केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९ पद-भाष्य किमनेकानि ब्रह्मणो रूपाणि | पूर्व०-क्या ब्रह्मके बड़े और महान्त्यर्भकाणि च, येनाह दहर- | छोटे अनेकों रूप हैं, जिससे कि मेवेत्यादि ? | गुरु 'तू ब्रह्मके अल्प रूपको ही | जानता है' ऐसा कह रहे हैं ? बाढम्; अनेकानि हि | सिद्धान्ती-हाँ, नाम-रूपात्मक ब्रह्मण नामरूपोपाधिकृतानि | उपाधिके किये हुए तो ब्रह्मके अनेक औपाधिकभेद- ब्रह्मणो रूपाणि, न | रूप हैं, किन्तु स्वतः नहीं हैं। स्वतः निरूपणम् स्वतः । स्वतस्तु | तो "जो अशब्द, अस्पर्श, रूपरहित, "अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथा- | अव्यय, रसहीन, नित्य और गन्ध- रसं नित्यमगन्धवच्च यत्" ( क० | हीन है" इस श्रुतिके अनुसार उ० १ । ३ । १५, नृसिंहोत्तर० | शब्दादिके सहित उसके सभी रूपों- ९, मुक्तिक० २ । ७२ ) इति | का प्रतिषेध किया जाता है । शब्दादिभिः सह रूपाणि प्रति- | षिध्यन्ते । | पूर्व०-जिस धर्मके द्वारा जिसका ननु येनैव धर्मेण यद्रूप्यते | निरूपण किया जाता है वही उसका तदेव तस्य स्वरूपमिति ब्रह्मणोऽपि | रूप हुआ करता है; अतः ब्रह्मका भी येन विशेषेण निरूपणं तदेव | जिस विशेषणसे निरूपण होता है वही तस्य स्वरूपं स्यात् । अत उच्यते- | उसका स्वरूप होना चाहिये । अतः चैतन्यम् पृथिव्यादीनामन्य- | कहते हैं—चैतन्य पृथिवी आदिका तमस्य सर्वेषां विपरिणतानां वा | अथवा परिणामको प्राप्त हुए अन्य वाक्य-भाष्य अथवाल्पमेवास्याध्यात्मिकं | अथवा इसका इस प्रकार सम्बन्ध मनुष्येषु देवेषु च आधिदैविक- | लगाना चाहिये कि इस ब्रह्मका जो मस्य ब्रह्मणो यद्रूपं तदिति | मनुष्योंमें आध्यात्मिक और देवताओंमें सम्बन्धः । अथ न्विति हेतु- | आधिदैविक रूप है वह बहुत तुच्छ ही मीमांसायाः । यस्माद्दहरमेव सु | है। 'अथ नु' ऐसा कहकर ब्रह्मके विदितं ब्रह्मणो रूपमन्यदेव तद्विदि- | -विचारमें हेतु प्रदर्शित करते हैं। क्योंकि | 'ब्रह्म विदितसे पृथक् ही है'—ऐसा कहे | जानेके कारण ब्रह्मका अच्छी प्रकार | जाना हुआ रूप तो अल्प ही है। केनो० ३—
६० केनोपनिषद् [ खण्ड २
६० केनोपनिषद् [ खण्ड २ पद-भाष्य धर्मो न भवति, तथा श्रोत्रादी- | समस्त पदार्थोंमेंसे किसीका धर्म नहीं नामन्तःकरणस्य च धर्मो न | है और न वह श्रोत्रादि इन्द्रिय अथवा भवतीति ब्रह्मणो रूपमिति ब्रह्म | अन्तःकरणका ही धर्म है, अतएव रूप्यते चैतन्येन । तथा चोक्तम् । | वह ब्रह्मका रूप है, इसीलिये “विज्ञानमानन्दं ब्रह्म” (बृ० उ० | ब्रह्मका चैतन्यरूपसे निरूपण किया ३।९।२८) “विज्ञानघन एव” | जाता है। ऐसा ही कहा भी है— (बृ० उ० २।४।१२) “सत्यं | “ब्रह्म विज्ञान और आनन्दस्वरूप है” ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” (तै० उ० | “वह विज्ञानघन ही है” “ब्रह्म सत्य २।१।१) “प्रज्ञानं ब्रह्म” | ज्ञान और अनन्तस्वरूप है” “प्रज्ञान (ऐ० उ० ५ । ३) इति च | ब्रह्म है” इस प्रकार श्रुतियोंमें भी ब्रह्मणो रूपं निर्दिष्टं श्रुतिषु । | ब्रह्मके रूपका निरूपण किया गया है । सत्यमेवम्; तथापि तदन्तः- | सिद्धान्ती—यह ठीक है, तथापि करणदेहेन्द्रियोपाधिद्वारेणैव वि- | वह अन्तःकरण, शरीर और इन्द्रिय- रूप उपाधिके द्वारा ही विज्ञानादि ज्ञानादिशब्दैर्निर्दिश्यते, तदनु- | शब्दोंसे निरूपण किया जाता है, कारित्वाद् देहादिवृद्धिसङ्कोच- | क्योंकि देहादिके वृद्धि, संकोच, वाक्य-भाष्य तादित्युक्तत्वात्। सुवेदेति च मन्य- | और तू यह मानता ही है कि मैं उसे अच्छी सेऽतोऽल्पमेव वेत्थ त्वं ब्रह्मणो | तरह जानता हूँ। इसलिये तू ब्रह्मके अल्प स्वरूपको ही जानता है। क्योंकि ऐसी रूपं यत्साद्य नु तत्सान्मीमांस्यम् | बात है, इसलिये जबतक तुझे विदित और अविदितका प्रतिषेध करनेवाले एवाद्यापि ते तव ब्रह्म विचार्यमेव | शास्त्रवचनका अनुभव न हो तबतक तो अब भी मैं तेरे लिये ब्रह्मको मीमांसा यावद्विदिताविदितप्रतिषेधागमा- | यानी विचारके योग्य ही समझता हूँ; र्थानुभव इत्यर्थः । | यह इसका तात्पर्य है ।
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१
पद-भाष्य च्छेदादिषु नाशेषु च, न स्वतः । | उच्छेद और नाश आदिमें वह स्वतस्तु "अविज्ञातं विजानतां | उनका अनुकरण करनेवाला है; विज्ञातमविजानताम्" (के० उ० | परन्तु स्वतः वैसा नहीं है । स्वतः २।३) इति स्थितं भविष्यति । | तो वह "जाननेवालोंके लिये अज्ञात | है और न जाननेवालोंके लिये ज्ञात | है" इस प्रकार निश्चय किया जायगा । यदस्य ब्रह्मणो रूपमिति पूर्वेण | 'यदस्य' इस पदसमूहका पूर्व- सम्बन्धः । न केवलमध्यात्मो- | वर्ती 'ब्रह्मणो रूपम्' के साथ सम्बन्ध | है । तू केवल आध्यात्मिक उपाधिसे पाधिपरिच्छिन्नस्यास्य ब्रह्मणो | परिच्छिन्न हुए इस ब्रह्मके ही रूपं त्वमल्पं वेत्थ; यदप्यधि- | अल्प रूपको नहीं जानता बल्कि | अधिदैवत उपाधिसे परिच्छिन्न हुए दैवतोपाधिपरिच्छिन्नस्यास्य | इस ब्रह्मके भी जिस रूपको तू ब्रह्मणो रूपं देवेषु वेत्थ त्वम् | देवताओंमें जानता है वह भी | निश्चय तू इसके अल्प रूपको ही तदपि नूनं दहरमेव वेत्थ इति | जानता है—ऐसा मैं मानता हूँ । मन्येऽहम् । यदध्यात्मं यदपि | इसका जो अध्यात्मरूप है और जो | देवताओंमें है वह भी उपाधि- देवेषु तदपि चोपाधिपरिच्छिन्न- | परिच्छिन्न होनेके कारण दहरत्व त्वादहरत्वान्न निवर्तते । यत्तु | ( अल्पत्व ) से दूर नहीं है । किन्तु वाक्य-भाष्य मन्ये विदितमिति शिष्यस्य | 'मन्ये विदितम्' यह शिष्यकी | मीमांसा (विचार) करनेके अनन्तरकी मीमांसानन्तरोक्तिः प्रत्ययत्रय- | उक्ति है—क्योंकि ऐसा माननेपर ही | तीन प्रकारकी प्रतीतियोंकी सङ्गति सङ्गतेः । सम्यग्वस्तुनिश्चयाय | होती है । सम्यक् वस्तुके निश्चयके | लिये विचलित किये हुए शिष्यसे जब विचालितः शिष्य आचार्येण | आचार्यने कहा कि 'तुम्हारे लिये अभी मीमांस्यमेव त इति चोक्त एकान्ते | ब्रह्म विचारणीय ही है' तब शिष्यने
६२ केनोपनिषद् [ खण्ड २
६२ केनोपनिषद् [ खण्ड २ पद-भाष्य विध्वस्तसर्वोपाधिविशेषं शान्तम् | जो सम्पूर्ण उपाधि और विशेषणोंसे अनन्तमेकमद्वैतं भूमाख्यं नित्यं | रहित शान्त अनन्त एक अद्वितीय | भूमासंज्ञक नित्य ब्रह्म है वह ब्रह्म, न तत्सुवेद्यमित्यभिप्रायः। | सुगमतासे जाननेयोग्य नहीं है— | यह इसका अभिप्राय है। यत एवम् अथ नु तस्मात् | क्योंकि ऐसी बात है इसलिये मन्ये अद्यापि मीमांस्यं विचार्यमेव | अभी तो मैं तेरे लिये ब्रह्मको ते तव ब्रह्म। एवमाचार्योक्तः | विचारणीय ही समझता हूँ। शिष्य एकान्ते उपविष्टः समा- | आचार्यके ऐसा कहनेपर शिष्यने हितः सन्, यथोक्तमाचार्येण | एकान्तमें बैठकर समाहित हो आगममर्थतो विचार्य, तर्कतश्च | आचार्यके बतलाये हुए आगमको निर्धार्य, स्वानुभवं कृत्वा, | अर्थसहित विचारकर और तर्कद्वारा आचार्यसकाशमुपगम्य उवाच— | निश्चयकर आत्मानुभव करनेके मन्येऽहमथेदानीं विदितं | अनन्तर आचार्यके समीप आकर ब्रह्मेति ॥१॥ | कहा—मैं ऐसा मानता हूँ कि अब | मुझे ब्रह्म विदित हो गया है ॥ १ ॥ वाक्य-भाष्य समाहितो भूत्वा विचार्य यथोक्तं | एकान्त देशमें समाहित चित्तसे पूर्वोक्त सुपरिनिश्चितः सन्नाहागमाचा- | प्रकारसे ब्रह्मको विचारनेके अनन्तर र्यात्मानुभवप्रत्ययत्रयस्यैकविषय- | भलीभाँति निश्चय करके शास्त्र, | आचार्य और अपना अनुभव—इन त्वेन सङ्गत्यर्थम् । एवं हि सुपरि- | तीनों प्रतीतियोंकी एक ही विषयमें निश्चिता विद्या सफला स्यान्न | संगति करनेके लिये कहा [ मैं ब्रह्मको अनिश्चितेति न्यायः प्रदर्शितो | ज्ञात हुआ ही मानता हूँ ] । इससे यह | न्याय दिखलाया गया है कि इस भवति; मन्ये विदितमिति | प्रकार खूब निश्चित किया हुआ ज्ञान ही परिनिश्चितनिश्चितविज्ञानप्रतिज्ञा- | सफल होता है—अनिश्चित नहीं, क्योंकि | 'मन्ये विदितम्' इस उक्तिसे परि- हेतूकेः ॥ १ ॥ | निश्चित—निश्चित विज्ञानकी प्रतिज्ञाके | हेतुका ही प्रतिपादन किया गया है ॥१॥
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३ पद-भाष्य कथमिति, शृणु— | कैसे विदित हुआ है सो सुनिये— अनुभूतिका उल्लेख नाहं* मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च । यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥ २॥ मैं न तो यह मानता हूँ कि ब्रह्मको अच्छी तरह जान गया और न यही समझता हूँ कि उसे नहीं जानता । इसलिये मैं उसे जानता हूँ और नहीं भी जानता । हम शिष्योंमेंसे जो इस प्रकार [ उसे विदिता- विदितसे अन्य ] जानता है वही जानता है ॥ २ ॥ पद-भाष्य न अहं मन्ये सुवेदेति, नैवाहं | मैं अच्छी तरह जानता हूँ— | ऐसा नहीं मानता अर्थात् ब्रह्मको मन्ये सुवेद ब्रह्मेति । नैव तर्हि | अच्छी तरह जानता हूँ—ऐसा भी | मैं निश्चयपूर्वक नहीं मानता । 'तब विदितं त्वया ब्रह्मेत्युक्ते आह— | तो तुझे ब्रह्म विदित ही नहीं | हुआ'—ऐसा कहनेपर शिष्य कहता | है—'मैं नहीं जानता, सो भी बात नो न वेदेति वेद च । वेद | नहीं है, जानता भी हूँ । मूलके 'वेद | च' इस पदसमूहके 'च' शब्दसे 'नहीं चेति चशब्दान्न वेद च । | भी जानता' ऐसा अर्थ लेना चाहिये । वाक्य-भाष्य परिनिष्ठितं सफलं विज्ञानं | आचार्यका और अपना निश्चय | समान ही है—यह दिखलानेके लिये प्रतिजानीत आचार्यात्मनिश्चययोः | शिष्य अपने अच्छी प्रकार निश्चित | किये हुए सफल विज्ञानकी प्रतिज्ञा तुल्यतायै यस्माद्धेतुमाह नाह | करता है, क्योंकि 'नाह मन्ये सुवेद'— | ऐसा कहकर वह उसका हेतु मन्ये सुवेद इति । | बतलाता है ।
- यहाँ 'नाह' ऐसा भी पाठ है, वाक्य-भाष्य इसी पाठके अनुसार है।
६४ केनोपनिषद् [ खण्ड २
६४ केनोपनिषद् [ खण्ड २ पद-भाष्य ननु विप्रतिषिद्धं नाहं मन्ये | गुरु—'मैं ब्रह्मको अच्छी तरह जानता हूँ—ऐसा नहीं मानता' सुवेदेति, नो न वेदेति, वेद च | तथा 'मैं नहीं जानता—सो भी बात नहीं है बल्कि जानता ही हूँ' इति। यदि न मन्यसे सुवेदेति, | ऐसा कहना तो परस्पर विरुद्ध है। यदि तू यह नहीं मानता कि 'उसे कथं मन्यसे वेद चेति। अथ | अच्छी तरह जानता हूँ' तो ऐसा कैसे समझता है कि 'उसे जानता मन्यसे वेदैवेति, कथं न मन्यसे | भी हूँ' और यदि तू मानता है कि 'मैं जानता ही हूँ' तो ऐसा क्यों नहीं सुवेदेति। एकं वस्तु येन ज्ञायते, | मानता कि 'उसे अच्छी तरह जानता हूँ'। संशययुक्त और तेनैव तदेव वस्तु न सुविज्ञायत | विपरीत ज्ञानको छोड़कर एक वस्तु जिसके द्वारा जानी जाती है इति विप्रतिषिद्धं, संशयविपर्ययौ | उसीसे वही वस्तु अच्छी तरह नहीं जानी जाती—ऐसा कहना तो वर्जयित्वा। न च ब्रह्म संशयित- | ठीक नहीं है। और ऐसा भी कोई नियम नहीं बनाया जा सकता कि त्वेन ज्ञेयं विपरीतत्वेन वेति | ब्रह्म संशययुक्त अथवा विपरीतरूपसे वाक्य-भाष्य अहेत्यवधारणार्थो निपातो | 'अह' यह निश्चयार्थक निपात नैव मन्य इत्येतत्। यावद- | है। इसका यह तात्पर्य है कि मैं [ब्रह्मको अच्छी तरह जानता हूँ ] ऐसा परिनिश्चितं विज्ञानं तावत्सुवेद | मानता ही नहीं। जबतक मुझे सुष्ठु वेदाहं ब्रह्मेति विपरीतो | ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ था तबतक ही मुझे 'मैं ब्रह्मको अच्छी तरह जानता मम निश्चय आसीत् । | हूँ'—ऐसा विपरीत निश्चय था। आपके द्वारा [उस निश्चयसे ] विचलित किये स उपजगाम भवद्भिर्विचालितस्य; | जानेपर अब मेरा यह निश्चय दूर हो गया,
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५
पद-भाष्य नियन्तुं शक्यम् । संशयविप- | ही जाननेयोग्य है, क्योंकि संशय र्ययौ हि सर्वत्रानर्थकरत्वेनैव | और विपर्यय तो सर्वत्र अनर्थकारी प्रसिद्धौ । | रूपसे ही प्रसिद्ध हैं । एवमाचार्येण विचाल्य- | आचार्यद्वारा इस प्रकार विचलित मानोऽपि शिष्यो न विचचाल, | किये जानेपर भी 'वह विदितसे 'अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- | अन्य ही है और अविदितसे भी दितादधि' इत्याचार्योक्तागम- | ऊपर है' इस आचार्यके कहे हुए सम्प्रदायबलात् उपपत्त्यनुभव- | शास्त्रसम्प्रदायके बलसे तथा उपपत्ति बलाच्च; जगर्ज च ब्रह्मविद्यायां | और अपने अनुभवके बलसे शिष्य | विचलित न हुआ; बल्कि वह ब्रह्म- दृढनिश्चयतां दर्शयन्नात्मनः । | विद्यामें अपनी दृढनिश्चयता दिखलाते | हुए गर्जने लगा । किस प्रकार वाक्य-भाष्य यथोक्तार्थमीमांसाफलभूतात् | क्योंकि वह पूर्वोक्त अर्थकी मीमांसा स्वात्मब्रह्मत्वनिश्चयरूपात्सम्यक्- | (विचार) के फलस्वरूप अपने आत्मा- प्रत्ययाद्विरुद्धत्वात् । अतो नाह | के ब्रह्मत्वनिश्चयरूप सम्यक् प्रत्ययके | विरुद्ध है । अतः 'मैं अच्छी तरह मन्ये सु वेदेति । | जानता हूँ' ऐसा तो मानता ही नहीं। यस्मान्नैतन्मैव न वेद नो न वेदेति | तथा, उस ब्रह्मको मैं नहीं | जानता-ऐसा भी नहीं मानता मन्य इत्यनुवर्तते; अविदित- | क्योंकि अविदित ब्रह्मका प्रतिषेध | किया गया है। यहाँ 'नो न वेदेति' इस ब्रह्मप्रतिषेधात् । कथं तर्हि | वाक्यके आगे 'मन्ये' इस क्रिया-पदकी | अनुवृत्ति होती है। फिर यह पूछनेपर कि मन्यसे इत्युक्त आह-वेद च । | 'तुम किस प्रकार मानते हो ?' | शिष्य बोला-'वेद च' । यहाँ 'च' | शब्दसे 'वेद च न वेद च' अर्थात् चशब्दाद्वेद च न वेद चेत्यभिप्रायः | जानता भी हूँ और नहीं भी जानता-
६६ केनोपनिषद् [ खण्ड २
६६ केनोपनिषद् [ खण्ड २ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ पद-भाष्य
कथमित्युच्यते-यो यः कश्चिद् | गर्जने लगा, सो बतलाते हैं— नः अस्माकं सब्रह्मचारिणां मध्ये | ब्रह्मचारियोंके सहित 'हम शिष्योंमें तन्मदुक्तं वचनं तत्त्वतो वेद, | जो-जो मेरे कहे हुए उस वचनको स तद्ब्रह्म वेद । | तत्त्वतः जानता है—वही उस | ब्रह्मको जानता है।' किंपुनस्तद्वचनमित्यत आह— | अच्छा तो वह वचन है क्या ? | ऐसा प्रश्न करनेपर [ शिष्य ] कहता नो न वेदेति वेद च इति । | है—'मैं नहीं जानता—ऐसा भी | नहीं है, जानता भी हूँ।' जो बात यदेव 'अन्यदेव तद्विदितादथो | [ आचार्यने ] 'वह विदितसे अन्य अविदितादधि' इत्युक्तम्, तदेव | ही है और अविदितसे भी ऊपर है' | इस वाक्यद्वारा कही थी उसी वस्तु- वस्तु अनुमानानुभवाभ्यां | को अपने अनुमान और अनुभवसे
वाक्य-भाष्य
विदिताविदिताभ्यामन्यत्वाद्ब्रह्मणः | ऐसा अभिप्राय है। क्योंकि ब्रह्म विदित | और अविदित—दोनोंसे ही भिन्न है। तस्मान्मया विदितं ब्रह्मेति मन्य | अतः 'ब्रह्म मुझे विदित है—यह मानता इति वाक्यार्थः । | हूँ'—यही इस वाक्यका अर्थ है। अथवा वेद चेति नित्यविज्ञान- | अथवा 'वेद च' इसका यह | अभिप्राय है कि मैं नित्यविज्ञान-ब्रह्म- ब्रह्मस्वरूपतया नो न वेद वेदैव | स्वरूप होनेके कारण 'नहीं जानता' | —ऐसी बात नहीं है बल्कि जानता चाहं स्वरूपविक्रियाभावात् । | ही हूँ, क्योंकि अपने स्वरूपमें कोई | विकार नहीं है। तथा विशेष विज्ञान विशेषविज्ञानं च पराध्यस्तं न | भी दूसरोंका आरोपित किया हुआ ही स्वत इति परमार्थतो न च | है स्वरूपसे नहीं है—इसलिये वेदेति । | परमार्थतः नहीं भी जानता।
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७ पद-भाष्य संयोज्य निश्चितं वाक्यान्तरेण | मिलाकर निश्चित करके आचार्यकी नो न वेदेति वेद च इत्यवोचत् | बुद्धिको सम्यक् प्रकारसे बतलाने आचार्यबुद्धिसंवादार्थं मन्दबुद्धि- | और मन्दबुद्धियोंकी बुद्धिकी पहुँचसे ग्रहणव्यपोहार्थं च । तथा च | बचानेके लिये एक दूसरे वाक्यसे गर्जितमुपपन्नं भवति 'यो नस्त- | 'मैं नहीं जानता—ऐसा भी नहीं है द्वेद तद्वेद' इति ॥२॥ | जानता भी हूँ' ऐसा कहा है। ऐसा | होनेपर ही 'हममेंसे जो इस [वाक्यके | मर्म ] को जानता है वही जानता | है' यह गर्जना उचित हो सकती | है ॥ २ ॥
वाक्य-भाष्य यो नस्तद्वेद तद्वेदेति पक्षान्तर- | 'यो नस्तद्वेद तद्वेद' यह आगम निरासार्थमाम्नाय उक्तार्थानु- | उपर्युक्त अर्थका अनुवाद होनेके वादात् । यो नोऽस्माकं मध्ये स | कारण इससे अन्य पक्षोंका निषेध एव तद्ब्रह्म वेद नान्यः । उपास्य- | करनेके लिये है । हममेंसे जो ब्रह्मवित्त्वादतोऽन्यस्य यथाहं | उस ब्रह्मको इस प्रकार विदित- वेदेति । वेद चेति पक्षान्तरे ब्रह्म- | अविदितसे भिन्न जानता है वही जानता वित्त्वं निरस्यते । कुतोऽयमर्थोऽ- | है, और कोई नहीं; क्योंकि जैसा वसीयत इत्युच्यते । उक्तार्थानुवा- | मैं जानता हूँ उससे अन्य प्रकार जानने- दादुक्तं ह्यनुवदति नो न वेदेति | वाला तो उपास्य अर्थात् कार्यब्रह्मको ही वेद चेति ॥ २ ॥ | जाननेवाला है । 'वेद च' इस पदसे | अन्य पक्षवालेमें ब्रह्मवित्त्वका निरास | किया जाता है । किस कारण यह | निष्कर्ष निकाला जाता है ? सो बतलाते | हैं । ऊपर कहे हुए अर्थका अनुवाद | करनेके कारण; क्योंकि यहाँ 'नो न | वेदेति वेद च' इस वाक्यसे पूर्वोक्तका | ही अनुवाद करते हैं ॥ २ ॥
६८ केनोपनिषद् [ खण्ड २
६८ केनोपनिषद् [ खण्ड २ पद-भाष्य शिष्याचार्यसंवादात्प्रतिनिवृत्य | अब शिष्य और आचार्यके स्वेन रूपेण श्रुतिः समस्तसंवाद- | संवादसे निवृत्त होकर श्रुति समस्त निर्वृत्तमर्थमेव बोधयति-यस्या- | संवादसे सम्पन्न होनेवाले अर्थको मतमित्यादिना- | ही 'यस्यामतम्' इत्यादि अपने ही रूपसे बतलाती है— ज्ञाता अज्ञ है और अज्ञ ज्ञानी है यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः । अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥ ३ ॥ ब्रह्म जिसको ज्ञात नहीं है उसीको ज्ञात है और जिसको ज्ञात है वह उसे नहीं जानता; क्योंकि वह जाननेवालोंका बिना जाना हुआ है और न जाननेवालोंका जाना हुआ है [क्योंकि अन्य वस्तुओंके समान दृश्य न होनेसे वह विषयरूपसे नहीं जाना जा सकता] ॥ ३ ॥ पद-भाष्य यस्य ब्रह्मविदः अमतम् | जिस ब्रह्मवेत्ताका ऐसा मत— अविज्ञातम् अविदितं ब्रह्मेति | अभिप्राय अर्थात् निश्चय है कि मतम् अभिप्रायः निश्चयः, तस्य | ब्रह्म अमत—अविज्ञात यानी मतं ज्ञातं सम्यग्ब्रह्मेत्यभिप्रायः। | अविदित है उसे ब्रह्म ठीक-ठीक यस्य पुनः मतं ज्ञातं विदितं | मत अर्थात् ज्ञात हो गया है—ऐसा इसका तात्पर्य है। और जिसे 'मुझे ब्रह्म मत—ज्ञात अर्थात् विदित हो वाक्य-भाष्य यस्यामतम् इति श्रौतम् | 'यस्यामतम्' इत्यादि श्रुति-वचन आख्यायिकार्थोपसंहारार्थम् । | इस आख्यायिकाका उपसंहार करनेके शिष्याचार्योक्तिप्रत्युक्तिलक्षणया | लिये है। शिष्य और आचार्यकी अनुभवयुक्तिप्रधानया आख्यायि- | उक्ति-प्रत्युक्ति ही जिसका लक्षण है कया योऽर्थः सिद्धः स श्रौतेन | ऐसी इस अनुभव और युक्तिप्रधान आख्यायिकासे जो अर्थ सिद्ध हुआ है
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६२
पद-भाष्य मया ब्रह्मेति निश्चयः, न वेदैव | गया है'—ऐसा निश्चय है वह | जानता ही नहीं—उसे ब्रह्मका सः-न ब्रह्म विजानाति सः । | ज्ञान नहीं है । विद्वदविदुषोर्यथोक्तौ पक्षौ | अत्र 'अविज्ञातं विजानताम्' | ऐसा कहकर विद्वान् और अविद्वान्- अवधारयति—अविज्ञातं विजान- | के उपर्युक्त पक्षोंका अवधारण | ( निश्चय ) करते हैं—जाननेवालों तामिति, अविज्ञातम् अमतम् | अर्थात् भली प्रकार समझनेवालों- | को वह ब्रह्म अविज्ञात—अमत अविदितमेव ब्रह्म विजानतां | यानी अविदित ( अज्ञेय ) ही है; सम्यग्विदितवतामित्येतत् । | वाक्य-भाष्य वचनेनागमप्रधानेन निगमन- | वह सबका उपसंहार करनेवाले इस | शास्त्रप्रधान श्रौतवचनसे संक्षेपमें कहा स्थानीयेन संक्षेपत उच्यते। यदुक्तं | जाता है । जिसे वागादि इन्द्रियोंका | अविषय होनेके कारण जाने हुए विदितादन्यद्वागादीनामगोचर- | पदार्थोंसे भिन्न बतलाया था तथा | अनुभव और उपपत्तिसे भी जिसकी त्वात् मीमांसितं चानुभवोप- | मीमांसा की थी उस ब्रह्मको वैसा ही पत्तिभ्यां ब्रह्म तत्तथैव ज्ञातव्यम् । | जानना चाहिये । कस्मात् ? यस्यामतं यस्य | किस कारणसे ? [ सो बतलाते विविदिषाप्रयुक्तप्रवृत्तस्य साधकस्य | हैं—] जिज्ञासासे प्रेरित होकर प्रवृत्त | हुए जिस साधकको ब्रह्म अविज्ञात— अमतमविज्ञातमविदितं ब्रह्म | अविदित है अर्थात् आत्मतत्त्वनिश्चय- इत्यात्मतत्त्वनिश्चयफलावसानाव- | रूप फलमें पर्यवसित होनेवाले ज्ञानरूप- बोधतया विविदिषा निवृत्ता | से जिसकी जिज्ञासा निवृत्त हो गयी इत्यभिप्रायः, तस्य मतं ज्ञातं तेन | है उसीको वह विदित—ज्ञात है। विदितं ब्रह्म । येनाविषयत्वेन | तात्पर्य यह कि जिसने ब्रह्मको
७० केनोपनिषद् [ खण्ड २
७० केनोपनिषद् [ खण्ड २ पद-भाष्य विज्ञातं विदितं ब्रह्म अविजान- | तात्पर्य यह है कि इन्द्रिय, मन और ताम् असम्यग्दर्शिनाम्, इन्द्रिय- | बुद्धि, आदिमें आत्मभाव करनेवाले | असम्यग्दर्शी अज्ञानियोंके लिये ब्रह्म मनोबुद्धिष्वेवात्मदर्शिनामित्यर्थः; | विज्ञात यानी विदित (ज्ञेय) ही है।* वाक्य-भाष्य आत्मत्वेन प्रतिबुद्धमित्यर्थः। स | अविषयरूपसे आत्मभावसे जाना है सम्यग्दर्शी यस्य विज्ञानानन्त- | उसीने उसे जाना है। जिसे विज्ञानकी | प्राप्तिके अनन्तर ही सब ओर ब्रह्मात्म- रमेव ब्रह्मात्मभावस्यावसितत्वात् | भावकी प्राप्ति हो जानेके कारण सर्वतः कार्याभावो विपर्ययेण | कर्तव्यका अभाव हो जाता है वही | सम्यग्दर्शी है। इससे विपरीत समझने- मिथ्याज्ञानो भवति । कथम् ? मतं | वाला मिथ्या ज्ञानी होता है । कैसे ? | [सो कहते हैं—] जिसका ऐसा विदितं ज्ञातं मया ब्रह्मेति यस्य | विज्ञान है कि ब्रह्म मुझे विदित—ज्ञात विज्ञानं स मिथ्यादर्शी विपरीत- | अर्थात् मालूम है वह विपरीत | विज्ञानवान् मिथ्यादर्शी है, क्योंकि विज्ञानो विदितान्यत्वाद्वह्मणो | ब्रह्म विदितेसे भिन्न है; इसलिये वह न वेद स न विजानाति । | ब्रह्मको नहीं जानता—नहीं समझता । ततश्च सिद्धमवैदिकस्य विज्ञा- | इन कारणोंसे अवैदिक विज्ञानका नस्य मिथ्यात्वम्, अब्रह्मविषय- | मिथ्यात्व सिद्ध हुआ, क्योंकि वह ब्रह्म- तया निन्दितत्वात्तथा कपिल- | विषयक न होनेसे, निन्दित है । कणभुगादिसमयस्यापि विदित- | यही नहीं; कपिल और कणाद ब्रह्मविषयत्पादनवस्थिततर्कजन्य- | आदिके सिद्धान्त भी ज्ञातब्रह्मविषयक, त्वाद्द्विविदिषानिवृत्तेश्च मिथ्या- | अनवस्थिततर्कजनित और जिज्ञासाकी त्वमिति। स्मृतेश्च "या वेद- | निवृत्ति न करनेवाले होनेसे मिथ्या ही बाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च | हैं। “जो वेदबाह्य स्मृतियाँ हैं तथा
- इस वाक्यका तात्पर्य यह है कि 'जिन्हें ब्रह्मके स्वरूपका यथार्थ बोध हो गया है वे तो उसे मन-बुद्धि आदिसे अग्राह्य होनेके कारण अज्ञात यानी अज्ञेय ही मानते हैं । और जो अज्ञानी हैं वे मन-बुद्धि आदिको ही आत्मा समझनेके कारण ब्रह्मका उनके साथ अभेद समझकर यह मानने लगते हैं कि हमने उसे जान लिया है' ।
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१ पद-भाष्य न त्वत्यन्तमेवाव्युत्पन्नबुद्धी- | हाँ, जिनकी बुद्धि अत्यन्त अव्युत्पन्न नाम्। न हि तेषां विज्ञातम् | (अकुशल) है उनके लिये ऐसी अस्माभिर्ब्रह्मेति मतिर्भवति । | बात नहीं है, क्योंकि उन्हें तो | 'हमने ब्रह्मको जान लिया है' ऐसी इन्द्रियमनोबुद्ध्युपाधिष्वात्म- | बुद्धि ही नहीं होती । किन्तु जो दर्शिनां तु ब्रह्मोपाधिविवेकानु- | लोग इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदि | उपाधियोंमें आत्मभाव करनेवाले हैं पलम्भात्, बुद्ध्याद्युपाधेश्च | उन्हें तो, ब्रह्म और उपाधिके | पार्थक्यका ज्ञान न होने तथा बुद्धि वाक्य-भाष्य कुदृष्टयः । सर्वास्ता निष्फलाः | और भी जो कोई कुविचार हैं वे प्रोक्तास्तमोनिष्ठा हि ताः | सभी निष्फल कहे गये हैं और सब-के- स्मृताः” (मनु० १२ । ९५) | सब अज्ञाननिष्ठ ही माने गये हैं” इस इति विपरीतमिथ्याज्ञानयो- | स्मृतिवाक्यसे भी विपरीत ज्ञान और र्नष्टत्वादिति । | मिथ्याज्ञानको नष्ट बतलाया गया है । अविज्ञातं विजानतां विज्ञात- | 'अविज्ञातं विजानतां विज्ञातम- मविजानतामिति पूर्वहेतूक्तिरनु- | विजानताम्' यह मन्त्रके पूर्वार्धमें कहे वादस्यानर्थक्यात् । अनुवाद- | हुए अर्थका हेतु-कथन है, क्योंकि मात्रेऽनर्थकं वचनमिति पूर्वो- | उसीका अनुवाद करना तो व्यर्थ क्तयोर्यस्यामतमित्यादिना ज्ञाना- | होगा । अनुवादमात्रके लिये कोई बात ज्ञानयोर्हेत्वर्थत्वेनेदमुच्यते । | कहना कुछ अर्थ नहीं रखता, इसलिये | 'यस्यामतम्' इत्यादि पूर्व पदसे कहे अविज्ञातमविदितमात्मत्वेन | हुए ज्ञान और अज्ञानके हेतुरूपसे ही अविषयतया ब्रह्म विजानतां यस्मात् | यह कहा गया है । तस्मात्तदेव ज्ञानम्। यत्तेषां विज्ञातं | क्योंकि विज्ञानियोंको ब्रह्म आत्म- विदितं व्यक्तमेव बुद्ध्यादिविषयं | स्वरूप होनेके कारण इन्द्रियोंका विषय | न होनेसे अविज्ञात—अविदित है, | इसलिये वही ज्ञान है । और जो | अज्ञानी हैं, जो ऐसा नहीं जानते कि
७२ केनोपनिषद् [ खण्ड २
७२ केनोपनिषद् [ खण्ड २ पद-भाष्य विज्ञातत्वाद् विदितं ब्रह्मेत्युप- | आदि उपाधिके ज्ञातरूप होनेसे पद्यते भ्रान्तिरित्यतोऽसम्य- | 'ब्रह्म विदित है' ऐसी भ्रान्ति होनी ग्दर्शनं पूर्वपक्षत्वेनोपन्यस्यते— | उचित ही है । अतः यहाँ 'विज्ञात- विज्ञातमविजानतामिति । अथवा | मविजानताम्' इस वाक्यद्वारा हेत्वर्थ उत्तरार्धोऽविज्ञात- | असम्यग्दर्शनका पूर्वपक्षरूपसे उल्लेख मित्यादिः ॥३॥ | किया गया है । अथवा 'अविज्ञातं | विजानताम्' इत्यादि जो मन्त्रका | उत्तरार्द्ध है वह* हेतु-अर्थमें है ॥३॥ वाक्य-भाष्य ˙ ब्रह्माविजानतां विदिताविदित- | ज्ञात और अज्ञात पदार्थोंसे रहित, व्यावृत्तमात्मभूतं नित्यविज्ञान- | अपना आत्मा, नित्यविज्ञानस्वरूप, स्वरूपमात्मस्थमविक्रियममृतमज- | आत्मस्थ, अविक्रिय, अमृत, अजर, रमभयमनन्यत्वादविषयमित्येवम् | अभय और अनन्यरूप होनेके कारण अविजानतां बुद्ध्यादिविषया- | ब्रह्म किसी इन्द्रियका विषय नहीं है— त्मतयैव नित्यं विज्ञातं ब्रह्म । | उन्हींको ब्रह्म विज्ञात—विदित—व्यक्त तस्माद्विदिताविदितव्यक्ताव्यक्त- | अर्थात् बुद्धि आदिके विषयरूपसे ही धर्माध्यारोपेण कार्यकारणभावेन | प्रतीत होता है, उन्हें सर्वदा बुद्धि आदि- सविकल्पमयथार्थविषयत्वात् । | के विषयरूपसे ही ब्रह्मका ज्ञान है। अतः शुक्तिकादौ रजताद्यध्यारोपण- | विदित-अविदित अथवा व्यक्त-अव्यक्त ज्ञानवन्मिथ्याज्ञानं तेषाम् ॥ ३ ॥ | आदि धर्मोंके आरोपसे [ उनका जाना | हुआ ब्रह्म ] कार्य-कारणभाव रहनेसे | सविकल्प ही है क्योंकि वह अयथार्थ- | विषयक है । उनका वह ज्ञान शुक्ति | आदिमें आरोपित रजत आदि ज्ञानोंके | समान मिथ्या ही है ॥ ३ ॥ * हेतु यों समझना चाहिये—ब्रह्म अज्ञानियोंको इसलिये ज्ञात है, क्योंकि विज्ञानियोंको वह अज्ञात है ।
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३ ൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘ पद-भाष्य 'अविज्ञातं विजानताम्' | 'ब्रह्म जाननेवालोंको अविज्ञात इत्यवधृतम् । यदि ब्रह्मात्यन्तम् | है' ऐसा निश्चय हुआ । इस प्रकार एवाविज्ञातम्, लौकिकानां ब्रह्म- | यदि ब्रह्म अत्यन्त अविज्ञात ही है विदां चाविशेषः प्राप्तः । 'अवि- | तो लौकिक पुरुष और ब्रह्मवेत्ताओंमें ज्ञातं विजानताम्' इति च | कोई भेद नहीं रह जाता; इसके परस्परविरुद्धम् । कथं तु तद्ब्रह्म | सिवा 'जाननेवालोंको अविज्ञात है' सम्यग्विदितं भवतीत्येवमर्थमाह- | यह कथन परस्पर विरुद्ध भी है । | फिर वह ब्रह्म सम्यक् प्रकारसे कैसे | जाना जाता है—यही बात | बतलानेके लिये कहते हैं— विज्ञानावभासोंमें ब्रह्मकी अनुभूति प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते । आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥ ४ ॥ जो प्रत्येक बोध (बौद्ध प्रतीति) में प्रत्यगात्मरूपसे जाना गया है वही ब्रह्म है—यही उसका ज्ञान है, क्योंकि उस ब्रह्मज्ञानसे अमृतत्व- की प्राप्ति होती है । अमृतत्व अपनेहीसे प्राप्त होता है, विद्यासे तो अज्ञानान्धकारको निवृत्त करनेका सामर्थ्य मिलता है ॥ ४ ॥ पद-भाष्य प्रतिबोधविदितं बोधं बोधं | 'प्रतिबोधविदितम्' यानी जो प्रति विदितम् । बोधशब्देन बौद्धाः | बोध-बोधके प्रति विदित होता प्रत्यया उच्यन्ते । सर्वे प्रत्यया | है । यहाँ 'बोध' शब्दसे बुद्धिसे | होनेवाली प्रतीतियों (ज्ञानों) का | कथन हुआ है । अतः समस्त वाक्य-भाष्य प्रतिबोधविदितं मतम् इति | 'प्रतिबोधविदितम्' यह द्विरुक्ति है, वीप्सा प्रत्ययानामात्मावबोध- | क्योंकि प्रतीतियाँ ही आत्मज्ञानकी द्वारत्वात् । बोधं प्रति | द्वार हैं । 'बोधं प्रति बोधं प्रति' (बोध-
७४ केनोपनिषद् [ खण्ड २
७४ केनोपनिषद् [ खण्ड २ पद-भाष्य विषयीभवन्ति यस्य स आत्मा सर्व- प्रतीतियाँ जिसकी विषय होती हैं बोधान्प्रति बुध्यते । सर्वप्रत्यय- वह आत्मा समस्त बोधोंके समय जाना जाता है । सम्पूर्ण प्रतीतियों- दर्शी चिच्छक्तिस्वरूपमात्रः का साक्षी और चिच्छक्तिस्वरूपमात्र प्रत्ययैरेव प्रत्ययेष्वविशिष्टतया होनेके कारण वह प्रतीतियोंद्वारा सामान्यरूपसे प्रतीतियोंमें ही लक्षित लक्ष्यते; नान्यद्द्वारमन्तरात्मनो होता है । उस अन्तरात्माका ज्ञान विज्ञानाय । प्राप्त करनेके लिये कोई और मार्ग नहीं है । अतः प्रत्ययप्रत्यगात्मतया अतः जिस समय ब्रह्मको प्रत्ययसाक्षितया विदितं ब्रह्म यदा, प्रतीतियोंके अन्तःसाक्षीस्वरूपसे ब्रह्मणोऽभेद- तदा तन्मतं तत्- जाना जाता है उसी समय 'प्रतिपादनम् वह ज्ञात होता है; अर्थात् यही सम्यग्दर्शनमित्यर्थः उसका सम्यक् ज्ञान है । सम्पूर्ण सर्वप्रत्ययदर्शित्वे चोपजनना- प्रतीतियोंका साक्षी होनेपर ही वाक्य-भाष्य बोधं प्रतीति वीप्सा सर्वप्रत्यय- बोधके प्रति ) यह द्विरुक्ति सम्पूर्ण व्याप्त्यर्था । बौद्धा हि सर्वे प्रत्ययाः प्रतीतियोंमें [ ब्रह्मकी ] व्याप्ति सूचित करनेके लिये है । बुद्धिजनित सम्पूर्ण तप्तलोहवन्नित्यविज्ञानस्वरूपात्म- प्रतीतियाँ तपे हुए लोहेके समान नित्य विज्ञानस्वरूप आत्मासे व्याप्त रहनेके व्याप्तत्वाद् विज्ञानस्वरूपावभासाः, कारण उस विज्ञानस्वरूपसे ही अवभासित हैं तथा उनसे पृथक् उनका तदन्यावभासश्चात्मा तद्वि- अवभासक आत्मा [ लोहपिण्डमें व्याप्त हुए ] अग्निके समान उनसे सर्वथा लक्षणोऽग्निवदुपलभ्यत इति तेन विलक्षण उपलब्ध होता है । अतः वे ते द्वारीभवन्त्यात्मोपलब्धौ । बौद्ध प्रत्यय आत्माकी उपलब्धिमें द्वारस्वरूप हैं । इसलिये प्रत्येक बौद्ध तस्मात्प्रतिबोधावभासप्रत्यगात्म- प्रत्ययके अवभासमें जो प्रत्यगात्म-
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५
पद-भाष्य
पायवर्जितदृक्स्वरूपता नित्यत्वं | उसका वृद्धिक्षयशून्य साक्षित्व, विशुद्धस्वरूपत्वमात्मत्वं निर्वि- | नित्यत्व, विशुद्धस्वरूपत्व, आत्मत्व, शेषतैकत्वं च सर्वभूतेषु सिद्धं | निर्विशेषत्व और सम्पूर्ण भूतोंमें [ अनुस्यूत ] एकत्व सिद्ध हो सकता भवेत् ; लक्षणभेदाभावाद्द्योम्न | है, जिस प्रकार कि लक्षणोंमें भेद न होनेके कारण घट, पर्वत और गुहादि- इव घटगिरिगुहादिषु । विदिता- | में आकाशका अभेद है। इस प्रकार विदिताभ्यामन्यद्ब्रह्मेत्यागम- | 'ब्रह्म विदित और अविदित—दोनोंहीसे भिन्न है' इस शास्त्रवचनके वाक्यार्थ एवं परिशुद्ध एवोपसंहृतो | अर्थका ही भली प्रकार शोधन करके यहाँ उपसंहार किया गया है। इसके भवति । “दृष्टेर्द्रष्टा श्रुतेः श्रोता | सिवा “वह दृष्टिका द्रष्टा है, श्रवणका श्रोता है, मतिका मनन करने- मतेर्मन्ता विज्ञातेर्विज्ञाता” इति | वाला है और विज्ञातिका विज्ञाता है” ऐसी एक दूसरी श्रुति भी है। हि श्रुत्यन्तरम् । | [ उससे भी यही सिद्ध होता है ]।
वाक्य-भाष्य
तया यद्विदितं तद्ब्रह्म तदेव मतं | स्वरूपसे जाना जाता है वही ब्रह्म है, ज्ञातं तदेव सम्यग्ज्ञानवत्प्रत्यगा- | वही माना हुआ अर्थात् ज्ञात है तथा वही सम्यग्ज्ञानके सहित प्रत्यगात्माका त्मविज्ञानम्, न विषयविज्ञानम् । | ज्ञान है; विषयज्ञान सम्यग्ज्ञान नहीं है। आत्मत्वेन प्रत्यगात्मानमैक्ष- | ‘प्रत्यगात्माको आत्मस्वरूपसे देखा’ दिति च काठके । | ऐसा कठोपनिषद्में कहा है। ‘अमृतत्वं (आत्मज्ञानं अमृतत्व-निमित्तम्) 'अमृतत्वं हि विन्दते' | हि विन्दते’ (आत्मज्ञानसे अमरत्व ही प्राप्त होता है) यह हेतुसूचक वाक्य इति हेतुवचनम्;विपर्यये | है, क्योंकि इससे विपरीत ज्ञानसे मृत्युप्राप्तेः । विषया- | मृत्युकी प्राप्ति होती है। बुद्धि आदि त्मविज्ञाने हि मृत्युः प्रारभत | विषयोंमें आत्मत्व बोध होनेसे ही
७६ केनोपनिषद् [ खण्ड २
७६ केनोपनिषद् [ खण्ड २
पद-भाष्य यदा पुनर्बोधक्रियाकर्तेति बोध- | जिस प्रकार, जो वृक्षकी क्रियालक्षणेन तत्कर्तारं विजाना- | शाखाओंको चलायमान करता है | उसे वायु कहते हैं उसी प्रकार— तीति बोधलक्षणेन विदितं प्रति- | जिस समय 'प्रतिबोधविदितम्' | इसका ऐसा अर्थ किया जाता है बोधविदितमिति व्याख्यायते, | कि आत्मा बोधक्रियाका कर्ता है; | अतः बोधक्रियारूप लिङ्गसे उसके यथा यो वृक्षशाखाश्चालयति स | कर्ताको जानता है, इसलिये बोधरूप- | से विदित होनेके कारण वह वायुरिति तद्वत्; तदा बोधक्रिया- | 'प्रतिबोधविदितम्' कहलाता है | उस समय—आत्मा बोधक्रियारूप शक्तिमानात्मा द्रव्यम्, न बोध- | शक्तिसे युक्त एक द्रव्य सिद्ध होता है, | साक्षात् बोधस्वरूप ही सिद्ध नहीं स्वरूप एव । बोधस्तु जायते | होता । बोध ( बुद्धिगत प्रतीति ) विनश्यति च । यदा बोधो | तो उत्पन्न होता है और नष्ट भी | हो जाता है। अतः जिस समय जायते, तदा बोधक्रियया स- | बोध उत्पन्न होता है उस समय तो वाक्य-भाष्य इत्यात्मविज्ञानममृतत्वनिमित्तम् | मृत्युका आरम्भ होता है, अतः इति युक्तं हेतुवचनममृतत्वं हि | आत्मविज्ञान अमरत्वका हेतु है; | इसलिये 'अमृतत्वं हि विन्दते' यह विन्दत इति । | हेतुवचन ठीक ही है। आत्मज्ञानेन किममृतत्वमु- | पूर्व०-क्या आत्मज्ञानसे अमरत्व त्पाद्यते ? | उत्पन्न किया जाता है ? न। | सिद्धान्ती-नहीं। कथं तर्हि ? | पूर्व०-तब कैसे ? आत्मना विन्दते स्वेनैव नि- | सिद्धान्ती-अमरत्व तो आत्मासे— | अपने नित्यात्मस्वभावसे ही प्राप्त करते त्यात्मस्वभावेनामृतत्वं विन्दते । | हैं, किसीके आश्रयसे नहीं। 'विन्दते' नालम्बनपूर्वकम् । विन्दत इति | इससे यह समझना चाहिये कि उसकी
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७ पद-भाष्य विशेषः। यदा बोधो नश्यति, तदा | वह बोधक्रियारूप विशेषणसे युक्त | होता है और जब उसका नाश हो नष्टबोधो द्रव्यमात्रं निर्विशेषः। | जाता है तो वह निर्विशेष द्रव्यमात्र तत्रैवं सति विक्रियात्मकः साव- | रह जाता है। ऐसा माननेसे तो | वह विकारी, सावयव, अनित्य और यवोजनित्योऽशुद्ध इत्यादयो दोषा | अशुद्ध निश्चित होता है, और उसके न परिहर्तुं शक्यन्ते । | इन दोषोंका किसी प्रकार परिहार | नहीं किया जा सकता । यदपि काणादानाम् आत्म- | तथा वैशेषिक मतावलम्बियोंका कणादमत- मनः संयोगजो बोध | जो मत है कि 'आत्मा और मनके समीक्षा | संयोगसे उत्पन्न होनेवाला बोध आत्मनि समवैति; अतः | आत्मामें समवाय-सम्बन्धसे रहता आत्मनि बोद्धृत्वम्, न तु | है, इसीसे आत्मामें बोद्धृत्व है, विक्रियात्मक आत्मा; द्रव्य- | वस्तुतः आत्मा विकारी नहीं है, मात्रस्तु भवति घट इव रागसम- | वह तो नीलपीतादि वर्णोंके समवायी | घटके समान केवल द्रव्यमात्र है' वायी; अस्मिन् पक्षेऽप्यचेतनं | —सो इस पक्षमें भी ब्रह्म अचेतन द्रव्यमात्रं ब्रह्मेति "विज्ञान- | द्रव्यमात्र सिद्ध होता है और "ब्रह्म मानन्दं ब्रह्म" (बृ०उ० ३।९।२८) | विज्ञान एवं आनन्दस्वरूप है" वाक्य-भाष्य आत्मविज्ञानापेक्षम् । यदि हि | प्राप्ति आत्मविज्ञानकी अपेक्षा रखने- विद्योत्पाद्यममृतत्वं स्यादनित्यं | वाली है। यदि अमृतत्व विद्यासे उत्पन्न भवेत्कर्मकार्यवत् । अतो न | किया जाने योग्य होता तो कर्मफलके | समान अनित्य हो जाता। इसलिये वह विद्योत्पाद्यम् । | विद्यासे उत्पाद्य नहीं है। यदि चात्मनैवामृतत्वं विन्दते | यदि कहो कि जब अमृतत्व स्वतः | ही मिल जाता है तो विद्या उसमें क्या किं पुन्र्विद्यया क्रियत इत्युच्यते । | करती है, तो इसमें हमें यह कहना है
७८ केनोपनिषद् [ खण्ड २
७८ केनोपनिषद् [ खण्ड २ पद-भाष्य “प्रज्ञानं ब्रह्म” (ऐ० उ० ५।३) | “प्रज्ञान ब्रह्म है” इत्यादि श्रुतियाँ इत्याद्याः श्रुतयो बाधिताः स्युः । | बाधित हो जाती हैं। निरवयव होनेके आत्मनो निरवयवत्वेन प्रदेशा- | कारण आत्मामें कोई देशविशेष नहीं भावात् नित्यसंयुक्तत्वाच्च मनसः | है; और उससे मनका नित्यसंयोग है; स्मृत्युत्पत्तिनियमानुपपत्तिरपरि- | इस कारण उसमें स्मृतिकी उत्पत्तिके हार्या स्यात् । संसर्गधर्मित्वं | नियमकी अनुपपत्ति अनिवार्य हो चात्मनः श्रुतिस्मृतिन्यायविरुद्धं | जाती है तथा श्रुति, स्मृति और कल्पितं स्यात् । “असङ्गो न हि | युक्तिसे विरुद्ध आत्माके संसर्गधर्मी सज्जते” (बृ० उ० ३ । ९ । २६) | होनेकी कल्पना भी होती है। “असङ्ग “असक्तं सर्वभृत्” (गीता १३ । | [आत्मा] का किसीसे संग नहीं १४) इति हि श्रुतिस्मृती । | होता” “संगरहित और सबका पालन न्यायश्च—गुणवद्गुणवता सं- | करनेवाला है” ऐसी श्रुति और स्मृति सृज्यते, नातुल्यजातीयम् । अतः | प्रसिद्ध हैं। युक्तिसे भी जो वस्तु निर्गुणं निर्विशेषं सर्वविलक्षणं केन- | सगुण होती है उसीका गुणवान्से चिदप्यतुल्यजातीयेन संसृज्यत | संसर्ग होता है; विजातीय वस्तुओं- इत्येतत् न्यायविरुद्धं भवेत् । | का संयोग कभी नहीं होता । अतः तस्मात् नित्यालुप्तज्ञानस्वरूप- | निर्गुण निर्विशेष और सबसे विलक्षण आत्माका किसी भी विजातीय वस्तुसे संयोग होता है—ऐसा मानना न्यायविरुद्ध होगा । अतः नित्य अविनाशी ज्ञानस्वरूप प्रकाश- वाक्य-भाष्य अनात्मविज्ञानं निवर्तयन्ती सा | कि वह अनात्मविज्ञानको निवृत्त तन्निवृत्त्या स्वाभाविकस्यामृत- | करती हुई उसकी निवृत्तिके द्वारा त्वस्य निमित्तमिति कल्प्यते । | स्वाभाविक अमृतत्वकी हेतु बनती है, यत आह 'वीर्यं विद्यया विन्दते' । | क्योंकि [अगले वाक्यसे] 'विद्यासे [अज्ञानान्धकारको निवृत्त करनेका] सामर्थ्य प्राप्त होता है' ऐसा कहा भी है।