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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१


अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ १८ ॥

यह विपश्चित्—मेधावी आत्मा न उत्पन्न होता है, न मरता है; यह न तो किसी अन्य कारणसे ही उत्पन्न हुआ है और न स्वतः ही कुछ [अर्थान्तररूपसे] बना है। यह अजन्मा, नित्य (सदासे वर्तमान) शाश्वत (सर्वदा रहनेवाला) और पुरातन है तथा शरीरके मारे जानेपर भी स्वयं नहीं मरता ॥ १८ ॥

न जायते नोत्पद्यते म्रियते वा न म्रियते चोत्पत्तिमतो वस्तुनोऽनित्यस्य अनेकविक्रियाः तासामाद्यन्ते जन्मविनाशलक्षणे विक्रिये इहात्मनि प्रतिषिध्येते प्रथमं सर्वविक्रियाप्रतिषेधार्थं न जायते म्रियते वेति । विपश्चिन्मेधावी, अविपरिलुप्तचैतन्यस्वभावात् ।यह आत्मा उत्पन्न नहीं होता और न मरता ही है। उत्पन्न होनेवाली अनित्य वस्तुके अनेक विकार होते हैं। यहाँ—आत्मामें सब विकारोंका प्रतिषेध करनेके लिये 'न जायते म्रियते वा' ऐसा कहकर सबसे पहले उनमेंसे जन्म और विनाशरूप आदि और अन्तके विकारोंका निषेध किया जाता है। कभी लुप्त न होनेवाले चैतन्यरूप स्वभावके कारण आत्मा विपश्चित् यानी मेधावी है।
किं च नायमात्मा कुतश्चित् कारणान्तराद्बभूव । स्वस्माच्च आत्मनो न बभूव कश्चिदर्थान्तरभूतः । अतोऽयमात्माऽजो नित्यः शाश्वतोऽपक्षयविवर्जितः । यो ह्यशाश्वतः सोऽपक्षीयते; अयंतथा यह आत्मा कहींसे अर्थात् किसी अन्य कारणसे उत्पन्न नहीं हुआ और न अर्थान्तररूपसे स्वयं अपनेसे ही हुआ है। इसलिये यह आत्मा अजन्मा, नित्य और शाश्वत—यानी क्षयरहित है, क्योंकि जो अशाश्वत होता है वही क्षीण हुआ

६२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १

६२कठोपनिषद्[ अध्याय १

| तु शाश्वतोऽत एव पुराणः पुरापि नव एवेति। यो ह्यवयवोपचयद्वारेणाभिनिर्वर्त्यते स इदानीं नवो यथा कुम्भादिः। तद्विपरीतस्त्वात्मा पुराणो वृद्धिविवर्जित इत्यर्थः।<br><br>यत एवमतो न हन्यते न हिंस्यते हन्यमाने शस्त्रादिभिः शरीरे। तत्स्थोऽप्याकाशवदेव ॥ १८ ॥ | करता है। यह तो शाश्वत है, इसलिये पुराण भी है यानी प्राचीन होकर भी नवीन ही है। क्योंकि जो पदार्थ अवयवोंके उपचय (मेल) से निष्पन्न किया जाता है वही 'इस समय नया है' ऐसा कहा जाता है; जैसे घड़ा। किन्तु आत्मा उससे विपरीत स्वभाववाला है; अर्थात् वह पुराण यानी वृद्धिरहित है।<br><br>क्योंकि ऐसा है; इसलिये शस्त्रादिद्वारा शरीरके मारे जानेपर भी वह नहीं मरता—उसकी हिंसा नहीं होती। अर्थात् शरीरमें रहकर भी वह आकाशके समान निर्लिप्त ही है ॥ १८ ॥ |


हन्ता चेन्मन्यते हन्तुँꣳहतश्चेन्मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायँꣳहन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥

यदि मारनेवाला आत्माको मारनेका विचार करता है और मारा जानेवाला उसे मारा हुआ समझता है तो वे दोनों ही उसे नहीं जानते, क्योंकि यह न तो मारता है और न मारा जाता है ॥ १९ ॥

एवं भूतम्प्यात्मानं शरीरमात्रात्मदृष्टिर्हन्ता चेद्यदि मन्यते चिन्तयति हन्तुं हनिष्याम्येनम्ऐसे प्रकारके आत्माको भी जो देहमात्रको ही आत्मा समझनेवाला किसीको मारनेवाला पुरुष यदि किसीको मारनेका विचार करता

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३


इति योऽप्यन्यो हतः सोऽपि चेन्मन्यते हतमात्मानं हतोऽहमित्युभावपि तौ न विजानीतः स्वमात्मानं यतो नायं हन्ति अविक्रियत्वादात्मनस्तथा न हन्यत आकाशवदविक्रियत्वादेव। अतोऽनात्मज्ञविषय एव धर्माधर्मादिलक्षणः संसारो न ब्रह्मज्ञस्य। श्रुतिप्रामाण्यान्न्यायाच्च धर्माधर्माद्यनुपपत्तेः॥१९॥है—यह सोचता है कि मैं इसे मारूँगा, तथा दूसरा मारा जानेवाला भी यह समझकर कि 'मैं मारा गया हूँ' अपने (आत्मा) को मारा गया मानता है तो वे दोनों ही अपने आत्माको नहीं जानते; क्योंकि आत्मा अविकारी है, इसलिये वह मार नहीं सकता और आकाशके समान अविकारी होनेसे ही मारा भी नहीं जा सकता। अतः धर्माधर्मादिरूप संसार अनात्मज्ञसे ही सम्बन्ध रखता है, ब्रह्मज्ञसे नहीं। क्योंकि श्रुतिप्रमाण और युक्तिसे भी ब्रह्मज्ञानीद्वारा धर्म-अधर्म आदि नहीं बन सकते ॥१९॥

कथं पुनरात्मानं जानाति इत्युच्यते—तो फिर मुमुक्षु पुरुष आत्माको किस रूपसे जानता है ? इसपर कहते हैं—

अणोरणीयान्महतो महीया-
नात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् ।

तमक्रतुः पश्यति वीतशोको
धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥२०॥

यह अणुसे भी अणु और महान्‌से भी महान् आत्मा जीवकी हृदयरूप गुहामें स्थित है। निष्काम पुरुष अपनी इन्द्रियोंके प्रसादसे आत्माकी उस महिमाको देखता है और शोकरहित हो जाता है ॥२०॥

| ६४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |

| ६४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ | | :--- | :--- |

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
अणोः सूक्ष्मादणीयाञ्छ्यामाकादेरणुतरः। महतो महत्परिमाणान्महीयान्महत्तरःपृथिव्यादेः। अणु महद्वा यदस्ति लोके वस्तु तत्तेनैवात्मना नित्येन आत्मवत्संभवति । तदात्मना विनिर्मुक्तमसत्संपद्यते । तस्माद् असावेवात्माणोरणीयान्महतो महीयान्सर्वनामरूपवस्तूपपाधिकत्वात्। स चात्मास्य जन्तोर्ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तस्य प्राणिजातस्य गुहायां हृदये निहित आत्मभूतः स्थित इत्यर्थः ।आत्मा अणुसे भी अणु अर्थात् श्यामाक आदि सूक्ष्म पदार्थोंसे भी सूक्ष्मतर तथा महान्‌से भी महान् यानी पृथिवी आदि महत्परिमाणवाले पदार्थोंसे भी महत्तर है । संसारमें अणु अथवा महत्परिमाणवाली जो कुछ वस्तु है वह उस नित्यस्वरूप आत्मासे ही आत्मवान् (स्वरूप-सत्तायुक्त) हो सकती है । आत्मासे परित्यक्त हो जानेपर वह सत्ताशून्य हो जाती है । अतः यह आत्मा ही अणु-से-अणु और महान्-से-महान् है, क्योंकि नाम-रूपवाली सभी वस्तुएँ इसकी उपाधि हैं। वह आत्मा ही ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त इस सम्पूर्ण प्राणिसमुदायकी गुहा—हृदयमें निहित है अर्थात् अन्तरात्म-रूपसे स्थित है ।
तमात्मानं दर्शनश्रवणमननविज्ञानलिङ्गमक्रतुरकामो दृष्टादृष्टवाह्यविषयोपरतबुद्धिरित्यर्थः—यदा चैवं तदा मन आदीनि करणानि धातवः शरीरस्य धारणात्प्रसीदन्तीत्येषां धातूनांदेखना, सुनना, मनन करना और जानना—ये जिसके लिङ्ग हैं उस आत्माको अक्रतु—निष्काम पुरुष अर्थात् जिसकी बुद्धि दृष्ट और अदृष्ट बाह्य विषयोंसे उपरत हो गयी है, क्योंकि जिस समय ऐसी स्थिति होती है उसी समय मन आदि इन्द्रियाँ, जो कि शरीरको धारण करनेके कारण धातु कहलाती हैं, प्रसन्न होती हैं—सो,

| वल्ली २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६५ |

वल्ली २ ]शाङ्करभाष्यार्थ६५

| प्रसादादात्मनो महिमानं कर्मनिमित्तवृद्धिक्षयरहितं पश्यत्ययम् अहमस्मीति साक्षाद्विजानाति । ततो वीतशोको भवति ॥ २० ॥ | इन धातुओंके प्रसादसे वह अपने आत्माकी कर्मनिमित्तक वृद्धि और क्षयसे रहित महिमाको देखता है; अर्थात् इस बातको साक्षात् जानता है कि 'मैं यह हूँ'। [ऐसा जानकर] फिर वह शोकरहित हो जाता है॥२०॥ |

| अन्यथा दुर्विज्ञेयोऽयमात्मा कामिभिः प्राकृतपुरुषैः, यस्मात्— | अन्यथा सकाम प्राकृत पुरुषोंके लिये यह आत्मा बड़ा दुर्विज्ञेय है; क्योंकि— |

आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः ।
कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥ २१ ॥

वह स्थित हुआ भी दूरतक जाता है, शयन करता हुआ भी सब ओर पहुँचता है । मद ( हर्ष ) से युक्त और मदसे रहित उस देवको भला मेरे सिवा और कौन जान सकता है ? ॥ २१ ॥

| आसीनोऽवस्थितोऽचल एव सन् दूरं व्रजति । शयानो याति सर्वत एवमसावात्मा देवो मदामदः समदोऽमदश्च सहर्षोऽहर्षश्च विरुद्धधर्मवानतोऽशक्यत्वाज्ज्ञातुं कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ? | आसीन—अवस्थित अर्थात् अचल होकर भी वह दूर चला जाता है तथा शयन करता हुआ भी सब ओर पहुँचता है। इस प्रकार वह आत्मा—देव समद और अमद यानी हर्षसहित और हर्षरहित—विरुद्ध धर्मवाला है। अतः जाननेमें न आ सकनेके कारण उस मदयुक्त और मदरहित देवको मेरे सिवा और कौन जान सकता है ? |

६६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १

६६कठोपनिषद्[ अध्याय १

| अस्मदादेरेव सूक्ष्मबुद्धेः पण्डितस्य सुविज्ञेयोऽयमात्मा स्थितिगतिनित्यानित्यादिविरुद्धानेकधर्मोपाधिकत्वाद्विरुद्धधर्मवत्त्वाद्विश्वरूप इव चिन्तामणिवदवभासते। अतो दुर्विज्ञेयत्वं दर्शयति कस्तं मदन्यो ज्ञातुमर्हतीति। | यह आत्मा हम-जैसे सूक्ष्मबुद्धि विद्वानोंके लिये ही सुविज्ञेय है। स्थिति-गति तथा नित्य और अनित्य आदि अनेक विरुद्धधर्मरूप उपाधिवाला तथा विपरीतधर्मयुक्त होनेसे यह चिन्तामणिके समान विश्वरूप-सा भासता है। अतः 'मेरे सिवा उसे और कौन जानने योग्य है' ऐसा कहकर उसकी दुर्विज्ञेयता दिखलाते हैं। | | कारणानामुपशमः शयनं करणजनितस्यैकदेशविज्ञानस्योपशमः शयानस्य भवति। यदा चैवं केवलसामान्यविज्ञानत्वात् सर्वतो यातीव यदा विशेषविज्ञानस्थः स्वेन रूपेण स्थित एव सन्मनआदिगतिषु तदुपाधिकत्वाद्दूरं व्रजतीव। स चेहैव वर्तते ॥ २१ ॥ | इन्द्रियोंका शान्त हो जाना शयन है। शयन करनेवाले पुरुषका इन्द्रियजनित एकदेशसम्बन्धी विज्ञान शान्त हो जाता है। जिस समय ऐसी अवस्था होती है उस समय केवल सामान्य विज्ञान होनेसे वह सब ओर जाता हुआ-सा जान पड़ता है; और जब वह विशेष विज्ञानमें स्थित होता है तो स्वरूपसे अविचल रहकर भी मन आदि उपाधियोंवाला होनेसे उन मन आदिकी गतियोंमें जाता हुआ-सा जान पड़ता है। वस्तुतः तो वह यहीं रहता है॥२१॥ | | तद्विज्ञानाच्च शोकात्यय इत्यपि दर्शयति— | तथा अब यह भी दिखलाते हैं कि उस आत्माके ज्ञानसे शोकका अन्त हो जाता है— |

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६७

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६७


अशरीरँ शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् ।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २२ ॥

जो शरीरोंमें शरीररहित तथा अनित्योंमें नित्यस्वरूप है उस महान् और सर्वव्यापक आत्माको जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ॥ २२ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
अशरीरं स्वेन रूपेण आकाशकल्प आत्मा तमशरीरं शरीरेषु देवपितृमनुष्यादिशरीरेषु अनवस्थेष्ववस्थितिरहितेष्ववस्थितं नित्यमविकृतमित्येतत्, महान्तं महत्त्वस्यापेक्षिकत्वशङ्कायामाह— विभुं व्यापिनमात्मानम्—आत्मग्रहणं स्वतोऽनन्यत्वप्रदर्शनार्थम्, आत्मशब्दः प्रत्यगात्मविषय एव मुख्यस्तमीदृशमात्मानं मत्वा अयमहमिति धीरो धीमान्न शोचति। न ह्येवंविधस्यात्मविदः शोकोपपत्तिः ॥ २२ ॥आत्मा अपने स्वरूपसे आकाशके समान है, अतः देव, पितृ और मनुष्यादि शरीरोंमें अशरीर है, अनवस्थित—अवस्थितिरहित यानी अनित्योंमें अवस्थित—नित्य अर्थात् अविकारी है, तथा महान् है—[किससे महान् है—इस प्रकार] महत्त्वमें इतरकी अपेक्षा होनेकी शङ्का करके कहते हैं उस विभु अर्थात् व्यापक आत्माको जानकर—यहाँ 'आत्मा' शब्द अपनेसे ब्रह्मकी अभिन्नता दिखानेके लिये लिया गया है, क्योंकि 'आत्मा' शब्द प्रत्यगात्मविषयमें ही मुख्य है—ऐसे उस आत्माको 'यही मैं हूँ' ऐसा जानकर धीर—बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता, क्योंकि इस प्रकारके आत्मवेत्तामें शोक बन ही नहीं सकता ॥ २२ ॥

संस्कृतहिन्दी
यद्यपि दुर्विज्ञेयोऽयमात्मा तथाप्युपायेन सुविज्ञेय एवेत्याह—यद्यपि यह आत्मा दुर्विज्ञेय है तो भी उपाय करनेसे तो सुविज्ञेय ही है; इसपर कहते हैं—

६८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १

६८कठोपनिषद्[ अध्याय १

आत्मा आत्मकृपासाध्य है

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्य-
स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूꣳस्वाम् ॥ २३ ॥

यह आत्मा वेदाध्ययनद्वारा प्राप्त होने योग्य नहीं है और न धारणाशक्ति अथवा अधिक श्रवणसे ही प्राप्त हो सकता है । यह [ साधक ] जिस [ आत्मा ] का वरण करता है उस [ आत्मा ] से ही यह प्राप्त किया जा सकता है । उसके प्रति यह आत्मा अपने स्वरूपको अभिव्यक्त कर देता है ॥ २३ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
नायमात्मा प्रवचनेनानेक-<br>वेदस्वीकरणेन लभ्यो ज्ञेयो नापि<br>मेधया ग्रन्थार्थधारणशक्त्या ।<br>न बहुना श्रुतेन केवलेन । केन<br>तर्हि लभ्य इत्युच्यते—यह आत्मा प्रवचन अर्थात् अनेकों वेदोंको स्वीकार करनेसे प्राप्त यानी विदित होने योग्य नहीं है, न मेधा यानी ग्रन्थ-धारणकी शक्तिसे ही जाना जा सकता है और न केवल बहुत-सा श्रवण करनेसे ही । तो फिर किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है, इसपर कहते हैं—
यमेव स्वात्मानमेष साधको<br>वृणुते प्रार्थयते तेनैवात्मना<br>वरित्रा स्वयमात्मा लभ्यो ज्ञायत<br>एवमित्येतत् । निष्कामस्यात्मानम्<br>एव प्रार्थयत आत्मनैवात्मा<br>लभ्यत इत्यर्थः ।यह साधक जिस आत्माका वरण—प्रार्थना करता है उस वरण करनेवाले आत्माद्वारा यह आत्मा स्वयं ही प्राप्त किया जाता है—अर्थात् उससे ही ‘यह ऐसा है’ इस प्रकार जाना जाता है । तात्पर्य यह कि केवल आत्मलाभके लिये ही प्रार्थना करनेवाले निष्काम पुरुषको आत्माके द्वारा ही आत्माकी उपलब्धि होती है ।

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६९

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६९


कथं लभ्यत इत्युच्यते—<br>तस्यात्मकामस्यैष आत्मा विवृणुते प्रकाशयति पारमार्थिकीं तनूं स्वां स्वकीयां स्वयाथात्म्यम् इत्यर्थः ॥ २३ ॥किस प्रकार उपलब्ध होता है, इसपर कहते हैं—उस आत्मकामीके प्रति यह आत्मा अपने पारमार्थिक स्वरूप अर्थात् अपने याथात्म्यको विवृत—प्रकाशित कर देता है ॥ २३ ॥

किं चान्यत्—इसके सिवा दूसरी बात यह भी है—

आत्मज्ञानका अनधिकारी

नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः ।
नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ २४ ॥

जो पापकर्मोंसे निवृत्त नहीं हुआ है, जिसकी इन्द्रियाँ शान्त नहीं हैं और जिसका चित्त असमाहित या अशान्त है वह इसे आत्मज्ञान-द्वारा प्राप्त नहीं कर सकता है ॥ २४ ॥

न दुश्चरितात्प्रतिषिद्धाच्छ्रुतिस्मृत्यविहितात्पापकर्मणोऽविरतः अनुपरतो नापीन्द्रियलौल्याद् अशान्तोऽनुपरतो नाप्यसमाहितोऽनेकाग्रमना विक्षिप्तचित्तः, समाहितचित्तोऽपि सन्समाधान-जो दुश्चरित—प्रतिषिद्ध कर्म यानी श्रुति-स्मृतिसे अविहित पापकर्मसे अविरत—अनुपरत है वह नहीं, जो इन्द्रियोंकी चञ्चलताके कारण अशान्त यानी उपरतिशून्य है वह भी नहीं, जो असमाहित अर्थात् जिसका चित्त एकाग्र नहीं है—जो विक्षिप्तचित्त है वह भी नहीं, तथा समाहितचित्त होनेपर भी उस एकाग्रताके फलका इच्छुक

७० | शाङ्करभाष्यार्थ | [ अध्याय १

७०शाङ्करभाष्यार्थ[ अध्याय १

| फलार्थित्वानाप्यशान्तमानसो व्यापृतचित्तः प्रज्ञानेन ब्रह्मविज्ञानेनैनं प्रकृतमात्मानमाप्नुयात् । यस्तु दुश्चरिताद्विरत इन्द्रियलौल्याच्च समाहितचित्तः समाधानफलादप्युपशान्तमानसश्चाचार्यवान्प्रज्ञानेन यथोक्तम् आत्मानं प्राप्नोतीत्यर्थः ॥ २४ ॥ | होनेके कारण जो अशान्तचित्त है—जिसका चित्त निरन्तर व्यापार करता रहता है वह पुरुष भी इस प्रस्तुत आत्माको केवल आत्मज्ञानद्वारा नहीं प्राप्त कर सकता । अर्थात् जो पापकर्म और इन्द्रियोंकी चञ्चलतासे हटा हुआ तथा समाहितचित्त और उस समाधानके फलसे भी उपशान्तमना है वह आचार्यवान् साधक ही ब्रह्मज्ञानद्वारा उपर्युक्त आत्माको प्राप्त कर सकता है ॥ २४ ॥ |

यस्त्वनेवंभूतः—किन्तु जो (साधक) ऐसा नहीं है [उसके विषयमें श्रुति कहती है—]

यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः ।
मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ २५ ॥

जिस आत्माके ब्राह्मण और क्षत्रिय—ये दोनों ओदन—भात हैं तथा मृत्यु जिसका उपसेचन (शाकादि) है वह जहाँ है उसे कौन [अज्ञ पुरुष] इस प्रकार (उपर्युक्त साधनसम्पन्न अधिकारीके समान) जान सकता है ? ॥ २५ ॥

यस्यात्मनो ब्रह्मक्षत्रे सर्वधर्मविधारके अपि सर्वत्राणभूते उभे ओदनोऽशनं भवतः स्याताम्,सम्पूर्ण धर्मोंको धारण करनेवाले और सबके रक्षक होनेपर भी ब्राह्मण और क्षत्रिय—ये दोनों वर्ण जिस आत्माके ओदन—भोजन हैं

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७१

वल्ली २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७१


| सर्वहरोऽपि मृत्युर्यस्योपसेचनम् इवौदनस्य, अशनत्वेऽप्यपर्याप्तस्तं प्राकृतबुद्धिर्यथोक्तसाधनरहितः सन् क इत्था इत्थमेवं यथोक्तसाधनवानिवेत्यर्थः, वेद विजानाति यत्र स आत्मेति ॥ २५ ॥ | तथा सबका हरण करनेवाला होनेपर भी मृत्यु जिसका भातके लिये उपसेचन (शाकादि) के समान है, अर्थात् भोजनके लिये भी पर्याप्त नहीं है, उस आत्माको, जहाँ कि वह है, ऐसा कौन पूर्वोक्त साधनोंसे रहित और साधारण बुद्धिवाला पुरुष है जो इस प्रकार—उपर्युक्त साधनसम्पन्न पुरुषके समान जान सके? ॥ २५ ॥ |


इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्य-
श्रीमदाचार्यश्रीशङ्करभगवतः कृतौ कठोपनिषद्भाष्ये
प्रथमाध्याये द्वितीयवल्लीभाष्यं समाप्तम् ॥ २ ॥

७२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १

७२कठोपनिषद्[ अध्याय १

तृतीया वल्ली

प्राप्ता और प्राप्तव्य भेदसे दो आत्मा

ऋतं पिबन्तावित्यस्या वल्ल्याः सम्बन्धः—इस 'ऋतं पिबन्तौ' इत्यादि तृतीया वल्लीका सम्बन्ध इस प्रकार है—
विद्याविद्ये नानाविरुद्धफले इत्युपन्यस्ते न तु सफले ते यथावन्निर्णीते; तन्निर्णयार्था रथरूपककल्पना, तथा च प्रतिपत्तिसौकर्यम् । एवं च प्राप्तृप्राप्यगन्तृगन्तव्यविवेक़ार्थं द्वावात्मानौ उपन्यस्येते—ऊपर विद्या और अविद्या नाना प्रकारके विरुद्ध धर्मोंवाली बतलायी गयी हैं; किन्तु उनका फलसहित यथावत् निर्णय नहीं किया गया। उनका निर्णय करनेके लिये ही [इस वल्लीमें] रथके रूपककी कल्पना की गयी है। ऐसा करनेसे उन्हें [अर्थात् विद्या-अविद्याको] समझनेमें सुगमता हो जाती है। इसी प्रकार प्राप्त होनेवाले और प्राप्तव्य स्थान तथा गमन करनेवाले और गन्तव्य लक्ष्यका विवेक करनेके लिये दो आत्माओंका उपन्यास करते हैं—

ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके
गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे ।
छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति
पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ १ ॥

ब्रह्मवेत्तालोग कहते हैं कि शरीरमें बुद्धिरूप गुहाके भीतर प्रकृष्ट ब्रह्मस्थानमें प्रविष्ट हुए अपने कर्मफ़लको भोगनेवाले छाया और घामके समान परस्पर विलक्षण दो [तत्त्व] हैं। यही बात जिन्होंने तीन बार नाचिकेताग्निका चयन किया है वे पञ्चाग्निकी उपासना करनेवाले भी कहते हैं ॥ १ ॥

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३


ऋतं सत्यमवश्यंभावित्वात् कर्मफलं पिबन्तौ, एकस्तत्र कर्मफलं पिवति भुङ्क्ते नेतरः; तथापि पातृसम्बन्धात्पिवन्तौ इत्युच्यते छत्रिन्यायेन, सुकृतस्य स्वयंकृतस्य कर्मण ऋतम् इति पूर्वेण संबन्धः; लोकेऽस्मिन् शरीरे गुहां गुहायां बुद्धौ प्रविष्टौ, परमे बाह्यपुरुषाकाशसंस्थानापेक्षया परमम्, परस्य ब्रह्मणोऽर्धं स्थानं परार्धम्। तस्मिन्हि परं ब्रह्मोपलभ्यते, अतस्तस्मिन्परमे परार्धे हार्दाकाशे प्रविष्टावित्यर्थः।ऋत अर्थात् अवश्यम्भावी होनेके कारण सत्य कर्मफलका पान करनेवाले दो आत्मा, जिनमेंसे केवल एक कर्मफलका पान—भोग करता है, दूसरा नहीं; तो भी पान करनेवालेसे सम्बन्ध होनेके कारण यहाँ छत्रिन्यायसे* दोनोंहीके लिये 'पित्रन्तौ' इस द्विवचनका प्रयोग हुआ है, सुकृत अर्थात् अपने किये हुए कर्मके फलको भोगते हुए, यहाँ 'सुकृतस्य' शब्दका पूर्ववर्ती 'ऋतम्' शब्दके साथ सम्बन्ध है। लोक अर्थात् इस शरीरमें गुहा—बुद्धिके भीतर परम—बाह्य देहाश्रित आकाश स्थानकी अपेक्षा उत्कृष्ट परब्रह्मके अर्ध यानी स्थानमें प्रवेश किये हुए हैं, क्योंकि उसीमें परब्रह्मकी उपलब्धि होती है। अतः तात्पर्य यह है कि उस परम परार्ध यानी हृदयाकाशमें प्रवेश किये हुए हैं।
तौ च छायातपाविव विलक्षणौ संसारित्वासंसारित्वेनवे दोनों संसारी और असंसारी होनेके कारण छाया और धूपके

* जहाँ बहुत-से आदमी जा रहे हों और उनमेंसे किसी एकके पास छाता हो तो दूरसे देखनेवाला पुरुष उन्हें बतलानेके लिये 'देखो, वे छातेवाले लोग जा रहे हैं' ऐसे वाक्यका प्रयोग करता है। इस प्रकार एक छातेवालेसे सम्बन्धित होनेके कारण वह सारा समूह ही छातेवाला कहा जाता है। इसे 'छत्रिन्याय' कहते हैं। इसी प्रकार यहाँ भोक्ता जीवके सम्बन्धसे ईश्वरको भी भोक्ता कहा गया है।

७४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १

७४कठोपनिषद्[ अध्याय १
ब्रह्मविदो वदन्ति कथयन्ति । न केवलमकर्मिण एव वदन्ति । पञ्चाग्नयो गृहस्था ये च त्रिणाचिकेताः त्रिःकृत्वो नाचिकेतोऽग्निश्चितो यैस्ते त्रिणाचिकेताः ॥ १ ॥समान परस्पर विलक्षण हैं—ऐसा ब्रह्मवेत्तालोग वर्णन करते—कहते हैं । [इस प्रकार] केवल अकर्मी ही ऐसा नहीं कहते बल्कि जो त्रिणाचिकेत हैं—जिन्होंने तीन बार नाचिकेत अग्निका चयन किया है वे पञ्चाग्निकी उपासना करनेवाले गृहस्थ भी ऐसा ही कहते हैं ॥१॥

यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् ।
अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतꣳ शकेमहि ॥ २ ॥

जो यजन करनेवालोंके लिये सेतुके समान है उस नाचिकेत अग्निको तथा जो भयशून्य है और संसारको पार करनेकी इच्छावालोंका परम आश्रय है उस अक्षर ब्रह्मको जाननेमें हम समर्थ हों ॥ २ ॥

यः सेतुरिव सेतुरीजानानां यजमानानां कर्मिणां दुःखसं-तरणार्थत्वान्नाचिकेतोऽग्निस्तं वयं ज्ञातुं चेतुं च शकेमहि शक्नुवन्तः। किं च यच्चाभयं भयशून्यं संसारपारं तितीर्षतां तर्तुमिच्छतां ब्रह्मविदां यत्परमाश्रयमक्षरमात्माख्यं ब्रह्म तच्च ज्ञातुं शकेमहि शक्नुवन्तः। परापरे ब्रह्मणी कर्मब्रह्मविदाश्रयेदुःखको पार करनेका साधन होनेसे जो नाचिकेत अग्नि यजमान अर्थात् कर्मियोंके लिये सेतुके समान होनेके कारण सेतु है उसे हम जानने और चयन करनेमें समर्थ हों । तथा जो भयरहित है, और संसारके पार जानेकी इच्छावाले ब्रह्मवेत्ताओंका परम आश्रय अविनाशी आत्मा नामक ब्रह्म है उसे भी हम जाननेमें समर्थ हो सकें । अर्थात् कर्मवेत्ताका आश्रय अपर ब्रह्म और ब्रह्मवेत्ताका आश्रय

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७१

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७१


वेदितव्ये इति वाक्यार्थः। एतयोरेव ह्युपन्यासः कृत ऋतं पिबन्ताविति ॥२॥परब्रह्म—ये दोनों ही ज्ञातव्य हैं—यह इस वाक्यका अर्थ है। 'ऋतं पिबन्तौ' इत्यादि मन्त्रसे इन्हीं दोनों [ब्रह्मों] का उल्लेख किया गया है ॥ २ ॥

तत्र य उपाधिकृतः संसारी विद्याविद्ययोरधिकृतो मोक्षगमनाय संसारगमनाय च तस्य तदुभयगमने साधनो रथः कल्प्यते—उनमें जो उपाधिपरिच्छिन्न संसारी तथा मोक्ष एवं संसारके प्रति गमन करनेके लिये विद्या और अविद्याका अधिकारी है उसके लिये उन दोनोंके प्रति जानेके साधनस्वरूप रथकी कल्पना की जाती है—

शरीरादिसे सम्बन्धित रथादि रूपक

आत्मानग्ँ रथिनं विद्धि शरीरग्ँरथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३ ॥

तू आत्माको रथी जान, शरीरको रथ समझ, बुद्धिको सारथी जान और मनको लगाम समझ ॥ ३ ॥

तत्र तमात्मानमृतपं संसारिणं रथिनं रथस्वामिनं विद्धि जानीहि। शरीरं रथमेव तु रथबद्धहयस्थानीयैरिन्द्रियैराकृष्यमाणत्वाच्छरीरस्य। बुद्धिं तु अध्यवसायलक्षणां सारथिं विद्धि बुद्धिनेतृ-उनमें उस आत्माको—कर्मफल भोगनेवाले संसारीको रथी—रथका स्वामी जान। और शरीरको तो रथ ही समझ, क्योंकि शरीर रथमें बँधे हुए अश्वरूप इन्द्रियगणसे खींचा जाता है। तथा निश्चय करना ही जिसका लक्षण है उस बुद्धिको सारथी जान, क्योंकि

७६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १

७६कठोपनिषद्[ अध्याय १
प्रधानत्वाच्छरीरस्य सारथिनेत्-<br>प्रधान इव रथः। सर्वं हि देहगतं<br>कार्यं बुद्धिकर्तव्यमेव प्रायेण। मनः<br>संकल्पविकल्पादिलक्षणं प्रग्रहं<br>रशनां विद्धि । मनसा हि<br>प्रगृहीतानि श्रोत्रादीनि करणानि<br>प्रवर्तन्ते रशनयेवाश्वाः ॥ ३ ॥सारथिरूप नेता ही जिसमें प्रधान है<br>उस रथके समान शरीर बुद्धिरूप<br>नेताकी प्रधानतावाला है, क्योंकि देह-<br>के सभी कार्य प्रायः बुद्धिके ही कर्तव्य<br>हैं । और संकल्प-विकल्पादिरूप<br>मनको प्रग्रह—लगाम समझ, क्योंकि<br>जिस प्रकार घोड़े लगामसे नियन्त्रित<br>होकर चलते हैं उसी प्रकार श्रोत्रादि<br>इन्द्रियाँ मनसे नियन्त्रित होकर ही<br>अपने विषयोंमें प्रवृत्त होती हैं ॥३॥

इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयाँस्तेषु गोचरान् ।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ४ ॥

विवेकी पुरुष इन्द्रियोंको घोड़े बतलाते हैं तथा उनके घोड़ेरूपसे कल्पना किये जानेपर विषयोंको उनके मार्ग बतलाते हैं और शरीर, इन्द्रिय एवं मनसे युक्त आत्माको भोक्ता कहते हैं ॥ ४ ॥

इन्द्रियाणि चक्षुरादीनि हयान्<br>आहू रथकल्पनाकुशलाः शरीर-<br>रथाकर्षणसामान्यात् । तेष्वेव<br>इन्द्रियेषु हयत्वेन परिकल्पितेषु<br>गोचरान्मार्गान्-रूपादीन्विषयान्<br>विद्धि । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तः<br>शरीरेन्द्रियमनोभिः सहितं<br>संयुक्तमात्मानं भोक्तेति संसारी-<br>त्याहुर्मनीषिणो विवेकिनः।रथकी कल्पना करनेमें कुशल<br>पुरुषोंने चक्षु आदि इन्द्रियोंको<br>घोड़े बतलाया है, क्योंकि [इन्द्रिय<br>और घोड़ोंकी क्रमशः] शरीर और<br>रथको खींचनेमें समानता है ।<br>इस प्रकार उन इन्द्रियोंको घोड़ेरूपसे<br>परिकल्पित किये जानेपर रूपादि<br>विषयोंको उनके मार्ग जानो तथा<br>शरीर इन्द्रिय और मनके सहित<br>अर्थात् उनसे युक्त आत्माको मनीषी—<br>विवेकी पुरुष 'यह भोक्ता—संसारी<br>है' ऐसा बतलाते हैं ।

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७७

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७७


| न हि केवलस्यात्मनो भोक्तृत्वमस्ति बुद्ध्याद्युपाधिकृतमेव तस्य भोक्तृत्वम् । तथा च श्रुत्यन्तरं केवलस्याभोक्तृत्वमेव दर्शयति—"ध्यायतीव लेलायतीव" (बृ० उ० ४।३।७) इत्यादि । एवं च सति वक्ष्यमाणा रथकल्पनया वैष्णवस्य पदस्यात्मतया प्रतिपत्तिरुपपद्यते नान्यथा स्वभावानतिक्रमात् ॥ ४ ॥ | केवल (शुद्ध) आत्मा तो भोक्ता है नहीं; उसका भोक्तृत्व तो बुद्धि आदि उपाधिके कारण ही है। इसी प्रकार "ध्यान करता हुआ-सा, चेष्टा करता हुआ-सा" इत्यादि एक दूसरी श्रुति भी केवल आत्माका अभोक्तृत्व ही दिखलाती है। ऐसा होनेपर ही रथकल्पनासे उस वैष्णवपदकी आगे कही जानेवाली आत्मभावसे प्रतिपत्ति (प्राप्ति) बन सकती है—और किसी प्रकार नहीं, क्योंकि स्वभाव कभी नहीं बदल सकता ॥ ४ ॥ |


अविवेकीकी विवशता

यस्त्वविज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥ ५ ॥

किन्तु जो [बुद्धिरूप सारथी] सर्वदा अविवेकी एवं असंयतचित्तसे युक्त होता है उसके अधीन इन्द्रियाँ इसी प्रकार नहीं रहतीं जैसे सारथीके अधीन दुष्ट घोड़े ॥ ५ ॥

| तत्रैवं सति यस्तु बुद्ध्याख्यः सारथिरविज्ञानवाननिपुणोऽविवेकी प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च भवति यथेतर्रो रथचर्यायामयुक्तेन | किन्तु ऐसा होनेपर भी जो बुद्धिरूप सारथी अविज्ञानवान्—अकुशल अर्थात् रथसञ्चालनमें अकुशल अन्य सारथीके समान [इन्द्रियरूप घोड़ोंकी] प्रवृत्ति-निवृत्तिके विवेकसे रहित है, जो |

७८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १

७८कठोपनिषद्[ अध्याय १

| अप्रगृहीतेनासमाहितेन मनसा प्रग्रहस्थानीयेन सदा युक्तो भवति तस्याकुशलस्य बुद्धिसारथेः इन्द्रियाण्यश्वस्थानीयान्यवश्यानि अशक्यनिवारणानि दुष्टाश्वा अदान्ताश्वा इवेतरसारथेर्भवन्ति ॥ ५ ॥ | सर्वदा प्रग्रह (लगाम) स्थानीय अयुक्त—अगृहीत अर्थात् विक्षिप्त चित्तसे युक्त है उस अनिपुण बुद्धिरूप सारथीके इन्द्रियरूप घोड़े [रथादि हाँकनेवाले] अन्य सारथीके दुष्ट अर्थात् बेकाबू घोड़ोंके समान अवश्य यानी जिनका निवारण नहीं किया जा सकता ऐसे हो जाते हैं ॥ ५ ॥ |

विवेकीकी स्वाधीनता

यस्तु विज्ञानवान्भवति युक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥ ६ ॥

परन्तु जो [बुद्धिरूप सारथी] कुशल और सर्वदा समाहितचित्त रहता है उसके अधीन इन्द्रियाँ इस प्रकार रहती हैं जैसे सारथीके अधीन अच्छे घोड़े ॥ ६ ॥

| यस्तु पुनः पूर्वोक्तविपरीत: सारथिर्भवति विज्ञानवान्प्रगृहीत-मनाः समाहितचित्तः सदा तस्याश्वस्थानीयानीन्द्रियाणि प्रवर्तयितुं निवर्तयितुं वा शक्यानि वश्यानि दान्ताः सदश्वा इवेतरसारथेः ॥ ६ ॥ | किन्तु जो [बुद्धिरूप सारथी] पूर्वोक्त सारथीसे विपरीत विज्ञानवान् (कुशल)—मनको नियन्त्रित रखनेवाला अर्थात् संयतचित्त होता है उसकी अश्वस्थानीय इन्द्रियाँ प्रवृत्त और निवृत्त किये जानेमें इस प्रकार समर्थ होती हैं जैसे सारथीके लिये अच्छे घोड़े ॥ ६ ॥ | | तस्य पूर्वोक्तस्याविज्ञानवतो बुद्धिसारथेरिदं फलमाह— | उस पूर्वोक्त अविज्ञानवान् बुद्धिरूप सारथीवाले रथीके लिये श्रुति यह फल बतलाती है— |

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९


अविवेकीकी संसारप्राप्ति

यस्त्वविज्ञानवान्भवत्यमनस्कः सदाशुचिः ।
न स तत्पदमाप्नोति सꣳसारं चाधिगच्छति ॥ ७ ॥

किन्तु जो अविज्ञानवान्, अनिगृहीतचित्त और सदा अपवित्र रहनेवाला होता है वह उस पदको प्राप्त नहीं कर सकता, प्रत्युत संसारको ही प्राप्त होता है ॥ ७ ॥

यस्त्वविज्ञानवान्भवति , अमनस्कोऽप्रगृहीतमनस्कः स तत एवाशुचिः सदैव, न स रथी तत्पूर्वोक्तमक्षरं यत्परं पदम् आप्नोति तेन सारथिना । न केवलं कैवल्यं नाप्नोति संसारं च जन्ममरणलक्षणमधिगच्छति ॥ ७ ॥किन्तु जो अविज्ञानवान्, अमनस्क—असंयतचित्त और इसीलिये सदा अपवित्र रहनेवाला होता है उस सारथीके द्वारा वह [जीव-रूप] रथी उस पूर्वोक्त अक्षर परम पदको प्राप्त नहीं कर सकता । वह कैवल्यको प्राप्त नहीं होता—केवल इतना ही नहीं, बल्कि जन्म-मरणरूप संसारको भी प्राप्त होता है ॥ ७ ॥

विवेकीकी परमपदप्राप्ति

यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्कः सदा शुचिः ।
स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥ ८ ॥

किन्तु जो विज्ञानवान्, संयतचित्त और सदा पवित्र रहनेवाला होता है वह तो उस पदको प्राप्त कर लेता है जहाँसे वह फिर उत्पन्न नहीं होता ॥ ८ ॥

यस्तु द्वितीयो विज्ञानवान् विज्ञानवत्सारथ्युपेतो रथी विद्वान्किन्तु जो दूसरा रथी अर्थात् विद्वान् विज्ञानवान्—कुशल सारथी-

८० | कठोपनिषद् | [ अध्याय १

८०कठोपनिषद्[ अध्याय १

| इत्येतत्; युक्तमनाः समनस्कः स तत् एव सदा शुचिः स तु तत्पदमाप्नोति, यस्मादाप्तात्पदाद् अप्रच्युतः सन्भूयः पुनर्न जायते संसारे॥ ८ ॥ | से युक्त, समनस्क—युक्तचित्त और इसीलिये सदा पवित्र रहनेवाला होता है वह तो उसी पदको प्राप्त कर लेता है, जिस प्राप्त हुए पदसे च्युत न होकर वह फिर संसारमें उत्पन्न नहीं होता ॥ ८ ॥ |

| किं तत्पदमित्याह— | वह पद क्या है ? इसपर कहते हैं— |

विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः ।
सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ९ ॥

जो मनुष्य विवेकयुक्त बुद्धि-सारथीसे युक्त और मनको वशमें रखनेवाला होता है वह संसारमार्गसे पार होकर उस विष्णु (व्यापक परमात्मा) के परमपदको प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥

| विज्ञानसारथिर्यस्तु यो विवेकबुद्धिसारथिः पूर्वोक्तो मनःप्रग्रहवान्प्रगृहीतमनाः समाहितचित्तः सन्शुचिर्नर्रो विद्वान्सोऽध्वनः संसारगतेः पारं परमेव अधिगन्तव्यमित्येतदाप्नोति मुच्यते सर्वसंसारवन्धनैः। तद्विष्णोः व्यापनशीलस्य ब्रह्मणः परमात्मनो वासुदेवाख्यस्य परमं प्रकृष्टं पदं स्थानं सतत्त्वमित्येतद्यदसौ आप्नोति विद्वान् ॥ ९ ॥ | जो पूर्वोक्त विद्वान् पुरुष विवेकयुक्त बुद्धि-सारथीसे युक्त मनोनिग्रहवान् यानी निगृहीतचित्त—एकाग्र मनवाला होता हुआ पवित्र है वह संसारगतिके पारको यानी अवश्य, प्राप्तव्य परमात्माको प्राप्त कर लेता है; अर्थात् सम्पूर्ण संसार-बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है । उस विष्णु यानी वासुदेव नामक सर्व-व्यापक परब्रह्म परमात्माका जो परम—उत्कृष्ट पद—स्थान अर्थात् स्वरूप है उसे वह विद्वान् प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥ |