महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
११८- भीष्मका अद्भुत पराक्रम करते हुए पाण्डव-सेनाका भीषण संहार ११९- कौरवपक्षके प्रमुख महारथियोंद्वारा सुरक्षित होनेपर भी अर्जुनका भीष्मको रथसे गिराना, शरशय्यापर स्थित भीष्मके समीप हंसरूपधारी ऋषियोंका आगमन एवं उनके कथनसे भीष्मका उत्तरायणकी प्रतीक्षा करते हुए प्राण धारण करना १२०- भीष्मजीकी महत्ता तथा अर्जुनके द्वारा भीष्मको तकिया देना एवं उभय पक्षकी सेनाओंका अपने शिविरमें जाना और श्रीकृष्ण-युधिष्ठिर-संवाद १२१- अर्जुनका दिव्य जल प्रकट करके भीष्मजीकी प्यास बुझाना तथा भीष्मजीका अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए दुर्योधनको संधिके लिये समझाना १२२- भीष्म और कर्णका रहस्यमय संवाद
चित्र-सूची
चित्र-सूची
सादा
१- दुर्योधन और अर्जुनका श्रीकृष्णसे युद्धके लिये सहायता माँगना २- नहुषका स्वर्गसे पतन ३- आकाशचारी भगवान् सूर्यदेव ४- विदुर और धृतराष्ट्र ५- प्रह्लादजीका न्याय ६- आत्रेय मुनि और साध्यगण ७- श्रीसनत्सुजात और महाराज धृतराष्ट्र ८- धृतराष्ट्रकी सभामें संजय पाण्डवोंका संदेश सुना रहे हैं ९- भीमसेनका बल बखानते हुए धृतराष्ट्रका विलाप १०- धृतराष्ट्रके द्वारा श्रीकृष्णका स्वागत ११- श्रीकृष्णका कौरव-सभामें प्रवेश १४- ययातिका स्वर्गारोहण १५- दुर्योधनको गान्धारीकी फटकार १६- भगवान् श्रीकृष्ण कर्णको समझा रहे हैं १७- पाण्डवोंके डेरेमें बलरामजी १८- पाण्डवोंकी विशाल सेना १९- भीष्म-दुर्योधन-संवाद २०- पाण्डव-सेनापति धृष्टद्युम्न २१- भीष्म और परशुरामके युद्धमें नारदजीद्वारा बीच-बचाव २२- शरणागत अर्जुन २३- पंचमहायज्ञ २४- अर्जुनके प्रति भगवान्का विराट्रूप-प्रदर्शन २५- भगवान्के द्वारा भक्तका संसारसागरसे उद्धार २६- चार अवस्था २७- संसार-वृक्ष २८- मोह-नाश २९- श्रीकृष्ण एवं भाइयोंसहित युधिष्ठिरका भीष्मको प्रणाम करके उनसे युद्धके लिये आज्ञा माँगना ३०- भीमसेन और भीष्मका युद्ध
३१- अभिमन्युका युद्ध-कौशल ३२- भीमसेनके बाणसे मूर्च्छित दुर्योधन ३३- अर्जुनका व्यूहबद्ध कौरव-सेनाकी ओर श्रीकृष्णका ध्यान आकृष्ट करना ३४- आकाशमें स्थित हुए घटोत्कचकी गर्जना और दुर्योधनके साथ उसका युद्ध ३५- भीष्मजीका शिखण्डीसे युद्ध न करनेकी इच्छा प्रकट करना ३६- अर्जुनका बाणद्वारा पृथ्वीसे जल प्रकट करके भीष्मजीको पिलाना
उद्योगपर्व
ॐश्रीपरमात्मने नमः
श्रीमहाभारतम्
उद्योगपर्व
| सेनोद्योगपर्व |
|---|
प्रथमोऽध्यायः
राजा विराटकी सभामें भगवान् श्रीकृष्णका भाषण
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
अन्तर्यामी नारायण स्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये।
वैशम्पायन उवाच
कृत्वा विवाहं तु कुरुप्रवीरा-
स्तदाभिमन्योर्मुदिताः स्वपक्षाः ।
विश्रम्य रात्रावुषसि प्रतीताः
सभां विराटस्य ततोऽभिजग्मुः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उस समय अभिमन्युका विवाह करके कुरुवीर पाण्डव तथा उनके अपने पक्षके लोग (यादव पांचाल आदि) अत्यन्त आनन्दित हुए। रात्रिमें विश्राम करके वे प्रातःकाल जगे और (नित्यकर्म करके) विराटकी सभामें उपस्थित हुए॥ १ ॥
सभा तु सा मत्स्यपतेः समृद्धा मणिप्रवेकोत्तमरत्नचित्रा। न्यस्तासना माल्यवती सुगन्धा तामभ्ययुस्ते नरराजवृद्धाः॥ २ ॥
मत्स्यदेशके अधिपति विराटकी वह सभा अत्यन्त समृद्धिशालिनी थी। उसमें मणियों (मोती-मूँगे आदि)-की खिड़कियाँ और झालरें लगी थीं। उसके फर्श और दीवारोंमें उत्तम-उत्तम रत्नों (हीरे-पन्ने आदि)-की पच्चीकारी की गयी थी। इन सबके कारण उसकी विचित्र शोभा हो रही थी। उस सभाभवनमें यथायोग्य स्थानोंपर आसन लगे हुए थे, जगह-जगह मालाएँ लटक रही थीं और सब ओर सुगन्ध फैल रही थी। वे श्रेष्ठ नरपतिगण उसी सभामें एकत्र हुए॥ २ ॥
अथासनान्यविशतां पुरस्ता-
दुभौ विराटद्रुपदौ नरेन्द्रौ।
वृद्धौ च मान्यौ पृथिवीपतीनां
पित्रा समं रामजनार्दनौ च ॥ ३ ॥
वहाँ सबसे पहले राजा विराट और द्रुपद आसनपर विराजमान हुए; क्योंकि वे दोनों समस्त भूपतियोंमें वृद्ध और माननीय थे। तत्पश्चात् अपने पिता वसुदेवके साथ बलराम और श्रीकृष्णने भी आसन ग्रहण किये ॥ ३ ॥
पाञ्चालराजस्य समीपतस्तु
शिनिप्रवीरः सहरौहिणेयः।
मत्स्यस्य राज्ञस्तु सुसंनिकृष्टो
जनार्दनश्चैव युधिष्ठिरश्च ॥ ४ ॥
पाञ्चालराज द्रुपदके पास शिनिवंशके श्रेष्ठ वीर सात्यकि तथा रोहिणीनन्दन बलरामजी बैठे थे और मत्स्यराज विराटके अत्यन्त निकट श्रीकृष्ण तथा युधिष्ठिर विराजमान थे ॥ ४ ॥
सुताश्च सर्वे द्रुपदस्य राज्ञो
भीमार्जुनौ माद्रवतीसुतौ च।
प्रद्युम्नसाम्बौ च युधि प्रवीरौ
विराटपुत्रैश्च सहाभिमन्युः ॥ ५ ॥
सर्वे च शूराः पितृभिः समाना
वीर्येण रूपेण बलेन चैव।
उपाविशन् द्रौपदेयाः कुमाराः
सुवर्णचित्रेषु वरासनेषु ॥ ६ ॥
राजा द्रुपदके सब पुत्र, भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव, युद्धवीर प्रद्युम्न और साम्ब, विराटके पुत्रोंसहित अभिमन्यु तथा द्रौपदीके सभी पुत्र सुवर्णजटित सुन्दर सिंहासनोंपर आसपास ही बैठे थे। द्रौपदीके पाँचों पुत्र पराक्रम, सौन्दर्य और बलमें अपने पिता पाण्डवोंके ही समान थे। वे सब-के-सब शूरवीर थे ॥ ५-६ ॥
तथोपविष्टेषु महारथेषु
विराजमानाभरणाम्बरेषु।
रराज सा राजवती समृद्धा
ग्रहैरिव द्यौर्विमलैरुपैता ॥ ७ ॥
इस प्रकार चमकीले आभूषणों तथा सुन्दर वस्त्रोंसे विभूषित उन समस्त महारथियोंके बैठ जानेपर राजाओंसे भरी हुई वह समृद्धिशालिनी सभा ऐसी शोभा पा रही थी, मानो उज्ज्वल ग्रह-नक्षत्रोंसे भरा आकाश जगमगा रहा हो ॥ ७ ॥
ततः कथास्ते समवाययुक्ताः कृत्वा विचित्राः पुरुषप्रवीराः । तस्थुर्मुहूर्तं परिचिन्तयन्तः कृष्णं नृपास्ते समुदीक्षमाणाः ॥ ८ ॥ तदनन्तर उन शूरवीर पुरुषोंने समाजमें जैसी बातचीत करनी उचित है, वैसी ही विविध प्रकारकी विचित्र बातें कीं। फिर वे सब नरेश भगवान् श्रीकृष्णकी ओर देखते हुए दो घड़ीतक कुछ सोचते हुए चुप बैठे रहे ॥ ८ ॥
कथान्तमासाद्य च माधवेन संघट्टिताः पाण्डवकार्यहेतोः । ते राजसिंहाः सहिता ह्यशृण्वन् वाक्यं महार्थं सुमहोदयं च ॥ ९ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने पाण्डवोंके कार्यके लिये ही उन श्रेष्ठ राजाओंको संगठित किया था। जब उन सब लोगोंकी बातचीत बंद हो गयी, तब वे सिंहके समान पराक्रमी नरेश एक साथ श्रीकृष्णके सारगर्भित तथा श्रेष्ठ फल देनेवाले वचन सुनने लगे ॥ ९ ॥
श्रीकृष्ण उवाच
सर्वैर्भवद्भिर्विदितं यथायं युधिष्ठिरः सौबलेनाक्षवत्याम् । जितो निकृत्यापहृतं च राज्यं वनप्रवासे समयः कृतश्च ॥ १० ॥ **श्रीकृष्णने भाषण देना प्रारम्भ किया—**उपस्थित सुहृद्गण! आप सब लोगोंको यह मालूम ही है कि सुबलपुत्र शकुनिने द्यूतसभामें किस प्रकार कपट करके धर्मात्मा युधिष्ठिरको परास्त किया और इनका राज्य छीन लिया है। उस जूएमं यह शर्त रख दी गयी थी कि जो हारे, वह बारह वर्षोंतक वनवास और एक वर्षतक अज्ञातवास करे ॥ १० ॥
शक्तैर्विजेतुं तरसा महीं च सत्ये स्थितैः सत्यरथैर्यथावत् । पाण्डोः सुतैस्तद् व्रतमुग्ररूपं वर्षाणि षट् सप्त च चीर्णमग्र्यैः ॥ ११ ॥ पाण्डव सदा सत्यपर आरूढ़ रहते हैं। सत्य ही इनका रथ (आश्रय) है। इनमें वेगपूर्वक समस्त भूमण्डल-को जीत लेनेकी शक्ति है तथापि इन वीराग्रगण्य पाण्डु-कुमारोंने सत्यका खयाल करके तेरह वर्षोंतक वनवास और अज्ञातवासके उस कठोर व्रतका धैर्यपूर्वक पालन किया है, जिसका स्वरूप बड़ा ही उग्र है ॥ ११ ॥
त्रयोदशश्चैव सुदुस्तरोऽय-
मज्ञायमानैर्भवतां समीपे । क्लेशानसह्यान् विविधान् सहद्भि- र्महात्मभिश्चापि वने निविष्टम् ॥ १२ ॥ इस तेरहवें वर्षको पार करना बहुत ही कठिन था, परंतु इन महात्माओंने आपके पास ही अज्ञातरूपसे रहकर भाँति-भाँतिके असह्य क्लेश सहते हुए यह वर्ष बिताया है, इसके अतिरिक्त बारह वर्षोंतक ये वनमें भी रह चुके हैं ॥ १२ ॥
एतैः परप्रेष्यनियोगयुक्तै- रिच्छद्भिराप्तं स्वकुलेन राज्यम् । एवंगते धर्मसुतस्य राज्ञो दुर्योधनस्यापि च यद्धितं स्यात् ॥ १३ ॥ तच्चिन्तयध्वं कुरुपुङ्गवानां धर्म्यं च युक्तं च यशस्करं च । अधर्मयुक्तं न च कामयेत राज्यं सुराणामपि धर्मराजः ॥ १४ ॥ अपनी कुलपरम्परासे प्राप्त हुए राज्यकी अभिलाषासे ही इन वीरोंने अबतक अज्ञातावस्थामें दूसरोंकी सेवामें संलग्न रहकर तेरहवाँ वर्ष पूरा किया है। ऐसी परिस्थितिमें जिस उपायसे धर्मपुत्र युधिष्ठिर तथा राजा दुर्योधनका भी हित हो, उसका आपलोग विचार करें। आप कोई ऐसा मार्ग ढूँढ निकालें, जो इन कुरुश्रेष्ठ वीरोंके लिये धर्मानुकूल, न्यायोचित तथा यशकी वृद्धि करनेवाला हो। धर्मराज युधिष्ठिर यदि धर्मके विरुद्ध देवताओंका भी राज्य प्राप्त होता हो, तो उसे लेना नहीं चाहेंगे ॥ १३-१४ ॥
धर्मार्थयुक्तं तु महीपतित्वं ग्रामेऽपि कस्मिंश्चिदयं बुभूषेत् । पित्र्यं हि राज्यं विदितं नृपाणां यथापकृष्टं धृतराष्ट्रपुत्रैः ॥ १५ ॥ किसी छोटेसे गाँवका राज्य भी यदि धर्म और अर्थके अनुकूल प्राप्त होता हो, तो ये उसे लेनेकी इच्छा कर सकते हैं। आप सभी नरेशोंको यह विदित ही है कि धृतराष्ट्रके पुत्रोंने पाण्डवोंके पैतृक राज्यका किस प्रकार अपहरण किया है ॥ १५ ॥
मिथ्योपचारेण यथा ह्यनेन कृच्छ्रं महत् प्राप्तमसह्यरूपम् । न चापि पार्थो विजितो रणे तैः स्वतेजसा धृतराष्ट्रस्य पुत्रैः ॥ १६ ॥ कौरवोंके इस मिथ्या व्यवहार तथा छल-कपटके कारण पाण्डवोंको कितना महान् और असह्य कष्ट भोगना पड़ा है, यह भी आपलोगोंसे छिपा नहीं है। धृतराष्ट्रके उन पुत्रोंने
अपने बल और पराक्रमसे कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरको किसी युद्धमें पराजित नहीं किया था (छलसे ही इनका राज्य छीना) ॥ १६ ॥
तथापि राजा सहितः सुहृद्भि-
रभीप्सतेऽनामयमेव तेषाम् ।
यत् तु स्वयं पाण्डुसुतैर्विजित्य
समाहृतं भूमिपतीन् प्रपीड्य ॥ १७ ॥
तत् प्रार्थयन्ते पुरुषप्रवीराः
कुन्तीसुता माद्रवतीसुतौ च ।
बालास्त्विमे तैर्विविधैरुपायैः
सम्प्राथिता हन्तुममित्रसंघैः ॥ १८ ॥
राज्यं जिहीर्षद्भिरसद्भिरुग्रैः
सर्वं च तद् वो विदितं यथावत् ।
तथापि सुहृदोंसहित राजा युधिष्ठिर उनकी भलाई ही चाहते हैं। पाण्डवोंने दूसरे-दूसरे राजाओंको युद्धमें जीतकर उन्हें पीड़ित करके जो धन स्वयं प्राप्त किया था, उसीको कुन्ती और माद्रीके ये वीर पुत्र माँग रहे हैं। जब पाण्डव बालक थे—अपना हित-अहित कुछ नहीं समझते थे, तभी इनके राज्यको हर लेनेकी इच्छासे उन उग्र प्रकृतिके दुष्ट शत्रुओंने संघबद्ध होकर भाँति-भाँतिके षड्यन्त्रोंद्वारा इन्हें मार डालनेकी पूरी चेष्टा की थी; ये सब बातें आपलोग अच्छी तरह जानते होंगे ॥ १७-१८ १/२ ॥
तेषां च लोभं प्रसमीक्ष्य वृद्धं
धर्मज्ञतां चापि युधिष्ठिरस्य ॥ १९ ॥
सम्बन्धितां चापि समीक्ष्य तेषां
मतिं कुरुध्वं सहिताः पृथक् च ।
इमे च सत्येऽभिरताः सदैव
तं पालयित्वा समयं यथावत् ॥ २० ॥
अतः सभी सभासद् कौरवोंके बढ़े हुए लोभको, युधिष्ठिरकी धर्मज्ञताको तथा इन दोनोंके पारस्परिक सम्बन्धको देखते हुए अलग-अलग तथा एक रायसे भी कुछ निश्चय करें। ये पाण्डवगण सदा ही सत्यपरायण होनेके कारण पहले की हुई प्रतिज्ञाका यथावत् पालन करके हमारे सामने उपस्थित हैं ॥ १९-२० ॥
अतोऽन्यथा तैरुपचर्यमाणा
हन्युः समेतान् धृतराष्ट्रपुत्रान् ।
तैर्विप्रकारं च निशम्य कार्ये
सुहृज्जनास्तान् परिवारयेयुः ॥ २१ ॥
यदि अब भी धृतराष्ट्रके पुत्र इनके साथ विपरीत व्यवहार ही करते रहेंगे—इनका राज्य नहीं लौटायेंगे, तो पाण्डव उन सबको मार डालेंगे। कौरवलोग पाण्डवोंके कार्यमें विघ्न डाल रहे हैं और उनकी बुराईपर ही तुले हुए हैं; यह बात निश्चितरूपसे जान लेनेपर सुहृदों और सम्बन्धियोंको उचित है कि वे उन दुष्ट कौरवोंको (इस प्रकार अत्याचार करनेसे) रोकें ।। २१ ।।
युद्धेन बाधेयुरिमांस्तथैव तैर्बाध्यमाना युधि तांश्च हन्युः । तथापि नेमेऽल्पतया समर्था- स्तेषां जायायेति भवेन्मतं वः ।। २२ ।।
यदि धृतराष्ट्रके पुत्र इस प्रकार युद्ध छेड़कर इन पाण्डवोंको सतायेंगे, तो उनके बाध्य करनेपर ये भी डटकर युद्धमें उनका सामना करेंगे और उन्हें मार गिरायेंगे। सम्भव है, आपलोग यह सोचते हों कि ये पाण्डव अल्पसंख्यक होनेके कारण उनपर विजय पानेमें समर्थ नहीं हैं ।। २२ ।।
समेत्य सर्वे सहिताः सुहृद्भि- स्तेषां विनाशाय यतेयुरेव । दुर्योधनस्यापि मतं यथाव- न्न ज्ञायते किं नु करिष्यतीति ।। २३ ।।
तथापि ये सब लोग अपने हितैषी सुहृदोंके साथ मिलकर शत्रुओंके विनाशके लिये प्रयत्न तो करेंगे ही। (अतः इन्हें आपलोग दुर्बल न समझें) युद्धका भी निश्चय कैसे किया जाय; क्योंकि दुर्योधनके भी मतका अभी ठीक-ठीक पता नहीं है कि वह क्या करेगा? ।। २३ ।।
अज्ञायमाने च मते परस्य किं स्यात् समारभ्यतमं मतं वः । तस्मादितो गच्छतु धर्मशीलः शुचिः कुलीनः पुरुषोऽप्रमत्तः ।। २४ ।।
शत्रुपक्षका विचार जाने बिना आपलोग कोई ऐसा निश्चय कैसे कर सकते हैं? जिसे अवश्य ही कार्यरूपमें परिणत किया जा सके। अतः मेरा विचार है कि यहाँसे कोई धर्मशील, पवित्रात्मा, कुलीन और सावधान पुरुष दूत बनकर वहाँ जाय ।। २४ ।।
दूतः समर्थः प्रशमाय तेषां राज्यार्धदानाय युधिष्ठिरस्य ।
वह दूत ऐसा होना चाहिये, जो उनके जोश तथा रोषको शान्त करनेमें समर्थ हो और उन्हें युधिष्ठिरको इनका आधा राज्य दे देनेके लिये विवश कर सके ।। २४ ½ ।।
निशम्य वाक्यं तु जनार्दनस्य
धर्मार्थयुक्तं मधुरं समं च ॥ २५ ॥
समाददे वाक्यमथाग्रजोऽस्य
सम्पूज्य वाक्यं तदतीव राजन् ॥ २६ ॥
राजन्! भगवान् श्रीकृष्णका धर्म और अर्थसे युक्त, मधुर एवं उभयपक्षके लिये समानरूपसे हितकर वचन सुनकर उनके बड़े भाई बलरामजीने उस भाषणकी भूरि-भूरि प्रशंसा करके अपना वक्तव्य आरम्भ किया ॥ २५-२६ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि पुरोहितयाने प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोद्योगपर्वमें (द्रुपदके) पुरोहितका यात्राविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः
बलरामजीका भाषण
बलदेव उवाच
श्रुतं भवद्भिर्गदपूर्वजस्य
वाक्यं यथा धर्मवदर्थवच्च।
अजातशत्रोश्च हितं हितं च
दुर्योधनस्यापि तथैव राज्ञः॥ १॥
**बलदेवजी बोले—**सज्जनो! गदाग्रज श्रीकृष्णने जो कुछ धर्मानुकूल तथा अर्थशास्त्रसम्मत सम्भाषण किया है, उसे आप सब लोगोंने सुना है। इसीमें अजातशत्रु युधिष्ठिरका भी हित है तथा ऐसा करनेसे ही राजा दुर्योधनकी भलाई है॥ १॥
अर्धं हि राज्यस्य विसृज्य वीराः
कुन्तीसुतास्तस्य कृते यतन्ते।
प्रदाय चार्धं धृतराष्ट्रपुत्रः
सुखी सहास्माभिरतीव मोदेत्॥ २॥
वीर कुन्तीकुमार आधा राज्य छोड़कर केवल आधेके लिये ही प्रयत्नशील हैं। दुर्योधन भी पाण्डवोंको आधा राज्य देकर हमारे साथ स्वयं भी सुखी और प्रसन्न होगा॥ २॥
लब्ध्वा हि राज्यं पुरुषप्रवीराः
सम्यक्प्रवृत्तेषु परेषु चैव।
ध्रुवं प्रशान्ताः सुखमाविशेयु-
स्तेषां प्रशान्तिश्च हितं प्रजानाम्॥ ३॥
पुरुषोंमें श्रेष्ठ वीर पाण्डव आधा राज्य पाकर दूसरे पक्षकी ओरसे अच्छा बर्ताव होनेपर अवश्य ही शान्त (लड़ाई-झगड़ेसे दूर) रहकर कहीं सुखपूर्वक निवास करेंगे। इससे कौरवोंको शान्ति मिलेगी और प्रजावर्गका भी हित होगा॥ ३॥
दुर्योधनस्यापि मतं च वेत्तुं
वक्तुं च वाक्यानि युधिष्ठिरस्य।
प्रियं च मे स्याद् यदि तत्र कश्चिद्
व्रजेच्छमार्थं कुरुपाण्डवानाम्॥ ४॥
यदि दुर्योधनका भी विचार जाननेके लिये, युधिष्ठिरके संदेशको उसके कानोंतक पहुँचानेके लिये तथा कौरव-पाण्डवोंमें शान्ति स्थापित करनेके लिये कोई दूत जाय, तो यह मेरे लिये बड़ी प्रसन्नताकी बात होगी॥ ४॥
स भीष्ममामन्त्र्य कुरुप्रवीरं
वैचित्रवीर्यं च महानुभावम् । द्रोणं सपुत्रं विदुरं कृपं च गान्धारराजं च ससुतपुत्रम् ॥ ५ ॥ सर्वे च येऽन्ये धृतराष्ट्रपुत्रा बलप्रधाना निगमप्रधानाः । स्थिताश्च धर्मेषु तथा स्वकेषु लोकप्रवीराः श्रुतकालवृद्धाः ॥ ६ ॥ एतेषु सर्वेषु समागतेषु पौरेषु वृद्धेषु च संगतेषु । ब्रवीतु वाक्यं प्रणिपातयुक्तं कुन्तीसुतस्यार्थकरं यथा स्यात् ॥ ७ ॥
वह दूत वहाँ जाकर कुरुवंशके श्रेष्ठ वीर भीष्म, महानुभाव धृतराष्ट्र, द्रोण, अश्वत्थामा, विदुर, कृपाचार्य, शकुनि, कर्ण तथा दूसरे सब धृतराष्ट्रपुत्र, जो शक्तिशाली, वेदज्ञ, स्वधर्मनिष्ठ, लोकप्रसिद्ध वीर, विद्यावृद्ध और वयोवृद्ध हैं, उन सबको आमन्त्रित करे और इन सबके आ जाने एवं नागरिकों तथा बड़े बूढ़ोंके सम्मिलित होनेपर वह दूत विनयपूर्वक प्रणाम करके ऐसी बात कहे, जिससे युधिष्ठिरके प्रयोजनकी सिद्धि हो ॥ ५—७ ॥
सर्वास्ववस्थासु च ते न कोप्या ग्रस्तो हि सोऽर्थोबलमाश्रितैस्तैः । प्रियाभ्युपेतस्य युधिष्ठिरस्य द्यूते प्रसक्तस्य हृतं च राज्यम् ॥ ८ ॥
किसी भी दशामें कौरवोंको उत्तेजित या कुपित नहीं करना चाहिये, क्योंकि उन्होंने बलवान् होकर ही पाण्डवोंके राज्यपर अधिकार जमाया है। (युधिष्ठिर भी सर्वथा निर्दोष नहीं हैं, क्योंकि) ये जूएको प्रिय मानकर उसमें आसक्त हो गये थे। तभी इनके राज्यका अपहरण हुआ है ॥ ८ ॥
निवार्यमाणश्च कुरुप्रवीरः सर्वैः सुहृद्भिर्ह्ययमप्यतज्ज्ञः । स दीव्यमानः प्रतिदीव्य चैनं गान्धारराजस्य सुतं मताक्षम् ॥ ९ ॥ हित्वा हि कर्णं च सुयोधनं च समाह्वयद देवितुमाजमीढः । दुरोदरास्तत्र सहस्रशोऽन्ये युधिष्ठिरो यान् विषहेत जेतुम् ॥ १० ॥ उत्सृज्य तान् सौबलमेव चायं
समाह्वयत् तेन जितोऽक्षवत्याम् । अजमीढवंशी कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर जूएका खेल नहीं जानते थे। इसीलिये समस्त सुहृदोंके इन्हें मना किया था, (परंतु इन्होंने किसीकी बात नहीं मानी।) दूसरी ओर गान्धारराजका पुत्र शकुनि जूएके खेलमें निपुण था। यह जानते हुए भी ये उसीके साथ बारंबार खेलते रहे। इन्होंने कर्ण और दुर्योधनको छोड़कर शकुनिको ही अपने साथ जूआ खेलनेके लिये ललकारा था। उस सभामें दूसरे भी हजारों जुआरी मौजूद थे, जिन्हें युधिष्ठिर जीत सकते थे। परंतु उन सबको छोड़कर इन्होंने सुबलपुत्रको ही बुलाया। इसीलिये उस जूएमें इनकी हार हुई ।। ९-१० १/२ ।।
स दीव्यमानः प्रतिदेवनेन अक्षेषु नित्यं तु पराङ्मुखेषु ।। ११ ।। संरम्भमाणो विजितः प्रसह्म तत्रापराधः शकुनेर्न कश्चित् । जब ये खेलने लगे और प्रतिपक्षीकी ओरसे फेंके हुए पासे जब बराबर इनके प्रतिकूल पड़ने लगे, तब ये और भी रोषावेशमें आकर खेलने लगे। इन्होंने हठपूर्वक खेल जारी रखा और अपनेको हराया, इसमें शकुनिका कोई अपराध नहीं है ।। ११ १/२ ।।
तस्मात् प्रणम्यैव वचो ब्रवीतु वैचित्रवीर्यं बहुसामयुक्तम् ।। १२ ।। तथा हि शक्यो धृतराष्ट्रपुत्रः स्वार्थे नियोक्तुं पुरुषेण तेन । इसलिये जो दूत यहाँसे भेजा जाय, वह धृतराष्ट्रको प्रणाम करके अत्यन्त विनयके साथ सामनीतियुक्त वचन कहे। ऐसा करनेसे ही धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनको वह पुरुष अपने प्रयोजनकी सिद्धिमें लगा सकता है ।। १२ १/२ ।।
अयुद्धमाकाङ्क्षत कौरवाणां साम्नैव दुर्योधनमाह्वयध्वम् ।। १३ ।। साम्ना जितोऽर्थोऽर्थकरो भवेत् युद्धेऽनयो भविता नेह सोऽर्थः ।। १४ ।। कौरव पाण्डवोंमें परस्पर युद्ध हो, ऐसी आकांक्षा न करो—ऐसा कोई कदम न उठाओ। सन्धि या समझौतेकी भावनासे ही दुर्योधनको आमन्त्रित करो। मेल-मिलापसे समझा-बुझाकर जो प्रयोजन सिद्ध किया जाता है, वही परिणाममें हितकारी होता है। युद्धमें तो दोनों पक्षकी ओरसे अन्याय अर्थात् अनीतिको ही बर्ताव किया जाता है और अन्यायसे इस जगत्में किसी प्रयोजनकी सिद्धि नहीं हो सकती ।। १३-१४ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवं ब्रुवत्येव मधुप्रवीरे
शिनिप्रवीरः सहसोत्पपात ।
तच्चापि वाक्यं परिनिन्द्य तस्य
समाददे वाक्यमिदं समन्युः ॥ १५ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! मधुवंशके प्रमुख वीर बलदेवजी इस प्रकार कह ही रहे थे कि शिनिवंशके श्रेष्ठ शूरमा सात्यकि सहसा उछलकर खड़े हो गये। उन्होंने कुपित होकर बलभद्रजीके भाषणकी कड़ी आलोचना करते हुए इस प्रकार कहना आरम्भ किया ॥ १५ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि बलदेववाक्ये द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोद्योगपर्वमें बलदेववाक्यविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
तृतीयोऽध्यायः
सात्यकिके वीरोचित उद्गार
सात्यकिरुवाच
यादृशः पुरुषस्यात्मा तादृशं सम्प्रभाषते ।
यथारूपोऽन्तरात्मा ते तथारूपं प्रभाषसे ॥ १ ॥
**सात्यकिने कहा—**बलरामजी! मनुष्यका जैसा हृदय होता है, वैसी ही बात उसके मुखसे निकलती है। आपका भी जैसा अन्तःकरण है, वैसा ही आप भाषण दे रहे हैं ॥ १ ॥
सन्ति वै पुरुषाः शूराः सन्ति कापुरुषास्तथा ।
उभावेतौ दृढौ पक्षौ दृश्येते पुरुषान् प्रति ॥ २ ॥
संसारमें शूरवीर पुरुष भी हैं और कापुरुष (कायर) भी। पुरुषोंमें ये दोनों पक्ष निश्चितरूपसे देखे जाते हैं ॥
एकस्मिन्नेव जायेते कुले क्लीबमहाबलौ ।
फलाफलवती शाखे यथैकस्मिन् वनस्पतौ ॥ ३ ॥
जैसे एक ही वृक्षमें कोई शाखा फलवती होती है और कोई फलहीन। इसी प्रकार एक ही कुलमें दो प्रकारकी संतान उत्पन्न होती है, एक नपुंसक और दूसरी महान् बलशाली ॥ ३ ॥
नाभ्यसूयामि ते वाक्यं ब्रुवतो लाङ्गलध्वज ।
ये तु शृण्वन्ति ते वाक्यं तानसूयामि माधव ॥ ४ ॥
अपनी ध्वजामें हलका चिह्न धारण करनेवाले मधुकुलरत्न! आप जो कुछ कह रहे हैं, उसमें मैं दोष नहीं निकाल रहा हूँ, जो लोग आपकी बातें चुप-चाप सुन रहे हैं, उन्हींको मैं दोषी मानता हूँ ॥ ४ ॥
कथं हि धर्मराजस्य दोषमल्पमपि ब्रुवन् ।
लभते परिषन्मध्ये व्याहर्तुमकुतोभयः ॥ ५ ॥
भला, कोई भी मनुष्य भरी सभामें निर्भय होकर धर्मराज युधिष्ठिरपर थोड़ा-सा भी दोषारोपण करे, तो वह कैसे बोलनेका अवसर पा सकता है? ॥ ५ ॥
समाहूय महात्मानं जितवन्तोऽक्षकोविदाः ।
अनक्षज्ञं यथाश्रद्धं तेषु धर्मजयः कुतः ॥ ६ ॥
महात्मा युधिष्ठिर जूआ खेलना नहीं जानते थे, तो भी जूएके खेलमें निपुण धूर्तोंने उन्हें अपने घर बुलाकर अपने विश्वासके अनुसार हराया अथवा जीता है। यह उनकी धर्मपूर्वक विजय कैसे कही जा सकती है? ॥ ६ ॥
यदि कुन्तीसुतं गेहे क्रीडन्तं भ्रातृभिः सह ।
अभिगम्य जयेयुस्ते तत् तेषां धर्मतो भवेत् ।
समाहूय तु राजानं क्षत्रधर्मरतं सदा ॥ ७ ॥
निकृत्या जितवन्तस्ते किं नु तेषां परं शुभम् ।
कथं प्रणिपतेच्चायमिह कृत्वा पणं परम् ॥ ८ ॥ यदि भाइयोंसहित कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर अपने घरपर जूआ खेलते होते और ये कौरव वहाँ जाकर उन्हें हरा देते, तो यह उनकी धर्मपूर्वक विजय कही जा सकती थी। परंतु उन्होंने सदा क्षत्रियधर्ममें तत्पर रहनेवाले राजा युधिष्ठिरको बुलाकर छल और कपटसे उन्हें पराजित किया है। क्या यही उनका परम कल्याणमय कर्म कहा जा सकता है? ये राजा युधिष्ठिर अपनी वनवासविषयक प्रतिज्ञा तो पूर्ण ही कर चुके हैं, अब किस लिये उनके आगे मस्तक झुकायें—क्यों प्रणाम अथवा विनय करें? ।। ७-८ ।। वनवासाद् विमुक्तस्तु प्राप्तः पैतामहं पदम् । यद्ययं पापवित्तानि कामयेत युधिष्ठिरः ॥ ९ ॥ एवमप्ययमत्यन्तं परान् नार्हति याचितुम् । वनवासके बन्धनसे मुक्त होकर अब ये अपने बाप-दादोंके राज्यको पानेके न्यायतः अधिकारी हो गये हैं। यदि युधिष्ठिर अन्यायसे भी अपना धन, अपना राज्य लेनेकी इच्छा करें, तो भी अत्यन्त दीन बनकर शत्रुओंके सामने हाथ फैलाने या भीख माँगनेके योग्य नहीं हैं ।। कथं च धर्मयुक्तास्ते न च राज्यं जिहीर्षवः ॥ १० ॥ निवृत्तवासान् कौन्तेयान् य आहुर्र्विदिता इति । कुन्तीके पुत्र वनवासकी अवधि पूरी करके जब लौटे हैं, तब कौरव यह कहने लगे हैं कि हमने तो इन्हें समय पूर्ण होनेसे पहले ही पहचान लिया है। ऐसी दशामें यह कैसे कहा जाय कि कौरव धर्ममें तत्पर हैं और पाण्डवोंके राज्यका अपहरण नहीं करना चाहते हैं ।। १० १/२ ।। अनुनीता हि भीष्मेण द्रोणेन विदुरेण च ॥ ११ ॥ न व्यवस्यन्ति पाण्डूनां प्रदातुं पैतृकं वसु । वे भीष्म, द्रोण और विदुरके बहुत अनुनय-विनय करनेपर भी पाण्डवोंको उनका पैतृक धन वापस देनेका निश्चय अथवा प्रयास नहीं कर रहे हैं ।। ११ १/२ ।। अहं तु ताञ्छितैर्बाणैरनुनीय रणे बलात् ॥ १२ ॥ पादयोः पातयिष्यामि कौन्तेयस्य महात्मनः । मैं तो रणभूमिमें पैने बाणोंसे उन्हें बलपूर्वक मनाकर महात्मा कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरके चरणोंमें गिरा दूँगा ।। अथ ते न व्यवस्यन्ति प्रणिपाताय धीमतः ॥ १३ ॥ गमिष्यन्ति सहामात्या यमस्य सदनं प्रति । यदि वे परम बुद्धिमान् युधिष्ठिरके चरणोंमें गिरनेका निश्चय नहीं करेंगे, तो अपने मन्त्रियोंसहित उन्हें यमलोककी यात्रा करनी पड़ेगी ।। १३ १/२ ।। न हि ते युयुधानस्य संरब्धस्य युयुत्सतः ॥ १४ ॥
वेगं समर्थाः संसोढुं वज्रस्येव महीधराः । जैसे बड़े-बड़े पर्वत भी वज्रका वेग सहन करनेमें समर्थ नहीं हैं, उसी प्रकार युद्धकी इच्छा रखनेवाले और क्रोधमें भरे हुए मुझ सात्यकिके प्रहार-वेगको सहन करनेकी सामर्थ्य उनमेंसे किसीमें भी नहीं है ।। १४ १/२ ।।
को हि गाण्डीवधन्वानं कश्च चक्रायुधं युधि ।। १५ ।। मां चापि विषहेत् क्रुद्धं कश्च भीमं दुरासदम् । यमौ च दृढधन्वानौ यमकालोपमद्युती । विराटद्रुपदौ वीरौ यमकालोपमद्युती ।। १६ ।। को जिजीविषुरासादेद् धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् । कौरवदलमें ऐसा कौन है, जो जीवनकी इच्छा रखते हुए भी युद्धभूमिमें गाण्डीवधन्वा अर्जुन, चक्रधारी भगवान् श्रीकृष्ण, क्रोधमें भरे हुए मुझ सात्यकि, दुर्धर्ष वीर भीमसेन, यम और कालके समान तेजस्वी दृढ धनुर्धर नकुल-सहदेव, यम और कालको भी अपने तेजसे तिरस्कृत करनेवाले वीरवर विराट और द्रुपदका तथा द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नका भी सामना कर सकता है? ।। १५-१६ १/२ ।।
पञ्चैतान् पाण्डवेयांस्तु द्रौपद्याः कीर्तिवर्धनान् ।। १७ ।। समप्रमाणान् पाण्डूनां समवीर्यान् मदोत्कटान् । सौभद्रं च महेष्वासममरैरपि दुःसहम् ।। १८ ।। गदप्रद्युम्नसाम्बांश्च कालसूर्यानलोपमान् । द्रौपदीकी कीर्तिको बढ़ानेवाले ये पाँचों पाण्डव-कुमार अपने पिताके समान ही डील-डौलवाले, वैसे ही पराक्रमी तथा उन्हींके समान रणोन्मत्त शूरवीर हैं। महान् धनुर्धर सुभद्राकुमार अभिमन्युका वेग तो देवताओंके लिये भी दुःसह है, गद, प्रद्युम्न और साम्ब—ये काल, सूर्य और अग्निके समान अजेय हैं—इन सबका सामना कौन कर सकता है? ।। १७-१८ १/२ ।।
ते वयं धृतराष्ट्रस्य पुत्रं शकुनिना सह ।। १९ ।। कर्णं चैव निहत्याजावभिषेक्ष्याम पाण्डवम् । हमलोग शकुनिसहित धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनको तथा कर्णको भी युद्धमें मारकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरका राज्याभिषेक करेंगे ।। १९ १/२ ।।
नाधर्मो विद्यते कश्चिच्छत्रून् हत्वाऽऽततायिनः ।। २० ।। अधर्म्यमयशस्यं च शात्रवाणां प्रयाचनम् । आततायी शत्रुओंका वध करनेमें कोई पाप नहीं शत्रुओंके सामने याचना करना ही अधर्म और अपयशकी बात है ।। २० १/२ ।।
हद्गतस्तस्य यः कामस्तं कुरुध्वमतन्द्रिताः ।। २१ ।। निसृष्टं धृतराष्ट्रेण राज्यं प्राप्नोतु पाण्डवः ।
अद्य पाण्डुसुतो राज्यं लभतां वा युधिष्ठिरः ॥ २२ ॥ निहता वा रणे सर्वे स्वप्स्यन्ति वसुधातले ॥ २३ ॥ अतः पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके मनमें जो अभिलाषा है, उसीकी आपलोग आलस्य छोड़कर सिद्धि करें। धृतराष्ट्र राज्य लौटा दें और पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर उसे ग्रहण करें। अब पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको राज्य मिल जाना चाहिये, अन्यथा समस्त कौरव युद्धमें मारे जाकर रणभूमिमें सदाके लिये सो जायँगे ॥ २१—२३ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि सात्यकिक्रोधवाक्ये तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोद्योगपर्वमें सात्यकिका क्रोधपूर्ण वचनसम्बन्धी तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥