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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

शब्दावली

(१४१)

सुवटा सुन्दर भूप ॥ १५ ॥ डारे दुखके जाल मंझार । सो दुख कहत न आवे पार ॥ भूख प्यास बहु संकट सहे । परबस परे महा दुख लहे ॥ १६ ॥ सुवटाकी सुधि बुधि सब गयी । यह तो बात और कछु भयी ॥ आय परे दुख सागर माहिं । अब इतते कितको भगि जाहिं ॥ १७ ॥ केतो काल गयो इह ठौर । सुवटे जियमें ठानी और ॥ यह दुख जाल कटे किहि भांति । ऐसी मनमें उषजी खांति ॥ १८ ॥ रात दिना प्रभु सुमिरन करे । पाप जाल काटन चित धरे ॥ कम कम कर काटचो अघ जाल । सुमिरन फल भयो दीनदयाल ॥ १९ ॥ अब इतते जो भजिके जाऊँ । तो नलनी पर बैठे न खाऊँ ॥ पायो दाव भजो ततकाल । तजि दुर्जन दुर्गति जंजाल ॥ २० ॥ आये उडत बहर बन माहिं । बैठे नर भव दुमकी छाहिं ॥ तित इक साधु महा सुनिराय । धर्म देश ना देत सुभाय ॥ २१ ॥ यह संसार कर्म बन रूप । ता माहिं चेतन सुवा अनूप ॥ पढत रहे गुरु बचन विशाल । तौहु न अपनी करे संभाल ॥ २२ ॥ लोभ नलनि पर बैठे जाय । विषय स्वाद रस लटके आय ॥ पकरहिं दुर्जन दुर्गति परे । तामें दुख बहुत जिय भरे ॥ २३ ॥ सो दुख कहत न आवे पार । जानत जिन वर ज्ञान मंझार ॥ सुनते सुवटा चौकयो आप । यहि तो मोहिं परचो सब पाप ॥ २४ ॥ ये दुख तो सब मैंही सहे । जो सुनिवरने मुखते कहे ॥ सुवटा सोचे हिये मंझार । ये गुरु सांचे तारनहार ॥ २५ ॥ मैं शठ फिरचो करम बन माहिं । ऐसे गुरु कहि पाये नाहिं ॥ अब मो पुन्य उदय कछु भयो । सांचे गुरुके दरशन लयो ॥ २६ ॥ गुरुकी गुन स्तुति बारम्बार । सुमिरे सुवटा हिये मंझार ॥ सुमिरन आप पाप भजि गयो । घटके पट खुलि सम्यक्

(९४२)

कबीरपंथी—

थयो ॥२७॥ समकित होत लखि सब बात । यह मैं यह पर द्रव्य विख्यात ॥ चेतनके गुन निज माँहि धरे । पुद्गल रागादिक परिहरे ॥२८॥ आप मगन अपने गुन माँहि । जनम मरन भय जियकी नाहिं ॥ सिंह समान निहारत हिये । कर्म कलंक सबहीं तजि दिये ॥२९॥ ध्यावत आप माँहि जगदीश । दुहुँ पद एक विराजत ईश ॥ यहि विधि सुवटा ध्यावत ध्यान । दिन दिन प्रति प्रगटत कल्याण ॥३०॥ अनुक्रम शिव पद जिवको भयो । सुख अनन्त विलसत नित नयो ॥ सत संगति सबको सुख देय । जो कछु हियमें ज्ञान धरेय ॥३१॥ केवलि पद आतम अनुभूत । घट घट राजत ज्ञान संजूत ॥ सुख अनंत विलसे जिय सोय । जाके निज पद परगट होय ॥३२॥ सुआ बतीसी सुनहु सुजान । निज पद प्रगटत परम निधान ॥ सुख अनंत विलसहु ध्रुव नित । भय्याकी विनती धर चित्त ॥३३॥ सम्भव सत्रह त्रेपन माँहि । आश्विन पहिले पच्छ कहाहिं ॥ दसमी दशा दिशा परगास । गुरु संगति ते शिव सुख भास ॥३४॥

इति श्री आत्मनिष्ठ परमार्थीबंध कबीराश्रमाचार्य्य स्वामी श्रीयोगलानन्द विहारी द्वारा संग्रहीत कबीरपंथी शब्दावली छः खण्डका प्रथम भाग समाप्त ॥ शुभम् ॥

सत्यनाम ।

शब्दार्थ चिन्तामणि कोष का उपक्रम ॥

सद्गुरु कबीर साहबकी सर्ववाणी अध्यात्मतत्त्वके उपदेशोंसे भरों पड़ी है । अध्यात्मतत्त्वके सच्चे जिज्ञासुओंके लिये, यदि वह सच्चा अधिकारी है, तो उसे, आधी साखीमें ही सार मिल जाता है, जैसा सद्गुरुने कहा है—

आधी साखी सिर खड़े, जो निरुवारी जाय ।

क्या पंडित क्या पोथिया, रात दिवस मिलि गाय ॥

शब्दावली

(९४३)

किन्तु वर्तमान कालमें अधिकांशोंके कभी और साधारण लोगोंकी वृत्ति बहिरमुख होनेके कारण तथा श्रद्धा मस्तिके अभावसे, साधारण वाणियोंमें भी लोगोंको सन्देह रहा करता है और उसके ही समझने उनकी बुद्धि असमर्थ होती है। तब गूढ़ वाणियोंमें वह बहिरमुख वृत्तिकेसे परवेश कर सकता है। इतना होने पर भी साम्प्रदायिक पक्षपातके कारण अथवा रिवाजके कारण, लोगोंकी प्रवृत्ति वाणियों के संग्रह करने और कभी कभी जमाव आदिके अवसर पर वाणियोंको बाँचने गाने और बचन विलास-(सत्संग) की आवश्यकता तो पड़ती ही है। अथवा जो लोग श्रद्धापूर्वक कुछ जानने और पानेकी अभिलाषासे वाणियोंका पाठ करते हैं उन्हें भी अर्थ करने और समझने में बड़ी कठिनाइयां उपस्थित होती हैं। क्योंकि कबीर साहबकी वाणीमें अनन्त ऐसे सांकेतिक शब्द भरे पड़े हैं जिनको धेरी विना जानना अत्यन्त कठिन है। यथार्थ बात तो यह है कि संसारकी किसी भी वाणीका अर्थ उस वाणीके यथार्थ रहस्य ज्ञाताके विना समझाये समझमें आना अत्यन्त दुस्तर है तथापि मनुष्य मनन शील प्राणी हैं, सबको अपनी बुद्धिद्वारा समझनेकी अभिलाषा रहा। करता है। इन्हीं सब बातोंका विचार कर जब मैंने प्रथम बार सन्वत् १९५४ वि. में लखनौ में भूल बोजक छपवाया था तब “गुडार्थ चिन्तामणि कोष” के नामसे सांकेतिक शब्दोंके स्पष्टीकरणका कोष दे दिया था। अब इस शब्दावलीमें भी अनन्त शब्द ऐसे आये हैं जिनको समझने के लिये इस कोषको यहाँ देनेकी आवश्यकता थी, इसलिये यह कोष यहाँ दे दिया है। यद्यपि मेरा विचार था कि, इस कोषको नये सिरसे पुनरावर अकरादि अनुक्रम से नियम पूर्वक ठीक करकेही दोबारा प्रकाशित किया जाय किन्तु कितने अनिवार्यकार्यों तथा छापनेवाले प्रेसकी शीघ्र प्रथको पूर्ण करनेकी आतुरताके कारण से वैसा नहीं कर सका, इसलिये पहली छपी हुई प्रति ज्यों की त्यों दे दिया है। एक प्रकारसे यह भावीही थी, जैसे शब्दावली अदूरी रही है वैसे, कोषकी अदूरी रही है। सद्गुरुकी दया दृष्टि होगी तो कबीरधर्मदर्शन ग्रन्थ मालाकी किसी भाषिकामें यह कोष संशोधित और वद्धित रूपमें प्रकाशित किया जायगा, तबतक पाठकोंको इसीसे संतोष मानना चाहिये।

सर्व सत्यके जिज्ञासुओंका परमार्थी मित्र- कबीराश्रमाचार्य परमार्थी वैद्य, आत्मनिष्ठ-ध्यौयुगलानन्द विहारी, कबीराश्रम पों० खरसिया स्टेशन, जि० बिलासपुर सी. पों.

अथ गृढार्थं चिंतामणि कोष

कवीराश्रमाचार्यं परमार्थो वैद्य

भारत पथिक स्वामी

श्रीयुगलानन्दविहारी विरचित ॥

द्विविध शब्द ।

गुरुशिष्यब्रह्ममायाईश्वरजगत्
चैतनजडसुखदुःखपुण्यपाप
स्वर्गनरकगुणदोषदेवताराक्षस
दयालकालकारणकार्यंनिमित्तउपादान
रक्षकभक्षकदक्षिणवामशुद्धमलिन
मुख्यगौणविशेषसामान्यसमष्टिव्यष्टि
विशेषआवरणस्थिरचञ्चलनिराकारसाकार
सुगन्धदुर्गन्धअपरापरावक्ताश्रोता
दैवीआसुरीआधिव्याधिनिर्गुणसगुण
जीवजीवस्वामीसेवकपितापुत्र
पुरुषस्त्रीनरनारीपुरुषप्रकृति
जन्ममरणदिनरात्रिप्रकाशअन्धकार
एकअनन्तचतुरमूर्खरागद्वेष
स्तुतिनिन्दाजीवशिवकामक्रोध

परस्पर विरुद्ध तथा भय संयुक्त द्विविध पदार्थ ॥

विद्यावादतपक्षयद्व्यराजा, चोर
भोगरोगकायाकालसाधनइन्द्री
योगविषयस्वर्गवासीअवधिमंत्रयन्त्र
यन्त्रतंत्रतंत्रसिद्धसिद्धमाया
मायाज्ञानसज्जनदुर्जनमित्रशत्रु
मिलनाविछुरनाआनाजानापंडित स्तुतिनिन्दा
मूर्खमारगृद्धसमाधानकुलअति नारि
कर्मअकर्मउपासनाविशेषज्ञानअज्ञान

गुढार्थचिन्तामणिकोष ।

(१४५)

सत्यवादीपाखण्डआस्तिकनास्तिक,शुक्लकृष्ण
मित्रशत्रुमहावाक्यअवांतर
त्राक्य.प्रकाशअन्धकार
निर्विकल्पसविकल्पनिरंजनअद्याशीतउष्ण
सूक्ष्मस्थूलजंगमस्यावर
खुदाबन्दाकादिरकुदरत
आदमहून्वाखासआमइनसानहैवान

॥ त्रैयविधि ॥

ओंकार मात्रा | अ | उ | म | | ---|---|---|---|---|--- | | क्षर | अक्षर | निः अक्षर | | | हिरण्यगर्भ | ईश्वर | विराट | | | विश्व | तैजस | प्राज्ञ | देव | | ब्रह्मा | विष्णु | महेश | | | विबेक | वैराग्य | गुरुभक्ति | गुण | | रजोगुण | सतोगुण | तमोगुण | शरीर | | स्थूल | सूक्ष्म | कारण | | | नाम | रूप | गुण | काल | | भूत | वर्तमान | भविष्य | क्रिया | | उत्पत्ति | पालन | नाश | अर्थ | | स्वार्थ | परमार्थ | निरर्थ | अवस्था | | जाग्रत | स्वप्न | सुषुप्ति | वेदकांड | | कर्म | उपासना | ज्ञान | | | कर्म | धर्म | मति | महावाक्य | ॥ (सा. वे.) | तत् | त्व | असि | ॥ (ऋग्वेद) | | अहं | ब्रह्म | अस्मि | ॥ (यजुर्वेद) | | अयं | आत्मा | ब्रह्म | ॥ (अथर्वणवेद) | | प्रज्ञान | आनंद | ब्रह्म | नाडी | | इंगला | पिंगला | सुषुम्णा | | | यमुना | गंगा | सरस्वती | प्राणायाम | | रेचक | पूरक | कुम्भक | दोष | | वायु | पित्त | कफ | लोक | | मृत्युलोक | स्वर्ग | पाताल | प्रारब्ध | | इच्छा | अनिच्छा | स्वइच्छा | लक्षण (दोष) | | अव्याप्ति | अतिव्याप्ति | असंभव | गुरु | | माता | पिता | आचार्य्य | वादादि | | वाद | जल्प | वितंडा | वायु | | शीतल | मंद | सुगंध | ताप | | आध्यात्मिक | आधिभौतिक | आधि दैविक |

( ९४६ )

गूढार्थचिन्तामणिकोष ।

कर्मसंचितप्रारब्धक्रियमाण
श्रोतामुक्तमुमुक्षुविषयी
मनुष्यज्ञानीविषयीपामर
अवस्था (शरीर)बालयुवाबूढ़
लिंगस्त्रीपुरुषनपुंसक
सम्बन्धसंयोगसमवायतादात्म्य
त्रिपुटीज्ञाताज्ञानज्ञेय-
ध्याताध्यानध्येय
द्रष्टादर्शनदृश्य
कर्ताक्रियाकर्म
नादविदकला
अध्यात्मअधिभूतअधिदैव
ज्ञानप्रतिबन्धकगंशयअसंभावनाविपरीतभावना
ज्ञानसाधकज्ञानवैरागउपशम
हेतुस्वरूपफल
अस्तिभांतीप्रिय
कारणवादआरंभपरिणामविवर्त
सृष्टिपारमार्थिकव्यावहारिकप्रातिभासिक
आनन्दब्रह्मानन्दविषयानन्दवासनानन्द
आत्माज्ञानात्मामहानात्माशांतात्मा
भेद आत्माकामिथ्यात्मागौणआत्मामुख्यआत्मा
अन्तःकरण दोष ,मलविश्लेषआवरण
वेधतिलकमालालंगोट

॥ चतुरविधि ॥

१ देदताब्रह्माविष्णुरुद्रओंकार
२ अवस्थाजाग्रतस्वप्नसुषुप्तितुरीया
शरीरनासूतमलकृतजवरुतलाहूत
अभिमानी (व्याप्ति)स्थूलसूक्ष्मकारणमहाकारण
” (समष्टि)विश्वतैजसप्राज्ञप्रत्यक्ष
आकाशविराट्हिरण्यगर्भईश्वरब्रह्म
चैतन्यअवस्थाघटाकाशजलाकाश,मेषाकाशमहाकाश
वेदकूटस्थजीवईश्वरब्रह्म
किताबश्रुद्वेदयजुर्वेदसामवेदअथर्ववेद
अपवेदजंबूरतौरितवायबुलकुरान
अनुबन्धआयुर्वेदधनुर्वेदगांधर्वस्थापत्य
साधनअधिकारीविषयप्रयोजनसंबन्ध
विवेकवैरागषटसंपत्तिमुमुक्षता

गूढार्थचिन्तामणिकोष ।

(१४७)

प्रथम बिबेक विराम पुनि, अस्मादि षट् सम्पत्ति ।

कही चतुर्षु मनुष्यता, ये सब साधनसत्ति ॥ १२ ॥

साधन (अंतरंग)श्रवणमनननिदिध्यासनसाक्षात्कार
भक्तआर्तविज्ञासुअर्थावोंज्ञानी
पुरुषार्थअर्थधर्मकाममोक्ष
आश्रमब्रह्मचर्यगाहृत्स्यवानप्रस्थसंन्यास
वर्णब्राह्मणक्षत्रीवैश्यशूद्र
शेषसंन्यासमुगलपठान
मोक्षद्वारपालशमसंतोषविचारसत्संग

मोक्ष द्वारपालकचतुर, शम संतोष विचार ।

चौथो सत्संगति घरम, महापूज्य निर्धार ॥

संन्यासकुटिचरवहृदकहंसपरमहंस
भूमिकाक्षिप्राअनागतसूलिश्रुतासुलीनता
अन्तःकरणमनबुद्धिचित्तअहंकार
खानिजरायुजअण्डजउद्भिज्जस्वेदज
चित्तनिरोध-अध्यात्म-साधूसंग,वासनात्याग,प्राणायाम,
उपाय.विद्या.
स्पर्शशीतउष्णकोमलकठिन
युगसतयुगत्रेताद्वापरकलियुग
गरीर अवस्थाबालकिशोरयुवाबृद्ध
वैनानाटामञ्जोलालम्बा
वाणी भेदपरापश्यन्तोमध्यमावैखरी
शब्द भेदकालसंधिझाड़सार
अर्थशब्दार्थभावार्यव्यंग्यार्थधन्यार्थ
सेना चतुरंगिणीहाथीरथपैदलघोडा
नीति मार्गसामदानदण्डभेद
रिपुकामक्रोधलोभमोह
मुक्तिसालोकसामीप्यसारुप्यसायुज्य
मनुष्य लक्षणदयाशीलविचारशीर्य
सनकादिकसनकसनन्दनसन्तकुमारसनातन
यार ४अबुबक्उमरउसामनअली
मार्ग (हिन्दूधर्म)कर्मउपाशनायोगज्ञान
मार्ग (मुसलमानी)शरीयततरीकतमारफतहकीकत
आधार चक्र अक्षर
स्त्री भेदपश्चिनीचित्रनीशंखनीहस्तिनी
पुरुष भेदशशाभुगाघोडाखर
उत्तममध्यमलघुनिकुट्ट

(९४८)

गूढार्थोचिततामणिकोष ।

ज्ञान परीक्षानिरालम्बनिःश्रेमनिर्वासनिकनिर्विकार
विचार परीक्षानिर्माहिनिर्वेधनिहिंसकनिर्वाण
विवेक परीक्षासावधानसर्वगीसारग्राहीसंतोषी
परम संतोष परीक्षाअयाचकअमानीअपक्षीकस्थिर
सहज परीक्षानिष्प्रपंचनिःतरंगनिलिप्तनिष्कर्म
निर्वर परीक्षासुहृदतामुबुदार्ईशीतलताईसुमति
गून्य परीक्षाशोलवंतमुबुद्धिसत्यवादोध्यानसमाधि
सन्ध्याप्रातःमध्याह्निसांज्ञमध्यरात्री
दिशापूर्वपश्चिमउत्तरदक्षिण
विष्णु आयुधपांचचक्रगदापद्म
संमप्रदाश्रीसम्प्रदाशिवसम्प्रदाब्रह्मसम्प्रदासनकादिक
आचार्यरामानुजविष्णुस्वामी,माधवानंद,निम्बाकैस्वामी
पृथ्वीके खण्डएशियाअफरिकायोरपअमेरिका

शंकराचार्य निर्मित मठ १ गोवर्धन मठ पूर्व जगन्नाथपुरीमें ॥ २ शारदा मठ पश्चिम द्वारकामें ॥

३ जोशी मठ उत्तर बद्रिकाश्रममें ॥ शृंगेरी मठ दक्षिण रामेश्वर ४ ॥

विवेकियों के जाननेयोग्य ॥ १ हेय ॥ २ ज्ञेय ३ आप्य ॥ ४ पात्र्य ॥

कबीरसाहबके ४ नाम ॥ सतमुक्त सत्यगुणमें ९ मुनिन्द्र जेतोमें ॥ कृष्णामय द्वारपरमें कबीर कलियुगमें ॥

चारगुरु ४ । १ धर्मदास सा. २ चतुर्भुज ३ वकजी ४ सहतेजी ।

॥ पदार्थ पंचविधि ॥

॥ हंस देहके तत्व आदिक वर्णन ॥

तत्व सांच धीरता, दया, शील, विचार,

ई पांचो हूं तत्व सो, संगी हंसा केर ।

साधु गुरुभत गहन मन, कल्पित सूष्टि हेर ॥

अब प्रकृति पञ्चोसको, कहौ मुनहु परसंग ।

पांच पांचते पांचई, जेहि बिधि बाढो अंग ॥

प्रकृति (साँचकी) निर्णयता, निर्विन्दता, प्रकाशता, थोरता, क्षमता ॥

प्रकृति (दैव्यकी) मिथ्या त्यागन, सत्यग्रहण, निःसंदेहता, हंता नाशन, अवलता ॥

प्रकृति (दयाकी) अद्रोहता, समता, मैत्री, अभयता, अभेदता ॥

प्रकृति (शीलकी) सहनशीलता (तितिक्षा) प्रियवचन बोलना, बुद्धिकी शांतता, परख प्रत्यक्ष प्रकट सुखमें निलेपता, (दुःख सुखमें समबुद्धि रख आनन्दमें रहना,) ॥

प्रकृति विचारकी —अस्ति नास्ति पदका विलगाना, (विवेक) यथार्थ ग्रहण व्यवहार शुद्ध सतो-गुणी बाल रखना, परख या टकसार (सर्वका पारख करना तथा बिना पारख ग्रहण नहीं करना) ॥ वेद

गूढार्थचिन्तामणिकोष ।

(१४९)

कुरान आदिसे लेकर सर्व महात्माओं विद्वानोंकी वाणीका यथाशक्ति अभ्यास करके बोध प्राप्त करना और उसके आशयको समझना ॥

इहि पांचोंको पंचधा, भेद प्रकृति पञ्चौस ।

हँहू हेहूकी तत्त्व प्रकृति, बूझो दिस्वाबीस ॥

अहंकारके पांच मुख—१ प्रथम मुख विषय, कर्म काण्डका प्रकाशक ॥ २ तैजस, योग, काण्डका प्रकाशक ॥ ३ प्राज्ञ उपासना कांडका प्रकाशक ४ प्रत्यक्ष अत्याज्ञान काण्डका प्रकाशक ॥ ५

॥ अद्वैत विज्ञानका प्रकाशक ॥

तन्मात्राशब्द,स्पर्श.स्पर्शःरस,गंध.
तत्त्वआकाश,वायुअग्नि,जल,पृथ्वी.
ज्ञान इन्द्रीश्रवण,त्वचा,नेत्र,जिह्वानासा.
कर्म इन्द्रीवाक्,पाणि (हस्त)पाद पायु,गुदा.उपस्थ.
वायु स्थूलव्यान,समान,उदान,प्राण,अपान.
वायु सूक्ष्मधनञ्जय,किंकरा,कूर्म,नाग,देवदत्त.
वाणी (अवस्था)शून्य,परा,पश्यन्ती,मध्यमा,वैचारी.
आकाशकी प्रकृती १शिराकाशकंठाकाश,हृदयाकाश,उदराकाशकटयाकाश
सूक्ष्मप्रकृति ,, लोभकामक्रोधमोह,भय,
वायुकी ,, फैलना,बलकरना,उठना,चलना,संकोचन.
अग्निकी ,, निद्राप्यास,भूख,क्रांति,अलस्य.
जलकी ,, लार,स्वेद,मूत्र,वीर्य,रक्त.
,,मज्जा,रक्त,मूत्र,मल.
रक्तविद्रूकफ,मेद,मूत्र.
,, पृथ्वीकी-रोम,त्वचा,नाडी,मांस,अस्थि,
,,नाडी,मांस,त्वचा,अस्थि,
शरीर-कैवल्यमहाकारणकारणसूक्ष्मस्थूल,
कोश-अन्नमय,प्राणमय,मनोमयविज्ञानमय,आनन्दमय,
भक्त-आर्त,जिज्ञासूअर्थार्थी,विज्ञान,निर्वासि,
कर्म-नित्य,नैमित्तिक,काम्य,प्रायश्चित्त,निषिद्ध,
क्लेश-अविद्या,अस्मिता,राग,द्वेष,अभिनिवेश,

दृष्टांत ५— (जगतके मिथ्यापने विषय वेदान्तानुसार) ॥ १ शक्तिविषय रजत, २ रज्जुविषय, सर्प ३ स्थाणु विषय पुष्प, ४ गगन विषय नीलता, ५ मरीचिका विषय जल ॥

नियम—शौच, संतोष. तप स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान ॥

प्रलय—नित्य नैमित्तिक, दिनप्रलय, महाप्रलय, आत्यंतिकप्रलय,

भेद ५—जीव ईश्वरका भेद, जीव जीवका भेद, जीव जडका भेद, ईश जडका भेद, जड जडका भेद, भ्रम—भेद भ्रम, कर्तृत्वभ्रम, संग भ्रम, विकार भ्रम, सत्यत्वभ्रम ।

(९५०)

गूढार्थचिन्तामणिकोश ।

अम निवर्तक दृष्टांत—बिम्बप्रतिबिम्ब, लोहित स्फटिक, घटकाश रज्जू सर्प, कनक कुंडल ॥

महायज्ञ—देव,ऋषि,पितर,मनुष्य,भूत,
यम—अहिंसा,सत्य,ब्रह्मचर्य,अपरिग्रह,अस्तेय,
योगभूमिका,क्षेप,विक्षेप,मूढ,एकाग्र,निरोध,
पांच ब्रह्म.सोहृ,ररकार,औकार,अकार,पराशक्ति
पाण्डव पांचयुधिष्ठिरभीम,अर्जुन,नकुल,सहदेव
कन्याअहल्या.द्रौपदी,तारा,कुंती,मंदोदरी
रामपंचायतन,रामजानकीभरतलक्ष्मण,शत्रुहन
पंच मकार (तंत्रशास्त्रके) मधु,मांस,मत्स्य,मैथुनमुद्रा

॥ पदार्थ बद्धविधि ॥

आनादि पदार्थ ६ १ जीव २ ईश, ३ शुद्धचैतन, अविद्या, ४ चैतन, और अविद्याके सम्बन्ध, ५ तिनका परस्पर भेद ॥

अरिवर्ग,—कामक्रोध(द्वेष)लोभ,मोह,मदमत्सर,
अवस्था शरीरका—शिशु,कौमार,पौर्गंड,किशोर,युवा,जरा,
ईश्वरके गुण—समग्रऐश्वर्यसमग्रधर्म,समग्रयशसमग्रश्री,समग्रज्ञानसमग्रवैराग
ईश्वरके ज्ञान—उत्पत्तिप्रलय,गतिआगति,विद्या,अविद्या,
उर्मि धर्म—जन्म,मरण,क्षुधा,तृष्णा,हर्ष,शोक,
कर्म नित्य—स्नान,जप,ह्रीम,अर्चन,आतिथ्य,वैश्वदेव
कौशिक (अन्नमय कौशिकेपदार्थ)वक्,मांस,रुधिर,मेद,मज्जा,अस्ति,
प्रमाण—प्रत्यक्षअनुमान,उपमान,शब्द,अर्थापत्ति,अनुपलब्धि
ध्रम—कुल,गोत्र,जाति,वर्ण,आश्रम,नाम
रस—मधुर,अम्ल,लवण,कटु,कृषायतिक्त,
लिंग—उपक्रमउपसंहार,अभ्यास,अपूर्वता,फल,अर्थवाद,
विकार—जन्म,अस्तित्ता,बुद्धित्ताविपरिणामता,अपक्षीयता,विनाशना
वेदांत—शिक्षा,कल्प,व्याकरण,निरुक्तछंद,ज्योतिष
षट्संभति—शम,दम,उपरम,तिलिक्षा,श्रद्धा,समाधान

शास्त्र—१ सांख्य (कपिलकृत) २ योग पातंजल (पतंजलिकृत) ३ न्याय गौतमकृत ४ पूर्वमिमांसा (जैमिनिंकृत) ५ वैशेषिक (कण्वा मुनिकृत) ६ वेदांत वा उत्तर मीमांसा (व्यास वा ब्राह्मणकृत) ॥

स्वभाव प्राणीका—छाजन, भोजन, चक्र ६ आचारचक्र चार दल कमल, ३ मणिपूरक चक्र १० दलकमल

मैथुन, भय, निद्रा, मोह ॥ १ स्वाधिष्ठान चक्र छः दल कमल, ४ अनाहतचक्र १२ दल, ५ विशुद्धाख्य चक्र १६ दल, अज्ञाख्य पद्म अज्ञाथके २ दल ॥

दर्शनभेद—योगी,जंगम,सेवडा,संन्यासी,दवशब्राह्मण ॥
जैनियोंके—द्रव्यजीव,बुद्धि,आकाश,कालस्वर्ग,मोक्ष ॥
तंत्र क्रिया—भारण,मोहन,वशीकरण,उच्चटन,स्तम्भन,तारण ॥

न्यायोक्त जीव के छः विशेष गुण—१ बुद्धि, २ सुख, ३ दुख, ४ इच्छा, ५ द्वेष, ६ प्रयत्न

मूढार्चिचितामणिकोष ।

(१५१)

॥ सप्त विधि ॥

ऋषी— वशिष्ठ अत्रि, कश्यप, विश्वामित्र, भरद्वाज, जमदग्नि, गौतम आवरण— जल, पवन, अग्नि आकाश अहंकार, महत्त्व प्रकृति ज्ञानभूमिका-शुभइच्छा, सुविचारण तनुमानसा, सर्वपापति, असंशक्ति, पदार्थाभावनी, तुर्वा अज्ञानभू०—अशुचि जाग्रत, महाजाग्रत, जाग्रत स्वप्न, स्वप्न जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, बीज— ओं, श्रीं, रं, सौं, रौं, ह्रीं, क्लीं, ॥

अ, इ, उ, ए, व, म, ह,

कर्मादि ६—कर्म,उपासना,योगज्ञानउत्पत्तिनाश
कर्म—यजन, याजन,अध्यायनअध्यापन,दान,प्रतिग्रह,मैथुन
उपास्य—शिव,विष्णुगणपतिसूर्यशक्तिराम, कृष्ण ॥
योगप्रकार ॥ हठ,कुंडली,लाम्बका,तारकलय,असनस्क, सांख्य ॥
उत्पत्ति—शब्द,स्पर्श,रूप,रस,गंध,इच्छा, वासना ॥
स्थिति—अन्नपानी,घास,मिट्टी,पत्ती,फूल, फल ॥
लय (नाश)—पृथ्वी,वायु,जल,अग्नि,हाथ,पग, दांत ॥
दिनसात—शनिवार,रविवार,चंद्रवार,भंगलवार,बुधवार,गुरुवार, शुक्रवार, ॥
ऊपरके लोक—भूर,भुवर,स्वर,महर,जन,तप,
नीचेके अतल,वितल,सुतल,तलातल,रसातल,महातल,
धातु—रस,रुधिर,मांस,मेद,मज्जा,अस्थि,
रूपरंग—शुक्ल,कृष्ण,पीत,रक्त,हरित,कपिल,
चित्र ॥

॥ अष्ट विधि ॥

योगके अंग—यम,नियम,आसन,प्राणायाम,प्रत्याहार,धारणा,ध्यान,समाधि ।
सिद्धि—अणिमा,महिमा,लधिमा,गिरिमा,प्राप्ति,प्राकाम्य,ईशित्व,वशित्व ॥
पाश—दया,शंकाभय,लज्जा,निंदा,कुल,शील,धन, ॥
प्रकृति—पृथ्वी,जल,अग्नि,वायु,आकाश,मन,बुद्धि, ॥
मैथुन—श्रवण, स्मरण,कीर्तन,चिंतन,एकांतवातसंकल्प दृढ,प्रयत्न,तन,प्राप्ति, ॥
करना,
मद—कुल,धन,रूप,प्यौवन,विद्या,तप,राज्य ॥

॥ नव विधि ॥

लिङ्ग शरीरके तत्त्व—श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा, घ्राण, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार ॥ ग्रह—सूर्य, चंद्र, बुध, अंगारक इत्यादि ॥ भक्ति—श्रवण, कीर्तन, स्मरण, चरणसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य, आत्मनिवेदन ॥ नवगुण ब्राह्मणके—धृति, क्षमा दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, ज्ञान, विद्या, सत्य ॥

॥ वराविधि ॥

औतार मुख—१ १ मत्स्य, ३ कूर्म, ३ वराह, ४ नरसिंह, ५ वामन, ६ परशुराम, ७ राम, ८ कृष्ण, ९ बौद्ध, १० कर्लकी ।

(९५२)

गूढार्थचिन्तामणिकोष ।

नाडिका और देवता-महाविद्यादश- १ काली, २ दुर्गा, ३ भुवना, ४ बगला, ५ मातंगी, ६ धूमा, ७ तारा ८ छिम्स्ता, ९ त्रिपुरा, १० कमला, १ इडा (चंद्र) देवता हरि । २ पिंगला (सूर्य), देवता ब्रह्मा ॥ ३ सुमुमन मध्यमा, रुद्र, ॥ ४ गांधारी, दक्षिण नेत्र, इन्द्र ॥ ५ हस्त जिह्वा वाम नेत्र-वरुण ॥ ६ पुष्प दक्षिण कर्ण ईश्वर ॥ ७ यशस्विनी वामकर्ण-ब्रह्मा ॥ ८ कुंडं गुदा-पृथ्वी ९ अलम्बुषा मेढ्र सूर्य १० शंखिनी नाभी-चंद्र ॥

रस (कवितাকে) शृंगार, वीर, करुण, अद्भुत, हास्य, भयानक, बीभत्स, रौद्र शांति प्रेमभक्ती वा ज्ञान ।

॥ एकादश विधि ॥

रुद्र—१० प्राण ग्यारहवां मन ॥

ज्ञान साधन—विवेक, वैराग्य, षट्सम्पत्ति मुमुक्षता, गुरुसंपत्ति, श्रवण, तत्त्वज्ञानाभ्यास मनन, निदि- ध्यासन, मनोनाश, वासना क्षय ॥

॥ द्वादशविधि ॥

मास—चैत्र, वैशाखसे फालगुन तक ॥

आभारण ॥ नुपूर, चूड़ी, हार, कंकण, अंगूठी, बाजूबंद बेसर बिरिया, टीका, शिशफूल, तागडी, (करधनी) कण्ठधी ॥

द्वादश महावाक्य—तत् त्वम, आदि ॥

तिलक १२ ।

ऊर्ध्वं पुण्ड्र मस्तक, प्रथम, ब्रह्म रंध्र पुनि जोय ।

त्रितिय नेत्र दोउ कण्ठपुनि, उरनाभी फिर होय ॥ १५ ॥

उर दोहु बिशि भुज दोऊ पुनि, तथा पृष्ठ प्रबाण ।

बरन वैष्णवके यही, द्वादश तिलक बखान ॥ १६ ॥

इजोल—बारह ॥

॥ चतुर्दशविधि ॥

विद्या— १ ब्रह्मज्ञान, २ रसायन, ३ श्रुति, कथा, ४ वैश्वक, ५ ज्योतिष, ६ व्याकरण, ७ धनुर्विद्या, ८ जलतरना, ९ संगीत, १० नाटक, ११ अश्वारोहण, १२ कोकशास्त्र, १३ चोरी, १४ चतुरता ॥

॥ चौदह मासूम मुसलमानी धर्म के ॥

इति संक्षेप गूढार्थ चिन्तामणी कोष कवीराश्रमाचार्य्य स्वामी श्रीयुगलानन्द विहारी विरचित

॥ समाप्त शुभम् ॥

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खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई