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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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Here is the line-by-line Devanagari transcription of the page:

( ७ ) कं. सूत्र पृष्ठ यक्ष के उपद्रव, गीदड़ के बोलने आपस के झगड़ने, २२३-२५१ ग्रहणों, उषा, दुर्भिक्ष, हैजा, प्लेगादिमारक, आकाश में देव मूर्त्तियां इत्यादि—जब-जब जिस २ देश, नगर ग्राम आदिकों दैवी उपद्रव (अलौकिक) हावें, तब २ इस अद्भुत कर्म के प्रकरण पृ० २२३ से २५१ तक को भली भांति पढ़ समझकर शान्ति की पद्धति द्वारा उस उस कर्म की शान्ति करावे अवश्य कल्याण होगा। ९३ कण्डिका से १३६ कण्डिका तक में क्रमशः सूत्रों की संख्या । ४३, १८, ५, ५, ५, ९, ४, ५, ४ ४, ५, ५, ४, २४, ९, ४, ४, १०, ८, ११, ३, ४, ४, ३, ८, ५, २, ५, २४, २, ३, २, ७, ४, १४, १२, ६, ४, ३, २, ८, २, १२, ४४, अध्याय १४ १३७-४३ यज्ञ गृहरचना आदि । सर्व पाक यज्ञिय कर्म । २५१-२५५ १३८-१६ अष्टका कर्म का वर्णन । २५५-२५६ १३९-२८ अभिजित नक्षत्र में जब चन्द्रका का सम्बन्ध होवे, उस- २५६-२५८ समय अध्यापक अपने शिष्यों के साथ उत्सव करे । १४०-२२ महाराताओं, राजाओं को करने योग्य इन्द्रमहोत्सव २५९-२६० १४१-४५ वेदों के पढ़ने पढ़ाने तथा जिस २ समय पढ़ना, पढ़ाना- २६०-२६३ बन्द होगा इसका विचार । संक्षिप्तटोका संग्रह (ग्रंथ की समाप्ति में) १-५६ शुद्धिपत्र १-३

I

प्रस्तावना ।

प्रायः मनुष्यमात्र अनादि काल से यह विचार करते आते हैं कि यह संसार क्या है, यह कब और कैसे बना, और कब, कैसे नष्ट होगा । इस विषय में अनेकों मतभेद होते हुए भी सब विद्वान् एक ही बात में सहमत हैं कि ज्ञान की पहिली पुस्तक जो अब ही तक उपलब्ध हुई है वह वेद है और वेद के विद्वान् इस पुस्तक को सृष्टि विज्ञान की पूर्ण पुस्तक मानते हैं और उनका दावा है कि मनुष्य की जो उन्नति होती है, हुई है और होगी वह सब इसी वैदिकविज्ञान के आश्रय से है । संसार में मानव सभ्यता के प्राचीनतम काल से लेकर पाश्चात्य वैज्ञानिक आविष्कारों के युग तक समस्त विज्ञान का आधार भूमण्डल में केवल चार ही वस्तु हैं । वे हैं जल, अग्नि, वायु, और मिट्टी । इन्हीं चारों पदार्थों के स्थूल और सूक्ष्म ज्ञान को वेद कहते हैं । ज्ञान दो प्रकार का है एक प्रत्यक्ष जिसको लौकिक या दृष्टवाद और दूसरा अलौकिक या अदृष्टज्ञान कहते हैं । भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्लोक इनमें भूलोक से लेकर स्वर्ग तक तीन लोकों की सृष्टि होती है और इन्हीं तीनों का प्रलय भी होता है । बाकी १४ लोकों या १४ भुवनों में से ११ का पाञ्चभौतिक लोकों से प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है और इनमें से सायंस ( विज्ञान ) और पदार्थों में शक्ति या गुण क्यों है ? इसका ज्ञान दर्शनशास्त्र ( अध्यात्म शास्त्र ) से होता है । ये दोनों प्रकार के ज्ञान वेद से होता है । वेद चार क्यों हैं ? अधिक या कम क्यों नहीं ? इसका उत्तर अग्नि, जल, वायु और पृथिवी इन्हीं चार भिन्न २ पदार्थों की अलग २ शक्तियाँ स्थूल और सूक्ष्म का ज्ञान वेदों से होता है इसलिये अग्नि का ज्ञान पूर्ण रूप से ऋग्वेद से, यजुर्वेद से, वायु के प्रकार कार्य्य इत्यादि जाने जाते हैं । सामवेद से जल सम्बन्धी सारी बातों का पूर्ण ज्ञान होता है और अथर्ववेद से यही पृथिवीतत्व का पूर्णतया ज्ञान होता है । इसीलिये ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद इस प्रकार चार वेद हैं ।

( ख ) वेदोंकी शाखा । अग्नितत्त्व के ज्ञान के लिये वेद में २१ प्रधान विभाग हैं। अतएव ऋग्वेद की २१ शाखायें हैं । जलतत्त्व के प्रधान एकहजार विभाग हैं इसलिये सामवेद की १००० शाखायें हैं । यजुर्वेद में वायु के प्रधान १०१ विभाग हैं । अतएव उतनी ही उसकी शाखायें हैं और मिट्टी के ९ प्रधान विभाग हैं। इसलिये अथर्ववेद की नौ शाखायें हैं। ये सब मिलकर ११३१ शाखायें हैं। साम शब्द का अर्थ है जल, ऋक् का अग्नि, यजुः का अर्थ वायु और अथर्व का अर्थ मिट्टी। प्रत्येक वेद में जल, अग्नि, वायु, और मिट्टी पारिभाषिक शब्द हैं और उनसे हमारे इस जल, अग्नि, वायु, मिट्टी ही का तात्पर्य नहीं है; किन्तु इन चारों पदार्थों के आदि स्वरूप प्रकृति की अन्त्य अवस्था से लेकर स्थूलतम अवस्था तक जितने रूप, प्रकारान्तर से अवान्तर विभाग इत्यादि बनते हैं, उन सब का जातिवाचक नाम जल, अग्नि, वायु और मिट्टी वेद में हैं। जलसे वेद में घृत, मधु, सुरा, जल, इत्यादिक समस्त जलीय पदार्थों से अभिप्राय है। और जल के सूक्ष्म कण जो भाप रूप से आकाश में स्थित हैं, उनको वेद जल ही कहकर पुकारता है। वेद की शाखा का विभाग इस रूप से किया गया है कि एक एक शाखा में हम चार मूल पदार्थों के एक विभाग के गुण, कर्म, स्वभाव इत्यादिकों का विस्तृत वर्णन आ जाय। जैसे सामवेद की १००० शाखाओं में से १००० विभागों में एक एक विभाग का एक एक शाखा में विस्तृत वर्णन मिलेगा। अर्थात् एक जल पर एक शाखा प्रचलित हुई । इसी प्रकार अन्य वेदों की भी शाखायें हैं। प्राचीन ऋषियों ने प्रकृति की अवस्था से अन्त्य अवस्था तक योग बल से पूर्णावलोकन प्रत्येक देश में उस देश की प्राकृतिक रचना को देखकर इन शाखाओं का विस्तृत और क्रमपूर्वक प्रचार किया । उदाहरण स्वरूप उत्तर देश जल- और वायु प्रधान होने से विन्ध्य पर्वत के ऊपर साम और यजुर्वेद का प्रचार हुआ और विन्ध्य से नीचे दक्षिण देश अग्नि और भूमि की प्रधानता होने से वहाँ ऋग्वेद एवं अथर्ववेद का प्रचार हुआ । इससे साफ २ दीखता है कि हमारे ऋषियों ने सृष्टि का कितना सूक्ष्म और विस्तृत अध्ययन किया था। वर्तमान समय में हमारे अभाग्य से वेद की ११३१ शाखाओं में से भारतवर्ष में केवल छः ही उपलब्ध हैं। और ज़र्मन देश में १०३ शाखायें मिलती

( ग ) हैं। जिनको वहाँ की सरकार ने सुरक्षित कर रक्खी हैं। जिनका अध्ययन केवल वहाँ के शिखा रखने वाले ही द्वारा कराया जा सकता है। वेद का अर्थ निरुक्त से होता है। प्राचीन काल में प्रत्येक शाखा के भिन्न २ वेदाङ्गं (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष) होते थे। इस समय के पहिले १८ निरुक्त कई एक व्याकरण, ज्योतिष आदि मिलते थे। अब तो भारत में एक व्याकरण, निरुक्त (व्यास्क्रीय) एक मिलते हैं। परन्तु जर्मन देश में निरुक्त ३ मिलते हैं। वेद में अनेक प्रकार के वायुयानों का उल्लेख हैं; जिनमें से इस समय तक १८ प्रकार के वायुयानों का पता जर्मनों ने लगाया है। वेद के द्वारा हमारे ऋषि सूर्य आदि अन्य मण्डलों में जा सकते थे। इस समय का वायुयान केवल अधिक से अधिक १०१ मील तक जा सकेगा। अभी केवल २१ ही मील तक जा सकता है। ९ प्रकार के विद्युत को हमारे ऋषिगण जानते थे, एक विद्युत के प्रकाश से जिसको उत्तरी ध्रुव के नीचे बिन्दु सरोवर के ऊपर रक्खा जाता था उसी से सम्पूर्ण एशिया में प्रकाश होता था। इत्यादि आश्चर्यमय विषयों का वर्णन वेदों की सारी शाखाओं में उपदिष्ट हैं। हमारे दुर्भाग्य से वेदों की सब शाखायें नहीं मिल रही है। आज हमने पाठकों के अवलोकनार्थ अमेरिका में प्रकाशित अथर्व- वेदीय कौशिक गृह्यसूत्र को सानुवाद प्रकाशित किया है। आज तक जितने वैदिक गृह्यसूत्र उपलब्ध हुए हैं उनमें लोकहित की ऐसी बातें प्रकाशित नहीं पाई गई हैं जैसा कि इस सूत्र में अलौकिक आश्चर्य शक्ति वाले पदार्थों का वर्णन इसमें पाया जाता है जिनको पाठकवर्ग देखकर उनसे लाभ उठावेंगे। अनुवादक

भूमिका । —❀— वेद से बढ़कर संसार में कोई प्राचीन और प्रामाणिक ग्रंथ आजतक उपलब्ध नही हुआ है । मनुष्यों के लिये इससे बढ़कर किसी भाषा या धर्म सम्प्रदाय में ग्रंथ आज तक नहीं पाया गया है। इस विषय में एक सुप्रसिद्ध जर्मन देश के विद्वान् भट्ट मैक्षमूलर साहब यों लिखते हैं' कि वैदिक संहिता भाव, भाषा, तात्पर्य, रचना, प्रणाली और व्याकरण घटित विलक्षणता की विवेचना कर देखने से मालूम होता है कि संस्कृत भाषा में संसारकी विभिन्नजाति और देश की किसी भाषा में वैदिक संहिता के समान कोई दूसरी पुस्तक नहीं है। यह अलौकिक संस्कृत साहित्य का प्राचीन तम ग्रंथ “ऋग्वेद संहिता” है। यही मनुष्य जाति के हित के लिये पहिला ग्रंथ है। मानवीय सभ्यता का एक मात्र पहिला निदर्शन मनुष्य जाति का प्राचीनतम इतिहास और धर्म विश्वास का प्रथम मार्ग दर्शक है। इस लिये मनुष्य मात्र को यह वेद आदरणीय है। मनुष्य जाति के जिस समय का इतिहास कहीं नहीं पाया जाता है जिस I—The veda has a two fold interest, it belongs to the History of the world and to the History of India. In the History of the world the veda fills a gape which literary work in other langu- ages could fill. It carries us back to time of which we have no records any where and gives us the very words of gener- aration of men of whom otherwise we could form the vaguest estimate by means of conjectures and inferences. As long as man continues to take an interest in the history of his race and as long as we collect in literaries and museums the relics of farmer ages the place in that long row of books which contains the records of the Aryan branch of man kind belongs for ever to the regveda the most ancient than the Zindavasta and Homer ( 940-850. B. C. Professor Max mullar's History of Ancient Literature p. 63.

( २ ) समय की चिन्ता, धर्म, विश्वास, सभ्यता, उपासना, पद्धति देवोत्थान, सामाजिक, रीति, नीति, आशा, भरोसा और हृदय का भाव काल के अनन्त स्रोत के गर्भ में विलीन हुए हैं, जिस समय के इतिहास के उद्धार के लिये अन्य उपाय विद्यमान नहीं उसी स्मरणातीत समय का इतिहास सुप्रणाली बद्धरूप वेदों में ही सोने के अक्षरों में लिपिबद्ध हैं। इसी निमित्त सभ्य जगत् के सर्वत्र पण्डित मण्डली में वेदों की संहिताओं का इतना सम्मान और आदर है। वेदों की संहितायें चार हैं—ऋग्वेद , यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद जिनमें से—यहां अथर्ववेद के सम्बन्ध में लिखा जाता है।

अथर्ववेद की उत्पत्ति ।

दैवीं वाचमजनयन्त देवास्तां, विश्वरूपा पशवो वदन्ति । मन्द्रेष मूंर्जं दुहाना, धेनुर्वागस्मानुपसुष्टुतै तु ॥ १ ॥ भा० टी०—दैवी वाणी को देवताओं ने उत्पन्न किया, उसी को अनेक प्रकार के पशु बोलते हैं, गम्भीरनादमय धेनुस्वरूप वह वाणी हमारे द्वारा अभिष्टुत होकर अन्न तथा बल को देती हुई हमको प्राप्त हो ॥१॥ ब्रह्मा देवानां प्रथमः संबभूव, विश्वस्य कर्त्ता भुवनस्य गोप्ता ॥ स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठा मथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥ १ ॥ अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्मा अथर्वातां पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्मविद्याम् । स भरद्वाजाय सत्यवाहाय प्राह भरद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम् ॥ २ ॥ भा०टी०—विश्वरचयिता और उसका पालयिता देवताओं में पहिले ब्रह्मा हुए। वह सारी विद्याओं में प्रतिष्ठित वेदविद्या को अपने सबसे बड़े पुत्र अथर्व ऋषि को कहने लगे ॥ १ ॥ ब्रह्मा ने जिस वेद विद्या को अथर्वा से कहा, अथर्वा ने उसी को पहिले अङ्गिरा के प्रति कहा, अङ्गिरा ने भरद्वाज से कहा, और भरद्वाजने उसी परावरविद्याको आङ्गिरस से कहा ॥२॥ अथर्ववेद की मुण्डकोपनिषद् की इन दो श्रुतियों से वेदमात्र का पहिला वक्ता ब्रह्मा ही सिद्ध होते हैं। अथर्ववेद में प्राकृतिक पदार्थों के गुण वर्णन द्वारा, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि के रोगों की दवा का उपदेश है। जैसे—पृथिवी (मिट्टी) इसमें सर्प के विष को चूसने का गुण है (सर्प के काटे को भूमि में गढ़ा खोद कर श्वास लेने, जितना भाग छोड़ कर गाड़ देने से--सर्प विष

( ३ ) दूर हो जाता है ) । पृथिवी सम्भत् ( ऊषर पड़त मिट्टी ) अर्थात् रेह मिट्टी में कफ वाली खांसी को हटाने का गुण है। देवी मिट्टी में ( सौराष्ट्र मृत्तिका ) केशोंको काले, लम्बे और दृढ़ बनाने का गुण है और खान- पान आदि में दिये स्थावर बिष को नष्ट करती है। उपजीकोद्भृत् ( दीमक की मिट्टी ) व्रण ( घाव के गिरते पीव ) स्राव को और नशा करने वाले स्थावर विष से हुई मूर्च्छा और सर्प विष को भी नष्ट करती है। ऊँचे टीले और पहाड़ों पर दौड़ कर चढ़ जाने से तुरन्त काटे सर्प का विष निर्बल हो जाता है। अब जल का गुण कहते हैं। आपः ( जल ) जल में तुरन्त के घाव, स्वप्नदोष, नीद का न होना, और क्षेत्रिय ( वंश परम्परागत रोग ) को दूर करने का गुण है। और जल नेत्र-दृष्टि-वर्द्धक है। नदी के प्रवाहित जल में तैरने से सर्प विप दूर होता है। अवत्क ( ऊँचे से नीचे गिरता हुआ जल ) हिमालय पर्वत से निकलते हुए झरने का जल, हृदय जलन, और नेत्र जलन को दूर करता है। नये कूप का जल और ऊँचे से नीचे गिरता हुआ ( फाल का ) जल व्रणस्राव नाशक है। मेघवृष्टि धारा रुके मूत्र को निकाल देती है। और जल सब ही रोगों का नाशक है। अग्नि—शीत रोग को दूर करता है, सर्प विप को जला कर नष्ट कर देता है। कृमि दूषित आहार को शुद्ध करता है। रुके मूत्र को निकालता है और सुख से प्रसव कराता है। और सब रोगों का नाशक और रसायन है। भूरिधायस पर्जन्य ( पार्थिव अग्नि ) और होमाग्नि ( होम का अग्नि ) इन अग्नियों के गुण ऊपर कहे गये जानो। विद्युत या बिजुली इन्द्र ( विद्युत् शक्ति वाला ) इसके द्वारा सारे रोग दूर होते हैं। वरुण ( विद्युत् धारा ) भोजन में से कृमि दोष को दूर करता है। रुके मूत्र को बाहर निकालता है और रसायन है। वायु—मरुत् ( साधारण चलता हुआ वायु ) वायु स्वास्थ्यप्रद है, शरीर में दवा का काम करता है। सुख से प्रसव कराता है। सब रोग नाशक है। रुके मूत्र को बाहर निकालता है और रसायन है। वेधा ( प्रत्येक ऋतु का वायु ) बृहस्पति ( ऊपर का वायु ) मित्र ( साधन या यंत्र से प्रेरित वायु ) इन सबों में ऊपर कहे गुण हैं। मेघ, वृषा ( बादल ) गर्जना कर बरसता हुआ सर्प विष नाशक है। चन्द्र ( चन्द्रमा ) चन्द्रमा की चान्दनी रुके मूत्र को बाहर निकालती है और क्षेत्रिय रोगों को दूर करती है। सूर्य—हृदय रोग, हलीमक, कामला, अपची, गण्डमाला, शिरोरोग को नष्ट करता

( ४ )

है। सुख से प्रसव कराता है, और सब ही जानवरों के विष को नष्ट करता है। क्षेत्रिय रोग को नष्ट करता है, कृमि नाशक है। रुके मूत्र को बाहर निकालता है। क्षेत्रिय रोग को नष्ट करता है। और सर्व रोगना- शक रसायनरूप है। सूर्य के पर्यायवाची नाम—सूर्य, अर्यमा, सविता और आदित्य हैं। आठ वसु जिनका वर्णन वेदों में है, उन आठ वसुओं के भिन्न २ गुणों के कहने के पश्चात् अब अकारादि क्रम से अथर्ववेदोक्त दवाओं के गुणों का वर्णन करते हैं। अग्नि—(चित्रक या चीता दवा) यह दवा योनि दोष, गर्भ संस्राव, जातघातक रोगों तथा योनि एवं गर्भाशय में होने वाले कृमियों का नाशक है। अङ्ग (बोल नाम की दवा) बुखार को दूर करता है। अजशृङ्गी (मेढ़ासिंगी) शरीर में विष तुल्य मादक प्रभाव लानेवाले कृमियों को नष्ट कर देती है, भूत के द्वारा उन्माद का नाशक है। अदिति (गौ के दूध, घी, दही, माठा आदि पञ्चगव्य) सांप के विष को दूर करता है। अपामार्ग (श्वेत अपामार्ग, ढाल अपामार्ग, चिड़चिड़ी) सफेद चिड़चिड़ी मन्दाग्नि, ग्लानि, वमन, बन्ध्यापन, सन्तान स्तम्भन को दूर करता है, और लाल चिड़चिड़ी तृष्णा रोग, भस्मक रोग, पुरुषेन्द्रिय की निर्बलता को हटाता है। और अधः स्थान (गुदा, लिङ्ग, योनि) के अर्श रोग (बवासीर) और ऊर्ध्व स्थान (मुख, नाक) के अर्बुदों को नष्ट करता है। वीर्य्य स्तम्भक बाजीकरण है। संक्रमित होने वाले छूत रोगों को नष्ट करता है। अर्क (आक, अकवन) जननेन्द्रिय (लिङ्ग) में हर्ष एवं वृद्धि करने वाली बाजीकरण है। अर्जुनकाण्ड (कुह वृक्ष)*क्षेत्रिय रोग को नष्ट करता है। और खेत के अनुपज को नष्ट करता है। अश्वत्थ “शमीस्थ” (पीपलबन्दा, शमी वृक्ष पर लगा हुआ) गर्भ स्थापन कारक है, और पुरुष द्वारा सेवन करने से पुत्र पैदा होता है एवं स्त्री द्वारा सेवन करने से कन्या होती है। और पुरुष के वीर्य्य एवं स्त्री के रज का बढ़ाने वाला है। अश्ववार (कांस) सर्प काटे विष का बन्धन रोकने वाला है। असिक्नी (नीलिनी, नीळ) केशों की सफेदी, श्वेत कुष्ठ, गलित कुष्ठ को दूर करती है। आञ्जन (अञ्जन सुरमा) हलीमक, पाण्डु, विषय भोग से हुए रोग, अङ्गभेदक, विसल्यक फैलनेवाले विसर्प, हृदय और श्वास रोग को दूर करनेवाला आयुवर्द्धक है। आञ्जनमणि—सर्पकाटे विष एवं स्थावर विष को नष्ट करता है। मोहरूप मानसिकरोग का नाशक है। स्वप्न-

( ५ )

दोष, निद्राक्षय को दूर करता है । एवं विषतुल्य मादक प्रभाववाले कृमियों को नष्ट करता है । हलीमक-पाण्डु, विषभोगजन्यक्षय, अङ्गफूटन विसर्प, श्वास, हृदयरोग, नेत्ररोग को नष्ट करता है एवं आयु बढ़ाने वाला रसायन है। पशुओं को स्वास्थ्य, पुष्टि और सन्तति शक्ति देने वाला है । आसुरी—सफेद सरसों-श्वेतकुष्ठ, गलितकुष्ठ को नष्ट करती है । स्त्रियों में सुभागत्व और सौन्दर्य कान्ति बढ़ाती है । इन्द्र (इन्द्रायण लाल फल उछलनेवाले, फूकारनेवाले, लिपटनेवाले और तिरछी रेखावाले सर्पों के विष को दूर करता है और सब ही सर्पों के विष को नष्ट करता है । उपजीका—'उपजीकानुषिक्त (दीमकों का मुखस्राव) नशा करने वाले स्थावर विष को नष्ट करता है । उपजीका-उपजीकोद्भूत उखाड़ी- उगली वल्मीकमृत्तिका, व्रणस्राव को नष्ट करती है। ऋषभ (अष्टवर्ग की ऋषभक दवा) वन्ध्यापन और गर्भपात रोगको नष्ट करती है और गर्भ स्थापन शक्ति देती है । औक्षगन्धि—(वृष्यगन्धाबला) विष तुल्य मादक प्रभाव करने वाले कृमियों को, भूतोन्माद को दूर करती है। औदुम्बरमणि (गूलर वृक्ष) पुष्टि, बल और सन्तति उत्पन्न करने की शक्ति देता है । और पशुओं को स्वास्थ्य एवं सन्तान शक्ति देता है । कन- कक (टङ्कण सुहागा) सर्प विष नाशक है । खाने से सर्प विष को बाहर ले आता है । कन्या (बड़ी इलायची) इसकी जड़ से सर्प विष नष्ट होता है। करम्भ (फूल प्रियङ्गु, मालकौनी) खान पान में दिये स्थावर विष के प्रभाव को नष्ट करती है । कल्याणी (माषपर्णी) काम- शक्तिवर्द्धक वाजीकरण है । कश्यपवीवर्ह (चमरी मृगपुच्छ) इसका झाल सारे रोगों में हितकर है । कान्दा विष (कन्द विष) सर्प विषना- शक, अर्थात् सर्प विष को बाहर ले आता है । कुमारिका (बांझक कोड़ा) सर्प विष नाशक है (इसके फल नहीं आते, जङ्गलों में होती है) कुषुम्भक (नेवलाप्राणी) सर्प के विष को चूसने वाला है। इसके मल मूत्र, लार, रोम, अङ्ग, सर्प विष को निर्बल कर बाहर निकाल देते हैं । कुष्ठ (पर्वत पर का कुष्ठ) शिरोरोग, नेत्रान्ध, रक्तदोष को दूर करता है । नपुंस- कता नाशक वृष्य है । एवं तृतीयक, चातुर्थिक, सन्तत और ऋतु के ज्वर को एवं मलेरिया ज्वर को नष्ट करता है। कृष्णा—(नीलिनी, नील) पहिले ही इसके गुण कहे गये । केशवर्धिनी (भृङ्गराज, भांगरा) कान्ति देने, तेज बढ़ाने, धातु वृद्धि, और केशों को बढ़ाने वाली है । गन्धारि (कचूर) ज्वर नाशक है । गुग्गुल (गूगल) शरीर के कठिन रोगों,

( ६ ) शापकृत मानसिकखेद, छूत रोग, वात रोग को दूर करता है और विष तुल्य मादक प्रभावकारी कृमियों को नष्ट करता है। भूतोन्माद का नाशक है। घृताची-देखो बड़ी इलायची चीपद्रु (चीड़वृक्ष) विविध फुन्सी, फोड़ों विद्रधि को नष्ट करता है। जङ्गिडमणि—मोह आदि मानसिक रोगों को दूर करती है। और अनेक प्रकार के असाध्य रोग कृत्या द्वारा किये रोगों को नाश करता है। जीवन्ती—जीवन देने, रोग दूर करने, स्वास्थ्य रक्षक, बल पुष्टि देनेवाली रसायन है। जीवला—(सिंह पिप्पली) पशुओं के रोगों को दूर करती है। तरुणक—(तृण रोहिष तृण) सर्प के काटे विष को नष्ट करती है। तस्तुव—(कड़वी तोरी) सर्प विष को नष्ट को नष्ट करती है। तिल पिञ्जी (तिलों की मञ्जरी एवं नाल) क्षेत्रिय रोगों को नष्ट करती है और तिल नाल के भस्म खेतों के अनुपज दोष को दूर करती है। तौदी—(बड़ी इलायची) देखो पूर्व कहा। दर्भ (दाभ) सर्प के काटे विष का बन्धक है। दर्भमणि—स्वास्थ्य एवं दीर्घायु देने वाला रसायन है। दश वृक्ष (दशमूल) सन्धिवात मस्ति- ष्कवात (मृगी,) रोगों का नाशक है। दासी-(काकजङ्घा) ज्वर को नष्ट करता है। दृत्ति (जोक प्राणी) सर्प काटे विष को चूसने वाली है। देवी (सौराष्ट्र की मट्टि) केशों को लम्बे, काले, दृढ़ बना देती है। नघमार—(कुष्ठभेद मीठा कुष्ठ) शिरो रोग, तृतीयक, सन्तत, ऋतु ज्वर को नष्ट करता है। नघारिष—(कुष्ठभेद कड़वाकूट) उपरोक्त गुण वाला है। नमः—(वज्र अभ्रक) दर्भमणि के गुण जानो। नलदी (जटा- मांसी) विषतुल्य मादक प्रभाव वाले कृमियों को नष्ट करती है। नवती (पिपीलिकायें) सर्प काटे विष को नष्ट करती है। परुषवार— (मूंज) सर्प काटे विप का बन्धक है। पर्जन्य (दारु हल्दी) स्वास्थ्य और आयु को प्रदान करती है, रसायन है। पर्णमणि = इसमें सोमलता के सब गुण हैं। पाढा (पाठा, पाढ़) शस्त्र प्रहार के घाव को अत्यन्त लाभ दायक है। पिङ्ग (हरिताल) प्रसूति रोग, गर्भ भक्षक कृमियों, मृतवत्सा रोग जन्म कर सन्तान मरजाने के रोग को नष्ट करती है। पिप्पली (पीपल दवा) आक्षेपक, पक्षाघात, गठिया, आदि वातरोग को नष्ट करती है। जीवन देनेवाली रसायन है। पीला (पिप्पली) विषतुल्य मादक प्रभावकारी, कृमियों को नष्ट करती है। भूतोन्माद नाशक है। पृश्निपर्णी (पृष्टिपर्णी) बवासीर, दाद, कुष्ठ- रोग, योनिविकार, गर्भक्षय, आदि कृमियों से आक्रान्त रोगों को नष्ट

( ७ ) करती है। विशेषतः योनिदूषक और गर्भघातक कृमियों को नष्ट करती है। पैद्व (सफेद आक या अर्क) सर्प के काटे घाव पर लेप करने से विष को अत्यन्त निर्बल करती है, वमन विरेचन द्वारा विष प्रभाव को बहुत ही नष्ट करती है। प्रक्री-(सोमलता) नशा करने वाले स्थावर विष की मूर्च्छा और उसके प्रभाव को अत्यन्त नष्ट करती है। प्रमन्दनी (प्रमदिनी घातकी) विषतुल्य, मादक प्रभावकारी कृमियों को नष्ट करती है, भूतोन्माद नाशक है। ब्रह्म (ब्रह्म-वृक्ष उदुम्बर गूलर) 'योनिदोष, गर्भस्राव, जात घातक रोग और योनि एवं गर्भाशय में होने वाले कृमियों को नष्ट करती है। भद्रा—(कृष्ण सारिवा) रुधिर बहने, चोट से पिस जाने, दण्डेजाने, कट आने, जल जाने और हड्डी टूट जाने में हितकर हैं। भरी मूल दर्भ (उशीर-खस) क्रोध, मन के उद्वेग रूप भ्रम और उन्माद को शान्त करती है। मगध (पिप्पली) गुण पहिले कहे गये हैं। मधु (शहद) सर्प काटे विषका नाशक है। मधु- जाता (शहद की खाँड) टेढ़े चलने वाले सर्प आदि और मच्छर जैसे विष कृमियों के विष को दूर करती है)—आगे लिखी दवाओं में ये ही गुण हैं। मधुला (कपिलद्राक्षा), मधुश्रुत (महुआ) मधू (मुलहठी) मयूरी (मोरनी, उसके बच्चे) सर्पविषको चूसने नष्ट करनेवाले हैं। मित्र (अतीस) सर्पविष नाशक है। मुनि देवमूल (अगस्त्य वृक्षकी जड़) अपची-गण्डमालाओं को नष्ट करती है। यव पलाली (जौ की मञ्जरी, जौ की नाल) क्षेत्रिय रोग को हटाती है और नाल की भस्म खेत के अनुपज दोष को दूर करती है। रामा (नीलिनी, नील) गुण पहिले कहे गये। रोपणका (दूब) हलीमक, कामला, पाण्डु को नष्ट करती है। रोहिणी, (मांस रोहिणी) रुधिर स्राव, चोटसे पिसजाने, दरेडेजाने, जलजाने, कट जाने, हड्डी टूटजाने में हितकर है। लवण (नमक) ग्रीवा, कक्षा, वंक्षणमें होनेवाली विवर्ण हुई कठोर, बहने वाली अपची गण्डमालाओं का नाशक है। लाक्षा (लाख) टूटे को जोड़ने, पुराने घावों को भरने, नयों को शीघ्र ही ठीक करने, चोटको अच्छा करने वाली है। वचस्-(बचा, बच्छ) गुण पहिले कहे गये। दर्भ मणि के समान गुण। वरणमणि (वरना) वरणावती और वरण नामों में देखो। वरणावती (वरणों की पञ्चाङ्ग खान पान में स्थावर बिष को नष्ट करती है। वरुण (वरदाय वृक्ष) सर्प विषनाशक, शिरोरोग नाशक है। वाक (बक पञ्चाङ्ग अगस्त्य वृक्ष का पञ्चाङ्ग) मन्या. ग्रीवा, स्कन्ध

( ८ )

अपची गोंठा को नष्ट करता है । बाद् ( मूर्वाकन्द ) सर्पविष नाशक है । विक्षर ( समुद्र फेन ) कफमय खांसी को नष्ट करता है । विश्वरूपा ( काला अगर ) पशुओं के रोगों को दूर करता है । विष ( स्थावरविष ) सर्प के काटे विषका नाशक है । विषाणा ( मृगशृङ्ग ) क्षेत्रिय रोगों को या जन्म के हृदय रोग को नष्ट करता है । विषाणा ( मेढा सींगी ) रक्त- स्राव और वात रोग को दूर करती है । विषपुलिङ्ग का ( गुद् पुच्छ को निरन्तर ऊपर नीचे को उचकने वाली चिड़िया ) सर्प के काटे विष को नीचे के गुदा अङ्ग से चूसने वाली है। वृषा ( कपिकच्छ, कौंच ) दुबलेपन को दूर करती, नष्ट वीर्य में पुनः वीर्य स्थापन करती एवं पुरुषत्व शक्ति देती है । और स्वास्थ्य प्रद् है और वशीकरण एवं रसायन है । शकुन्तिका ( भासपक्षी ) सर्प काटे विषको चूसन कर लेती है । शङ्खमणि ( शङ्खमुक्ता मासिकरोगों को नष्ट करती है। तथा विषनाशक है। शतवार मणि ( ऋष- भक ओषधि ) पुत्रोत्पत्ति शक्ति को देती, नपुंसकता, गर्भघातक कृमियों को नष्ट करती है; ज्वर नाशक है एवं ज्वर एवं सन्दिग्ध रोगों को हटाती एवं रसायन है । शुक ( तोता पक्षी ) हलीमक, कामला, पाण्डु रोगों को नष्ट करता है । रोगी के उसके पास रहने से उक्त “रोगों को आकर्षित करता है। शूद्रा ( प्रियंगु लता ) ज्वर को नष्ट करती है। शोचि ( कुशा ) सर्प के काटे विष का बन्धन करती है । श्वेत ( अलर्क सफेद ) वमन विरेचन प्रलेप आदि द्वारा सर्प विषका अत्यन्त नाशक है । समिध ( सुगन्ध काष्ठ या शुद्ध काष्ठ ) पेटके अन्दर कीड़ों को नष्ट करती है । सहदेवी ( महाबला ) पशुओं के रोगों को दूर करती है । समुद्रफल— ईर्ष्या, मानसिक, दाह को नष्ट करता है । सुपर्ण ( गरुड़ पक्षी ) चूसने से या अपने मलमूत्र आदि से सर्प काटे विष को निर्बल करता है । सुभा ( शालपर्णी ) पशुओं के रोगों को दूर करती है । सोम ( सोमलता सोम- वल्ली, महौषधि ) सर्प के काटे विषको दूर करने की महौषधि है । मूर्छा- दि मानसिक रोगों, अयोग्य हीनदृष्टि, दूषित वाणी को ठीक करती हैं । खान पान में से कृमि दोषों को दूर करती है । स्त्री के प्रति प्रसङ्ग से हुए उरःक्षत, राजयक्ष्मा को दूर करती है । क्षेत्रिय रोगों को दूर करती है हवि ( घृत, घृतादि सुगन्ध होम ) राजयक्ष्मा, वातव्याधि, सन्दिग्ध रोग, क्षेत्रिय रोग, इत्यादि रोगों को नाश करती है । स्वास्थ्य और आयु को बढ़ाती है । हारिद्रव ( दारुहल्दी के वृक्ष) इनमें रहने, इनके दर्शन, वायु सेवन, और स्वरस कषाय के पान और अन्य योगों के सेवन

( ९ )

प्रलेप आदि से हलीमक, कामला, पाण्डुरोग नष्ट होते हैं। इसी अथर्व- वेद का यह कौशिक सूत्र—है जिसमें १६ संस्कारों को वर्णन करने के अतिरिक्त-संसार के अत्यन्त प्रयोजनीय विषयों का-उल्लेख और वर्णन है— जिनको संक्षिप्त रूप से आगे दिखलाया गया है ।

कौशिक गृह्यसूत्रम्

कौशिक सूत्र—शौनकीय आदि ४ शाखाओं का संहिता का कल्पसूत्र नामक अङ्ग का एक गृह्यसूत्र है। इस पर पं० दारिल एवं केशव संक्षिप्त टीका मूल और संस्करण श्रीमिस्रर मारीस की ब्लूमफिल्ड साहेब ने अमेरिका से प्रकाशित किया है। अब तक संसार में इसके सिवाय अन्यत्र यह कहीं नहीं प्रकाशित हुआ है। इसका अङ्गरेजी भाषा में किसी २ अंश का अनुवाद ब्लूमफिल्ड साहब कृत Hymns of Atharva veda नामक ग्रंथ में सन्निविष्ट हुआ है। इस सूत्र में अथर्ववेदोक्त मन्त्रोच्चारण के साथ अनेक प्रकारके णीय प्रक्रिया का विस्तृत विवरण है। जैसे— अथर्ववेद के प्रथम काण्ड के दूसरे सूक्त में और दूसरे काण्ड के तृतीय सूक्त में देह से अत्यधिक स्राव । जैसे—उदरामय, आमाशय, इत्यादिकों के निवारण करने के लिये मुञ्जघास ( Sacch arom arrya ) और झरना का जल लेकर दो मंत्रों से प्रयोग लिखा है। कौशिक सूत्र के इन दो मंत्रों के उच्चारण के साथ निम्नलिखित करणीय प्रक्रिया का भी विवरण है। “इन दो मंत्रों के उच्चारण करते समय (जो उच्चारण करते रहें वह) एक पेड़ मुञ्जघास के सूत से रोगी के शरीर में कवच, या,यंत्र ( ताबीज ) की भांति बांध देवे। उसके बाद थोड़ी दीमक की मिट्टी को पीस कर जळ में मिला कर इस जल को रोगी को पान करावे । उसके बाद रोगी को घी लगा देवे और रोगी के गुह्य स्थान में फूक देवे ।” इस प्रकार अनेक मंत्रों के साथ अनेक प्रकार के करणीय प्रक्रिया का विवरण कौशिक सूत्र में है। यह सूत्र लिखित प्रक्रिया आदि अथर्ववेद में भी है। इस विषय में इस समय भी मतभेद


१—Koushik sutra of the Atharveda, with extract from the commentaries of daril and Keshava, edited by Maurice Bloom field, insided as vol XIV of the journal of the American oriental society.

( १० )

हैं । ※ ( किसी २ के मत में यह है जो, यह प्रक्रिया सब अथर्ववेद के मंत्र रचना समय या उसके परवर्ती काल में परिवर्त्तित हुआ है । इस कौशिकसूत्र में वर्णित प्रक्रियाओं के भैषज्यविज्ञान और चिकित्सा में अधिकतर ज्ञान दृष्ट होने से स्वतः ही मन में होता है, जो ये प्रक्रियायें अथर्ववेद के समय रहने पर भी परवर्ती काल में बदल गयी थी । प्रक्रियाओं को बदलने के सम्बन्ध में मतभेद होने पर भी कौशिक सूत्र अथर्ववेद के पीछे और आयुर्वेद ग्रन्थों के पहिले रचित हुआ था—ऐसा मानना ही पड़ेगा । अथर्ववेद के “भैषज्यानि” और “आयुष्याणि” समुदायमन्त्र । इन सब मंत्रों में अथर्ववेद के समय हिन्दुओं को आयुर्वेद के ज्ञान का परिचय पाया जाता है। कौन २ मंत्र किस २ रोग को सम्बोधन करके रचित और मंत्र रोगों के प्रतिषेधक भेषज और धातु को सम्बो- धन कर उच्चरित हुए । जो सब मंत्र रोगों के प्रति सम्बोधित हैं, उनमें विशेष २ लक्षण वर्णित हैं। दृष्टान्त स्वरूप जैसे—“तक्षण” वा “ज्वर”। इस लक्षण के अनेकों सूक्तों में वर्णित हैं—प्रथम काण्ड, २५ सूक्त, पञ्चम काण्ड, ४ सूक्त, २२ सूक्त ; छठा काण्ड, ३ सूक्त, २० सू०, ९५ सू०, १०२ सू०, ११६ सू०, इन सूक्तों में ज्वरों के अनेक लक्षण वर्णित हुए हैं। और उनका औषध स्वरूप “कुष्ठ” नामक भेषज को ( costus speciosus or Arabicus ) आह्वान किया गया है ( ५ का० सू० ४ ) जो सब मंत्र किसी भेषज को सम्बोधित कर सब भेषज या उसका रस सेवन का


*—The practices mere ( in the Koushika Sutras ) invelve a mare extentive medcen etc and to mare elaborate theropenties, but it is difficult to define in detail the extent to which practices similar to those of the sutras must be presupposed from the start with the charms of the Atherva Veda—Bloom field’s the Atherva Veda. page 68. The value of the sutra is primarily as a help to the under- standing of the ritual and general purposes of a given hymn and so mediatedly its exegeses. Whitney—“Hymns of the Athervaveda.” General Introduction p. 1. XXV.

( ११ ) ( Internal application ) विशेष उल्लेख अथर्ववेद में भी पाया जाता । ये सब भेषज गले में, हाथ में, शरीर के अन्य स्थान में यंत्र ( या तागा परिहस्त वलय ) बन्धन किया जाता है। कौशिकसूत्र में इस प्रकार बन्धन के साथ अन्य २ द्रव्य सेवन करने की व्यवस्था भी है। जैसे—कौशिकसूत्र २५।६।९, २०।१०।१९, २९।२८।२९ इत्यादि । धातु घटित औषधों में भूतयोनि को भगाने के लिये सीसा का यंत्र ( १ का० सू० ६ ) और एक सौ वर्ष परमायु और प्रभूत शक्ति पाने के लिये सोने का यंत्र ( १ का० सू० १६ ) धारण करने की व्यवस्था है। चिकित्सा शास्त्रों के इतिहास की आलोचना करने से जाना जाता है जो पहिले औषधों का बाहरी व्यवहार ( external application ) और पीछे अभिज्ञता की वृद्धि के साथ २ भीतरी व्यवहार ( Internal admini- stration ) हो जाता है। पहिले हाथ या गले में धारण, पीछे मालिस या प्रलेप रूप से व्यवहार और शेष में औषध रूप से अति सूक्ष्म मात्रा में सेवन, इसी प्रकार औषध सेवन का क्रम विकाश संघटित हो जाता है। हम लोग अथर्ववेद में औषधियों को बाहर धारण में हिन्दू चिकि- त्सा के पहिले उन्मेष देखने में आता है। जिन भेषजों का ( जैसे— अश्वत्थ, खैर, हरिद्रा, अपामार्ग, मुञ्ज, शमी, पृश्निपर्णी इत्यादि ) यंत्रों या बूटियों या औषधों को अथर्ववेद में बाहरी ( शरीर के किसी भाग में ) भाग में धारण करना बतलाया है। पीछे उन्हीं सब भेषजों को औषधि रूप से सेवन की व्यवस्था बतलाई गई। धातुओं में से सीसा और स्वर्ण की अथर्ववेद में शरीर के बाहरी भाग में धारण करने की व्यवस्था है। पीछे के तन्त्र ग्रन्थों में ये दोनों एवं अन्यान्य धातुओं के भस्म औषध रूप से सेवन करने की व्यवस्था हुई है। निम्नलिखित कई एक पृष्ठों में अथर्ववेद के प्रत्येक काण्डों में जो सब रोग और भेषज मूलक सूक्त हैं, उनका अति सूक्ष्म विवरण दिया गया है। प्रथम काण्ड ॥ १ ॥ दूसरा सू०। देह से अत्यधिक स्राव ( उदरामय, आमाशयादि ) निवा रण के लिये मुञ्जघास लेकर मंत्र ) २तीय काण्ड में ३रे सू० में इसी उद्देश्य से “झरना का जल लेकर और एक मंत्र है। छठा काण्ड में ४४ सू० में और भी एक मंत्र है। मुञ्जघास को यंत्र रूप से बांधने की प्रक्रिया कौशिक सू० में ( २५।६ ) और दारिल की टीका में विस्तृत भाव से लिखा है।

१. अध्याय १-३: दर्शपूर्णमास, नवीन-शस्येष्टि एवं गृह्य-संस्कार आरम्भ

तीसरा सू०। कोष्ठबद्ध और प्रस्त्राव विरुद्ध में मंत्र । इसी सूक्त में परवर्त्ती काल चिकित्सकों का बस्ति यन्त्र की नाईं एक प्रकार के तृण की सहायता से चिकित्सा विषय का उल्लेख है। कौशिक सू० में इस विषय की जो विस्तृत व्यवस्था है, उसका अनुवाद नीचे दिया हुआ है। कौशिक सूत्र ( २५।१०।१९ ) इन मंत्रों के उच्चारण करते समय मूत्र का वेग जिसमें हो, ऐसा द्रव्य रोगी के शरीर में बान्ध देवे। उसके बाद दीमक की माटी पूतिका ( Guilandina bonduc ) सूखा गुण्डान प्रमन्द और काठ का गुँडा जल में भिंजा कर वही जल रोगी को पीने को देवे। इस सूक्त का शेष दो मंत्र उच्चारण करते २ मलद्वार में एक शलाका— एक सलाई ( Enema ) प्रवेश करा देवे। उसके बाद मूत्रनाली में शलाका दिलवा दे। शेष रोगी को आल, पद्म का शिकड़ और उल इन तीन द्रव्यों का पाचन सेवन करने को देवे। कोष्ठबद्ध होने पर भी इसी प्रकार व्यवस्था है। १६ सूक्त। सीसा का ताबीज। भूतों को भगाने के लिये व्यवस्था है। १७ सूक्त रुधिर गिरने को रोकने के लिये मंत्र। टीकाकार गण कहते हैं जो रक्त स्राव का अर्थ कटने से रक्तस्राव और अत्यधिक रजो- निस्सरण ये दोनों समझना होगा। इन मंत्रों के सहित कौशिक सूत्र (२६।१०) धूलि और पत्थर का चूर्ण जखम की जगह चढ़ा देने से रक्त बन्द करने की व्यवस्था दी है। २२वें सू०। पाण्डु ( कामला—केशव की टीका ) रोग के प्रति मंत्र। इस सूक्त में विशेष कोई जानने के लिये भेषज का उल्लेख नहीं। कौशिक सूत्र में ( २६, १४) इस मंत्र के साथ करणीय प्रक्रिया का विवरण है। २३।२४ सूक्त। श्वेत कुष्ठ रोग के प्रति मंत्र। रजनी ( हरिद्रा ) ( Cacuma longer ) इस रोग को दूर करने के लिये उल्लिखित हुई है। आयुर्वेद ग्रंथों में कुष्ठ रोग में हरिद्रा का व्यव- हार अधिकता से हुआ है। कौशिक सूत्र में (२६।२२।२४) मंत्रों के साथ करणीय आनुषङ्गिक प्रक्रिया वर्णित हुई है। सायनाचार्य और केशव ने अपनी २ टीका में कुष्ठ के लिये भृङ्गराज, हरिद्रा, इन्द्रवारुणी, और नीलिका का उल्लेख किया है। २५ सू०। तक्षण ( ज्वर ) इस सूक्त का और नीचे लिखे सूक्तों का विषय ५ का० ४ सूक्त, २२ सूक्त; ६ का० २० सू०, ९५ सू०, ३ सू०, १०२ सू०, ११६ सू०; १९ का० ३९ सू०। सुश्रुत जैसे ज्वर को रोगों का राजा कहा है उसी प्रकार अथर्ववेद में “तक्षण” को सबकी अपेक्षा भयानक कह कर लिखा है। इन सब सूक्तों में ज्वर के लक्षणादि भली-भांति स्पष्ट हुआ है। लक्षणादि मलेरिया

( १३ ) ज्वर के साथ बहुत मिलते हैं । प्रधान लक्षण पर्याय क्रम से उत्ताप और शीतावस्था, ज्वर को छोड़ कर और दो तीन दिन अन्तर देकर ज्वर होना । ज्वर के साथ मस्तक व्यथा, खांसी बलास ( क्षय रोग ) पामन् (तक्षण का भाई, चूलकना ) और पाण्डु ( कामला ) आकर योग देता है । उत्ताप ज्वर का प्रधान लक्षण होने से उल्लिखित हुआ है। १ का० १२ सू० में “विद्युत्को” जान पड़ता है अग्नि का रूपान्तर कहा है, ज्वर, माथा व्यथा, काश के कारण होने से निर्दिष्ट हुआ है। ज्वर दूर करने के लिये मंत्रोच्चारण और कुष्ठ नामक ( Costus specios or arabicus ) वृक्ष के यंत्र धारण की व्यवस्था सूचित हुई है। कौशिक सूत्र में और भी अनेक आनुषङ्गिक प्रक्रिया वर्णित हुई है; विस्तार भय से उन विषयों का उल्लेख नही किया गया । कौ० सू० सानुवाद में देखना (३५ सू०)। सोने का यंत्र एक सौ वर्ष परमायु और प्रभुत शक्ति लाभार्थ धारण करना चाहिये ऐसा लिखा है । ॥ द्वितीय काण्ड ॥ ३ रा सू० प्रथमकाण्ड दूसरा सू० देखो । चतुर्थ सू० विभिन्न रोग और भूत योनि के लिये “जङ्गिड” नामक वृक्ष को उपलक्ष कर मंत्र । टीकाकारगण इस जङ्गिड वृक्ष के स्वरूप को अब तक निश्चय नहीं कर पाये । सीधे लिखा है “वाराणस्यां” प्रसिद्धः ।—काशी में मशहूर है । १४ काण्ड ३४ सू० में और १९ काण्ड १५ सूक्त में इस सम्बन्ध में और भी दो मंत्र है । ८ म० सू० क्षेत्रिय ( Hereditaridiseases, Pulmon ary consumption Greffiths—इसका अनुवाद रामक रोग का मंत्र इस रोग को टीकाकारगण पुरुषानुक्रमसे प्राप्त यक्ष्मा रोग कहकर निर्देश किया है । इस यक्ष्मा रोग के सम्बन्ध में अनेक मंत्र हैं । तीसरे काण्ड में ६ ठा सू० में हरिण के शृङ्ग के यंत्र की व्यवस्था है । १९ काण्ड में ३९ सू० में कुष्ठ वृक्ष को अन्य २ रोगों में यक्ष्मा को आरोग्य करने के लिये प्रस्तुत हुआ है । ९ सूक्त अथर्ववेद में अनेक स्थलों में भूतयोनि, अप्सरा, गन्धर्व प्रभृति अमानुषिक प्राणिको रोग के कारण कहकर निर्देश किया है ( ६।३७ ) इस सू० में यह सब भूत योनि के आक्रमण से रोगी की रक्षा करने के लिये दश प्रकार के वृक्षों का यंत्र धारण करने की व्यवस्था की है । २५ सू० पृश्निपर्णी ( Hemianitis Cordifolia ) वृक्ष के प्रति मंत्र । रोग के हेतुभूत कण्वनामक दैत्य

को विनाशार्थ पृष्णिपर्णी नामक वृक्ष को अनुरोध किया गया है। सुश्रुत ने गर्भस्राव रोग में दूध के साथ पृष्णिपर्णी की व्यवस्था कियी है। ३१ और ३२ सूक्त में पशु के कृमि का “गोः कृमिः”—केशव की टीका है। और पञ्चम काण्ड २३ सू० में शिशुओं (बच्चे) की कृमि के मंत्र हैं। इन तीन सूक्तों में अनेक प्रकार के कृमियों का वर्णन देख पड़ता है। सादा, काला, तीन मस्तक वाले, चतुर्मस्तक, नाना रंगों के कृमियों का वर्णन है। इन सब सूक्तों में किसी प्रकार के भेषज का वर्णन नहीं पाया गया। केवल मंत्रों की सहायता से कृमिनाश की व्यवस्था है। तीसरा काण्ड ५ म सूक्त में आर्थिक उन्नति लाभ के लिये पर्णवृक्ष का यंत्र। इस पर्णवृक्ष को परवर्त्ती काल में पलास ( Butin Fron dosa ) नाम से कहा गया है। ६ ठे० सू० में अश्वत्थ वृक्ष को शत्रु- नाश के लिये और हरिण शृङ्ग का यंत्र धारण करे। ( २ का०८ मसू० ) । ॥ चतुर्थ काण्ड ॥ ४ र्थ सू०। नष्टवीर्य ( Impotency ) उपद्धार के लिये कपित्थक ( Feronia Elephantum ) नामक वृक्ष का उद्देश्य के लिये मंत्र। ६।७ सू० विष झाड़ने का मंत्र किसी औषधि के नाम का उल्लेख नहीं। ९ वम सू० पाण्डु, यक्ष्मा, दोषस्थ ज्वर के लिये मलहम ( Oeintment ) कौशिक सूत्र में ( ५८।८ ) लिखा गया है कि विधि से उसमें मलहम का यंत्र बान्ध देना चाहिये। १० सू० इस सू० में दीर्घजीवन के लिये मुक्तायंत्र धारण की व्यवस्था की है। मुक्ता की उत्पत्ति के सम्बन्ध में हम लोगों में जो प्रवाद प्रचलित है कि स्वाती नक्षत्र का जल सीप में पड़ने से मुक्ता रूप से परिणत होता है, उसी प्रवाद की सूचना इस सूक्त में पाई जाती है॥ १५॥ १२ सू० में क्षत आरोग्य के लिये अरुन्धती नामक लता के उद्देश्य से यह सूक्त रचित हुआ है। इस सम्बन्ध में पञ्चम काण्ड ५म सू० में और भी एक मंत्र है। उस मंत्र में ( ५, ५, ५, ) कहा गया है—“हे अरुन्धति ! तू पलाश, अश्वत्थ, खदिर, धव प्रभृति वृक्ष के अवलम्ब से उठी है इस सू० में अरुन्धती को शिलादि और लाक्षा ( Lac ) कह 1—Born in the sky, ocean born, brought nether out of the river, this gold born shell farms a life protonging ammulet IV, 10, 4.

कर सम्बोधन किया गया है किसी २ ने कहा है कि अरुन्धती का स्वरूप नहीं मालूम होता है। अनेक लोगों ने लाक्षारूप होने से निर्देश किया है। दोनों सूक्तों में अरुन्धती क्षतरोग के आरोग्यता के लिये निर्दिष्ट हुई है । ६ ठा काण्ड १०९ सू० में पिप्पली ( Heppercam ) क्षत के आरोग्यार्थ स्तुत हुआ है। १७,१८, १९ सूक्त । ये तीन सूक्त अपामार्ग ( चिड़चिड़ी ) ( Achryranthes aspera ) नामक औषधि के उद्देश्य से रचित हुए हैं। इस अपामार्ग और इस का क्षार परवर्त्ती काल के आयुर्वेद ग्रन्थों में बहुत परिमाण से व्यवहृत हुआ है। इन तीन सूक्तों में अपामार्ग की बहुत प्रशंसा वर्णित है। प्रत्युत इसको भेषजों की राणती कह कर निर्दिष्ट की गयी है। यह भेषज सब प्रकार के दोष युक्त रोगों, दैत्य और पाप को दूर करने में समर्थ है। २० सू० इस सू० में छिंपी हुई भूत योनि आविष्कार करने के लिये मंत्र है। पहिले ही कहा गया है जो, भूत योनि को अनेक रोगों का कारण कहकर अथर्ववेद में निर्दिष्ट हुआ है। कौशिक सूत्र (२८।७) इस विषय में करणीय प्रक्रिया वर्णित है। दारिल अपनी टीका में प्रसङ्ग वश सद्- म्पुष्प व्यवहार के लिये उल्लेख किया है।

॥ पञ्चम काण्ड ॥ ४र्थ सू० “तक्षण” ( ज्वर ) ज्वर दूर करने के लिये कुष्ठ नामक वृक्ष को आह्वान किया गया है ( १म का० २५ सू० ) ५म सू०। क्षत आरोग्य कल्प में अरुन्धती की आराधना है। ४ का० १२ सू० । ) १३ सू० । सर्प विष का मंत्र षष्ठ काण्ड, १२, १३ सू० सूक्त में सर्प विष के और दो मंत्र हैं। अनेक प्रकार के सरीसृप का उल्लेख इन तीन सूक्तों में देखने में पाया जाया जाता है। जैसे—किरातन, धूसर वर्ण, कृष्णवर्ण, चाका चाग का दाग विशिष्ट इत्यादि । इस प्रसङ्ग में मधु का उल्लेख देखने में आता है। कौशिक सूत्र में ( २९।२८।२९ ) सर्प विषकी चिकित्सा में रोगी को शीघ्र मधुपान कराने की व्यवस्था दियी गयी है। २२ सू०। तक्षण—( १ म का०, २५ सू० । ) २३ सू० । शिशुओं के कृमि ( २ का०, ३१ सू० । )

॥ षष्ठ काण्ड ॥ तीसरा सू० । तक्षण ( १म का० २३ सू० । ) १२ सू० सर्प विष का मंत्र—( ५म का० २३ सू० । )