भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

आठवाँ अधिकरण : व्यसनों का निरूपण

प्रकरणाधिकरण-विभाजन ५

मर्शः ॥ १३ ॥ संहितप्रयाणिकम् ॥ १४ ॥ परिपणितापरिपणितापसृताश्च संधयः ॥ १५ ॥ द्वैधीभाविकाः संधिविक्रमाः ॥ १६ ॥ यातव्यवृत्तिः ॥ १७ ॥ अनुग्राह्यमित्रविशेषाः ॥ १८ ॥ मित्रहिरण्यभूमिकर्मसंधय ॥ १९ ॥ पाष्णिग्राहचिन्ता ॥ २० ॥ हीनशक्तिपूरणम् ॥ २१ ॥ बलवता विगृह्यो-परोधहेतवः ॥ २२ ॥ दण्डोपनतवृत्तम् ॥ २३ ॥ दण्डोपनायिवृत्तम् ॥ २४ ॥ संधिकर्म ॥ २५ ॥ संधिमोक्षः ॥ २६ ॥ मध्यमचरितम् ॥ २७ ॥ उदासीन-चरितम् ॥ २८ ॥ मण्डलचरितम् ॥ २९ ॥

इति षाड्गुण्यं सप्तममधिकरणम् ।

(१) प्रकृतिव्यसनवर्गः ॥ १ ॥ राजराज्ययोर्व्यसनचिन्ता ॥ २ ॥ पुरुष-व्यसनवर्गः ॥ ३ ॥ पीडनवर्गः ॥ ४ ॥ स्तम्भनवर्गः ॥ ५ ॥ कोशसङ्गवर्गः ॥ ६ ॥ बलव्यसनवर्गः ॥ ७ ॥ मित्रव्यसनवर्गः ॥ ८ ॥

इति व्यसनाधिकारिकमष्टममधिकरणम् ।

(२) शक्तिदेशकालबलाबलज्ञानम् ॥ १ ॥ यात्राकालाः ॥ २ ॥ बलो-पादानकालाः ॥ ३ ॥ संनाहगुणाः ॥ ४ ॥ प्रतिबलकर्म ॥ ५ ॥ पश्चात्कोप-चिन्ता ॥ ६ ॥ बाह्याभ्यन्तरप्रकृतिकोपप्रतीकारः ॥ ७ ॥ क्षयव्ययलाभ-विपरिमर्शः ॥ ८ ॥ बाह्याभ्यन्तराश्चापदः ॥ ९ ॥ दूष्यशत्रुसंयुक्ताः ॥ १० ॥


निर्णय; १२. प्रकृतियों के क्षय, लोभ और विराग के हेतु; १३. सामवायिक राजाओं का विचार; १४. मिलकर आक्रमण; १५. परिपणित, अपरिपणित और अपसृत संधि; १६. द्वैधीभाव-सम्बन्धी सन्धि और विक्रम; १७. यातव्य-सम्बन्धी व्यवहार; १८. अनुग्राह्य मित्रविशेष; १९. मित्रसंधि, हिरण्यसंधि, भूमिसंधि और कर्मसंधि; २०. पाष्णिग्राह-चिन्ता; २१. दुर्बल का शक्ति-संचय; २२. बलवान् से विरोध कर के दुर्ग-प्रवेश के कारण; २३. दंडोपनतवृत्त; २४. दंडोपनायिवृत्त; २५. सन्धकर्म; २६. सन्धि-मोक्ष; २७. मध्यम का चरित; २८. उदासीन का चरित; और २९. राजमंडल का चरित ।

आठवाँ अधिकरण : व्यसनों का निरूपण

(१) १. प्रकृतियों के व्यसन; २. राजा और राज्य के व्यसनों पर विचार; ३. सामान्य पुरुषों के व्यसन; ४. पीडनवर्ग; ५. स्तम्भनवर्ग; ६. कोषसंगवर्ग; ७. बलव्यसनवर्ग और ८. मित्रव्यसनवर्ग ।

नवाँ अधिकरण : आक्रमण का निरूपण

(२) १. शक्ति, देश और काल के बलाबल का ज्ञान; २. आक्रमण का समय; ३. सेनाओं के तैयार होने का समय; ४. सैन्य-संगठन ५. शत्रुसेना से मुकाबला; ६. पश्चात्कोपचिन्ता; ७. बाह्य और आभ्यन्तर प्रकृति के कोप का प्रतीकार; ८. क्षय, व्यय और लाभ का विचार; ९. बाह्य और आभ्यन्तर आपत्तियाँ; १०. राजद्रोही

दसवाँ अधिकरण : संग्राम का निरूपण

कौटिल्य का अर्थशास्त्र

अर्थानर्थसंशययुक्ताः ॥ ११ ॥ तासामुपायविकल्पजाः सिद्धयः ॥ १२ ॥
इत्यभियास्यत्कर्म नवममधिकरणम् ।
(१) स्कन्धावारनिवेशः ॥१॥ स्कन्धावारप्रयाणम् ॥२॥ बलव्यसना-
वस्कन्दकालरक्षणम् ॥ ३ ॥ कूटयुद्धविकल्पाः ॥ ४ ॥ स्वसैन्योत्साहनम्
॥ ५ ॥ स्वबलान्यबलव्यायोगः ॥ ६ ॥ युद्धभूमयः ॥ ७ ॥ पत्त्यश्वरथहस्ति-
कर्माणि ॥ ८ ॥ पक्षकक्षोरस्यानां बलाग्रतो व्यूहविभागः ॥ ९ ॥ सारफल्गु-
बलविभागः ॥ १० ॥ पत्त्यश्वरथहस्तियुद्धानि ॥ ११ ॥ दण्डभोगमण्डला-
संहतव्यूहव्यूहनम् ॥ १२ ॥ तस्य प्रतिव्यूहसंस्थापनम् ॥ १३ ॥
इति साङ्ग्रामिकं दशममधिकरणम् ।
(२) भेदोपादानानि ॥ १ ॥ उपांशुदण्डः ॥ २ ॥
इति सङ्घवृत्तमेकादशमधिकरणम् ।
(३) दूतकर्म ॥ १ ॥ मन्त्रयुद्धम् ॥ २ ॥ सेनामुख्यवधः ॥ ३ ॥ मण्डल-
प्रोत्साहनम् ॥ ४ ॥ शस्त्राग्निरसप्रणिधयः ॥ ५ ॥ विवधासारप्रसारवधः
॥ ६ ॥ योगातिसंधानम् ॥ ७ ॥ दण्डातिसंधानम् ॥ ८ ॥ एकविजयः ॥ ९ ॥
इत्याबलीयसं द्वादशमधिकरणम् ।


और शत्रुजन्य आपत्तियाँ; ११. अर्थ, अनर्थ तथा संशयसंबंधी आपत्तियाँ; १२. उन आपत्तियों के प्रतीकारों के उपायों से प्राप्त होनेवाली सिद्धियाँ ।

दसवाँ अधिकरण : संग्राम का निरूपण

(१) १. छावनी का निर्माण; २. छावनी का प्रयाण; ३. आपत्ति एवं आक्रमण के समय सेना की रक्षा; ४. कूटयुद्ध के भेद; ५. अपनी सेना को प्रोत्साहन; ६. अपनी और पराई सेना का प्रयोग; ७. युद्ध के योग्य भूमि; ८. पदाति, अश्व, रथ तथा हाथी आदि सेनाओं के कार्य; ९. पक्ष, कक्ष तथा उरस्य आदि विशेष व्यूहों का सेना के परिमाण के अनुसार व्यूहविभाग; १०. सार तथा फल्गु बलों का विभाग; ११. चतुरंग सेना का युद्ध; १२. दंडव्यूह, भोगव्यूह, मंडलव्यूह, असंगतव्यूह और उनके प्रकृतिव्यूह तथा विकृतिव्यूह की रचना; १३. उक्त दंडादि व्यूहों के प्रतिव्यूहों की रचना ।

ग्यारहवाँ अधिकरण : संघवृत्त-निरूपण

(२) १. भेदकप्रयोग; २. उपांशुदंड ।

बारहवाँ अधिकरण : आबलीयस का निरूपण

(३) १. दूतकर्म; २. मंत्रयुद्ध; ३. सेनापतियों का वध; ४. राजमंडल की सहायता; ५. शस्त्र, अग्नि और रथों का गूढ़ प्रयोग; ६. विवध, आसार और प्रसार का नाश; ७. योगातिसंधान; ८. दंडातिसंधान; ९. एकविजय ।

तेरहवाँ अधिकरण : दुर्गप्राप्ति का निरूपण

प्रकरणाधिकरण-विभाजन

(१) उपजापः ॥ १ ॥ योगवानम् ॥ २ ॥ अपसर्पप्रणिधिः ॥ ३ ॥ पर्युपासनकर्म ॥ ४ ॥ अवमर्दः ॥ ५ ॥ लब्धप्रशमनम् ॥ ६ ॥
इति दुर्गलम्भोपायस्त्रयोदशमधिकरणम् ।

(२) परघातप्रयोगः ॥ १ ॥ प्रलम्भनम् ॥ २ ॥ स्वबलोपघात-प्रतीकारः ॥ ३ ॥
इत्यौपनिषदं चतुर्दशमधिकरणम् ।

(३) तन्त्रयुक्तयः ॥ १ ॥
इति तन्त्रयुक्तिः पञ्चदशमधिकरणम् ।

(४) शास्त्रसमुद्देशः पञ्चदशाधिकरणानि सपञ्चाशदध्यायशतं साशीतिप्रकरणशतं षट् श्लोकसहस्राणीति ।

(५) सुखग्रहणविज्ञेयं तत्त्वार्थपदनिश्चितम् ।
कौटिल्येन कृतं शास्त्रं विमुक्तग्रन्थविस्तरम् ॥
इति प्रकरणाधिकरणसमुद्देशः ।


तेरहवाँ अधिकरण : दुर्गप्राप्ति का निरूपण

(१) १. उपजाप; २. योगवामन; ३. गुप्तचरों का शत्रुदेश में निवास; ४. शत्रु के दुर्ग को घेरना; ५. शत्रु के दुर्ग को तोड़ना; ६. जीते हुए दुर्ग में शांति कायम करना ।

चौदहवाँ अधिकरण : औपनिषदिक-निरूपण

(२) १. शत्रुवध के प्रयोग; २. प्रलंभन योग; ३. शत्रुद्वारा अपनी सेना पर किये गए घातक प्रयोगों का प्रतीकार ।

पन्द्रहवाँ अधिकरण : तंत्रयुक्ति का निरूपण

(३) तंत्रयुक्तियाँ ।

(४) इस प्रकार सम्पूर्ण कौटिलीय अर्थशास्त्र में पन्द्रह अधिकरण; एक सौ पचास अध्याय; एक सौ अस्सी प्रकरण और छह हजार श्लोक हैं ।

[ उक्त श्लोकसंख्या अक्षरों की गणना से दी गई है । बत्तीस अक्षरों का एक अनुष्टुप् छन्द होता है । यदि इस कौटिलीय अर्थशास्त्र के अक्षरों को अनुष्टुप् छन्द में बांध दिया जाय तो छह हजार श्लोक बनते हैं । ]

(५) इस अर्थशास्त्र में तत्त्वार्थ और पदों का प्रयोग किया गया है । व्यर्थ विस्तार से यह ग्रन्थ सर्वथा मुक्त है । सरलमति बालक भी इस ग्रन्थ को सुखपूर्वक समझ सकते हैं । इस अर्थशास्त्र को कौटिल्य ने बनाया है ।

प्रकरण एवं अधिकरण का निरूपण समाप्त ।

प्रकरण १# विद्यासमुद्देशः आन्वीक्षकीस्थापना
अध्याय १

(१) आन्वीक्षकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिश्चेति विद्याः। (२) त्रयी वार्ता दण्डनीतिश्चेति मानवाः। त्रयीविशेषो ह्यान्वीक्षकीति। (३) वार्ता दण्डनीतिश्चेति बार्हस्पत्याः। संवरणमात्रं हि त्रयी लोकयात्राविद इति। (४) दण्डनीतिरेका विद्येत्यौशनसाः। तस्यां हि सर्वविद्यारम्भाः प्रतिबद्ध इति। (५) चतस्र एव विद्या इति कौटिल्यः। ताभिर्धर्मार्थौ यद्विद्यात्तद्विद्यानां विद्यात्वम्। (६) साङ्ख्यं योगो लोकायतं चेत्यान्वीक्षकी। धर्माधर्मौ त्रय्यामर्थानर्थौ वार्तायां नयापनयौ दण्डनीत्याम्। बलाबले चैतासां हेतुभिरन्वीक्षमाणा-


विद्या-विषयक विचार : आन्वीक्षकी

( १ ) आन्वीक्षकी, त्रयी, वार्ता और दण्डनीति—ये चार विद्यायें हैं।

( २ ) मनु सम्प्रदाय के अनुयायी आचार्य त्रयी, वार्ता और दण्डनीति, इन तीन विद्याओं को मानते हैं। उनका मत है कि आन्वीक्षकी का समावेश त्रयी के अन्तर्गत हो जाता है।

( ३ ) आचार्य बृहस्पति के अनुयायी विद्वान् केवल दो ही विद्यायें मानते हैं : वार्ता और दण्डनीति। उनके मतानुसार त्रयी तो दुनियादार (लोकयात्राविद्) लोगों की आजीविका का साधन मात्र है।

( ४ ) शुक्राचार्य के अनुयायी विद्वानों ने तो केवल दण्डनीति को ही विद्या माना है, और उसी को सम्पूर्ण विद्याओं का स्थान एवं कारण स्वीकार किया है।

( ५ ) किन्तु आचार्य कौटिल्य उक्त चारों विद्याओं को मानते हैं और उनकी यथार्थता धर्म तथा अधर्म के ज्ञान में बताते हैं।

( ६ ) सांख्य, योग और लोकायत (नास्तिक दर्शन), ये आन्वीक्षकी विद्या के अन्तर्गत हैं। इसी प्रकार त्रयी में धर्म-अधर्म का, वार्ता में अर्थ-अनर्थ का और दण्डनीति में सुशासन-दुःशासन का ज्ञान प्रतिपादित है। त्रयी आदि विद्याओं की प्रधानता-

प्रकरण १, अध्याय १ ] आन्वीक्षकीस्थापना ९

न्वीक्षकी लोकस्योपकरोति; व्यसनेऽभ्युदये च बुद्धिमवस्थापयति; प्रज्ञा- वाक्यक्रियावैशारद्यं च करोति ।

(१) प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम् । आश्रयः सर्वधर्माणां शश्वदान्वीक्षकी मता ॥

इति कौटिलीयार्थशास्त्रे विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे विद्यासमुद्देशे आन्वीक्षकीस्थापना नाम प्रथमोऽध्यायः ।

—: ० :—


•अप्रधानता ( बलाबल ) को, भिन्न-भिन्न युक्तियों से, निर्धारित करती हुई आन्वीक्षकी विद्या लोक का उपकार करती है; सुख-दुःख से बुद्धि को स्थिर रखती है; और सोचने, विचारने, बोलने तथा कार्य करने में सक्षम बनाती है ।

( १ ) यह आन्वीक्षकी विद्या सर्वदा ही सब विद्याओं का प्रदीप, सभी कार्यों का साधन और सब धर्मों का आश्रय मानी गई है ।

विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में पहला अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

प्रकरण १# त्रयीस्थापना
अध्याय २

(१) सामर्ग्यजुर्वेदास्त्रयस्त्रयी । अथर्ववेदेतिहासवेदौ च वेदाः । शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दोविचितिज्योतिषमिति चाङ्गानि ।

(२) एष त्रयीधर्मश्चतुर्णां वर्णानामाश्रमाणां च स्वधर्मस्थापनादौपकारिकः ।

(३) स्वधर्मो ब्राह्मणस्याध्ययनमध्यापनं यजनं याजनं दानं प्रतिग्रहश्चेति । क्षत्रियस्याध्ययनं यजनं दानं शस्त्राजीवो भूतरक्षणं च । वैश्यस्याध्ययनं यजनं दानं कृषिपाशुपाल्ये वणिज्या च । शूद्रस्य द्विजातिशुश्रूषा वार्त्ता कारुकुशीलवकर्म च ।

(४) गृहस्थस्य स्वकर्माजीवस्तुल्यैरसमानर्षिभिर्विवाह्यमृतुगामित्वं देवपित्रतिथिभृत्येषु त्यागः शेषभोजनं च ।

(५) ब्रह्मचारिणः स्वाध्यायोऽग्निकार्याभिषेकौ भैक्षव्रतत्वमाचार्ये प्राणान्तिकी वृत्तिस्तदभावे गुरुपुत्रे सब्रह्मचारिणि वा ।


विद्या-विषयक विचार : त्रयी

(१) साम, ऋक् तथा यजु, इन तीनों वेदों का समन्वित नाम ही त्रयी (तीनों वेद) है । अथर्ववेद और इतिहासवेद ही वेद कहे जाते हैं । शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्दोविचिति (विचिति=विचार, विवेक) और ज्योतिष, ये छह वेदांग हैं ।

(२) त्रयी में निरूपित यह धर्म, चारों वर्णों और चारों आश्रमों को अपने-अपने धर्म (कर्त्तव्य) में स्थिर रखने के कारण लोक का बहुत ही उपकारक है ।

(३) ब्राह्मण का धर्म अध्ययन-अध्यापन, यज्ञ-याजन और दान देना तथा दान लेना है । क्षत्रिय का धर्म है पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना, शस्त्रबल से जीविकोपार्जन करना और प्राणियों की रक्षा करना । वैश्य का धर्म पढ़ना, यज्ञ करना, दान देना; कृषिकार्य एवं पशुपालन और व्यापार करना है । इसी प्रकार शूद्र का अपना धर्म है कि वह ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य की सेवा करे; खेती, पशु-पालन तथा व्यापार करे; और शिल्प (कारीगरी), गायन, वादन एवं चारण, भाट आदि का कार्य करे ।

(४) गृहस्थ अपनी परम्परा के अनुकूल कार्यों द्वारा जीविकोपार्जन करे; सगोत्र तथा असगोत्र समाज में विवाह करे; ऋतुगामी हो; देव, पितर, अतिथि और भृत्यजनों को देकर सबसे अन्त में भोजन करे ।

(५) ब्रह्मचारी का धर्म है कि वह नियमित स्वाध्याय करे; अग्निहोत्र रचे; नित्य

प्र ० १ : अ ० २ ] त्रयीस्थापना ११

(१) वानप्रस्थस्य ब्रह्मचर्यं भूमौ शय्या जटाऽजिनधारणमग्निहोत्रा-
भिषेकौ देवतापितृतथिपूजा वन्यश्चाहारः ।
(२) परिव्राजकस्य संयतेन्द्रियत्वमनारम्भो निष्किञ्चनत्वं सङ्गत्यागो
भैक्षमनेकत्रारण्यवासो बाह्याभ्यन्तरं च शौचम् ।
(३) सर्वेषामहिंसा सत्यं शौचमनसूयाऽऽनृशंस्यं क्षमा च ।
(४) स्वधर्मः स्वर्गायानन्त्याय च । तस्यातिक्रमे लोकः सङ्करा-
दुच्छिद्येत ।
(५) तस्मात्स्वधर्मं भूतानां राजा न व्यभिचारयेत् ।
स्वधर्मं संदधानो हि प्रेत्य चेह च नन्दति ॥
(६) व्यवस्थितायर्मर्यादः कृतवर्णाश्रमस्थितिः ।
त्रय्या हि रक्षितो लोकः प्रसीदति न सीदति ॥
इति कौटीलीयार्थशास्त्रे विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे विद्यासमुद्देशे
त्रयीस्थापना द्वितीयोऽध्यायः ।

— : ० : —


स्नान करे; भिक्षाटन करे; जीवनपर्यन्त गुरु के समीप रहे; गुरु की अनुपस्थिति में गुरुपुत्र अथवा अपने किसी समान शाखाध्यायी के निकट रहे ।

( १ ) वानप्रस्थी का धर्म है : ब्रह्मचर्यपूर्वक रहना; भूमि पर शयन करना; जटा, मृगचर्म को धारण किये रहना; अग्निहोत्र तथा प्रतिदिन स्नान करना; देव, पितर एवं अभ्यागतों की सेवा-पूजा करना और वन के कन्द-मूल-फल पर निर्वाह करना ।

( २ ) संन्यासी का धर्म है : जितेन्द्रिय होना; वह किसी भी सांसारिक कार्य को न करे; निष्किञ्चन बना रहे; एकाकी रहे; प्राणरक्षा मात्र के लिए स्वल्प आहार करे; समाज में न रहे; जंगल में भी एक ही स्थान पर न रहता रहे; मन, वचन, कर्म से अपना भीतर तथा बाहर पवित्र रखे ।

( ३ ) प्रत्येक वर्ण और प्रत्येक आश्रम का धर्म है कि वह किसी भी प्रकार की हिंसा न करे; सत्य बोले; पवित्र बना रहे; किसी से ईर्ष्या न करे; दयावान् और क्षमाशील बना रहे ।

( ४ ) अपने धर्म का पालन करने से स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति होती है । उसका पालन न करने से वर्ण तथा कर्म में संकरता आ जाती है, जिससे लोक का नाश हो जाता है ।

( ५ ) इसलिए राजा का कर्तव्य है कि वह प्रजा को धर्म और कर्म मार्ग से भ्रष्ट न होने दे । अपनी प्रजा को धर्म और कर्म में प्रवृत्त रखने वाला राजा लोक और परलोक में सुखी रहता है ।

( ६ ) पवित्र आर्यमर्यादा में अवस्थित, वर्णाश्रमधर्म में नियमित और त्रयी धर्म से रक्षित प्रजा दुखी नहीं होती, सदा सुखी रहती है ।

विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में दूसरा अध्याय समाप्त ।

— : ० : —

प्रकरण १ | अध्याय ३

वार्तादण्डनीतिस्थापना


(१) कृषिपाशुपाल्ये वाणिज्या च वार्ता । धान्यपशुहिरण्यकुप्यविष्टि-प्रदानादौपकारिकी । तया स्वपक्षं परपक्षं च वशीकरोति कोशदण्डाभ्याम् ।

(२) आन्वीक्षकीत्रयीवार्तानां योगक्षेमसाधनो दण्डः । तस्य नीति-र्दण्डनीतिः । अलब्धलाभार्था; लब्धपरिरक्षणी; रक्षितविवर्धनी; वृद्धस्य तीर्थेषु प्रतिपादनी च ।

(३) तस्यामायत्ता लोकयात्रा । तस्माल्लोकयात्रार्थी नित्यमुद्यतदण्डः स्यात् । न ह्येवंविधं वशोपनयनमस्ति भूतानां यथा दण्ड इत्याचार्याः ।

(४) नेति कौटिल्यः । तीक्ष्णदण्डो हि भूतानामुद्वेजनीयः । मृदुदण्डः परिभूयते । यथार्हदण्डः पूज्यः । सुविज्ञातप्रणीतो हि दण्डः प्रजा धर्मार्थ-कामैर्योजयति ।


विद्या-विषयक विचार : वार्ता और दण्डनीति

( १ ) कृषि, पशुपालन और व्यापार, ये वार्ताविद्या के विषय हैं । यह विद्या, धान्य, पशु, हिरण्य, ताम्र आदि खनिज पदार्थ और नौकर-चाकर आदि की देने वाली परम उपकारिणी है । इसी विद्या से उपार्जित कोश और सेना के बल पर राजा स्वपक्ष तथा परपक्ष को वश में कर लेता है ।

( २ ) आन्वीक्षकी, त्रयी और वार्ता, इन सभी विद्याओं की सुख-समृद्धि दण्ड पर निर्भर है । दण्ड ( शासन ) को प्रतिपादित करने वाली नीति ही दण्डनीति कह-लाती है । वही अप्राप्त वस्तुओं को प्राप्त कराती है; प्राप्त वस्तुओं की रक्षा करती है; रक्षित वस्तुओं की वृद्धि करती है और वही संवर्द्धित वस्तुओं को समुचित कार्यों में लगाने का निर्देश करती है । उसी पर संसार की सारी लोकयात्रा निर्भर है । इस-लिए लोक को समुचित मार्ग पर ले चलने की इच्छा रखने वाला राजा सदा ही उद्यतदण्ड ( दण्ड देने के लिए प्रस्तुत ) रहे ।

( ३ ) पुरातन आचार्यों का अभिमत है कि 'दण्ड के अतिरिक्त कोई दूसरा उपाय नहीं है, जिससे सभी प्राणियों को सहज ही वश में किया जा सके' ।

( ४ ) किन्तु आचार्य कौटिल्य इस युक्ति से सहमत नहीं हैं । उनका कहना है कि 'कठोर दण्ड देने वाले राजा ( निष्ठुर शासक ) से सभी प्राणी उद्विग्न हो उठते

प्र ० १ : अ ० ३ ] वार्तादण्डनीतिस्थापना १३

(१) दुष्प्रणीतः कामक्रोधाभ्यामज्ञानाद्वानप्रस्थपरिव्राजकानपि कोपयति, किमङ्ग पुनर्गृहस्थान् । अप्रणीतो हि मात्स्यन्यायमुद्भावयति । बलीयानबलं हि ग्रसते दण्डधराभावे । तेन गुप्तः प्रभवतीति ।

(२) चतुर्वर्णाश्रमो लोको राज्ञा दण्डेन पालितः । स्वधर्मकर्माभिरतो वर्तते स्वेषु वेश्मसु ॥

इति कौटीलीयार्थशास्त्रे विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे विद्यासमुद्देशे वार्त्तास्थापना दण्डनीतिस्थापना च तृतीयोऽध्यायः ।

—: ० :—

हैं; किन्तु दण्ड में ढिलाई कर देने से भी लोक, राजा की अवहेलना करने लगता है । इसलिए राजा को समुचित दण्ड देने वाला होना चाहिए ।'

( १ ) भली भाँति सोच-समझ कर प्रयुक्त दण्ड प्रजा को धर्म, अर्थ और काम में प्रवृत्त करता है । काम-क्रोध के वशीभूत होकर अज्ञानतापूर्वक अनुचित रीति से प्रयुक्त किया हुआ दण्ड, वानप्रस्थ और परिव्राजक जैसे निःस्पृह व्यक्तियों को भी कुपित कर देता है; फिर गृहस्थलोगों पर ऐसे दण्ड की क्या प्रतिक्रिया होगी, सोचा ही नहीं जा सकता है ! इसके विपरीत, यदि दण्ड से व्यवस्था सर्वथा ही तोड़ दी जाय तो उसका कुप्रभाव यह होगा कि जैसे छोटी मछली को बड़ी मछली खा जाती है, वैसे ही बलवान् व्यक्ति, निर्बल व्यक्ति का रहना दूभर कर देगा । दण्ड-व्यवस्था के अभाव में सर्वत्र ही अराजकता फैल जाती है और निर्बल को बलवान् सताने लगता है; किन्तु दण्डधारी राजा से रक्षित दुर्बल भी बलवान् बना रहता है ।

(२) राजाकी दण्ड-व्यवस्था से रक्षित चारों वर्ण-आश्रम, सारा लोक, अपने-अपने धर्मकर्मों में प्रवृत्त होकर निरन्तर अपनी-अपनी मर्यादा पर बने रहते हैं ।

विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में तीसरा अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

प्रकरण २## वृद्ध-संयोगः
अध्याय ४

(१) तस्माद्दण्डमूलास्तिस्रो विद्याः । विनयमूलो दण्डः प्राणभृतां योगक्षेमावहः ।

(२) कृतकः स्वाभाविकश्च विनयः । क्रिया हि द्रव्यं विनयति नाद्रव्यम् । शुश्रूषाश्रवणग्रहणधारणविज्ञानोहापोहतत्त्वाभिनिविष्टबुद्धिं विद्या विनयति नेतरम् ।

(३) विद्यानां तु यथास्वमाचार्यप्रामाण्याद्विनयो नियमश्च ।

(४) वृत्तचौलकर्मा लिपिं संख्यानं चोपयुञ्जीत । वृत्तोपनयनस्त्रयीमान्वीक्षिकीं च शिष्टेभ्यः, वार्तामध्यक्षेभ्यः, दण्डनीतिं वक्तृप्रयोक्तृभ्यः ।

(५) ब्रह्मचर्यं चाषोडशाद्वर्षात् । अतो गोदानं दारकर्म च । अस्य नित्यश्च विद्यावृद्धसंयोगो विनयवृद्ध्यर्थं तन्मूलत्वाद्विनयस्य ।


वृद्धजनों की संगति

( १ ) यही कारण है कि आन्वीक्षकी, त्रयी और वार्ता, इन तीनों विद्याओं का अस्तित्व दण्डनीति पर आधारित है । शास्त्रविहित उचित रीति से प्रयुक्त दण्ड प्रजा के योगक्षेम का साधक होता है ।

( २ ) विनय ( शिक्षा ) दो प्रकार का होता है : १. कृतक ( कृत्रिम, बनावटी, नैमित्तिक ) और २. स्वाभाविक ( स्वतःसिद्ध ) । शिक्षा सुपात्र को ही योग्य बना सकती है, अपात्र को नहीं । विद्या से वही योग्य हो सकते हैं, जो कि शुश्रूषा, श्रवण, ग्रहण, धारण, विज्ञान, ऊहापोह ( तर्क-वितर्क ) में विवेक तथा बुद्धि से काम लेते हैं ।

( ३ ) विभिन्न विद्याओं के विभिन्न आचार्यों के मतानुसार ही शिष्य का शिक्षण और नियमन होना चाहिए ।

( ४ ) मुण्डन-संस्कार के बाद वर्णमाला और अङ्कमाला का अभ्यास करे । उपनयन के बाद सदाचारशील विद्वान् आचार्यों से त्रयी तथा आन्वीक्षकी, विभागीय अध्यक्षों से वार्ता और वक्ता-प्रयोक्ता विशेषज्ञों (सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव आदि के आचार्यों) से दण्डनीति की शिक्षा ग्रहण करे ।

( ५ ) सोलह वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य का पालन करे । तदनन्तर समावर्तन संस्कार ( केशान्त कर्म ) और विवाह करे । विवाह के बाद अपने विनय ( शिक्षा ) की वृद्धि

प्र० २ : अ० ४ ] वृद्ध-संयोगः १५

(१) पूर्वमहर्भागं हस्त्यश्वरथप्रहरणविद्यासु विनयं गच्छेत् । पश्चिममितिहासश्रवणे । पुराणमितिवृत्तमाख्यायिकोदाहरणं धर्मशास्त्रमर्थशास्त्रं चेतीतिहासः । शेषमहोरात्रभागमपूर्वग्रहणं गृहीतपरिचयं च कुर्यात् । अगृहीतानामाभीक्ष्ण्यश्रवणं च । (२) श्रुताद्धि प्रज्ञोपजायते; प्रज्ञाया योगो योगादात्मवत्तेति विद्यासामर्थ्यम् । (३) विद्याविनीतो राजा हि प्रजानां विनये रतः । अनन्यां पृथिवीं भुङ्क्ते सर्वभूतहिते रतः ॥

इति कौटीलीयार्थशास्त्रे विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे वृद्धसंयोगः चतुर्थोऽध्यायः ।

—: ० :—

के लिए सदा ही विद्यावृद्ध पुरुषों का सहवास करे, क्योंकि सारा विनय उन्हीं पर निर्भर है ।

( १ ) दिन का पहिला भाग हाथी, घोड़ा, रथ, अस्त्र-शस्त्र आदि विद्याओं की शिक्षा में बिताये । दिन के दूसरे भाग को इतिहास सुनने में लगाये । पुराण, इतिवृत्त, आख्यायिका, उदाहरण (मीमांसा), धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्र, ये सभी विषय इतिहास हैं । दिन और रात के बाकी बचे समय में नये ज्ञान का अर्जन और अधीत ज्ञान का मनन-चिन्तन करे । जो विषय एक बार सुनने में बुद्धिस्थ न हो सके, उसको बार-बार सुने ।

( २ ) क्योंकि शास्त्र-श्रवण से बुद्धि का विकास होता है; उससे योगशास्त्रों में रुचि और योग से आत्मबल प्राप्त होता है । यही विद्या का सुपरिणाम है ।

( ३ ) जो विद्वान् राजा प्राणिमात्र की हितकामना में लगा रहता है और प्रजा के शासन तथा शिक्षण में तत्पर रहता है, वह चिरकाल तक पृथिवी का निर्बाध शासन करता है ।

विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में चौथा अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

प्रकरण ३
अध्याय ५

इन्द्रिय-जयः अरिषड्वर्गत्यागः


(१) विद्याविनयहेतुरिन्द्रियजयः; कामक्रोधलोभमानमदहर्षत्यागात्कार्यः। कर्णत्वगक्षिजिह्वाघ्राणेन्द्रियाणां शब्दस्पर्शरूपरसगन्धेष्वविप्रतिपत्तिरिन्द्रियजयः।

(२) शास्त्रार्थानुष्ठानं वा। कृत्स्नं हि शास्त्रमिदमिन्द्रियजयः। तद्विरुद्धवृत्तिरवश्येन्द्रियश्चातुरन्तोऽपि राजा सद्यो विनश्यति। यथा दाण्डक्यो नाम भोजः कामाद् ब्राह्मणकन्यामभिमन्यमानः सबन्धुराष्ट्रो विननाश। करालश्च वैदेहः। कोपाज्जनमेजया ब्राह्मणेपु विक्रान्तस्तालजङ्घश्च भृगुषु। लोभादैलश्चातुर्वर्ण्यमत्याहारयमाणः सौवीरश्चाजबिन्दुः। मानाद्रावणः परदारानप्रयच्छन्। दुर्योधनो राज्याद्देशं च। मदाद् दम्भोद्भवो भूताव-


काम-क्रोधादि छह शत्रुओं का परित्याग

( १ ) विद्या और विनय का हेतु इन्द्रियजय है; अतः काम, क्रोध, लोभ, मान, मद और हर्ष के त्याग से इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करनी चाहिए। कान, त्वचा, नेत्र, जीभ और नासिका को उनके विषयों : शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध में प्रवृत्त न होने देना ही इन्द्रियजय कहलाता है।

( २ ) अथवा शास्त्रों में प्रतिपादित कर्तव्यों के सम्यक् अनुष्ठान को ही इन्द्रियजय कहते हैं। सारे शास्त्रों का मूल कारण इन्द्रियजय है। शास्त्रविहित कर्तव्यों के विपरीत आचरण करने वाला इन्द्रिय-लोलुप राजा सारी पृथिवी का अधिपति होता हुआ भी शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। उदाहरणस्वरूप भोजवंशीय दाण्डक्य नामक राजा काम-वश ब्राह्मणकन्या का अपहरण करने के अपराध में, उसके पिता के शाप से, सपरिवार एवं सराष्ट्र विनष्ट हो गया। यही गति विदेह देश के राजा कराल की भी हुई। क्रोधवश राजा जनमेजय भी ब्राह्मणों से कलह कर बैठा और वह भी उनके शाप से नष्ट हो गया। इसी प्रकार भृगुवंशियों से कलह करने पर तालजंघ की भी दुर्गति हुई। लोभाभिभूत होकर इला का पुत्र पुरूरवा, चारों वर्णों से अत्याचारपूर्वक धन का अपहरण करने के कारण, उनके अभिशाप से मारा गया। यही हाल सौवीर देश के राजा अजबिन्दु का भी हुआ। अभिमानी रावण पर-पत्नी के अपहरण के अपराध से और दुर्योधन अपने भाइयों को राज्य का भाग न देने के अन्याय से मारे

प्र० ३ : अ० ५ ] काम-क्रोधादि छह शत्रुओं का परित्याग १७

मानी हैहयश्चार्जुनः । हर्षाद्वातापिरगस्त्यमत्यासादयन्वृष्णिसंघश्च द्वैपायनमिति ।

(१) एते चान्ये च बहवः शत्रुषद्वर्गमाश्रिताः । सबन्धुराष्ट्रा राजानो विनेशुरजितेन्द्रियाः ॥ शत्रुषद्वर्गमुत्सृज्य जामदग्न्यो जितेन्द्रियः ।। अम्बरीषश्च नाभागो बुभुजाते चिरं महीम् ॥

इति कौटिलीयार्थशास्त्रे विनयाधिकारिके प्रथमेऽधिकरणे इन्द्रियजये अरिषड्वर्गत्यागः पञ्चमोऽध्यायः ।

—: ० :—


गये । मदोन्मत्त राजा दम्भोद्भव अपनी प्रजा का तिरस्कार करता रहा; अन्त में नर-नारायण के साथ युद्ध करते हुए वह भी विनाश को प्राप्त हुआ । इसी कारण हैहयराज अर्जुन, परशुराम के हाथ से मारा गया । हर्ष के वशीभूत होकर वातापि नाम का असुर, अगस्त्य ऋषि के साथ प्रवञ्चना करते हुए और यादवसंघ, द्वैपायन ऋषि के साथ कपट के अपराध में शापवश मृत्युमुख में जा पहुँचे ।

( १ ) कामादि छह शत्रुओं के वश में होकर, ऊपर गिनाये गए राजाओं के अतिरिक्त दूसरे भी बहुत से राजा, सबन्धु-बान्धव एवं सराज्य नष्ट हो गये । किन्तु जामदग्न्य ( परशुराम ), अम्बरीष और नाभाग ( नभाग का पुत्र ) जैसे जितेन्द्रिय राजाओं ने चिरकाल तक इस पृथिवी का निष्कण्टक राज्य भोगा ।

विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में पाँचवाँ अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

२ कौ०

प्रकरण ३
अध्याय ६# राजर्षिवृत्तम्

(१) तस्मादरिषड्वर्गत्यागेनेन्द्रियजयं कुर्वीत। वृद्धसंयोगेन प्रज्ञां, चारेण चक्षुरुत्थानेन योगक्षेमसाधनं, कार्यानुशासनेन स्वधर्मस्थापनं, विनयं विद्योपदेशेन, लोकप्रियत्वमर्थसंयोगेन, हितेन वृत्तिम्।

(२) एवं वश्येन्द्रियः परस्त्रीद्रव्याहिंसाश्च वर्जयेत्। स्वप्नं लौल्यमनृत-मुद्धतवेषत्वमनर्थसंयोगं च; अधर्मसंयुक्तमानर्थसंयुक्तं च व्यवहारम्।

(३) धर्मार्थाविरोधेन कामं सेवेत। न निःसुखः स्यात्। समं वा त्रिवर्गमन्योन्यानुबन्धम्। एको ह्यात्यासेवितो धर्मार्थकामानामात्मानमितरौ च पीडयति।


साधु-स्वभाव राजा की जीवनचर्या

(१) इसलिए, काम-क्रोधादि छहों शत्रुओं का सर्वथा परित्याग करके इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करे। विद्वान् पुरुषों की सङ्गति में रहकर बुद्धि का विकास करे। गुप्तचरों द्वारा स्वराष्ट्र एवं परराष्ट्र के वृत्तान्त को अवगत करे। उद्योग के द्वारा राज्य के योग-क्षेम का सम्पादन करे। राजकीय नियमों द्वारा अपने-अपने धर्म पर दृढ़ बने रहने के लिए प्रजा पर नियन्त्रण रखे। शिक्षा के प्रचार-प्रसार से प्रजा को विनम्र और शिक्षित बनावे। प्रजाजनों को धन-सम्मान प्रदान कर अपनी लोकप्रियता को बनाये रखे। दूसरों का हित करने में उत्सुक रहे।

(२) इस प्रकार इन्द्रियों को वश में रखता हुआ वह (राजा) पराई स्त्री, पराया धन और हिंसाप्रवृत्ति को सर्वथा त्याग दे। कुसमय शयन करना, चञ्चलता, झूठ बोलना, अविनीत वृत्ति बनाये रखना, इस प्रकार के आचरणों को और इस प्रकार के आचरण वाले लोगों की सङ्गति को वह छोड़ दे। उसको चाहिए कि वह अधर्माचरण और अनर्थकारी व्यवहार का भी परित्याग कर दे।

(३) काम का भी वह सेवन करे; किन्तु उससे धर्म और अर्थ को किसी प्रकार की क्षति न पहुँचे। सर्वथा सुखरहित जीवन-यापन न करे। परस्पर अनुबद्ध धर्म, अर्थ और काम, इस त्रिवर्ग का सन्तुलित उपभोग करे। इस त्रिवर्ग का असन्तुलित उपभोग बड़ा दुःखदायी सिद्ध होता है।

विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में छठवां अध्याय समाप्त ।

प्र० ३ : अ० ६ ] राजर्षि का व्यवहार १९

(१) अर्थ एव प्रधान इति कौटिल्यः; अर्थमूलौ हि धर्मकामाविति । (२) मर्यादां स्थापयेदाचार्यानमात्यान् वा । य एनमपायस्थानेभ्यो वारयेयुः । छायानालिकाप्रतोदेन वा रहसि प्रमाद्यन्तमभितुदेयुः । (३) सहायसाध्यं राजत्वं चक्रमेकं न वर्तते । कुर्वीत सचिवांस्तस्मात्तेषां च शृणुयान्मतम् ॥

इति कौटीलीयार्थशास्त्रे विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे इन्द्रियजये राजर्षिवृत्तं षष्ठोऽध्यायः ।

—: ० :—

( १ ) आचार्य कौटिल्य का अभिमत है कि 'धर्म, अर्थ और काम, इन तीनों में अर्थ प्रधान है, धर्म और काम अर्थ पर निर्भर हैं'।

( २ ) गुरुजन और अमात्यवर्ग राजा की मर्यादा को निर्धारित करें । वे ही राजा को अनर्थकारी कार्यों से रोकते रहें । यदि वह एकान्त में प्रमाद करता हुआ बेसुध हो तो समय-सूचक यन्त्र द्वारा अथवा घंटा आदि बजाकर उसको उद्बुद्ध करें ।

( ३ ) एक पहिये की गाड़ी की भांति राजकाज भी बिना सहायता-सहयोग से नहीं चलाया जा सकता है । इसलिए राजा को चाहिए कि वह सुयोग्य अमात्यों की नियुक्ति कर उनके परामर्शों को हृदयंगम करे ।

विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में छठवां अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

प्रकरण ३# अमात्यनियुक्तिः #
अध्याय ७

(१) सहाध्यायिनोऽमात्यान् कुर्वीत, दृष्टशौचसामर्थ्यत्वादिति भारद्वाजः। ते ह्यस्य विश्वास्या भवन्तीति।

(२) नेति विशालाक्षः। सहक्रीडितत्वात् परिभवन्त्येनम्। ये ह्यस्य गुह्यसधर्मणस्तानमात्यान् कुर्वीत, समानशीलव्यसनत्वात्। ते ह्यस्य मर्मज्ञभयान्नापराध्यन्तीति।

(३) साधारण एष दोष इति पराशरः। तेषामपि मर्मज्ञभयाकृताकृतान्यनुवर्तेत।

(४) यावद्भूयो गुह्यमाचष्टे जनेभ्यः पुरुषाधिपः।
अवशः कर्मणा तेन वश्यो भवति तावताम्॥


अमात्यों की नियुक्ति

( १ ) आचार्य भारद्वाज का अभिमत है कि 'राजा, अपने सहपाठियों को अमात्य पद पर नियुक्त करे; क्योंकि उनके हृदय की पवित्रता से वह सुपरिचित होता है; उनकी कार्यक्षमता को भी वह जान चुका होता है। ऐसे ही अमात्य राजा के विश्वासपात्र होते हैं'।

( २ ) आचार्य विशालाक्ष का कहना है कि 'ऐसा उचित नहीं। एक साथ खेलने, तथा उठने-बैठने के कारण सहपाठी अमात्य राजा का तिरस्कार कर सकते हैं। इसलिए अमात्य उनको बनाना चाहिए जो कि गुप्तकार्यों में राजा का साथ देते रहे हों। समान शील और समान व्यसन होने के कारण ऐसे लोग गुप्त बातों का भेद खुल जाने के भय से, राजा का अपमान नहीं करते हैं'।

( ३ ) आचार्य पराशर के मत से आचार्य विशालाक्ष की युक्तियाँ दोषपूर्ण हैं। पराशर का कहना है कि यह बात तो दोनों ही पक्षों पर एक समान चरितार्थ होती है। ऐसा करने से यह भी तो संभव है कि गुप्त बातों का भेद खुल जाने के भय से राजा ही अमात्य की कठपुतली बन जाय ! क्योंकि :

( ४ ) राजा जिन लोगों से जितना ही अपनी गुप्त बातें प्रकट करता है, उतना ही शक्ति से क्षीण होकर वह उनके वश में हो जाता है।

प्र ० ३ : अ ० ७ ] अमात्यों की नियुक्ति २१


(१) य एनमापत्सु प्राणाबाधयुक्तास्वनुगृह्णीयुस्तानमात्यान् कुर्वीत, दृष्टानुरागत्वादिति ।

(२) नेति पिशुनः । भक्तिरेषा न बुद्धिगुणः । संख्यातार्थेषु कर्मसु नियुक्ता ये यथादिष्टमर्थं सविशेषं वा कुर्युस्तानमात्यान् कुर्वीत, दृष्टगुणत्वादिति ।

(३) नेति कौणपदन्तः । अन्यैरमात्यगुणैर्युक्ता ह्येते । पितृपैतामहानमात्यान् कुर्वीत, दृष्टापदानत्वात् । ते ह्येनमपचरन्तमपि न त्यजन्ति, सगन्धत्वात् । अमानुषेष्वपि चैतद् दृश्यते—गावो ह्यसगन्धं गोगणमतिक्रम्य सगन्धेष्वेवावतिष्ठन्ते इति ।

(४) नेति वातव्याधिः । ते ह्यस्य सर्वमपगृह्य स्वामिवत् प्रचरन्तीति । तस्मान्नीतिविदो नवानमात्यान् कुर्वीत । नवास्तु यमस्थाने दण्डधरं मन्यमाना नापराध्यन्तीति ।


( १ ) इसलिए जो पुरुष राजा की प्राणघातक आपत्तियों में रक्षा करें, उनको अमात्य नियुक्त करना चाहिए। उनके अनुराग की परीक्षा राजा कर चुका होता है ।

( २ ) आचार्य पिशुन इसको भक्ति कहते हैं । उनका कहना है कि 'प्राणों की चिन्ता न करके राजा की सहायता करना भक्ति है, सेवाधर्म है; वह बुद्धि का प्रमाण नहीं; जो कि अमात्य का सर्वोच्च गुण है । इसलिए अमात्य पद पर उन्हीं को नियुक्त करना चाहिए जो कि विशिष्ट राजकीय कार्यों पर नियुक्त होकर अपने कार्यों को विशेष योग्यता के साथ संपन्न करके दिखा दें, क्योंकि इस ढंग पर उनके बुद्धि-वैशिष्ट्य की परीक्षा हो जाती हैं' ।

( ३ ) आचार्य कौणपदन्त उक्त मत को नहीं मानते । उनका कहना है कि 'ऐसे लोग अमात्योचित गुणों से शून्य होते हैं। अमात्यपद जिनको वंश-परम्परा से उपलब्ध रहा हो, उन्हीं को इस पद पर नियुक्त करना चाहिए । वे ही उसकी सम्पूर्ण रीति-नीति से सुपरिचित होते हैं । यही कारण है कि वे अपना अपकार होने पर भी, परम्परागत सम्बन्ध के कारण राजा को नहीं छोड़ते । यह बात पशु-पक्षियों तक में देखी जाती है : गाय, अपरिचित गोष्ठ को छोड़कर परिचित गोष्ठ में ही जाकर ठहरती है' ।

( ४ ) आचार्य वातव्याधि, आचार्य कौणपदन्त के अभिमत के समर्थक नहीं हैं । उनकी मान्यता है कि 'इस प्रकार के अमात्य; राजा के सर्वस्व को अपने अधीन करके, राजा के समान स्वतन्त्र वृत्ति वाले हो जाते हैं । इसलिए नीतिकुशल राजा नये व्यक्तियों को ही अमात्य नियुक्त करे । नये अमात्य, दण्डधारी राजा को यम का दूसरा अवतार समझ कर, उसकी कभी भी अवमानना नहीं करते हैं ।'

२२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहला अधिकरण

२२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहला अधिकरण

(१) नेति बाहुदन्तीपुत्रः । शास्त्रविददृष्टकर्मा कर्मसु विषादं गच्छेत् । अभिजनप्रज्ञाशौचशौर्यानुरागयुक्तानमात्यान् कुर्वीत, गुणप्राधान्यादिति । (२) सर्वमुपपन्नमिति कौटिल्यः । कार्यसामर्थ्याद्धि पुरुषसामर्थ्यं कल्प्यते सामर्थ्यतश्च । (३) विभज्यामात्यविभवं देशकालौ च कर्म च । अमात्याः सर्व एवैते कार्याः स्युर्न तु मन्त्रिणः ॥

इति विनयाधिकारिके प्रथमाऽधिकरणेऽमात्योत्पत्तिनामकः सप्तमोऽध्यायः ।

— : ० : —


( १ ) आचार्य बाहुदन्तीपुत्र ( इन्द्र ) के मत से यह भी ठीक नहीं है । वे कहते हैं 'नीतिशास्त्रपारंगत, किन्तु क्रियात्मक अनुभव से शून्य व्यक्ति राजकार्यों को नहीं कर सकता है । इसलिए जो लोग कुलीन, बुद्धिमान, विश्वासपात्र, वीर और राज-भक्त हों, उनको अमात्य पद पर नियुक्त करना चाहिए । उनमें गुणों की प्रधानता होती है ।'

( २ ) आचार्य कौटिल्य के मतानुसार, भारद्वाज से लेकर बाहुदन्तीपुत्र तक की विचार-परम्परा, अपने-अपने स्थान पर ठीक है । 'किसी भी पुरुष के सामर्थ्य की स्थिति उसके कार्यों की सफलता पर निर्भर है, और उसकी यह कार्यक्षमता उसकी विद्या-बुद्धि के बल पर ही आँकी जा सकती है ।' इसलिए :

( ३ ) राजा को चाहिए कि वह सहपाठी आदि की भी सर्वथा अवहेलना न करे । उसके लिए वह परमावश्यक है कि वह विद्या, बुद्धि, साहस, गुण, दोष, देश, काल और पात्र का विचार करके ही अमात्यों की नियुक्ति करे; किन्तु उन्हें अपना मन्त्री कदापि न बनाये ।

विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में सातवां अध्याय समाप्त ।

— : ० : —

प्रकरण ४# मन्त्रि-पुरोहितयोर्नियुक्तिः
अध्याय ८

(१) जानपदोऽभिजातः स्ववग्रहः कृतशिल्पश्चक्षुष्मान् प्राज्ञो धारयि- ष्ण्णुर्दक्षो वाग्मी प्रगल्भः प्रतिपत्तिमानुत्साहप्रभावयुक्तः क्लेशसहः शुचिर्मैत्रो दृढभक्तिः शीलबलारोग्यसत्त्वसंयुक्तः स्तम्भचापल्यवर्जितः संप्रियो वैराणामकर्तेत्यमात्यसंपत् । अतः पादार्धगुणहीनौ मध्यमावरौ । (२) तेषां जनपदमवग्रहं चाप्ततः परीक्षेत, समानविद्येभ्यः शिल्पं शास्त्रचक्षुष्मत्तां च; कर्मारम्भेषु प्रज्ञां धारयिष्णुतां दाक्ष्यं च; कथायोगेषु वाग्मित्वं प्रागल्भ्यं प्रतिभानवत्त्वं च; आपद्युत्साहप्रभावौ क्लेशसहत्वं च; संव्यवहाराच्छौचं मैत्रतां दृढभक्तित्वं च; संवासिभ्यः शीलबलारोग्यसत्त्व- योगमस्तम्भमचापल्यं च; प्रत्यक्षतः संप्रियत्वमवैरित्वं च ।


मन्त्री और पुरोहित की नियुक्ति

मन्त्री की योग्यता :

(१) स्वदेशोत्पन्न, कुलीन, अवगुणशून्य, निपुण सवार एवं ललितकलाओं का ज्ञाता, अर्थशास्त्र का विद्वान्, बुद्धिमान्, स्मरणशक्तिसम्पन्न, चतुर, वाक्पटु, प्रगल्भ ( दबंग ), प्रतिवाद तथा प्रतिकार करने में समर्थ, उत्साही, प्रभावशाली, सहिष्णु, पवित्र, मित्रता के योग्य, दृढ़, स्वामिभक्त, सुशील, समर्थ, स्वस्थ, धैर्यवान्, निरभिमानी, स्थिरप्रकृति, प्रियदर्शी और द्वेषवृत्तिरहित पुरुष प्रधानमन्त्री पद के योग्य है। जिनमें इसके एक-चौथाई या आधी योग्यताएँ हों उन्हें मध्यम या निकृष्ट मन्त्री समझना चाहिए।

(२) मन्त्री नियुक्त करने से पूर्व राजा को चाहिए कि वह प्रामाणिक, सत्य-वादी एवं आप्त पुरुषों के द्वारा उनके निवासस्थान तथा उनकी आर्थिक स्थिति का; सहपाठियों के माध्यम से उनकी योग्यता तथा शास्त्रप्रवेश का; नये-नये कार्यों में नियुक्त कर उनकी बुद्धि, स्मृति तथा चतुराई का; व्याख्यानों एवं सभाओं के माध्यम से उनकी वाक्पटुता, प्रगल्भता एवं प्रतिभा का; आपत्तियों से उनके उत्साह, प्रभाव तथा सहिष्णुता का; व्यवहार से उनकी पवित्रता, मित्रता एवं दृढ़ स्वामिभक्ति का; सहवासियों एवं पड़ोसियों के माध्यम से उनके शील, बल, स्वास्थ्य, गौरव, अप्रमाद तथा स्थिरवृत्ति का पता लगाये और उनके मधुरभाषी स्वभाव तथा द्वेषरहित प्रकृति की परीक्षा स्वयं राजा करे।

२४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहिला अधिकरण

२४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पहिला अधिकरण

(१) प्रत्यक्षपरोक्षानुमेया हि राजवृत्तिः । स्वयंदृष्टं प्रत्यक्षं, परोपदिष्टं परोक्षं, कर्मसु कृतेनाकृतावेक्षणमनुमेयम् । यौगपद्यात्तु कर्मणामनेकत्वादने-कस्थत्वाच्च देशकालात्ययो मा भूदिति परोक्षममात्यैः कारयेदित्यमात्य-कर्म ।

(२) पुरोहितमुदितोदितकुलशीलं षडङ्गे वेदे दैवे निमित्ते दण्डनीत्यां चाभिविनीतमापदां दैवमानुषीणाम् अथर्वभिरुपायैश्च प्रतिकर्तारं कुर्वीत । तमाचार्यं शिष्यः, पितरं पुत्रो, भृत्यः स्वामिनमिव चानुवर्तेत ।

(३) ब्राह्मणेनैधितं क्षत्रं मन्त्रिमन्त्राभिमन्त्रितम् ।
जयत्यजितमत्यन्तं शास्त्रानुगतशस्त्रितम् ॥

इति विनयाधिकारिके प्रथमाधिकरणे मन्त्रिपुरोहितयोर्नियुक्तिर्नामाष्टमोऽध्यायः ।

—: ० :—

( १ ) प्रत्यक्ष, परोक्ष और अनुमेय, राजा के व्यवहार की ये तीन विधियाँ हैं । स्वयं देखा हुआ प्रत्यक्ष, दूसरों के माध्यम से जाना हुआ परोक्ष और सम्पादित कार्यों से किये जाने वाले कार्यों का अनुमान करना ही अनुमेय कहलाता है । कार्यों की विधियाँ और उनके विधान एक जैसे नहीं हैं । राजा उन कार्यों को अकेला नहीं कर सकता है । जिससे कार्यों के सम्पादन में देश-काल का अतिक्रमण न हो, एतदर्थ, अमात्यों के द्वारा परोक्षरूप से राजा उन कार्यों को कराये । इसी हेतु अमात्यों की नियुक्ति और परीक्षा के लिए ऊपर वैसा विधान किया गया है ।

पुरोहित की योग्यता :

( २ ) उच्चकुलोत्पन्न; शील-गुणसम्पन्न; वेद-वेदाङ्गों का ज्ञाता; ज्योतिषशास्त्र, शकुनशास्त्र, दण्डनीति में पारङ्गत; अथर्ववेद में निर्दिष्ट उपायों द्वारा दैवी तथा मानुषी विपत्तियों का प्रतिकार करने वाला; इन योग्यताओं से सम्पन्न पुरोहित को नियुक्त करना चाहिए । जैसे आचार्य के पीछे शिष्य, पिता के पीछे पुत्र और स्वामी के पीछे भृत्य चलता है, वैसे ही राजा को पुरोहित का अनुगामी होना चाहिए ।

( ३ ) इस प्रकार ब्राह्मण पुरोहित से संवर्धित, सर्वगुणसम्पन्न योग्य मन्त्रियों के परामर्श से अभिरक्षित और शास्त्रोक्त अनुष्ठानों का आचरण करने वाला राजकुल युद्ध के बिना भी अजेय एवं अलभ्य वस्तुओं को सहज ही में स्वायत्त कर लेता है ।

विनयाधिकारिक प्रथम अधिकरण में आठवां अध्याय समाप्त ।

—: ० :—