कुमारसम्भवम् (महाकवि कालिदास - संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kumarasambhavam of Kalidasa with Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / पं. सीताराम चतुर्वेदी द्वारा
( २३१ ) पर्वतराजपुत्री, रास्ते.में पहाड़ से रोकी हुई नदी की तरह न तो जा सकी और न ठहर सकी ॥ ८५ ॥ English Translation —On seeing him, the daughter of the lord of mountains, trembling, her slender body covered with perspiration and having her foot raised to step forth could neither go nor stay, like a river hampered by the obstruction of a mountain in the way 85. Purport in Sanskrit :—महादेवस्य दर्शनेन तत्स्पर्शेन च पार्वत्या देहे कम्पस्वेदस्तम्भाद्याः सात्त्विकभावाः प्रादुर्भूताः, येन सा गन्तुमुद्यताऽपि तथैव ततश्चलितुं न शशाक यथा हि निम्न- स्थलं गच्छन्ती नदी सम्मुखागतेन पर्वतेन निरुद्धाग्रे गन्तुं न प्रवर्त्तते न च प्रवाहवेगात् स्थातुमपि शक्नोति । गमनोत्सुकापि पार्वती शिवसान्निध्येन किं कर्त्तव्यविमूढा जाता ॥ ८५ ॥ अद्य प्रभृत्यवनताङ्गि तवास्मि दासः क्रीतस्तपोभिरिति वादिनि चन्द्रमौलौ । अह्नाय सा नियमजं क्लममुत्ससर्ज क्लेशः फलेन हि पुनर्नवतां विधत्ते ॥ ८६ ॥ अद्येति । चन्द्रमौलौ शिवे । हे अवनताङ्गि पार्वति अद्य प्रभृति अस्माद्दिनादारभ्येत्यर्थः । प्रभृतियोगादद्येति सप्तम्यर्थवाचिना पञ्चम्यर्थो लक्ष्यते । तव तपोभिः क्रीतः । ‘ दास् दाने ’ । दासते आत्मानं ददातीति दासः । अस्मि इति वादिनि वदति सा देवी अह्नाय सपदि । ‘ स्राग्झटित्यञ्जसाह्नाय द्राङ्मङ्क्षु सपदि द्रुतम् ’ इत्यमरः । नियमजं तपोजन्यं क्लमं क्लेशं उत्ससर्ज । फलप्राप्त्या
( २३२ ) क्लेशं विसस्मारेत्यर्थः । तथा हि क्लेशः फलेन फलसिद्ध्या पुनर्नवतां विधत्ते पूर्ववदेवाक्लिष्टतामापादयतीत्यर्थः । सफलः क्लेशो न क्लेश इति भावः ॥ ८६ ॥ Prose Order :—(हे) अवनताङ्गि अद्य प्रभृति त्वया तपोभिः क्रीतः तव दासः अस्मि, चन्द्रमौलौ इति वादिनि सा अह्नाय नियमजं क्लमं उत्ससर्ज हि क्लेशः फलेन पुनः नवतां विधत्ते ॥ ८६ ॥ Notes —अवनताङ्गि-अवनत ( नम्रं ) अङ्गं यस्याः सा अवनताङ्गी, तस्याः सम्बोधने अवनताङ्गि O one possessed of stooping limbs ( on account of the breasts ) See notes on संनतगात्रि in verse 39 अद्य—अस्मिन् अहनि अद्य today अद्य प्रभृति—from today Though अद्य has the sense of the Locative case it has been used with प्रभृति and so it gives the sense of the Ablative. See also notes on तदा प्रभृति in verse 55 क्रीतः—purchased. दासः—दासते आत्मानं ददाति इति दासः—a slave चन्द्रमौलौ —Locative of चन्द्रमौलि moon-crested God. See notes on शशिमौलि in verse 60 वादिनि—( वद् + णिनिः =वादिन् ) वदति इति वादिन्, तस्मिन् while he was speaking so. अह्नाय—झटिति at once ‘ स्राग्झटिति अञ्जसा अह्नाय द्राङ्मङ्क्षु सपदि द्रुतम् ’ इत्यमरः । नियमजं— ( नियम + √जन् + डः ) नियमात् ( व्रतात् ) जातं ( उत्पन्नं ) नियमजं Caused by penance क्लमं-श्रान्तिं fatigue. उत्स- सर्ज—तत्याज gave up ; forgot. √सृज् to create, means ‘ to leave ’ with उद् । Párvati forgot all the fatigue because she had obtained Shiva, for whom she had
( २३३ ) been practising hard penance for so many days. This action of Pārvati is supported by a general statement—क्लेशः फलेन हि पुनर्नवतां विधत्ते । क्लेशः— क्लमः fatigue , pain. फलेन—by the attainment , of fruit. पुन. —again नवतां—नूतनताम् freshness विधत्ते—करोति does √धा to put on, means ' to do ' with वि. Note that √धा is उभयपदी, so दधाति and धत्ते ( लट् ) । It means that a person forgets all about his fatigue and becomes refreshed by the attainment of the fruit of his exertion 86. CHANGE OF VOICE :—( हे ) अवनताङ्गि ! अद्य प्रभृति त्वया तपोभिः क्रीतेन ( मया ) तव दासेन भूयते ; चन्द्रमौलौ इति वादिनि तया अह्नाय नियमजः क्लमः उत्ससृजे, हि क्लेशेन फलेन पुनः नवता विधीयते ॥ ८६ ॥ HINDI TRANSLATION : —हे झुके हुये अङ्ग वाली, आज से लेकर मै तुझ से तपस्या के द्वारा मोल लिया हुआ तेरा सेवक हूँ , महादेव के इस प्रकार कहने पर वह एक दम तपस्या से हुई थकावट को भूल गई ( क्योकि ) वास्तव में फल मिल जाने से परिश्रम नवीनता उत्पन्न करता है ॥ ८६ ॥ ENGLISH TRANSLATION —O one of stooping limbs, henceforth I am thy slave, bought by thee with thy austerities '—as the moon-crested God said these words, she immediately forgot the exhaustion caused by penance ; for fatigue gives freshness by the attainment of its fruit 86
( २३४ ) PURPORT IN SANSKRIT :—शिवविषयकं पार्वत्या अचला- नुरागं स्वोपस्थित्या तदीयसात्विकभावञ्च दृष्ट्वा शिवः पार्वतीं प्राह- ' हे सुन्दरि पार्वति ! अस्माद्दिनादारभ्याहं ते सेवको जात ; अव- श्यमेवाहं ते कामनां सफलां करिष्यामि ।' शिवस्यैतत्कथनमाकर्ण्य पार्वती क्षणेनैव तपःक्लेशरहिता बभूव, यतो हि फले प्राप्ते सति तत्प्राप्त्यर्थं कृतः क्लेशो न दुःखयति ॥ ८६ ॥ इति महाकविश्रीकालिदासविरचिते कुमारसंभवे महाकाव्ये तपःफलोदयो नाम पञ्चमः सर्गः ।
U. P. INTERMEDIATE EXAMINATION PAPERS. 1937 Q. I. Translate into English or Hindi:— प्रयुक्तसत्कार विशेषमात्मना न मां परं संप्रतिपत्तुमर्हसि । यतः सतां संनतगात्रि संगतं मनीषिभिः साप्तपदीनमुच्यते ॥ A—Hindi Translation:—(तुमने) अपने आप जिसका विशेष आदर किया है ऐसे मुझको कोई दूसरा (अजनबी) मानना उचित नहीं है ; क्योंकि हे सुन्दरि बुद्धिमान लोग सज्जनों की मित्रता को सात शब्दों के बोलने (या) पैरों के चलने से होने वाली कहते हैं । English Translation :—It does not behove thee to regard me as a stranger, to whom special hospitality has been accorded by thee, for, O, one of stooping body the friendship of good people is declared by the wise to be formed after seven words have been exchanged between them (or) after seven steps have been walked together. Q. II. Write a grammatical note on साप्तपदीनम् A—सप्तानां पदानाम् समाहारः सप्तपदम् (द्विगु समासः) सप्तपदेन (सप्तभिः पदैः वा) अवाप्यते इति साप्तपदीनम् । The word पद has two meanings viz., ‘a word’ and a footstep, so the expression means ‘which is
( २३६ ) formed by uttering seven words ' or ' by walking over seven steps together' i e., friendship. The word has lost literal sense and is used for friend- ship. It is regularly formed to indicate this meaning by the Sutra "साप्तपदीनं सख्यम्"। Q. III. Explain any two of the following with reference to the context in Hindi and English or Sanskrit :— (a) क ईप्सितार्थस्थिर निश्चयं मनः पयश्च निम्नाभिमुखं प्रतीपयेत्। (b) न धर्म वृद्धेषु वयः समीक्ष्यते। Ans. (a) जब पार्वती जी ने शंकर जी को पाने के वास्ते कठोर तप करने का विचार कर लिया और अपनी माता के बहुत समझाने पर भी न माना उस समय कवि अपना यह वक्तव्य प्रकट करता है—चाही हुई वस्तु के लिये दृढ़ निश्चय वाले मन को और नीचे की ओर जाते हुये जल को कौन पलट सकता है। भाव यह है कि जिस प्रकार जल जो नीचे की ओर बह रहा है नहीं रोका जा सकता उसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति ने किसी वस्तु के पाने का दृढ़ संकल्प कर लिया है तो उसके मन को भी कोई नहीं रोक सकता। इसमें अर्थान्तरन्यास अलंकार है। when Párvati made up her mind to perform penance to get Shiva for her husband, her mother tried her best to dissuade her from her
( २३७ ) determination, but was not successful In that connection the poet makes his remark—who can turn back a mind of firm determination for ( the achievement of ) a desired object, or water flowing towards a low ground ? The sense is that as water flowing to a lower level cannot be checked similarly a mind of firm determination cannot be dissuaded from determination यदा पार्वती शिवं पति वरयितुं तप कर्तुम् च मनसि- निश्चितवती तदा तस्याः माता ताम् तस्मात् महतः मुनिव्रतात् निवारयितुं प्रयत्नं कृतवती किन्तु तस्याः श्रम व्यर्थः अभूत् । अस्मिन्नेव प्रसङ्गे कविः अर्थान्तरन्यासेन कथयति—यथा अधः गच्छन्तं जलं रोद्धुं कोऽपि न समर्थो भवति तथैव कृतदृढ़निश्चयं मनाऽपि स्वविचारात् निवारयितुं न कोऽपि समर्थः । (b) न धर्म वृद्धेषु वयः समीक्ष्यते । पार्वती ने जङ्गल में जाकर इतनी कठिन तपस्या किया कि उसको देखने के वास्ते बड़े बड़े मुनि आने लगे इसी संबंध में कवि कहता है यद्यपि पार्वती को अवस्था कम थी तो भी उसको देखने के वास्ते बड़े बड़े मुनि लोग जो आये इसका कारण यह है कि धर्म में बढ़े हुये व्यक्तियों की आयु नहीं देखी जाती । उनके गुण का आदर होता है। When Párvati went to the forest she performed such a severe penance that many sages came to see her and in that connection the poet says that it was कु० सं०—१७
This image is completely blank and contains no text to transcribe.
( २३६ ) विलोक्य वृद्धोक्षमधिष्ठितं त्वया महाजनः स्मेरमुखो भविष्यति ॥ महार्हशय्यापरिवर्तनच्युतैः स्वकेशपुष्पैरपि या स्मदूयते । अशेत सा बाहुलतोपधायिनी निषेदुषी स्थण्डिल एव केवलम् ॥ III. Explain any two of the following with reference to the context in Hindi or English (a) न कामवृत्तिर्वचनीयमीक्ष्यते (b) न रत्नमन्विष्यति मृग्यते हि तत् (c) पदं सहेत भ्रमरस्य पेलवं शिरीष पुष्पं न पुनः पतत्रिणः IV (a) Explain the formation of यदूढया and निषेदुषी in 2 a. (b) Parse प्रचक्रमे in Question I (a). Ans I (a) सा देवी पार्वती यदा यस्मिन् काले तावता तावत्प्रमाणेन पूर्वतपःसमाधिना पूर्वेणानुष्ठीयमान प्रकारेण तपोनियमेन काङ्क्षितं अभीष्टम् फलं लभ्यं लब्धुं शक्यं न अमंस्त मेने अशक्यम् अमंस्तेत्यर्थः तदा तत्काले अविलम्बेनेत्यर्थः स्वशरीरमार्दवम् स्वशरीरस्य कोमलतां मृदुत्वं वा अनपेक्ष्य अविगणय्य महत् दुस्तरं तपः चरितुं साधयितुं प्रचकमे उपचक्रमे । यदा पूर्वोक्त- प्रकारेण तप आचरंती पार्वती स्वाभीष्टसंसिद्धौ ससन्देहा जाता तदा सा निजदेहस्य मृदुत्वम् अनादृत्य कठिनतरं तपः कर्तुं निश्चितवती ।
( २४० ) (b) यदा पार्वती ब्रह्मचारिवेषधारिणम् शिवम् " इतो गमिष्यामीति कथयित्वा गन्तुमुद्यताऽभवत् तदा शिवः तां स्वरूपमास्थाय समाललम्बे । तदा तं देवं शिवम् वीक्ष्य दृष्ट्वा वेपथुमती कम्पयुक्ता सरसांगयष्टिः स्विन्नगात्री महादेवदर्शनेन देव्याः सात्त्विकभावोदय उक्तः । निक्षेप- णाय अन्यत्र विन्यासाय उद्धृतं पदम् उद्वहन्ती धारयन्ती शैलाधिराजतनया पर्वतराजकन्या मार्गाचल व्यतिकराकुलिता मार्गे अचलः तस्य व्यतिकरेण समाहत्या अवरोधेनेति यावत् आकुलिता संभ्रमिता सिन्धुः नदी इव न ययौ नागच्छन् न तस्थौ लज्ज- येतिभावः । गमनोत्सुकापि पार्वती शिवसान्निध्येन कि कर्तव्यविमूढा जाता । Ans II (a) सबसे पहले यह तुम्हारी और दूसरी हंसी होगी कि श्रेष्ठ हाथी पर चढ़ने योग्य विवाहित तुमको (शिवजी के) बुड्ढे बैल पर बैठे देखकर बडे आदमी मुस्कराने लगेंगे । Then, first of all, there will be another humiliation for thee, when great men will have smiling countenances on seeing thee, fit to be borne by a lordly elephant, riding an old bull, after marriage (b) जो अत्यधिक मूल्यवाली सेज पर करवट लेने से गिरे हुये अपने बालों के फूलों से भी कष्ट पाती थी वह अब अपनी लता के समान भुजा की तकिया लगाकर नंगी भूमि पर ही सोती और बैठती थी । She who would feel pain even by the flowers dropped down from her hair by the rollings on her
( २४१ ) costly bed slept and sat on the bare earth using her creeper-like arm as a pillow Ans III (a) जब ब्रह्मचारी का रूप धारण कर शङ्करजी ने पार्वती को बहुतेरा समझाया और अपना ( शङ्करजी का ) दोष भी उनको बताया और यह भी कहा कि ऐसे पति की इच्छा न करो तब पार्वती जी ने कहा कि अब रहने दो वाद विवाद मत करो । मैं उनके गुण व अवगुण की परवाह नहीं करती क्योंकि इच्छा के अनुसार कार्य करने वाला व्यक्ति बदनामी की परवाह नहीं करता । (b) ब्रह्मचारि वेषधारी शिव ने पार्वती से तपस्या करने का कारण पूछा । और अनेकों तर्कनायें करते हुए कहा कि यदि हे पार्वती तुम पति पाने की इच्छा से तपस्या कर रही हो तो व्यर्थ है क्योकि रत्नों की खोज लोग स्वयम् करते हैं और रत्न किसी की खोज नहीं करता । अर्थात् हे पार्वती तुम तो स्त्री हो तुम्हें पाने के वास्ते तो लोग स्वयम् प्रयत्न करेंगे तुम पति खोजने के वास्ते नाहक तपस्या कर रही हो । (c) जब पार्वती ने तपस्या करने का पूर्ण निश्चय कर लिया उस समय उनकी माता ने उनके निश्चय से उनको हटाना चाहा और उसी संबंध में समझाती हुई उन्होने कहा कि तुम्हारे कोमल शरीर तथा कठिन तपस्या में बड़ा अन्तर है। कमल का फूल भौंरे का ही बोझ संभाल सकता है पक्षियों का नहीं अर्थात् तुम तपस्या के कठिन दुःख को नहीं सहन कर सकती।
( २४२ ) VI. (a) यदूढया—यत् + ऊढया = वह + क्त + आ ( टाप् )— ऊढा तया ऊढया निषेदुषी—नि + सद् + क्वसु + ङीप् । (b) प्रचक्रमे—यह प्र पूर्वक क्रम धातु के लिट् के अन्य पुरुष का एक वचन है। प्र + क्रम् + लिट् अन्य पुरुष एकवचन । QUESTIONS 1939. I. Explain the following in Sanskrit in tika form .— (a) किमित्यपास्याभरणानि यौवने धृतंत्वया वार्धकशोभिबल्कलम् । वद प्रदोषे स्फुटचन्द्रतारका विभावरी यद्यरुणाय कल्पते ॥ or (b) अथाजिनाषाढधरः प्रगल्भवाग् ज्वलन्निव ब्रह्ममयेन तेजसा विवेश कश्चिज्जटिलस्तपोवनम् शरीरबद्धः प्रथमाश्रमो यथा II. Translate the following into English or Hindi (a) कियच्चिरं श्राम्यसि गौरि विद्यते ममापि पूर्वाश्रमसञ्चितं तपः
( २४३ ) तदर्धभागेन लभस्व काङ्क्षितं वरं तमिच्छामि च साधु वेदितुम् or (b) उवाच चैनं परमार्थतो हरं न वेत्सि नूनं यत एवमात्थ माम् अलोकसामान्यमचिन्त्यहेतुकम् द्विपन्ति मन्दाश्चरितं महात्मनाम् III Explain the following in Hindi or English. (a) क्लेश फलेन हि पुनर्नवतां विधत्ते। (b) शरीरमाद्यं खलुधर्मसाधनम् IV (a) Explain the formation of वार्धक । (b) Account for the Case in यद्यरुणाय in I (a) Ans. 1939 I (a) गुप्तवेषधारी शिवः पार्वतीं तपसः कारणं पृच्छति—हे गौरि किम् कस्माद्धेतोः यौवने युवावस्थायामेव त्वया आभरणानि अपास्य विहाय त्यक्त्वा वार्धकशोभि वृद्धस्यभावः वार्धकम् तत्रशोभत इति वार्धकशोभि वल्कलम् धृतम् प्रदोषे रजनीमुखे स्फुटाः प्रकटाश्चन्द्र- तारकाश्च यस्याः सा स्फुटचन्द्रतारका अर्थात् चन्द्रमसा तथा तारागणैः च युक्ता विभावरी रात्रिः अरुणाय सूर्यसुताय कल्पते यदि अरुणं गन्तुं कल्पते किम् वद ब्रूहि । दीप्यमानशशाङ्कतारके प्रदोषे यद्यरुण उदेति ततो विभूषणापहारेण तव वल्कलाधारणं संघटत इतिभावः।
( २४४ ) (b) अथ अनन्तरम् यदा पार्वत्या महत् तपः कृतं तदेत्यर्थः अजिनाषाढधरः अजिनं कृष्णमृगत्वक् आषाढः प्रयोजनमस्येत्याषाढः पालाशदण्डः तयोर्धरः कृष्ण- मृगत्वग्धारा तथा पालाश दण्डधारी प्रगल्भवाक् प्रगल्भावाक् यस्य सः प्रौढवचनः ब्रह्ममयेन वैदिकेन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेत्यर्थ ज्वलन् इव स्थितः कश्चिद् अनिर्दिष्टः रटिन् जटावान् ब्रह्मचारीविशेषः शरीरबद्धः शरीरवान् इत्यर्थ प्रथमाश्रमः यथा ब्रह्मचर्याश्रम इव पार्वत्याः तपोवनम् विवेश प्रविष्टवान् इत्यर्थः । II. (a) O, Gauri, how long wilt thou torture your self ? I too have religious merit accumulated in my first stage of life. Do thou get thy desired husband by (the grant of) a half of it, him, however, I desire to know well (fully)" (b) And him she thus addressed :—" Indeed, thou dost not know Shiva aright, since thou talkest thus to me The dull-witted find fault with the course of life of the magnanimous which is not in common with that of other people, and the motive of which is difficult to divine III. (a) जब पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने उनको साक्षात दर्शन दिया और कहा कि हे पार्वती आज से मैं तुम्हारा दास हो गया हूँ उस समय पार्वती
( २४५ ) बड़ी प्रसन्न हुईं और उनका सारा कष्ट दूर हो गया । क्योंकि फल मिल जाने पर ( मनोरथ सफल हो जाने पर ) सब कष्ट भूल जाता है । उसी बात को कवि ने यहां बतलाया है । (b) पार्वती जी की तपस्या से प्रसन्न होकर शङ्कर जी ब्रह्मचारी का वेष धारण कर उनके पास गये थे और उनसे सत्कार पाकर पूछने लगे कि हे पार्वती सब कुशल तो है क्योकि शरीर ही सब धर्मों का साधन है। यही बात कवि ने अर्थान्तरन्यास से कहा है। यदि शरीर कुशल रहेगा तो सभी धर्मकृत्य ठीक से हो सकेंगे। IV (a) For the formation of वार्धक see note श्लोक 44. (b) अरुणाय—'क्लृपिसंपद्यमाने च' से इसमें चतुर्थी हुई है। अर्थात् जहां पर कोई वस्तु किसी वस्तु के वास्ते पर्याप्त दिखाई जाती है वहां चतुर्थी होती है। QUESTIONS 1940. I. Explain the following in Sanskrit in tika form :— (a) शुचौ चतुर्णां ज्वलतां हविर्भुजाम् शुचिस्मिता मध्यगता सुमध्यमा विजित्य नेत्रप्रतिघातिनीं प्रभा मनन्यदृष्टि सवितारमैक्षत
( २४६ ) (b) अकिञ्चनः सन्प्रभवः स सम्पदां त्रिलोकनाथः पितृसद्मगोचरः स भीमरूपः शिव इत्युदीर्यते न सन्ति याथार्थ्यविद् पिनाकिनः II. Translate the following into English or Hindi. अद्य प्रभृत्यवनताङ्गि तवास्मि दासः क्रीतस्तपोभिरिति वादिनि चन्द्रमौलौ अह्नाय सा नियमजं क्लममुत्ससर्ज क्लेशः फलेन हि पुनर्नवतां विधत्ते । III. Explain the following in Hindi or English. (a) मनोरथानामगतिर्न विद्यते (b) द्विषन्तिमन्दाश्चरितं महात्मनाम् (c) कः करं प्रसारयेत्पन्नगरत्न सूचये । IV. Account for the case ending in चन्द्रमौलौ II (a) Ans. 1940 I (a) अस्मिन् श्लोके कविः पार्वत्याः तपस्यां वर्णयति । शुचौ ग्रीष्मर्तौ शुभिस्मिता विशदमन्दहासा सुमध्यमा शोभनकटीयुक्ता पार्वती ज्वलतां दीप्तिमतां चतुर्णाम् हविर्भुजाम् अग्नीनामूमध्यगता सती नेत्रप्रतिघातिनीं नेत्रे प्रतिहन्तीति तां नेत्रप्रतिघातिनीं प्रभां सौर्यं तेज- विजित्य अनन्यदृष्टिः न विद्यते अन्यत्रदृष्टिः यस्या सा अनन्यदृष्टि सती एकाग्रदृष्टिः सवितारम् सूर्यम् ऐक्षत ददर्श ।
( २४७ ) (b) ब्रह्मचारिमुखात् शिवस्यनिन्दां श्रुत्वा पार्वती कथयति हे वटु—सः हरः अकिञ्चन सन् निर्धनोऽपिसन् सम्पदां ऐश्वर्यस्य प्रभव कारणं पितृसद्मगोचरःसन् श्मशानाश्रयः सन् त्रिलोकनाथः त्रयाणाम् लोकानां नाथः स भीमरुपः भयङ्करकारः सन् शिवः सौम्यरुप इति उदीर्यते कथ्यने अतः पिनाकिनः हरस्य याथार्थ्य विदः यथाभूतोऽर्थो यथार्थस्तस्य भावो याथार्थ्यम् तत्वतस्य विदः न सन्ति। लोकोत्तरमहिम्ना निर्लेपस्य यथाकथंचिदवस्थानं न दोषाये तिभावः। II. " O thou of stooping limbs, hence forth I am thy Slave, bought by thy austerities "—as the Moon crested God said these words, she immediately forgot ( all ) her exhaustion caused by the austerities , for, fatigue gives fresh vigour again by the fruition ( i e. the achievement of the desired object ). III. (a) जब ब्रह्मचारी का रूप धारण कर शंकरजी पार्वती से उनकी तपस्या का कारण पूछने लगे तो पार्वती ने उनको उत्तर दिया कि हे ब्रह्मचारी मैं बड़े भारी पद को पाने की (अर्थात् शङ्कर को पाने की) इच्छा से यह तप कर रही हूँ। क्योंकि मनुष्य की इच्छायें कहाँ नहीं जा सकतीं अर्थात् मनुष्य हर एक वस्तु की इच्छा कर सकता है। पार्वती के कहने का भाव यही है कि चूंकि मनुष्य के इच्छाओं का अन्त नहीं है अतएव मैं भी शंकर जी को पति पाने की इच्छा से तपस्या कर रही हूँ।
( २४८ ) (b) जब ब्रह्मचारी शङ्कर जी की निन्दा करने लगा तो उस समय पार्वती ने कहा कि तुम शङ्कर जी को ठीक से नहीं समझते हो जो ऐसा कहते हो। क्योकि मन्द पुरुष महात्माओं के चरित्र की निंदा करते ही हैं। (c) पार्वती से तप करने का कारण पूछते हुए ब्रह्मचारी शङ्कर जी ने कहा हे पार्वती यह तो हो नहीं सकता कि किसी अपमान के कारण से तुम तपस्या कर रही हो कारण कि पिता के घर में अपमान कैसे हो सकता है। इसी बात को पुष्ट करते हुए कवि कहता है कि सर्प की मणि को कोन छू सकता है। भाव यह कि तुम्हारा अपमान करना सर्प की मणि को छूने के समान है। IV. चन्द्रमौलौ—में ‘ यस्यच भावेनभावलक्षणं से सप्तमी हुई है। QUESTIONS 1941. I Explain the following in tika form (a) विपत्प्रतीकारपरेण मङ्गलं निषेव्यते भूतिसमुत्सुकेन वा जगच्छरण्यस्य निराशिषः सतः किमेभिराशोपहतात्मवृत्तिभिः (b) अवस्तुनिर्बन्धपरे कथं नु ते करोऽयमामुक्तविवाहकौतुकः
( २४६ ) करेण शमोर्धतयीकृताहिना सहिष्यते तत्प्रथमावलम्बनम् II Translate the following into English or Hindi. (a) मुखेन सा पद्मसुगन्धिना निशि प्रवेपमानाधरपत्रशोभिना तुषारवृष्टिक्षतपद्मसम्पदाम् सराजसंधानमिवा करोदपाम् (b) अद्य प्रभृत्यवनताङ्गि तवास्मिदासः क्रीतस्तपोभिरिति वादिनिचन्द्रमौलौ अह्नाय सा नियमजं क्लममुत्ससर्ज क्लेशः फलेन हि पुनर्नवतां विधत्ते III. Explain in Hindi or English (a) भवन्तिसाम्येऽपि निविष्टचेतसाम् वपुर्विशेषेष्वतिगौरवाः क्रिया (b) अपेक्ष्यते साधुजनेन वैदिकी श्मशानशूलस्य न यूपसक्रिया IV. (a) Expound the समास in तुषारवृष्टिक्षत पद्म संपदाम् (b) Explain the formation of. शरशय, सुगन्धि, Ans. 1941 (a) यदा ब्रह्मवारी “शिवः अमङ्गलाभ्यासरतिः” इति पार्वतीमकथयत तदा सा तं ब्रह्मचारिणमकथयत—
( २५० ) विपत्प्रतीकारपरेण अनर्थपरिहारार्थिना इत्यर्थ. भूतिममुत्सुकेन वा ऐश्वर्यकामेन वा मङ्गन्नं निषेव्यते गन्धमाल्यादिकं निषेव्यते अर्थात् ये जनाः भूतिमिच्छन्ति ते मङ्गलवस्तूनि सेवन्ते किंतु जगच्छ्र रणयस्य संसार- ˙स्य यः शरणभूतोऽस्ति तस्य तथा निराशिष निरभि- लापस्य सतः शिवस्य आशोपहतात्मवृत्तिभिः आशया तृष्णया उपहता दूषितात्मवृत्तिः अन्त करणवृत्तिः येषां तेः एभिः मङ्गलैः किम् अर्थात् शिवस्तु कस्यापि वस्तुनः आशां न करोति स तु स्वयं लोकाय शरणं दातु समर्थः अतएव तस्य मङ्गलवस्तुभिः किम् । (b) पार्वतींप्रतिशिवस्य एतद्वच — अवस्तुनिर्वंधपरे अवस्तुनि तुच्छवस्तुनि निर्वेधोऽभि निवेशः पर प्रधानं यस्याः तस्याः संबुद्धि तुच्छवस्तुनि अभिलापवति आमुक्ताविवाहकौतुकः आमुक्तम् आ सञ्जितम् विवाहे यत्कौतुकं हस्तसुत्रं तद्यस्य सः ते अय करः वलयीकृतनाहिना भूषणीकृतसर्पेण शंभोः महादेवस्य करेण करणभूतेन तत्प्रथमावलम्बनं तदेव प्रथमं तत्प्रथमम् अपरिचितत्वादति भयंकरमि'तभावः तद्घलम्बन ग्रहणं चेति कथं नु सहिष्यते । कथमपिनेत्यर्थः । II. (a) By her face, which was as fragrant as the lotus ( itself ) and which shone, with the quivering leaf of the nether lip, she at night restored the ( beauty of ) lotuses to the waters ( of the stream ) the wealth of which was destroyed by the showers of snow.