कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
५२० कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् [ अध्याय २
५२० * कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् * [ अध्याय २ यह जो सूर्य दृष्टिगोचर होता है, निश्चय ही इस रूपमें ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है। जब यह नहीं दिखायी देता, तब मानो मर जाता है। उस समय उसका तेज चन्द्रमाको ही प्राप्त होता और प्राण वायुमें मिल जाता है। यह जो चन्द्रमा दिखायी देता है, निश्चय ही इसके रूपमें ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है। फिर जब यह नहीं दिखायी देता, तब मानो यह मर जाता है। उस समय उसका तेज विद्युत्को ही और प्राण वायुको प्राप्त हो जाता है। यह जो बिजली कौंधती है, निश्चय ही इसके रूपमें यह ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है। फिर जब यह नहीं कौंधती, तब मानो मर जाती है; उस समय उसका तेज वायुको प्राप्त होता है और प्राण भी वायुमें ही प्रवेश कर जाता है। वे प्रसिद्ध अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा तथा विद्युत्-स्वरूप सम्पूर्ण देवता वायुमें ही प्रवेश करके स्थित होते हैं। वायु (आधिदैविक प्राण) में विलीन होकर वे विनष्ट नहीं होते; क्योंकि पुनः उस वायुसे ही उनका प्रादुर्भाव होता है। इस प्रकार आधिदैविक दृष्टि है। अब आध्यात्मिक दृष्टि बतायी जाती है ॥ १२ ॥ मनुष्य वाणीसे जो बातचीत करता है, यह मानो ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है। जब यह नहीं बोलता, उस समय मानो यह वाक्-इन्द्रिय मर जाती है। उस समय वाणीका तेज नेत्रको प्राप्त हो जाता है और प्राण प्राणवायुमें मिल जाता है। यह मनुष्य नेत्रद्वारा जो देखता है, यह मानो ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है। जब नेत्रसे नहीं देखता, उस समय मानो नेत्रेन्द्रिय मर जाती है। उस समय नेत्रका तेज श्रवणेन्द्रियको प्राप्त हो जाता है तथा प्राण प्राणमें ही मिल जाता है। यह जो श्रवणद्वारा सुनता है, यह मानो ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है, जब यह नहीं सुनता, तब मानो श्रवणेन्द्रिय मर जाती है। उस समय उसका तेज मनको ही प्राप्त हो जाता है और प्राण प्राणमें मिल जाता है। यह जो मनसे ध्यान (चिन्तन) करता है, यह मानो ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है। जब चिन्तन नहीं करता, तब मानो मन मर जाता है। उस समय उसका तेज प्राण- को ही प्राप्त हो जाता है और प्राण भी प्राणमें ही मिल जाता है। इस प्रकार ये सम्पूर्ण वाक् आदि देवता प्राणमें ही प्रवेश करके स्थित होते हैं। प्राणमें लीन होकर वे नष्ट नहीं होते। अतएव पुनः प्राणसे ही उनका प्रादुर्भाव होता है। उस दैव परिमर (प्राण) का सम्यग्ज्ञान हो जानेपर यदि वे ज्ञानी पुरुष ऐसे दो ऊँचे पर्वतोंको, जो भूमण्डलके उत्तरी सिरेसे लेकर दक्षिणी सिरेतक फैले हों, अपनी इच्छाके अनुसार चलनेको प्रेरित करें तो वे पर्वत इन ज्ञानी महापुरुषोंकी हिंसा—उनकी आज्ञाका परित्याग अर्थात् उनकी अवहेलना नहीं कर सकते। इसके सिवा, जो लोग इस 'दैवपरिमर' के ज्ञाता पुरुषसे द्वेष करते हैं, अथवा वह स्वयं जिन लोगोंसे द्वेष रखता हो; वे सब-के-सब सर्वथा नष्ट हो जाते हैं ॥ १३ ॥ मोक्षके लिये सर्वश्रेष्ठ प्राणकी उपासना इसके पश्चात् अब मोक्ष-साधनके गुणसे विशिष्ट सर्वश्रेष्ठ प्राणकी उपासना बतायी जाती है। एक समय वाक् आदि सम्पूर्ण देवता अहङ्कारवश अपनी-अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करनेके लिये विवाद करने लगे। वे सब प्राणके साथ ही इस शरीरसे निकल गये। उनके निकल जानेपर वह शरीर काठकी भाँति निश्चेष्ट होकर सो गया। तदनन्तर उस शरीरमें वाक् इन्द्रियने प्रवेश किया। तब वह वाणीसे बोलने तो लगा, परंतु उठ न सका, सोया ही रह गया। तत्पश्चात् चक्षु-इन्द्रियने उस शरीरमे प्रवेश किया। तथापि वह वाणीसे बोलता और नेत्रसे देखता हुआ भी सोता ही रहा, उठ न सका। तब उस शरीरमे श्रवण-इन्द्रियने प्रवेश किया। उस समय भी वह वाणीसे बोलता, नेत्रसे देखता और कानोंसे सुनता हुआ भी सोता ही रहा; उठकर बैठ न सका। तदनन्तर उस शरीरमे मनने प्रवेश किया। तब भी वह शरीर वाणीसे बोलता, नेत्रसे देखता, कानसे सुनता और मनसे चिन्तन करता हुआ भी पड़ा ही रहा। तत्पश्चात् प्राणने उस शरीरमें प्रवेश किया। फिर तो उसके प्रवेश करते ही वह शरीर उठ बैठा। तब उन वाक् आदि देवताओंने प्राणमें ही मोक्ष-साधनकी शक्ति जानकर तथा प्रज्ञारूप प्राणको ही सब ओर व्याप्त समझकर इन प्राण-अपान आदि समस्त प्राणोंके साथ ही इस शरीररूप लोकसे उत्क्रमण किया। वे वायुमें—आधिदैविक प्राणमें स्थित हो आकाशस्वरूप होकर स्वर्गलोकमें गये—अपने अधिष्ठातृ-देवता अग्नि आदिके स्वरूपको प्राप्त हो गये। उसी प्रकार इस रहस्यको जाननेवाला विद्वान् सम्पूर्ण भूतोंके प्राणको ही प्रज्ञात्मरूपसे प्राप्तकर इन प्राण-अपान आदि समस्त प्राणोंके साथ इस शरीरसे उत्क्रमण करता है। तथा वह वायुमे प्रतिष्ठित हो आकाशस्वरूप होकर स्वर्गलोकको गमन करता है। वह विद्वान् वहाँ उस सुप्रसिद्ध प्राणका स्वरूप हो जाता है जिसमें कि ये वाक् आदि देवता स्थित होते हैं। उस प्राणस्वरूपको प्राप्तकर वह विद्वान् प्राणके उस अमृतत्व-गुणसे युक्त हो
अध्याय २ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ५२१
अध्याय २ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५२१
[बायाँ स्तम्भ] जाता है, जिस अमृतत्व-गुणसे वे वाक् आदि देवता भी संयुक्त होते हैं ॥ १४ ॥ प्राणोपासकका सम्प्रदान-कर्म अब इसके पश्चात् पिता-पुत्रका सम्प्रदान-कर्म बतलाते हैं ( पिता पुत्रको अपनी जीवन-शक्ति प्रदान करता है; अतएव इसको पितापुत्रीय सम्प्रदान-कर्म कहते हैं ) । पिता यह निश्चय करके कि अब मुझे इस लोकसे प्रयाण करना है, पुत्रको अपने समीप बुलाये । नूतन कुश-कास आदि तृणोंसे अग्निशालाको आच्छादित करके विधिपूर्वक अग्निकी स्थापना करे । अग्निके उत्तर या पूर्वभागमें जलसे भरा हुआ कलश स्थापित करे । कलशके ऊपर धान्यसे भरा हुआ पात्र भी होना चाहिये । स्वय भी नवीन धौत ( धोती ) और उत्तरीय धारण करे । इस प्रकार श्वेत वस्त्र और माला आदिसे अलङ्कृत हो घरमें आकर पुत्रको पुकारे । जब पुत्र समीप आ जाय तो सब ओरसे उसके ऊपर पड़ जाय अर्थात् उसे अङ्कमें भर ले और अपनी इन्द्रियोंसे उसकी इन्द्रियोंका स्पर्श करे ( तात्पर्य यह कि नेत्रसे नेत्रका, नाकसे नाकका तथा अन्य इन्द्रियोंसे उसकी अन्य इन्द्रियोंका स्पर्श करे ) । अथवा केवल पुत्रके सम्मुख बैठ जाय और उसे अपनी वाक्-इन्द्रिय आदिका दान करे । पिता कहे—‘वाचं मे त्वयि दधानि' ( बेटा ! मैं तुममें अपनी वाक्-इन्द्रिय स्थापित करता हूँ ) । पुत्र उत्तर दे—'वाच ते मयि दधे' ( पिताजी ! मैं आपकी वाक्-इन्द्रियको अपनेमे धारण करता हूँ ) । पिता—'प्राणं मे त्वयि दधानि' ( मैं अपने प्राणको तुममें स्थापित करता हूँ ) । पुत्र—'प्राणं ते मयि दधे' ( आपके प्राण—घ्राणेन्द्रियको अपनेमें धारण करता हूँ ) । पिता—'चक्षुर्मे त्वयि दधानि' ( अपनी चक्षु-इन्द्रियको तुममे स्थापित करता हूँ ) । पुत्र—'चक्षुस्ते मयि दधे' ( आपके चक्षुको अपनेमें धारण करता हूँ ) । पिता—'श्रोत्रं मे त्वयि दधानि' ( अपने श्रोत्रको तुममें स्थापित करता हूँ ) । उ० अं० ६६—
[दायाँ स्तम्भ] पुत्र—'श्रोत्रं ते मयि दधे' ( आपके श्रोत्रको अपनेमें धारण करता हूँ ) । पिता—'अन्नरसान्मे त्वयि दधानि' ( अपने अन्नके रसोंको तुममें स्थापित करता हूँ ) । पुत्र—'अन्नरसांस्ते मयि दधे' (आपके अन्नरसोंको अपनेमें धारण करता हूँ ) । पिता—'कर्माणि मे त्वयि दधानि' ( अपने कर्मोंको तुममें स्थापित करता हूँ ) । पुत्र—'कर्माणि ते मयि दधे' ( आपके कर्मोंको अपनेमें धारण करता हूँ ) । पिता—'सुखदुःखे मे त्वयि दधानि' ( अपने सुख और दुःखको तुममें स्थापित करता हूँ ) । पुत्र—'सुखदुःखे ते मयि दधे' ( आपके सुख और दुःखको अपनेमे धारण करता हूँ ) । पिता—'आनन्दं रतिं प्रजातिं मे त्वयि दधानि' ( मैथुन-जनित आनन्द, रति और सन्तानोत्पत्तिकी शक्ति तुममें स्थापित करता हूँ ) । पुत्र—'आनन्दं रतिं प्रजातिं ते मयि दधे' ( आप- की वह शक्ति मैं अपनेमे धारण करता हूँ ) । पिता—'इत्या मे त्वयि दधानि' ( अपनी गतिशक्ति मैं तुममें स्थापित करता हूँ ) । पुत्र—'इत्यास्ते मयि दधे' ( आपकी गतिशक्ति अपनेमे धारण करता हूँ ) । पिता—'धियो विज्ञातव्य कामान् मे त्वयि दधानि' ( अपनी बुद्धि-वृत्तियोंको, बुद्धिके द्वारा ज्ञातव्य विषयको तथा विशेष कामनाओंको तुममें स्थापित करता हूँ ) । पुत्र—'धियो विज्ञातव्यं कामास्ते मयि दधे' ( आपकी बुद्धि-वृत्तियोंको, बुद्धिके द्वारा ज्ञातव्य विषयोंको तथा कामनाओं- को मैं अपनेमें धारण करता हूँ ) । तदनन्तर पुत्र पिताकी प्रदक्षिणा करते हुए पूर्व दिशाकी ओर पिताके समीपसे निकलता है । उस समय पिता पीछेसे पुत्रको सम्बोधित करके कहते हैं— 'यशो ऽब्रह्मवर्चसमन्नाद्य कीर्तिस्त्वा जुषताम् ।'
५२२ ⁕ कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् ⁕ [ अध्याय :
५२२ ⁕ कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् ⁕ [ अध्याय : 'यश, ब्रह्मतेज, अन्नको खाने और पचानेकी शक्ति तथा इसके बाद यदि पिता नीरोग हो तो वह पुत्रके प्रभुत्वमें उत्तम कीर्ति—ये समस्त सद्गुण तुम्हारा सेवन करें।' ही वहाँ निवास करे (पुत्रको घरका स्वामी समझे और पिताके यों कहनेपर पुत्र अपने बायें कन्धेकी ओर दृष्टि अपनेको उसके आश्रित माने)। अथवा सब कुछ त्यागकर घुमाकर देखे और हाथसे ओट करके अथवा कपड़ेसे आड़ घरसे निकल जाय—सन्यासी हो जाय। अथवा यदि वह करके पिताको उत्तर दे— परलोकगामी हो जाय तो जिन-जिन वाक् आदि इन्द्रियोंको 'स्वर्गान् लोकान् कामान् अवाप्नुहि' उसने पुत्रमें स्थापित किया था, उन सभीकी शक्तियोंका वह 'आप अपनी इच्छाके अनुसार कमनीय स्वर्गलोक तथा पुत्र उसी प्रकार आश्रय हो जाता है। वे सभी शक्तियाँ उसे वहाँके भोगोंको प्राप्त करें।' प्राप्त होती हैं (यही सच्चा उत्तराधिकार है) ॥ १५ ॥ ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ २ ॥
तृतीय अध्याय
ॐ तृतीय अध्याय इन्द्र-प्रतर्दन-संवाद; प्रज्ञास्वरूप प्राणकी महिमा
ॐ यह प्रसिद्ध है कि राजा दिवोदासके पुत्र प्रतर्दन (देवासुर-सङ्ग्राममें देवताओंकी सहायता करनेके लिये) देवराज इन्द्रके प्रिय धाम स्वर्गलोकमें गये। वहाँ उनकी अनुपम युद्धकला और पुरुषार्थसे संतुष्ट होकर इन्द्रने उनसे कहा— 'प्रतर्दन ! बोलो, मैं तुम्हें क्या वर दूँ?' तब वे प्रसिद्ध वीर प्रतर्दन बोले—'देवराज ! जिस वरको आप मनुष्य-जातिके लिये परम कल्याणमय मानते हों, वैसा कोई वर मेरे लिये आप स्वयं ही वरण करें।' यह सुनकर इन्द्रने कहा—'राजन् ! लोकमें यह सर्वत्र विदित है कि कोई भी दूसरेके लिये वर नहीं माँगता, अतः तुम्हीं अपने लिये कोई वर माँगो।' प्रतर्दन बोला— 'तब तो मेरे लिये वरका अभाव ही रह गया।' (क्योंकि आप स्वयं तो वर माँगेंगे नहीं, और 'मुझे क्या माँगना चाहिये'—इसका मुझको ज्ञान ही नहीं है। ऐसी दशामें मुझे वर मिलनेसे रहा।) प्रतर्दनके ऐसा कहनेपर निश्चय ही देवराज इन्द्र अपने सत्यसे विचलित नहीं हुए, (वे वर देनेकी प्रतिज्ञा कर चुके थे, अतः प्रतर्दनके न माँगनेपर भी अपनी ही ओरसे वर देनेको उद्यत हो गये।) क्योंकि इन्द्र सत्यस्वरूप हैं। उन प्रसिद्ध देवता इन्द्रने कहा—'प्रतर्दन ! तुम मुझे ही जानो—मेरे ही यथार्थ स्वरूपको समझो। इसे ही मैं मनुष्य- जातिके लिये परमकल्याणमय वर मानता हूँ कि वह मुझे भलीभाँति जाने।' (यदि कहो, आपमें ऐसी क्या विशेषता है! तो सुनो; मैंने प्राणब्रह्मके साथ तादात्म्य प्राप्त कर लिया है, अतएव मुझमें कर्तापनका अभिमान नहीं है, मेरी बुद्धि कहीं भी लिप्त नहीं होती। कर्मफलकी इच्छा मेरे मनमें कभी उत्पन्न ही नहीं होती, अतएव कोई भी कर्म मुझे बन्धनमें नहीं डालता।* इसी अभिप्रायसे कहते हैं—) 'मैंने त्वष्टा प्रजापतिके पुत्र विश्वरूपको, जिसके तीन
- न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा। इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥ यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते। हत्वापि स इमाँल्लोकान् न हन्ति न निबध्यते ॥ (गीता ४। १४, १८। १७) मस्तक थे, वज्रसे मार डाला। कितने ही (मिथ्या) संन्यासियोंको, जो अपने आश्रमोचित आचारसे भ्रष्ट एव बहिर्मुख (ब्रह्मविचारसे विमुख) हो चुके थे, टुकड़े-टुकड़े करके भेड़ियोंको बाँट दिया। कितनी ही बार प्रह्लादके परिचारक दैत्य राजाओंको मौतके घाट उतार दिया। पुलोमासुरके परिचारक दानवों तथा पृथिवीपर रहनेवाले कालखाञ्ज नामक बहुत-से असुरोंका भी समस्त विघ्न-बाधाओंका अतिक्रम करके संहार कर डाला। परंतु इतनेपर भी (अहङ्कार और कर्मफलकी कामनासे शून्य होनेके कारण) मुझ प्रसिद्ध देवराज इन्द्रके एक रोमको भी हानि नहीं पहुँची। मेरा एक बाल भी बाँका नहीं हुआ। इसी प्रकार जो मुझे भलीभाँति जान ले, उसके पुण्यलोकको किसी भी कर्मसे हानि नहीं पहुँचती। 'मेरे स्वरूपका ज्ञान रखनेवाले पुरुषको बड़े-से-बड़ा पाप भी हानि नहीं पहुँचा सकता। अधिक क्या कहूँ, उसे पाप लगता ही नहीं। पाप करनेकी इच्छा होनेपर भी उसके मुखसे नील आभा नहीं प्रकट होती—उसका मुँह काला नहीं होता'॥१॥ (यह कथन अहङ्कारसे सर्वथा शून्य ब्रह्मज्ञानीकी महत्ता बतलानेके लिये है, न कि पाप कर्मोंका समर्थन करनेके लिये। वस्तुतः अहङ्काररहित राग-द्वेषशून्य पुरुषसे पापकार्य बननेका ही कोई हेतु नहीं होता।) वे प्रसिद्ध देवराज इन्द्र बोले—'मैं प्रज्ञास्वरूप प्राण हूँ। उस प्राण एव प्रज्ञात्मारूपमें विदित मुझ इन्द्रकी तुम 'आयु और अमृत' रूपसे उपासना करो।' (अर्थात् समस्त प्राणियोंकी आयु एव जीवनभूत जो प्राण है, जो मृत्युसे रहित अमृतपद है, वह मुझ इन्द्रसे भिन्न नहीं है—यों समझकर मेरी उपासना करो।) 'आयु प्राण है। प्राण ही आयु है तथा प्राण ही अमृत है। जबतक इस शरीरमें प्राण निवास करता है, तबतक ही आयु है। प्राणसे ही प्राणी परलोकमें अमृतत्वके सुखका अनुभव करता है। 'प्रज्ञासे मनुष्य सत्यका निश्चय और सङ्कल्प-विकल्प करता है। जो 'आयु' और 'अमृत' रूपसे मुझ इन्द्रकी उपासना करता है, वह इस लोकमें पूरी आयुतक जीवित रहता है
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- कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् * [ ३
तथा स्वर्गलोकमें जानेपर अक्षय अमृतत्वका सुख भोगता है।' 'इस प्राणके विषयमें निश्चय ही कोई-कोई विद्वान् इस प्रकार कहते हैं-अवश्य ही सब प्राण (वाक् आदि समस्त इन्द्रियाँ और प्राण) एकीभावको प्राप्त होते हैं। कोई भी मनुष्य एक ही समय वाणीसे नाम सूचित करने, नेत्रसे रूप देखने, कानसे शब्द सुनने और मनसे चिन्तन करनेमें समर्थ नहीं हो सकता; इससे सिद्ध होता है कि अवश्य ही समस्त प्राण एकीभावको प्राप्त होते हैं-एक होकर कार्य करते हैं। ये सब एक-एक विषयका बारी-बारीसे अनुभव कराते हैं। 'जब वाणी बोलने लगती है, उस समय अन्य सब प्राण मौन होकर उसका अनुमोदन करते हैं। जब नेत्र देखने लगाता है, तब अन्य सब प्राण भी उसके पीछे रहकर देखते हैं। जब कान सुनने लगता है, तब अन्य सब प्राण भी उसका अनुसरण करते हुए सुनते हैं, जब मन चिन्तन करने लगता है, तो अन्य सब प्राण भी उसके साथ रहकर चिन्तन करते हैं तथा मुख्य प्राण जब अपना व्यापार करता है, तब अन्य प्राण भी उसके साथ साथ वैसी ही चेष्टा करते हैं।'-प्रतर्दनने कहा। 'यह बात ऐसी ही है'-इस प्रकार उन सुप्रसिद्ध देवराज इन्द्रने उत्तर दिया। "सब प्राण एक होते हुए भी जो पाँच प्राण हैं, वे निःश्रेयस (परम कल्याण) -रूप हैं; निःसंदेह ऐसी ही बात है ॥ २ ॥ "वाक्-इन्द्रियसे वञ्चित होनेपर भी मनुष्य जीवित रहता है; क्योंकि हमलोग गूँगोंको प्रत्यक्ष देखते हैं। नेत्रहीन मनुष्य भी जीवित रहता है, क्योंकि हमलोग अंधोंको जीवित देखते हैं। श्रवण-इन्द्रियसे रहित होनेपर भी मनुष्य जीवित रहता है, क्योंकि हमलोग बहरोंको जीवित देखते हैं। मनःशक्तिसे शून्य होनेपर भी मनुष्य जीवन धारण कर सकता है, क्योंकि हमलोग छोटे शिशुओंको जीवित देखते हैं। इतना ही नहीं, प्राण शक्तिके रहनेपर बाँह कट जानेपर भी मनुष्य जीवित रहता है, जाँघ कट जानेपर भी वह जीवन धारण कर सकता है (परतु प्राणके न रहनेपर तो एक क्षण भी जीवित रहना असम्भव है।)- यह हम प्रत्यक्ष देखते हैं। "अतः क्रियाशक्तिका उद्बोधक प्राण ही ज्ञानशक्तिका उद्बोधक प्रज्ञात्मा है। (अतएव यह निःश्रेयसरूप है।) यही इस शरीरको सब ओरसे पकड़कर उठाता है। इसीलिये इस प्राणकी ही 'उक्थ' रूपसे उपासना करनी चाहिये।
(उत्थापनके कारण ही वह उक्थ है।) निश्चय ही जो प्रसिद्ध प्राण है, वही प्रज्ञा है। अथवा जो प्रज्ञा बतायी गयी है, वही प्राण है, क्योंकि ये प्रज्ञा और प्राण दोनों साथ- साथ ही इस शरीरमें रहते हैं और जीवात्मासे मिलकर साथ- ही-साथ यहाँसे उत्क्रमण करते हैं। इस प्राणमय परमात्माका यही दर्शन (ज्ञान) है, यही विज्ञान है कि जिस अवस्थामें यह सोया हुआ पुरुष किसी स्वप्नको नहीं देखता, उस समय वह इस मुख्य प्राणमें ही एकीभावको प्राप्त हो जाता है। उस अवस्थामे वाक् सम्पूर्ण नामोंके साथ इस प्राणमें ही लीन हो जाती है। नेत्र समस्त रूपोंके साथ इसमें ही लीन हो जाता है। कान समग्र शब्दोंके साथ इसमें ही लीन हो जाता है तथा मन सम्पूर्ण चिन्तनीय विषयोंके साथ इसमें ही लयको प्राप्त हो जाता है। वह पुरुष जब जाग उठता है, उस समय, जैसे जलती हुई आगसे सब दिशाओंकी ओर चिनगारियाँ निकलती हैं, उसी प्रकार इस प्राणस्वरूप आत्मासे समस्त वाक् आदि प्राण निकलकर अपने-अपने योग्य स्थानकी ओर जाते हैं। फिर प्राणोंसे उनके अधिष्ठाता अग्नि आदि देवता प्रकट होते हैं और देवताओंसे लोक-नाम आदि विषय प्रकट होते हैं। इस प्राणस्वरूप आत्माकी यह आगे बतायी जानेवाली ही सिद्धि है, यही विज्ञान है कि जिस अवस्थामें पुरुष रोगसे आर्त हो मरणासन्न हो जाता है, अत्यन्त निर्बलताको पहुँचकर अचेत हो जाता है-किसीको पहचान नहीं पाता, उस समय कहते हैं कि इसका चित्त (मन) उत्क्रमण कर गया। इसीलिये यह न तो सुनता है, न देखता है, न वाणीसे कुछ बोलता है और न चिन्तन ही करता है। उस समय इस प्राणमें ही वह एकीभावको प्राप्त हो जाता है। उस अवस्थामें वाक् सम्पूर्ण नामोंके साथ इसमें लीन हो जाती है। नेत्र समस्त रूपोंके साथ इसमे लीन हो जाता है। कान समग्र शब्दोंके साथ इसमे लीन हो जाता है तथा मन सम्पूर्ण चिन्तनीय विषयोंके साथ इसमें लीन हो जाता है। वह पुरुष मृत्युके बाद जब पुनः जागता है-जन्मान्तर ग्रहण करता है, उस समय जैसे जलती हुई आगसे सब दिशाओंकी ओर चिनगारियाँ निकलती हैं, उसी प्रकार इस प्राणस्वरूप आत्मासे वाक् आदि प्राण प्रकट हो अपने-अपने योग्य स्थान- की ओर चल देते हैं। फिर प्राणोंसे उनके अधिष्ठाता अग्नि आदि देवता प्रकट होते हैं और देवताओसे लोक- नाम आदि विषय प्रकट होते हैं ॥ ३ ॥
अध्याय ३ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ५२५
अध्याय ३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५२५
[बायाँ स्तम्भ] वह मुमूर्षु पुरुष जब इस शरीरसे उत्क्रमण करता है, उस समय इन सब इन्द्रियोंके साथ ही उत्क्रमण करता है। वाक्-इन्द्रिय इस पुरुषके पास सब नामोंका त्याग कर देती है (अतः वह नामोंको ग्रहण नहीं कर पाता); क्योंकि वाक्-इन्द्रियसे ही मनुष्य नामोंको ग्रहण कर पाता है। घ्राण-इन्द्रिय उसके निकट समस्त गन्धोंका त्याग कर देती है (अतः वह गन्धसे भी वञ्चित हो जाता है); क्योंकि घ्राण-इन्द्रियसे ही मनुष्य सब प्रकारके गन्धोंका अनुभव करता है। नेत्र उसके समीप सब रूपोंको त्याग देता है; नेत्रसे ही मनुष्य सब रूपोंको ग्रहण करता है। कान उसके समीप समस्त शब्दोंको त्याग देता है; कानसे ही मनुष्य सब प्रकारके शब्दोंको ग्रहण करता है। मन उसके समीप समस्त चिन्तनीय विषयोंको त्याग देता है; मनसे ही मनुष्य सब प्रकारके चिन्तनीय विषयोंको ग्रहण करता है। यही प्राणस्वरूप आत्मामें सब इन्द्रियों और विषयोंका समर्पित हो जाना है। निश्चय ही जो प्राण है, वही प्रज्ञा है अथवा जो प्रज्ञा है, वही प्राण है, क्योंकि ये दोनों इस शरीरमें साथ-साथ ही रहते हैं और साथ-साथ ही इससे उत्क्रमण करते हैं। अब निश्चय ही जिस प्रकार इस प्रज्ञामें सम्पूर्ण भूत एक हो जाते हैं, इसकी हम स्पष्ट शब्दोंमें व्याख्या करेंगे ॥ ४ ॥ अवश्य ही वाक्-इन्द्रियने इस प्रज्ञाके एक अङ्गकी पूर्ति की है। बाहरकी ओर उसके विषयरूपसे कल्पित भूतमात्रा (पञ्चभूतोंका अंश-विशेष) नाम—शब्द है। निश्चय ही प्राण (घ्राणेन्द्रिय) ने भी इस प्रज्ञाके एक अङ्गकी पूर्ति की है। बाहरकी ओर उसके विषयरूपसे कल्पित जो भूत- मात्रा है, वह गन्ध है। निश्चय ही नेत्रने भी इस प्रज्ञाके एक अङ्गकी पूर्ति की है। बाहरकी ओर उसके विषयरूपसे कल्पित जो भूतमात्रा है, वह रूप है। निश्चय ही कानने भी इस प्रज्ञाके एक अङ्गकी पूर्ति की है। बाहरकी ओर उसके विषयरूपसे कल्पित जो भूतमात्रा है, वह शब्द है। निश्चय ही जिह्वाने भी इस प्रज्ञाके एक अङ्गकी पूर्ति की है। बाहरकी ओर उसके विषयरूपसे कल्पित जो भूतमात्रा है, वह अन्नका रस है। निश्चय ही हाथोंने भी इस प्रज्ञाके एक अङ्गकी पूर्ति की है। बाहरकी ओर उनके विषयरूपसे कल्पित जो भूतमात्रा है, वह कर्म है। निश्चय ही शरीरने भी इस प्रज्ञाके एक अङ्गकी पूर्ति की है। बाहरकी ओर उसके
[दायाँ स्तम्भ] विषयरूपसे कल्पित जो भूतमात्रा है, वह सुख और दुःख है। निश्चय ही उपस्थने भी इस प्रज्ञाके एक अङ्गकी पूर्ति की है, बाहरकी ओर इसके विषयरूपसे कल्पित जो भूतमात्रा है, वह आनन्द, रति और प्रजोत्पत्ति है। निश्चय ही पैरोंने भी इस प्रज्ञाके एक अङ्गकी पूर्ति की है। बाहरकी ओर उनके विषयरूपसे कल्पित जो भूतमात्रा है, वह गमन-क्रिया है। अवश्य ही प्रज्ञाने भी इस प्रज्ञाके एक अङ्गकी पूर्ति की है। बाहरकी ओर उसके विषयरूपसे कल्पित जो भूतमात्रा है, वह बुद्धिके द्वारा अनुभव करने योग्य वस्तु और कामनाएँ हैं॥ ५ ॥ प्रज्ञासे वाक्-इन्द्रियपर आरूढ होकर मनुष्य वाणीके द्वारा नामोंको ग्रहण करता है। प्रज्ञासे प्राण (घ्राणेन्द्रिय) पर आरूढ होकर उसके द्वारा समस्त गन्धोंको ग्रहण करता है। प्रज्ञासे नेत्रपर आरूढ होकर नेत्रसे सब रूपोंको ग्रहण करता है। प्रज्ञासे श्रवण-इन्द्रियपर आरूढ होकर उसके द्वारा सब प्रकारके शब्दोंको ग्रहण करता है। प्रज्ञासे जिह्वापर आरूढ होकर जिह्वासे सम्पूर्ण अन्नरसोंको ग्रहण करता है। प्रज्ञासे हाथोंपर आरूढ होकर हाथोंसे समस्त कर्मोंको ग्रहण करता है। प्रज्ञासे शरीरपर आरूढ होकर शरीरसे भोग और पीडाजनित सुख-दुःखोंको ग्रहण करता है। प्रज्ञासे उपस्थपर आरूढ होकर उपस्थसे आनन्द, रति और प्रजोत्पत्ति को ग्रहण करता है। प्रज्ञासे पैरोंपर आरूढ होकर पैरोंसे सम्पूर्ण गमन-क्रियाओं- को ग्रहण करता है। तथा प्रज्ञासे ही बुद्धिपर आरूढ होकर उस- के द्वारा अनुभव करनेयोग्य वस्तु एवं कामनाओंको ग्रहण करता है ॥ ६ ॥ प्रज्ञासे रहित होनेपर वाक्-इन्द्रिय किसी भी नामका बोध नहीं करा सकती; क्योंकि उस अवस्थामें मनुष्य यों कहता है कि 'मेरा मन अन्यत्र चला गया था। मैं इस नामको नहीं समझ सका।' प्रज्ञासे पृथक् होनेपर घ्राण-इन्द्रिय किसी भी गन्धका बोध नहीं करा सकती। उस दशामें मनुष्य यों कहता है कि 'मेरा मन अन्यत्र चला गया था, इसलिये मैं इस गन्ध- को नहीं जान सका।' प्रज्ञासे पृथक् होकर नेत्र किसी भी रूपका ज्ञान नहीं करा सकता। उस दशामें मनुष्य यों कहता है कि 'मेरा मन अन्यत्र चला गया था, इसलिये मैं इस रूप- को नहीं पहचान सका।' प्रज्ञासे पृथक् रहकर कान किसी भी शब्दका ज्ञान नहीं करा सकता। उस दशामें मनुष्य यह कहता है कि 'मेरा मन अन्यत्र चला गया था, इसलिये मैं इस शब्द- को नहीं समझ सका।' प्रज्ञासे पृथक् रहकर जिह्वा किसी भी
५२६ | कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् | [ अध्याय ३
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अन्न रसका अनुभव नहीं करा सकती । उस दशामें मनुष्य यह कहता है कि 'मेरा मन अन्यत्र चला गया था, इसलिये मैं इस अन्न-रसका अनुभव न कर सका।' प्रज्ञासे पृथक् होकर हाथ किसी भी कर्मका ज्ञान नहीं करा सकते । उस दशामें मनुष्य यह कहता है कि 'मेरा मन अन्यत्र चला गया था, इसलिये मैं इस कर्मको नहीं जान सका।' प्रज्ञासे पृथक् होकर शरीर किसी सुख दुःखका ज्ञान नहीं करा सकता । उस दशामें मनुष्य कहता है कि 'मेरा मन अन्यत्र चला गया था, इसलिये मैं इन सुख दुःखोंको नहीं जान सका ।' प्रज्ञासे पृथक् हो उपस्थ किसी भी आनन्द, रति और प्रजोत्पत्तिका ज्ञान नहीं करा सकता; उस दशामें मनुष्य कहता है कि 'मेरा मन अन्यत्र चला गया था, इसलिये मैं इस आनन्द, रति और प्रजोत्पत्तिका ज्ञान नहीं प्राप्त कर सका ।' प्रज्ञासे पृथक् रहकर दोनों पैर किसी भी गमन-क्रियाका बोध नहीं करा सकते; उस दशामें मनुष्य यह कहता है कि 'मेरा मन अन्यत्र चला गया था, इसलिये मैं इस गमन क्रियाका अनुभव नहीं कर सका।' कोई भी बुद्धिवृत्ति प्रज्ञासे पृथक होनेपर नहीं सिद्ध हो सकती, उसके द्वारा ज्ञातव्य वस्तुका बोध नहीं हो सकता ॥ ७ ॥
वाणीको जाननेकी इच्छा न करे; वक्तारको—वाणीके प्रेरक आत्माको जाने । गन्धको जाननेकी इच्छा न करे; जो गन्धको ग्रहण करनेवाला आत्मा है, उसको जाने । रूपको जाननेकी इच्छा न करे; रूपके ज्ञाता साक्षी आत्माको जाने । शब्दको जाननेकी इच्छा न करे; उसे सुननेवाले आत्माको जाने । अन्नके रसको जाननेकी इच्छा न करे; उस अन्नरसके ज्ञाता आत्माको जाने । कर्मको जाननेकी इच्छा न करे; कर्ता (आत्मा) को जाने । सुख-दुःखको जाननेकी इच्छा न करे; सुख-दुःखके विज्ञाता (साक्षी आत्मा) को जाने । आनन्द, रति और प्रजोत्पत्तिको जाननेकी इच्छा न करे; आनन्द, रति और प्रजोत्पत्तिके ज्ञाता (आत्मा) को जाने । गमन-क्रियाको जाननेकी इच्छा न करे; गमन करनेवाले (साक्षी आत्मा) को जाने । मनको जाननेकी इच्छा न करे; मनन करनेवाले (आत्मा) को जाने ।
वे ये दस ही भूतमात्राएँ (नाम आदि विषय) हैं, जो प्रज्ञामें स्थित हैं तथा प्रज्ञाकी भी दस ही मात्राएँ (वाक् आदि इन्द्रियरूप) हैं, जो भूतोंमें स्थित हैं। यदि वे प्रसिद्ध भूतमात्राएँ न हों तो प्रज्ञाकी मात्राएँ भी नहीं रह सकतीं और प्रज्ञाकी मात्राएँ न हों तो भूतमात्राएँ भी नहीं रह सकतीं । इन दोमेसे किसी भी एकके द्वारा किसी भी रूप (विषय अथवा इन्द्रिय) की सिद्धि नहीं हो सकती । (तात्पर्य यह कि इन्द्रियसे विषयकी और विषयसे इन्द्रियकी सत्ता जानी जाती है; यदि केवल विषय हो तो विषयसे विषयका ज्ञान नहीं हो सकता अथवा यदि केवल इन्द्रिय रहे तो उससे भी इन्द्रियका ज्ञान होना सम्भव नहीं है; अतः दोनोंका—भूतमात्रा और प्रज्ञामात्राका (विषय तथा इन्द्रियका) होना आवश्यक है।
(विषय और इन्द्रियोमे जो परस्पर भेद है, वैसा प्रज्ञामात्रा और भूतमात्रामें भेद नहीं है—इस आशयसे कहते हैं—) इनमें नानात्व नहीं है। अर्थात् प्रज्ञामात्रा और भूतमात्राका जो स्वरूप है, उसमें भेद नहीं है। वह इस प्रकार समझना चाहिये । जैसे रथकी नेमि अरोंमें और अरे रथकी नाभिमे आश्रित हैं, इसी प्रकार ये भूतमात्राएँ प्रज्ञामात्राओंमें स्थित हैं और प्रज्ञामात्राएँ प्राणमें प्रतिष्ठित हैं। वह यह प्राण ही प्रज्ञात्मा, आनन्दमय, अजर और अमृतरूप है। वह न तो अच्छे कर्मसे बढता है और न खोटे कर्मसे छोटा ही होता है । यह प्राण एव प्रज्ञारूप चेतन परमात्मा ही इस देहाभिमानी पुरुषसे साधु कर्म करवाता है। वह भी उसीसे करवाता है, जिसे इन प्रत्यक्ष लोकोंसे ऊपर ले जाना चाहता है; तथा जिसे वह इन लोकोंकी अपेक्षा नीचे ले जाना चाहता है, उससे असाधु कर्म करवाता है। यह लोकपाल है, यह लोकोंका अधिपति है और यह सर्वेश्वर है। इन सब गुणोंसे युक्त वह प्राण ही मेरा आत्मा है—इस प्रकार जाने । वह मेरा आत्मा है, इस प्रकार जाने ॥ ८ ॥
॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥
चतुर्थ अध्याय
ॐ चतुर्थ अध्याय अजातशत्रु और गार्ग्यका संवाद
[बायाँ स्तम्भ]
गर्गगोत्रमें उत्पन्न एव गार्ग्य नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण थे, जो बलाकाके पुत्र थे। उन्होंने सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन तो किया ही था, वे वेदोंके अच्छे वक्ता भी थे। उन दिनों संसारमे सब ओर उनकी बड़ी ख्याति थी। वे उशीनर देशके निवासी थे, परन्तु सदा विचरण करते रहनेके कारण कभी मत्स्यदेशमें, कभी कुरु पाञ्चालमें और कभी काशी तथा मिथिला प्रान्तमें रहते थे। इस प्रकार वे सुप्रसिद्ध गार्ग्य एक दिन काशीके विद्वान् राजा अजातशत्रुके पास गये और अभिमानपूर्वक बोले—'राजन् ! मैं तुम्हारे लिये ब्रह्मतत्त्वका उपदेश करूँगा।' गार्ग्यके यों कहनेपर उन प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—'ब्रह्मन् ! आपकी इस बातपर हम आपको एक हजार गौएँ देते हैं। निश्चय ही आजकल लोग जनक- जनक कहते हुए ही उनके समीप दौड़े जाते हैं (अर्थात् राजा जनक ही ब्रह्मविद्याके श्रोता और दानी हैं, ऐसा कहकर प्रायः लोग उन्हींके निकट जाते हैं; आज आपने हमारे पास इसी उद्देश्यसे आकर राजा जनकके समान ही हमारा गौरव बढाया है। अतः हम आपको एक हजार गौएँ देते हैं) ॥ १ ॥
तब वे प्रसिद्ध बलाका-पुत्र गार्ग्य बोले—'राजन् ! यह जो सूर्यमण्डलमें अन्तर्यामी पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मबुद्धिसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—'नहीं नहीं, इसके विषयमें आप सवाद न करें। निश्चय ही यह सबसे महान् और शुक्ल वस्त्र धारण करनेवाला है। * यह सबका अतिक्रमण करके-सबसे ऊँची स्थितिमें स्थित है तथा यह मनका मस्तक हे। इस प्रकार मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह मनुष्य भी, जो इस प्रसिद्ध सूर्यमण्डलान्तर्गत पुरुषकी इस रूपमें उपासना करता है, सबका अतिक्रमण
[दायाँ स्तम्भ]
करके—सबसे ऊँची स्थितिमें स्थित होता है तथा समस्त भूतोंका मस्तक माना जाता है' ॥ २-३ ॥
वे सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य बोले—'यह जो चन्द्र- मण्डलमें अन्तर्यामी पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा— 'नहीं नहीं, इसके विषयमें आप सवाद न करें। यह सोम राजा है और अन्नका आत्मा है। निश्चय ही इस प्रकार मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इस प्रसिद्ध चन्द्रमण्डलान्तर्गत पुरुषकी इस रूपमें उपासना करता है, अन्नका आत्मा होता है (अन्न-राशिसे सम्पन्न होता है)' ॥४॥
वे सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य बोले—'यह जो विद्युन्मण्डलमें अन्तर्यामी पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजात- शत्रुने कहा—'नहीं-नहीं, इसके विषयमें आप सवाद न करें। यह तेजका आत्मा है—निश्चय ही इस भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इस प्रसिद्ध विद्युन्मण्डलान्तर्गत पुरुषकी इस रूपमें उपासना करता है, तेजका आत्मा (महान् तेजस्वी) होता है' ॥ ५ ॥
वे सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य बोले—'यह जो मेघ- मण्डलमें अन्तर्यामी पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—'नहीं नहीं, इसके विषयमें आप सवाद न करें। यह शब्दका आत्मा है—निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इस प्रसिद्ध मेघ मण्डलान्तर्गत पुरुषकी इस रूपमें उपासना करता है, शब्दका आत्मा (समस्त वाङ्मयके चरम तात्पर्यका ज्ञाता) हो जाता है' ॥ ६ ॥
वे सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य बोले—'यह जो आकाश- मण्डलमें अन्तर्यामी पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—'नहीं-नहीं, इसके विषयमें आप सवाद न करें। यह पूर्ण, प्रवृत्तिशून्य (निष्क्रिय) और ब्रह्म (सबसे बृहत्) है— निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इस प्रसिद्ध आकाशमण्डलान्तर्गत पुरुषकी
[पाद-टिप्पणी]
- सूर्यकी तेजोमयी किरणें भास्वर शुक्लवर्णकी मानी गयी हैं, अत उनमें आवृत्त होनेके कारण सूर्यमण्डलके अधिष्ठाता पुरुषको 'पाण्डरवासा' कहा गया। अथवा 'पाण्डरवासा' पद चन्द्रमाका विशेषण है। चन्द्रमा स्वभावत शुक्ल रश्मियोंसे आच्छादित है तथा सूर्यकी जो सुषुम्ना नामकी किरण है, वह चन्द्रमारूप ही मानी गयी है। बृहदारण्यक उपनिषद्में द्वितीय अध्यायके प्रथम ब्राह्मणमें भी यह प्रसङ्ग आया है, वहाँ 'पाण्डरवासा' यह विशेषण चन्द्रमाके लिये ही आया है।
५२८ कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् [ अध्याय ४
५२८ * कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् * [ अध्याय ४
इस रूपमे उपासना करता है, प्रजा और पशुसे पूर्ण होता है। इसके सिवा, न तो स्वय वह उपासक और न उसकी सतान ही समयसे (मनुष्यके लिये नियत सामान्य आयुसे) पहले मृत्युको प्राप्त होती है' ॥ ७॥
वे सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य बोले—'यह जो वायु- मण्डलमें अन्तर्यामी पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा— 'नहीं-नहीं, इसके विषयमें आप संवाद न करें। यह इन्द्र (परम ऐश्वर्यसे सम्पन्न), वैकुण्ठ (कहीं भी कुण्ठित न होने- वाला) और कभी परास्त न होनेवाली सेना है—निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इस प्रसिद्ध वायुमण्डलान्तर्गत पुरुषकी इस रूपमें उपासना करता है, अवश्य ही विजयशील, दूसरोंसे पराजित न होनेवाला और शत्रुओंपर विजय पानेवाला होता है' ॥ ८ ॥
वे सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य बोले—'यह जो अग्नि- मण्डलमें अन्तर्यामी पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—'नहीं-नहीं, इसके विषयमें आप सवाद न करें। यह विषासहि (दूसरोंके आक्रमणको सह सकनेवाला) है— निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह उपासक भी, जो इस प्रसिद्ध अग्निमण्डलान्तर्गत पुरुषकी इस रूपमें उपासना करता है, यह उपासनाके पश्चात् विषासहि (दूसरोंका वेग सह सकनेवाला) होता है' ॥ ९ ॥
वे सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य बोले—'यह जो जल- मण्डलमें अन्तर्यामी पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—'नहीं नहीं, इसके विषयमें आप सवाद न करें। यह नामका आत्मा है (अर्थात् जितने भी नामधारी जीव हैं, उन सबका आत्मा—जीवनरूप है)—निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इस प्रसिद्ध जलमण्डलान्तर्गत पुरुषकी इस रूपमें उपासना करता है, नामधारी जीवमात्रका आत्मा होता है। यह अधिदैवत उपासना बतायी गयी । अब अध्यात्म-उपासना बतायी जाती है ॥ १० ॥
वे सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य बोले—'यह जो दर्पणमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—'नहीं-नहीं, इसके विषयमे आप संवाद न करें। यह प्रतिरूप है—निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इस दर्पणान्तर्गत पुरुषकी इस रूपमे उपासना करता है, उस प्रतिरूपगुणसे विभूषित होता है। उसकी संततिमें सब उसके अनुरूप ही जन्म लेते हैं, प्रतिकूल रूप और स्वभाव- वाले नहीं ॥ ११ ॥
वे सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य बोले—'यह जो प्रति- ध्वनिमे पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—'नहीं- नहीं, इसके विषयमें आप सवाद न करें। यह द्वितीय और अनपग है—निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इस प्रतिध्वनिगत पुरुषकी इस रूपमें उपासना करता है, अपने सिवा द्वितीय (स्त्री-पुत्रादि) को प्राप्त करता है तथा सदा द्वितीयवान् बना रहता है (अर्थात् उन स्त्री-पुत्र आदिसे उसका वियोग नहीं होता)' ॥ १२ ॥
वे सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य बोले—'यह जो जाते हुए पुरुषके पीछे ध्वन्यात्मक शब्द उसका अनुसरण करता है, उसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—'नहीं-नहीं, इसके विषयमें आप सवाद न करें। यह प्राणरूप है—निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इसकी इस रूपमे उपासना करता है, न तो स्वय पूरी आयुके पहले मृत्युको प्राप्त होता है और न उसकी सतान ही पूर्ण आयुके पहले निधनको प्राप्त होती है' ॥ १३ ॥
१. विषका अर्थ यहाँ हविष्य है। अग्निमें जो हविष्य डाला जाता है, उसे वह भस्म करके सहन कर लेता है, इसलिये अग्नि विषासहि अर्थात् सहन करनेवाला है। २ जलके बिना जीवन-रक्षा असम्भव है, अत उसे नामधारी जीवमात्रका आत्मा कहा गया है।
१. रूपका ठीक वैसा ही प्रतिबिम्ब उपस्थित करनेके कारण उसे 'प्रतिरूप' कहा गया है। २ प्रतिध्वनि एक ध्वनिकी ही पुनरावृत्ति है, अतएव यह द्वितीय है। प्रतिध्वनिमें गतिका अभाव है, इसलिये वह 'अनपग' है। ३. चलते या दौड़ते समय श्वासकी गति कुछ तीव्र हो जाती है, उससे जो अव्यक्त शब्द होता है, उसीको यहाँ 'प्राण' रूप बताया गया प्रतीत होता है।
अध्याय ४ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ५२९
अध्याय ४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५२९
वे सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य बोले— 'यह जो छाया- मय पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—'नहीं-नहीं, इसके विषयमें आप सवाद न करें। यह मृत्युरूप है—निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इसकी इस रूपमें उपासना करता है, न तो स्वय ही समयसे ( मनुष्यके लिये सामान्यतः नियत आयुसे ) पहले मृत्युको प्राप्त होता है और न उसकी सन्तान ही समयसे पहले जीवनसे हाथ धोती है' ॥ १४ ॥
उन सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्यने कहा—'यह जो शरीरान्तर्वर्ती पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा— 'नहीं-नहीं, इसके विषयमें आप सवाद न करें। यह प्रजापति- रूप है—निश्चय ही इस भावसे ही मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इसकी इस रूपमें उपासना करता है, प्रजा और पशुओंसे सम्पन्न होता है' ॥ १५ ॥
वे सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य बोले— 'यह जो प्रज्ञासे नित्य संयुक्त प्राणरूप आत्मा है, जिससे एकताको प्राप्त होकर यह सोया हुआ पुरुष स्वप्नमार्गसे विचरता है ( नाना प्रकार- के स्वप्नोंका अनुभव करता है ), उसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजात- शत्रुने कहा—'नहीं-नहीं, इसके विषयमें आप सवाद न करें। यह य$^३$ राजा है—निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार जो इसकी इस रूपमें उपासना करता है, उस उपासककी श्रेष्ठताके लिये यह सारा जगत् नियमपूर्वक चेष्टा करता है' ॥ १६ ॥
उन सुप्रसिद्धबलाकानन्दन गार्ग्यने कहा—'यह जो दाहिने नेत्रमें पुरुष है, उसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—'नहीं- नहीं, इसके विषयमें आप सवाद न करें। यह नामका आत्मा, अग्निका आत्मा तथा ज्योतिका आत्मा है—निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इसकी इस रूपमे उपासना करता है, इन सबका आत्मा होता है' ॥ १७ ॥
वे सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य बोले— 'यह जो बायें नेत्रमे पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—'नहीं- नहीं, इसके विषयमे आप सवाद न करें। यह सत्यका आत्मा, विद्युत्का आत्मा और तेजका आत्मा है—निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इसकी इस रूपमे उपासना करता है, इन सबका आत्मा होता है' ॥ १८ ॥
उसके बाद बलाकानन्दन गार्ग्य चुप हो गये। तब उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा— 'बालाके ! बस, क्या इतना ही आपका ब्रह्मज्ञान है ?' इस प्रश्नपर बलाकानन्दन गार्ग्य बोले— 'हाँ, इतना ही है।' तब उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—'तब तो व्यर्थ ही आपने मेरे साथ यह संवाद किया था कि मैं तुम्हें ब्रह्मका उपदेश करूँगा । बलाकानन्दन ! अवश्य ही जो आपके बताये हुए इन सभी सोपाधिक पुरुषोंका कर्ता है अथवा ये सभी जिसके कर्म हैं, वही जाननेयोग्य है।'
राजाके यह कहनेपर वे प्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य हाथमें समिधा लेकर उनके पास गये और बोले—'मैं आपको गुरु बनानेके लिये समीप आता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—'यह विपरीत बात हो जायगी, यदि क्षत्रिय ब्राह्मणको शिष्य बनानेके लिये अपने समीप बुलाये । इसलिये आइये ( एकान्तमें चलें ), वहाँ आपको मैं अवश्य ब्रह्मका ज्ञान कराऊँगा।' यों कहकर राजाने बालाकि गार्ग्यका हाथ पकड़ लिया और वहाँसे चल दिये। वे दोनों एक सोये हुए पुरुषके पास चले आये। वहाँ प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने उस सोये हुए पुरुषको पुकारा—'ओ बृहन् ! हे पाण्डरवासा ! हे सोम राजन् !' इस प्रकार सम्बोधन करनेपर भी वह पुरुष चुपचाप सोया ही रहा। तब राजाने उस पुरुषके शरीरपर छड़ीसे आघात किया। वह सोया हुआ पुरुष छड़ीकी चोट लगते ही उठकर खड़ा हो गया। तब बालाकि गार्ग्यसे राजा अजातशत्रुने कहा—'बालाके ! यह पुरुष इस प्रकार अचेत-सा होकर कहाँ सोता था ? किस प्रदेशमें इसका शयन हुआ था ? और इस जाग्रत्-अवस्थाके प्रति यह कहाँसे चला आया ?'
१. छाया अन्धकारका ही स्वरूप है। बाहरका अन्धकार और भीतरका अज्ञान—ये दोनों मृत्युरूप हैं। २ सन्तानके उत्पादन और पालन-पोषणमें संलग्न रहनेसे यहाँ शरीरस्थित पुरुषको 'प्रजापति' कहा गया है। ३. प्राण ही यम-नियमका हेतु है तथा वह राजाकी भाँति सर्वत्र विशेष स्थान रखता है, अतएव वह 'यम राजा' कहा गया है। १-२. नेत्र तैजस इन्द्रिय है, नेत्रसे ही नाम-रूपावली वस्तुओंका प्रकाशन होता है, अत इसे नाम, सत्य, ज्योति, विद्युत्, अग्नि और तेजका आत्मा बताना ठीक ही है।
उ० अ० ६७—
५३० कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् [ ४
यहाँ पृष्ठ की पूर्ण सामग्री प्रस्तुत है:
५३० * कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् * [ ४ राजाके इस प्रकार पूछनेपर भी बालाकि गार्ग्य इस रहस्यको समझ न सके । तब उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने फिर कहा—'बालाके ! यह पुरुष इस प्रकार अचेत सा होकर जहाँ सोता था, जहाँ इसका शयन हुआ था और इस जाग्रत्- अवस्थाके प्रति यह जहाँसे आया है, वह स्थान यह है— 'हिता' नामसे प्रसिद्ध बहुत सी नाड़ियाँ हैं, जो हृदय कमल- से सम्बन्ध रखनेवाली हैं। वे हृदय-कमलसे निकलकर सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त होकर फैली हुई हैं। इनका परिमाण इस प्रकार है—एक केशको एक हजार बार चीरनेपर जो एक खण्ड हो सकता है, उतनी ही सूक्ष्म वे सब-की-सब नाड़ियाँ हैं। पिङ्गल अर्थात् नाना प्रकारके रंगोंका जो अति सूक्ष्मतम रस है, उससे वे पूर्ण हैं। शुक्ल, कृष्ण, पीत और रक्त—इन सभी रंगोंके सूक्ष्मतम अंशसे वे युक्त हैं। उन्हीं नाड़ियोंमें वह पुरुष सोते समय स्थित रहता है। जिस समय सोया हुआ पुरुष कोई स्वप्न नहीं देखता, उस समय वह इस प्राणमें ही एकीभावको प्राप्त हो जाता है। उस समय वाक् सम्पूर्ण नामोंके साथ इस प्राणमें ही लीन हो जाती है। नेत्र समस्त रूपोंके साथ इसमें ही लीन हो जाता है। कान समग्र शब्दोंके साथ इसमें ही लीन हो जाता है तथा मन भी सम्पूर्ण चिन्तनीय विषयोंके साथ इसमें ही लयको प्राप्त हो जाता है। वह पुरुष जब जाग उठता है, उस समय जैसे जलती हुई आगसे सब दिशाओंकी ओर चिनगारियाँ निकलती हैं, उसी प्रकार इस प्राणस्वरूप आत्मासे समस्त वाक् आदि प्राण निकलकर अपने-अपने भोग्य-स्थानकी ओर जाते हैं। फिर प्राणोंसे उनके अधिष्ठाता अग्नि आदि देवता प्रकट होते हैं और देवताओंसे लोक—नाम आदि विषय प्रकट होते हैं ॥१९॥ उस आत्माकी उपलब्धिको दृष्टान्त इस प्रकार है। जैसे क्षुरधान (छूरा रखनेके लिये बनी हुई चर्ममयी पेटी) में छूरा रक्खा रहता है, उसी प्रकार शरीरान्तर्वर्ती हृदय-कमलमें अङ्गुष्ठमात्र पुरुषके रूपमे परमात्माकी उपलब्धि होती है; तथा जिस प्रकार अग्नि अपने नीडभूत अरणी आदि काष्ठमें सर्वत्र व्याप्त रहती है, उसी प्रकार यह प्रज्ञानवान् आत्मा इस 'आत्मा' नामसे कहे जानेवाले शरीरमें नखसे शिखातक व्याप्त है। उस इस साक्षी आत्माका ये वाक् आदि आत्मा अनुगत सेवककी भाँति अनुसरण करते हैं—ठीक उसी तरह, जैसे श्रेष्ठ गुणोंसे युक्त धनीका, उसके आश्रित रहनेवाले स्वजन अनुवर्त्तन करते हैं तथा जिस प्रकार धनी अपने स्वजनोंके साथ भोजन करता है और स्वजन जैसे उस धनीको ही भोगते हैं, उसी प्रकार यह प्रज्ञानवान् आत्मा इन वाक् आदि आत्माओंके साथ भोगता है तथा निश्चय ही इस आत्माको ये वाक् आदि आत्मा भोगते हैं। वे प्रसिद्ध देवता इन्द्र जबतक इस आत्माको नहीं जानते थे, तबतक असुरगण इनका पराभव करते रहते थे; किंतु जब वे इस आत्माको जान गये, तब असुरोंको मारकर, उन्हें पराजित करके सम्पूर्ण देवताओंमें श्रेष्ठताका पद, स्वर्गका राज्य और त्रिभुवनका आधिपत्य पा गये। उसी प्रकार यह जानने- वाला विद्वान् सम्पूर्ण पापोंका नाश करके समस्त प्राणियोंमें श्रेष्ठताका पद, स्वाराज्य और प्रभुत्व प्राप्त कर लेता है। जो यह जानता है, जो यह जानता है, उसे पूर्वोक्त फल मिलता है' ॥ २० ॥ ॥ चतुर्थ अध्याय समाप्त ॥ ४ ॥ ॥ ऋग्वेदीय कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान्सन्दधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ ऐतरेयोपनिषद्के आरम्भमें छप चुका है। १ हृदय नामसे प्रसिद्ध जो कमलके आकारका मांसपिण्ड है, उसको चारों ओर आँतोंने घेर रक्खा है; आँतोंद्वारा किये गये हृदयके इस परिवेष्टनका नाम 'पुरीतत्' है। यह 'पुरीतत्' सम्पूर्ण शरीरका उपलक्षण है—ऐसा श्रीशङ्कराचार्यने माना है।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ अथर्ववेदीय श्रीरामपूर्वतापनीयोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इन मन्त्रोंका अर्थ प्रश्नोपनिषद्में दिया जा चुका है ।
खण्ड
राम-नामके विविध अर्थ; भगवान्के तत्त्वकी व्याख्या, मन्त्र एवं यन्त्रका माहात्म्य
ॐ सच्चिदानन्दमय महाविष्णु श्रीहरि जब रघुकुलमें दशरथजीके यहाँ अवतीर्ण हुए, उस समय उनका नाम 'राम' हुआ । इस नामकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है—'जो महीतलपर स्थित होकर भक्तजनोंका सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण करते और राजा-के रूपमें सुशोभित होते हैं, वे राम हैं'—ऐसा विद्वानोंने लोकमें 'राम' शब्दका अर्थ व्यक्त किया है । ('राति राजते वा महीस्थितः सन् इति रामः'—इस विग्रहके अनुसार 'राति' या 'राजते' का प्रथम अक्षर 'रा' और 'महीस्थितः'का आदि अक्षर 'म' लेकर 'राम' बनता है; इसी प्रकार अन्यत्र भी समझना चाहिये।) राक्षस जिनके द्वारा मरणको प्राप्त होते हैं, वे राम हैं । अथवा अपने ही उत्कर्षसे इस भूतलपर उनका 'राम' नाम विख्यात हो गया (उसकी प्रसिद्धिमें कोई व्युत्पत्तिजनित अर्थ ही कारण है, ऐसा नहीं मानना चाहिये) । अथवा वे अभिराम (सबके मनको रमानेवाले) होनेसे राम हैं । अथवा जैसे राहु मनसिज (चन्द्रमा) को हतप्रभ कर देता है, उसी प्रकार जो राक्षसोंको मनुष्यरूपसे प्रभाहीन (निष्प्रभ) कर देते हैं, वे राम हैं । अथवा वे राज्य पानेके अधिकारी महीपालोंको अपने आदर्श चरित्रके द्वारा धर्ममार्गका उपदेश देते हैं, नामोच्चारण करनेपर ज्ञानमार्गकी प्राप्ति कराते हैं, ध्यान करने-पर वैराग्य देते हैं और अपने विग्रहकी पूजा करनेपर ऐश्वर्य प्रदान करते हैं, इसलिये इस भूतलपर उनका 'राम' नाम पड़ा होगा । परंतु यथार्थ बात तो यह है कि उस अनन्त, नित्यानन्दस्वरूप, चिन्मय ब्रह्ममें योगीजन रमण करते हैं; इसलिये वह परब्रह्म परमात्मा ही 'राम' पदके द्वारा प्रतिपादित होता है ॥ १—६ ॥
यद्यपि ब्रह्म चिन्मय, अद्वितीय, प्राकृत अवयवरहित और (पाञ्चभौतिक) शरीरसे रहित है, तथापि भक्तजनोंके अभीष्ट कार्यकी सिद्धिके लिये वह चिन्मय देहको प्रकट करता है—भक्तोंके स्नेहवश निराकार ब्रह्म भी नराकार धारण कर लेता है ॥ ७ ॥
भगवान्के स्वरूपमें स्थित जो देवता हैं, उन्हींकी पुरुष, स्त्री, अङ्ग और अस्त्र आदिके रूपमे कल्पना होती है । अर्थात् भिन्न-भिन्न देवता ही अस्त्र आदिके रूपमें भगवान्की सेवा करते हैं, परंतु वे भगवत्स्वरूपसे पृथक् नहीं हैं । भगवान् जो अनेक प्रकारके स्वरूप धारण करते हैं, उनमें किसीके दो, किसीके चार, किसीके छः, आठ, दस, बारह, सोलह और अठारह—इतने-इतने हाथ कहे गये हैं । ये शङ्ख आदिसे सुशोभित होते हैं । 'विश्वरूप' धारण करनेपर भगवान्के सहस्रों हाथ हो जाते हैं । उन सभी विग्रहोंके भिन्न-भिन्न रंग और वाहन आदिकी भी कल्पना होती है । उनके लिये नाना प्रकारकी शक्तियों तथा सेना आदिकी भी कल्पना की जाती है । इस
५३२ * श्रीरामपूर्वतापनीयोपनिषद् * [ खण्ड ३
प्रकार परब्रह्म परमात्मामें विष्णु, शिव, दुर्गा, सूर्य और गणेश आदिके रूपमें पञ्चविध शरीरकी कल्पना होती है और उन सबके लिये पृथक्-पृथक सेना आदिकी कल्पना होती है ॥८-१०॥
ब्रह्मासे लेकर वृक्षादिपर्यन्त समस्त जड-चेतनका वाचक जो यह 'राम' मन्त्र है, यह अर्थके अनुरूप ही है—जैसा इस नामका अर्थ है, वैसा ही इसका प्रभाव भी है। अतः इस राम-मन्त्रकी दीक्षा लेकर सदा इसका जप करना चाहिये। इसके बिना भगवान्की प्रसन्नता नहीं प्राप्त होती। क्रिया, कर्म इत्यादिका अनुष्ठान करनेवाले जो साधक हैं, उनके अर्थ (अभीष्ट प्रयोजन) को मन्त्र बता देता है—उसकी सिद्धिका निश्चय करा देता है; अतः मनन (निश्चय) और त्राण (रक्षा) करनेके कारण वह मन्त्र कहलाता है। वह सम्पूर्ण अभिधेयोंका वाचक होता है। स्त्री-पुरुष उभय-रूपमें विराजमान जो भगवान् हैं, उनके लिये प्रतीकरूप विग्रह-यन्त्रका निर्माण है। यदि बिना यन्त्रके पूजा होती है, तो देवता प्रसन्न नहीं होते ॥ ११-१३ ॥
द्वितीय खण्ड
श्रीरामके स्वरूपका कथन; राम-बीजकी व्याख्या
भगवान् किसी कारणकी अपेक्षा न रखकर स्वतः प्रकट होते या नित्य विद्यमान रहते हैं, इसलिये 'स्वभू' कहलाते हैं। चिन्मय प्रकाश ही उनका स्वरूप है; अतः वे ज्योतिर्मय हैं। रूपवान् होते हुए भी वे अनन्त हैं—देश, काल और वस्तुकी सीमासे परे हैं। उन्हें प्रकाशित करनेवाली कोई दूसरी शक्ति नहीं है, वे अपनेसे ही प्रकाशित होते हैं। वे ही अपनी चैतन्य-शक्तिसे सबके भीतर जीवरूपसे प्रतिष्ठित होते हैं तथा वे ही रजोगुण, सत्त्वगुण तथा तमोगुणका आश्रय लेकर समस्त जगत्की उत्पत्ति, रक्षा और संहारके कारण बनते हैं, ऐसा होनेसे ही यह जगत् सदा प्रतीतगोचर होता है। यह जो कुछ दिखायी देता है, सब ॐकार है—परमात्मस्वरूप है। जैसे प्राकृत वटका महान् वृक्ष वटके छोटे-से बीजमें स्थित रहता है, उसी प्रकार यह चराचर जगत् रामबीजमें स्थित है। ('राम्' ही रामबीज है।) ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव—ये तीन मूर्तियाँ 'राम्'के रकारपर आरूढ हैं तथा उत्पत्ति, पालन एव संहारकी त्रिविध शक्तियाँ अथवा बिन्दु, नाद और बीज-से प्रकट होनेवाली रौद्री, ज्येष्ठा एवं वामा—ये त्रिविध शक्तियाँ भी वहीं स्थित हैं। ('राम्'का अक्षर-विभाग इस प्रकार है—र्, आ, अ, म् । इनमें रकार तो साक्षात् श्रीरामका वाचक है तथा उसपर आरूढ जो 'आ', 'अ' और 'म्' हैं, ये क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव—इन तीन देवोंके और उपर्युक्त त्रिविध शक्तियोंके वाचक हैं।) इस बीजमन्त्रमे प्रकृति-पुरुषरूप सीता तथा राम पूजनीय हैं। इन्हीं दोनोंसे चौदह भुवनोंकी उत्पत्ति हुई है। इनमें ही इन लोकोंकी स्थिति है तथा उन आकार, अकार, मकाररूप ब्रह्मा, विष्णु, शिवमें इन सबका लय भी होता है। अतः श्रीरामने माया (लीला) से ही अपनेको मानव माना। जगत्के प्राण एव आत्मारूप इन भगवान् श्रीरामको नमस्कार है। इस प्रकार नमस्कार करके गुणोंके भी पूर्ववर्ती परब्रह्मस्वरूप इन नमस्कार-योग्य देवता श्रीरामके साथ अपनी एकताका उच्चारण करे अर्थात् दृढ़ भावनापूर्वक 'मैं श्रीराम ही ब्रह्म हूँ' यों कहे ॥ १-४ ॥
तृतीय खण्ड
राम-मन्त्रकी व्याख्या, जपकी प्रक्रिया तथा ध्यान
'नमः' यह नाम जीववाचक है और 'राम' इस पदके द्वारा आत्माका प्रतिपादन होता है। तथा 'राम' के साथ एकात्मताको प्राप्त हुई जो 'आय' (रामाय)—रूपा चतुर्थी विभक्ति है, उसके द्वारा जीव और आत्मा (परमात्मा) की एकता बतलायी जाती है। 'रामाय नमः' यह मन्त्र वाचक है और भगवान् राम इसके वाच्य हैं; इन दोनोंका संयोग (अर्थात् मन्त्रजपपूर्वक भगवान्के स्वरूपका चिन्तन) सम्पूर्ण साधकोंको अभीष्ट फल प्रदान करनेवाला है। इसमें तनिक भी संशय नहीं है। जैसे जो नामी होता है, वह अपने वाचक नामका उच्चारण होनेपर सम्मुख आ जाता है, उसी प्रकार बीजात्मक मन्त्र 'राम्' को भी समझना चाहिये। अर्थात् इसके द्वारा बुलानेपर भी भगवान् मन्त्र-जप करनेवाले साधकके सम्मुख आ जाते हैं। बीज और शक्तिका क्रमशः दाहिने और बायें स्तनोंपर न्यास करे और कीलकका नियमपूर्वक मध्यमें अर्थात् हृदयमें न्यास करे। (यहाँ 'रा' यह बीज है, 'मा' यह शक्ति है और 'यं' यह कीलक है।) इस न्यासके साथ ही साधक अपनी मनोवाञ्छा-सिद्धिके लिये विनियोग भी करे। सभी मन्त्रोंका यही साधारण क्रम है—अर्थात् पहले बीजका, फिर शक्तिका, फिर कीलकका न्यास तथा अन्तमें अपनी मनोरथ-सिद्धिके लिये विनियोग होता है। यहाँ ध्यान-कालमें भावना करनी चाहिये कि दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम अनन्त परमात्मरूप हैं।
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कल्याण भगवान् श्रीरामचन्द्र
प्रकृत्या सहितः श्यामः पीतवासा जटाधरः । द्विभुजी कुण्डली रत्नमाली धीरो धनुर्धरः ॥ हेमाभया द्विभुजया सर्वालङ्कृतयाचिता । स्विष्टः कमलधारिण्या पृष्ठः कोसलजात्मजः ॥ दक्षिणे लक्ष्मणेनाथ सधनुष्पाणिना पुनः । हेमाभेनानुजेनैव तथा कोणत्रयं भवेत् ॥ (रामतापनी०)
खण्ड ४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५३३ वे तेजमें प्रज्वलित अग्निके सदृश हैं। (अथवा राम्-मन्त्र अनन्त—'आ' और तेजोमय अग्नि 'र्' के साथ एक ही समय उच्चारित होता है। 'र' और 'आ' का एक साथ उच्चारण होनेसे 'रा' बनता है।) वे श्रीराम जब शीतल किरणोंवाली अर्थात् सौम्य कान्तिमती श्रीसीताजीके साथ संयुक्त होते हैं, तब उनसे अग्नीषोमात्मक (पुरुष और स्त्रीरूप) जगत्की उत्पत्ति होती है। (अथवा अनुष्णगु-शब्दका अर्थ है चन्द्रमा (म्) और विश्वका अर्थ है वैश्वानर-अग्नि (रा), अतः वैश्वानर-बीज 'रा' जब चन्द्र-बीज 'म्' से व्याप्त होता है, तब अग्नीषोमात्मक जगत्का वाचक 'राम्' यह मन्त्र बनता है।) श्रीराम सीताके साथ उसी प्रकार शोभा पाते हैं, जैसे चन्द्रमा चन्द्रिकाके साथ सुशोभित होते हैं ॥ १—६ ॥ ध्यान कौसल्यानन्दन श्रीराम अपनी प्रकृति—ह्लादिनीशक्ति श्रीसीताजीके साथ विराजमान हैं। उनका वर्ण श्याम है। वे पीताम्बर धारण किये हुए हैं। उनके सिरपर जटाभार सुशोभित है। उनके दो भुजाएँ हैं। कानोंमें कुण्डल शोभा पा रहे हैं। गलेमें रत्नोंकी माला चमक रही है। वे स्वभावतः धीर (निर्भय एव गम्भीर) हैं। धनुष धारण किये हुए हैं। उनके मुखपर सदा प्रसन्नता छायी रहती है। वे सङ्ग्राममें सदा ही विजयी होते हैं। अणिमा आदि आठ ऐश्वर्य- शक्तियाँ उनकी शोभा बढाती हैं। इस जगत्की कारणभूता मूल प्रकृतिरूपा परमेश्वरी सीता उनके वाम अङ्गको विभूषित कर रही हैं। सीताजीके श्री-अङ्गोंकी कान्ति सुवर्णके सदृश गौर है। उनके भी दो भुजाएँ हैं। वे समस्त दिव्य आभूषणों- से विभूषित हैं तथा हाथमें कमल धारण किये हुए हैं। उन चिदानन्दमयी सीतासे सटकर बैठे हुए भगवान् श्रीराम बड़े हृष्ट-पुष्ट दिखायी देते हैं। दक्षिण भागमें श्रीरघुनाथजीके छोटे भाई सुवर्ण-गौर कान्तिवाले श्रीलक्ष्मणजी हाथमें धनुष- बाण लिये खड़े हैं। उस समय श्रीराम, लक्ष्मण और श्रीसीताजीका एक त्रिकोण बन जाता है ॥ ७-९ ॥ चतुर्थ खण्ड षडक्षर मन्त्रका स्वरूप; भगवान् श्रीरामका स्तवन जैसे श्रीराम-मन्त्रका 'राम्' यह बीज बताया गया है, उसी प्रकार उसका शेष अंश भी बताया जाता है। स्व अर्थात् 'राम' शब्दके चतुर्थ्यन्त रूपके साथ जीव—अर्थात् 'नमः' पद हो तो 'रां रामाय नमः' यह षडक्षर मन्त्र बनता है। इस प्रकार षडक्षर मन्त्र सिद्ध होनेपर दो त्रिकोणरूप बनता है। (अर्थात् छहों अक्षरोंके न्यासके लिये छः कोण बनते हैं।) एक बार जब देवता भगवान्का दर्शन करनेके लिये आये, तब उन्होंने कल्पवृक्षके नीचे रत्नमय सिंहासनपर विराजमान जगदीश्वर श्रीरघुनाथजीका इस प्रकार स्तवन किया— 'कामरूपधारी तथा मायामय स्वरूप ग्रहण करनेवाले श्रीरामको नमस्कार है। (अथवा कामबीज 'क्लीं' और मायामय बीज 'ह्रीं' से युक्त श्रीराम-मन्त्रको नमस्कार है—क्लीं रामाय नमः ह्रीं रामाय नमः ।) वेदके आदिकारण ॐकारस्वरूप श्रीरामको नमस्कार है। (इससे 'ॐ रामाय नम' इस मन्त्रकी सूचना मिलती है।) रमा श्रीसीताजीको धारण करनेवाले अथवा रमणीय अधरोंवाले, आत्मरूप, नयनाभिराम श्रीरामको नमस्कार है। श्रीजानकीजीका शरीर ही जिनका आभूषण अथवा जो श्रीजनकनन्दिनीके श्रीविग्रहको स्वय ही शृङ्गार आदिसे विभूषित करते हैं, जो राक्षसोंके संहारक तथा कल्याणमये विग्रहवाले हैं तथा जो दशमुख रावणका अन्त करनेके लिये यमराजस्वरूप हैं, उन मङ्गलमय रघुवीरको नमस्कार है। हे रामभद्र ! हे महाधनुर्धर ! हे रघुवीर ! हे नृपश्रेष्ठ ! हे दशवदन-विनाशक ! हमारी रक्षा कीजिये तथा हमें ऐसी श्री—ऐश्वर्य-सम्पदा दीजिये, जिसका सम्बन्ध आपसे हो, अर्थात् जो भगवत्प्रीत्यर्थ ही उपयोगमे लायी जा सके'* ॥ १-६ ॥
- कामरूपाय रामाय नमो मायामयाय च ॥ नमो वेदादिरूपाय ॐकाराय नमो नमः। रमाधाराय रामाय श्रीरामायात्ममूर्तये ॥ जानकीदेहभूषाय रक्षोघ्नाय शुभाङ्गिने। भद्राय रघुवीराय दशस्यान्तकरूपिणे ॥ रामभद्र महेष्वास रघुवीर नृपोत्तम। भो दशास्यान्तकास्माक रक्षां देहि श्रियं च ते ॥ (२-५)
५३४ * श्रीरामपूर्वत्तापनीयोपनिषद् * [ खण्ड ६ पञ्चम खण्ड खरके वधसे लेकर वाली-वधतकका संक्षिप्त चरित्र 'रघुवीर ! आप हमे ऐश्वर्यकी प्राप्ति कराइये।' भगवान् | आश्रमपर गये । वहाँ शबरीने उनका बड़ी भक्तिसे स्वागत- श्रीरामने जबतक खर नामक राक्षसका वध किया, उतने | सत्कार किया । तत्पश्चात् आगे जानेपर उन्हें वायुपुत्र समयतक देवता आदि उपर्युक्त रूपसे उनकी स्तुति करके | भक्तवर हनुमान्जी मिले, जिन्होंने (मध्यस्थरूपमें) उनके साथ सुखपूर्वक स्थित हुए । देवताओंकी ही भाँति | कपिराज सुग्रीवको बुलाकर उनके साथ दोनो भाइयोंकी मैत्री ऋषि भी भगवान्की स्तुति करते रहे। उस समय खर | करायी। तत्पश्चात् दोनों भाइयोंने सुग्रीवसे अपना सब हाल आदिके मारे जानेपर राक्षसकुलोत्पन्न रावण (मारीचके | आदिसे अन्ततक कह सुनाया ॥ १-५ ॥ साथ) वनमें आया और उसने अपने ही विनाशके लिये | सुग्रीवको श्रीरामके पराक्रममे संदेह था, अतः उन्होंने रामपत्नी सीताजीको हर लिया। उन दिनों सीता भी वनमें ही | श्रीरामको दुन्दुभिनामक राक्षसका विशाल शरीर दिखाया रहती थीं। उसने 'वन' से उनको हरण किया, इससे वह राक्षस | (जिसे वालीने मार गिराया था); श्रीरामने दुन्दुभिके उस रावण कहलाया ('राम' शब्दसे 'रा' एवं 'वन' शब्दसे 'वन' लेकर | शवको अनायास ही बहुत दूर फेंक दिया। इसके सिवा एक 'रावण' नाम बना)। अथवा दूसरोंको रुलानेके कारण वह रावण | ही बाणसे सात तालवृक्षोंको तत्काल बींध डाला और इस कहलाता था । (अथवा एक दिन दशाननने कैलासको उठा | प्रकार अपने मित्रको आश्वासन देकर प्रसन्नताका अनुभव लिया था, तब महादेवजीने कैलासपर बहुत भार डाल दिया। | किया। इससे कपिराज सुग्रीवको बड़ा हर्ष हुआ । इसके उस समय) दशाननने बड़ा रव किया, इसीसे उसका नाम रावण | बाद वे श्रीरघुनाथजी सुग्रीवके नगरमें गये । वहाँ वाली- हो गया । तदनन्तर श्रीराम और लक्ष्मण सीतादेवीका पता | के भाई सुग्रीवने बड़ी विकट गर्जना की। उस गर्जनाको लगानेके ब्याजसे वनभूमिपर विचरने लगे । सामने कबन्ध | सुनकर वाली बड़े वेगसे घरके बाहर निकला । श्रीरामने युद्ध- नामक असुरको उपस्थित देख दोनों भाइयोंने उसे मार | मे उस वालीको मार गिराया और किष्किन्धाके राज्यसिंहासन- डाला और उस कबन्धके कथनानुसार वे दोनों शबरीके | पर सुग्रीवको बिठा दिया ॥ ६-९ ॥ षष्ठ खण्ड शेष चरित्रका संक्षिप्त वर्णन, आवरण-पूजाके लिये यन्त्रस्थ देवताओंका निरूपण तदनन्तर सुग्रीवने वानरोंको बुलाकर कहा--'वानर-वीरो ! | वहाँका राजा बनाया और जनकनन्दिनी सीताको साथ ले तुम सब दिशाओंकी बातें जानते हो। इस समय शीघ्र यहाँसे | उन्हें अपने वाम अङ्कमे बिठाकर उन सब वानरोंके साथ अपनी जाओ और मिथिलेशकुमारी सीताको आज ही ढूँढ लाकर | पुरी अयोध्याको प्रस्थान किया ॥ १-६ ॥ रघुनाथजीको अर्पित करो ।' ( इस आदेशके अनुसार सब | अब द्विभुजरूपधारी श्रीरघुनाथजी अयोध्याके राजसिंहासन- दिशाओंकी ओर बहुत से वानर चल पड़े ।) तत्पश्चात् | पर विराजमान है। वे धनुष धारण किये हुए हैं। उनका हनुमान्जी (जो कुछ प्रमुख वानरोंके साथ दक्षिण दिशामे | चित्त स्वभावतः प्रसन्न है । वे सब प्रकारके आभूषणोंसे खोज करनेके लिये भेजे गये थे ) समुद्र लाँघकर लङ्कामें | विभूषित हैं। दाहिने हाथमे ज्ञानमयी और बायें हाथमें तेज-१ गये । वहाँ सीताजीका दर्शन करके उन्होंने अनेक असुरोंका वध किया और लङ्कामे आग लगा दी । फिर वहाँसे श्रीरामके पास लौटकर सब समाचार यथावत् कह सुनाया। तब भगवान् श्रीरामने क्रोधका अभिनय किया— रावणके प्रति क्रोधयुक्त होकर उन वानरोको बुलाया और उनके साथ अस्त्र शस्त्र लेकर लङ्कापुरीपर आक्रमण किया । लङ्काका भलीभाँति निरीक्षण करके भगवान्ने वहाँके राजा रावणके साथ युद्ध छेड़ दिया। उस युद्धमें भाई कुम्भकर्ण तथा पुत्र इन्द्रजित्के सहित रावणको मारकर उन्होने विभीषणको १ ज्ञान-मुद्राका लक्षण इस प्रकार है- तर्जन्यङ्गुष्ठौ संक्तावग्रतो हृदि विन्यसेत् । वाम हस्ताम्बुज वामे जानु मूर्धनि विन्यसेत् । ज्ञानमुद्रा भवेदेषा रामचन्द्रस्य वल्लभा ॥ दाहिने हाथकी तर्जनी और अँगूठेको सटाकर आगेकी ओर छातीपर रक्खे और बायें हाथको बायें घुटनेके ऊपर रक्खे । यह ज्ञानमुद्रा है, जो श्रीरामचन्द्रजीको बहुत प्रिय है।
खण्ड ६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५३५
को प्रकाशित करनेवाली धनुर्मयी मुद्रा धारण करके वे सच्चिदा- नन्दमय परमेश्वर व्याख्यानकी मुद्रामें स्थित हैं ॥ ७८॥
(इस प्रकार देवताओंकी स्तुतिसे लेकर श्रीरामके राज्याभिषेकतककी लीलाका सङ्क्षेपसे वर्णन करके अब पुनः पूर्वोक्त षट्कोणका अनुसरण करके आवरण-पूजाके लिये यन्त्रस्थ देवताओंका वर्णन किया जाता है—)
श्रीरामचन्द्रजीके उत्तर और दक्षिणभागमे क्रमशः शत्रुघ्न और भरतजी स्थित हैं । हनुमान्जी श्रोताके रूपमें भगवान्के सम्मुख हाथ जोड़कर खड़े हैं। वे भी त्रिकोणके भीतर ही स्थित हैं । भरतके नीचे सुग्रीव हैं और शत्रुघ्नके नीचे विभीषण खड़े हैं। भगवान्के पीछेकी ओर छत्र-चँवर धारण किये लक्ष्मणजी विराजमान हैं।* लक्ष्मणजी-से नीचे स्तरमें ताड़के पंखे हाथमें लिये हुए दोनों भाई भरत-शत्रुघ्न खड़े हैं । इस प्रकार लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्नको लेकर दूसरा त्रिकोण और बन जाता है। इस तरह छः कोण होते हैं। भगवान् श्रीराम पहले तो अपने बीज-मन्त्रस्वरूप दीर्घ अक्षरोंके ही आवरणसे घिरे हुए हैं। (वह प्रथम आवरण इस प्रकार है—'रां', 'रीं', 'रूं', 'रै', 'रौं', 'रः' ) ॥ ९–११ ॥
द्वितीय आवरण यों है—वासुदेव, शान्ति, सङ्कर्षण, श्री, प्रद्युम्न, सरस्वती, अनिरुद्ध और रति । ये क्रमशः भगवान्के आग्नेय आदि दिशाओंमें स्थित हैं । द्वितीय आवरणमें भगवान् इन सबसे संयुक्त रहते हैं। तृतीय आवरणमें हनुमान्, सुग्रीव, भरत, विभीषण, लक्ष्मण, अङ्गद तथा जाम्बवान् और शत्रुघ्नकी गणना है। अर्थात् इन सबसे जब श्रीरघुनाथजी संयुक्त होते हैं, तब तृतीय आवरण सिद्ध होता है । इनके अतिरिक्त धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल और सुमन्त्रसे आवृत होनेपर भी तृतीय आवरण ही रहता है। इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, चन्द्रमा, ईशान, ब्रह्मा और अनन्त—इन दस दिक्पालोंसे जब भगवान् आवृत होते हैं, तब चतुर्थ आवरण होता है। (इनमें इन्द्र पूर्वके, अग्नि अग्निकोणके, यम दक्षिणके, निर्ऋति नैर्ऋत्यकोणके, वरुण पश्चिमके, वायु वायव्यकोणके, चन्द्रमा उत्तरके और ईशान—शिव ईशानकोणके अधिपति हैं। इन सबकी अपनी-अपनी दिशामें पूजा करनी चाहिये । ब्रह्माका स्थान पूर्व दिशा और ईशानकोणके मध्यभागमें है तथा अनन्तका स्थान नैर्ऋत्यकोण और पश्चिमके मध्यभागमें है । इन्द्र आदिके बीज-मन्त्र क्रमशः इस प्रकार हैं—लं रं मं क्षं वं यं सं हं आं नं) इन दिक्पालोंके बाह्य भागमे उनके ही वज्र आदि आयुध हैं, जिनसे आवृत्त भगवान् पूजनीय होते हैं । (उन आयुधोंके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—इन्द्रका वज्र, अग्निका शक्ति, यमका दण्ड, निर्ऋतिका खड्ग, वरुणका पाश, वायुका अङ्कुश, चन्द्रमाका गदा, ईशानका शूल, ब्रह्माका पद्म और अनन्तका चक्र । ) उसी आवरणमे नल आदि वानर भी भगवान्की शोभा बढाते हैं। साथ ही वसिष्ठ-वामदेव आदि मुनि भगवान्की उपासनामें संलग्न रहते हैं ॥ १२–१६ ॥
१ धनुर्मयी मुद्रा इस प्रकार है—
वामस्य मध्यमाग्रं तु तर्जन्यग्रे नियोजयेत् । अनामिकां कनिष्ठां च तस्याङ्गुष्ठेन पीडयेत् । दर्शयेद् वामके स्कन्धे धनुर्मुद्रेयमीरिता ॥
बायें हाथकी मध्यमा अङ्गुलिके अग्रभागको तर्जनीके अग्रभागमें सटा दे और अनामिका तथा कनिष्ठिकाको अँगूठेसे दबाये। इस प्रकारकी भङ्गी बायें कंधेपर प्रदर्शित करें । यही धनुर्मुद्रा बतायी गयी है।
२ व्याख्यानमुद्राका लक्षण यों है—
दक्षिणाङ्गुष्ठतर्जन्यावग्रलग्ने पराङ्गुली । प्रसार्य संहतोत्ताना एषा व्याख्यानमुद्रिका ॥ रामस्य च सरस्वत्या अत्यन्त प्रेयसी मता । ज्ञानव्याख्या पुस्तकानां युगपत्सम्भवः स्मृतः ॥
दाहिने हाथके अँगूठे और तर्जनी अङ्गुलिके अग्रभाग परस्पर सटे हों और शेष तीन अङ्गुलियोंको फैलाकर रक्खा जाय । वे फैली अङ्गुलियाँ भी परस्पर सटी हुई और उत्तान हों । यह व्याख्यान-मुद्रा है । यह श्रीरामको और सरस्वतीको बहुत अधिक प्रिय है । इसके द्वारा ज्ञान, व्याख्यान तथा पुस्तक—तीनों मुद्राओंका एक साथ प्रकाशन माना गया है।
* पहले लक्ष्मणको भगवान्के दक्षिण भागमें स्थित बता आये हैं और यहाँ पश्चिमभागमें उनकी स्थिति बतायी जाती है, परंतु इसमें विरोध नहीं है। वहाँ वनवासके समयका ध्यान है, अत उसमें भरत आदिकी उपस्थिति नहीं है। यहाँ राज्याभिषेकके समय भरतजी भी हैं, अत उस समय लक्ष्मणजीका पृष्ठभागमें स्थित होना उचित ही है।
५३६ * श्रीरामपूर्वतापनीयोपनिषद् *
सप्तम खण्ड पूजा-यन्त्रका विस्तृत वर्णन
[स्तम्भ १] इस प्रकार संक्षेपसे पूजा-यन्त्रका वर्णन किया गया । अब उसका पूर्णतः निर्देश किया जाता है । समरेखाओंके दो त्रिकोण बनाकर उनके मध्यभागमें दो प्रणवोंका पृथक् पृथक् उल्लेख करे । फिर उन दोनोंके बीचमें आद्यबीज (रा) लिखकर उसके नीचे साध्य-कार्यका उल्लेख करे । साध्यका नाम द्वितीयान्त होना चाहिये । आद्यबीजके ऊपरी भागमें साधकका नाम लिखना चाहिये । साधकका नाम षष्ठ्यन्त रहना चाहिये । तत्पश्चात् बीजके दोनो ओर—वाम दक्षिण पार्श्वोंमे एक एक 'कुरु' पदका उल्लेख करना चाहिये । बीजके बीचमें और साध्यके ऊपर श्री-बीज 'श्रीं' लिखे । बुद्धिमान् पुरुष यह सब बीज आदि इस प्रकार लिखे कि वे दोनों प्रणवोंसे सम्पुटित रहें । फिर छहों कोणोंमे दीर्घस्वरसे युक्त मूल-बीजका उल्लेख करे, साथ ही क्रमशः एक एकके साथ 'हृदयाय नमः', 'शिरसे स्वाहा' इत्यादिको भी अङ्कित करे । (अर्थात् 'रा हृदयाय नमः', 'रीं शिरसे स्वाहा', 'रू शिखायै वषट्', 'रैं कवचाय हुम्', 'रौं नेत्राभ्या वौषट्' तथा 'रः अस्त्राय फट्'—इस प्रकार छः वाक्य छः कोणोंमें लिखने चाहिये ।) कोणोंके पार्श्व-भागमें रमाबीज (श्रीं ) और माया-बीज ( ह्रीं ) लिखे तथा उसके आगे काम-बीज ( क्लीं ) का उल्लेख करे ।
[स्तम्भ २] कोणके अग्रभाग और भीतरी भागोंमे क्रोध- लिखकर मन्त्र साधक उस 'हुम्' के दोनों पाश्र्व बीज ( ऐं ) लिखे । फिर तीन वृत्त ( गोलाव बनाये ( इनमे एक वृत्त तो षटकोणके ३ एक मध्यमें होगा और एक दलोंके अग्रभागमें इन तीन वृत्तोंके साथ-साथ एक अष्टदल = लिखे । कमलके जो केसर हैं, उनमें दो दो अक्ष सभी स्वर-वर्णोंका उल्लेख करे । आठों दलोंमें स्वरं व्यञ्जन वर्णोंके आठ वर्गोंका, लेखन करे (आठ वर्ग ये हैं- चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग, यवर्ग, शवर्ग और लवर्ग)। ८ दलोंमे अष्टवर्गके ऊपर आगे बताये जानेवाले माला-मन्त्र वर्णोंका एक एक दलमे छः छः वर्णके क्रमसे उल्लेख अन्तिम दलमें अवशिष्ट पाँच वर्णोंका ही उल्लेख होगा। प्रकारसे पुनः एक अष्टदल कमल बनाये । उसके आठ 'ॐ नमो नारायणाय' इस अष्टाक्षर-मन्त्रके एक-एक अ न्यास करे । उसके केसरमें रमा-बीज (श्रीं) लिखे । उसके बारह दलोका कमल बनाये । और उसके बारहों द द्वादशाक्षर मन्त्र 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' इसके एक अक्षरको अङ्कित करे ॥ १-८ ॥
अष्टम खण्ड पूजा-यन्त्रके अगले अङ्गोंका वर्णन
[स्तम्भ १] उक्त द्वादशदल कमलके केसरोमें 'अकार'से लेकर 'क्ष' तकके वर्णोंको ( १६ स्वर और ३५ व्यञ्जन) गोलाकार लिखे । ( एक एक केसरमें चार-चार अक्षर होंगे, किंतु अन्तिम केसरमें सात होंगे ।) उसके बाह्यभागमे पुनः षोडशदल कमल लिखे और उसके केसरोंमें माया-बीज (ह्रीं) का उल्लेख करे । उसके षोडश दलोंमें एक-एक अक्षरके क्रमसे 'हु' 'फट्' 'नमः' तथा द्वादशाक्षर मन्त्रंको अङ्कित करे । षोडश दलोंकी संधियोंमें मन्त्रवेत्ता पुरुष हनुमान्जी आदिके बीज-मन्त्र लिखे । वे मन्त्र
[स्तम्भ २] इस प्रकार है—ह्र स् भृ व्लृ भ् जू और भृ । (इन् अतिरिक्त धृष्टि आदिके बीज मन्त्रोंका भी उल्लेख करे ये हैं— घृं जू' वृ स्तू भृं अं घृ और सं । मूल श्लोक आये हुए 'च' से इनका समुच्चय होता है।) उसके बाह्यभाग बत्तीस दलोंका महाकमल बनाये, जो नाद और बिन्दुसे युक्त हो उसके दलोंपर यत्नपूर्वक नारसिंह मन्त्रराजके बत्तीस अक्षरोंको लिखे । उन दलोंमें ही आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य और सबको धारण करनेवाले$^३$ वषट्कारका न्यास एव ध्यान
पाद-टिप्पणी: १ द्वादशाक्षर मन्त्र यह है—'ॐ ह्रीं भरताग्रज राम ह्रीं स्वाहा' । २ नारसिंह-मन्त्रराज इस प्रकार है—
उग्रं वीरं महाविष्णु ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् । नृसिंह भीषणं भद्र मृत्युमृत्यु नमाम्यहम् ॥
३ वषट्कारके साथ मूल श्लोकमें 'धाता' शब्दका प्रयोग हुआ है, उसका अर्थ 'धारण करनेवाला' है । वषट्कार दानके अर्थमे प्रयुक्त होता है । दानसे ही समस्त लोक धारण किये जाते हैं, अत 'धाता' पद 'वषट्कार' का विशेषण ही है । 'धाता' को देवतावाचक इसलिये नहीं मानना चाहिये कि बारह आदित्योंकी श्रेणीमें धाता नामक आदित्यका नाम आ चुका है । अथवा 'धाता' पद ब्रह्माजीका वाचक है और 'वषट्कार' उसका विशेषण है । ब्रह्माजी ही सबको जन्म और जीवन प्रदान करते हैं, अत उनके लिये 'वषट्कार' विशेषण देना उपयुक्त ही है ।
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