सत्लोक पहुँचे, बहुरि न भौजल आइये ॥ धर्मदास प्रकाश कीन्हो, अकह कुण्ड नहाइये । सकल कलविष धोय
शब्दावली
(५३)
निर्मल, बहुरि न भोजल आइये ॥ साहब कबीर प्रकाश सदगुरु, भली सुमति दिठाइये । सार में ततसार दरसे, सोई अकल कहाइये । धर्मदास पट खोलि देखो, तत्त्व में निहतत्त्व है । कहैं कबीर निहतत्त्व दरसे, आवागमन निवारिये ॥
इति श्रीव्यासागरस्तुति समाप्तः
चेतावनी
नमो ! नमो धर्मनि पातक, पूर रहो मद काम । जिनको लोक बासा दिया, अधम उधारण नाम ॥ अनेक बन्धनते बाँधिया; एक विचारा जीव । अपने बल छूटे नहीं, तुमहिं छुडावहु पीव ॥ मैं अपराधी जनमका, नख शिख भरा विकार । तुम दाता दुख भजना, मेरी करो उबार ॥ अवगुण मेरे बापजी बकसो गरीब निवाज । मैं तो पूत कुपूतहों, तुम्ही पिता कोलाज ॥ विनती है निज दास की, सुनिये दीनदयाल । दास आपनो जानिके, सतगुरु होहु कृपाल ॥ 'कबीर' जम्मन जाय पुकारिया, धर्मराय दरबार । हंस मवासी है रहा, लगे न फाँस हमार ॥ हमरी शंका ना करे, तुम्हरी धरै न धीर । सतगुरु के बल गाजहीं, कहैं कबीर कबीर ॥ कबीर कहंता जानदे, मेरी दसी न जाय । खेवटिया के नाव पर, चढ़े चनोरे आय ॥ बाजा बाजा रहित का, परानगरमें शोर ॥ सदगुरु खसम कबीर है नजरन आवे और ॥
सत्यका शब्द
सत्का शब्द सुन भाई फकीरी अदल बादशाही ॥ साधो बन्दगी दीदार । सहज उतर सायर पार ॥ सोहं शब्दसे कर प्रीति । अनभय अखण्ड घरको जीत ॥ तन में खबर कर भाई जा में नाम रुशनाई ॥ सुरतिनगरमें वस्ती खूब । बेहद उलट चढ महबूब ॥ मूरति नगरामें कर सैल । जामें आतमा को महेल ॥
(५४)
कबीरपंथी—
अमरी मूलसन्धि मिलाव । जापर रखो बाँयाँ पांव ॥ दहिना मध्यमें धरना । आसन अमर यों करना ॥ द्वादश पवन भर पीजे । शशिघर उलट चढ़लीजे ॥ तन मन वारना कीजे । उलट निज नामरस पीजे ॥ तन मन सहित राखो श्वास ॥ इस बिध करो बेहद बास ॥ दोनों नैन के कँर बान । भौरा उलटि कस कमान ॥ परबत छके दरिया जान । करले तिरकुटी अस्नान ॥ सहज परस पद निर्बान । तेरा मिटे आवाजान ॥ जा में गैव का बाजार । सरबर दोह दीसे पार ॥ जा बिच खड़ीकुदरत झार । शोभा कोटि अगम अपार ॥ लागे नौलख तारा फूल । करनी कोटि जरिया मूल ॥ ताको देखना मत भूल । रमता राम आप रमूल ॥ माया भरम की कांची । देखु दिल अन्दरकी सांची ॥ वरषे तूर बिन मोती । चन्दा सूर की जोती ॥ झलके झिलमिला नारी । ताबिच अरूप है कयारी मानो प्रेम की झारी । खुलगई अगम किंवारी ॥ बेडा भरम का खोया । दीपक नामका जोया ॥ जोगी जुगतसे जीवे । प्याला प्रेम का पीवे ॥ मौला पीव को दीजे । तनमनकुरखान करलीजे ॥ परी है प्रेम की फांसी । मनुवां गगनका बासी ॥ बाजे बिना तन्ती तूर । सहजे ऊगे पछिम सूर ॥ भौरा सुगंध का प्यासा । किया है कमलमें बासा ॥ रमता हंस है राजा । सहजे पलक आवाजा ॥ सुन्दर श्याम घन लाया । बादल गगनमें छाया ॥ अमृत बूंद झर लाया । देखि दोह नैन ललचाया ॥ अजब दीदार को पाया । दरिया सहजमें नहाया । दरिया उलट उमगे नीर । ता बिच चले चौसठ छोर ॥ हंसा आन बैठे तीर । सहज जुगे मुक्ता हीर ॥ मिला है प्रेम का प्यारा ॥ नहीं है नैन सों न्यारा ॥ जीवनमृत न व्यापेकाला । जो त्रिकुटीसे पलक न
शब्दावली
(५५)
टाला ॥ पल जब पीव से लाग। धोखा तब दिलों का भागा ॥ चेतावनी चित विलास । जबलग रहे पिंजर श्वास ॥ सोहंशब्द अजपाजाप । साहब कवीरसो आपहिंआप ॥
साखी ।
चेतावनि चितलागि रहे, यह गति लखै न कोय । अगम पन्थ के महल में, अनहद बानी होय ॥ नाम नैन में रमि रहा, जाने बिरला कोय । जाको सतगुरु मीलिया, ताको मालुम होय ॥ झण्डा रोपा गैब का, दोय परवत के सन्ध । साधु पहि- चाने शब्द को, दृष्टि कमल कर बन्ध ॥ झलके जोती झिल- मिला, बिन बाती विन तेल ॥ चहुँदिशि सूरज ऊगिया, ऐसा अदभुत खेल ॥ जागृत रूपी रहत है, सतमत गहिर गंभीर । अजरनाम बिनसे नहीं, सोऽहं सत्य कवीर ॥
॥ इति चेतावनी ॥
ज्ञानगुदरी ।
अलखपुरुष जब किया बिचारा । लख चौरासीधागा डारा ॥ पांच पत्तव की गुदरी बीनी । तीन गुणनसे ठाढी कीनी ॥ ता में जीव ब्रह्म औ माया । समरथ ऐसा खेल बनाया ॥ सीवन पांच पचीसो लागे । काम क्रोध मोह मद पागे ॥ काया गुदरी का बिस्तारा । देखो सन्तो अमर सिंगरा ॥ चांद सूर दोह पैवैंद लागे । गुरु प्रताप से सोवत जागे ॥ शब्दकी सुई सुरतिकाडोरा । ज्ञानके टोभन सिरजनडोरा ॥ अबगुदरीकी करु हुशियारी । दाग न लागे देखुबिचारी ॥ सुमतकी साबुन सिरजनधोई । कुमत मैलको डारो खोई ॥ जिनगुदरीका कियाविचारा ॥ सोजन भेटे सिरजन हारा ॥ धीरजधुनीध्यान धर आसन । सतकी कोपीनसहज सिंगासन ॥ जुगतकमंडल कर गहि लीन्हा । प्रेम पावडी मुरशद
(५६)
कवीरपंथो-
चीन्हा ॥ सेलीशील बिबेककी माला । दयाकी टोपी तनधर्म- शाला ॥ मिहर मंतंगा मन वैशाखी । मृगछाला मनहीको राखी॥ निहचे धोती पवन जनेउ । अजपा जपे सो जाने भेऊ ॥ रहे निग्नतर सतगुरु दाया । साधु सँगतकर सबकछु पाया ॥ लौकी लकुटी हिरदया झोरी । क्षमा खड़ाऊँ पहिर बहोरी ॥ मुक्ति मेखला सुकृत सुमिरनी । प्रेम पियाला पीवे मौनी ॥ उदास कूबरी कलह निवारी । ममता कुत्तीको ललकारी ॥ जुगतजंजी- रवांथजब लीन्हा । अगम अगोचरखिरकी चीन्हा ॥ विराग- त्याग बिज्ञान निधाना । तत्ततिलकदीन्होनिरबाना ॥ गुरुगम चकमकमनसमतूला । ब्रह्म अगिनपरगटकरमूला ॥ संशय शोक सकल भ्रम जारा । पांच पचीसो परगटमारा ॥ दिलका दरपन दुबिधा खोई । सो बैरागी पक्का होई ॥ शून्य महल में फेरीदेई। अमृतरसकी भिच्छा लेई ॥ दुखसुख मेला जगका भाऊ । तिर- बेनीके घाट नहाऊँ ॥ तनमनशोधि भयाजेहि ज्ञाना । सोलखि पावे पद निर्बाना ॥ अष्ट कमलदल चक्रर सोधे । जोगी आप आपमें बोधे ॥ ईगला पिगलाके घर जाई । सुषमन नीर रहा ठहराई ॥ वोह सोह तत्त्व बिचारा । बंकनालमें किया सँभारा ॥ मनको मार गगन चढिजाई । मानसरोवर पैठि नहाई ॥ अनह- दनाद नामका पूजा । ब्रह्म बैराग देव नहि दूजा ॥ छुटगइ कश- मल कर्मजलेखा । यहि नैनन साहबको देखा ॥ अहंकार अभिमान बिडारा । घटका चौकाकर उजियारा ॥ चितकर चंदन मनसा फूला । हितकर संपुट करले मूला ॥ शरधा चैवर प्रीति कर धूपा । नौतम नाम साहबका रूपा ॥ गुदरी पहिरे आप अलेखा । जिन यह प्रगट चलाई भेखा ॥ साहबकवीरब स्निशजबदीन्हा । सुरनरमुनिसबगुदरी लीन्हा ॥ ज्ञानगूदरी पठे-
शब्दावली
(५७)
प्रभाता । जनम २ के पातक जाता ॥ ज्ञानगुदरी पढे मध्याना सो लखि पावे पद निर्वाना ॥ संज्ञा सुमिरण जो नर करई । जरा मरण भौसागर तरई ॥ कहैं कवीरा सुनो धर्मदासा । ज्ञानगुदरी करचो प्रगासा ॥
साखी
माला टोपी सुमिरनी, सदगुरु दिया बखशीश । पल २ गुरु को बंदगी, चरण नवाऊँ शीश ॥ भौ भंजन दुख परिहरन, अम्बर करन शरीर । आदियुगादि आप हो, चारो युग कव्वीर ॥ बंदी- छोर कहाइया, बलख शहर मंझार । छूटे बंद सब भेष के, धन धन कहे संसार ॥
॥ इति श्रीज्ञानगुदरी सम्पूर्णम् ॥
रतनास्तुति
गुरुध्यानसार भजबारबार ।
सब तजबिकार सतनामसार सों कर यारी ॥ जय जय गुरु- पीरं सत्यकबीरं, अमरशरीरं अधिकारी ॥ निर्गुण निज मूलं धरि अस्थूलं, काटें शूलं भवभारी ॥ सूरति निज सोहं कलिमल- खोहं, जन मनमोहं छबिभारी ॥ अम्बरपुरबासी सब सुखरासी, सदा बिलासी बलिहारी ॥ पीरनके पीरा मतिके धीरा, अलख फकीरा ब्रह्मचारी ॥ हंसन हितकारी जग पगुधारी, गरभप्रहारी उपकारी ॥ काशी आये दास कहाये, हंस बचाये प्रणधारी ॥ रामानंदस्वामी अन्तर्यामी, हैं वड़नामी संसारी ॥ उनको गुरु- कीन्हा मतबुधलीन्हा, उनहुन चीन्हा करतारी ॥ ब्राह्मणसन्यासी कीन्हीहांसी, तब अविनाशी पगुधारी ॥ मगहर स्थाना किया पयाना, दे परवाना जन तारी ॥ तहैं बलबीरा तजे शरीरा,
(५८)
कवीरपंथी-
काटन पीरा भव भारी ॥ बिरसिघदेवराजा, सुनबलगाजा सबदल साजा संभारी ॥ उत्त पीर पठाना है बलवाना, लाय कमाना कर डारी ॥ सनमुख नियराना छूटे बाना, भै घमसाना रण भारी ॥ तब गुरुज्ञानी मनकी जानी, अधरहिं बानी उच्चारी ॥ खोलोपरदा है नहिं सुरदा, जूझ अवस्था करडारी ॥ सुनिके यह बानी अचर जमानी, देख निशानी सिरमारी ॥ रोये परवीना हम मतिहीना, तुमहिं न चीन्हा करतारी ॥ मगहर तजि बासा किया प्रकाशा, जहँ धर्मदासा ब्रतधारी ॥ तिनको शिष कीन्हा सर्वस दोन्हा, दुख हरलीन्हा यमभारी ॥ सतपन्थ चलाये भ्रम मिटाये, शब्द दिढाये संसारी ॥ रतनाजन तेरो करत निहेरो, हमतन हेरो बलिहारी ॥
अष्टक ।
साहब गुरुज्ञानी समरथध्यानी, अचल स्थानीस्थीरं ॥ अवि- गतवानी मुक्तिनिशानी, जगमें आनी कब्बीरं ॥ शीशबिराजे तिलक अखण्डित, मुख सतसुकृत गम्भीरं ॥ ज्ञान प्रचण्डित पाखंड खण्डित, समता मंडित कब्बीरं ॥ भेष रिसाला श्रवनी माला, प्रेम उजाला किर्पा गहिरं ॥ दीनदयालं जन प्रतिपालं, सदा कृपालं कब्बीरं ॥ संकट टारन कष्ट निवारन, शीश विदा- रन यम थीरं ॥ हंस उबारन जिव निस्तारन, भर्म विदारन कब्बीरं ॥ सतयुग, त्रेता, द्वापर बीता, रमता तीता पर पीरं ॥ कलयुग कीता सबसों जीता, परम पुनीत कब्बीरं ॥ काशी छोड़ उडीसा आये, आसा गाडे सिन्ध तीरं ॥ ठाकुर पंडो गर्ब बिहंडो, पाखंड खंडो कब्बीरं ॥ पुरुष विदेही अविचल देही, नाम सनेही मन थीरं ॥ जो जन जाने भेटे तेही, दर्शन दे गुरु कब्बीरं ॥ कवीरं अष्टक टारन कष्टक, भौजल नष्टक कर थीरं ॥ धर्मनि- दासं नित अभ्यासं, प्राप्त तासं कब्बीरं ॥
शब्दावली
(५९)
स्मृति ।
गुरु दुखित तुम विन रटत द्वारे, प्रगट दर्शन दीजिये ॥ गुरुसामियांसुनु विनतिमोरी, बलिजाउँ बिलंब न कीजिये ॥ गुरु नैन भरभर रहत हेरो, निमिख नेह न छाडिये ॥ गुरु बाँह दीजे बन्दछोर, सो अबकी बन्द छुड़ाइये ॥ विविध विधि तन भयेउ व्याकुल, विन देखे अब नारहों ॥ तपत तनमन उठत ज्वाला, कठिन दुख कैसे सहों ॥ गुन औगुम अप- राध छमाकरि, अब न पतित विसारिये ॥ यह विनती धर्मदास जनकी, सतपुरुष अवमानिये ॥
विनय ।
दरस दीजै गुरु परम स्नेही । तुम विनु दुख पावे मोर देही ॥ अन्न न भावै नींद नहिं आवै । बारबार मोहि विरह सतावै ॥ घर आंगनमोहि कछु न सुहावै । वज्र भयो यहविरह नजावै ॥ नैनानीर बहे जलधारा । निसिदिन पंथ निहारुं तुम्हारा ॥ जैसे निजधन जातहिराई । ऐसे तुम विनु कछु न सुहाई ॥ जैसे मनि विनु फानि बेकरारा । ऐसे तुम विनु हाल हमारा ॥ हे कर्ता तुम अपरम्पारा । केहि कारन गुरु मोहि विसारा ॥ जैसे मीन मरे विनु नीरा । ऐसे तुम विनु दुखित शरीरा ॥ छन्द ॥ दुखित तुम विनु रटत द्वार, प्रगट दर्शन दीजिये ॥ विनति सुनु स्वामिया वलि जावैं विलंब न कीजिये ॥ विविध विधि हम भय हैं व्या- कुल, विनदेखे जिव ना रहै ॥ तपत तन मन उठत ज्वाला, कठिन दुख अब को सहे ॥ गुन औगुन अपराध छिमाकरि औगुन कछु न विचारिये ॥ पतित पावन राखलाज, अब न पतित विसारिये ॥ वंदीछोर अब बाँह दीजे, अब की बन्द छुड़ाइये ॥ नैन भरि भरि रहैं निरखत, निमिख नेह न तोरिये ॥ दासधर्मनि करत
(६०)
कवीरपंथी—
विन्ती महापुरुष गुरु मानिये ॥ दया कीजे दरस दीजे अपनो कर जानिये ॥
स्तोत्र (विदेहं स्वरूप)
नमोशब्दरूपी सो है जत्तकरता । दयापालस्वामी सबैकष्ट हरता ॥ विशालं कृपालं धनी अन्तर््यामी विदेहं स्वरूपं कवीरं नमामी ॥ अखंडं अकर्म अनिच्छा अदेही । जपैशेषजाको लहै- नाहि तेही ॥ लगी शंभुतारी गहो अर्धनामी । विदेहं सरूपं कवीरं- नमामी ॥ तकोजीवशरनासो भवसिधुतरना । अघै खान टरना गहो बेग चरना ॥ अभय रूपजाको महापरमधामी । विदेहं स्वरूपं कवीरंनमामी जहां जिव पुकारे तहांको सिधारे । भये दीन जेते सो तेते उबारे ॥ लखै कौन जाको अनामीसनामी । विदेहंसरूपं कवीरंननामी । परे सिधुभारे सो साहब पुकारे । करी आय रक्षा सु ताको उबारे ॥ अभयमुक्तिदाता मिलेआय स्वामी । विदेहंसरूपं कवीरं नमामी ॥ तुही सृष्टिकरता तुही आप हरता । तुही सोखसिधू तुही फेर भरता ॥ तुहा सर्व कामी तुही है अकमी । विदेहं सरूपं कवीरं नमामी ॥ तुही बीनबीनानबीना बजावै । तुही आप रीझे तुही आप गावै । भये दीन डोलै मोहे ऐस कामी । विदेहं सरूपं कवीरं नमामी ॥ तुही रामरावन तुही कंसकृष्णा । तुही ब्रह्मरुद्रा तुही देव विष्णा । तुही शेष ब्रह्मा तुही भूमि थामी । विदेहं सरूपं कवीरं नमामी ॥ तुही सर्वजीवनके रक्षकारी । तुही चारखानी सो बानी सुधारी ॥ तुही आप जीवन दे सत्यनामी । विदेहं सरूपं कवीरं नमामी ॥ तुही आप खैलै खेलावे अकेला । तुही आप स्वामी तुही आप चेला ॥ तुही खेत भागे लडे धार सामी । विदेहं सरूपं कवीरं नमानी ॥ उभय मेषधारी धरै मेष भारी । तुही भोग भोगी तुही ब्रह्म चारी ॥ कहे को कहाँलों
शब्दावली
(६१)
अपारं अनामी ॥ विदेहं सहरूपं कवीरं नमामी । दर्दं काल पीरा जबै जिव सताये । लिये नाम लाहा जोलाहा हो आये ॥ लखोरे लखोरे कृपासिंधु स्वामी । विदेहं सहरूपं कवीरं नमामी ॥ अघै- खान जेते कियो हानि तेते । गहो सत्यपंथे उहै संत हेते ॥ बसो देश जाको जहां है अरामी ॥ विदेहं सहरूपं कवीरं नमामी ॥ जपो नाम नीको सदा ये कवीरं । मिले लोक बासा हरे काल पीरं ॥ अभीरं अपीरं सो है तासु नामी । विदेहं सहरूपं कवीरं नमामी ॥ हरे मत्त मंदा करै सो अनंदा ॥ उबारो उबारो महाकाल फंदा ॥ अभय बास जाको सो है अंतर््यामी । विदेहं सहरूपं कवीरं नमामी ॥ कवीर अष्टक जो पढै औ पढावै । महाप्रेमबानी सुनै औ सुनावै ॥ कहे दीनबंदा सो फंदा न आनी । विदेहं सहरूपं कवीरं नमामी ॥
स्तोत्र (जय जय कबीर) कवित्त
जय जय कबीर धीर, हरन सकल काल पीर, निर्गुण अवि- नाशी, ब्रह्म शब्दरूप साई ॥ चर अचर भूत ब्याल, व्योम मृत्यु औ पताल, सुर नर मुनि यक्ष गंधर्व, सकल में समाई ॥ अम- रलोक के निवास, पुढूप दीप को सुवास, शब्द कोट अति हुलास, विविधविध बनाई ॥ जहां हंसन को निवास, षोडश रविको प्रकास, अमृतफल चुगे सुपास, सर्व श्रुथा जाई ॥ जग मगात हंस अंग, शब्द को भयो प्रसंग, अकह वृक्ष साई संग, सुराजत समुदाई ॥ बंदीछोर प्रभु दयाल, भंजन भवसिंधु जाल, सतगुरु साहब कृपाल, सुमिरत अघ जाई ॥ जहां सदगुरुको निवास, कोटिन शाश्विको प्रकास, छाड़ लोक हंस पास, भौजल में आई ॥ कठिन काल को संहार, लीन्हो हंसन उबार, कीन्हो भवसिंधु पार, सकल भ्रम मिटाई ॥ माया मद मोह हरन, काम क्रोध गर्भ दलन, चिन्तामणि हंस रमन, संतन सुखदाई ॥ जे
(६२)
कवीरपंथी—
नर भये भक्तिहीन, सो भये यम के अधीन, अटके भवसिंध तिन, नहीं पार पाई ॥ जो नरगुरुशरण आय, लीन्हो तिनको बचाय, कालजाल सों छुडाय, अमर घर पठाई ॥ निरंजन निरकार, ब्रह्मा विष्णु शिव विचार, आदिशक्ति मायाजार, नहीं पार पाई॥ निगम वेद कर पुकार, तेहू नहीं पाये पार, गुरु कवीर शरन अपार, सुमिरत अघ जाई ॥
अथ नामाजीकृत छ'प्यय ॥
अनन्त कोट निज भक्त हैं, तामें एक करोर बिचारी । ताहू में ते चुनलिये, लाखलख नेजा धारी ॥ तामें समरथ एक सहस सहस में सौ अधिकारी ॥ पचास भक्त प्रसिद्ध, पचीस परम उजागर । द्वादश भक्त प्रधान, षट रस गुन के आगर ॥ चतुर नाम गोविन्द वपु, उभय भक्त तारन तरन । तामें मुख्य कवीर हैं, ता पद रज नाभा शरन ॥१॥ गिरा गंग अनुहार, चाल सनकादिक जैसे । ज्ञान मुनि शुक्रदेव, ध्यान शिव शंकर तैसे॥ जती ज्यों गोख सती, हरिचन्द बखानो । प्रतिज्ञा प्रह्लाद, सांख्यमें कपिले जानो ॥ हेम जेम शीतल सदा, परकाशी दिवाकर मानो । कवीर सदा गंभीर हैं, निज अविनाशी जानो॥ कर कलजुग ऊपर कट करी सो संत फौज नींकाचढ़ी ।
नाम महानिज मंत्र नामहि सेवा पूजा । जपतप तीरथ नाम नाम विनु और न दूजा ॥ नाम प्रीति नाम बैर नाम कहि नामी बोले ॥ नाम अजामिल साख नाम बन्धनते खोले ॥ नाम अधिक रघुनाथ ते, रामनिकट हनुमत कह्यो । कवीर कृपाते
१ यद्यपि आजकलके छपे हुवे जितने नामाजीकृत मन्त्रमाल हैं उनमें “कवीर कानि राखी नहीं वरण क,अम षट दर्शनी” के सिवाय इस प्रकार बाणी नहीं मिलती है तथापि कवीरपंथियोंके यहां इसी रूपमें बहुत दिनोंसे प्रचलित है, और प्रायः कवीरपंथी इसे नित्य पाठमें गाया करते हैं । इस लिये यहां दिया गया है । ‘श्रीयुगलानन्द बिहारी’
शब्दावली
(६३)
परमतत्त्व पदुमनाभ, परिचय लह्यो ॥ ३ ॥ नौ करोर प्रह्लाद अष्टध्रुव लक्षमन हनुमाना । मोरध्वज हरिचन्द, सातले संत- स्याना ॥ रुक्मांगद अम्बरीष पंच, निज पहुँचे दासा । दौय अर्जुन गंगदेव, दौय वृजमंडल वासा ॥ तैतीस कोट तिहु जुगमें हरि सेवत निरभय भयो । कलियुग नाम कवीर हैं, अनन्त कोट जिवले निस्तन्यो ॥ ४ ॥
छप्पय (भक्तमालका)
कबीर कानि राखी नहीं, वरन आश्रम षट दर्शनी ॥ भक्ति विखुरख जो धर्म सब, अधर्म करि गायो । जोग जग्य व्रतदान, भजन विनु तुच्छ दिखायो ॥ हिंदू तुरुक प्रमान, रमैनी शब्दे साखी । पक्षपात नहीं करी, सबनके हितकी भाखी ॥ आरुठ दशा होय जगतमें, मुख देखी नाहि न भनी । कबीरकानराखी नहीं, वरन आश्रम षट दर्शनी ॥५॥ राखी नहीं जगतकी, भाखी सत्य कबीर । देदे शब्द निराटका, तोरे भ्रम जंजीर ॥ बानी अरबो खरब है, ग्रन्थां कोटि हजार । करता पुरुष कबीर है, नाभा किया विचार ॥ ६ ॥
इति छप्पय
(सूचना—यहांतक तो नाभाजीके नामसे है जिसमेंसे केवल एक छप्पय “कबीर कानि राखी नहीं” वाला शुद्धभी है और भक्तमालमें पाया भी जाता है । शेष छन्दोभंग आदि अशुद्धि- योंसे ऐसा पूर्ण है कि, इसे इस रूपमें नाभाजीकी कविता कहना महा अन्याय होगा । यह तो यह इन्हीं छप्पयोंके आगे एक दोहा है—
जनक विदेही नानका, ऊधो स्याम शरीर । वालमीक तुलसी भये, शुक्रदेव भये कवीर ॥
नोट—३२ पेजमें, नाभाजीकृत छप्पय में ‘अधिकारी’ के आगे एक चरण ग्रन्थ पात है.