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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

३६० ] [ कल्कि पुराण निस्साराः प्रतिमाकारा भवन्ति भुवनाश्रया ।३७। बौद्धा शौद्धोदनाद्यग्रे कृत्वा तामग्रतः पुनः । योद्धुं समागता म्लेच्छकोटिलक्षशतैर्वृताः ।३८। सिंहध्वजोत्थितरथा फेरु-काक-गणान्विताम् । सर्वास्त्रशस्त्रजननीं षड्वर्गपरिसेविताम् ।३९। नानारूपां बलवतीं त्रिगुणाव्यक्तिलक्षिताम् । मायां निराक्ष्य पुरतः कल्किसेना समापतत् ।४०। तब शुद्धोदन ने कवि को अत्यन्त पराक्रमी और रथ-सेना से सम्पन्न देख कर कर माया देवी आह्ववानाथ तुरन्त ही वहाँ से प्रस्थान किया ।३६। जिस माया देवी का दर्शन करते ही देवता, दैत्य, मनुष्य आदि सभी सांसारिक जीव तेजहीन और प्रतिमा के समान निश्चेष्ट हो जाते हैं, उसी को साथ लेकर शुद्धोदन आदि बौद्धगण अपने करोड़ो म्लेच्छ वीरो के सहित रणस्थल में पहुँचे ।३७-३८। सिंहध्वजा वाले रथ पर माया देवी आरूढ हुई और उसने अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्र प्रकट किये । कौए और शृगाल उस माया देवी को सब ओर से घेरे हुए थे तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर—यह षड्वर्ग उसकी सेवा कर रहे थे ।३९। वह अनेक प्रकार के रूप-धारण में समर्थ, बल- वती, त्रिगुणात्मिका माया देवी जैसे ही कल्कि सेना के समक्ष पहुँची, वैसे ही उसे देख कर कल्कि-सेना क्षीणता को प्राप्त हो गई ।४०। निःसारा प्रतिमाकाराः समस्ता शस्त्रपाणयः ।४१। कल्किसतानालोक्य निजान्भ्रातृज्ञातिसुहृज्जनान् । मायया जायया जीर्णान्विभुुरासीत्तदग्रतः ।४२। तामालोक्य वरारोहा श्रीरूपा हरिरीश्वरः । सा प्रियेव तमालोक्य प्रविष्टा तस्य विग्रहे ॥४३॥ तामनोलोक्य ते बौद्धा मातरं कतिश्चा वराः । रुरुदुः सघशो दीना हीनस्वबलपौरुषाः ॥४४॥

सप्तम अध्याय-२ ] [ ३६१ कल्किजी के शस्त्रवारी वीरगण प्रतिभा के समान चेष्टाहीन तथा बलहीन होगए ।४१। फिर कल्किजी ने जब अपने बन्धु, जाति- बांधव और सुहृदो को मायारूपिणी अपनी पत्नी के द्वारा जीर्ण होते देखा तो वे उसके समक्ष पहुँचे ।४२। जैसे ही उन्होंने श्रीस्वरूपा अपनी उस प्रिया की ओर देखा, वैसे ही वह वरारोहा उनके देह मे प्रविष्ट हो गई ।४३। तब अपनी उस माता माया देवी को न देख कर सभी प्रमुख बौद्ध बल पौरुष से रहित होकर रुदन करने लगे ।४४। विस्मयाविष्टमनस क्व गतेयमथाब्रुवन् । कल्किः समालोकनेन समुत्थाप्य निजाञ्जनान् ।४५। निशतमसिमादाय म्लेच्छांहन्तु मनो दधे । सन्नद्ध तुरगारूढ दृढहस्तधृतत्सरुम् ।४६ धनुर्निषङ्गमनिश्श बाणजालप्रकाशितम् । धृतहस्ततुत्राणगोवाङ्गुलि वराजितम् ।४७। मेधोपर्य्युत्ताराम दशनस्वर्णबिन्दुकम् । किरीटकाटिविन्यस्त-मणिराजिविराजितम् ।४८। कामिनीनयनानन्दसन्दोहरसमन्दिरम् । विपक्षपक्षविक्षेपक्षिप्तस्रक्षकटाक्षकम् ।४६। निजभक्तजनोल्लास-सवासचरणाम्बुजम् । निरीक्ष्य कल्कि ते बौद्धास्तत्रसुर्धर्मनिन्दका ।५०। माया को न देख वे आश्चर्य चकित होकर परस्पर कहने लगे कि माया देवी कहाँ चली गई ? इधर कल्किजी ने अपनी सेना पर दृष्टि डाली यो यह स्वस्थ और सचेत हो गई तथा म्लेच्छो का सहार करने की इच्छा से कल्किजी तीक्ष्ण खग लेकर घोडे पर सवार हुए ।४५-४६। उस समय बाणो से परिपूर्ण तरकश श्रेष्ठ धनुष, कवच एव अगुलित्राण

३६२ ] [ कल्कि पुराण था तथा किरीट के अग्रभाग मे विविध प्रकार की जडी हुई मणियां चमक रही थी ।४८। कामनियो के नयनो को आनन्द देने वाले रस के सदन रूप कल्किजी उस समय शत्रु-पक्ष को विक्षिप्त करने के उद्देश्य से उनकी ओर कटाक्ष करने लगे ।४६। भक्तजन अपने भगवान् कल्किजी के चरणा- रविन्दो का दर्शन करके उल्लसित हो उठे और धर्म-निन्दक बौद्धगण भय से कांपने लगे ।५०। जहृषुः सुरसङ्घाः खे यागाहुतिहुताशनाः ।५१। सुबलमिलनहृषः शत्रुनाशंतकर्ष समरवरविलास साधुसत्कारकाश । स्वजनदुरितहर्त्ता जीवजातस्य भर्त्ता रचयतु कुशल व. कामपूगवतार ।५२। यह देख कर आकाश मे स्थित देवता कहने लगे कि अब युद्ध- भूमि रूपी यज्ञस्थल मे स्थित अग्नि मे पुन आहुति डाली जाने को है ।५१। जो अस्त्रशस्त्रो से सुसज्जित सेनाओ को इकट्ठी करके शत्रुओं को नष्ट करने वाले, लीलापूर्वक सग्राम मे तत्पर साधुओ के सत्कार-कर्त्ता, स्वजनो के दु खो का विनाश एव सब प्राणियो का भरण करने वाले है, वे सतो की अभिलाषा पूर्ण करने वाले भगवान् कल्किजी सब प्रकार कल्याण करे ।५२। ० ॥ द्वितीय अंश समाप्त ॥

तृतीयांश- प्रथम अध्याय ततः कल्किम्लेच्छगणान्करवालेन कालितान् । बाणैः सन्ताडितान्याननयद्यमसादनम् ।१। विशाखयूपोऽपि तया कविप्राज्ञसुमन्त्रका । गार्ग्यभाग्र्यविशालाद्या म्लेच्छान्निन्धुयमक्षयम् ।२। कपोतरोमा काकाक्ष काककृष्णादयोऽपरे । बौद्धा. शौद्धोदना याता युयुधु कल्किसैनिकै ।३। तेषा युद्धमभूद्धोर भयदं सर्वदेहिनाम् । भूतेशानन्दजनकं रुधिरारुणकर्द्दमम् ।४। गजाश्वरथसघाना पतता रुधिरस्रवैः । स्रवन्ती केशशैवाला वाजिग्राहा सुगाहिको ।५। सूतजी बोले--फिर कल्किजी ने कुछ म्लेच्छो को बाणो द्वारा बीध दिया और कुछ को तलवार से मार कर यम लोक मे भेज दिया ।१। विशाखयूपनरेश, कवि, प्राज्ञ, सुमन्त्रक, गर्ग्य, भर्ग्य और विशालादि ने भी उन म्लेच्छो को यमपुरी पठाया ।२। फिर कपोतरोमा, काकाक्ष, काककृष्ण और शुद्धोदन आदि बौद्ध योद्धागण कल्किक-सेना से युद्ध मे तत्पर हुए।३। उस घोर सग्राम को देख कर सभी प्राणी भयभीत हुए । रक्त युक्त लाल कीचड से रणभूमि ढक गई, यह देख कर भूतनाथ हर्षित हो उठे ।४। युद्धस्थल मे गिरे हुए हाथियो, अश्वो और रथियो के ३६३

३६४ ] [ कल्कि पुराण रक्तपात से लोहित की नदी बह चली, जिसमें केश सिवार जैसे लगने लगे और अश्व रूपी ग्रह धार मे प्रवाहित होने लगे ।५। धनुस्तरङ्गा दुष्पारा गजरोधः प्रवाहिणी । शिरःकूर्मा रथतरिः पणिमीनासृगापगा ।६। प्रवृत्ता तत्र बहुधा हर्षयन्तो मनस्विनाम् । दुन्दुभेयरवा फेरुशकुनानन्ददायिनी ।७। गजेर्गजा नरैरश्वा. खरैरुष्ट्रा रथे रथाः । निपेतुर्बाणभिन्नाङ्गा' छिन्नबाह्वङ्घ्रिकन्धरा ।८। भस्मना गुण्ठितमुखा रक्तवस्त्रा निवारता. । विकीर्णकेशाः परितो तान्ति सन्यासिनो यथा ।६। व्यग्रा केऽपि पलायन्ते याचन्त्यन्य जलं पुन, । कल्किसेनाशुगक्षुण्णा म्लेच्छा नो शर्म लेभिरे ।१०। उस लोहित नदी मे धनुष तरंग के समान उछलने लगे, हाथी इस नदी मे सेतु के समान लगते थे, कटे हुए शीश कछुआ के समान, रथ नाव के समान और कटे हुए हाथ मछली के समान दिखाई देते थे ।६। लोहित नदी के किनारे गीदडो और बाज पक्षियो की हर्ष ध्वनि दुंदुभि की ध्वनि जैसी लगती थी । उसे देख कर मनस्वी लोग हर्षित हो उठे ।७। युद्ध क्षेत्र मे हाथी सवार हाथी सवार से, अश्वारोही अश्वारोही से, ऊँट वाला ऊँट वाले से, रथ रथी से भिड़ा हुआ था । उस समय बाणो से कट-कट कर हाथ, पाँव और मस्तक धरती पर गिर रहे थे ।८। बहुत से वीरो ने भयभीत होकर गेरुए वस्त्र धारण कर, भस्म रमा ली तथा विकीर्ण केश होकर संन्यासी बन कर रोके जाने पर भी पला- यन कर गये ।६। कोई-कोई विकल होकर भागा, कोई जल माँगता रहा । इस प्रकार कल्कि-सेना के बाणो की मार से कोई म्लेच्छ वीर सकुशल न रहा ।१०।

प्रथम अध्याय-२ ] [ ३६५ तेषा स्त्रियो रथारूढा गजारूढा विहङ्गमा । समारूढा हयारूढा खरोष्ट्रवृषवाहना ॥१। योद्धु समाययुस्त्यक्त्वा पत्यापत्यसुखाश्रयान् । रूपवत्योऽतिबलवत्य पतिव्रता ।१२। नानाभरणाभूषाढ्या सन्नधा विशदप्रभा । खड्गशक्तिधनुर्वाणवलयाक्तकराम्बुजा ।१३। स्वैरिण्योऽप्यतिकामिन्यो पुंश्चल्यश्च पतिव्रता । ययुर्योद्धु कल्किसैन्ये पतीना निधनातुरा ।१४। मृद्भस्मकाष्ठचित्राणा प्रभूताम्नायशासनात् । साक्षात्पतीना निधन कि युवत्योऽपि सेहिरे ।१५। उन म्लेच्छो की रूपवती बलवती, पतिव्रता युवती स्त्रियाँ भी सन्तान-सुख की और उनके आश्रय की कामना छोड कर कोई रथ पर चढ कर, कोई हाथो पर चढ कर, कोई विहग पर चढ कर, कोई घोडे, गधे, ऊँट पर, कोई बैल पर चढ कर युद्ध करने के लिए अपने-अपने पति के पास पहुँची ।११-१२। इन्होने अनेक प्रकार के उज्ज्वल आभूषण एव शस्त्रास्त्र धारण कर रखे थे। इनके हाथो मे कडो के साथ ही खड्ग और बाण भी सुशोभित थे ।१३। सुन्दर लावण्यमयी यह स्त्रियाँ कोई स्वैरिणी, कोई वार-विलासिनी अथवा कोई पतिव्रता थी । यह पति- वियोग मे व्याकुल हुई स्त्रियाँ कलिक सेना से युद्ध करने को अग्रसर हुई ।१४। क्योकि मनुष्य मिट्टी, काष्ठ एव राख की वस्तु पर भी प्राण देने मे तत्पर होजाते है, इसी प्रकार अपने प्राण के समान पति का मरण सहन करना युवतियो के लिए भी सम्भव नही होता ।१५। ता स्त्रिय रवपतोन्बाणैर्भिन्नान्व्याकुलेतेन्द्रियान् । कृत्वा पश्चाद्यु युधिरे कल्किसैन्यैधृतायुधा ।१६। ताः स्त्रीरुद्वीक्ष्य ते सर्वे विस्मयस्मितमानसा । कल्किमागत्य ते योधाः कथयामासरादरात् ।१७।

३६६ ] [ कल्कि पुराण स्त्रीणा मेव युयुत्सूना कथा श्रुत्वा महामति । कल्कि समुदित प्रायात्स्वसैन्यै सनुगो रथः ।१८। ता. समालोक्य पद्मेश सर्वशस्त्रास्त्रधारिणी. । नानावाहनसारूढा कृतव्यूहा उवाच सः ।१६। रे स्त्रिय शृणुतास्माक वचन पथ्यमुत्तमम् । स्त्रिया युद्धे न कि पु सा व्यवहारोऽत्र विद्यते ।२०। वे म्लेच्छ स्त्रियाँ अपने पतियो को बाणो मे बिंधे हुए तथा व्या- कुल देख कर उन्हे पीछे हटाती हुई हथियार लेकर कल्कि सेना से युद्ध करने लगी ।१६। उन स्त्रियो को युद्ध मे तत्पर देख कर कल्कि-सेना आश्चर्य में पड़ गई और उसने कल्कि जी के समक्ष जाकर उन्हे सब वृत्तान्त सूचित किया ।१७। युद्ध की इच्छा वाली उन स्त्रियो का युद्ध करना मुन कर प्रसन्न हुए कल्कि जी रथ पर चढ कर सेना और अनुचरो के सहित रणभूमि मे पहुचे ।१८। अनेक शस्त्रास्त्रो से सुसज्जिता, अनेक प्रकार के वाहनो पर चढी हुई, व्यूह रचना करके युद्ध मे तत्पर उन स्त्रियो को देख कर कल्किजी बोले ।१६। कल्किजी ने कहा — हे स्त्रियो ! मैं तुम्हारे हितार्थ श्रेष्ठ वचन कहता हूँ, वह सुनो । स्त्रियो को पुरुषो के साथ युद्ध नही करना चाहिए ।२०। इति कल्केर्वचः श्रुत्वा प्राहस्य प्राहूराहता । अस्माक त्व पतीन् हंसि तेन नष्टा वयं विभो ! । हन्तु गतानामस्त्राणि कराण्येवागतान्युत ।२१। खड्ग-शक्ति धनुर्बाण-शूल तोमर-यष्टय । ताः प्राहुः पुरतो मूर्त्ताः कातंरस्वरविभूषणाः ।२२। यामासाद्य वय नार्यो हिसायामः स्वजेतसा । तमात्मन सर्वमय जानीत कृतनिश्चया ।२३। तमीशमात्मना नार्यः ! चरामो यदनुज्ञया । यत्कृता नामरूपादिभेदेन विदिता वयम् ।२४।

प्रथम अध्याय-३ ] [ ३६७ रूप-गन्ध-रस-स्पर्श-शब्दाद्या भूतपञ्चकाः । चरन्ति यदधिष्ठानात्सोऽद्य कल्कि. परात्मक ।२५। कल्किजी के वचन सुन कर म्लेच्छ-पत्नियां हँस पडी । उन्होने कहा—हे विभो ! जब तुम्हारे द्वारा हमारे पति ही नाश को प्राप्त हो गये, तब हम भी नष्ट हो चुकी । यह कह कर वे नारियाँ कल्किजी की मारने को तत्पर हुई । उन्होने जो अस्त्र छोडने चाहे, वे अस्त्र उनके हाथो मे ही रुके रह गये ।२१। खड्ग, शक्ति, धनुष-बाण, शूल, तोमर, यष्टि आदि शस्त्रास्त्रो के स्वर्ण-सज्जित देवता साक्षात् प्रकट हो कर उन म्लेच्छ-पत्नियो के प्रति बोले ।२२ देव रूपी अस्त्रो ने कहा—हे नारियो । हम जिस तेज के द्वारा जीवो का सहार करते रहते हैं, वह तेज हमे जिनसे प्राप्त हुआ है, वह सर्वमय ईश्वर यही हैं, यह समझ लो ।२३। हे स्त्रियो ! हम इन्ही परमात्मा की प्रेरणा प्राप्त कर गतिशील होते हैं तथा इनके द्वारा ही हम नाम-रूप को पाकर जाने जाते हैं ।२४। रूप, गन्ध, रस, स्पर्श तथा शब्दादि पचगुण के आश्रय रूप पञ्चभूत जिनके अधिष्ठान से अपने-अपने कार्य मे उद्यत रहते है, यह कल्किजी वही ईश्वर है ।२५। काल स्वभाव-सस्कार-नामाद्या प्रकृति परा । यस्येक्षया सृजत्यण्ड महदहङ्कारकादिकान् ।२६। य-मायया जगद्यात्रा सर्गस्थित्यन्तसञ्जिता । य एवाद्यः स एवान्ते तस्याय सोऽयमीश्वर ।२७। असौ पतिर्मे भार्याहमस्य पुत्राप्तबान्धवाः । स्वप्नोपमास्तु तन्निष्ठा विविधाश्चैन्द्रजालवत् ।२८। स्नेहमोनिबन्धना यातायात्वशा मतम् । न कल्किसेविना रागद्वेषविद्वेषकारिणाम् ।२६। कुतः कालः कुतो मृत्यु क्व यमः क्वास्तिदेवताः स एव कल्किर्भगवान्मायया बहुलीकृत. ।३०।

प्रथम अध्याय-३ ] [ ३६८ इन्ही की आज्ञा से काल, स्वभाव, सस्कार तथा सजा आदि की आश्रयभूता परा प्रकृति, महत्तत्त्व और अहकार आदि को उत्पन्न करने मे समर्थ होती है ।२६। सर्ग, स्थिति और प्रलयात्मक यह सम्पूर्ण विश्व जिनकी माया ही है, यह वही सबके आदि-रूप ईश्वर है । इनके द्वारा ही लोक मे शुभाशुभ का प्रवर्तन होता है ।२७। यह मेरा पति है और मै इसकी भार्या हूँ, यह मेरा पुत्र अथवा बान्धव है । ऐसे स्वप्न अथवा इन्द्रजाल के समान विविध प्रकार के व्यवहार की उत्पत्ति इन्ही के द्वारा होती है ।२८। स्नेह और मोहादि के बन्धन मे पड़े रह कर जो प्राणी इस विश्व के आवागमन मे रहे आते हैं अथवा जो राग, द्वेष एव विद्वे- षादि के आश्रय रहने वाले जीव तथा भगवान कल्कि की सेवा में अनु- राग न रखने वाले हैं, वही इस जगत को सत्य मानते हैं ।२६। काल कहा से आया ? मृत्यु कहाँ से उत्पन्न हुई ? यम तथा देवगण कौन हैं ? यह कल्किजी के अतिरिक्त अन्य कोई नही है, यही अपनी माया के द्वारा बहुरूप हो गए हैं ।३०। न शस्त्राणि वय नार्थः सप्रहार्या न च क्वचित् । शस्त्र प्रहर्तृ भेदोऽयमविवेक परात्मन. ।३१। कल्किदासस्यापि वय हन्तु नार्हा कथोद्‌भुनम् । हनिष्यामो दैत्यपते प्रह्लादस्य यथा हरिम् ।३२। इत्यस्त्राणा वच. श्रुत्वा स्त्रियो विस्मितमानसा. । स्नेहमोहविनिर्मुक्तास्त कल्कि शरण ययुः ॥३३॥ ताः समालोक्य पद्‌मेशः प्रणता ज्ञाननिष्ठया । प्रोवाच प्रहसन् भक्ति-योग कल्मषनाशनम् ।३४। हे स्त्रियो ! हम शस्त्र नहीं हैं, हम किसी पर आघात करने मे भी समर्थ नही हैं । यही परमात्मा स्वय शस्त्र हैं और यही आघात करने की शक्ति से सम्पन्न हैं । इनमे जो भेद प्रतीत होता है, वह सब इनकी माया ही है ।३१। दैत्यराज प्रह्ल.द की प्रार्थना पर जब भगवान् विष्णु,

३६६ ] कल्कि पुराण विष्णु नृसिंह रूप हुए थे, उस समय हम जैसे उन पर आघात करने मे समर्थ नही हो सके थे, वैसे ही इन कल्किजी और उनके सेवको पर भी आघात करने मे पूर्णतया असमर्थ हैं।३२। अस्त्रो के यह वचन सुनकर स्त्रिया अत्यन्त विस्मित हुईं और तब वे स्नेह और मोह से युक्त होकर कल्किजी की शरण मे पहुँची । ३३। भगवान कल्कि म्लेच्छ-नारियो को ज्ञाननिष्ठा मे स्थित देखकर उनके प्रति पापो का नाश करने वाला भक्ति- योग हँसते हुए कहने लगे । ३४। कर्मयोगञ्चात्मनिष्ठं ज्ञानयोगं भिदाश्रयम् । नैष्कर्म्यलक्षणं तासा कथयामास माधवः ३५। ताः स्त्रियः कल्कि गदित ज्ञानेन विजितेन्द्रियाः । भक्त्या परमवापुस्तद्योगिना दुर्लभं पदम् । ३६। दत्वा मोक्ष म्लेच्छबौद्धपियारण कृत्वा युद्ध भैरव भीमकर्मा । हत्वा बौद्धान् म्लेच्छ सघाश्च कल्किस्तेषा ज्योति स्थानापूर्ण रेजे । ३७। येशृण्वन्ति वदन्ति बौद्धनिधन म्लेच्छक्षय सादराल्लोकाः शोकहर सदा शुभकर भक्तिप्रदं माधवे । तेषामेव पुनर्न जन्ममरण सर्वार्थसम्पत्कर माया मोहविनाशन प्रतिदिन ससारतापच्छिदम् ।३८। तदनन्तर उन्होने उन नारियो को कर्मयोग, आत्मनिष्ठात्मक ज्ञान- योग, भेदाश्रय, निष्कर्मत्व के लक्षण आदि का प्रसग सुनाया ।३५। इस प्रकार जब वे म्लेच्छ रमणियां कल्कि-प्रदत्त ज्ञानोपदेश से सचेत होकर इन्द्रियो का दमन करके, भक्ति करती हुई, योगियो को भी दुर्लभ मोक्ष पद को प्राप्त हो गई ।३६। इस प्रकार उन भीमकर्मा कल्किजी घोर युद्धमे बौद्ध और म्लेच्छो का सहार कर दिया, और उनकी स्त्रियो को मोक्षपद प्रदान करके मरे हुए म्लेच्छो और बौद्धो को ज्योतिर्मय स्थान में स्थित कर विराजमान हुए । ३७। जो इस बौद्धो के निधन एव म्लेच्छो के क्षीण होने की कथा को सुनेगे, वे सभी शोको से मुक्त होकर कल्याण को प्राप्त होगे । भगवान के प्रति उनके हृदय मे भक्ति का संचार होगा और वे जन्म- मरण के चक्र से छूट जाँयगे । इस कथा के सुनने से सर्व ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है और माया-मोह का विनाश होता है, तथा संसार के ताप का सदा उच्छेद करने मे समर्थ होता है ।३८। —❀—

तृतीयांश- द्वितीय अध्याय ततो बौद्धान् म्लेच्छगणान्विजित्य सह सैनिकैः । धनान्यदाय रत्नानि कीकटात्पुनरव्रजत् ।१। कल्किः परमतेजस्वी धर्माणां परिरक्षकः । चक्रतीर्थं समागत्य स्नानं विधिवदाचरत् ।२। भ्रातृभिर्लोकपालाभैर्बहुभिः स्वजनैर्वृतः । समायातान्मुनीं स्तत्र ददृशे दीनमानसान् ।३। समुद्भिभागतास्त परिपाहि जगत्पते । इत्युक्तवन्तो बहुधा ये तानोह हरि परः ।४। वालखिल्यादिकानल्पकायाञ्चीरजटाधरान् । विनयावनतः कल्किरतनानाह कृपणान्भयात् ।५ सूतजी बोले- हे ऋषियो ! बौद्धो और म्लेच्छो पर विजय प्राप्त करके भगवान कल्कि धन रत्नादि लेकर सेना के सहित उस कीकटपुरी से चल दिये ।१। फिर वे परम तेजस्वी एव धर्मवान् कल्किजी चक्रतीर्थ मे पहुचे और वहाँ उन्होंने विधिपूर्वक स्नान किया ।२। तदनन्तर वे अपने बन्धु-बाधव के साथ लोकपाल के समान सुशोभित होते हुए वही निवास करने लगे । कुछ समयोपरान्त उन्होंने दीनता पूर्वक आये हुए कुछ मुनियो को देखा ।३। वे भयभीत मुनिवरण कल्किजी की शरण मे पहुँच कर बोले- हे जगत्पते ! हमारी रक्षा करो, रक्षा करो । इस पर भग- वान श्रीहरि बोले ।४। उन्होने अल्प देह वाले छिन्न वस्त्राभूषण और जटा धारण करने वाले बालखिल्यादि मुनियो से विनय और कृपा पूर्वक कहा ।५।

३७१ ] [ कल्कि पुराण कस्माद्यूयं समायाता केन वा भीषिता वत । तमहं निहनिष्यामि यदि वा स्यात्पुरन्दरः ॥६॥ इत्याश्रुत्य कल्किवाक्यं तेनोल्लासितमानसाः । जगदुः पुण्डरीकाक्ष निकुम्भदुहितुः कथाः ॥७॥ श‍ृणुविष्णुयशःपुत्र ! कुम्भकर्णात्मजात्मजा । कुथोदरीति विख्याता गगनार्द्धसमुत्थिता ॥८॥ कालकञ्जस्य महिषी विकञ्जजननी च सा । हिमालये शिरः कृत्वा पादौ च निषधाचले । शेते स्तनं पाययन्ती विकञ्जं प्रस्तुतास्तनी ॥६॥ तस्या निःश्वासवातेन विवशा वयमागताः । दैवेनैव समानीताः सम्प्राप्तास्त्वत्पदास्पदम् । मुनयो रक्षणीयास्ते रक्ष सु च विपत्सु च ॥१०॥ आप कहाँ से आ रहे हैं ? किससे डरे हुए हैं ? यह सब वृतान्त मुझे बताओ, फिर यदि आपका अपकार करने वाला इन्द्र भी होगा, तो भी मै उसे नष्ट कर दूंगा ।६। पुण्डरीकाक्ष कल्किजी के वाक्य सुनकर आश्वस्त हुए मुनियो के हृदय प्रफुल्लित हो गये और तब उन्होंने दैत्यराज निकुम्भ की पुत्री की कथा सुनाई ।७। मुनियो ने कहा— हे विष्णुयश के पुत्र ! हे प्रभो ! सुनिये, कुम्भकर्ण का एक पुत्र निकुम्भ था, उसकी एक कन्या कुथोदरी नाम की है । उसका आकार गगनमँडल से भी ऊँचा है ।८। वह कालकञ्ज नामक दैत्य की पत्नी है, उसका पुत्र विकञ्ज है । वह राक्षसी अपना मस्तक हिमालय पर और पांव निषध पर्वत पर रखकर विकञ्ज को स्तन पिला रही है ।६। हे देव ! हम उसकी श्वासवायु से उत्पीडित होकर दैव-प्रेरणा वश यहाँ उपस्थित हुए हैं । अब हम आपके चरणाश्रय को प्राप्त हो चुके हैं अतः उससे हमारी शीघ्र रक्षा कीजिये ।१० इति तेषां वचः श्रुत्वा कल्किः परपुरञ्जयः ।

थम अध्याय- ३ ] [ ३७२ सेनागणै परिव्रतो जगाम हिमबद्गिरिम् ।११। उपत्यका समासाद्य निशामेका निनाय सः । प्रातर्जिगमिषुः सैन्यैर्ददृशे क्षीरनिम्नगाम् ।१२। शखेन्दुधवलाकारा फेनिला बृहती द्रुतम् । चलन्ती वीक्ष्यते सर्वे स्तम्भीता विस्मयान्विताः ।१३। सेनागणगजाश्वादिरथयोध्यैः समावृतः । कल्किस्तु भगवास्तत्र ज्ञातार्थोऽपि मुनीश्वरान् ।१४। पप्रच्छ का नदी चेयं कथ दुग्धवहाभवत् । ते कल्केस्तु वच श्रुत्वा मुनयः प्राहुरा दरात् ।।१५।। उनके यह वचन सुनकर शत्रु-नगरो को विजय करने वाले भगवान् कल्कि अपनी सेना के सहित हिमालय की ओर चले ।११। वहाँ पहुँच कर उन्होने एक रात्रि निवास किया और प्रात काल होते ही, जैसे ही सेना के सहित आगे चलने लगे, वैसे ही उन्हे एक दूध की नदी दिखाई दी ।१२। यह नदी शंख तथा चन्द्रमा के समान श्वेत थी, वह दीर्घाकार वाली फेनिल नदी वेगपूर्वक बह रही थी । सेना के सभी लोग उस दूध की नदी को देखकर आश्चर्य से चकित हो गये ।१३। यद्यपि भगवान् कल्कि उस नदी के विषय में सब कुछ जानते थे, फिर भी गज, अश्व, रथ तथा पदाति सैनिको से युक्त कल्किजी ने उन मुनीश्वरो से पूछा- 'इस नदी का नाम क्या है ? इसमे यह दुग्ध किस प्रकार प्रवाहित है ?' यह सुनकर वे मुनिगण आदरपूर्वक बोले ।१४-१५। शृणु कल्के पयस्वत्याः प्रभव हिमवद्गिरौ । समायाता कुथोदर्याः स्तनप्रस्रवनादिहि ।१६। घटिकासप्तकैश्चान्या पयो यास्यति वेगतम् । हीनसारा तटाकारा भविष्यति महामते ।१७। इति श्रुत्वा मुनीनान्तु वचन सैनिकैः सह । प्रहो किमस्या राक्षस्याः स्तनादेका त्वियं नदी ।१८

प्रथम अध्याय-२ ] [ ३७१ एक स्तनं पाययति विकुञ्जं पुत्रमादरात् । न जानेऽस्याः शरीरस्य प्रमाणं कति वा भवेत् ॥१९॥ बलं वास्या निशाचर्या इत्यूचुर्विस्मयान्विताः । कल्किः परात्मा सन्नह्य सेनाभि सहसा ययौ ॥२०॥ हे प्रभो ! हे कल्के ! इम पयस्विनी नदी की उत्पत्ति के विषय मे कहते है, इसे सुनिये । उस कुथोदरी नाम की राक्षसी के स्तनो स निकला हुआ दूध हिमालय पर्वत से गिरता हुआ नदी रूप मे बह रहा है ।। १६ ।। हे महामते ! सात घडी के पश्चात् इसी प्रकार को एक अन्य पयस्विनी नदी प्रवाहित होगी । इसके पश्चात् यह नदी सूख कर तटाकार मे परिवर्तित हो जायगी ।।१७।। सेना सहिन सुशोभित कल्कि जी मुनियो के वचन सुनकर बोले- अहो, कैसे विस्मय का विषय है कि राक्षसी के स्तनो से निर्गत हुए दुग्ध से इतनी बडी नदी उत्पन्न होकर बह रही है ।।१८।। वह अपना एक स्तन अपने पुत्र विकुन्ज को पिला रही है तो इसके देह का परिमाण क्या होगा ? यह किस प्रकार जाना जा सकता है ? ।।१९।। तब सभी आश्चर्य मे भर कर बोल उठे-- अहो ! इस राक्षसी मे कितना बल है ? तदनन्तर सेना से सुसज्जित हुए कल्कि जी उस राक्षसी की ओर चल पडे ।।२०।। मुनिदर्शितमार्गेण यत्रास्ते सा निशाचरी । पुत्रं स्तनं पाययन्ती गिरिमूर्द्धिनं घनोपमा ॥२१ः श्वासवातातिवातेन दूरक्षिप्तवनद्विपाः । यस्याः कर्णबिलावासं प्रसुप्ताः सिंहसुकुलम् ॥२२। पुत्रपौत्रपरिवृता गिरिगह्वरविभ्रमाः । केशमूलमुपालम्ब्य हरिणा शेरते चिरम् ।। २३ ।। यूका इव न च व्यग्रा लुब्धजातशङ्कया भृशम् ' तामालोक्य गिरेर्मूर्ध्नि गिरितत्परमाद्भुताम् ॥२४॥ कल्किः कमलपत्राक्षः सर्वांस्तानाह सैनिकान् । भयोद्विग्नान्बुद्धिहीनांस्त्यक्तोद्यमशमपरिच्छदान् ॥२५॥

३७४ ] [ कल्कि पुराण वे मुनिगण उस मार्ग का दर्शन करने लगे जो राक्षसी के स्थान को जाता था । वहाँ पहुँच कर उन्होंने उस मेघाकार राक्षसी को गिरि शिखर पर अपने पुत्र को स्तन-पान कराते हुए देखा ॥२१॥ बन के हाथी उसकी श्वास-वायु के थपेडे खाकर दूर जा गिरते हैं तथा उसके कानों के छेदों में सिंह पडे सो रहे हैं ॥२२॥ उसके रोम छिद्रों को गिरि-गुहा समझ कर अपने पुत्र पौत्रों से युक्त हरिण गण भी उनमें घुस कर सो रहे हैं ॥२३॥ वहाँ रह कर व्याध के भय से बचे हुए हैं तथा लीख के समान स्थित हैं। पर्वत की चोटी पर अन्य पर्वत के समान स्थित उस राक्षसी को देख कर हत बुद्धि एवं भयभीत तथा शस्त्रास्त्र त्याग कर भागने को उद्यत अपने सैनिकों से भगवान् कल्कि बोले ॥ २४-२५ ॥ गिरिदुर्गंवह्निदुर्गं कृत्वा तिष्ठान्तु मामकाः । गजाश्वरथयोधा ये समायान्तु मया सह ॥२६॥ अह स्वल्पेन सैन्येन याम्यस्याः समुख शनैः । प्रहर्तुं बाणसन्दोहैः खङ्गशक्तिपरश्वधै, ।॥२७॥ इत्युक्त्वास्थाप्य पश्चात्तान्बाणैस्ता समहनद्बली । सा क्रुधोत्थाय सहसा ननर्द्द परमाद्भुतम् ॥२८॥ तेन नादेन महता वित्रस्ताश्चाभवञ्जनाः निपेतु सैनिका. सर्वे मूर्च्छिता धरणातले ॥२६॥ सा रथांश्च गजांश्चापि विवृत्तास्या भयानका । जघास प्रश्वासवातैः समानीय कुथोदरी ॥ ३०॥ उन्होंने कहा - इस पर्वतीय, दुर्ग में अग्नि दुर्ग बना कर तुम सब यही ठहरो तथा गजारूढ, अश्वारूढ और रथी वीर हमारे साथ आगे बढ़े ।। २६ ।। मैं अल्प सेना को साथ लेकर बाणों, तलवारों और फरसों के द्वारा प्रहार करने के लिए अग्रसर होता हूँ ॥२७॥ यह कह कर कल्कि जी ने सेना को तो पीछे छोडा और आगे बढ़ कर राक्षसी पर बाणों से प्रहार करने लगे । यह देख कर राक्षसी ने भी

प्रथम अध्याय-३ ] [ ३७५ क्रोध पूर्वक अद्भुत नाद किया ॥ २८ ॥ उस घोर निनाद को सुन कर सभी भयभीत हो गये तथा सब सेनापति मूर्च्छित एव धराशायी हो गये ॥२६॥ तब वह राक्षसी कुथोदरी अपने भयकर मुख को खोल कर अपने प्रश्वास के द्वारा ही रथ, अश्व, गजादि को खीच-खीच कर हडप करने लगी ॥ ३० ॥ सेनागणास्तदुदर प्रविष्टा' कल्किना सह । यथर्क्षमुखवातेन प्रविशन्ति पिपोलिकाः ॥३१॥ तद्दृष्ट्वा देवगन्धर्वा हाहाकारं प्रचक्रिरे । तत्रस्था मुनयः शेपुर्जपुश्चान्ये महर्षय ॥ ३२॥ निपेत्तुरन्ये दुःखार्त्ता ब्राह्मणा ब्रह्मवादिनः । रुरुदुः शिष्टयोधा ये जहृषुस्तन्निशाचरा ॥ ३३ ॥ जगता कदन दृष्ट्वा सस्मरात्मानमात्मना । कल्किः कमलपत्राक्षः सुरारातिनिषूदन ॥ ३४ ॥ बाणाग्नि चेलचर्माभ्या कर्म्मनेयॉनदारुभिः । प्रज्वाल्योदरमध्येन करवाल समाददे ॥ ३५ ॥ जैसे रीछ के प्रश्वास खींचने से चीटियां आकर्षित होकर उसके मुख मे पहुंच जाती है, वैसे ही अपनी सेना के सहित भगवान कल्कि उस राक्षसी के मुख मे प्रविष्ट हो गये ॥३१॥ यह देख कर सब देवता-गन्धर्व हाहाकार कर उठे, मुनिगण ने उस राक्षसी को शाप दिये और महर्षिगण कल्कि जी की कुशल के निमित्त मन्त्र-जप मे संलग्न हुए ॥३२॥ वेदज्ञ ब्राह्मण दुःख से अचेत हो गये, प्रभु-भक्त वीर रोने लगे और राक्षस गण आनन्द मे निमग्न हो गये ॥ ३३ ॥ देव शत्रुओ के नाशक भगवान् कल्कि ने जब सम्पूर्ण विश्व को इस प्रकार दुःखी देखा तो वे स्वय अपना ही स्मरण करने लगे ॥३४॥ फिर कल्कि जी ने राक्षसी के उस अन्धकार मय उदर मे अपने बाण द्वारा अग्नि उत्पन्न की और चर्म तथा रथ के काष्ठादि के द्वारा उस अग्नि को प्रज्वलित कर हाथ मे तलवार ग्रहण की ॥३५॥

३७६ ] [ कल्कि पुराण तेन खड्गेन महता दाक्ष्यं निर्भिद्य बन्धुभिः । बलिभिर्भ्रातृभिर्बाह्वैर्वृतः शस्त्रास्त्रपाणिभि ॥३६॥ बहिर्बभूव सर्वेश कल्कि. कलकविनाशनः । सहस्राक्षौ यथा वृत्रकुक्षित् दम्भोलिनेमिना ॥३७॥ यानि रध्राद्गजरथस्तुरगाश्चाभवन्बहिः । नासिकाकर्णविवरान्क र्दाप तस्या विनिर्गताः ॥३८ ॥ ते निर्गतास्ततस्तस्या सैनिका रुधिरोक्षिताः । ता विव्यधुर्निक्षिपन्ती तरसा चरणौ करौ ॥३६॥ ममार सा भिन्नदेहा भिन्नकुक्षिशिरोधरा । नादयन्ती दिशो घो. ख चूणयन्ती च पर्वतान् ॥४०॥ जैसे देवराज इन्द्र वृत्रासुर की कुक्षि को अपने वज्र से भेद कर बाहर आये थे, वैसे ही सर्वेश्वर एव पापो का नाश करने वाले कल्कि- जी ने अपनी वृहद् तलवार से राक्षसी की दक्षिण कुक्षि चीर डाली और अपने शस्त्रास्त्र धारी बाधवो के सहित बाहर निकल आये ॥ ३६- ३७ ॥ बहुत से गज, अश्व रथ और पैदल उसके अधो मार्ग मे और बहुत से उसके कानो तथा नासिका छिद्रो से होकर बाहर आ गये । ३८॥ फिर वे रक्त से भीगे हुए वीर गण राक्षमी के देह से बाहर निकल कर, को हाथ-पैर चलाती देख कर बाणो द्वारा उसका वेधन करने लगे ॥३६॥ जब उसके उदर मस्तक तथा अन्यान्ध अग छिन्न-भिन्न होने लगे तब उसकी घोर चीत्कार से दशों दिशाएं गूँज उठी । फिर वह पर्वतो पर गिर कर उन्हे चूर-चूर करती हुई मृत्यु को प्राप्त हुई ॥४०॥ करञ्जोऽपि तथा वीक्ष्य मातरं कातरोऽभवत् । स विकञ्ज क्रुधा धावन्सेनामध्ये निरायुध ॥४१॥ गजमालाकुलो वक्षोवाजिराजिविभूषण । महासर्पकृतोष्णीशः केसरीमुद्रिताङ्गुलिः ॥४२॥ ममद्द कल्किसेना ता मातुर्व्यसनकर्षितः । स कल्किरत्त ब्राह्ममस्त्र रामदत्त जिघासया ॥४३॥

प्रथम-अध्याय ] [ ३७७ धनुषा पञ्चवर्षीय राक्षसं शस्त्रमाददे । तेनास्त्रेण शिरस्तस्य छित्वा भूमावपातयत् ॥४४॥ रुधिराक्तं धातुचित्रं गिरिशृङ्गमिवद्भुतम् । सपुत्रा राक्षसी हत्वा मुनीना वचनाद्विभुः ।०४५:। जब विकज ने अपनी माता की यह दशा देखी तो वह क्रोध से कातर होकर निरस्त्र ही सेना में घुस पडा ॥ ४१ ॥ उसके हृदय मे हाथियो की माला, सब अंगो मे घोडो के आभूषण, मस्तक पर महा-सर्प का मुकुट और अंगुलियो मे सिंहो की मुद्रिकाएँ थी ॥ ४२ ॥ वह अपनी माता के शोक से व्याकुल होकर कल्किजी की सेना का उत्पीडन करने लगा । तब कल्किजीने उस पाँच वर्ष के राक्षस-बालक को मारने के लिए ब्रह्मास्त्र ग्रहण किया और उससे उसका मस्तक काट कर पृथ्वी पर गिरा दिया ॥ ४३-४४ ॥ इस प्रकार मुनियो द्वारा निवेदन करने पर कल्किजी ने गेरू आदि से चित्रित किये के समान उस रक्ताक्त पर्वत पर पुत्र सहित राक्षसी को नष्ट कर दिया ॥४५॥ गङ्गातीरे हरद्वारे निवास समकल्पयत् । देवानां कुसुमासारैर्मुनिस्तोत्रैः सुपूजितः ॥४६॥ निनाय तां निशां तत्र कल्किः परिजनावृतः । प्रातर्ददर्श गङ्गायास्तीरे मुनिगणान्बहून् । तस्याः स्नानव्राजविष्णोरात्मनो दर्शनाकुजान् ॥४७॥ हरद्वारे गङ्गातटनिकटपिण्डारकवने । वसन्तं श्रीमन्तं निजगणवृतं तं मुनिगणाः । स्तवैः स्तुत्वा स्तुत्वा विधिवदुदितैर्जन्हुतनयां । प्रपश्यंतं कल्कि मुनिजलगणा द्रष्टुमगमन् ॥४८॥ तदनन्तर उन्होने देवताओ द्वारा पुष्प-वृष्टि और मुनियो के स्तोत्रो से भले प्रकार पूजित होते हुए वहाँ चल कर हरिद्वार मे गङ्गा जी के

३७८ ] कल्कि पुराण पावन तीर पर अपनी सेना सहित निवास किया ॥४६॥ अपने परिजनो के सहित कल्किजी ने वह रात्रि वही बिताई और प्रात काल उठने पर गगा स्नान के निमित्त आये हुए मुनिगण उनके दर्शनार्थ आते हुए दिखाई दिये ॥४७ ॥ वे हरिद्वार मे गगातट के समीप स्थित पिण्डारक बन मे अपनी सेना के सहित निवास करने लगे । एक दिन, जब वे कलिमल-नाशिनी भगवती जाह्नवी की स्तोत्रो के द्वारा स्तुति कर रहे थे, तभी मुनिगण उनके दर्शनार्थ वहां आये और विविध शब्दो से युक्त स्तोत्र करने लगे ॥ ४८ ॥

तृतीयांश— तृतीय अध्याय सुस्वागतान्मुनीन् दृष्ट्वा कल्किक परम धर्मवित् । पूजावित्वा च विधिवत्सुखासीनानुवा चतान् ॥१॥ कयूय सूर्यसङ्काशा मम भाग्यादुपस्थिताः । तीर्थाटनोत्सुका लोकत्रयाणामुपकारकाः ॥२॥ वय लोके पुण्यवन्तो भाग्यवन्तो यशस्विनः । यत कृपाकटाक्षेण युष्माभिरवलोकिताः ॥३॥ ततस्ते वामदेवऽत्रिवं सष्ठो गालवो भृगुः । पराशरो नारदोऽश्वत्थामा रामः कृपक्षितः ॥४॥ दुर्वासा देवलः कण्वो वेदप्रमितिरङ्गिराः । एते चान्ये च बहबी मुनय, सशितव्रताः ॥५॥ कृत्वाग्रे मरुदेवापी च चन्द्रसूर्यकुलोद्भवौ । राजानौ तौ महावीर्यौ तपस्याभिरतौ चिरम् ॥६॥ ऊचुः प्रहृष्टमनसः कल्कि कल्कविनाशनम् । महोदधेस्तोरगत विष्णु सुरगणा यथा ॥७॥ परम धर्मविद कल्किजी ने उन मुनिगण को सुखपूर्वक वहाँ आये हुए देखकर स्वागत, आसन और विधिवत् पूजन करके उनसे बोले ॥१॥ सूर्य के समान अत्यन्त तेजस्वी, तीर्थाटन मे उत्सुक एवं तीनो लोको के कल्याण रूप उपकार की कामना वाले आप कौन हैं ? जो मेरे सौभाग्यवश यहाँ पधारे हैं ॥२॥ आपके द्वारा कृपा-कटाक्ष पूर्वक देखे जाने से मैं आज इस लोक मे अपने को पुण्यवान्, भाग्यवान्